हृदयं रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता।। बसह बाजि गज पसु हियं हारें। चले जाहिं परबह मन मारें।।_अर्थ_सीताजी एवं लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में रखकर सब लोग बेसुध होकर चले जा रहे हैं। बैल, घोड़े हाथी आदि पशु हृदय में सारे ( शिथिल हुए ) परवश मन मारे चले जा रहे हैं।
गुर गुरतिय बंदि प्रभु सीता लखन समेत। फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत।।_अर्थ_गुरु वशिष्ठजी और गुरुपत्नी अरुंधतिजी के चरणों की वन्दना करके सीताजी और लक्ष्मणजी संहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी हर्ष और विषाद के साथ लौटकर पर्णकुटी पर आए।
विदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयं बड़ बिरह बिषादू।। कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।।_अर्थ_फिर सम्मान करके निषादराज को विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदय में विरह का बड़ा भारी विषाद था। फिर श्रीरामजी ने कोल, किरात, भील आदि बनवासी लोगों को लौटाया। वे सब जोहार_जोहारकर ( वन्दना कर_करके ) लौटे।
प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहिं।। भरत सनेहं सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहहिं बखानी।।_अर
थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़ की छाया में बैठकर प्रियजन और परिवार के वियोग से दु:की हो रहे हैं। भरतजी के स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणी को बखान_बखानकर वे प्रिय पत्नी सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी से कहने लगे ।
प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।। तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट घर अचर मलीना।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम के वश होकर भरतजी के वचन, मन, कर्म की प्रीति तथा विश्वास का अपने श्रीमुख से वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जल की मछलियां, चित्रकूट के सभी चेतन और जड़ जीव उदास हो गये।
बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहा गति घर घर की।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी की दशा देखकर देवताओं ने उनपर फूल बरसाकर अपनी घर_घर की दशा कहीं ( दुखड़ा सुनाया) ।प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया। तब वे प्रसन्न होकर चले, मन में जरा_सा भी डर न रहा।
सानुज सीय समेत प्रभु राज्य परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।_अर्थ_छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी समेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञानऔ शरीर धारण करके शोभित हो रहे हैं।
मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहं सब साजु बिहालू।। प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहिं।_अर्थ_मुनि, ब्राह्मण, गुरु वशिष्ठजी, भरतजी और राजा जनकजी_ सारा समाज श्रीरामचन्द्रजी के बिरह में विह्वल है। प्रभु के गुणसमूहों का मन में स्मरण करते हुए सबलोग मार्गं में चुपचाप चले जा रहे हैं।
जमुना उतरि पार सबु भयऊ। सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।। उतरि देवसरी दूसर बासू। रामसखां सब कीन्ह सुपासू।।_अर्थ_( पहले दिन ) सबलोग यमुनाजी उतरकर फिर हुए। वह दिन बिना भोजन के ही बीत गया। दूसरा मुकाम गंगाजी उतरकर ( गंगापार श्रृंगवेरपुर में ) हुआ। वहां रामसखा निषादराज ने सब सुप्रबन्ध कर दिया।
सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए।। जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज संभारी।।_अर्थ_फिर ही उतरकर गोमतीजी में स्नान किया और चौथे दिन सब अयोध्याजी आ पहुंचे। जनकजी चार दिन अयोध्याजी में रहे और राजकाज एवं सब साझ_सामान को संभालकर_
सौंपि सचिव गुर भरतहिं राजू। तेरहुति चले साजि सब साजू।। नगर नारी नर गुरु सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।_अर्थ_तथा मंत्री, गुरुजी और भरतजी को राज्य सौंपकर, सारा साज_समाज ठीक करके तिरहुत को चले। नगर के स्त्री-पुरुष गुरुजी की शिक्षा मानकर श्रीरामजी की राजधानी अयोध्या में सुखपूर्वक रहने लगे।
राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपवास। तजि तथा भूषण भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।_अर्थ_सबलोग श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये नियम और उपवास करने लगे। वे भूषण और भोग सुखों को छोड़ _छोड़कर अवधि की आशा पर जी रहे हैं।
सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाई सिख ओंधे।। पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।।_अर्थ_भरतजी ने मंत्रियों और विश्वासी सेवकों को समझाकर उद्यत किया। वे सब सीख पाकर अपने _अपने काम में लग गये। फिर छोटे भाईशत्रुध्नजी को बुलाकर शिक्षा दी और सब राजाओं की सेवा उनको सौंपी।
भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रणाम बय बिनय निहोरे।। ऊंच नीच कारजु भल पोचू।।_अर्थ_ब्रहमणों को बुलाकर भरतजी ने हाथ जोड़कर प्रणाम करके अवस्था के अनुसार विनय और निहोरा किया कि आपलोग ऊंचा_नीचा ( छोटा_बड़ा ), अच्छा_गंदा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा।
परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधी करि सुबह बसाए।। सानुज गए गुर गेहूं बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।।_अर्थ_ भरतजी ने फिर परिवार के लोगों को तथा अन्य प्रजा को बुलाकर उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया। फिर छोटे भाई शत्रुध्नसहित वे गुरुजी के घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले_।
आयसु होई त रहउं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकित सपेमा।। समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहिं सोई।।_अर्थ_आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूं ! मुनि वशिष्ठजी पपप्रेम के साथ बोले_हे भरत ! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वहीं जगत् में धर्म का सार होगा।
सुनि सिख पाई असीस बड़ि खनक बोली दानी साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।_अर्थ_भरतजी ने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियों को बुलाया और दिन ( अच्छा मुहूर्त ) साधकर प्रभु की चरण पादुकाओं को निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासन पर विराजित कराया।
राम मातु गुरु पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।। नंदगांव करि परन कुटीरा। कीन्ह निवास धरमु धुर धीरा।।_अर्थ_फिर श्रीरामजी की माता कौसल्याजी और गुरुजी के चरणों में सिर नवाकर और प्रभु की चरणपादुकाओं को निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासन पर विराजित किया।
जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस सांथरी संवारी।। आसन बसन बासन ब्रत नेमा करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।।_अर्थ_ सिर पर जटा जूट और शरीर में मुनियों के वल्कल वसन धारण कर, पृथ्वी को खोलकर उसके अन्दर खुश की आसनी बिछायी। भोजन, वस्त्र, बर्तन, व्रत, नियम_सभी बातों में वे ऋषियों के कठिन धर्म का पालन करने लगे।
भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तीन तूरी।। अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथजई धनु सुनि नन्दी लजाई।।।_अर्थ_गहने, कपड़े और अनेक प्रकार के भोग सुखों को मन, तन और वचन से तृण तोड़कर ( प्रतिज्ञा करके ) त्याग दिया। जिस अयोध्या के राज्य को देखकर देवराज इन्द्र सिहाते थे और ( जहां के राजा ) दशरथ जी की सम्मति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे,।
तेहि पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।। रमा बिलासु राम अनुरागी। रजत बमन जिमि जन बड़भागी ।।_अर्थ_उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर भरतजी इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पा के बाग में भौंरा। श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी बड़ भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास ( भोगोश्वैर्ज ) को चमन की भांति त्याग देते हैं। ( फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं ।)
राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहियत टेंक बिबेक विभूति।।_अर्थ_फिर भरतजी तो ( स्वयं ) श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के पात्र हैं। वे इस ( भोगैश्वर्यत्यागरूप ) करनी से बड़े नहीं हुए ( अर्थात् उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं हैं )। ( पृथ्वी पर का जल न पीने की ) टेक से चातक की और नीर_क्षीर_ विवेक की विभूति ( शक्ति )_से हंस की सराहना होती है।
देह दिनहुं दिन दूबर होई। घंटी तेजी बलु सुखछबि सोई।। नित नव राम प्रेम पशु पीना। बढ़त धरम दलउ मनु न मलीना।।_अर्थ_भरतजी का शरीर दिनों-दिन दुबला होता जाता है। तेज ( अन्न, घृत आदि आदि से उत्पन्न होनेवाला भेद ) घट रहा है। बल और मउखछबइ ( मुख की कान्ति अथवा शोभा ) वैसी ही बनी हुई है। राम प्रेम का प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्म का दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है ( अर्थात् प्रसन्न हैं )।
( संस्कृत कोष में 'तेज' का अर्थ भेद मिलता है और यह अर्थ लेने से 'घटइ' के अर्थ में भी किसी प्रकार की खींच_तान नहीं करनी पड़ती। )
जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बने बिकासे।। सम दम संजम नियम उपासा। नाथ भरत हिय बिमल अकासा।।_अर्थ_जैसे शरद् ऋतु के प्रकाश ( विकास )_से जल घटता है, किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं। शम, दम, संयम, नियम और उपवास आदि भरतजी के हृदयरूपी निर्मल आकाश के नक्षत्र ( तारागण ) हैं।
ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी। राम पेम बिनु अचल अदोषा।। सहित समाज सोह नित चोखा।।_अर्थ_विश्वास ही ( उस आकाश में ) ध्रुवतारा है, चौदह वर्ष की अवधि ( का ध्यान ) पूर्णिमा के समान है और स्वामी श्रीरामजी की सुरति ( स्मृति ) आकाशगंगा _सरीखी प्रकाशित है। राम प्रेम ही अचल ( सदा रहनेवाला ) और कलंकरहइत चन्द्रमा है। वह अपने समाज ( नक्षत्रों ) सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है।
भरत रहनि समुझनि करतूति। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती। बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।_अर्थ_भरतजी की रहनी, समझ, करनी, भक्ति , बैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्य का वर्णन करने में सभी सुकवि सकुचाते हैं, क्योंकि वहां ( औरों की तो बात ही क्या ) स्वयं शेष, गणेस और सरस्वती की भी पहुंच नहीं है।
नित पूजत प्रभु पांवरी प्रीति न हृदय समाति। मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भांति।।_अर्थ_वे नित्यप्रति प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं, हृदय में प्रेम समाता ही नहीं है। पादुकाओं से आज्ञा मांग_मांगकर वे बहुत प्रकार ( सब प्रकार के ) राज_काज करते हैं।
पुलक गात हियं सिय रघुबीरू। जिस नामु जप लोचन नीरू।। लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसा तप तनु कसहीं।_अर्थ_शरीर पुलकित है, हृदय में श्रीसीता_रामजी हैं। जीभ राम_राम जप रही है, नेत्रों में प्रेम का जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वन में बसते हैं, परन्तु भरतजी घर ही में रहकर तप के द्वारा शरीर को कस रहे हैं।
दोउ दिसि समुझि कहते सबु लओगू। सब बिधि भरत सराहना जोगू।। सुनि ब्रत नेमा साधु सकुचाईं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं।।_अर्थ_दोनों ओरकी स्थिति समझकर सबलोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकार से सराहनेयोय हैं। उनके व्रत और नियमों को सुनकर साधु_संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं।