Thursday, 18 December 2025

अयोध्याकाण्ड

अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएं बिचारु न सोचु खरो सो।। आरती मोर नाथ कर छोहू। दुहूं मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।।_अर्थ_मुझे सब प्रकार से ऐसा बहुत भरोसा है। विचार करने पर तिनके के बराबर ( जरा_सा ) भी सोच नहीं रह जाता। मेरी दीनता और स्वामी का स्नेह दोनों ने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ढ़ीठ बना दिया है।

यह बड़ दोषु दूरी करि स्वामी। तजि संकोच सिखइअ अनुगामी।। भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।_अर्थ_हे स्वामी ! इस बड़े दोष को दूर करके संकोच को त्यागकर मुझ सेवक को शिक्षा दीजिये। दूध और जल को अलग_अलग करने में हंसिनीकी_सी गतिवाली भरतजी की विनती सुनकर उसकी सभी ने प्रसंशा की।

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दिन छलहीन।देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।_अर्थ_ दीनबंधु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजी के दिन और छलरहित वचन सुनकर देश, काल और अवसर के अनुकूल वचन बोले _।

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहिं नृपहिं घर बन की।। माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहिं तुम्हहिं सपनेहुं न ।_अर्थ_हे तात ! तुम्हारी, मेरी, परिवार की,  घर की और वन की सारी चिंता गुरु वशिष्ठजी और महाराज जनकजी को है। हमारे सिर पर जब गुरुजी, गुरु विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें स्वप्न में भी क्लेश नहीं है।

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजस धरम परमारथु।। पितु आयसु पालिहि दुहुं भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।।_अर्थ_मेरा और तुम्हारा जो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धैर्य और परमार्थ इसी में है कि हम दोनों पिताजी की आज्ञा का पालन करें। राजा की भलाई ( उसके व्रत की रक्षा )_से ही लोक और वेद दोनों में भला है।

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चले हुं कुमार पग परहिं न खालें।। अस बिचारि सब सोच बिहाई। पारसु अवध अवधि भरि जाई।।_अर्थ_गुरु, पिता, माता, और स्वामी की शिक्षा ( आज्ञा )_का पालन करने पर कुमार्ग पर भी चलने से पैर गड्ढे में नहीं पड़ता ( पतन नहीं हसीं होता )। ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधिभर उसका पालन करो।

देसु कोसी परिजन परिवारू। गुर पद राजहिं लाख छरुभारू।। तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।_अर्थ_देश, खजाना, कुटुम्ब परिवार आदि सबकी जिम्मेदारी तो गुरुजी की चरण रज पर है।तुम तो मुनि वशिष्ठजी, माताओं और मंत्रियों की शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानी का पालन ( रक्षा ) भर करते रहना। 

मुखिया मुख सो चाहिऐ खान पान कहुं एक। पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक।।_अर्थ_तुलसीदासजी कहते हैं_(श्रीरामजी ने कहा_) मुखिया मुख के समान होना चाहिये, जो खाने_पीने को तो एक अकेला है, परन्तु विवेकपूर्वक सब ( अकेला ) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन _पोषण करता है।

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन मांस मनोरथ गोई।। बंधु प्रबोधु कीन्ह बहुत भांती। बिनु आधार मन तोषी न सांती।।_अर्थ_ राजधर्म का सर्वस्व ( सार ) भी इतना ही है। जैसे मन के भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजी ने भाई भरत को बहुत प्रकार से समझाया। परन्तु कोई अवलम्ब पाये बिना उनके मन में न संतोष हुआ न शांति।

भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच स्नेह बिबस रघुराजू।। प्रभु करि कृपां पआंवरईं दीन्हा सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।_अर्थ_इधर तो भरतजी का शील ( प्रेम ) और उधर गुरुजनों, मंत्रियों और समाज की उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेह के विशेष वशीभूत हो गये। ( अर्थात् भरतजी के प्रेमवश उन्हें पांवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदि का संकोच भी होता है। ) आखिर ( भरतजी के प्रेमवश ) प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने कृपा कर खड़ाऊं दे दीं और भरतजी ने उन्हें आदरपूर्वक सिर पर धारण कर लिया।

चरन पीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिनि प्रजा प्रान के। संपुट भरत सनेहं रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के।।_अर्थ_ करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजी के दोनों खड़ाऊं प्रजा के प्राणों की रक्षा के लिये मानो दो पहरेदार हैं। भरतजी के प्रेम रुपी रत्न के लिये मानो डिब्बा है और जीवन के साधन के लिये मानो राम_नाम के दो अक्षर हैं।

कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के। भरत मुदित अवलम्ब लहे तें। अस सुख जस सिर रामु रहे तें।।_अर्थ_रघुकुल ( की रक्षा )_के लिये दो किवाड़ हैं। कुशल ( श्रेष्ठ ) कर्म करने के लिये दो हाथ की भांति ( सहायक ) हैं। और सेवा रूपी श्रेष्ठ  धर्म को बुझाने के लिये निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अधर्म।ब के मिल जाने से परम आनंदित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसे श्रीसीतारामजी के रहने से होता।

मागेउ विदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ। लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ।।_अर्थ_भरतजी ने प्रणाम करके विदा मांगी, तब श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें हृदय से लगा लिया। इधर कुटिल इन्द्र ने बुरा मौका पाकर लोगों का उच्चाटन कर दिया।

सो कुचालि सब कहं भी नीकी। अवधि इस समय जीवनि जी की।। नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।_अर्थ_वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधि के आशा के समान ही जीवन के लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो ( उच्चाटन न होता तो ) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजीके वियोग रूपी बुरे लोग से सब लोग घबराकर (हाय_हाय करके ) मर ही जाते।

रामकृपां अवरेब सुधारी। बिबुध धारा भी गुनद गोहारी।। भेंटत भुज भरी भाई भरत सो राम प्रेम हो कहा न परत सो।।_अर्थ_श्रीरामजी की कृपा ने सारी उलझन सुधार दी। देवताओं की सेना जो लूटने आई थी, वहीं गुणदायक ( हितकारी ) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओं में भरकर भरत से मिल रहे हैं। श्रीरामजी के प्रेम का वह रस ( आनन्द ) कहते नहीं बनता।

तन मन बचन उमंग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।। बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दशा सुर सभा दुखारी।।_अर्थ_तन, मन और वचन तीनों में प्रेम उमड़ पड़ा। धीरज की धूरी धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजी ने धीरज त्याग दिया। वे कमलसदऋश नेत्रों से ( प्रेमाश्रुओं का जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओं की सभा ( समाज ) दु:खी हो गयी।

मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से।। जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।।_अर्थ_मुनिगन, गुरु वशिष्ठजी और जनकजी_सरीखे धीर धुरंधर जो अपने मनों को ज्ञानरुपी अग्नि में सोने के समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजी ने निर्लेप ही रचा और जो जगत् रूपी जल में कमल के पत्ते के तरह ही ( जगत् में रहते हुए भी जगत् से अनासक्त ) पैदा हुए।

तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार। भए मगन मन तन बचन सहित बिरागु बिचार।।_अर्थ_वे भी श्रीरामजी और भरतजी के उपमारहित अपार प्रेम को देखकर वैराग्य और विवेक सहित तीन, मन, वचन से उस प्रेम में मग्न हो गये।

जहां जनक गुरु गति मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहते बड़ि खोरी।। बरनत रघुबर भरत बियोगू।  सुनि कठोर छबि जानहिं लोगू।।_अर्थ_जहां जनकजी और गुरु वशिष्ठजी की बुद्धि की गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेम को प्राकृत ( लौकिक ) कहने में बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी के वियोग का वर्णन करते सुनकर लोग कवि को कठोर हृदय कहेंगे।

सो सकोच रही अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।। भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनू हर्षा उर लाए।।_अर्थ_वह संकोच रस अकथनीय है। अतएव कवि की सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेम को स्मरण करके सकुचा गये। भरतजी को भेंटकर श्रीरघुनाथजी ने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर श्रीरघुनाथजी को हृदय लगा लिया।

सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई।। सुनि दारुन दुखु दुहूं समाजा। लगे चलन के साजन साजा।।_अर्थ_सेवक और मंत्री भरतजी का रुख पाकर सब अपने_अपने कामों में जा लगे। यह सुनकर दोनों समाजों में दारुण दु:ख छा गया। वे चलने की तैयारियां करने लगे।

प्रभु पद पदुम बंदी दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई।। मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी।।_अर्थ_प्रभु के चरणकमलों की वन्दना करके तथा श्रीरामजी की आज्ञा को सिर पर रखकर भरत_शत्रुध्न दोनो भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार_बार सम्मान करके उनकी विनती की।

लखनहिं भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि। चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।_अर्थ_फिर लक्ष्मणजी को क्रमशः भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजी के चरणों की धूरलि को सिर पर धारण करके और समस्त मंगलों के मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेम सहित चले।

सानुज राम नृपहिं सिर नाई। कीन्ह बहुबिधि बिनय बड़ाई।। देव दया बस दुखी पायी। सहित समाज काननहिं आयु।।_अर्थ_छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत श्रीरामजी ने राजा जनकजी को सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकार से विनती की ( और कहा_) है देव ! दयावश आपने बहुत दु:ख पाया। आप समाजसहित वन में आये।

पुर पगु धारिअ देख असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।। मुनि महिदेव साधु सनमाने। विदा किए हरि हर सम जाने।।_अर्थ_अब आशीर्वाद देकर नगर को पधारिये। यह सुन राजा जनकजी ने धीरज धरकर गमन किया। फिर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि ब्राह्मण और साधुओं को विष्णु और शिव के समान जानकर सम्मान कर उनको विदा किया।

सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदी पग आसिफ पाई।। कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।_अर्थ_ तब श्रीराम लक्ष्मण दोनों भाई ( सुनयनाजी) के पास गये और उनके चरणों की वन्दना करके छोटे भाई लक्ष्मण सहित आशीर्वाद पाकर लौट आये। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरण वाले कुटुम्बी, नगर निवासी और मंत्री_

जथा जोगु करि विनय प्रनामा। विदा किए सब सानुज रामा।। नारी पुरुष लघु मध्यम बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।_अर्थ_सबको छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्रजी ने जथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने छोटे, मध्यम और बड़े सभी श्रेणी के स्त्री-पुरुषों का सम्मान करके उनको लौटाया।

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेह मिला भेंटि। विदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।_अर्थ_भरत की माता कैकेयी के चरणों की वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने पवित्र ( निश्छल ) प्रेम के साथ उनसे मिल_भेंटकर तथा उनके सारे संकोच और सोच को मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया।

परिजन मातु पिता मिलि सीता। फिर प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।। करि प्रणाम भेंटी सब सासू। प्रीति कहते कबि हियं न हुलासू।।_अर्थ_प्राणप्रिय पति श्रीरामचन्द्रजी के साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नैहर के कुटुम्बभर तथा माता_पिता से मिलकर लौट आयीं। फिर प्रणाम करके सब सासुओं से गले लगकर मिलीं। उसने प्रेम का वर्णन करने के लिये कवि के हृदय में हुलास ( उत्साह ) नहीं होता।

सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहुं प्रीति समाई। रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई।।_अर्थ_उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासुओं तथा माता_पिता दोनों ओर की प्रीति में हमारी ( बहुत देर तक निमग्न ) रहीं। ( तब ) श्रीरघुनाथजी ने सुन्दर पालकियां मंगवायीं और सब माताओं को आश्वासन देकर उनपर चढ़ाया।
 
बार बार मिलि मिलि दुहुं भाई। हम सनेहं जननीं पहुंचाईं।। साजि बाजी गए बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना।।_अर्थ_ दोनों भाइयों ने ने माताओं से समान प्रेम से बार_बार मिलजुलकर उनको पहुंचाया। भरतजी और राजा जनकजी के दलों ने घोड़े, हाथी आदि पशु हृदय में सारे ( शिथिल ) हुए परवश मन मारे चले जा रहे हैं।