Monday, 8 September 2025

अयोध्याकाण्ड

समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।। जनक भरत संबादु सुनाई । भरत कहाउति कही सुहाई।।_अर्थ_तब रघुकुल के पुरोहित वशिष्ठजी समय, समाज और धर्म के अवइरओधई ( अर्थात् अनुकूल ) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजी का संवाद सुनाया। फिर भरतजी की कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायीं।

तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।। सुनि रघुनाथ जोरी जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।_अर्थ_( फिर बोले_) है तात राम ! मेरा मत तो यह है कि तुम जैसी आज्ञा दो, वैसी ही सब करें ! यह सुनकर दोनों हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी सत्य, सरल और कोमल वाणी बोले_

विद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भांति भदेसू।। राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।।_अर्थ_ आपके और मिथिलेश्वर जनकजी के विद्यमान रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकार से भद्दा ( अनुचित ) है। आपकी और महाराज की जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूं वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी।

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। बिकल बिलोकर भरत मुखु बना न ऊतरु देत।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी की शपथ सुनकर सभा समेत मुनि और जनकजी सकुचा गये ( स्तम्भित रह गये )। किसी से उत्तर देते नहीं बनता, सबलोग भरतजी का मुंह ताक रहे हैं।

सभा सकुच बस भरत निहारी। राम बन्धु धरि धीरज भारी।। कुसमउ देखि सनेहु संभारा बिंधि जिमि घटज निवारा।।_अर्थ_ भरतजी ने सभा को संकोचवश देखा। राम बन्धु ( भरतजी ) ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने ( उमड़ते हुए ) प्रेम को संभाला, जैसे बढ़ते हुए विंध्याचल को अगस्त जी ने रोका था।

सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।। भरत बिबेक सराहन बिसाला। अनायास चौधरी तेहि काला।।_अर्थ_ शोक रुपी हिरण्याक्ष ने ( सारी सभा की ) बुद्धि रुपी पृथ्वी को हर लिया जो विमल गुणसमूहरूपी जगत् की योनि ( उत्पन्न करनेवाली ) थी। भरतजी के विवेकरूपी विशाल बराह ( वराहरूपधारी भगवान् )_ने ( शोक रुपी हिरण्याक्ष को नष्ट कर दिया ) बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया।

करि प्रनामु सब कहं कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।। छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउं बदन मृदु बचन कठोरा।।_अर्थ_ भरतजी ने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचन्द्रजी, राजा जनकजी, गुरु वशिष्ठजी  और साधु_संत सबसे विनती की और कहा_आज मेरे इस अत्यन्त अनुचित वर्ताव को क्षमा कीजिएगा। मैं कोमल ( छोटे ) मुख से कठोर ( धृष्टता पूर्ण ) वचन कह रहा हूं।

हियं सुमिरि सारदा सुहाई। मानस में मुख पंकज आई।। बिमल बिबेक धर्म नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।_अर्थ_ फिर उन्होंने हृदय में सुहावनी सरस्वतीजी का स्मरण किया। वे मानस से ( उनके मन रुपी मानसरोवर से ) उनके मुखारविंद पर आ विराजीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीति से युक्त भरतजी की वाणी सुन्दर हंसिनी ( के समान गुण_दोष का विवेचन करनेवाली ) है।

निरखि बिबेक बिलोचन्हि सिथिल सनेहं समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।_अर्थ_विवेक के नेत्रों से सारे समाज को प्रेम से शिथिल देख, सबको प्रणाम कर, श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके भरतजी बोले_

प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी।। सरत्न सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।_अर्थ_हे प्रभु ! आप पिता, माता  सुहृद् ( मित्र ), गुरु, स्वामी, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरल हृदय, श्रेष्ठ मालिक, शील के भण्डार, शरणागत की रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान,

समरथ  सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।। स्वामि गोसांइहिं सरिस गोसाईं। मोहि समान मैं साईं दोहाईं।।_अर्थ_समर्थ, शरणागत का हित करनेवाले, गुणों का आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापों को हरनेवाले हैं। हे गोसाईं ! आप सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामी से द्रोह करने में मेरे समान मैं ही हूं।

प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयीं इंसान समाजु सकेली।। जग भला पोच ऊंच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।_अर्थ_ मैं मओहवश प्रभु ( आप )_ के और पिताजी के वचनों का उल्लंघन कर और समाज बटोरकर यहां आया हूं। जगत् में भले_बुरे, ऊंचे और नीचे अमृत और अमरपद ( देवताओं का पद ), विष और मृत्यु आदि_

राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुं कोई नाहीं।। सो मैं सब बिधि कीन्ह ढ़िठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।_अर्थ_किसी को भी कहीं ऐसा नहीं देखा_सुना जो मन में भी श्रीरामचन्द्रजी ( आपकी ) आज्ञा को भेंट दे। मैंने सब प्रकार से वही ढ़िठाई की, परन्तु प्रभु ने उस ढ़िठाई को स्नेह और सेवा मान लिया।

कृपां भलाईं अपनी नाथ कीन्ह भल मोर।दूषन में दूषन सुजसु चारु चहुं ओर।।_अर्थ_हे नाथ ! आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण ( दोष ) भी भूषण ( गुण )_के समान  हो गये और चारों ओर मेरा यश छा गया।

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत विदित निगमागम गाई। कूल कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।।_अर्थ_हे नाथ ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभाव की बड़ाई जगत् में प्रसिद्ध है और वेद_शास्त्रों ने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शईलरहइत, निरीश्वरवादी ( नास्तिक) और नि:शंख ( निडर ) है।


तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सुकृति प्रनामु किहें अपनाए।। देखि दोष कबहुंक न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।।_अर्थ_उन्हें भी आपने शरण में सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करने पर ही अपना लिया। उन ( शरणागतों )_ के दोषों को देखकर भी आप कभी हृदय में नहीं लाये और उनके गुणों को सुनकर साधुओं के समाज में उनका बखान किया।

को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साथ सब साजी।। निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।।_अर्थ_ऐसा सेवक पर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवक का सारा साज_समान से दे ( उसकी सारी आवश्यकताओं को पूर्ण कर दे ) और स्वप्न में भी अपनी कोई करनी न समझकर ( कर।थात् मैंने सेवक के लिये कुछ किया है ऐसा न समझकर ) उलटा सेवक को संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदय में रखे।

सो गोसाईं नहिं दूसरे कोपी। भुजा उठाइ कहउं पन रोपी।।  पसु नाचते सुख पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।_अर्थ_मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर ( बड़े जोर के साथ ) कहता हूं, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है।
( बंदर आदि ) पशु नाचते और तोते ( सीखें हुए ) पाठ में प्रवीण हो जाते हैं। परन्तु तोते का ( पाठप्रवीणतारूप ) गुण और पशु के नाचने की गति ( क्रमशः ) पढ़ानेवाले और नचानेवाले के अधीन है।

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।_अर्थ_इस प्रकार अपने सेवकों की ( बिगड़ी ) बात सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओं का शिरोमणि बना दिया। कृपालु ( आप )_के सिवा अपनी विरदावली का और कौन जबर्दस्ती ( हठपूर्वक ) पालन करेगा ?

सोक सनेहं कि बाल सुभाएं। आयउं लाइ रजायसु बाएं।। तबहुं कृपाल हेरि निज ओरा। सबहिं भांति भल  मानेउ मोरा।।_मैं शोक से या स्नेह से या बालक स्वभाव से आज्ञा को बाएं लाकर ( न मानकर ) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी ( आप )_ने अपनी ओर देखकर सभी प्रकार से मेरा भला ही माना ( इस अनुचित कार्य को अच्छा ही समझा )।

देखउं पाय सुमंगलमूला। जानेंउ स्वामि सहज अनुकूला।। बड़े समाज बिलोकउं भागू। बड़ी चूक साहिब अनुरागू।।_अर्थ_मैंने सुन्दर मंगलों के मूल आपके चरणों का दर्शन किया, और यह जान लिया कि स्वामी मुझपर स्वभाव से ही अनुकूल हैं। इस बड़े समाज में अपने भाग्य को देखा कि इतनी बड़ी चूक होने पर भी स्वामी का मुझपर कितना अनुराग है।

कृपा अनुग्रहु अंगु अघाई। कीन्ह कृपानिधि सब अधिकाई।। राखा मोर दुलार गोसाईं। अपने सील सुभायं बड़ाई।।_अर्थ_कृपानिधान ने मुझपर सांगोपांग भरपेट कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं ( अर्थात् मैं जिसके जरा भी लायक नहीं था उतनी अधिक सर्वांगपूर्ण कृपा आपने मुझपर की है )। हे गोसाईं ! आपने अपने शील, स्वभाव और भलाई से मेरा दुलार रखा।

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहारी।। अभिनय बिनय जथारुचि बानी। तमसा देऊ अति आरती जानी।।_अर्थ_ है नाथ ! मैंने स्वामी और समाज के संकोच को छोड़कर अभिनय या वइनयभरई जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढ़िठाई की है। हे देव ! मेरे आर्तभआव ( आतुरता )_को जानकर आप क्षमा करेंगे।

सुहृदं सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ी खोरि। आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारि मोरि।।_अर्थ_सुहृद ( बिना ही हेतु के हित करनेवाले ), बुद्धिमान और श्रेष्ठ मालिक से बहुत कहना बड़ा अपराध है। इसलिये हे देव ! अब मुझे आज्ञा दीजिये, आपने मेरी सभी बात सुधार दी।



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