बिपुल सुमन सुर बरसहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ। निज पद दीन्ह असुर कहुं दीनबंधु रघुनाथ।।_अर्थ_ देवता बहुत _से फूल बरसा रहे हैं और प्रभु के गुणों की गाथाएं ( स्तुतियां ) गा रहे हैं ( कि ) श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबंधु हैं कि उन्होंने असुर को भी अपना परम पद दे दिया।
खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।। आरत गिरा सुनि जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।।_अर्थ_दुष्ट मारीच को मारकर श्रीरघुवीर तुरंत लौट पड़े। हाथ में धनुष और कमर में तरकस शोभा दे रहा है। इधर जब सीताजी ने दु:गहरी वाणी ( मरते समय मारीच की 'हा लक्षमण' की आवाज ) सुनी तो वे बहुत ही भयभीत होकर लक्ष्मणजी से कहने लगीं_
जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।। भृकुटि बिंदास सृष्टि लय होई। सपनेहुं संकट परइ कि सोई।।_अर्थ_तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे बड़े भाई संकट में हैं। लक्ष्मण जी ने हंसकर कहा_हे माता ! सुनो, जिनके भृकुटिविलास ( भौं के इशारे ) मात्र से सारी सृष्टि का लय ( प्रलय हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वन में भी संकट में पड़ सकते हैं ?
मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।। बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहां रावन ससि राहू।।_अर्थ_ इसपर सीताजी जब कुछ मर्म_वचन ) कहने लगीं, तब भगवान् की प्रेरणा से लक्ष्मणजी का मन चंचल हो उठा वे श्री सीताजी को वन और दिशाओं के देवताओं को सौंपकर वहां चले जहां रावण रूपी चन्द्रमा के लिये राहूरूप श्रीरामजी थे।
सून बीच दसकंधर देखा। आशा निकट जती कें वेषा। जाके बल सुर असुर डेराहीं। निसि न नींद दिन अन्न न खाहीं।।_अर्थ_रावण सूना मौका देखकर रति ( संन्यासी ) के वेष में श्री सीताजी के समीप आया। जिसके डर से देवता और असुर इतना डरते हैं कि रात को नींद नहीं आती और दिन में ( भरपेट ) अन्न नहीं खाते_
सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितई चला भड़िहाईं।। जिमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा।।_ अर्थ_वही दस सिर वाला रावण कुत्ते की तरह इधर_उधर ताकता हुआ भड़िहाई ( चोरी )_के लिये चला।( काकभुशुंडीजी कहते हैं _) हे गरुड़जी ! इस प्रकार कुमार्ग पर पैर रखते ही शरीर में तेज तथा बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता।
नाना विधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।। कह सीता सुनु जाती गोसाईं। बोले हुं बचन दुष्ट की नाईं।।_अर्थ_रावण ने अनेकों प्रकार की सुहावनी कथाएं रचकर सीताजी को राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया। सीताजी ने कहा_हे जति गोसाईं ! तुमने तो दुष्ट की तरह वचन कहे।
तब रावण निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनाना।। कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहुं खल ठाढ़ा।।_अर्थ_तब रावण ने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गयीं। उन्होंने गहरा धीरज धरकर कहा_'अरे दुष्ट ! खड़ा तो यह, प्रभु आ गये।'
जिमि हरिबधुहि छुद्र सब चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।। सुनत बचन दस-सीस रिसाना। मन महुं चरन बंधि सुख माना।।_अर्थ_जैसे सिंह की स्त्री को तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज ! तू ( मेरी चाह करके ) काल के वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावण को क्रोध आ गया, परन्तु मन में उसने सीताजी के चरणों की वन्दना करके सुख माना।
क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ। चला गगनपथ आतुर भय रथ हांकि न जाई।।_अर्थ_फिर क्रोध में भरकर रावण ने पर कर रावण ने सीताजी को रथ पर बैठा लिया और वह बड़ी उतावली के साथ आकाशमार्ग से चला; किन्तु डर के मारे उससे रथ हांका नहीं जाता था।
हा जग एक वीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।। आरति हरन सरन सरन सुखदायक। हा रघुकुलसरोज दिननायक।।_अर्थ_ ( सीताजी विलाप कर रही थीं_) हां जगत् के अद्वितीय वीर श्रीरघुनाथजी ! आपने किस अपराध से मुझपर दया भुला दी । हे दु:कों के रहनेवाले, हे शरणागत को सुख देनेवाले, हां रघुकुल के कमल सूर्य !
हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फल पायउं कीन्हेउं रोसा।। बिबिध बिलाप करि बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।।_अर्थ_ हा लक्ष्मण ! तुम्हारा दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया, उसका फल पाया। श्रीजानकीजी बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं_( हाय ! ) प्रभु की कृपा तो बहुत है, परन्तु वे स्नेही प्रभु बहुत दूर रह गये हैं।
बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।। सीता कै विलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।।_अर्थ_प्रभु को मेरी यह विपत्ति कौन सुनावें ? यज्ञ के अन्न को गदहा खाना चाहता है। सीताजी का भारी विलाप सुनकर जड़_चेतन सभी जीव दु:की हो गये।
गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।। अधम निसार लीन्हें जाई। जिमि म्लेच्छ बस कपिला गाई।।_अर्थ_गीधराज जटायु ने सीताजी की दु:गहरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी हैं। ( उसने देखा कि ) नीच राक्षस इनको ( बुरी तरह ) लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के पाले पड़ गयी हो।
सीते पुत्री करसि जनि त्रासा। करिहउं जातुधान कर नासा।। धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुं जैसे।।_अर्थ_( वह बोला_) हे बीते पुत्री ! भय मत कर। मैं इस राक्षस का नाश करूंगा। ( यह कह ) वह पक्षी क्रोध में भरकर ऐसे दौड़ा, जैसेज्ञपर्वत की ओर वज्र छूटता हो।
रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही। आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।।_अर्थ_ ( उसने ललकारकर कहा_) रे रे दुष्ट ! खड़ा क्यों नहीं होता ? निडर होकर चल दिया! मुझे तुमने नहीं जाना ? उसको यमराज के समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मन में अनुमान करने लगा_)
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।। जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीर्थ छांड़िहि देहा।।_अर्थ_यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़। पर वह ( गरुड़ ) तो अपने स्वामी विष्णु सहित मेरे बल को जानता है। ( कुछ पास आने पर ) रावण ने उसे पहचान लिया ( और बोला_) यह तो बूढ़ा जटायु है ! यह मेरे हाथ रुपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा।
की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।। जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छांड़िहि देहा।।_अर्थ_यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़। पर वह ( गरुड़ ) तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरे बल को जानता है। ( कुछ पास आने पर ) रावण ने उसे पहचान लिया ( और बोला_ ) यह तो बूढ़ा जटायु है ! यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा।
सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।। तजि जानकिहि कुल गृह जाहू। नाहिं त अब होइहि बहुबाहू।।_अर्थ_यह सुनते ही गीध क्रोध में भरकर बड़े वेग से दौड़ा और बोला_रावण ! मेरी सिखावन सुन ! जानकी जी को छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा। नहिं तो हे बहुत भुजाओं वाले !ऐसा होगा कि_
राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल नाश कुल तोरा।। उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।।_अर्थ_ श्रीरामजी के क्रोध रुपी अत्यन्त भयानक अग्नि में तेरा साया वंश पतिंगा ( होकर भस्म ) हो जायगा। योद्धा रावण कुछ उत्तर नहीं देता। तब गीध क्रोध करके दौड़ा।
धरि कच बिरज कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।। चोचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेंही।।_अर्थ_उसने ( रावण के ) बाल पकड़कर उसे रथ के नीचे उतार दिया, रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा। गीध सीताजी को एक ओर बैठाकर फिर लौटा और चोंच से मार_मारकर रावण के शरीर को विदीर्ण कर डाला। इसी से उसे एक घड़ी के लिये मूर्छा हो गयी।