धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हर्षित बरिआई।। मुनि मिथिलेस समां सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।।_अर्थ_'भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजी की जय हो !' ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक ( अत्यधिक ) हर्षित होने लगे। भरतजी के वचन सुनकर मुनि वशिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी और सभा में सब किसी को बड़ा उत्साह ( आनन्द ) हुआ।
भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।। सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।।_अर्थ_ भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी के गुणसमूह तथा प्रेम की विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनों का सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और प्रेम पवित्र को भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले हैं।
मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।। सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहुं समाज हियं हर्ष बिषादू।।_अर्थ_मंत्री और सभासद सभी प्रेम मुग्ध होकर अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी का संवाद सुन_सुनकर दोनों समाजों के हृदयों में हर्ष और विषाद ( भरतजी के सेवाधर्म को देखकर हर्ष और राम वियोग की संभावना से विषाद ) दोनों हुए।
राम मातु दुखु सुखु सब जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।। एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत। भरत भलाई।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी दु:ख और सुख को समान जानकर श्रीरामजी के गुण कहकर दूसरी रानियों को धैर्य बंधाया। कोई श्रीरामजी की बड़ाई ( बड़प्पन )_की चर्चा कर रहैं, तो कोई भरतजी के अच्छेपन की सराहना करते हैं।
अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहं पावन अमिअ अनूप।।_अर्थ_तब अत्रिजी ने भरतजी से कहा_इस पर्वत के समीप ही एक सुंदर कुआं है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत_जैसे तीर्थस्थल को उसी में स्थापित कर दीजिये।
भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।। सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहं कूप अगाधू।।_अर्थ_भरतजी ने अत्रि मुनि की आज्ञा पाकर जल के सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुध्न, अत्रइमउनइ तथा अन्य साधु_संतों सहित आप वहां गये जहां वह अथाह कुआं था।
पावन पार पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।। तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेज काल बिदित नहीं केहू।।_अर्थ_ ऋषि ने प्रेम से आनंदित होकर ऐसा कहा_हे तात ! यह अनादि सिद्ध स्थल है। कालक्रम से यह लोप हो गया था इसलिये किसी को इसका पता नहीं था।
तब सेवकन्ह सरस जलु देखा। कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।। बिधि बस भयउ बिस्व पुकारूं। सुगम अगम अति धरम बिचारू।।_अर्थ_तब ( भरतजी के ) सेवकों ने उस जलयुक्त स्थान को देखा और उस सुन्दर ( तीर्थों के ) जल के लिये एक खास कुआं बना लिया। दैवयोग से विश्वभर का उपकार हो गया। धर्म का विचार जो अत्यन्त अगम था, वह ( इस कूप के प्रभाव से ) सुगम हो गया।
भरतकूप अब कहिहहिं लोगा। अति पावन तीर्थ जल जोगा।। प्रेम स्नेह निमज्जन प्रानी। होइहिं बिमल करम मन बानी।।_अर्थ_अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे। तीर्थों के जल के संयोग से तो यह अत्यन्त पवित्र हो गया। इसमें प्रेमपूर्वक नियम से स्नान करने पर प्राणी मन, वचन और कर्म से निर्मल हो जायेंगे।
कहत कूप महिमा सकल गए जहां रघुराउ। अत्रि सुनायी रघुबरहिं तीर्थ पुन्य प्रभाउ।।_अर्थ_कूप की महिमा कहते हुए सब लोग वहां गये जहां श्रीरघुनाथजी थे। श्रीरघुनाथजी को अत्रिजी ने उस तीर्थ का पुण्य प्रभाव सुनाया।
कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोर निसि सो सुख बीती।। नित्य निबाहा भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।।_अर्थ_प्रेमपूर्वक धर्म का इतिहास कहते वह रात सुख से बीत गयी और सवेरा हो गया। भरत_शत्रुध्न दोनों भाई नइत्यक्रइयआ पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वशिष्ठ जी की आज्ञा पाकर,।
सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटल पयादें।। कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।।_अर्थ_समाजसहित सब सादें साथ से श्रीरामजी के वन में भ्रमण ( प्रदक्षिणा ) करने के लिये पैदल ही चले। कोमल चरण है और बिना जूते के चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन_ही_मन सकुचाकर कोमल हो गयी।
कुस कंटक कांकरी कुराईं। खटीक कठोर कुबस्तु दुराई।। महि मंजुल मृदु मार्ग कीन्हे। बहुत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।।_अर्थ_कुश, कांटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओं को छिपाकर पृथ्वी ने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये। सुखों को साथ लिये ( सुखदायक ) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी।
सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूला बलि त्न मृदुताहीं।। मृग बिलोकि खग बोलि सुबानि। से वहां सकल राम प्रिय जानी।।_अर्थ_रास्ते में देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल_फलकर, तृण अपनी कोमलता से, मृग ( पशु ) देखकर और पक्षी सुन्दर और वाणी बोलकर_सभी भरतजी को श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे।
सुलभ सिद्धि सब प्राकृत ही राम कहते जमुहात। राम प्रानप्रिय भरत कहुं यह न होई बड़ि बात।।_अर्थ_ जब एक साधारण मनुष्य को भी ( आलस्य से ) जंभाई लेते समय 'राम' कह देने से ही सब सिद्धियां सुलभ हो जाती हैं, तब श्रीरामचन्द्रजी ने भरतजी के लिये यह कोई बड़ी (आश्चर्य ) की बात नहीं है।
एहि बिधि भरत फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमी लखि मुनि सकुचाहीं।। पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु त्न गिरि बन बागा।।_अर्थ_इस प्रकार भरतजी वन में फिर रहे हैं।उनके नियम और प्रेम को देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जल के स्थान ( नदी, बावली, कुण्ड आदि ), पृथ्वी के पृथक्_पृथक् भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण ( घास ), पर्वत, वन और बगीचे_।
चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतुसभी विशेष रूप से दिव्य सब देखी।। सुनि मन मुदित कहते रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।।_अर्थ_सभी विशेष रूप से सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरतजी पूछते हैं और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रिजी प्रसन्न मन से सबके कारण, नाम, गुण और पुण्य प्रभाव को कहते हैं।
कतहुं निमज्जन कतहुं प्रनामा। कतहुं बिलोकत मन अभिराम।। कतहुं बैठ मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।।_अर्थ_भरतजी कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थानों के दर्शन करते हैं और मुनि अत्रिजी की आज्ञा पाकर बैठकर, सीताजी सहित श्रीराम _लक्ष्मण दिनों भाइयों का स्मरण करते हैं।
देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा फिरहिं गेंद दिन पहले अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।_अर्थ_भरतजी के स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभाव को देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं। यों घूम_फिरकर ढ़ाई पहर दिन बीतने परलोक पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों का दर्शन करते हैं।
देखे थल तीरथ सकल भरत पांच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयी दिवस भइ सांझ।।_अर्थ_ भरतजी ने पांच दिनों में सब तीस्थानों के दर्शन कर लिये। भगवान् विष्णु और महादेवजी का सुन्दर यश कहते_सुनते वह ( पांचवां ) दिन भी बीत गया, सन्ध्या हो गयी।
भोर न्हाइ सब जुरा समाजू। भरत भूमि सुर तेरहुति राजू।। भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचा हीं।।_अर्थ_(अगले छठे दिन ) सवेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने के लिये अच्छा दिन है, यह मन में जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहने में सकुचा रहे हैं।
गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचा राम फिरि अवनि बिलोकी।। सील सराही सभा सब सोची। कहुं न राम सम स्वामि संकोची।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने गुरु वशिष्ठजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभा की ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वी की ओर ताकने लगे। सभा उनके शील की सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचन्द्रजी के समान संकोची स्वामी कहीं नहीं है।
भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।। करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।_ अर्थ_सुजान भरतजी श्रीरामचन्द्रजी का रुख देखकर प्रेमपूर्वक उठकर, विशेष रूप से धीरज धारण कर दण्डवत् करके हाथ जोड़कर कहने लगे_हे नाथ ! आपने मेरी सभी रुचियां रखीं।
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भांति दुखु पावा आपू। अब गोसाईं मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।_अर्थ_मेरे लिये सब लोगों ने सन्ताप सहा और अपने भी बहुत प्रकार से दुख पाया। अब स्वामी मुझे आज्ञा दें। मैं जाकर अवधिभर ( चौदह वर्ष तक ) अवध का सेवन करूं।
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखें दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कओसलपआल कृपाल।।_अर्थ_हे दीनदयालु! जिस उपाय से यह दास फिर चरणों का दर्शन करे_हे कोसलाधीश ! हे कृपालु ! अवधिभर के लिये मुझे वहीं शिक्षा दीजिये।
पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहं सगाईं।। राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।।
_अर्थ_हे गोसाईं ! आपके प्रेम और सम्बन्ध से अवधपुर वासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र रस ( आनन्द )_से युक्त हैं। आपके लिये भव दु:ख ( जन्म_मरणके दु:ख )_की ज्वाला में जलना भी अच्छा है और प्रभु ( आप )_के बिना परमपद ( मोक्ष )_का लाभ भी व्यर्थ है।
स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहना जन जी की।। प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देऊं दुहू दिसि ओर निबाहू।।_अर्थ_हे स्वामी ! आप सुजान हैं, सभी के हृदय की और मुझ सेवक के मन की रुचि, लालसा ( अभिलाषा ) और रहनी जानकर, है प्रनतपाल ! आप सब किसी का पालन करेंगे और है देव ! दोनों तरफ को ओर अंत तक निबाहेंगे।
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