प्रभु पद पदुम पराग दोहाईं। सत्य सुकृति सुख सीव सुहाई।। सो करि कहुं हाए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।।_अर्थ_प्रभु ( आप )_के चरणकमलों की रज, जो सत्य, सुकृति ( पुण्य ) और सुख की सुहावनी सीमा ( अवधि ) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदय को जागते, सोते और स्वप्न में में भी बनी रहनेवाली रुचि ( इच्छा ) कहता हूं।
सहज सनेहं स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल बल चारि बिहाई।। क्या हम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।_अर्थ_वह रुचि है_कपट, स्वार्थ और ( अर्थ_धर्म, काम_मोक्षरूप ) चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। और आज्ञापालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है। हे देव ! अब वही आज्ञा रूप प्रसाद सेवक को मिल जाय।
अस कहि प्रेम बिबस में भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।। प्रभु पद कमल इसे अकुलाई। समउ सनेह न सो कहि जाई।।_अर्थ_भरतजी ऐसा कहकर प्रेम के बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा। नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर आया। अकुलाकर ( व्याकुल होकर ) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमल पकड़ लिये। उस समय को और स्नेह को कहा नहीं जा सकता।
कृपासिंधु सनमानि सुबानि। बैठिये समीप गहि पानी।। भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहं सभा रघुराऊ।।_अर्थ_कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी ने सुन्दर वाणी से भरतजी का सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजी की विनती सुनकर उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्नेह से शिथिल हो गये।
रघुराउ सिथिल सनेहं साधु समाज सुनि मिथिला धनी। मन महुं सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी।। भरतहिं प्रसंसत बिबुध बरसात सुमन मानस मलिन से। तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी, साधुओं का समाज, मुनि वशिष्ठजी और मिथिलापति ननकजई प्रेम से शिथिल हो गये। सब मन_ही_मन श्रीभरतजी के भाईपन और उनकी भक्ति की अतिशय महिमा को सराहने लगे। देवता मलिन मन से भरतजी की प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं _सब लोग भरतजी का भाषण सुनकर व्याकुल हो गये और ऐसे सकुचा गये जैसे रात्रि के आगमन से कमल।
देखि दुखारी दीन दुहुं समाज नर नारी सब। मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत।।_अर्थ_दोनों समाजों के सभी नर_नारियों को दिन और दु:खी देखकर महामलिन मन इन्द्र मरे हुए को मारकर अपना मंगल चाहता है।
कपट कुचालि सीवं सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।। काक समान पाकरिपु रीती। छली मलिन कतहुं न प्रतीती।।_अर्थ_ देवराज इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा हैं। उसे प्यारी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्र की रीति कौए के समान है। वह चली और मलिन_मन है, उसका कहीं किसी पर विश्वास नहीं है।
प्रथम कुमत करि कपटु संकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला।। सुर्खियां सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे
।।_अर्थ_पहले तो कुमत ( बुरा विचार ) करके कपट को बटोरा ( अनेक प्रकार के कपट का साज सजा )। फिर वह कपटजनित ) उचाट करके सिर पर बाल दिया। फिर देवमाता से सब लोगों को विशेष रूप से मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम से उनका अत्यंत बिछोह नहीं हुआ ( अर्थात् उनका श्रीरामजी के प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा )।
भय उचाट बस मन थिर नाहीं। जन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।। जुबिन मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।_अर्थ_भय और उचाट के वश किसी का मन स्थिर नहीं है। क्षण में उनकी वन में रहने की इच्छा होती है और क्षण में उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मन के इस प्रकार की दुविधामयी स्थिति से प्रजा दु:की हो रही है। मानो नदी और समुद्र के संगम का जल क्षुब्ध हो रहा है। ( जैसे नदी और समुद्र के संगम का जल स्थिर एक सननहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकार की दशा प्रजा के मन की हो गयी। )
दुखित कतहुं परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।। लखि हियं हंसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान भगवान जुबानू।।_अर्थ_चित्त दोतरफा हो जाने से वे कहीं संतोष नहीं पाते और एक_दूसरे से अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदय में हंसकर कहने लगे_कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक ( कामी पुरुष ) एक_सरीखे ( एक ही स्वभाव के ) हैं। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार श्वन्, युवन् और मधवन् शब्दों के रूप भी एक_सरीखे होते हैं।)
भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागी देवमाता सबहिं जथाजोगु जनु पाइ।।_अर्थ_भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मंत्री और ज्ञानी साधु_संतों को छोड़कर अन्य सभी पर जिस मनुष्य को जिस योग्य ( जिस प्रकृति और जिस स्थिति का )पाया, उसपर उसपर वैसे ही देवमाता लग गयी।
कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहं सुरपति छल भारे।। सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब को मति जंत्री।।_अर्थ_ कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी ने लोगों को अपने स्नेह और देवराज इन्द्र के भारी छल से दु:खी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मंत्री आदि सभी की बुद्धि को भरतजी की भक्ति ने कुल कर दिया।
रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।। भरत प्रीति अति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।।_अर्थ_सब लोग चित्रलिखे_से श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये हुए_से वचन बोलते हैं। भरतजी की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करने में कठिनता है।
जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।। महिमा तासु कहे किमि तुलसी। भगति सुभायं सुमति हियं हुलसी।।_अर्थ_जिनकी भक्ति का लवलेस देखकर मुनिगन और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेम में मग्न हो गये, उन भरतजी की महिमा तुलसीदास कैसे कहें ? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे ( कवि के ) हृदय में सुबुद्धि हुलस रही है ( विकसित हो रही है )।
आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।। कहां न सकता गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।।_अर्थ_परन्तु वह बुद्धि अपने को छोटी और भरतजी की महिमा को बड़ी जानकर कवि परम्परा की मर्यादा को मानकर सकुचा गयी ( उसका वर्णन करने का साहस नहीं कर सकी )। उसकी गुणों में रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धि की गति बालक के वचनों की तरह हो गयी ( वह कुण्ठित हो गयी )।
भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि।।_अर्थ_ भरतजी का निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कवि की बुद्धि चकोरी है, जो भक्तों के हृदय रूपी निर्मल आकाश में उस चन्द्रमा को उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है ( तब उसका वर्णन कौन करे ? )।
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूं। लघु मति चापलता कबि छमहूं।। कहत सुनत संता भाई भरत को। सीय राम पद होई न रत को।।_अर्थ_भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिये भी सुगम नहीं है। ( अतः ) मेरी तुच्छ बुद्धि की चंचलता को कवि लोग क्षमा करें ! भरतजी के सद्भाव
को कहते_सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजी के चरणों में अनुरक्ति न हो जायगा।
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहिं न सुलभु तेहि सरिस बाम को।। देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।_अर्थ_भरतजी का स्मरण करने से जिसको श्रीरामजी का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम ( अभागा ) और कौन होगा ? दयालु और सुजान श्रीरामजी ने सभी की दशा देखकर और भक्त ( भरतजी )_के हृदय की स्थिति जानकर_।
धर्म धुरीन धीर जय नागर। सत्य सनेह सील गुन सागर।। देसु कालु लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।।_अर्थ_धर्मधुरंधर, धीर, नीति में चतुर, समय, स्नेह सील और सुख के समुद्र, नीति और प्रीति को पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल और अवसर को देखकर;
बोले बचन बानी सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रही से।। तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।_अर्थ_( तदनुसार ) ऐसे वचन बोले जो मानो वाणी के सर्वस्व ही थे, परिणाम में हितकारी थे और सुनने में चन्द्रमा के रस ( अमृत )_सरीखे थे। ( उन्होंने कहा_) हे तात भरत ! तुम धर्म की धूरी को धारण करनेवाले हैं, लोक और वेद दोनों के जाननेवाले और प्रेम में प्रवीण हो।
करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयं किमि कहि जात।।_अर्थ_हे तात ! कर्म से, वचन से और मन से निर्मल तुम्हारे समान तुही हो। गुरुजनों के समाज में और ऐसे कुसमय में छोटे भाई के गुन किस तरह कहे जा सकते हैं ?
जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।। समउ समाजु लाज गुर्जन की। उदासीन हित अनहित मन की।।_अर्थ_हे तात ! तुम सूर्यकुल की रीति को, सत्यरतिज्ञ पिताजी की कीर्ति और प्रीति को, समय, समाज और गुरुजनों की लज्जा ( मर्यादा )_को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सके मन की बात जानते हो।
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