Tuesday, 21 October 2025

अयोध्याकाण्ड

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपने मोर परम हित धरमू।। मोहि सब भांति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउं अवसर अनुसारा।।_अर्थ_ तुमको सबके कर्मों ( कर्तव्यों )_का और अपने तथा मेरे परम
हितकारी धर्म का पता है। यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकार से भरोसा है, तथापि मैं समय के अनुसार कुछ कहता हूं।

तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपां संभारी।। नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहिं सहित सबु होत खुआरू।।_अर्थ_हे तात ! पिताजी के बिना ( उनकी अनुपस्थिति में ) हमारी बात केवल कुरुवंश की कृपा ने ही संभाल रखी है; नहीं तो हमारे सहित प्रजा, कुटुंब, परिवार सभी बर्बाद हो जाते।

जौं बिनु अवसर अथवं दिनेसू। जग केहि कहहु न होई कलेसू।। तब उत्पात तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखी सबु लीन्हा।।_अर्थ_यदि बिना समय के ( संध्या से पूर्व ही ) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत् में किसको क्लेश न होगा ? हे तात ! उसी प्रकार का उत्पात विधाता ने यह ( पिता की असामयिक मृत्यु ) किया है। पर मुनि महाराज ने तथा मिथिलेश्वर ने सबको बचा लिया।

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहिं भल होइहि परिनाम।।_अर्थ_राज्य का सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर_इन सभी का पालन ( लक्षण ) गुरुजी का प्रभाव ( सामर्थ्य ) करेगा और परिणाम शुभ होगा।

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।। मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।।_अर्थ_गुरुजी का प्रसाद ( अनुग्रह ) ही घर में और वन में समाजसहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा (का पालन ) समस्त धर्म रुपी पृथ्वी को धारण करने में शेषजी के समान है।

सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनि कुल पालक होहू।। साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।।_अर्थ_हे तात ! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुल के रक्षक बनो। साधक के लिये यह एक ही ( आज्ञापालनरूपी साधना ) संपूर्ण सिद्धियों को देनेवाली, कीतिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है।

सो बिचारी सही संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।। बांटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहिं अवधि भरी बड़ि कठिनाई।।_अर्थ_इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवार को सुखी करो। हे भाई ! मेरी विपत्ति सभी ने बांट ली है, परन्तु तुमको तो अवधि ( चौदह वर्ष )_तक बड़ी कठिनाई है ( सबसे अधिक दु:ख है )।


जानि तुम्हहि मृदु कहउं कठोरा। कुसमयं तात न अनुचित मोरा।। होहिं कुठायं सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहुं के घाए।।_अर्थ_तुमको कोमल जानकर मैं भी कठोर ( वियोग की बात ) कह रहा हूं। हे तात ! बुरे समय में मेरे लिये कोई अनुचित बात नहीं है। कुठौर ( कुअवसर )_में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं। वज्र के आघात भी हाथ से ही रोके जाते हैं।

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिब होइ। तुलसी प्रीति की रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।। _अर्थ_सेवक हाथ, पैर और नेत्रों के समान और स्वामी मुख के समान होना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं कि  सेवक_स्वामी की ऐसी प्रीति की रीति सुनकर सुकबि उसकी सराहना करते हैं।

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअं जनु सानी।। सिथिल समाज सनेहं समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी की वाणी सुनकर, मानो प्रेमरूपी समुद्र के ( मन्थन से निकले हुए ) अमृत में सनी हुई थी, सारा समाज शिथिल हो गया; सबको प्रेम समाधि लग गयी। यह दशा देखकर सरस्वती ने चुप साध ली।

भरतहिं भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।_अर्थ_मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूंगेहि गिरा प्रसादू।।_अर्थ_भरतजी को परम संतोष हुआ। स्वामी के (अनुकूल ) होते ही उनके दु:ख और दोषों ने मुख मोड़ लिया ( उन्हें छोड़कर भाग गये )। उनका मुंह प्रसन्न हो गया और मन का विषाद मिट गया। मानो गूंगे पर सरस्वतीकी कृपा हो गयी।

कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानी पंकरुह जोरी।। नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउं लाहु जग जनमु भए को।।_अर्थ_उन्होंने फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और करकमलों को जोड़कर वे बोले_हे नाथ ! मुझे आपके साथ जाने का सुख प्राप्त हो गया और मैंने जगत में जन्म लेने का लाभ भी पा लिया।

अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।। सो अवलंब देव मोहि देती। अवधि पार पावौं जेहि सेई।।_अर्थ_ है कृपाल ! अब जैसी आज्ञा हो, उसी को मैं सिर पर धरकर आदरपूर्वक करूं। परंतु देव ! आप मुझे वह अवलम्ब ( कोई सहारा ) दें जिसकी सेवा कर मैं अवधि का पार पा जाऊं ( अवधि को बिता दूं ) ।

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउं सब बिधि तीर्थ सलिलु तेहि कहं काह रजाइ।।_अर्थ_ है देव ! स्वामी ( आप ) के अभिषेक के लिये गुरुजी की आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थों का जल लेता आया हूं; उसके लिये क्या आज्ञा होती है ?

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयं सकोच जात कहि नाहीं।। कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई
।।_अर्थ_मेरे मन में एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोच के कारण कहा नहीं जाता। ( श्रीरामचन्द्रजी ने कहा_) है भाई ! कहो। तब प्रभु की आज्ञा पाकर भरतजी स्नेहपूर्ण सुन्दर वाणी बोले_ ।

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।। प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होई त आवौं देखी।।_अर्थ_आज्ञा हो तो चित्रकूट के पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पशु_पक्षी, तालाब_नदी, झरने और पर्वतों के समूह तथा विशेषकर प्रभु ( आप )_के चरण चिन्हों से अंकित भूमि को देख आऊं।

अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।। मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।।_अर्थ_( श्रीरघुनाथजी बोले_) अवश्य ही अत्रि ऋषि की आज्ञा को सिर पर धारण करो ( उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो ) और निर्भय होकर वन में विचरण करो। हे भाई ! अत्रि मुनि के प्रसाद से वन मंगलों को देनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है_।

रिषिनायकु जहं आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।। सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।_अर्थ_और ऋषियों के प्रमुख अत्रिजी जहां आज्ञा दें, वहीं ( लाया हुआ ) तीर्थों का जल स्थापित कर देना। प्रभु का वचन सुनकर भरतजी ने सुख पाया और आनंदित होकर मुनि अत्रिजी के चरणकमलों में सिर नवाया।

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरसात सुरतरु फूल।।_अर्थ_समस्त सुन्दर मंगलों का मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी का संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुल की सराहना करके कल्पवृक्ष के फूल बरसाने लगे।

Wednesday, 1 October 2025

अयोध्याकाण्ड

प्रभु पद पदुम पराग दोहाईं। सत्य सुकृति सुख सीव सुहाई।। सो करि कहुं हाए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।।_अर्थ_प्रभु ( आप )_के चरणकमलों की रज, जो सत्य, सुकृति ( पुण्य ) और सुख की सुहावनी सीमा ( अवधि ) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदय को जागते, सोते और स्वप्न में में भी बनी रहनेवाली रुचि ( इच्छा ) कहता हूं।

सहज सनेहं स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल बल चारि बिहाई।। क्या हम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।_अर्थ_वह रुचि है_कपट, स्वार्थ और ( अर्थ_धर्म, काम_मोक्षरूप ) चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। और आज्ञापालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है। हे देव ! अब वही आज्ञा रूप प्रसाद सेवक को मिल जाय।

अस कहि प्रेम बिबस में भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।। प्रभु पद कमल इसे अकुलाई। समउ सनेह न सो कहि जाई।।_अर्थ_भरतजी ऐसा कहकर प्रेम के बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा। नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर आया। अकुलाकर ( व्याकुल होकर ) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमल पकड़ लिये। उस समय को और स्नेह को कहा नहीं जा सकता।

कृपासिंधु सनमानि सुबानि। बैठिये समीप गहि पानी।। भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहं सभा रघुराऊ।।_अर्थ_कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी ने सुन्दर वाणी से भरतजी का सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजी की विनती सुनकर उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्नेह से शिथिल हो गये।

रघुराउ सिथिल सनेहं साधु समाज सुनि मिथिला धनी। मन महुं सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी।। भरतहिं प्रसंसत बिबुध बरसात सुमन मानस मलिन से‌। तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी, साधुओं का समाज, मुनि वशिष्ठजी और मिथिलापति ननकजई प्रेम से शिथिल हो गये। सब मन_ही_मन श्रीभरतजी के भाईपन और उनकी भक्ति की अतिशय महिमा को सराहने लगे। देवता मलिन मन से भरतजी की प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं _सब लोग भरतजी का भाषण सुनकर व्याकुल हो गये और ऐसे सकुचा गये जैसे रात्रि के आगमन से कमल।

देखि दुखारी दीन दुहुं समाज नर नारी सब। मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत।।_अर्थ_दोनों समाजों के सभी नर_नारियों को दिन और दु:खी देखकर महामलिन मन इन्द्र मरे हुए को मारकर अपना मंगल चाहता है।

कपट कुचालि सीवं सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।। काक समान पाकरिपु रीती। छली मलिन कतहुं न प्रतीती।।_अर्थ_ देवराज इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा हैं। उसे प्यारी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्र की रीति कौए के समान है। वह चली और मलिन_मन है, उसका कहीं किसी पर विश्वास नहीं है।

प्रथम कुमत करि कपटु संकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला।। सुर्खियां सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे
।।_अर्थ_पहले तो कुमत ( बुरा विचार ) करके कपट को बटोरा ( अनेक प्रकार के कपट का साज सजा )। फिर वह कपटजनित ) उचाट करके सिर पर बाल दिया। फिर देवमाता से सब लोगों को विशेष रूप से मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम से उनका अत्यंत बिछोह नहीं हुआ ( अर्थात् उनका श्रीरामजी के प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा )।

भय उचाट बस मन थिर नाहीं। जन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।। जुबिन मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।_अर्थ_भय और उचाट के वश किसी का मन स्थिर नहीं है। क्षण में उनकी वन में रहने की इच्छा होती है और क्षण में उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मन के इस प्रकार की दुविधामयी स्थिति से प्रजा दु:की हो रही है। मानो नदी और समुद्र के संगम का जल क्षुब्ध हो रहा है। ( जैसे नदी और समुद्र के संगम का जल स्थिर एक सननहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकार की दशा प्रजा के मन की हो गयी। )

दुखित कतहुं परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।। लखि हियं हंसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान भगवान जुबानू।।_अर्थ_चित्त दोतरफा हो जाने से वे कहीं संतोष नहीं पाते और एक_दूसरे से अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदय में हंसकर कहने लगे_कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक ( कामी पुरुष ) एक_सरीखे ( एक ही स्वभाव के )  हैं। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार श्वन्, युवन् और मधवन् शब्दों के रूप भी एक_सरीखे होते हैं।)

भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागी देवमाता सबहिं जथाजोगु जनु पाइ।।_अर्थ_भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मंत्री और ज्ञानी साधु_संतों को छोड़कर अन्य सभी पर जिस मनुष्य को जिस योग्य ( जिस प्रकृति और जिस स्थिति का )पाया, उसपर उसपर वैसे ही देवमाता लग गयी।

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहं सुरपति छल भारे।। सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब को मति जंत्री।।_अर्थ_ कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी ने लोगों को अपने स्नेह और देवराज इन्द्र के भारी छल से दु:खी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मंत्री आदि सभी की बुद्धि को भरतजी की भक्ति ने कुल कर दिया।

रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।। भरत प्रीति अति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।।_अर्थ_सब लोग चित्रलिखे_से श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये हुए_से वचन बोलते हैं। भरतजी की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करने में कठिनता है।

जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।। महिमा तासु कहे किमि तुलसी। भगति सुभायं सुमति हियं हुलसी।।_अर्थ_जिनकी भक्ति का लवलेस देखकर मुनिगन और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेम में मग्न हो गये, उन भरतजी की महिमा तुलसीदास कैसे कहें ? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे ( कवि के ) हृदय में सुबुद्धि हुलस रही है ( विकसित हो रही है )।

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।। कहां न सकता गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।।_अर्थ_परन्तु वह बुद्धि अपने को छोटी और भरतजी की महिमा को बड़ी जानकर कवि परम्परा की मर्यादा को मानकर सकुचा गयी ( उसका  वर्णन करने का साहस नहीं कर सकी )। उसकी गुणों में रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धि की गति बालक के वचनों की तरह हो गयी ( वह कुण्ठित हो गयी )।

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय  नभ एकटक रही निहारि।।_अर्थ_ भरतजी का निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कवि की बुद्धि चकोरी है, जो भक्तों के हृदय रूपी निर्मल आकाश में उस चन्द्रमा को उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है ( तब उसका वर्णन कौन करे ? )।

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूं। लघु मति चापलता कबि छमहूं।। कहत सुनत संता भाई भरत को। सीय राम पद होई न रत को।।_अर्थ_भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिये भी सुगम नहीं है। ( अतः ) मेरी तुच्छ बुद्धि की चंचलता को कवि लोग क्षमा करें !  भरतजी के सद्भाव 
 को कहते_सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजी के चरणों में अनुरक्ति न हो जायगा।

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहिं न सुलभु  तेहि सरिस बाम को।।  देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।_अर्थ_भरतजी का स्मरण करने से जिसको श्रीरामजी का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम ( अभागा ) और कौन होगा ? दयालु और सुजान श्रीरामजी ने सभी की दशा देखकर और भक्त ( भरतजी )_के हृदय की स्थिति जानकर_।

धर्म धुरीन धीर जय नागर। सत्य सनेह सील गुन सागर।। देसु कालु लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।।_अर्थ_धर्मधुरंधर, धीर, नीति में चतुर, समय, स्नेह सील और सुख के समुद्र, नीति और प्रीति को पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल और अवसर को देखकर;


बोले बचन बानी सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रही से।। तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।_अर्थ_( तदनुसार ) ऐसे वचन बोले जो मानो वाणी के सर्वस्व ही थे, परिणाम में हितकारी थे और सुनने में चन्द्रमा के रस ( अमृत )_सरीखे थे। ( उन्होंने कहा_) हे तात भरत ! तुम धर्म की धूरी को धारण करनेवाले हैं, लोक और वेद दोनों के जाननेवाले और प्रेम में प्रवीण हो।

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयं किमि कहि जात।।_अर्थ_हे तात ! कर्म से, वचन से और मन से निर्मल तुम्हारे समान तुही हो। गुरुजनों के समाज में और ऐसे कुसमय में छोटे भाई के गुन किस तरह कहे जा सकते हैं ?

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।। समउ समाजु लाज गुर्जन की। उदासीन हित अनहित मन की।।_अर्थ_हे तात ! तुम सूर्यकुल की रीति को, सत्यरतिज्ञ पिताजी की कीर्ति और प्रीति को, समय, समाज और गुरुजनों की लज्जा ( मर्यादा )_को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सके मन की बात जानते हो।