दिसि अरु बिदिसि पंथ नहिं सूझा। को मैं चलेउं कहां नहि बूझा।। कबहुंक फिरि पाछें पुनिजाई। कबहुंक नृत्य करइ गुन गाई।।_,अर्थ_उन्हें दिशा_विदिशा ( दिशाएं और उनके कोच आदि ) और रास्ता, कुछ भी नहीं सूझ रहा हैं। मैं कौन हूं और कहां जा रहा हूं, यह भी नहीं जानते ( इसका भी ज्ञान है )। वे कभी पीछे घूमकर आगे चलने लगते हैं और कभी ( प्रभु के ) गुण गाकर नाचने लगते हैं।
अबिरल प्रेम भगति मुनि पाई। प्रभु देखें तरु ओट लुकाई।। अतिसय प्रीति देखि रघुबीरा। प्रगटें हृदय हरन भव भीरा।।_अर्थ_मुनि ने प्रगाढ़ प्रेमासक्ति प्राप्त कर ली। प्रभु श्रीरामजी वृक्ष की आड़ में छिपकर ( भक्त की प्रेमोन्मक्त दशा ) देख रहे हैं। मुनि का अत्यन्त प्रेम देखकर भवभय ( आवागमन के भय ) को हरनेवाले श्रीरघुनाथजी मुनि के हृदय में प्रकट हो गये।
मुनि मग याद अचल होइ बैसा। पुलक सरीर पनस फल जैसा।। तब रघुनाथ निकट चला आए। देखि दशा निज जन मन भाए।।_अर्थ_( हृदय में प्रभु के दर्शन पाकर ) मुनि बीच रास्ते में अचल ( स्थिर ) होकर बैठ गये। उनका शरीर रोमांच से कटहल के फल के समान ( कण्टकित ) हो गया। तब रघुनाथजी उनके पास आये और अपने भक्त की प्रेम दशा देखकर मन में बहुत प्रसन्न हुए।
मुनिहि राम बहुत भांति जगाना। जाग न ध्यान जनित सुख पावा।। भूप रूप तब राम दुरावा। हृदयं चतुर्भुज रूप देखावा।।_अर्थ_श्रीरामजी ने मुनि को बहुत प्रकार जगाया, पर मुनि जागे; क्योंकि उन्हें प्रभु के ध्यान का सुख प्राप्त हो रहा था। तब श्रीरामजी ने अपने राजरूप को छिपा लिया और उनके हृदय में अपना चतुर्भुज रूप प्रकट किया।
मुनि अकुलाइ उठा तब कैसें। बिकल हीन मनि फनिबर जैसें। आगें देखि राम तन स्यामा। सीता अनुज सहित सुखधामा।।_अर्थ_तब (अपने इष्ट_स्वरूप के अन्तर्धान होते ही ) मुनि कैसे व्याकुल होकर उठे, जैसे श्रेष्ठ ( मणिंद्र ) सर्पमणि के बिना व्याकुल हो जाता है। मुनि ने अपने सामने लक्ष्मणजीसहित श्यामसुंदर_विग्रह सुखधामा श्रीरामजी को देखा।
परेउ लकुट इव चरनन्हि लागी। प्रेम मगन मुनिबर बडभागी।। भुज बिसाल गहि लिए उठाईं। परम प्रीति राखे उर लाई।।_अर्थ_ प्रेम में मग्न हुए वे बड़े बड़भागी श्रेष्ठ मुनि लाठी की तरह गिरकर श्रीरामजी के चरणों में लग गये। श्रीरामजी ने अपनी विशाल भुजाओं से पकड़कर उन्हें उठा लिया और बड़े प्रेम से हृदय से लगा रखा।
मुनिहि मिलत अस सोह कृपाला। कनक तरुहि जनु भेंट तमाला।। राम बदनु बिलोकि मुनि ठाढ़ा। मानहुं चित्र माझ लिखि काढ़ा।।_अर्थ_कृपालु श्रीरामचन्द्रजी मुनि से मिलते हुए ऐसे शोभित हो रहे हैं, मानो सोने के वृक्ष से तमाल का वृक्ष गले लगकर मिल रहा हो। मुनि ( निस्तब्ध ) खडे़ हुए ( टकटकी लगाकर ) श्रीरामजी का मुख देख रहे हैं, मानो चित्र में लिखकर बनाये गये हों।
तब मुनि हृदयं धीर धरि नहि पद बारहिं बार। निज आश्रम प्रभु आना करि पूजा बिबिध प्रकार।।_अर्थ_तब मुनि ने हृदय में धीरज धरकर बार_बार चरणों को स्पर्श किया। फिर प्रभु को अपने आश्रम में लाकर अनेक प्रकार से उनकी पूजा की।
कह मुनि प्रभु सुनु बिनती मोरी। अस्तुति क्यों कवन बिधि तोरी।। महिमा अमित मोरा मति थोरी। रबी सम्मुख खद्योत अंजोरी।।_अर्थ_मुनि कहने लगे_हे प्रभो ! मेरी विनती सुनिये। मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूं ? आपकी महिमा अपार है और मेरी बुद्धि अल्प है। जैसे सूर्य के सामने जुगनू का उजाला !
श्याम तामरस दाम शरीरं। जटा मुकुट परिधन मुनि चीरं।। पाणि चाप धर कटि तूणीरं। शोमा निरंतर श्रीरघुवीरं।।_अर्थ_हे नीलकमल की माला के समान शरीर वाले ! हे जटाओं का मुकुट और मुनियों के ( वल्कल ) वस्त्र पहने हुए, हाथों में धनुष _बाण लिये तथा कमर में तरकस कसे हुए श्रीरामजी! मैं आपको निरंतर नमस्कार करता हूं।
मोह विपिन घन दहन कृशानु:। संत सरोरुह कानन भानु:।। निसिचर करि वरूथ मृगराज:। त्रातु सदा नो भव खग बाज:।।_अर्थ_जो मोहरूपी घने वन को जलाने के लिये अग्नि है, संतरूपी कमलों के वन को प्रफुल्लित करने के लिये सूर्य है, राक्षस रूपी हाथियों के समूह को पछाड़ने के लिये सिंह है और भव (आवागमन )_रूपी पक्षी के मारने के लिये बाजरूप हैं, वे प्रभु सदा हमारी रक्षा करें।
अरुण नयन राजीव सुवेशं। सीता नयन चकोर निशेशं।। शिव हिय मानस बाल मरालं। शोमा राम उर बाहु विशालं।।_अर्थ_ है लाल कमल के समान नेत्र रूपी चकोर के चन्द्रमा, शिवजी के हृदयरूपी मानसरोवर के बालहंस, विशाल हृदय और भुजा वाले श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूं।
संशय सर्प ग्रसनी उरगाद:। शमन सुकर्कश तर्क विषाद:।। भव भोजन रंजन सुर यूथ:। त्रातु सदा नो कृपा वरूथ:।।_अर्थ_जो संशय रूपी सर्प को ग्रसने के लिये गरुड़ हैं, अत्यन्त कठोर तर्क से उत्पन्न होनेवाले विषाद का नाश करनेवाले हैं, आवागमन को मिटानेवाले और देवताओं के समूह को आनन्द देनेवाले हैं, वे कृपा के समूह श्रीरामनननजी सदा हमारी रक्षा करें।
निर्गुण सगुण विषम सम रूपं। ज्ञान गिरा गोतीतमनूपं।। अमलमखिलमनवद्यमपारं।। शोमा राम भंजन महि भारं।।_अर्थ_हे निर्गुण, सगुण विषम और समरूप ! हे ज्ञान, वाणी र इन्द्रियों से अतीत ! हे अनुपम, निर्मल, संपूर्ण दोषरहित, अनंत एवं पृथ्वी का भार उतारने वाले श्रीरामचन्द्रजी ! मैं आपको नमस्कार करता हूं।
भक्त कल्पपादप आराम:। तर्जनी क्रोध लोभ मद काम:।। अति नागर भवसागर सेतु:। त्रातु सदा दिनकर कुल केतु:।।_अर्थ_जो भक्तों के लिये कल्पवृक्ष के बगईचएज्ञहऐं, क्रोध, लोभ, मद और काम को डरानेवाले हैं, अत्यन्त ही चतुर और संसाररूप समुद्र से चलने के लिये सएतउरूप हैं, वे सूर्यकुल की ध्वजा श्रीरामजी सदा मेरी रक्षा करें।
अतुलित भुज प्रताप बल धाम:। कलिमल विपुल विभंजन नाम:।। धर्म वर्म नर्मदा गुण ग्राम:। संतत शं तनोतु मम राम:।।_अर्थ_जिनकी भुजाओं का प्रताप अतुलनीय है, जो बल के नाम हैं, जिनका नाम कलियुग के बड़े भारी पापों का नाश करनेवाला है, जो धर्म के कवच ( रक्षा ) हैं और जिनके गुणसमूह आनन्द देनेवाले हैं, वे श्रीरामजी निरंतर मेरे कल्याण का विस्तार करें।
जदपि बिरज व्यापक अविनासी। सबके हृदयं निरंतर बासी।। तदपि अनुज श्री सहित खरारी। बसतु मम काननचारी।।_अर्थ_यद्यपि आप निर्मल, व्यापक, अविनाशी और सबके हृदय में निरंतर निवास करनेवाले हैं; तथापि है खरारि श्रीरामजी ! लक्ष्मणजी और सीता सहित वन में विचरनेवाले आप इसी रूप में मेरे हृदय में निवास कीजिये।
जे जानहिं ते जानहु स्वामी। सगुन अगुन उर अंतरजामी।। जो कोसलपति राजिव नयना। करु सो राम हृदय मम अयना।।_अर्थ_हे स्वामी ! आपको जो सगुण, निर्गुण और अन्तर्यामी जानते हैं, वे जाना करें, मेरे हृदय को तो कोसलपति कमलनयन श्रीरामजी ही अपना घर बनावें।
अस अभिमान जाइ जनि भोरे। मैं सेवक रघुपति पति मोरे।। सुनि मुनि बचन राम मन भाए। बहुरि हरषि मुनिबर उर लाए।।_अर्थ_ऐसा अभिमान भूलकर भी न छूटे कि मैं सेवक हूं और श्रीरघुनाथजी मेरे स्वामी हैं। मुनि के वचन सुनकर श्रीरामजी मन में बहुत प्रसन्न हुए। तब उन्होंने हर्षित होकर श्रेष्ठ मुनि को हृदय से लगा लिया।
परम प्रसन्न जानी मुनि मोहि। जो बर मागउं देऊं सो तोही।। मुनि कह मैं बर कबहुं न जांचा। समुझि न परइ झूठ का साचा।।_अर्थ_( और कहा_) हे मुनि ! मुझे परम प्रसन्न जानो। जो वर मांगो, वहीं मैं तुम्हें दूं ! मुनि सुतीक्ष्णजी ने कहा_मैंने तो कभी वर मांगा ही नहीं। मुझे समझ ही नहीं पड़ता कि क्या झूठ और क्या सत्य है, ( क्या मांगूं, क्या नहीं )।
तुम्हहिं नीक लागे रघुराई। सो मोहि देहु दास सुखदाई।। अबिरल भगति बिरति बिग्याना। होहु सकल गुन ज्ञान निधाना।।_अर्थ_( अतः ) है रघुनाथजी ! हे दासों को सुख देनेवाले ! आपको जो अच्छा लगे, मुझे वही दीजिये। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा_हे मुने ! ) तुम प्रगाढ़ भक्ति, वैराग्य विज्ञान एवं समस्त गुणों तथा ज्ञान के निधान हो जाओ।
प्रभु जो दीन्ह हो बरु मैं पावा। अब सो देहु मोहि जो भावा।।_अर्थ_( तब मुनि बोले_) प्रभु ने जो वरदान दिया वह तो मैंने पास लिया। अब मुझे जो अच्छा लगता है वह दीजिये।
अनुज जानकी सहित प्रभु चाप बान धर राम। मम हियं गगन इंदु इव बसहु सदा निहकाम।।_अर्थ_हे प्रभो ! हे श्रीरामजी ! छोटे भाई लक्ष्मण सहित धनुष_बाणधारी आप निष्काम ( स्थिर ) होकर मेरे हृदयरूपी आकाश में चन्द्रमा की भांति सदा निवास कीजिये।
एवमस्तु करि रामनिवास। हरषि चले कुंभज रिषि पासा।। बहुत दिवस गुर दरसनु पाएं। भए मोहि एहिं आश्रम आएं।।_अर्थ_'एवमस्तु' (ऐसा ही हो ) ऐसा उच्चारण कर लक्ष्मीनिवास श्रीरामचन्द्रजी हर्षित होकर अगस्त्य ऋषि के पास चले। ( तब सुतीक्ष्णजी बोले_) गुरु अगस्त्य जी का दर्शन पाये और इस आश्रम में आये मुझे बहुत दिन हो गये।
अब प्रभु संग जाऊं गुर पाहीं। तुम्ह कहं नाथ निहोरा नाहीं।। देखि कृपानिधि मुनि चतुराई। लिए संग हिस्से द्वौ भाई।।_अर्थ_अब मैं भी प्रभु ( आप )_के साथ गुरुजी के पास चलता हूं। इसमें से नाथ ! आपपर मेरा कोई एहसान नहीं है। मुनि की चतुरता देखकर कृपा के भण्डार श्रीरामचन्द्रजी ने उनको साथ ले लिया और दोनों भाई हंसने लगे।
पंथ कहत निज भगति अनूपा। मुनि आश्रम पहुंचे सुरभूपा।। तुरंत सउतईछन गुर पहिं गयऊ। करि दंडवत कहत अस भयऊ।।_अर्थ_रास्ते में अपनी अनुपम भक्ति का वर्णन करते हुए देवताओं के राजराजेश्वर श्रीरामजी अगस्त्य मुनि के आश्रम पर पहुंचे। सुतीक्ष्ण तुरंत ही गुरु अगस्त्य जी के पास गये और दण्डवत् करके ऐसा कहने लगे_
नाथ कोसलाधीस कुमारा। आए मिलन जगत आधारा।। राम अनुज समेत बैदेही। निसि दानी देव जपत हहु जेही।।_अर्थ_हे नाथ अयोध्या के राजा दशरथ जी के कुमार जगदाधार श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई लक्ष्मणजी और सीताजी सहित आपसे मिलने आये हैं, जिनका है देव ! आप रात_दिन जप करते रहते हैं।
सुनत अगस्ति तुरत उठि दिए। हरि बिलोकि लोचन जल छाए।। मुनि पद कमल पड़े द्वौ भाई। रिषि अति प्रीती लिये उर लाई।।_अर्थ_यह सुनते ही अगस्त्य जी तुरंत ही उठ दौड़े। भगवान् को देखते ही उनके नेत्रों में ( आनंद और प्रेम के आंसुओं का ) जल भर आया। दोनों भाई मुनि के चरणों पर गिर पड़े। ऋषि ने ( उठाकर ) बड़े प्रेम से उन्हें हृदय से लगा लिया।
सादर कुशल पूछि मुनि ज्ञानी। आसन बर बैठारे आनी।। पुनि करि बहुत प्रकार प्रभु पूजा। मोहि सम भाग्यवंत नहिं दूजा।।_अर्थ_ज्ञानी मुनि ने आदरपूर्वक कुशल पूछकर उनको लाकर श्रेष्ठ आसन पर बैठाया। फिर बहुत प्रकार से प्रभु की पूजा करके कहा_मेरे समान भाग्यवानों आज दूसरा कोई नहीं है।
जहं लगि रहे अपर मुनिवृंदा। हरषे सब बिलोकि मुनिकंदा।।_अर्थ_वहां जहां तक ( जितने भी ) अन्य मुनिगण थे, सभी आनंदित श्रीरामजी के दर्शन करके हर्षित हो गये।
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