Saturday, 28 February 2026

अरण्यकाण्ड

पुलकित गात अत्रि उठि आए। देखि रामु आतुर चलि आए।। करत दण्डवत् मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।।_अर्थ_शरीर पुलकित हो गया, अत्रिजी उठकर दौड़े। उन्हें दौड़े आते देखकर श्रीरामजी और भी शीघ्रता से चले आए। दण्डवत् करते हुए ही श्रीरामजी को  ( उठाकर ) मुनि ने हृदय से लगा लिया और प्रेमाश्रुओं के जल को दोनों जनों को ( दोनों भाइयों को ) नहला दिया।


देखि राम छबि नयन छुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।। करि पूजा कहा बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।। _अर्थ_ श्रीरामजी की छबि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गये। तब वे उनको आदरपूर्वक अपने आश्रम में ले आये। पूजन करके सुन्दर वचन कहकर मुनि ने मूल और फल दिये, जो प्रभु के मन को बहुत रुचे।

प्रभु आसन आसीन भरी लोचन शोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानी अस्तुति करत।।_अर्थ_प्रभु आसन पर विराजमान हैं। नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।

नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।। भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।_अर्थ_हे भक्तवत्सल ! हे कृपालु ! हे कोमल स्वभाववाले ! मैं आपको नमस्कार करता हूं। निष्काम पुरुषों को परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलों को मैं भजता हूं।

निकाम श्याम सुन्दरं । भवांबुनाथ मंदरं ।। प्रफुल्ल कंज लोचनं। भवांबुनाथ मंदरं।।_अर्थ_आप नितांत सुन्दर, श्याम, संसार ( आवागमन )_रूपी समुद्र को मथने के लिये मन्दराचलयरूप, फूले हुए कमल के समान नेत्रों वाले और मद आदि दोषों से छुड़ाने वाले हैं।

प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभो प्रमेय वैभवं।। निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।
_अर्थ_हे प्रभु ! आपकी लंबी भुजाओं का पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय ( बुद्धि के परे अथवा असीम ) है। आप तरकस और धनुष _बाण धारण करनेवाले तीनों लोकों के स्वामी,।

दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।। मुनीन्द्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।_अर्थ_सूर्यवंश के भूषण, महादेवजी के धनुष को तोड़नेवाले, मुनिराज ओं और संतों को आनंद देनेवाले तथा देवताओं के शत्रु असुरों के समूह का नाश करनेवाले हैं।

मनोज वैरी वंदितं। आजादि देव सेवितं।।
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।_अर्थ_आप कामदेव के शत्रु महादेवजी के द्वारा वंदित, ब्रह्मा आदि देवताओं से सेवित, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह तथा समस्त दोषों को नष्ट करनेवाले हैं।

नमामि इंदिरा पतिं। सउखआकरं सतां गतिं।। भजे सशक्ति साधुजन। शची पति प्रियानुजं।।_अर्थ_ है लक्ष्मीपति ! हे सुखों के खान और सत्पुरुषों की एकमात्र गति ! मैं आपको नमस्कार करता हूं ! हे शचइपतइ ( इन्द्र )_के प्रिय छोटे भाई ( वामपंथी ) ! स्वरूपा_शक्ति श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मण सहित मैं आपको भजता हूं।

त्वदंध्रिमूल ये नरा: ।भजंति हीन मत्सरा: ।। पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले ।।_अर्थ_जो मनुष्य मत्स्य ( डाह ) रहित होकर आपके चरणकमलों का सेवन करते हैं, वे तर्क_वितर्क ( अनेक प्रकार के संदेह )_रूपी तरंगों से पूर्ण संसाररूप समुद्र में नहीं गिरते ( आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ते )।

विविक्त वासिन: सदा। भजंति मुक्तये मुदा।। निरस्य इंद्रियादिकं। प्रतीय ते गतिं स्वकं।।_अर्थ_जो एकान्तवासी पुरुष मुक्ति के लिये, इंद्रियादिज्ञका निग्रह करके ( उन्हें विषयों से हटाकर ) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गति को ( अपने स्वरूप को ) प्राप्त होते हैं।

तमेकमद्भुतं प्रमुं: निरीहमीश्वरं विभुं ।। जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं ।।_अर्थ _उन ( आप )_को जो एक ( अद्वितीय ), अद्भुत ( मायिक जगत् से विलक्षण ), प्रभु ( सर्वसमर्थ ), इच्छारहित ( ईश्वर ( सबके स्वामी ), व्यापक, जगत्गुरु, सनातन ( नित्य ), तुरीय ( तीनों गुणों से सर्वथा परे ) और केवल ( अपने स्वरूप में स्थित ) है।

भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।_अर्थ_( तथा ) जो भावप्रिय, कुययोगियों ( विषयी पुरुषों )_के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तों के लिये कल्पवृक्ष ( अर्थात् उनकी समस्औत कामनाओं को पूर्ण करनेवाले), सम ( पक्षपातरहित ) और सदा सुखपूर्वक सेवन करने योग्य है; मैं निरंतर भजता हूं।
 
अनूप रूप भूपतिं। नतोहमुर्विजापतिं।। प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।_अर्थ_हे अनुपम सुंदर ! हे जानकीनाथ ! मैं आपको प्रणाम करता हूं। मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूं। मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति दीजिये।

पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।। व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता:।।_अर्थ_जो मनुष्य इस स्तुति को आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके परमपद को प्राप्त होते हैं, इसमें संदेह नहीं।

बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरी बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुं तजे मति मोरि।।_अर्थ_मुनि ने ( इस प्रकार) विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा_हे नाथ ! मेरी बुद्धि आपके चरणकमलों को कभी न छोड़े।

अनुसूयिया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील विनीता।। रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देई निकट बैठाई।।_अर्थ_फिर परम सीलवती और विनम्र श्रीसीताजी ( अत्रिजी की पत्नी ) अनुसूचियां जी के चरण पकड़कर उन्हें मिलीं। ऋषिपत्नी के मन में बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशीष देकर श्रीसीताजी को पास बैठा लिया।

दिव्य बसन भूषन पहिराए।  जे नित नूतन अमल सुहाए।। कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।_अर्थ_और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य_नये निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर रिषिपतिनी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणी से स्त्रियों के कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं।

मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।। अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेहि।।_अर्थ_हे राजकुमारी ! सुनिये , माता, पिता, भाई, सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही ( सुख ) देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी ! पति तो ( मोक्षरूप ) असीम ( सुख ) देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती।

धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।। बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना।।_अर्थ_धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री_ इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्ना, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन_

ऐसेहु पति कर किएं अपमाना। नारि पाव जमपुर 
दुख नाना।। एकइ धर्म एक ब्रत नेमा । कायं बचन मन पति पद प्रेमा।।_अर्थ_ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भांति _भांति के दुख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एकही नियम है।


Saturday, 7 February 2026

अरण्यकाण्ड

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधे: पूर्णेन्दुमानन्ददं। वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्व:सम्भव: शंकरं। वन्दे ब्रह्मकुंड कलंकशमनं श्रीरामभूपप्रियम्।।_अर्थ_धर्मरूपी वृक्ष के मूल, विवेकरूपी समुद्र को आनन्द देनेवाले पूर्णचंद्र, वैराग्यरूपी कमल के ( विकसित करनेवाले )सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकार को निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापों को हरने वाले, मोहरूपी बादलों के समूह को छिन्न_भिन्न करने की विधि ( क्रिया )_में आकाश से उत्पन्न पवन स्वरूप, ब्रह्माजी के वंशज ( आत्मज ) तथा कलंकनआशक महाराज श्रीरामचन्द्रजी के प्रिय श्री शंकरजी की मैं वन्दना करता हूं।

सान्द्रानन्दपयोदसौभगतनुं पीताम्बरं सुन्दरं।
पाणौवाणसरासनं कटिलसत्तूणीरभारं शर्म।। राजीवायतलोचनं धऋतजटआजूटएन संशोभितं। सीता लक्ष्मण संयुक्त पथइगतं रामाभिरामं भजे।।_अर्थ_ जिनका शरीर जलयुक्त मेघों के समान सुंदर ( श्यामवर्ण ) एवं आनन्दघन है, जो सुंदर ( वल्कल का ) पईतवस्त्र धारण किये हैं, जिनके हाथों में वाण और धनुष है, कमर उत्तम तरकस के भार से सुशोभित हैं, कमल के समान विशाल नेत्र हैं और मस्तक पर जटा जूट धारण किये हैं, उन अत्यंत शोभायमान श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी सहित मार्ग चलते हुए आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी को मैं भजता हूं।

उमा राम गुन गूढ़ पंडित मुनि पावहिं बिरति। पावहिं मोह बिमूढ जे हरि बिमुख न धर्म रति।।_अर्थ_हे पार्वती ! श्रीरामजी के गुण गूढ़ हैं, पण्डित और मुनि उन्हें समझकर वैराग्य प्राप्त करते हैं। परन्तु जो भगवान से विमुख हैं और जिनका धर्म में प्रेम नहीं है, वे महआमूढ़ ( उन्हें सुनकर मोह को प्राप्त होते हैं।

पुर नर भरत प्रीति मैं गाई। मति अनुरूप अनूप सुहाई।। अब प्रभु चरित सुनहु अति पावन। करत जे बन सुर नर मुनि भावना।_अर्थ_पुरवासियों के और भरतजी के अनुपम और सुन्दर प्रेम का मैंने अपनी बुद्धि के अनुसार गान किया। अब देवता, मनुष्य और मुनियों के मन को भानेवाले श्रीरामचन्द्रजी के अत्यन्त पवित्र चरित्र सुनो, जिन्हें वे वन में कर रहे हैं।

एक बार चुनि कुसुम सुहाए। निज कर भूषण राम बनाए।। सीतहिं पहिराए प्रभु सादर। बैठे फटिक सिला पर सुन्दर।।_अर्थ_एक बार सुन्दर फूल चुनकर श्रीरामजी ने अपने हाथों से भांति भांति के गहने बनाये और सुन्दर स्फटिक शिला पर बैठे हुए प्रभु ने आदर के साथ वे गहने श्रीसीताजी को पहनाये।

सुरपति सुत धरि बायस बेषा। सब चाहत रघुपति बल देखा।। जिमि पिपिलिका सागर थाहा। यहां मन्दमति पावन चाहा।।_अर्थ_ देवराज इन्द्र का पुत्र जयंत कोए का रूप धरकर श्रीरघुनाथजी का बल देखना चाहता है। जैसे महान् मंदबुद्धि चींटी समुद्र का थाह पाना चाहती हो।

सीता चरन चोंच हति भागा। मूढ़ मन्दमति कार्न कागा।। चला रुधिर रघुनायक जाना। सींक धनुष सायक संधाना।।_अर्थ_ वह मूढ़, मंदबुद्धि कारण से ( भगवान् के बल की परीक्षा परीक्षा करने के लिये ) बना हुआ कौआ सीताजी के चरणों में चोंच मारकर भागा। जब रक्त बह चला, तब श्रीरघुनाथजी ने जाना और धनुष पर सींक ( सरकंडे )_का बाण संधान किया।

अति कृपाल रघुनायक सदा दिन पर नेह। ता सन आइ कीन्ह छलु मूरख अवगुन गेह।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी, जो अत्यन्त ही कृपालु हैं और जिनका दीनों पर सदा प्रेम रहता है, उनसे भी उस अवगुणों के घर मूर्ख जयन्त ने आकर छल किया।

प्रेरित मंत्र ब्रह्मसर धावा। चला भाजि बायस भय पावा।। धरि निज रूप गयी पितु पाहीं। राम बिमुख राखा तेहि नाहीं।।_अर्थ_मंत्र से प्रेरित होकर ब्रह्मबाण दौड़ा। कौआ भयभीत होकर भाग चला। वह अपना असली रूप धरकर पिता इन्द्र के पास गया, पर श्रीरामजी का विरोधी जानकर इन्द्र ने उसको नहीं रखा।

भा निरास उपजी मन त्रासा। जथा चक्र भय रिषि दुर्वासा।। ब्रह्मधाम सिवपुर सब लोका। फिरा श्रमित ब्याकुल भय सोका।।_अर्थ_तब वह निराश हो गया, जैसे दुर्वासा ऋषि को चक्र से भय हुआ था। वह ब्रह्मलोक, शिवलोक आदि समस्त लोकों में थका हुआ और भय_शोक से व्याकुल होकर भागता फिरा।

काहूं बैठन कहा न ओही। राखि को सका राम कर द्रोही।। मातु मृत्यु पितु समन समाना। सुधा होई बीस सुनु हरिजाना।।_अर्थ_( पर रखना तो दूर रहा ) किसी ने उसे बैठने तक के लिये नहीं कहा। श्रीरामजी के द्रोही को कौन रख सकता है ? ( काकभुसुंडीजी कहते हैं_)है गरुड़ ! सुनिये, उसके लिये माता मृत्यु के समान, पिता यमराज के समान और अमृत विष के समान हो जाता है।

मित्र करइ संत रिपु कै करनी। ता कहुं बिबुध नदी बैतरनी।। सब जगु ताहि अनलहु ते ताता। जो रघुबीर बिमुख सुनु भ्राता।।_अर्थ_मित्र सैकड़ों शत्रुओं की_सी करनी करने लगता है। देवनदी गंगाजी उसके लिये वैतरणी ( यमपुरी की नदी ) हो जाती है। हे भाई ! सुनिये, जो श्रीरघुनाथजी के विमुख होता है, समस्त जगत् उसके लिये अग्नि से भी अधिक गरम ( जलानेवाला) हो जाता है

नारद देखा बिकल जयंता। लागी दया कोमल चित संता।। पठवा तुरंत राम पहिं ताहि। कहेसि पुकारि प्रान्त हित पाही।।_अर्थ_नारदजी ने जयंत को व्याकुल देखा तो उन्हें दया आ गयी; क्योंकि संतों का चित्त बड़ा कोमल होता है। उन्होंने उसे ( समझाकर ) तुरंत श्रीरामजी के पास भेज दिया। उसने ( जाकर ) पुकारकर कहा_ है शरणागत के हितकारी ! मेरी रक्षा कीजिये।

आतुर समय गहेसि पद जाई। त्राहि त्राहि दयाल रघुराई।। अतुलित बल अतुलित प्रभुताई। मैं मतिमंद जानि नहिं पाई।।_अर्थ_आतुर और भयभीत जयन्त ने जाकर श्रीरामजी के चरण 
पकड़ लिये ( और कहा_ ) है दयालु रघुनाथजी ! रक्षा कीजिये । आपके अतुलित बल और आपकी अतुलित प्रभुताई ( सामर्थ्य )_को मैंठं झनझन मन्दबुद्धि  जान नहीं पाया था।

निज कृत कर्म जनित फल पायीं। अब प्रभु पाहि सरन ताकि आयउं।। सुनि कृपाल अति कारण बानी। एक नयन करि तथा भवानी।।_अर्थ_अपने किये हुए कर्म से उत्पन्न हुआ फल मैंने पा लिया। अब हे प्रभु ! मेरी रक्षा कीजिये। मैं आपकी शरण तककर आया हूं। ( शिवजी कहते हैं_) है पार्वती ! कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने उसकी अत्यन्त आर्त ( दु:खभरी ) वाणी सुनकर उसे एक आंख का काना करके छोड़ दिया।


कीन्ह मोहवश द्रोह यद्यपि तेहि कर वध उचित। प्रभु छाड़ेउ करि छोह को कृपाल रघुवीर सम।।_अर्थ_उसने मओहवश द्रोह किया था, इसलिये यद्यपि उसका वध ही उचित था, पर प्रभु ने कृपा करके उसे छोड़ दिया। श्रीरामजी के समान कृपालु और कौन होगा ?

रघुपति चित्रकूट बसि नाना। चरित किए श्रुति सुधा समाना।। बहुरि राम अस मन अनुमाना। होइहिं भीर सबहिं मोहि जाना।।_अर्थ_चित्रकूट में फंसकर श्रीरघुनाथजी ने बहुत _से चरित्र किये, जो कानों को अमृत के समान ( प्रिय ) हैं। फिर ( कुछ समय पश्चात् ) श्रीरामजी ने मन में ऐसा अनुमान किया कि मुझे सब लोग जान गये हैं, इससे ( यहां) बड़ी भीड़ हो जायेगी।

सकल मुनिन्ह सन विदा कराई। सीता सहित चले द्वौ भाई।। अत्रि के आश्रम जब प्रभु गयऊ। सुनत महामुनि हरषित भयऊ।।_अर्थ_( इसलिये ) सब मुनियों से विदा लेकर सीता सहित दोनों भाई चले ! जब प्रभु अत्रिजी के आश्रम में गये, तो उनका आगमन सुनते ही महामुनि हर्षित हो गये।

Wednesday, 21 January 2026

अयोध्याकाण्ड

परम पुनीत भरत आचरनू। मधुर मंजु मुद मंगल करनू।। हरन कठिन करि कलुष कलेसू। महामोह निसि दलन दिनेसू।।_अर्थ_भरतजी का परम पवित्र आचरण ( चरित्र ) मधुर, सुन्दर और आनन्द _मंगलों का करनेवाला है। कलियुग के कठिन पापों और क्लेशों को हरनेवाला है। महामोह रूपी रात्रि को नष्ट करने के लिये सूर्य के समान है।

पाप पुंज कुंज मृगराजू। समन सकल संताप समाजू।। जन रंजन भोजन भव भालू। राम स्नेह सुधाकर सारू।।_अर्थ_ पापसमूहरूपी हाथी के लिये सिंह है। सारे संतापों के दल का नाश करनेवाला है। भक्तों को आनन्द देनेवाला और भव के पार ( संसार के दु:ख )_का भंजन करनेवाला तथा श्रीरामप्रेमरूपी  चन्द्रमा का सार ( अमृत ) है।

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को। मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को।। दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को। कलाकार तुलसी से सिन्हा हटा राम सनमुख करत को।।_अर्थ_श्रीसीतारामजी के प्रेमरूपी अमृत से परिपूर्ण भरतजी का जन्म यदि न होता तो मुनियों के मन को भी अगम, यम, नियम, शम, दम आदि कठिन व्रतों का आचरण कौन करता ? दु:ख, संताप, दरिद्रता, दम्भ आदि दोषों को अपने सुयश के बहाने कौन हरण करता ? तथा कलाकार में तुलसीदास जैसे शब्दों को हठपूर्वक कौन श्रीरामजी के सम्मुख करता ?

भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं। सीयं राम पद प्रेमु अवसि होई भव रस बिरति।।_अर्थ_ तुलसीदासजी कहते हैं_ जो कोई भरतजी के चरित्र को नियम से आदरपूर्वक सुनेंगे, उनको अवश्य ही श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम होगा और सांसारिक विषय_रस से वैराग्य होगा।

मासपरायण इक्कीसवां विश्राम 

इति श्रीरामचरितमानसे सकल कलिकलुषविध्वंसने द्वितीय सोपान: समाप्त:।

कलियुग के संपूर्ण पापों को विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानस का यह दूसरा सोपान समाप्त हुआ।

( अयोध्याकाण्ड समाप्त )

Friday, 16 January 2026

अयोध्याकाण्ड

हृदयं रामु सिय लखन समेता। चले जाहिं सब लोग अचेता।। बसह बाजि गज पसु हियं हारें। चले जाहिं परबह मन मारें।।_अर्थ_सीताजी एवं लक्ष्मणजीसहित श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में रखकर सब लोग बेसुध होकर चले जा रहे हैं। बैल, घोड़े हाथी आदि पशु हृदय में सारे ( शिथिल हुए ) परवश मन मारे चले जा रहे हैं।

गुर गुरतिय बंदि प्रभु सीता लखन समेत। फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत।।_अर्थ_गुरु वशिष्ठजी और गुरुपत्नी अरुंधतिजी के चरणों की वन्दना करके सीताजी और लक्ष्मणजी संहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी हर्ष और विषाद के साथ लौटकर पर्णकुटी पर आए।

विदा कीन्ह सनमानि निषादू। चलेउ हृदयं बड़ बिरह बिषादू।। कोल किरात भिल्ल बनचारी। फेरे फिरे जोहारि जोहारी।।_अर्थ_फिर सम्मान करके निषादराज को विदा किया। वह चला तो सही, किन्तु उसके हृदय में विरह का बड़ा भारी विषाद था। फिर श्रीरामजी ने कोल, किरात, भील आदि बनवासी लोगों को लौटाया। वे सब जोहार_जोहारकर ( वन्दना कर_करके ) लौटे।

प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं। प्रिय परिजन बियोग बिलखाहिं।। भरत सनेहं सुभाउ सुबानी। प्रिया अनुज सन कहहिं बखानी।।_अर
थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी, सीताजी और लक्ष्मणजी बड़ की छाया में बैठकर प्रियजन और परिवार के वियोग से दु:की हो रहे हैं। भरतजी के स्नेह, स्वभाव और सुन्दर वाणी को बखान_बखानकर वे प्रिय पत्नी सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मणजी से कहने लगे ।

प्रीति प्रतीति बचन मन करनी। श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी।। तेहि अवसर खग मृग जल मीना। चित्रकूट घर अचर मलीना।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम के वश होकर भरतजी के वचन, मन, कर्म की प्रीति तथा विश्वास का अपने श्रीमुख से वर्णन किया। उस समय पक्षी, पशु और जल की मछलियां, चित्रकूट के सभी चेतन और जड़ जीव उदास हो गये।

बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की। बरषि सुमन कहा गति घर घर की।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो। चले मुदित मन डर न खरो सो।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी की दशा देखकर देवताओं ने उनपर फूल बरसाकर अपनी घर_घर की दशा कहीं ( दुखड़ा सुनाया) ।प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें प्रणाम कर आश्वासन दिया। तब वे प्रसन्न होकर चले, मन में जरा_सा भी डर न रहा।

सानुज सीय समेत प्रभु राज्य परन कुटीर। भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर।।_अर्थ_छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी समेत प्रभु श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो वैराग्य, भक्ति और ज्ञानऔ शरीर धारण करके शोभित हो रहे हैं।

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू। राम बिरहं सब साजु बिहालू।। प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं। सब चुपचाप चले मग जाहिं।_अर्थ_मुनि, ब्राह्मण, गुरु वशिष्ठजी, भरतजी और राजा जनकजी_ सारा समाज श्रीरामचन्द्रजी के बिरह में विह्वल है। प्रभु के गुणसमूहों का मन में स्मरण करते हुए सबलोग मार्गं में चुपचाप चले जा रहे हैं।

जमुना उतरि पार सबु भयऊ।  सो बासरु बिनु भोजन गयऊ।। उतरि देवसरी दूसर बासू। रामसखां सब कीन्ह सुपासू।।_अर्थ_( पहले दिन ) सबलोग यमुनाजी उतरकर फिर हुए। वह दिन बिना भोजन के ही बीत गया। दूसरा मुकाम गंगाजी उतरकर ( गंगापार श्रृंगवेरपुर में ) हुआ। वहां रामसखा निषादराज ने सब सुप्रबन्ध कर दिया।

सई उतरि गोमतीं नहाए। चौथें दिवस अवधपुर आए।। जनकु रहे पुर बासर चारी। राज काज सब साज संभारी।।_अर्थ_फिर ही उतरकर गोमतीजी में स्नान किया और चौथे दिन सब अयोध्याजी आ पहुंचे। जनकजी चार दिन अयोध्याजी में रहे और राजकाज एवं सब साझ_सामान को संभालकर_

सौंपि सचिव गुर भरतहिं राजू। तेरहुति चले साजि सब साजू।। नगर नारी नर गुरु सिख मानी। बसे सुखेन राम रजधानी।।_अर्थ_तथा मंत्री, गुरुजी और भरतजी को राज्य सौंपकर, सारा साज_समाज ठीक करके तिरहुत को चले। नगर के स्त्री-पुरुष गुरुजी की शिक्षा मानकर श्रीरामजी की राजधानी अयोध्या में सुखपूर्वक रहने लगे।

राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपवास। तजि तथा भूषण भोग सुख जिअत अवधि कीं आस।।_अर्थ_सबलोग श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये नियम और उपवास करने लगे। वे भूषण और भोग सुखों को छोड़ _छोड़कर अवधि की आशा पर जी रहे हैं।

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे। निज निज काज पाई सिख ओंधे।।  पुनि सिख दीन्हि बोलि लघु भाई। सौंपी सकल मातु सेवकाई।।_अर्थ_भरतजी ने मंत्रियों और विश्वासी सेवकों को समझाकर उद्यत किया। वे सब सीख पाकर अपने _अपने काम में लग गये। फिर छोटे भाईशत्रुध्नजी को बुलाकर शिक्षा दी और सब राजाओं की सेवा उनको सौंपी।

भूसुर बोलि भरत कर जोरे। करि प्रणाम बय बिनय निहोरे।। ऊंच नीच कारजु भल पोचू।।_अर्थ_ब्रहमणों को बुलाकर भरतजी ने हाथ जोड़कर प्रणाम करके अवस्था के अनुसार विनय और निहोरा किया कि आपलोग ऊंचा_नीचा ( छोटा_बड़ा ), अच्छा_गंदा जो कुछ भी कार्य हो, उसके लिये आज्ञा दीजियेगा। संकोच न कीजियेगा।

परिजन पुरजन प्रजा बोलाए। समाधी करि सुबह बसाए।। सानुज गए गुर गेहूं बहोरी। करि दंडवत कहत कर जोरी।।_अर्थ_ भरतजी ने फिर परिवार के लोगों को तथा अन्य प्रजा को बुलाकर उनका समाधान करके उनको सुखपूर्वक बसाया। फिर छोटे भाई शत्रुध्नसहित वे गुरुजी के घर गये और दण्डवत् करके हाथ जोड़कर बोले_।

आयसु होई त रहउं सनेमा। बोले मुनि तन पुलकित सपेमा।। समुझब कहब करब तुम्ह जोई। धरम सारु जग होइहिं सोई।।_अर्थ_आज्ञा हो तो मैं नियमपूर्वक रहूं ! मुनि वशिष्ठजी पपप्रेम के साथ बोले_हे भरत ! तुम जो कुछ समझोगे, कहोगे और करोगे, वहीं जगत् में धर्म का सार होगा।

सुनि सिख पाई असीस बड़ि खनक बोली दानी साधि। सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि।।_अर्थ_भरतजी ने यह सुनकर और शिक्षा तथा बड़ा आशीर्वाद पाकर ज्योतिषियों को बुलाया और दिन ( अच्छा मुहूर्त ) साधकर प्रभु की चरण पादुकाओं को निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासन पर विराजित कराया।

राम मातु गुरु पद सिरु नाई। प्रभु पद पीठ रजायसु पाई।। नंदगांव करि परन कुटीरा। कीन्ह निवास धरमु धुर धीरा।।_अर्थ_फिर श्रीरामजी की माता कौसल्याजी और गुरुजी के चरणों में सिर नवाकर और प्रभु की चरणपादुकाओं को निर्विघ्नतापूर्वक सिंहासन पर विराजित किया।

जटाजूट सिर मुनिपट धारी। महि खनि कुस सांथरी संवारी।। आसन बसन बासन ब्रत नेमा करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा।।_अर्थ_ सिर पर जटा जूट और शरीर में मुनियों के वल्कल वसन धारण कर, पृथ्वी को खोलकर उसके अन्दर खुश की आसनी बिछायी। भोजन, वस्त्र, बर्तन, व्रत, नियम_सभी बातों में वे ऋषियों के कठिन धर्म का पालन करने लगे।

भूषन बसन भोग सुख भूरी। मन तन बचन तजे तीन तूरी।। अवध राजु सुर राजु सिहाई। दसरथजई धनु सुनि नन्दी लजाई।।।_अर्थ_गहने, कपड़े और अनेक प्रकार के भोग सुखों को मन, तन और वचन से तृण तोड़कर ( प्रतिज्ञा करके ) त्याग दिया। जिस अयोध्या के राज्य को देखकर देवराज इन्द्र सिहाते थे और ( जहां के राजा ) दशरथ जी की सम्मति सुनकर कुबेर भी लजा जाते थे,।

तेहि पुर बसत भरत बिनु रागा। चंचरीक जिमि चंपक बागा।। रमा बिलासु राम अनुरागी। रजत बमन जिमि जन बड़भागी ।।_अर्थ_उसी अयोध्यापुरी में भरतजी अनासक्त होकर भरतजी इस प्रकार निवास कर रहे हैं जैसे चम्पा के बाग में भौंरा। श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी बड़ भागी पुरुष लक्ष्मी के विलास ( भोगोश्वैर्ज ) को चमन की भांति त्याग देते हैं। ( फिर उसकी ओर ताकते भी नहीं ।)

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति। चातक हंस सराहियत टेंक बिबेक विभूति।।_अर्थ_फिर भरतजी तो ( स्वयं ) श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के पात्र हैं। वे इस ( भोगैश्वर्यत्यागरूप ) करनी से बड़े नहीं हुए ( अर्थात् उनके लिये यह कोई बड़ी बात नहीं हैं )। ( पृथ्वी पर का जल न पीने की ) टेक से चातक की और नीर_क्षीर_ विवेक की विभूति ( शक्ति )_से हंस की सराहना होती है।

देह दिनहुं दिन दूबर होई। घंटी तेजी बलु सुखछबि सोई।। नित नव राम प्रेम पशु पीना। बढ़त धरम दलउ मनु न मलीना।।_अर्थ_भरतजी का शरीर दिनों-दिन दुबला होता जाता है। तेज ( अन्न, घृत आदि आदि से उत्पन्न होनेवाला भेद ) घट रहा है। बल और मउखछबइ ( मुख की कान्ति अथवा शोभा ) वैसी ही बनी हुई है। राम प्रेम का प्रण नित्य नया और पुष्ट होता है, धर्म का दल बढ़ता है और मन उदास नहीं है ( अर्थात् प्रसन्न हैं )।
( संस्कृत कोष में 'तेज' का अर्थ भेद मिलता है और यह अर्थ लेने से 'घटइ' के अर्थ में भी किसी प्रकार की खींच_तान नहीं करनी पड़ती। )

जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे। बिलसत बेतस बने बिकासे।। सम दम संजम नियम उपासा। नाथ भरत हिय बिमल अकासा।।_अर्थ_जैसे शरद् ऋतु के प्रकाश ( विकास )_से जल घटता है, किन्तु बेंत शोभा पाते हैं और कमल विकसित होते हैं। शम, दम, संयम, नियम और उपवास आदि भरतजी के हृदयरूपी निर्मल आकाश के नक्षत्र ( तारागण ) हैं।

ध्रुव बिस्वासु अवधि राका सी। स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी। राम पेम बिनु अचल अदोषा।। सहित समाज सोह नित चोखा।।_अर्थ_विश्वास ही ( उस आकाश में ) ध्रुवतारा है, चौदह वर्ष की अवधि ( का ध्यान ) पूर्णिमा के समान है और स्वामी श्रीरामजी की सुरति ( स्मृति ) आकाशगंगा _सरीखी प्रकाशित है। राम प्रेम ही अचल ( सदा रहनेवाला ) और कलंकरहइत चन्द्रमा है। वह अपने समाज ( नक्षत्रों ) सहित नित्य सुन्दर सुशोभित है।
 
भरत रहनि समुझनि करतूति। भगति बिरति गुन बिमल बिभूती। बरनत सकल सुकबि सकुचाहीं। सेस गनेस गिरा गमु नाहीं।।_अर्थ_भरतजी की रहनी, समझ, करनी, भक्ति , बैराग्य, निर्मल गुण और ऐश्वर्य का वर्णन करने में सभी सुकवि सकुचाते हैं, क्योंकि वहां ( औरों की तो बात ही क्या ) स्वयं शेष, गणेस और सरस्वती की भी पहुंच नहीं है।


नित पूजत प्रभु पांवरी प्रीति न हृदय समाति। मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भांति।।_अर्थ_वे नित्यप्रति प्रभु की पादुकाओं का पूजन करते हैं, हृदय में प्रेम समाता ही नहीं है। पादुकाओं से आज्ञा मांग_मांगकर वे बहुत प्रकार ( सब प्रकार के ) राज_काज करते हैं।


पुलक गात हियं सिय रघुबीरू। जिस नामु जप लोचन नीरू।। लखन राम सिय कानन बसहीं। भरतु भवन बसा तप तनु कसहीं।_अर्थ_शरीर पुलकित है, हृदय में श्रीसीता_रामजी हैं। जीभ राम_राम जप रही है, नेत्रों में प्रेम का जल भरा है। लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी तो वन में बसते हैं, परन्तु भरतजी घर ही में रहकर तप के द्वारा शरीर को कस रहे हैं।

दोउ दिसि समुझि कहते सबु लओगू। सब बिधि भरत सराहना जोगू।। सुनि ब्रत नेमा साधु सकुचाईं। देखि दसा मुनिराज लजाहीं।।_अर्थ_दोनों ओरकी स्थिति समझकर सबलोग कहते हैं कि भरतजी सब प्रकार से सराहनेयोय हैं। उनके व्रत और नियमों को सुनकर साधु_संत भी सकुचा जाते हैं और उनकी स्थिति देखकर मुनिराज भी लज्जित होते हैं।