Saturday, 7 February 2026

अरण्यकाण्ड

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे: पूर्णेन्दुमानन्ददं। वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्व:सम्भव: शंकरं। वन्दे ब्रह्मकुंड कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।।_अर्थ_धर्मरूपी वृक्ष के मूल, विवेकरूपी समुद्र को आनन्द देनेवाले पूर्णचंद्र, वैराग्यरूपी कमल के ( विकसित करनेवाले )सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकार को निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापों को हरने वाले, मोहरूपी बादलों के समूह को छिन्न_भिन्न करने की विधि ( क्रिया )_में आकाश से उत्पन्न पवन स्वरूप, ब्रह्माजी के वंशज ( आत्मज ) तथा कलंकनआशक महाराज श्रीरामचन्द्रजी के प्रिय श्री शंकरजी की मैं वन्दना करता हूं।

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं।
पाणौवाणसरासनं कटिलसत्तूणीरभारं शर्म।। राजीवायतलोचनं धऋतजटआजूटएन संशोभितं। सीता लक्ष्मण संयुक्त पथइगतं रामाभिरामं भजे।।_अर्थ_ जिनका शरीर जलयुक्त मेघों के समान सुंदर ( श्यामवर्ण ) एवं आनन्दघन है, जो सुंदर ( वल्कल का ) पईतवस्त्र धारण किये हैं, जिनके हाथों में वाण और धनुष है, कमर उत्तम तरकस के भार से सुशोभित हैं, कमल के समान विशाल नेत्र हैं और मस्तक पर जटा जूट धारण किये हैं, उन अत्यंत शोभायमान श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी सहित मार्ग चलते हुए आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी को मैं भजता हूं।

उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ जे हरि बिमुख न धर्म रति।।_अर्थ_हे पार्वती ! श्रीरामजी के गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं। परन्तु जो भगवान से विमुख हैं और जिनका धर्म में प्रेम नहीं है, वे महआमूढ़ ( उन्हें सुनकर मोह को प्राप्त होते हैं।

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।। अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावना।_अर्थ_पुरवासियों के और भरतजी के अनुपम और सुन्दर प्रेम का मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गान किया। अब देवता, मनुष्य और मुनियों के मन को भानेवाले श्रीरामचन्द्रजी के अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनो, जिन्हें वे वन में कर रहे हैं।

एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषण राम बनाए।। सीतहिं पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुन्दर।।_अर्थ_एक बार सुन्दर फूल चुनकर श्रीरामजी ने अपने हाथों से भांति भांति के गहने बनाये और सुन्दर स्फटिक शिला पर बैठे हुए प्रभु ने आदर के साथ वे गहने श्रीसीताजी को पहनाये।

सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सब चाहत रघुपति बल देखा।। जिमि पिपिलिका सागर थाहा। यहां मन्दमति पावन चाहा।।_अर्थ_ देवराज इन्द्र का पुत्र जयंत कोए का रूप धरकर श्रीरघुनाथजी का बल देखना चाहता है। जैसे महान् मंदबुद्धि चींटी समुद्र का थाह पाना चाहती हो।

सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मन्दमति कार्न कागा।। चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।_अर्थ_ वह मूढ़, मंदबुद्धि कारण से ( भगवान् के बल की परीक्षा परीक्षा करने के लिये ) बना हुआ कौआ सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भागा। जब रक्त बह चला, तब श्रीरघुनाथजी ने जाना और धनुष पर सींक ( सरकंडे )_का बाण संधान किया।

अति कृपाल रघुनायक सदा दिन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनों पर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणों के घर मूर्ख जयन्त ने आकर छल किया।

प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।। धरि निज रूप गयी पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।_अर्थ_मंत्र से प्रेरित होकर ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर श्रीरामजी का विरोधी जानकर इन्द्र ने उसको नहीं रखा।

भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्वासा।। ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।_अर्थ_तब वह निराश हो गया, जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय_शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा।

काहूं बैठन कहा न ओही। राखि को सका राम कर द्रोही।। मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होई बीस सुनु हरिजाना।।_अर्थ_( पर रखना तो दूर रहा ) किसी ने उसे बैठने तक के लिये नहीं कहा। श्रीरामजी के द्रोही को कौन रख सकता है ? ( काकभुसुंडीजी कहते हैं_)है गरुड़ ! सुनिये, उसके लिये माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है।

मित्र करइ संत रिपु कै करनी। ता कहुं बिबुध नदी बैतरनी।। सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।_अर्थ_मित्र सैकड़ों शत्रुओं की_सी करनी करने लगता है। देवनदी गंगाजी उसके लिये वैतरणी ( यमपुरी की नदी ) हो जाती है। हे भाई ! सुनिये, जो श्रीरघुनाथजी के विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्नि से भी अधिक गरम ( जलानेवाला) हो जाता है

नारद देखा बिकल जयंता। लागी दया कोमल चित संता।। पठवा तुरंत राम पहिं ताहि। कहेसि पुकारि प्रान्त हित पाही।।_अर्थ_नारदजी ने जयंत को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गयी; क्योंकि संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे ( समझाकर ) तुरंत श्रीरामजी के पास भेज दिया। उसने ( जाकर ) पुकारकर कहा_ है शरणागत के हितकारी ! मेरी रक्षा कीजिये।

आतुर समय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।। अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।_अर्थ_आतुर और भयभीत जयन्त ने जाकर श्रीरामजी के चरण 
पकड़ लिये ( और कहा_ ) है दयालु रघुनाथजी ! रक्षा कीजिये । आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुताई ( सामर्थ्य )_को मैंठं झनझन मन्दबुद्धि  जान नहीं पाया था।

निज कृत कर्म जनित फल पायीं। अब प्रभु पाहि सरन ताकि आयउं।। सुनि कृपाल अति कारण बानी। एक नयन करि तथा भवानी।।_अर्थ_अपने किये हुए कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु ! मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपकी शरण तककर आया हूं। ( शिवजी कहते हैं_) है पार्वती ! कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने उसकी अत्यन्त आर्त ( दु:खभरी ) वाणी सुनकर उसे एक आंख का काना करके छोड़ दिया।


कीन्ह मोहवश द्रोह यद्यपि तेहि कर वध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुवीर सम।।_अर्थ_उसने मओहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्रीरामजी के समान कृपालु और कौन होगा ?

रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।। बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहिं भीर सबहिं मोहि जाना।।_अर्थ_चित्रकूट में फंसकर श्रीरघुनाथजी ने बहुत _से चरित्र किये, जो कानों को अमृत के समान ( प्रिय ) हैं। फिर ( कुछ समय पश्चात् ) श्रीरामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गये हैं, इससे ( यहां) बड़ी भीड़ हो जायेगी।

सकल मुनिन्ह सन विदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।। अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।_अर्थ_( इसलिये ) सब मुनियों से विदा लेकर सीता सहित दोनों भाई चले ! जब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में गये, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये।