राम बचन गुरु नृपहिं सुनाए। सील स्नेह सुभायं सुहाए। महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धर्म सहित हित होई।।_अर्थ_गुरुजी ने श्रीरामचन्द्रजी के शील और स्नेह से युक्त स्वभाव से ही सुन्दर वचन राजा जनकजी को सुनाये ( और कहा_ ) हे महाराज ! अब वही कीजिये जिसमें सबका धर्म सहित हित हो।
ग्यान निधान सुजान सुचि धर्मवीर नरपाल। तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल ।।_अर्थ_हे राजन् ! तुम ग्यान के भण्डार, सुजान, पवित्र और धर्म में धीर हो। इस समय तुम्हारे बिना इस दुविधा को दूर करने में और कौन समर्थ है ?
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।। सिथिल सनेहं गुनत मन माहीं। आए यहां कीन्ह भल नाहीं।।_अर्थ_ मुनि वशिष्ठजी के वचन सुनकर जनकजी प्रेम में मग्न हो गये। उनकी दशा देखकर ग्यान और वैराग्य को भी वैराग्य हो गया ( अर्थात् उनके ज्ञान_वैराग्य छूट_से गये ) वे प्रेम से शिथिल हो गये और मन में विचार करने लगे कि हम यहां आये, यह अच्छा नहीं किया।
रामहिं रांय कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।। हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।।_अर्थ_राजा दशरथ जी ने श्रीरामचन्द्रजी को वन में जाने के लिये कहा और स्वयं अपने प्रिय के प्रेम को प्रमाणित ( सच्चा ) कर दिया ( प्रिय वियोग में प्राण त्याग दिये )। परन्तु अब इन्हें वन से ( और गहन ) वन को भेजकर अपने विवेक की बड़ाई में आनन्दित होते हुए लौटेंगे ( कि हरमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजी को वन में छोड़कर चले आये, दशरथ जी की तरह मरे नहीं ! )
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेमबस बिकल बिसेषी।। समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।।_अर्थ_ तपस्वी, सुनि और ब्राह्मण सब यह सुन और देखकर प्रेमवश बहुत ही व्याकुल हो गये। समय का विचार करके राजा जनकजी धीरज धरकर समाजसहित भरत के पास चले।
भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।। तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहिं विदित रघुबीर सुभाऊ।।_अर्थ_भरतजी ने आकर उन्हें आगे होकर लिया ( सामने आकर उनका स्वागत किया ) और समयानुकूल अच्छे आसन दिये। तेरहुतिराज जनकजी कहने लगे _हे तात भरत ! तुमको श्रीरामजी का स्वभाव मालूम ही है।
राम सत्यव्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु। संकट सहित सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील और स्नेह रखनेवाले हैं, इसीलिये वे संकोचवश संकट सह रहे हैं; अब तुम जो आज्ञा दो, वह उनसे कही जाय।
सुनि तन पुलक नयन भरी बारी। बोले भर्ती धीर धरि भारी।। प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुल गुरु सम हित मार न बापू।।_अर्थ_भरतजी यह सुनकर पुलकशरीर हो नेत्रों में जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले_हे प्रभु ! आप हमारे पिता के समान प्रिय और पूज्य हैं। और कुल गुरु श्रीवशिष्ठजी के समान हितैषी तो माता_पिता भी नहीं है।
कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।। सासु सेवकु आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।।_अर्थ_ विश्वामित्रजी आदि मुनियों और मंत्रियों का समाज है। और आज के दिन ग्यान के समुद्र आप भी उपस्थित हैं। हे स्वामी ! मुझे अपना बच्चा , सेवक और आज्ञानुसार चलनेवाला समझकर शिक्षा दीजिये।
एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर।। छोटे बदन कहौं बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।।_अर्थ_इस समाज और ( पुण्य ) स्थल में आप ( जैसे ज्ञानी और पूज्य )_का पूछना ! इसपर यदि मौन रहता हूं तो मलिन समझा जाऊंगा; और बोलना पागलपन होगा तथापि मैं छोटे मुंह से बड़ी बात कहता हूं। हे तात ! विधाता को प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजिएगा।
आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना।। स्वामि धर्म स्वारथहिं बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहिं न प्रबोधू।।_अर्थ_वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है। स्वामि धर्म में ( स्वामी के प्रति कर्तव्यपालन में ) और स्वार्थ में विरोध है ( दोनों एक साथ नहीं निभ सकते ) वैर अंधा होता है और प्रेम को ज्ञान नहीं रहता ( मैं स्वार्थवश कहूंगा या प्रेमवश, दोनों में ही भूल होने का भय है।
राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि। सब करें संमत सिर्फ हित करिअ पेमु पहिचानि।।_अर्थ_अतएव मुझे पराधीन जानकर ( मुझसे न पूछकर ) श्रीरामचन्द्रजी के रुख ( रुचि ), धर्म और ( सत्य के ) व्रत को रखते हुए, जो सबके सम्मत और सबके लिये हितकारी है तो आप सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिये।
भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।। सुगम अगम मृदु मंजुल कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।।_अर्थ_भरतजी के वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाजसहित राजा जनक उनकी सराहना करने लगे। भरतजी के वचन सुगम और अगम, सुन्दर, कोमल और कठोर हैं। उनमें अक्षर थोड़े हैं परन्तु अर्थ अत्यन्त अपार भरा हुआ है।
ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी। इसी न जाइ अस अदभुत बानी।। भूप भरत मुनि सहित समाजू। गए जहं बिबुध कुमुद द्विजराजू।।_अर्थ_ जैसे ( मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण में दिखता है और दर्पण अपने हाथ में है, फिर भी वह ( मुख का प्रतिबिम्ब पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजी की यह अद्भुत वाणी भी पकड़ में नहीं आती ( शब्दों से उसका आशय समझ में नहीं आता )। ( किसी से कुछ उत्तर देते नहीं बना ), तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वशिष्ठजी समाज के साथ वहां गये जहां देवता रुपी कुमुदों को खिलानेवाले ( सुख देनेवाले ) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे।
सुनि सुनि सोच बिकल सब लोगा। मनहुं मीनगन नव जल जोगा।। देवं प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।_अर्थ_यह समाचार सुनकर सबलोग सोच से व्याकुल हो गये, जैसे नये ( पहली वर्षा के ) जल के संयोग से मछलियां व्याकुल होती हैं। देवताओं ने पहले कुलगुरू वशिष्ठजी की ( प्रेमविह्वल दशा देखी,फिर विदेहराज के विशेष स्नेह को देखा।
राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वार्थी हहरि हियं हारे।। सब कोई राम प्रेममय पेखा। भए अलेख सोचबस लेखा।।_अर्थ_और तब श्रीराम भक्ति से ओत-प्रोत भरतजी को देखा। इन सबको देखकर स्वार्थी देवता घबराकर हृदय में हार मान गये ( निराश हो गये )। उन्होंनेसब किसी को श्रीराम प्रेम में सराबोर देखा। इससे देवता इतने सोच के वश हो गये कि जिसका कोई हिसाब नहीं।
रामु सनेह सकोचबस कह ससोच सुरराजु। राहु प्रपंचहिं पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।_अर्थ_ देवराज इन्द्र सोच में भरकर कहने लगे कि श्रीरामचन्द्रजी तो स्नेह स्नेह और संकोच के वश में हैं। इसलिये सबलोग मिलकर कुछ प्रपंच ( माया ) रचो; नहीं तो काम बिगड़ा ( ही समझो )।
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव संरचनागत पाहीं।। फेरी भरत मति करि निज माया। पाली बिबुध कुल करि छल छाया।।_अर्थ_ देवताओं ने सरस्वती का स्मरण कर उनकी सराहना ( स्तुति ) की और कहा _हे देवी ! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरतजी की बुद्धि को फेर दीजिये। और छल की छाया कर देवताओं के कुल का पालन ( रक्षा ) कीजिये।
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।। मैं सन कहहु भरत मति फेरूं। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।_अर्थ_ देवताओं की विनती सुनकर और देवताओं के स्वार्थ के वश होने से मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं_मुझसे कह रहे हो कि भरतजी की मति पलट दो ! हजार नेत्रों से भी तुमको सुमेरु नहीं सूझ पड़ता।
बिधि हरि हर माया बड़ा भारी। सोउ न भरत गति सका निहारी।। सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।।_अर्थ_ रस्ता, विष्णु और महेश की माया बड़ी प्रबल है। किन्तु वह भी भरतजी की बुद्धि की ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धि को, तुम मुझसे कह रहे हो कि बोली करदो ( भुलावे में डाल दो ) । अरे ! चांदनी कहीं प्रचंड किरण वाले सूर्य को चुरा सकती है ?
भरत हदय श्रीराम निवासू। तहं कि तिमिर जहं तरनि प्रकासू।। अस कहि सारद गई बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुं कोका।।_अर्थ_भरतजी के हृदय में श्रीसीतारामजी का निवास है। जहां सूर्य का प्रकाश है, वहां कहीं अंधेरा रह सकता है ? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोक को चली गयीं। देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रि में चकवा व्याकुल होता है।
सुर स्वार्थी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु। रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।_अर्थ_मलिन मन वाले स्वार्थी देवताओं ने बुरी सलाह करके बुरा ठाट ( षड्यंत्र ) रचा। प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया।
करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सभी काजु अकाजू।। गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।_अर्थ_कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि काम का बनना_बिगड़ना सब भरतजी के हाथ है। इधर राजा जनकजी ( मुनि वशिष्ठ आदि के साथ ) श्रीरघुनाथजी के पास गये। सूर्यकुल के दीपक श्रीरामचन्द्रजी ने सबका सम्मान किया।
समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।। जनक भरत संबादु सुनाई । भरत कहाउति कही सुहाई।।_अर्थ_तब रघुकुल के पुरोहित वशिष्ठजी समय, समाज और धर्म के अवइरओधई ( अर्थात् अनुकूल ) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजी का संवाद सुनाया। फिर भरतजी की कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायी।