पुलकित गात अत्रि उठि आए। देखि रामु आतुर चलि आए।। करत दण्डवत् मुनि उर लाए। प्रेम बारि द्वौ जन अन्हवाए।।_अर्थ_शरीर पुलकित हो गया, अत्रिजी उठकर दौड़े। उन्हें दौड़े आते देखकर श्रीरामजी और भी शीघ्रता से चले आए। दण्डवत् करते हुए ही श्रीरामजी को ( उठाकर ) मुनि ने हृदय से लगा लिया और प्रेमाश्रुओं के जल को दोनों जनों को ( दोनों भाइयों को ) नहला दिया।
देखि राम छबि नयन छुड़ाने। सादर निज आश्रम तब आने।। करि पूजा कहा बचन सुहाए। दिए मूल फल प्रभु मन भाए।। _अर्थ_ श्रीरामजी की छबि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गये। तब वे उनको आदरपूर्वक अपने आश्रम में ले आये। पूजन करके सुन्दर वचन कहकर मुनि ने मूल और फल दिये, जो प्रभु के मन को बहुत रुचे।
प्रभु आसन आसीन भरी लोचन शोभा निरखि। मुनिबर परम प्रबीन जोरि पानी अस्तुति करत।।_अर्थ_प्रभु आसन पर विराजमान हैं। नेत्र भरकर उनकी शोभा देखकर परम प्रवीण मुनिश्रेष्ठ हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।
नमामि भक्त वत्सलं। कृपालु शील कोमलं।। भजामि ते पदांबुजं। अकामिनां स्वधामदं।।_अर्थ_हे भक्तवत्सल ! हे कृपालु ! हे कोमल स्वभाववाले ! मैं आपको नमस्कार करता हूं। निष्काम पुरुषों को परमधाम देनेवाले आपके चरणकमलों को मैं भजता हूं।
निकाम श्याम सुन्दरं । भवांबुनाथ मंदरं ।। प्रफुल्ल कंज लोचनं। भवांबुनाथ मंदरं।।_अर्थ_आप नितांत सुन्दर, श्याम, संसार ( आवागमन )_रूपी समुद्र को मथने के लिये मन्दराचलयरूप, फूले हुए कमल के समान नेत्रों वाले और मद आदि दोषों से छुड़ाने वाले हैं।
प्रलंब बाहु विक्रमं। प्रभो प्रमेय वैभवं।। निषंग चाप सायकं। धरं त्रिलोक नायकं।।
_अर्थ_हे प्रभु ! आपकी लंबी भुजाओं का पराक्रम और आपका ऐश्वर्य अप्रमेय ( बुद्धि के परे अथवा असीम ) है। आप तरकस और धनुष _बाण धारण करनेवाले तीनों लोकों के स्वामी,।
दिनेश वंश मंडनं। महेश चाप खंडनं।। मुनीन्द्र संत रंजनं। सुरारि वृंद भंजनं।।_अर्थ_सूर्यवंश के भूषण, महादेवजी के धनुष को तोड़नेवाले, मुनिराज ओं और संतों को आनंद देनेवाले तथा देवताओं के शत्रु असुरों के समूह का नाश करनेवाले हैं।
मनोज वैरी वंदितं। आजादि देव सेवितं।।
विशुद्ध बोध विग्रहं। समस्त दूषणापहं।।_अर्थ_आप कामदेव के शत्रु महादेवजी के द्वारा वंदित, ब्रह्मा आदि देवताओं से सेवित, विशुद्ध ज्ञानमय विग्रह तथा समस्त दोषों को नष्ट करनेवाले हैं।
नमामि इंदिरा पतिं। सउखआकरं सतां गतिं।। भजे सशक्ति साधुजन। शची पति प्रियानुजं।।_अर्थ_ है लक्ष्मीपति ! हे सुखों के खान और सत्पुरुषों की एकमात्र गति ! मैं आपको नमस्कार करता हूं ! हे शचइपतइ ( इन्द्र )_के प्रिय छोटे भाई ( वामपंथी ) ! स्वरूपा_शक्ति श्रीसीताजी और छोटे भाई लक्ष्मण सहित मैं आपको भजता हूं।
त्वदंध्रिमूल ये नरा: ।भजंति हीन मत्सरा: ।। पतंति नो भवार्णवे। वितर्क वीचि संकुले ।।_अर्थ_जो मनुष्य मत्स्य ( डाह ) रहित होकर आपके चरणकमलों का सेवन करते हैं, वे तर्क_वितर्क ( अनेक प्रकार के संदेह )_रूपी तरंगों से पूर्ण संसाररूप समुद्र में नहीं गिरते ( आवागमन के चक्कर में नहीं पड़ते )।
विविक्त वासिन: सदा। भजंति मुक्तये मुदा।। निरस्य इंद्रियादिकं। प्रतीय ते गतिं स्वकं।।_अर्थ_जो एकान्तवासी पुरुष मुक्ति के लिये, इंद्रियादिज्ञका निग्रह करके ( उन्हें विषयों से हटाकर ) प्रसन्नतापूर्वक आपको भजते हैं, वे स्वकीय गति को ( अपने स्वरूप को ) प्राप्त होते हैं।
तमेकमद्भुतं प्रमुं: निरीहमीश्वरं विभुं ।। जगद्गुरुं च शाश्वतं। तुरीयमेव केवलं ।।_अर्थ _उन ( आप )_को जो एक ( अद्वितीय ), अद्भुत ( मायिक जगत् से विलक्षण ), प्रभु ( सर्वसमर्थ ), इच्छारहित ( ईश्वर ( सबके स्वामी ), व्यापक, जगत्गुरु, सनातन ( नित्य ), तुरीय ( तीनों गुणों से सर्वथा परे ) और केवल ( अपने स्वरूप में स्थित ) है।
भजामि भाव वल्लभं। कुयोगिनां सुदुर्लभं।। स्वभक्त कल्प पादपं। समं सुसेव्यमन्वहं।।_अर्थ_( तथा ) जो भावप्रिय, कुययोगियों ( विषयी पुरुषों )_के लिये अत्यन्त दुर्लभ, अपने भक्तों के लिये कल्पवृक्ष ( अर्थात् उनकी समस्औत कामनाओं को पूर्ण करनेवाले), सम ( पक्षपातरहित ) और सदा सुखपूर्वक सेवन करने योग्य है; मैं निरंतर भजता हूं।
अनूप रूप भूपतिं। नतोहमुर्विजापतिं।। प्रसीद मे नमामि ते। पदाब्ज भक्ति देहि मे।।_अर्थ_हे अनुपम सुंदर ! हे जानकीनाथ ! मैं आपको प्रणाम करता हूं। मुझपर प्रसन्न होइये, मैं आपको नमस्कार करता हूं। मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति दीजिये।
पठंति ये स्तवं इदं। नरादरेण ते पदं।। व्रजंति नात्र संशयं। त्वदीय भक्ति संयुता:।।_अर्थ_जो मनुष्य इस स्तुति को आदरपूर्वक पढ़ते हैं, वे आपकी भक्ति से युक्त होकर आपके परमपद को प्राप्त होते हैं, इसमें संदेह नहीं।
बिनती करि मुनि नाइ सिरु कह कर जोरी बहोरि। चरन सरोरुह नाथ जनि कबहुं तजे मति मोरि।।_अर्थ_मुनि ने ( इस प्रकार) विनती करके और फिर सिर नवाकर, हाथ जोड़कर कहा_हे नाथ ! मेरी बुद्धि आपके चरणकमलों को कभी न छोड़े।
अनुसूयिया के पद गहि सीता। मिली बहोरि सुसील विनीता।। रिषिपतिनी मन सुख अधिकाई। आसिष देई निकट बैठाई।।_अर्थ_फिर परम सीलवती और विनम्र श्रीसीताजी ( अत्रिजी की पत्नी ) अनुसूचियां जी के चरण पकड़कर उन्हें मिलीं। ऋषिपत्नी के मन में बड़ा सुख हुआ। उन्होंने आशीष देकर श्रीसीताजी को पास बैठा लिया।
दिव्य बसन भूषन पहिराए। जे नित नूतन अमल सुहाए।। कह रिषिबधू सरस मृदु बानी। नारिधर्म कछु ब्याज बखानी।।_अर्थ_और उन्हें ऐसे दिव्य वस्त्र और आभूषण पहनाये, जो नित्य_नये निर्मल और सुहावने बने रहते हैं। फिर रिषिपतिनी उनके बहाने मधुर और कोमल वाणी से स्त्रियों के कुछ धर्म बखानकर कहने लगीं।
मातु पिता भ्राता हितकारी। मितप्रद सब सुनु राजकुमारी।। अमित दानि भर्ता बयदेही। अधम सो नारि जो सेव न तेहि।।_अर्थ_हे राजकुमारी ! सुनिये , माता, पिता, भाई, सभी हित करनेवाले हैं, परन्तु ये सब एक सीमा तक ही ( सुख ) देनेवाले हैं। परन्तु हे जानकी ! पति तो ( मोक्षरूप ) असीम ( सुख ) देनेवाला है। वह स्त्री अधम है, जो ऐसे पति की सेवा नहीं करती।
धीरज धर्म मित्र अरु नारी। आपद काल परिखिअहिं चारी।। बृद्ध रोगबस जड़ धनहीना। अंध बधिर क्रोधी अति दीना।।_अर्थ_धैर्य, धर्म, मित्र और स्त्री_ इन चारों की विपत्ति के समय ही परीक्षा होती है। वृद्ध, रोगी, मूर्ख, निर्धन, अन्ना, बहरा, क्रोधी और अत्यन्त ही दीन_
ऐसेहु पति कर किएं अपमाना। नारि पाव जमपुर
दुख नाना।। एकइ धर्म एक ब्रत नेमा । कायं बचन मन पति पद प्रेमा।।_अर्थ_ऐसे भी पति का अपमान करने से स्त्री यमपुर में भांति _भांति के दुख पाती है। शरीर, वचन और मन से पति के चरणों में प्रेम करना स्त्री के लिये, बस, यह एक ही धर्म है, एक ही व्रत है और एकही नियम है।
No comments:
Post a Comment