Saturday, 28 February 2026

अरण्यकाण्ड

पुलकित गात अत्रि उठि आए। देखि रामु आतुर चलि आए।। करत दण्डवत् मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।।_अर्थ_शरीर पुलकित हो गया, अत्रिजी उठकर दौड़े। उन्हें दौड़े आते देखकर श्रीरामजी और भी शीघ्रता से चले आए। दण्डवत् करते हुए ही श्रीरामजी को  ( उठाकर ) मुनि ने हृदय से लगा लिया और प्रेमाश्रुओं के जल को दोनों जनों को ( दोनों भाइयों को ) नहला दिया।


देखि राम छबि नयन छुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।। करि पूजा कहा बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।। _अर्थ_ श्रीरामजी की छबि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गये। तब वे उनको आदरपूर्वक अपने आश्रम में ले आये। पूजन करके सुन्दर वचन कहकर मुनि ने मूल और फल दिये, जो प्रभु के मन को बहुत रुचे।

प्रभु आसन आसीन भरी लोचन शोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानी अस्तुति करत।।_अर्थ_प्रभु आसन पर विराजमान हैं। नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।

नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।। भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।_अर्थ_हे भक्तवत्सल ! हे कृपालु ! हे कोमल स्वभाववाले ! मैं आपको नमस्कार करता हूं। निष्काम पुरुषों को परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलों को मैं भजता हूं।

निकाम श्याम सुन्दरं । भवांबुनाथ मंदरं ।। प्रफुल्ल कंज लोचनं। भवांबुनाथ मंदरं।।_अर्थ_आप नितांत सुन्दर, श्याम, संसार ( आवागमन )_रूपी समुद्र को मथने के लिये मन्दराचलयरूप, फूले हुए कमल के समान नेत्रों वाले और मद आदि दोषों से छुड़ाने वाले हैं।

प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभो प्रमेय वैभवं।। निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।
_अर्थ_हे प्रभु ! आपकी लंबी भुजाओं का पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय ( बुद्धि के परे अथवा असीम ) है। आप तरकस और धनुष _बाण धारण करनेवाले तीनों लोकों के स्वामी,।

दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।। मुनीन्द्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।_अर्थ_सूर्यवंश के भूषण, महादेवजी के धनुष को तोड़नेवाले, मुनिराज ओं और संतों को आनंद देनेवाले तथा देवताओं के शत्रु असुरों के समूह का नाश करनेवाले हैं।

मनोज वैरी वंदितं। आजादि देव सेवितं।।
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।_अर्थ_आप कामदेव के शत्रु महादेवजी के द्वारा वंदित, ब्रह्मा आदि देवताओं से सेवित, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह तथा समस्त दोषों को नष्ट करनेवाले हैं।

नमामि इंदिरा पतिं। सउखआकरं सतां गतिं।। भजे सशक्ति साधुजन। शची पति प्रियानुजं।।_अर्थ_ है लक्ष्मीपति ! हे सुखों के खान और सत्पुरुषों की एकमात्र गति ! मैं आपको नमस्कार करता हूं ! हे शचइपतइ ( इन्द्र )_के प्रिय छोटे भाई ( वामपंथी ) ! स्वरूपा_शक्ति श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मण सहित मैं आपको भजता हूं।

त्वदंध्रिमूल ये नरा: ।भजंति हीन मत्सरा: ।। पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले ।।_अर्थ_जो मनुष्य मत्स्य ( डाह ) रहित होकर आपके चरणकमलों का सेवन करते हैं, वे तर्क_वितर्क ( अनेक प्रकार के संदेह )_रूपी तरंगों से पूर्ण संसाररूप समुद्र में नहीं गिरते ( आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ते )।

विविक्त वासिन: सदा। भजंति मुक्तये मुदा।। निरस्य इंद्रियादिकं। प्रतीय ते गतिं स्वकं।।_अर्थ_जो एकान्तवासी पुरुष मुक्ति के लिये, इंद्रियादिज्ञका निग्रह करके ( उन्हें विषयों से हटाकर ) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गति को ( अपने स्वरूप को ) प्राप्त होते हैं।

तमेकमद्भुतं प्रमुं: निरीहमीश्वरं विभुं ।। जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं ।।_अर्थ _उन ( आप )_को जो एक ( अद्वितीय ), अद्भुत ( मायिक जगत् से विलक्षण ), प्रभु ( सर्वसमर्थ ), इच्छारहित ( ईश्वर ( सबके स्वामी ), व्यापक, जगत्गुरु, सनातन ( नित्य ), तुरीय ( तीनों गुणों से सर्वथा परे ) और केवल ( अपने स्वरूप में स्थित ) है।

भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।_अर्थ_( तथा ) जो भावप्रिय, कुययोगियों ( विषयी पुरुषों )_के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तों के लिये कल्पवृक्ष ( अर्थात् उनकी समस्औत कामनाओं को पूर्ण करनेवाले), सम ( पक्षपातरहित ) और सदा सुखपूर्वक सेवन करने योग्य है; मैं निरंतर भजता हूं।
 
अनूप रूप भूपतिं। नतोहमुर्विजापतिं।। प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।_अर्थ_हे अनुपम सुंदर ! हे जानकीनाथ ! मैं आपको प्रणाम करता हूं। मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूं। मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति दीजिये।

पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।। व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता:।।_अर्थ_जो मनुष्य इस स्तुति को आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके परमपद को प्राप्त होते हैं, इसमें संदेह नहीं।

बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरी बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुं तजे मति मोरि।।_अर्थ_मुनि ने ( इस प्रकार) विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा_हे नाथ ! मेरी बुद्धि आपके चरणकमलों को कभी न छोड़े।

अनुसूयिया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील विनीता।। रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देई निकट बैठाई।।_अर्थ_फिर परम सीलवती और विनम्र श्रीसीताजी ( अत्रिजी की पत्नी ) अनुसूचियां जी के चरण पकड़कर उन्हें मिलीं। ऋषिपत्नी के मन में बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशीष देकर श्रीसीताजी को पास बैठा लिया।

दिव्य बसन भूषन पहिराए।  जे नित नूतन अमल सुहाए।। कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।_अर्थ_और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य_नये निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर रिषिपतिनी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणी से स्त्रियों के कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं।

मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।। अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेहि।।_अर्थ_हे राजकुमारी ! सुनिये , माता, पिता, भाई, सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही ( सुख ) देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी ! पति तो ( मोक्षरूप ) असीम ( सुख ) देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती।

धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।। बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना।।_अर्थ_धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री_ इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्ना, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन_

ऐसेहु पति कर किएं अपमाना। नारि पाव जमपुर 
दुख नाना।। एकइ धर्म एक ब्रत नेमा । कायं बचन मन पति पद प्रेमा।।_अर्थ_ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भांति _भांति के दुख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एकही नियम है।


Saturday, 7 February 2026

अरण्यकाण्ड

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे: पूर्णेन्दुमानन्ददं। वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्व:सम्भव: शंकरं। वन्दे ब्रह्मकुंड कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।।_अर्थ_धर्मरूपी वृक्ष के मूल, विवेकरूपी समुद्र को आनन्द देनेवाले पूर्णचंद्र, वैराग्यरूपी कमल के ( विकसित करनेवाले )सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकार को निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापों को हरने वाले, मोहरूपी बादलों के समूह को छिन्न_भिन्न करने की विधि ( क्रिया )_में आकाश से उत्पन्न पवन स्वरूप, ब्रह्माजी के वंशज ( आत्मज ) तथा कलंकनआशक महाराज श्रीरामचन्द्रजी के प्रिय श्री शंकरजी की मैं वन्दना करता हूं।

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं।
पाणौवाणसरासनं कटिलसत्तूणीरभारं शर्म।। राजीवायतलोचनं धऋतजटआजूटएन संशोभितं। सीता लक्ष्मण संयुक्त पथइगतं रामाभिरामं भजे।।_अर्थ_ जिनका शरीर जलयुक्त मेघों के समान सुंदर ( श्यामवर्ण ) एवं आनन्दघन है, जो सुंदर ( वल्कल का ) पईतवस्त्र धारण किये हैं, जिनके हाथों में वाण और धनुष है, कमर उत्तम तरकस के भार से सुशोभित हैं, कमल के समान विशाल नेत्र हैं और मस्तक पर जटा जूट धारण किये हैं, उन अत्यंत शोभायमान श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी सहित मार्ग चलते हुए आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी को मैं भजता हूं।

उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ जे हरि बिमुख न धर्म रति।।_अर्थ_हे पार्वती ! श्रीरामजी के गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं। परन्तु जो भगवान से विमुख हैं और जिनका धर्म में प्रेम नहीं है, वे महआमूढ़ ( उन्हें सुनकर मोह को प्राप्त होते हैं।

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।। अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावना।_अर्थ_पुरवासियों के और भरतजी के अनुपम और सुन्दर प्रेम का मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गान किया। अब देवता, मनुष्य और मुनियों के मन को भानेवाले श्रीरामचन्द्रजी के अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनो, जिन्हें वे वन में कर रहे हैं।

एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषण राम बनाए।। सीतहिं पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुन्दर।।_अर्थ_एक बार सुन्दर फूल चुनकर श्रीरामजी ने अपने हाथों से भांति भांति के गहने बनाये और सुन्दर स्फटिक शिला पर बैठे हुए प्रभु ने आदर के साथ वे गहने श्रीसीताजी को पहनाये।

सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सब चाहत रघुपति बल देखा।। जिमि पिपिलिका सागर थाहा। यहां मन्दमति पावन चाहा।।_अर्थ_ देवराज इन्द्र का पुत्र जयंत कोए का रूप धरकर श्रीरघुनाथजी का बल देखना चाहता है। जैसे महान् मंदबुद्धि चींटी समुद्र का थाह पाना चाहती हो।

सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मन्दमति कार्न कागा।। चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।_अर्थ_ वह मूढ़, मंदबुद्धि कारण से ( भगवान् के बल की परीक्षा परीक्षा करने के लिये ) बना हुआ कौआ सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भागा। जब रक्त बह चला, तब श्रीरघुनाथजी ने जाना और धनुष पर सींक ( सरकंडे )_का बाण संधान किया।

अति कृपाल रघुनायक सदा दिन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनों पर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणों के घर मूर्ख जयन्त ने आकर छल किया।

प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।। धरि निज रूप गयी पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।_अर्थ_मंत्र से प्रेरित होकर ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर श्रीरामजी का विरोधी जानकर इन्द्र ने उसको नहीं रखा।

भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्वासा।। ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।_अर्थ_तब वह निराश हो गया, जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय_शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा।

काहूं बैठन कहा न ओही। राखि को सका राम कर द्रोही।। मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होई बीस सुनु हरिजाना।।_अर्थ_( पर रखना तो दूर रहा ) किसी ने उसे बैठने तक के लिये नहीं कहा। श्रीरामजी के द्रोही को कौन रख सकता है ? ( काकभुसुंडीजी कहते हैं_)है गरुड़ ! सुनिये, उसके लिये माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है।

मित्र करइ संत रिपु कै करनी। ता कहुं बिबुध नदी बैतरनी।। सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।_अर्थ_मित्र सैकड़ों शत्रुओं की_सी करनी करने लगता है। देवनदी गंगाजी उसके लिये वैतरणी ( यमपुरी की नदी ) हो जाती है। हे भाई ! सुनिये, जो श्रीरघुनाथजी के विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्नि से भी अधिक गरम ( जलानेवाला) हो जाता है

नारद देखा बिकल जयंता। लागी दया कोमल चित संता।। पठवा तुरंत राम पहिं ताहि। कहेसि पुकारि प्रान्त हित पाही।।_अर्थ_नारदजी ने जयंत को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गयी; क्योंकि संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे ( समझाकर ) तुरंत श्रीरामजी के पास भेज दिया। उसने ( जाकर ) पुकारकर कहा_ है शरणागत के हितकारी ! मेरी रक्षा कीजिये।

आतुर समय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।। अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।_अर्थ_आतुर और भयभीत जयन्त ने जाकर श्रीरामजी के चरण 
पकड़ लिये ( और कहा_ ) है दयालु रघुनाथजी ! रक्षा कीजिये । आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुताई ( सामर्थ्य )_को मैंठं झनझन मन्दबुद्धि  जान नहीं पाया था।

निज कृत कर्म जनित फल पायीं। अब प्रभु पाहि सरन ताकि आयउं।। सुनि कृपाल अति कारण बानी। एक नयन करि तथा भवानी।।_अर्थ_अपने किये हुए कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु ! मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपकी शरण तककर आया हूं। ( शिवजी कहते हैं_) है पार्वती ! कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने उसकी अत्यन्त आर्त ( दु:खभरी ) वाणी सुनकर उसे एक आंख का काना करके छोड़ दिया।


कीन्ह मोहवश द्रोह यद्यपि तेहि कर वध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुवीर सम।।_अर्थ_उसने मओहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्रीरामजी के समान कृपालु और कौन होगा ?

रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।। बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहिं भीर सबहिं मोहि जाना।।_अर्थ_चित्रकूट में फंसकर श्रीरघुनाथजी ने बहुत _से चरित्र किये, जो कानों को अमृत के समान ( प्रिय ) हैं। फिर ( कुछ समय पश्चात् ) श्रीरामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गये हैं, इससे ( यहां) बड़ी भीड़ हो जायेगी।

सकल मुनिन्ह सन विदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।। अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।_अर्थ_( इसलिये ) सब मुनियों से विदा लेकर सीता सहित दोनों भाई चले ! जब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में गये, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये।