Monday, 13 November 2023

अयोध्याकाण्ड

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमान बनावा।। गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानी दर्शन अभिलाषी।।_अर्थ_वेदों में बतायी हुई विधि से राजा की देह को स्नान कराया गया और परम बिचित्र विमान बनाया गया। भरतजी ने सब माताओं को चरण पकड़कर रखा ( अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होने से रोक लिया )। वे रानियां भी ( श्रीराम के ) दर्शन की अभिलाषा से रह गयीं।






चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।। सरजू तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।_अर्थ_चंदन और अगर के तथा और भी अनेकों प्रकार के अपार ( कपूर, गुलगुल, केसर आदि ) सुगंध द्रव्यों के बहुत_से बोझ आये। सरयूजी के तट पर सुंदर चिंता रचकर बनायी गयी, ( जो ऐसी मालुम होती थी ) मानो स्वर्ग की सुंदर सीढ़ी हो।





एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।। सोधि स्मृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।_अर्थ_इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने बइधइपूर्वक स्नान करके तिलांजलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजी ने पिता का दशगात्र_विधान ( दस दिनों के कृत्य ) किया।









जहं जस मुनिवर आयसु दीन्हा। तहं तस सहज भांति सबु कीन्हा।। भए बइसउद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजी गज बाहन नाना।।_अर्थ_ मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ जी ने जहां जैसी आज्ञा दी, वहां भरतजी ने वैसा ही हजारों प्रकार से किया। शुद्ध हो जाने पर ( विधिपूर्वक ) सब दान दिये। गऔएं तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकार की सवारियां,





सिंघासन भूषन बसन अन्न धरना धन धाम। दिए भरत रहि भूमइसउर में परिपूर्ण काम।।_अर्थ_सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन और मकान भरतजी ने दिए; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्ण काम हो गये ( अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएं अच्छी तरह से   पूरी हो गयीं )




पितु हित भरत कीन्ह जस करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।। सुदिनु सोधि मुनिवर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।_अर्थ_पिता के लिये भरतजी ने जैसी करनी की वह लाखों मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठ जी आए और उन्होंने मंत्रियों तथा सब महाजनों को बुलाया।




बैठे राजसभां सब जाई। पड़े बोलि भरत दोउ भाई।। भरतु बसिष्ठ निकट बैठाले। नीति धरममय बचन उचारे।।_अर्थ_ सब लोग राजसभा में जाकर बैठ गये। तब मुनि ने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयों को बुलवा भेजा। भरतजी को वसिष्ठ जी ने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्म से भरे हुए वचन कहे।






प्रथम कथा सब मुनिवर बरनी। कैकेई कुटिल कीन्ह जस करनी।। भूप धरमब्रतउ सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेम निबाहा।।_अर्थ_पहले तो कैकेयी ने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनि ने वह सारी कथा कही। फिर राजा के धर्मव्रत और सत्य की सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेम को निबाहा।





कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।। बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ज्ञानी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के गुण, शील और स्वभाव का वर्णन करते_करते तो मुनिराज के नेत्रों में जल भर आया और वे शरीर से पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मण जी और सीताजी के प्रेम की बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेह में मग्न हो गये।





सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभ जीवनु मरने जस अपजसु बिधि हाथ।।_अर्थ_मुनिनाथ ने बिलखकर ( दु:खी होकर ) कहा_हे भरत ! सुनो, भावी ( होनहार) बड़ी बलवान् है। हानि_लाभ, जीवन_मरण और यश_अपयश, ये सब विधाता के हाथ हैं।






अस बिचारि केही देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिए रोसू।। तात बिचारी करहु मन माहीं। सोचु जोगु दशरथ नृप नाही।।_अर्थ_ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय ?और व्यर्थ किसपर क्रोध किया जाय ? हे तात ! मन में विचार करो। राजा दशरथ सोच करने योग्य नहीं हैं।





सोचिअ बिप्र जो वेद बिहीना। तजि निज धर्मु बिषय लयलीना।। सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना।।_अर्थ_सोच उस ब्राह्मण का करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय भोगों में ही लीन रहना है। उस राजा का सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है।






सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।। सोचिअ सूद्रू बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।_अर्थ_उस वैश्य का सोच करना चाहिये जो धनवान होकर भी कंजूस है, और जो अतिथि सत्कार तथा शिवजी की भक्ति करने में कुशल नहीं है। उस शूद्र का सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान_बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञान का घमंड रखनेवाला है।





सोचिअ पुनि पतिबंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।। सोचिअ बटु निज ब्रतउ परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुहरई।।_अर्थ_पुन: उस स्त्री का सोच करना चाहिये जो पति को चलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञा के अनुसार नहीं चलता।





सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग।।_अर्थ_उस गृहस्थ का सोच करना चाहिये जो मोह वश कर्ममार्ग का त्याग कर देता है; उस संन्यासी का सोच करना चाहिये जो दुनिया के प्रपंच में फंसा हुआ है और ज्ञान वैराग्य से हीन है।





बैखानस सोई सोचै जोखू। तप बिहाइ भोगू।। सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननी जनक गुर बंधु बिरोधी।।_अर्थ_वानप्रस्थ वहीं सोच करने योग्य है जिसको तयस्यआ छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई बंधुओं का विरोध रखनेवाला है।






सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।। सोचनीय सबहीं बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।_अर्थ_सब प्रकार से उसका सोच करना चाहिये जो दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने ही शरीर का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकार से सोच करने योग्य है जो छल छोड़कर हरि का भक्त नहीं होता।






सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।। भयउ न अहई न  अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।_अर्थ_कोसलराज दशरथजी सोच करने योग्य नहीं हैं जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है। हे भरत ! तुम्हारे पिता_जैसा राजा न तो हुआ न है और न अब होने का ही है। 






बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहि सब दशरथ गुन गाथा।।_अर्थ_ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजी के गुणों की कथाएं कहते रहते हैं।

कहहु तात केहि भांति कोई करिहिं बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।_अर्थ_हे तात ! कहो उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा, जिनके राम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न सरीखे पवित्र पुत्र हैं।






सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।। यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।।_अर्थ_राजा सब प्रकार से बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो।

Saturday, 7 October 2023

अयोध्याकाण्ड

पितु सुरपुर बन रघुवर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतू।। धिग मोहि भयउं बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।_अर्थ_पिताजी स्वर्ग में हैं और श्रीरामजी वन में हैं। केतू के समान केवल मैं ही इन सब अनर्थों का कारण हूं। मुझे धिक्कार है ! मैं बांस के वन में आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दु:ख और दोषों का भागी बना।




मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी संभारि। लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।_अर्थ_भरतजी के कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर संभलकर उठीं। उन्होंने भरत को उठाकर छाती से लगा लिया और नेत्रों से आंसू बहाने लगीं।






सरल सुभाय मायं हियं लाए। अति हित मनहुं राम फिरि आए।। भेंटेउ बहुरि लखन लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयं समाई।।_अर्थ_सरल स्वभाववाली माता ने बड़े प्रेम से भरतजी को छाती से लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मण जी के छोटे भाई शत्रुघ्न को हृदय से लगा लिया। शोक और स्नेह हृदय में समाता ही नहीं है।







देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।। माता भरतु गोद बैठारे। आंसु पोंछि मृदु बचन उचारे।।_अर्थ_ कौसल्या का स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं_श्रीराम की माता का ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माता ने भरतजी को गोद में बैठा लिया और उनके आंसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं।







अजहुं बच्छ बलि धीरज धरहु। कुसमय समुझि सोक परिहरहू।। जनि मानहुं हइयं हानि गलानी। काल क्रम गति अघटित जानी।।_अर्थ_हे वत्स ! मैं बलैया लेती हूं। तुम अब भी धीरज धरो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्म की गति अमिट जानकर हृदय में हानि और ग्लानि मत मानो।







काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।। जो एतएहउं दुख मोहि जिआवा। अजहुं को जानि का तेहि भावा।।_अर्थ_ हे तात ! किसी को दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकार से उल्टा हो गया है, जो इतने दु:ख पर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है ?







पितु आयसु भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरष न हृदयं कछु पहिरे बलकल चीर।।_अर्थ_ हे तात ! पिता की आज्ञा से श्रीरघुवीर ने भूषन_वस्त्र त्याग दिये और वल्कल _वस्त्र पहन लिये। उनके हृदय में न कुछ विषाद था न हर्ष।







मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।। चले बिपिन सुनि सिय संग लागी। रहि न राम चरन अनुरागी।।_अर्थ_उनका मुख प्रसन्न था, मन में न आसक्ति थी, न राग ( द्वेष )। सबका सब तरह से संतोष कराकर वे वन को चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीराम के चरणों की अनुरागिणि वे किसी तरह न रहीं।








सुनहिं लखन चले उठि साथा।  रहहइं न जतन किए रघुनाथा।। तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।।_अर्थ_सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथ ने उन्हें रोकने के बहुत यत्न किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मण को साथ लेकर चले गये।







रामु लखनऊ सिय बनहइ सिधाए। गाउं न संग न प्रान पठाए।। यह सबु भा इन्ह आंखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागे।।_अर्थ_श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन को चले गये। मैं न तो साथ ही गया और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आंखों के सामने हुआ। तो भी अभागे जीव ने शरीर नहीं छोड़ा।








मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।। जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।_अर्थ_ अपने स्नेह की ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम सरीखे पुत्र की मैं माता ! जीना और मरना तो राजा ने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रों के समान कठोर है।







कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु। ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुं सोक नेवासु।।_अर्थ_कौसल्या के वचनों को सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोक का निवास बन गया।







बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्या लिए हृदयं लगाई।। भांति अनेक भरत समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।_अर्थ_भरत_शत्रुध्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजी ने उनको हृदय से लगा लिया। अनेकों प्रकार से भरतजी को समझाया और बहुत _सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनायीं।








भरतहउं मातु सकल समुझाईं। कहि पुराने श्रुति कथा सुहाई।। छल बिहीन सुचि सरल सुबानी।
बोले भरत जोरी जुग पानी।।_अर्थ_ भरतजी ने आक्षममपमपंभी सभी माताओं को पुराण और वेदों की सुन्दर कथाएं कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी जलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले__








जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महइसउर पुर जारें।। जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महिपति माहुर दीन्हें।।_अर्थ_जो पाप माता पिता को पुत्र के मारने से होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणों के नगर जलाने से होते हैं और जो मित्र और राजा को जहर देने से होते हैं__








जे पातक उपपातक अहहईं। कर्म बचन मन भव कबि कहहीं।। तें पातक मोहि होहुं बिधाता। जौं यही होइ मोर मत माता।।_अर्थ_कर्म वचन और मन से होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक ( बड़े_छोटे पाप ) हैं, जिनको कवइलओग कहते हैं; हे विधाता ! यदि इस काम में मेरा मत हो, तो हे माता ! वे सब पाप मुझे लगें।







जे परिहरि हरि हर चरन भजहइं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देहु बिधि जौं जननी मत मोर।।_अर्थ_जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजी के चरणों को छोड़कर भयानक भूत_प्रेतों को भजते हैं, हैं माता ! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे।








बेचहिं बेद धर्म दुधि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहिं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।_अर्थ_जो लोग वेदों को बेचते हैं, धर्म को दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरे के पापों को कह देते हैं, जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदों की निंदा करनेवाले और विश्वभर के विरोधी हैं;








लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधन परदारा।। पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा। जौं जननी यह संमत मोरा।।_अर्थ_ जो लोभी लंपट और लालचियों का आचरण करनेवाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्री की ताक में रहते हैं; हे जननी! यदि इस काम में मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गति को पाऊं।








जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमार्थ पथ बइमउख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हें न हरिहर सुजसु सोहाई।।_अर्थ_जिनका सत्संग में प्रेम नहीं हैं; जो अभागे परमार्थ के मार्ग से विमुख हैं; जो मनुष्य शरीर पाकर क्षश्रीहरि का भजन नहीं करते; जिनको हरिहर ( भगवान् विष्णु और शंकरजी ) का सुयश नहीं सुहाता;








तजा श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बइरचइ बेषु जग छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यही जानों भेऊ।।_अर्थ_जो वेदमार्ग को छोड़कर वाम ( वेदप्रतिकूल ) मार्ग पर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत् को छलते हैं; हैं माता ! मैं इस भेद को जानता भी होऊं तो शंकरजी मुझे उनलोगों की गति दें।








मातु भरत के वचन सुनि सांचे सरल सुभायं। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा वचन मन कायं।।
_अर्थ_माता कौसल्याजी भरत के स्वाभाविक ही सच्चे और सरल वचनों को सुनकर कहने लगीं _हे तात ! तुम तो मन, वचन और शरीर से सदा ही श्रीरामचन्द्र के प्यारे हो।








राम प्रानहुं तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहुं तें प्यारे।। बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।।_अर्थ_श्रीराम तुम्हारे प्राणों से भी बढ़कर प्राण ( प्रिय ) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथजी को प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जल से विरक्त हो जाय।








भएं ज्ञानु  बरु मिटै न मोहू।। तुम्ह रामहित प्रतिकूल न होहू।। मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुं सुख सुगति न लहहीं।।_अर्थ_और ज्ञान हो जाने पर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्र के प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत् में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्न में भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे।








अस कहि मातु भरतु हियं लाए। थन पय स्रवहिं नयन जल छाए।। करत बिलाप बहुत एहि भांती। बैठेहिं बीती गई सब राती।।_अर्थ_ऐसा कहकर माता कौसल्या ने भरतजी को हृदय से लगा लिया। उनके स्तनों से दूध बहने लगा और ने त्यों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे_ही_बैठे बीत गयी।








बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। मुनि बहु भांति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।_अर्थ_तब वामदेवजी और वसिष्ठ जी आये। उन्होंने सब मंत्रियों तथा महाजनों को बुलवाया। फिर मुनि वसिष्ठ जी ने परमार्थ के सुन्दर समयआकूल वचन कहकर बहुत प्रकार से भरतजी को उपदेश दिया।







तात हृदयं धीरज धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।
_अर्थ_( वसिष्ठ जी ने कहा_) हे तात ! हृदय में धीरज धरो और आज जिस कार्य करने का अवसर है, उसे करो। गुरुजी के वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करने के लिये कहा।








 

Wednesday, 13 September 2023

अयोध्याकाण्ड

हंस-बंस दशरथु जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूं जननी भी बिधि सन कछु न बसाइ।।_अर्थ_मुझे सूर्यवंश ( _सा वंश ), दशरथजी (_सरीखे ) पिता और राम_लक्ष्मण_से भाई मिले। पर हे जननी ! मुझे जन्म देनेवाली माता तू हुई ! ( क्या किया जाय ! ) विधाता से कुछ भी वश नहीं चलता।






जब तैं कुमति कुमत जियं ठयऊ। खंड खंड होइ हृदउ न गयउ।। बर मागत मन भइ नहीं पीड़ा। गरि न जीह मुंह परेउ न कीरा।।_अर्थ_अरी कुमति ! जब तूने हृदय में यह बुरा विचार ( निश्चय ) ठाना, उसी समय तेरे हृदय के टुकड़े _टुकड़े ( क्यों न ) हो गये ? वरदान मांगते समय तेरे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई ? तेरी जीभ गोल नहीं गयी ? तेरे मुंह में कीड़े नहीं पड़ गये ?






भूप प्रतीति तोरि किमि किन्हीं। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।। बिधिहुं न नारी हृदयं गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।।_अर्थ_राजा ने तेरा विश्वास कैसे कर लिया ? ( जान पड़ता है ) विधाता ने मरने के समय उनकी बुद्धि हर ली थी। स्त्रियों के हृदय की गति ( चाल ) विधाता भी नहीं जान सके। वह संपूर्ण कपट, पाप और अवगुणों की खान है।







सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।। अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहिं रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।_अर्थ_फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला स्त्री_स्वभाव को कैसे जानते ? अरे, जगत् के जीव_जन्तुओं में ऐसा कौन है जिसे रघुनाथजी प्राणों के समान प्यारे नहीं हैं।






भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।। जो हसि सो हसि मुंह मसि लाई। आंखि ओट उठि बैठहि जाई।।_अर्थ_वे श्रीरामजी भी तुझे अहित हो गये ( वैरी लगे ) ! तू कौन है ? मुझे सच_सच कह ! तू जो है, सो है, अब मुंह में स्याही पोतकर ( मुंह काला करके ) उठकर मेरी आंखों की ओट में जा बैठ।







राम बिलोनी हृदय में प्रगट कीन्ह बिधि मोहि। मैं समान को पातकी बादि कहीं कछु तोहि।।_अर्थ_विधाता ने मुझे श्रीरामजी से विरोध करनेवाले ( तेरे ) हृदय से उत्पन्न किया ( अथवा विधाता ने मुझे हृदय से राम का विरोधी जाहिर कर दिया ) । मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है ? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूं।







सुनि सत्रुधन मातु कुटलाई। जेहिं गाय रिस कछु न बसाई।। तेहि अवसर कुबरी तहं आती। बहन विभूषण बिबिध बनाई।।_अर्थ_माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजी के सब अंग क्रोध से जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भांति_भांति के कपड़ों और गहनों से सजकर कुबरी ( मंथरा ) वहां आयी।







लखि रिस मर्जी लखन लघु भाई। भरत अनल घृत आहुति पाई।। हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।_अर्थ_ उसे ( सजी ) देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोध में भर गये। मानो जलती हुई आग को घी की आहुति मिल गई हो। उन्होंने जोर से थककर कूबर पर एक रात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुंह के बल जमीन पर गिर पड़ी।







सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटना धरि धरि झोंटी।। भरत दयानिधि दीन्हा छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।_अर्थ_उसकी यह बात सुनकर और उसे ना से सिखा तक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा पकड़_पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरत ने उसे छुड़ा दिया और दोनों भाई ( तुरंत ) कौसल्याजी के पास गये।







मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुं हनी तुसार।।_अर्थ_कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरे का रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही है, दु:ख के बोझ से शरीर सूख गया है। ऐसी दिख रही है मानो सोने की सुन्दर कल्पलतआ को वन में पाला मार गया हो।







भरतहिं देखि मातु उठि लाई। मुरछित अवधि पूरी झइं आई।। देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।।_अर्थ_भरत को देखते ही माता कौसल्या उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जाने से मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीर की सुध भुलाकर चरणों में गिर पड़े।







मातु तात कहं देहिं देखी। कहं सिय राम लखन दोउ भाई।। केकई कत जनमी जग माझा। जौं जनमी तो भइ काहे न बांझा।।_अर्थ_( फिर बोले_) माता ! पिताजी कहां हैं ? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम_लक्ष्मण कहां हैं ? ( उन्हें दिखा दे। ) कैकेई जगत् में क्यों जनमी ! और यदि जनमी तो फिर बांझ क्यों न हुई ?_






कुल कलंक जेहिं जनमेउ मोही।  अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।। को त्रिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहिं लागी।।_अर्थ_जिसने कुल के कलंक, अपयश के मांड़े और प्रियजनों के द्रोही मुझ_जैसे पुत्र को उत्पन्न किया। तीनों लोकों में मेरे समान अभागा कौन है ? जिसके कारण हे माता ! तेरी यह दशा हुई।



Friday, 8 September 2023

अयोध्याकाण्ड

तात बात मैं सकल संवारी। मैं मंथरा सहाय बिचारी।। कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।_अर्थ_हे तात ! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधाता ने बीच में जरा_सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोक को पधार गये।








सुनत भरत में बिबस बिषादा। जनु सहमएउ करि केहरि नादा।। तात तात हां तात पुकारी। परे भूमितल व्याकुल भारी।।_अर्थ_भरत यह सुनते ही विषाद के मारे विवश ( बेहाल ) हो गये। मानो सिंह की गर्जना सुनकर हाथी सहम गया है। वे 'तात ! तात! हा तात !' पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीन पर गिर पड़े।








चलत न देखन पायउं तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोहि।। बहुरि धीर धरि उठे संभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।।_अर्थ_( और विलाप करने लगे कि ) से तात !  मैं आपको ( स्वर्ग के लिये ) चलते समय देख भी न सका। ( हाय ! )  आप मुझे श्रीरामजी को सौंप भी नहीं गये। फिर धीरे धरकर वे संभलकर उठे और बोले_माता ! पिता के मरने का कारण तो बताओ ।








सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पांछि जनु माहुरी देई।। आदिहुं तें सब अपनी करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।_अर्थ_पुत्र का वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्मस्थान को पाकर ( चाकू से चीरकर ) उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयी ने अपनी सब करनी शुरू से ( आखिर तक बड़े ) प्रसन्न मन से सुना दी।










भरतहिं बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनी जानि जियं थकित रहे धरि मौनु।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का वन जाना सुनकर भरतजी को पिता का मरण भूल गया और हृदय में इन सारे अनर्थ का कारण अपने को ही जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये ( अर्थात् उनकी बोली बन्द हो गयी और वे सन्न रह गये।









बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुं जरे पर लोन लगावति।। तात राउ नहीं सोचो जोगू। बिढ़इ सुकृत ऐसी कीन्हेंउ भोगू।।_अर्थ_पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले पर नमक लगा रही है। ( वह बोली_) से तात ! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्याप्त भोग किया।







जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।। अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।।_अर्थ_जीवनकाल में ही उन्होंने जन्म लेने के संपूर्ण फल पा लिये और अन्त में इन्द्रलोक को चले गये। ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाज सहित नगर का राज्य करो।








सुनि सुनि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अंगारू।। धीरज धरि भरी लेहिं उसासा। पापिनि सबहि भांति कुल नासा।।_अर्थ_राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घाव पर अंगार छू गया है। उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लम्बी सांस लेते हुए कहा_पापिनी ! तूने सभी तरह से कुल का नाश कर दिया।








जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोहि।। पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।_अर्थ_हाय ! यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी रुचि ( दुष्ट इच्छा ) थी, तो तूने जन्मते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला ? तूने पेड़ को काटकर पत्ते को सींचा है और मछली के जीने के लिये पानी को उलीच डाला ! ( अर्थात् मेरा हित करने जाकर उल्टा तूने मेरा अहित कर डाला।

Saturday, 2 September 2023

अयोध्याकाण्ड

बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु  करहिं पुरबासी।। अंथयउ आजु भानुकुल भानू।‌ धरम अवधि गुन रूप निधानू।।_अर्थ_दास_दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरवासी घर_घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्म की सीमा, गुण और रूप के भण्डार सूर्यकुल के सूर्य अस्त हो गये।






गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहिं।। एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ज्ञानी।।_अर्थ_सब कैकेई को गालियां देते हैं, जिसने संसार भर को बिना नेत्र का ( अंधा ) कर दिया। इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रात:काल सब बड़े _बड़े ज्ञानी मुनि आये।








तब बसिष्ठ मुनि समय सम कही अनेक इतिहास। सोक निवारि सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।_अर्थ_तब वसिष्ठ मुनि ने समय के अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञान के प्रकाश से सबका शोक दूर किया।







तेल नावं भरी नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अब भाषा।। धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहूं कहहू जनि काहू।।_अर्थ_वसिष्ठजी ने नाव में तेल भरवाकर राजा के शरीर में उसको रखवा दिया। फिर दूतों को बुलवाकर उनसे ऐसा कहा_तुमलोग जल्दी दौड़कर भरत के पास जाओ। राजा की मृत्यु का समाचार कहीं किसी से कहो।








एतनइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई।। सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजी लजाए।।_अर्थ_जाकर भरत से इतना ही कहना कि दोनों भाइयों को गुरुजी ने बुलवा भेजा है। मुनि की आज्ञा सुनकर धावन ( दूत ) दौड़े। वे अपने वेग से उत्तम घोड़ों को भी लजाते हुए चले।










अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कउसगउन होहिं भरत कहीं तब तें।। देखहिं राति भयानक सपना। जागा करहिं कटु कोटि कलपना।।_अर्थ_ जबसे अयोध्या में अनर्थ प्रारंभ हुआ, तभी से भर्ती को अपशकुन होने लगे। वे रात को भयंकर स्वप्न देखते थे और जागने पर ( उन स्वप्नों के कारण ) करोड़ों ( अनेकों ) तरह की बुरी_बुरी कल्पनाएं किया करते थे।










बिप्र जेवांइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।। मागहिं हृदयं महेस मनाई। कुसल मातु_पितु परिजन भाई।।_अर्थ_( अनिष्टशान्ति के लिये) वे प्रतिदिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियों से रुद्राभिषेक करते थे। महादेवजी को हृदय में मनाकर उनसे माता_पिता, कुटुम्बी और भाइयों का कुशल_क्षेम मांगते थे।








एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुंचे आइ। गुर अनुशासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।_अर्थ_भरतजी इस प्रकार मन में चिंता कर रहे थे कि दूत आ पहुंचे। गुरु की आज्ञा कानों से सुनते ही वे गणेशजी को मनाकर चल पड़े।








चले समीर वेग हय हांके। नाघत सरित सैल बन बांके।। हृदयं सोची बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियं जाऊं उड़ाई।।_अर्थ_हवा के समान वेगवाले घोड़ों को हांकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलों को लांघते हुए चले। उनके हृदय में बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। में ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुंच जाऊं।







एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।। असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभांति कुखेत करारा।।_अर्थ_एक_एक निमेष वर्ष के समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगर के निकट पहुंचे। नगर में प्रवेश करते समय अपशगुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरह कांव_कांव कर रहे हैं।







खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।। श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा।।_अर्थ_गदहे और सिआर विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन_सुनकर भरत के मन में बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है।







खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।। नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुं सबन्हिं सब संपति हारी।।_अर्थ_श्रीरामजी के वियोगरूपी बुरे लोग से बताये हुए पक्षी_पशु, घोड़े_हाथी ( ऐसे दु:खी हो रहे हैं कि ) देखें नहीं जाते। नगर के स्त्री_पुरुष अत्यंत दु:खी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी संपत्ति हार गये हैं।








पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवंहिं जोहारहिं जाहिं। भरत कुशल पूंछि न सकहिं भय बिषादा मन माहिं।।_अर्थ_नगर के लोग मिलते हैं, फिर कुछ कहते नहीं; गौं _से ( चुपके_से ) जोहार ( वन्दना ) करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसी से कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मन में भय और विषाद जा रहा है।










हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहन दिसा लागि दवारी।। आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल कैरव चंदिनि।।_अर्थ_बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगर में दसों दिशाओं में दावाग्नि लगी है। पुत्र को आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमल के लिये चांदनी रूपी कैकेयी ( बड़ी ) हर्षित हुई।








सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारे हां भेंटा भवन लेइ आई।। भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुं तुहिन बनज बन मारा।।_अर्थ_वह आरती सजाकर आनंद में भरकर उठ दौड़ी और दरवाजे पर ही मिलकर भरत_शत्रुध्न को महल में ले आयी। भरत ने सारे परिवार को दु:खी देखा। मानो कमलों के वन को पाला मार गया हो।







कैकेई हरषित एहि भांती। मनहुं मुदित दव लाई किराती। सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूछति नैहर कुसल हमारें।।_अर्थ_एक कैकेयी ही इस तरह हर्षित दिखती है मानो भीलनी जंगल में आग लगाकर आनंद भर रही हो। पुत्र को सोचवश और मन मारे ( बहुत उदास ) देखकर वह पूछने लगी_हमारे नैहर में कुशल तो है?








सकल कुसल कहीं भरत सुनाई। पूंछी निज कुल कुसल भलाई।। कहीं कहं तात के कहां सब माता। कहं सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।_अर्थ_ भरतजी ने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुल की कुशल_क्षेम पूछी।  ( भरतजी ने कहा_) कहो, पिताजी कहां हैं ? मेरी सब माताएं कहां हैं ? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम_लक्ष्मण कहां हैं ?






सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरी नैन। भरत श्रवन मन सूल सम पानी बोली बैन।।_अर्थ_पुत्र के स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रों में कपट का जल भरकर पानी कैकेयी भरत के कानों में शूल के समान चुभनेवाली वचन बोली_








Wednesday, 16 August 2023

अयोध्याकाण्ड

धीरजु धरिअ तो पाइअ पारू। नहीं तो बूड़िहिं सभी परिवारू।। जौं जियं धरिअ बिनय प्रिय मोरी। रामु लखनऊ सिय मिलहिं बहोरी।।_अर्थ_आप धीरज धरियेगा, तो सब पार पहुंच जायेंगे। नहिं तो सारा परिवार डूब जायगा। हे प्रिय स्वामी! यदि मेरी विनती हृदय में धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे।





प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आंखि उघारि।  तलफत मीन मलीन जनु सींचती सीतल बारि।।_अर्थ_प्रिय पत्नी कौशल्या के कोमल वचन सुनते हुए राजा ने आंखें खोलकर देखा। मानो तड़पती हुई दिन मछली पर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो।







धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहं राम कृपालू।। कहां लखनु कहं राम सनेही। कहं प्रिय पुत्रवधू बैदेही।।_अर्थ_धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले_सुमंत्र ! कहो, कृपालु राम कहां हैं ? लक्ष्मण कहां हैं ? स्नेही राम कहां हैं ? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहां है ?







बिलपत राउ बिकल बहुत भांती। भइ जुग सरिस सिरात न राती।। तापस अंध साप सुनि आई। कौसल्यहिं सब कथा सुनाई।।_अर्थ_राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकार से विलाप कर रहे हैं। वह रात युग के समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजा को अंधे तपस्वी ( श्रवणकुमार के पिता ) के शाप की याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्या को कह सुनायी। 







भयऊ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।। सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहि न प्रेमु पन मोर निबाहा।।_अर्थ_उस इतिहास का वर्णन करते_करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीराम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है। मैं उस शरीर को रखकर क्या करूंगा जिसने मेरा प्रेम का पन नहीं निबाहा।









हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।। हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।।_अर्थ_हा रघुकुल को आनंद देनेवाले मेरे प्राण प्यारे राम ! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुबर ! हा पिता के चित्तरूपी चातक के हित करनेवाले मेघ !







राम राम कहि राम कहां राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहं राउ गयी सुरधाम।।_अर्थ_राम_राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीराम के विरह में शरीर त्यागकर सुरलोक को सिधार गये।






जिअन मरन फल दशरथ पावा। अंड अनेक अमल जस छावा।। जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु संवारा।।_अर्थ_जीने और मरने का फल तो दशरथजी ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डों में छा गया। जीते_जी तो श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमा के समान मुख को देखा और श्रीराम के विरह को निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया।

Sunday, 6 August 2023

अयोध्याकाण्ड

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।। धीरजु धरहीं बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।_अर्थ_मूर्खलोग सुख में हर्षित होते हैं और दु:ख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। हे सबके हितकारी ( रक्षक ) ! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोक का परित्याग कीजिये।








प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरी तीर। न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ वीर।।_अर्थ_ श्रीरामजी का पहला निवास ( मुकाम ) तमसा के तट पर हुआ, दूसरा गंगातीर पर। सीताजी सहित दोनों भाई उस दिन स्नान करके जल पीकर ही रहे।








केवट कीन्ह बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवांई।। होत प्रात बट छीर मंगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।।_अर्थ_ केवट ( निषादराज ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर ( श्रृंगवेरपुर ) मं ही बितायी। दूसरे दिन सवेरा होते ही बड़ का दूध मंगवाया और उससे श्रीराम_लक्ष्मण ने अपने सिरों पर जटाओं के मुकुट बनाये।








रामसखा तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाई चले रघुराई।। लखन बान धनु धरे बनाई। आप चढ़े प्रभु आयसु पाई।।_अर्थ_ तब श्रीरामचन्द्रजी के सखा निषादराज ने नाव मंगवायी। पहले प्रिया सीताजी को उसपर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजी ने धनुष _बाण सजाकर रखें और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े।









बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।। तात प्रनामु तात सन कहेहू। बार बार पद पंकज गहेहू।।_अर्थ_ मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले_ हे तात ! पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और मेरी और से बार_बार उनके चरण_कमल पकड़ना।।









करबि पायं परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।। बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।_अर्थ_फिर पांव पकड़कर विनती करना कि हे पिताजी ! आप मेरी चिंता न कीजिये। आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्य से वन में और मार्ग में हमारी कुशल मंगल होगा।










तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरिंं आइहौं।। जननीं सकल परितोषि परि परि पायं करी बिनती घनी। तुलसी करहु सोई जतन जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी।।_अर्थ_हे पिताजी ! आपके अनुग्रह से मैं वन जाते हुए सब प्रकार का सुख पाऊंगा। आज्ञा का भलीभांति पालन करके चरणों का दर्शन करने कुशलपूर्वक फिर आऊंगा। सब माताओं के पैरों पड़ _पड़कर उनका समाधान करके और उनसे बहुत विनती करके_तुलसीदास कहते हैं _तुम वहीं प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी प्रसन्न रहें।









गुर सन कहब संदेसु बार बार पद पदुम गहि। करब सोई उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति।।_अर्थ_बार_बार चरणकमलों को पकड़कर गुरु वसिष्ठजी से मेरा संदेसा कहना कि ये वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें।








पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।। सोई सब भांति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।।_अर्थ_हे तात ! सब प्रवासियों और कुटुम्बियों से निहोरा ( अनुरोध ) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकार से हितकारी है जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।








कहब संदेसु भरत के आएं। नीति न तजिअ राजपदु पाएं।। पालेहु प्रजहि कर्म मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।।_अर्थ_भरत के आने पर उनको मेरा संदेसा कहना कि राजा का पद पा जाने पर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मन से प्रजा का पालन करना और सब माताओं को समान जानकर उनकी सेवा करना।








ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।। तात भांति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करें न काऊ।।_अर्थ_और हे भाई ! पिता, माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपने को अन्त तक निबाहना। हे तात ! राजा ( पिताजी ) को उसी प्रकार से रखना जिससे वे कभी ( किसी तरह भी ) मेरा सोच न करें।








लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।। बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।_अर्थ_लक्ष्मणने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजी ने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार_बार अपनी सौगंध दिलायी ( और कहा_ ) से तात ! लक्ष्मण का लड़कपन वहां न कहना।








कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह। थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।_अर्थ_प्रणाम कर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, किन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं।  उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रों में जल भर आया और शरीर रोमांच से व्याप्त हो गया।






  

तेहि अवसर रघुबर रुख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।। रघुकुलतिलक चले एहि भांती। देखउं ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।_अर्थ_उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर केवट ने पार जाने के लिये नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छाती पर वज्र रखकर खड़ा_खड़ा देखता रहा।









मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरौ लेइ राम संदेसू।। अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि ग्लानि सोच बस भयऊ।।_अर्थ_मैं अपने क्लेश को कैसे कहूं, जो श्रीरामजी का यह संदेसा  लेकर जीता ही लौट आया ! ऐसा कहकर मंत्री की वाणी रुक गयी ( वे चुप हो गये ) और वे हानि की ग्लानि और सोचवश हो गये।








सूत बचन सुनहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।। तलफत बिषय मोह मन मापा। माजा मनहुं मीन कर ब्यापा।।_अर्थ_सारथि सुमंत्र के वचन सुनते ही राजा पृथ्वी पर गिर पड़े, उनके हृदय में भयानक जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोह से व्याकुल हो गया। मानो मछली को मांजा व्याप गया हो ( पहली वर्षा का जल लग गया हो )।








करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।। सुनि बिलाप दुखहू दुखी  लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।_अर्थ_सब रानियां विलाप करके रो रही हैं। उस महान विपत्ति का कैसे वर्णन किया जाय ? उस समय के विलाप को सुनकर दु:ख को भी दु:ख लगा और धीरज का भी धीरज भाग गया।








भयउ कोलाहल अवध अति सुनि नृप राउर सोरु। बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुं कुलिस कठोर।।_अर्थ_ राजा के रावले ( रनिवास ) में रोने का शोर सुनकर अयोध्या में बड़ा भारी कुहराम मच गया। ( ऐसा जान पड़ता था ) मानो पक्षियों के विशाल वन में आ रात के समय कठोर वज्र गिरा हो।







प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि विहीन जनु व्याकुल ब्यालू।। इंद्रीं सकल बिकल भईं भारी। जनु सर सरसिज बनी बिनु बारी।।_अर्थ_राजा के प्राण कंठ में आ गये। मानो मणि के बिना सांप व्याकुल ( मरणासन्न ) हो गया हो। इन्द्रियां सभी बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जल के तालाब में कमलों का वन मुरझा गया है।







कौसल्या नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबी अंथयउ जाय जाना।। उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।।_अर्थ_ कौसल्याजी ने राजा को बहुत दुखी देखकर अपने हृदय में जान लिया कि अब सूर्यकुल का सूर्य अस्त हो चला !  तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्या हृदय में धीरज धरकर समय के अनुकूल वचन बोलीं_







नाथ समुझि मन करिअ विचारू। राम वियोग पयोधि अपारू।। करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक ममाजू।।_अर्थ_हे नाथ ! आप मन में समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्र का वियोग अपार समुद्र है और आप उसके कर्णधार ( खेनेवाले ) हैं। सब प्रियजन ( कुटुम्बी और प्रजा ) ही यात्रियों का समाज है, जो इस जहाज पर चढ़ा हुआ है।