परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू।। हरन कठिन करि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू।।_अर्थ_भरतजी का परम पवित्र आचरण ( चरित्र ) मधुर, सुन्दर और आनन्द _मंगलों का करनेवाला है। कलियुग के कठिन पापों और क्लेशों को हरनेवाला है। महामोह रूपी रात्रि को नष्ट करने के लिये सूर्य के समान है।
पाप पुंज कुंज मृगराजू। समन सकल संताप समाजू।। जन रंजन भोजन भव भालू। राम स्नेह सुधाकर सारू।।_अर्थ_ पापसमूहरूपी हाथी के लिये सिंह है। सारे संतापों के दल का नाश करनेवाला है। भक्तों को आनन्द देनेवाला और भव के पार ( संसार के दु:ख )_का भंजन करनेवाला तथा श्रीरामप्रेमरूपी चन्द्रमा का सार ( अमृत ) है।
सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को।। दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलाकार तुलसी से सिन्हा हटा राम सनमुख करत को।।_अर्थ_श्रीसीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी का जन्म यदि न होता तो मुनियों के मन को भी अगम, यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतों का आचरण कौन करता ? दु:ख, संताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषों को अपने सुयश के बहाने कौन हरण करता ? तथा कलाकार में तुलसीदास जैसे शब्दों को हठपूर्वक कौन श्रीरामजी के सम्मुख करता ?
भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं। सीयं राम पद प्रेमु अवसि होई भव रस बिरति।।_अर्थ_ तुलसीदासजी कहते हैं_ जो कोई भरतजी के चरित्र को नियम से आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम होगा और सांसारिक विषय_रस से वैराग्य होगा।
मासपरायण इक्कीसवां विश्राम
इति श्रीरामचरितमानसे सकल कलिकलुषविध्वंसने द्वितीय सोपान: समाप्त:।
कलियुग के संपूर्ण पापों को विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानस का यह दूसरा सोपान समाप्त हुआ।
( अयोध्याकाण्ड समाप्त )
No comments:
Post a Comment