Sunday, 28 June 2026

अरण्यकाण्ड

बचन कर्म मन मोरि गति भजन करहिं नि:काम। तिन्ह के हृदय कमल महुं करउं सदा विश्राम।।_अर्थ_जिनको कर्म वचन और मन से मेरी ही गति हैं; और जो निष्काम भाव से मेरा भजन करते हैं, उनके हृदय_कमल में मैं सदा विश्राम करता हूं।


भगति जोग सुनि अति सुख पावा। लछिमन प्रभु चरनन्हि सिरु नावा।। एहि बिधि गए कछुक दिन बीती। कहत बिराग ग्यान गुन नीति।।_अर्थ_इस भक्तियोग को सुनकर लक्ष्मणजी ने अत्यन्त सुख पाया और उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाया। इस प्रकार वैराग्य, ज्ञान, गुण और नीति कहते हुए कुछ दिन बीत गये।


सूपनखा रावन कै बहिनी। दुष्ट हृदय दारुन जब अहिनी।। पंचवटी सो गइ एक बारा। देखि बिकल भई जुगलकुमारा।।_अर्थ_शूर्पनखा नामक रावण की एक बहन थी, जो नागिन के समान भयानक और दुष्ट हृदय की थी। वह एक बार पंचवटी में गयी और दोनों राजकुमारों को देखकर विकल ( काम से पीड़ित ) हो गयी।

भ्राता पिता पुत्र उरगारी। पुरुष मनोहर निरखत नारी।। होइ बिकल सक मनहुं न रोकी। जिमि रबिमनि द्रव रबिहिं बिलोकी।।_अर्थ_( काकभुसुंडीजी कहते हैं_) हे गरुड़जी ! ( सूर्पनखा_जैसी राक्षसी धर्मज्ञानशून्य कामान्ध ) स्त्री मनोहर पुरुष को देखकर, चाहे वह भाई, पिता, पुत्र ही हो, विकल हो जाती है और मन को नहीं रोक सकती। जैसे सूर्यकांत मणि सूर्य को देखकर द्रवित हो जाती है ( ज्वाला से पिघल जाती है।

रुचिर रूप धरि प्रभु पहिं जाई। बोली बचन बहुत मुसकाई।। तुम्ह सम पुरुष न मो सम नारी। यह संजोग बिधि रचा बिचारी।।_अर्थ_वह सुंदर रूप धरकर प्रभु के पास जाकर र बहुत मुस्कराकर वचन बोली_ न तो तुम्हारे समान कोई पुरुष है, न मेरे समान स्त्री ! विधाता ने यह संजोग ( जोड़ा ) बहुत विचारकर रचा है।

मम अनुरूप पुरुष जग माहीं। देखेउं खोजि लोक तिहुं नाही।। तातें अब लगा रहीं कुमारी। मनु माना कछु तुम्हहिं निहारी।।_अर्थ_मेरे योग्य पुरुष ( वर ) जगत्भर में नहीं है, मैंने तीनों लोकों में खोज देखा। इसी से मैं अबतक कुमारी ( अविवाहित ) रही। अब तुमको देखकर कुछ मन माना ( चित्त ठहरा ) है।


सीतहिं चितइ सब कही प्रभु बाता। अहइ कुमार मोर लघु भ्राता।। गइ लछिमन रिपु भगिनी जानी। प्रभु बिलोकि बोले मृदु बानी।।_अर्थ_सीताजी की ओर देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने यह बात कही कि मेरा छोटा भाई कुमार है। तब वह लक्ष्मण के पास गयी। लक्ष्मणजी उसे शत्रु की बहिन समझकर और प्रभु की ओर देखकर कोमल वाणी से बोले_


सुन्दरी सुनु मैं उन्ह कर दासा। पराधीन नहीं तोर सुपास।। प्रभु समर्थ कोसलपुर राजा। जो कछु करहिं उनहिं सब छाजा।।_अर्थ_हे सुंदरी ! सुन, मैं तो उनका दास हूं, अतः: तुम्हें सुभीता ( सुख ) न होगा। प्रभु समर्थ हैं, कोसलपुर के राजा हैं, वे जो कुछ करें उन्हें सब फबता है।


सेवक सुख उस मान भिखारी। बेसनी धन सब गति बिभिचारी।। लोभी जसु चह चार गुमानी। नभ दुहि दूध चहत ए प्रानी।।_अर्थ_सेवक सुख चाहे, भिखारी सम‌्मान चाहे, व्यसनी ( जिसे जूए शराब आदि का व्यसन हो ) धन और व्यभिचारी शुभ गति चाहे, लोभी यश चाहे और अभिमानी चारों फल_अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चाहे, तो ये सब प्राणी आकाश को दुहकर दूध लेना चाहते हैं ( अर्थात् असम्भव बात को सम्भव करना चाहते हैं )।

पुनि फिर राम निकट सोआई। प्रभु लछिमन पहिं बहुरि पठाई।। लछिमन कहा मोहि सो बरु। जो त्न तोरी लाज परिहरई।।_अर्थ_वह लौटकर फिर श्रीरामजी के पास आयी। प्रभु ने फिर उसे लक्ष्मणजी के पास भेज दिया। लक्ष्मणजी ने कहा_तुम्हें वहीं भरेगा जो लज्जा को तृण तोड़कर ( अर्थात् प्रतिज्ञा करके ) त्याग देना ( अर्थात् जो निपट निर्लज्ज होगा )।

तब खिसियानि राम पहिं गई। रूप भयंकर प्रगटत भई।। सीतहिं समय देखि रघुराई। कहां अनुज सन स्तन बुझाई।।_अर्थ_तब वह खिसियायी हुई ( क्रुद्ध होकर ) श्रीरामजी के पास गयी और उसने अपना भयंकर रूप प्रकट किया। सीताजी को भयभीत देखकर श्रीरघुनाथजी ने लक्ष्मणजी को इशारा देकर कहा।

छिमन अति लाघवं सो नाक कान बिनु कीन्हि। ताकें कर रावन कहुं मनों चुनौती दीन्हि।।_अर्थ_लक्ष्मणजी ने बड़ी फुर्ती से उसको बिना नाक_कान के कर दिया। मानो उसके हाथ रावण को चुनौती दे दी हो।

नाक कान बिनु भी बिकरारा। जनु स्थल सैल गेरु के धारा।। कर दूषन पहिं गई बिलपाता। धिग धिग तो पौरुष बल भ्राता।।_अर्थ_बिना नाक_कान के वह विकराल हो गयी। _ उसके शरीर से रक्त इस प्रकार बहने लगा ) मानो ( काले ) पर्वत से गेरु की धारा बह रही हो। वह विलाप करती हुई खर-दूषण के पास गयी। ( और बोली _) है भाई ! तुम्हारे पौरुष ( वीरता )_को धिक्कार है, तुम्हारे बल को धिक्कार है।

तेहि पूछा सब कहेसि बुझाई। जआतउधआन सुनि सेन बनाई।। धाए निसिचर निकर बरूथा। जनु सपच्छ कज्जल गिरि जूथा।।_अर्थ_उन्होंने पूछा, तब सूर्पनखा ने सब समझाकर कहा। सब सुनकर राक्षसों ने सेना तैयार की। राक्षस_समूह झुण्ड_के_झुण्ड दौड़े। मानो पंखधारी काजल के पर्वतों का झुंड हो।

नाना बाहन नानाकारा। नानायुध धर घोर अपारा।। सूर्पनखा आगे करि लीनी। विकट रूप श्रुति नासा हीनी।।_अर्थ_वे अनेकों प्रकार की सवारियों पर चढ़े हुए तथा अनेकों आकार ( सूरतों )_के हैं। वे अपार हैं और अनेकों प्रकार के असंख्य भयानक हथियार धारण किये हुए हैं। उन्होंने नाक_कान कटी हुई अमंगलरूपिणी सूर्पनखा को आगे कर लिया। 

असगुन अमित होहिं भयकारी। गनहिं न मृत्यु बिबस सब झारी।। गर्जहिं तर्जहिं गगन उड़ाहीं। देखि कट्टु भट अति हरषाहीं।।_अर्थ_अनगिनत भयंकर अपशकुन हो रहे हैं। परंतु मृत्यु के वश होने के कारण सब_के_सब उनको कुछ गिनते ही नहीं। गरजते हैं, ललकारते हैं और आकाश में उड़ते हैं। सेना देखकर योद्धा लोग बहुत ही हर्षित होते हैं।

कोई कह जियत धरहु द्वौ भाई। धरि मारहु तिय देहु छड़ाई।। धूरि पूर्ति नभमंडल रहा। राम बोलाइ अनुज सन कहा।।_अर्थ_कोई कहता है दोनों भाईयों को जीता ही पकड़ लो, पकड़कर मार डालो और स्त्री को छीन लो। आकाश मंडल धूल से भर गया। तब श्रीरामजी ने लक्मणजी को बुलाकर उनसे कहा_।

Tuesday, 2 June 2026

अरण्यकाण्ड

मुनि समूह महं बैठे सम्मुख सब की ओर। सरद इंदु तन चित्त मानहुं निकर चकोर।।_अर्थ_ मुनियों के समूह में श्रीरामचन्द्रजी सबकी ओर उन्मुख होकर बैठे हैं ( अर्थात् प्रत्येक मुनि को श्रीरामजी अपने ही ओर मुख करके बैठे दिखायी देते हैं और सब मुनि टकटकी लगाये उनके मुख को देख रहे हैं)। ऐसा जान पड़ता है मानो चकोरों का समुदाय शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा की ओर देख रहा हो।

तब रघुबीर कहा मुनि पाहीं। तुम्ह सन प्रभु दुराव कछु नाहीं।। तुम्ह जानहु जेहिं कारण आयउं। ताते तात न कहीं समुझायउं।।_अर्थ_तब श्रीरामजी ने मुनि से कहा_हे प्रभो ! आपसे तो कुछ छिपाव है नहीं। मैं जिस कारण से आया हूं वह आप जानते ही हैं। इसी से हे तात ! मैंने आपसे समझाकर कुछ नहीं कहा।

अब सो मंत्र देहु प्रभु मोहि। जेहिं प्रकार यारों मुनिद्रोही।। मुनि मुसुकाने सुनि प्रभु बानी। पूछें ही नाथ मोहि का जानी।।_अर्थ_हे प्रभो ! अब आप मुझे वहीं मंत्र ( सलाह ) दीजिये, जिस प्रकार मैं मुनियों के द्रोही राक्षसों को मारूं। प्रभु की वाणी सुनकर मुनि मुस्कराये और बोले_हे नाथ ! आपने क्या समझकर मुझसे यह प्रश्न किया है ?

तुम्हरेइं भजन प्रभाव अघारी। जानउं महिमा कछुक तुम्हारी।। ऊमरि तरु बिसाल तव माया। फल ब्रह्मांड अनेक निकाया।।_अर्थ_हे पापों का नाश करनेवाले ! मैं तो आपही के भजन के दबाव से आपकी कुछ थोड़ी_सी महिमा जानता हूं। आपकी माया गूलर के विशाल वृक्ष के समान है, अनेकों ब्रह्मांड के समूह ही जिसके फल हैं।

जीव चराचर जंतु समाना। भीतर बसहिं न जानहिं आना।। ते फल भच्छक कठिन कराला। तव भयं डरत सदा सोच काला।।_अर्थ_चर और अचर जीव ( गूलर के फल के भीतर रहनेवाले छोटे_छोटे जंतुओं के समान उन ( ब्रह्मांड रूपी फलों )_के भीतर बसते हैं और वे ( अपने उस छोटे-से जगत् के सिवा ) दूसरा कुछ नहीं जानते। उन फलों का भक्षण करनेवाला कठिन और कराल काल है। वह काल भी सदा आपसे भयभीत रहता है।

ते तुम्ह सकल लोकपति साईं। पूंछेहु मोहि मनुज की नाईं।। यह डर मांगउं कृपानिकेता । बसहु हृदयं श्री अनुज समेता।।_अर्थ_उन्हीं आपने समस्त लोकपालों के स्वामी होकर भी मुझसे मनुष्य की तरह प्रश्न किया । हे कृपा के धाम ! मैं तो यह वर मांगता हूं कि आप श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मण सहित मेरे हृदयं में ( सदा ) निवास कीजिये। 

अबिरल भगति बिरति सतसंगा। चरन सरोरुह प्रीति अभंगा।।  यद्यपि ब्रह्म अखंड अनंता। अनुभव गम्य भजहिं जेहिं संता।।_अर्थ_मुझे प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य, सत्संग और आपके चरणकमलों में अटूट प्रेम प्राप्त हो। यद्यपि आप अखंड और शांत ब्रह्म हैं, जो अनुभव से ही जानने में आते हैं और जिनका संतान भजन करते हैं।

अस तव रूप बखानउं जानउं। फिरि फिरि ब्रह्म रति मानउं।। संतत दासन्ह देहु बड़ाई। तातें मोहि पूंछेहु रघुराई।।_अर्थ_यद्यपि मैं आपके ऐसे रूप को जानता हूं और उसका वर्णन भी करता हूं तो भी लौट_लौटकर मैं सगुन ब्रह्म में ( आपके इस सुन्दर स्वरूप में ) ही प्रेम मानता हूं। आप सेवकों को सदा ही बड़ाई दिया करते हैं, इसी से हे रघुनाथजी ! आपने मुझसे पूछा है।

है प्रभु परम मनोहर ठाऊं। पावन पंचवटी तेहि नाउं।। दंडक बन पुनीत प्रभु करहू। उग्र सांप मुनिबर कर हरहू।।_अर्थ_हे प्रभो ! एक परम मनोहर और पवित्र स्थान है, उसका नाम पंचवटी है। हे प्रभो ! आप दण्ड कवन को ( जहां पंचवटी है ) पवित्र कीजिये और श्रेष्ठ मुनि गौतमजी के कठोर श्राप को हर लीजिये।

बास करहु तहं रघुकुलराया। कीजे सकल मुनिन्ह पर दाया।। चले राम मुनि आयसु पाई। तुरंत हां पंचवटी निअराई।।_अर्थ_हे रघुकुल के स्वामी ! आप सब मुनियों पर दया करके वहीं निवास कीजिये और श्रेष्ठ मुनि गौतमजी के कठोर श्राप को हर लीजिये। 

गीधराज से भेंट भइ बहुबिधि प्रीति बढ़ाइ। गोदावरी निकट प्रभु रहे परन गृह जाइ।।_अर्थ_वहां गीधराज जटायु से भेंट हुई। उसके साथ बहुत प्रकार से प्रेम बढ़ाकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी गोदावरी जी के समीप पर्णकुटी जाकर रहने लगे।

जब तें राम कीन्ह तहं बासा। सुखी में मुनि बीती त्रासा।। गिरि बन नदीं ताल छबि छाए। दिन दिन प्रति अति होहिं सुहाए।।_अर्थ_जबसे श्रीरामजी ने वहां निवास किया तबसे मुनि सुखी हो गये, उनका डर जाता रहा। पर्वत, वन, नदी और तालाब शोभा से छा गये।

खग मृग बृंद आनंदित रहहीं। मधुप मधुर गुंजत छबि लहहीं।। सो बन बरनी न सक अहिराजा। जहां प्रगट रघुबीर बिराजा।।_अर्थ_पक्षी और पशुओं के समूह आनंदित रहते हैं और भौंरे मधुर गुंजार करते हुए शोभा पा रहे हैं। जहां प्रत्यक्ष श्रीरामजी विराजमान हैं, उस वन का वर्णन सर्पराज शेषजी भी नहीं कर सकते।

एक बार प्रभु सुख आसीना। लछिमन बचन कहे छलहीना।। सुर नर मुनि सचराचर साईं। मैं पूछीं निज प्रभु की नाईं।।_अर्थ_एक बार प्रभु श्रीरामजी सुख से बैठे हुए थे। उस समय लक्ष्मणजी ने उनसे छलरहित ( सरल ) वचन कहे_हे देवता, मनुष्य, मुनि और चराचर के स्वामी! मैं अपने प्रभु की तरह ( अपना स्वामी समझकर ) आपसे पूछता हूं।

मोहि समुझाई कहहु सोई सेवा। सब तजि करौं चरन रज सेवा।। कहहु ग्यान बिरागु अरु माया। कहहु हो भगति करहु जेहिं दाया।।_अर्थ_हे देव ! मुझे समझाकर वहीं कहिये, जिससे सब छोड़कर मैं आपकी चरणरज की ही सेवा करूं। ज्ञान, वैराग्य और माया का वर्णन कीजिये; और उस भक्ति को कहिये जिसके कारण आप दया करते हैं।

ईश्वर जीव भेद प्रभु सकल अहो समुझाइ। जायें होई चरन रति सोक मोह भ्रम जाइ।।_अर्थ_हे प्रभो !: ईश्वर और जीवन का भेद भी सब समझाकर कहिये, जिससे आपके चरणों में मेरी प्रीति हो और शोक, मोह और भ्रम नष्ट हो जाय।


थोरेहि महं सब कहउं बुझाई। सुनहु तात मति मन चित लाई।। मैं अरु मोर तोर तैं माया। जेहिं बस कीन्हे जीव निकाया।।_अर्थ_( श्रीरामजी ने कहा_) है तात ! मैं थोड़े में ही सब समझाकर कहे देता हूं। तुम मन चित्त और बुद्धि लगाकर सुनो। मैं और मेरा, तू और तेरा_यही माया है, जिसने समस्त जीवों को वश में कर रखा है।
गो गोचर जहं लगि मन जाई। सो सब माया जानेहु भाई।। तेहि कर भेद सुनहु तुम्ह सोऊ। विद्या अपर अविद्या दोऊ।।_अर्थ_ इन्द्रियों के विषयों को और जहां तक मन जाता है, है भाई ! उस सबको माया जानना। उसके भी_ एक विद्या और दूसरी अविद्या, इन दोनों भेदों को तुम सुनो।

एक दुष्ट अतिसय दुखरूपा। जा बस जीव परा भवकूपा।। एक रचइ जग गुन बस जाकें। प्रभु प्रेरित नहिं निज बल ताकें।।_अर्थ_एक ( अविद्या ) दुष्ट ( दोषयुक्त ) है और अत्यन्त दोषरूप है जिसके वश होकर जीव संसाररूप कुएं में पड़ा हुआ है। और एक ( विद्या ) जिसके वश में गुण है और जो जगत् की रचना करती है, वह प्रभु से ही प्रेरित होती है, उसके अपना बल कुछ भी नहीं है।


ग्यान मान जहं एक एकु नाहीं। देख ब्रह्म समान सब माहीं।। कहिअ तात सो परम बिरागी। त्न सम सिद्धि तीनि गुन त्यागी।।_अर्थ_ज्ञान वह है जहां ( जिसमें ) मान आदि एक भी ( दोष ) नहीं है और जो सबमें समान रूप से ब्रह्म को देखता है। हे तात ! उसी को परम वैराग्यवान व कहना चाहिये जो सारी है सिद्धियों को और तीनों गुणों को तिनके के समान त्याग चुका हो।

( जिनमें मान, दम्भ, हिंसा, क्षमाराहित्य, टेढापन, आचार्य सेवा का अभाव, अपवित्रता, अस्थिरता, मन का निगृहीत न होना, इन्द्रियों के विषय में आसक्ति, अहंकार, जन्म_मृत्यु_जरा_व्याधिमय, जगत् में सुखवृद्धि, स्त्री_पुत्र, घर आदि में आसक्ति तथा ममता, इष्ट और अनिष्ट की प्राप्ति में हर्ष_शोक, भक्ति का अभाव, एकान्त में मन न लगना, विषयी मनुष्यों के संग में‌ प्रेम_ये अठारह न हों और नित्य अध्यात्म ( आत्मा )_में स्थिति तथा तत्वज्ञान के अर्थ ( तत्वज्ञान के द्वारा जानने योग्य) परमात्मा का नित्य दर्शन हो, वहीं ज्ञान कहलाता है )
माया ईस न आपु कहुं जान कहिअ सो जीव। बंध मोच्छ प्रद सर्ब पर माया प्रेरक जीव।।_अर्थ_ जो माया को, ईश्वर को और अपने स्वरूप को नहीं जानता, उसे जीव कहना चाहिये। ( कर्मानुसार ) बन्धन और मोक्ष देनेवाला, सबसे परे और माया का प्रेरक है वह ईश्वर है।

धर्म ते बिरति जोग तें ज्ञाना। ग्यान मोच्छप्रद बेद बखाना।। जातें बेगि द्रवउं मैं भाई। सो मम भगति भगत सुखदाई।।_अर्थ_ धर्म ( के आचरण ) से वैराग्य और योग से ज्ञान होता है तथा ज्ञान मोक्ष देनेवाला है_ऐसा वेदों ने वर्णन किया है। और हे भाई ! जिससे मैं शीघ्र ही प्रसन्न होता हू, वह मेरी भक्ति है जो भक्तों को सुख देनेवाली है।

सो सुमंत्र अवलंब न आना। तेहि आधीन ग्यान बिग्याना।। भगति तात अनुपम सुखमूला। मिलि जो संत होई अनुकूला।।_अर्थ_वह भक्ति स्वतंत्र है, उसको ( ज्ञान_विज्ञान आदि किसी ) दूसरे साधन का सहारा ( अपेक्षा ) नहीं है। ज्ञान और विज्ञान तो उसके अधीन हैं। हे तात् ! भक्ति अनुपम एवं सुख की मूल है; और वह तभी मिलती है जब संत अनुकूल ( प्रसन्न ) होते हैं।

भगति कि साधन कहुं बखानी। सुगम पंथ मोहि पावहिं प्रानी।। प्रथमहिं विप्र चरन अति प्रीती। निज निज कर्म निरत श्रुति रीती।।_अर्थ_अब मैं भक्ति के साधन विस्तार से कहता हूं_यह सुगम मार्ग है, जिससे जीव मुझको सहज ही पा जाते हैं। पहले तो ब्राह्मणों के चरणों में अत्यन्त प्रीति हो और वेद की रीति के अनुसार अपने_अपने ( वर्णाश्रम के ) कर्मों में लगा रहे।

एहि कर फल पुनि बिषय बिरागा। तब मम धर्म उपज अनुरागा।। श्रवनादिक नव भक्ति दऋढ़आहईं। मम लीला रति अति मन माहीं।।_इसका फल, फिर विषयों से वैराग्य होगा। तब ( वैराग्य होने पर ) मेरे धर्म ( भागवतधर्म )_में प्रेम उत्पन्न होगा। तब श्रवण आदि नौ प्रकार की भक्तियां दृढ़ होंगी और मन में मेरी लीलाओं के प्रति अत्यन्त प्रेम उत्पन्न होगा।

संत चरन पंकज अति प्रेमा। मन क्रम बचन भजन दृढ़ नेमा।। गुरु पितु मातु बंधु पति देवा। सब मोहि कहं जाने सेवा।।_अर्थ_जिसका संतों के चरणकमलों में अत्यंत प्रेम हो; मन, वचन और कर्म से भजन का दृढ़ नियम है और जो मुझको ही गुरु, पिता, माता, भाई, पति और देवता सब कुछ जाने और सेवा में दृढ़ हो।

मम गुन गावत पुलक सरीरा। गदगद गिरा नयन बह नीरा।। काम आदि मद दंभ न जाकें। तात निरंतर बस मैं ताकें।।_अर्थ_मेरा गुण गाते समय जिसका शरीर पुलकित हो जाय, वाणी गद्गद् हो जाय और नेत्रों से ( प्रेमाश्रुओं ) जल बहाने लगे और काम, मद और दम्भ आदि जिसमें न हों, है भाई ! मैं सदा उसके वश में रहता हूं।