जग पतिब्रता चारि बिधि अहहीं। बेद पुरान संत सब कहहीं।। उत्तम के अस बस मन माहीं। सपनेहुं इन पुरुष जग नाहीं।।_अर्थ_जगत् में चार प्रकार की पतिव्रताओं हैं वेद, पुरान, संत सब ऐसा कहते हैं कि उत्तम श्रेणी की पतिव्रता के मन में ऐसा भाव बसा रहता है कि जगत् में ( मेरे पति को छोड़कर ) दूसरा पुरुष स्वप्न में भी नहीं है।
मध्यम परपति देखइ कैसें। भ्राता पिता पुत्र निज जैसे।। धर्म बिचारी समुझि कुल रहई। सो निकिष्ट त्रिय श्रुति अस कहई।।_अर्थ_मध्यम श्रेणी की पतिव्रता पराये पति को कैसे देखती है, जैसे वह अपना सगा भाई, पिता या पुत्र हो ( अर्थात् समान अवस्थावाले को वह भाई के रूप में देखती है, बड़े को पिता के रूप में देखती है। ) जो धर्म को विचारकर और अपने कुल की मर्यादा समझकर बची रहती है, वह निकृष्ट ( निम्न श्रेणी की ) स्त्री है, ऐसा वेद कहते हैं।
बिनु अवसर भय तें रह जोईं। जानेहु अधम नारि जग सोई।। पति बंचक परपति रति करई। गौरव नरक कल्प सत परई।।_अर्थ_और जो स्त्री मौका न मिलने से या भयवश पतिव्रता बनी रहती है, जगत् में उसे अधम स्त्री मानना। पति को धोखा देनेवाली जो स्त्री पराये पति से रति करती है, वह तो सौ कल्प तक रौरव नरक में पड़ी रहती है।
छन सुख लागी जनम सत कोटी। दुख न समुझ तेहि सम को खोटी।। बिनु श्रम नारि परम गति लहई। पतिब्रत धर्म छाड़ि छल गहई।।_अर्थ_क्षणभर के सुख के लिये जो सौ करोड़ ( असंख्य ) जन्मों के दुख को नहीं समझती, उसके समान दुष्टा कौन होगी। जो स्त्री छल छोड़कर पतिव्रत धर्म को ग्रहण करती है, वह बिना ही परिश्रम परम गति को प्राप्त करती है। पति प्रतिकूल जन्म जहं जाई। बिधवा होई पाई तरुनाई।।_अर्थ_किन्तु जो पति के प्रतिकूल चलती है, वह जहां भी जाकर जन्म लेती है वहीं जवानी पाकर ( भरी जवानी में ) विधवा हो जाती है।
सहज अपावनि नारी पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहउं तुलसी का हरिहि प्रिय।।_अर्थ_स्त्री जन्म से ही अपवित्र है, किन्तु पति की सेवा करके वह अनायास ही शुभ गति प्राप्त कर लेती है। ( पतिव्रत धर्म के कारण ही ) आज भी 'तुलसीजी' भगवान् को प्रिय हैं और चारों वेद उनका यश गाते हैं।
सुनु सीता तव नाम सुमिरि नारी पतिब्रत करहिं। तोहि प्रानप्रिय राम कहुं कथा संसार हित।।_अर्थ_हे सीता ! सुनो, तुम्हारा तो नाम ही ले_लेकर स्त्रियां पतिव्रत धर्म का पालन करेंगी। तुम्हें तो श्रीरामजी प्रआणओंज्ञकए समान प्रिय हैं, यह ( पतिव्रत धर्म की ) कथा तो मैंने संसार के हित के लिये कहीं है।
सुनि जानकी परम सुखु पावा। सादर तासु चरन सिरु नावा।। तब मुनि सन कह कृपानिधाना। आयसु होई त जाऊं बन आना।।_अर्थ_जानकीजी ने सुनकर परम सुख पाया और आदरपूर्वक उनके चरणों में सिर नवाया। तब कृपा की खान श्रीरामजी ने मुनि से कहा_आज्ञा हो तो अब दूसरे वन में जाऊं।
संतत मैं पर कृपा करेहू। सेवक जानि करेंसी जनि नेहू।। धर्म धुरंधर प्रभु कै बानी। सुनि सप्रेम बोले मुनि ग्यानी।।_अर्थ_मुझपर निरंतर कृपा करते रहियेगा और अपना सेवक जानकर स्नेह न छोड़ियेगा। धर्मधुरंधर प्रभु श्रीरामजी के वचन सुनकर ज्ञानी मुनि प्रेमपूर्वक बोले_
जासु कृपा आज साल सनकादी। चहत सकल परमारथ बादी।। ते तुम्ह राम अकाम पिआरे। दीन बंधु मृदु बचन उचारे।।_अर्थ_ब्रहमा, शिव और सभी परमार्थवादी ( तत्ववेत्ता ) जिनकी कृपा चाहते हैं, है रामजी ! आप वही निष्काम पुरुषों के भी प्रिय और दिनों के बन्धु भगवान् हैं, जो इस प्रकार कोमल वचन बोले रहे हैं।
अब जानी मैं श्री चतुराई। भजी तुम्हहिं सब देव बिहाई।। जेहिं समान अतिसय नहीं कोई। ता कर सील कस न अस होई।।_अर्थ_अब मैंने लक्ष्मीजी की चतुराई समझी, जिन्होंने सब देवताओं को छोड़कर आपही को भजा। जिसके समान ( सब बातों में ) अत्यन्त बड़ा और कोई नहीं है, उसका शील भला, ऐसा क्यों नहीं होगा ?
केहि बिधि कहौं जाहु अब स्वामी। कहहु नाथ तुम्ह अन्तरजामी।। अस कहि प्रभु बिलोकि मुनि धीरा। लोचन जल बह पुलक सरीरा।।_अर्थ_मैं किस प्रकार कहूं कि हे स्वामी ! अब आप जाइये ? हे नाथ ! आप अन्तर्यामी हैं, आप ही कहिये। ऐसा कहकर धीर मुनि प्रभु को देखने लगे। मुनि के नेत्रों से ( प्रेमाश्रुओं का ) जल बह रहा है और शरीर पुलकित है।
तन पुलक निर्भर प्रेम पूरन नयन मुख पंकज दिए। मन ग्यान गुन गोतीत प्रभु मैं दुख जप तप का किए।। जप जोग धर्म समूह में नर भगति अनुपम पावई। रघुबीर चरित पुनीत निसि दिन दास तुलसी गावई।।_अर्थ_मुनि अत्यन्त प्रेम से पूर्ण हैं; उनका शरीर पुलकित है और नेत्रों को श्रीरामजी के मुख-कमल से लगाये हुए हैं। ( मन में विचार कर रहे हैं कि ) मैंने ऐसे कौन से जप_तप किये थे, जिसके कारण मन, ज्ञान, गुण और इन्द्रियों से परे प्रभु के दर्शन पाये। जप, योग और धर्म समूह से मनुष्य अनुपम भक्ति को पाता है। श्रीरघुवीर के पवित्र चरित्र को तुलसीदास रात दिन गाता है।
कलिमल समन दमन मन राम सुजस सुख मूल। सादर सुनहिं जे तिन्ह पर राम लहहीं अनुकूल।।
_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का सुन्दर यश कलियुग के पापों का नाश करनेवाला, मन को दमन करनेवाला और सुख का मूल है। जो लोग इसे आदरपूर्वक सुनते हैं, उनपर श्रीरामजी प्रसन्न रहते हैं।
कठिन काल मल कोस धर्म न ज्ञान न जोग जप। परिहरि सकल भरोस रामहिं भजहिं ते चतुर नार।।_अर्थ_यह कठिन कलिकाल पापों का खजाना है; इसमें न धर्म है न ज्ञान है न योग तथा जप ही है। इसमें तो जो लोग सब भरोसों को छोड़कर श्रीरामजी को ही भजते हैं, वे ही चतुर हैं।
मुनि पद कमल नाइ करि सीसा। चले बनहि सुर नर मुनि ईसा।। आगें राम अनुज पु़नि पाछें। मुनिबर बेस बने अति काछें।।_अर्थ_मुनि के चरणों में सिर नवाकर देवता, मनुष्य और मुनियों के स्वामी श्रीरामजी वन को चले। आगे श्रीरामजी हैं और उनके पीछे छोटे भाई लक्ष्मणजी हैं। दोनों ही मुनियों का सुन्दर वेष बनाये अत्यन्त सुशोभित हैं।
उभय बीच श्री सोहाति कैसी। ब्रह्म जीव बीच माया जैसी।। सरिता बन गिरि अवघट घाटा। पति पहिचानि देहिं भर बाटा।।_अर्थ_दोनों के बीच में श्रीजानकीजी कैसी सुशोभित हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच में माया हो। नदी, वन पर्वत और दुर्गम घाटियां, सभी अपने स्वामी को पहचानकर सुंदर रास्ता दे देते हैं।
जहं जहं जाहिं देव रघुराया। करहिं मेघ तहं तहं नभ छाया।। मिला असुर बिराध मग जाता। आवतहीं रघुबीर निपाता।।_जहां_जहां देव श्रीरघुनाथजी जाते हैं, वहां_वहां बादल आकाश में छाया करते जाते हैं। रास्ते में जाते हुए विराध राक्षस मिला। सामने आते ही श्रीरघुनाथजी ने उसे मार डाला।
तुरतहिं रुचिर रूप तेहि पावा। देखि दुखी निज धाम पठावा।। पुनि आए जहं मुनि सरभंगा। सुंदर अनुज जानकी संगा।।_अर्थ_( श्रीरामजी के साथ से मरते ही ) उसने तुरंत ( दिव्य ) रूप प्राप्त कर लिया। दु:खी देखकर प्रभु ने उसे अपने परम धाम को भेज दिया। फिर वे सुंदर छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी के साथ वहां गये जहां मुनि शरभंगजी थे।
देखि राम मुख पंकज मुनिबर लोचन भृंग। सादर पान करत अति धन्य जन्म सरभंग।।_अर्थ_श्रीरामजी का मुख-कमल देखकर मुनिश्रेष्ठ के नेत्र रूपी भौंरे अत्यन्त आदरपूर्वक उसका ( मककरन्दरस ) पान कराते हैं। शरभंगजी का जन्म धन्य है।
कह मुनि सुनु रघुबीर कृपाला। संकर मानस राजमराला।। जात रहेउं बिरंचि के धामा। सुनें श्रवन बन कहहिं रामा।।_अर्थ_मुनि ने कहा_हे कृपालु रघुबीर ! हे शंकरजी के मनरूपई मानसरोवर के राजहंस ! सुनिये, मैं ब्रह्मलोक को जा रहा था। ( इतने में ) कानों से सुना कि श्रीरामजी वन में आवेंगे।
चितवत पंथ रहेउं दिन राती। अब प्रभु देखि जुड़ानी छाती।। नाथ सकल साधन मैं हीना। कीन्ही कृपा जानि जन दीना।।_अर्थ_ तबसे मैं दिन-रात आपकी राह देखता रहा हूं। अब ( आज ) प्रभु को देखकर मेरी छाती शीतल हो गयी। हे नाथ ! मैं सब साधनों से हीन हूं। आपने अपना दीन सेवक जानकर मुझपर कृपा की है।
सो कछु देव न मोहि निहोरा। निज पन राखेउ जन मन चोरा।। तब लगा रहहु दीन हित लागी। जब लगि मिलौं तुम्हहिं तनु त्यागी।।_अर्थ_हे देव ! यह कुछ मुझपर आपका एहसान नहीं है। हे भक्त मनचओर ! ऐसा करके आपने अपने प्रण की रक्षा की है। अब इस दिन के कल्याण के लिये तब तक यहां ठहरिये, जबतक मैं शरीर छोड़कर ( आपके धाम में न ) मिलूं।
जोग जग्य जप तप ब्रत कीन्हां। प्रभु कहुं देख भगति बर लीन्हा।। एहि बिधि सर रचा मुनि सरभंगा। बैठे हृदयं छाड़ि सब संगा।।_अर्थ_
जोग, यज्ञ, जप, तप जो कुछ व्रत आदि भी मुनि ने किया था, सब प्रभु को समर्पण करके बदले में भक्ति का वरदान दे दिया। इस प्रकार ( दुर्लभ भक्ति प्राप्त करके फिर ) चिंता रचकर मुनि शरभंगजी हृदय से सब आसक्ति छोड़कर उसपर जा बैठे।
सीता अनुज समेत प्रभु नील जलद तनु श्याम। मम हियं बसहु निरंतर सगुनरूप श्रीराम।।_अर्थ_हे नीले मेघ के समान श्याम शरीर वाले सगुनरूप श्रीरामजी ! सीताजी और छोटे भाई लक्ष्मण सहित प्रभु ( आप ) निरंतर मेरे हृदय में निवास कीजिये।
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपां बैकुंठ सिंधारा।। ताते मुनि हरि लीन न भरे। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ।।_अर्थ_ऐसा कहर शरभंगजी ने योगाग्नि से अपने शरीर को जला डाला और श्रीरामजी की कृपा से वे बैकुंठ को चले गये।
रिषि निकाय मुनिबर गति देखी। सुखी में निज हृदयं बिसेषी।। अस्तुति करहिं सकल मुनि बृंदा। जयति प्रनत हित करुना कंदा।।_अर्थ_ऋषिसमूह मुनिश्रेष्ठ शरभंगजी की यह ( दुर्लभ ) गति देखकर अपने हृदय में विशेष रूप से सुखी हुए। समस्त मुनिवृंद श्रीरामजी की स्तुति कर रहे हैं ( और कह रहे हैं ) शरणागत हितकारी करुणाकंद ( करुणा के मूल ) प्रभु की जय हो।
पुनि रघुनाथ चले बन आगे। मुनिबर बृंद बिपुल संग लागे।। अस्थि समूह देखि रघुराया। पूछी मुनिन्ह लागी अति दाया।।_अर्थ_ फिर श्रीरघुनाथजी आगे वन में चले। श्रेष्ठ मुनियों के बहुत_से समूह उनके साथ हो लिये। हड्डियों के समूह देखकर श्रीरघुनाथजी को बहुत दया आयी, उन्होंने मुनियों से पूछा।
जानतहूं पूछिअ कस स्वामी। सबदरसी तुम्ह अन्तरजामी।। निसिचर निकर सकल मुनि खाए।
सुनि रघुबीर नयन जल छाए।_अर्थ_( मुनियों ने कहा_ ) है स्वामी ! आप सर्वदर्शी ( सर्वज्ञ ) ओर अन्तर्यामी ( सबके हृदय की जाननेवाले ) हैं। जानते हुए भी अनजान की तरह ) हमसे कैसे पूछ रहे हैं ? राक्षसों के दलों ने मुनियों को खा डाला है ( ये सब उन्हीं की हड्डियों के ढ़ेर हैं )। यह सुनते ही श्रीरघुवीर ही रघुवीर के नेत्रों में जल छा गया ( उनकी आंखों में करुणा के आंसू भर आये )।
निसिचर हीन करउं महि भुज उठाई पन कीन्ह।सकल मुनिन्ह के आश्रमन्हि जाइ जाइ सुख दीन्ह।।_अर्थ_श्रीरामजी ने भुजा उठाकर प्रण किया कि मैं पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर दूंगा। फिर समस्त मुनियों के आश्रमों में जा_जाकर उनको ( दर्शन एवं सम्भाषण का ) सुख दिया।
मुनि अगस्ति कर सिष्य सुजाना। नाम सउतईछन रति भगवाना।। मन क्रम बचन राम पद सेवक। सपनेहुं आन भरोस न देवक।।_अर्थ_मुनि अगस्त्य जी के एक सुतीक्ष्ण नाम का सुजान ( ज्ञानी ) शिष्य थे, उनकी भगवान् में प्रीति थी। वे मन, वचन और कर्म से श्रीरामजी के चरणों के सेवक थे। उन्हें स्वप्न में भी किसी दूसरे देवता का भरोसा नहीं था।
प्रभु आगवन श्रवण सुनि पावा। करत मनोरथ आतुर धावा।। हे बिधि दीनबंधु रघुराया। मैं से सट पर करिहहिं दाया।।_अर्थ_उन्होंने ज्योंहि प्रभु का आगमन कानों से सुन पाया, त्योंही अनेक प्रकार के मनोरथ करते हुए वे आतुरता ( शीघ्रता )_से दौड़ चले। हे विधाता! क्या दीनबंधु रघुनाथजी मुझ जैसे दुष्ट पर भी दया करेंगे।
सहित अनुज मोहि राम गोसाईं। मिलिहहिं निज सेवक की नाईं। मोरें जियं भरोस दृढ़ नाहीं। भगति बिरति न ग्यान मन माहीं।।_अर्थ_क्या स्वामी श्रीरामजी छोटे भाई लक्ष्मण सहित मुझसे अपने सेवक की तरह मिलेंगे ? मेरे हृदय में दृढ़ विश्वास नहीं होता ; क्योंकि मेरे मन भक्ति, वैराग्य या ज्ञान कुछ भी नहीं है।
नहिं सतसंग जोग जप जागा। नहिं दृढ़ चरन कमल अनुरागा।। एक बानी करुनानिधान की। सो प्रिय झांकें गति न आने की।।_अर्थ_मैंने तो न सतसंग, जोग, जप अथवा यज्ञ ही किये हैं और न प्रभु के चरणकमलों में मेरा दृढ़ अनुराग ही है। हां, दया के भण्डार प्रभु की एक बान है कि जिसे किसी दूसरे का सहारा नहीं है, वह उन्हें प्रिय होता है।
होइहैं सुफल आजु मम लोचन। देखि बदन पंकज भव मोचन।। निर्भर प्रेम मगन मुनि ग्यानु। कहां न जाइ सो दसा भवानी।।_अर्थ_( भगवान की इस बान का स्मरण आते ही मुनि आनन्दमग्न होकर मन_ही_मन कहने लगे_) कहा ! भवबन्धन से छुड़ाने वाले प्रभु के मुखारविंद को देखकर आज मेरे नेत्र सफल होंगे। ( शिवजी कहते हैं_) है भवानी ! ज्ञानी मुनि प्रेम में पूर्णरूप से निमग्न हैं। उनकी यह दशा कहीं नहीं जाती।
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