Monday, 13 August 2018

बालकाण्ड


अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ।। धरम धुरंधर गुननिधि ग्यानी। हृदयँ भगति मति सारँगपानी।।___अर्थ___ अवधपुरी में रघुकुलशिरोमणि दशरथ नाम के राजा हुए, जिनका नाम वेदों में विख्यात है। वे धर्मधुरंधर, गुणों के भण्डार और ज्ञानी थे। उनके हृदय में सारंगधनुष धारण करनेवाले भगवान् की भक्ति थी, और उनकी बुद्धि भी उन्हीं में लगी रहती थी।

कौसल्यादि नारि प्रिय सब आचरन पुनीत। पति अनुकूल प्रेम दृढ़ हरि पद कमल विनीत।।___ अर्थ___उनकी कौसल्या आदि प्रिय रानियाँ सभी पवित्र आचरणवाली थीं। वे [ बड़ी ] विनीत और पति के अनुकूल [ चलनेवाली ] थीं और श्रीहरि के चरणकमलों में उनका दृढ़ प्रेम था।

एक बार भूपति मन माहीं। भै गलानि मोरें सुत नाहीं।। गुर गृह गयउ तुरत महीपाला। चरन लागि करि बिनय बिसाला।।___ अर्थ___एक बार राजा के मन में बड़ी ग्लानि हुई कि मेरे पुत्र नहीं है। राजा तुरंत ही गुरु के घर गये और चरणों में प्रणाम कर बहुत विनय की।

निज दुख सुख सब गुरहि सुनायउ। कहि बसिष्ठ बहुबिधि समुझायउ।। धरहु धीर होइहहिं सुर चारि। त्रिभुवन बिदित भगत भय हारी।।___अर्थ___राजा ने अपना सारा दुःख_सुख गुरु को सुनाया। गुरु वसिष्ठजी ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया [ और कहा___] धीरज धरो, तुम्हारे चार पुत्र होंगे, जो तीनों लोकों में प्रसिद्ध और भक्तों के भय को हरनेवाले होंगे।

सृिंगी रिषिहि बसिष्ठ बोलावा। पुत्रकाम सुभ जग्य करावा।। भगति सहित मुनि आहुति दीन्हें। प्रगटे अगिनि चरू कर लीन्हें।।___ अर्थ___वसिष्ठजी ने श्रृंगी ऋषि को बुलवाया और उनसे शुभ पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया। मुनि के,भक्तिसहित आहुतियाँ देने पर अग्निदेव हाथ में चरु ( हविष्यान्न खीर ) लिये प्रकट हुए।

जो बसिष्ठ कछु हृदयँ बिचारा। सकल काजु भा सिद्ध तुम्हारा।। यह हबि बाँटि देहु नृप जाई। जथा जोग जेहि भाग बनाई।।___अर्थ___[ और दशरथ से बोले___ ] वसिष्ठ ने हृदय में जो कुछ विचारा था, तुम्हारा वह सब काम सिद्ध हो गया। हे राजन् ! [ अब ] तुम जाकर इस हविष्यान्न ( पायस ) को, जिसको जैसा उचित हो, वैसा भाग बनाकर बाँट दो।

तब अदृस्य भए पावक सकल सभहि समुझाइ। परमानंद मगन नृप हर्ष न हृदयँ समाइ।।___अर्थ___ तदनन्तर अग्निदेव सारी सभा को समझाकर अन्तर्धान हो गये। राजा परमानन्द में नर्म हो गये, उनके हृदय में हर्ष समाता न था।

तबहिं रायँ प्रिय नारि बोलाईं। कौसल्यादि तहाँ चलि आईं।। अर्ध भाग कौसल्यहि दीन्हा। उभय भाग आधे करि लीन्हा।।___ अर्थ____ उसी समय राजा ने अपनी प्यारी पत्नियों को बुलाया। कौसल्या आदि सब [ रानियाँ ] वहाँ चली आयीं। राजा ने [ पायस ] का आधाभाग कौसल्या को दिया, [ और शेष ] आधे के दो भाग किये।

कैकेई कहँ नृप सो दयऊ। रह्यो सो उभय भाग पुनि भयऊ।। कौसल्या कैकेई हाथ धरि। दीन्ह सुमित्रहि मन प्रसन्न करि।।___अर्थ___वह ( उनमें से एक भाग ) राजा ने कैकेयी को दिया,  शेष जो बच रहा उसके फिर दो भाग हुए और राजा ने उनको कौसल्या और कैकेयी के हाथ पर रखकर ( अर्थात् उनकी अनुमति लेकर ) और इस प्रकार उनका मन प्रसन्न करके सुमित्रा को दिया।

एहि बिधि गर्भसहित सब नारी। भईं हृदयँ हरषित सुख भारी।। जा दिन तें हरि गर्भहिं आए। सकल लोक सुख संपति छाए।।___अर्थ___ इस प्रकार सब स्त्रियाँ गर्भवती हुईं। वे हृदय में बहुत हर्षित हुईं। उन्हें बड़ा सुख मिला। जिस दिन से श्रीहरि [ लीला से ही ] गर्भ में आये, सब लोकों में सुख और सम्पत्ति छा गयी।

मंदिर महँ सब राजहिं रानीं। शोभा सील तेज की खानीं।। सुख जुत कछुक काल चलि गयऊ। जेहिं प्रभु प्रगट सो अवसर भयउ।।___अर्थ___ शोभा, शील और तेज की खान [ बनी हुई ] सब रानियाँ महल में सुशोभित हुईं। इस प्रकार कुछ समय सुखपूर्वक बीता और वह अवसर आ गया जिसमें प्रभु को प्रकट होना था।

जोग लगन ग्रह बार तिथि सकल भए अनुकूल। चर अरु अंतर हर्षजुत राम जनम सुखमूल।।___ अर्थ___ योग, लग्न, ग्रह, वार और तिथि सभी अनुकूल हो गये। जड़ और चेतन सब हर्ष से भर गये। [ क्योंकि ] श्रीराम का जन्म सुख का मूल है।

नौमी तिथि मधुमास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता। मध्य दिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक विश्रामा।।___अर्थ___ पवित्र चैत्र का महीना था, नवमी तिथि थी। शुक्लपक्ष और भगवान् का प्रिय अभिजित् मुहूर्त था। दोपहर का समय था। न बहुत सरदी थी, न धूप ( गरमी ) थी। वह पवित्र समय सबलोगों को,शान्ति देनेवाला था।

सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ।। बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सुरितामृत धारा।।___अर्थ___ शीतल, मन्द और सुगन्धित पवन बह रहा था। देवता हर्षित थे और संतों के मन में [ बड़ा ] चाव था। वन फूले हुए थे, पर्वतों के समूह मणियों से जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृत की धारा बहा रहीं थीं।

सीतल मंद सुरभि बह बाऊ। हरषित सुर संतन मन चाऊ।। बन कुसुमित गिरिगन मनिआरा। स्रवहिं सकल सरितामृत धारा।।___ अर्थ___ शीतल, मंद और सुगंधित पवन बह रहा था। देवता हर्षित थे और संतों के मन में [ बड़ा ] चाव था। रन उबले हुए थे, पर्वतों के समूह मणियों से जगमगा रहे थे और सारी नदियाँ अमृत की धारा बहा रही थीं।

सो अवसर बिरंचि जब जाना। चले सकल सुर साजि बिमाना।। गगन बिमल संकुल सुर जूथा। गावहिं गुन गंधर्ब बरूथा।।___अर्थ___ जब ब्रह्माजी ने वह ( भगवान् के प्रकट होने का ) अवसर जाना तब [ उनके समेत ] सारे देवता विमान सजा_ सजाकर चले। निर्मल आकाश देवताओं के समूहों से भर गया। गन्धर्वों का दल गुणों का गान करने लगे।

बरसहिं सुमन सुअंजुलि साजी।गहगहि गगन दुंदुभि बाजी।। अस्तुति करहिं नाग मुनि देवा। बहुबिधि लावहिं निज निज सेवा।।___ अर्थ___ और सुन्दर अंजुलियों में सजा_ सजाकर पुष्प बरसाने लगे। नाग, मुनि और देवता स्तुति करने लगे और बहुत प्रकार से अपनी_ अपनी सेवा ( उपहार ) भेंट करने लगे।

सुर समूह बिनती करि पहुँचे निज निज धाम। जगनिवास प्रभु प्रगटे अखिल लोक बिश्राम।।___अर्थ___देवताओं के समूह विनती करके अपने_ अपने लोक में जा पहुँचे। समस्त लोकों को शान्ति देनेवाले, जगदाधार प्रभु प्रकट हुए।

भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी। हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी।। लोचन अभिरामा तनु घनस्यामा निज आयुध भुज चारी। भूषन बनमाला नयन बिसाला सोभासिंधु खरारी।।___ अर्थ___दीनों पर दया करनेवाले, कौसल्याजी के हितकारी कृपालु प्रभु प्रकट हुए। मुनियों के मन को हरनेवाले उनके अद्भुत रूप का विचार करके माता हर्ष से भर गयी। नेत्रों को,आनंद देनेवाला मेघ के समान श्यामशरीर था; चारों भुजाओं में अपने ( खास ) आयुध [ धारण किये हुए ] थे; [ दिव्य ] आभूषण और वनमाला पहने थे; बड़े_बड़े नेत्र थे। इस प्रकार शोभा के समुद्र तथा खर राक्षस को मारनेवाले भगवान् प्रकट हुए।

कह दुइ कर जोरी अस्तुति तोरी केहि बिधि करौं अनंता। माया गुन ग्यानातीत अमाना बेद पुरान भनंता।। करुना सुख सागर सब गुन आगर जिहि गावहिं श्रुति संता। सो मम हित लागी जन अनुरागी भयउ प्रगट श्रीकंता।।___ अर्थ___ दोनों हाथ जोड़कर माता कहने लगी___ हे अनंत ! मैं किस प्रकार तुम्हारी स्तुति करूँ। वेद और पुराण तुमको माया, गुण और ज्ञान से परे और परिमाणरहित बतलाते हैं। श्रुतियाँ और संतजन दया और सुख का समुद्र, सब गुणों का धाम कहकर जिनका गान करते हैं, वही भक्तों पर प्रेम करनेवाले लक्ष्मीपति भगवान् मेरे कल्याण के लिये प्रकट हुए हैं।

ब्रह्मांड निकाया निर्मित माया रोम रोम प्रति बेद कहै। मम उर सो बासी यह उपहासी सुनत धीर मति थिर न रहै। उपजा जब ज्ञाना प्रभु मुसकाना चरित्र बहुत बिधि कीन्ह चहै। कहि कथा सुहाई मातु बुझाई जेहि प्रकार सुत प्रेम लहै।।___अर्थ___ वेद कहते हैं कि तुम्हारे प्रत्येक रोम में माया के रचे हुए अनेकों ब्रह्माण्डों के समूह [ भरे ] हैं। वे तुम मेरे गर्भ मे रहे___ इस हँसी की बात सुनने पर कीर [ विवेकी ] पुरुषों की बुद्धि भी स्थिर नहीं रहती ( विचलित हो जाती है )। जब माता को ज्ञान उत्पन्न हुआ, तब प्रभु मुसकराये। वे बहुत प्रकार के चरित्र करना चाहते हैं। अतः उन्होंने [ पूर्वजन्मकी ] सुन्दर कथा कहकर माता को समझाया, जिससे उन्हें पुत्र का ( वात्सल्य ) प्रेम प्राप्त हो ( भगवान् के प्रति पुत्रभाव हो जाय )।

माता पुनि बोली सो मति डोली तजहु तात यह रूपा। कीजै सिसुलीला अति प्रियसीला यह सुख परम अनूपा।। सुनि बचन सुजाना रोदन ठाना होइ बालक सुरभूपा। यह चरित जे गावहिं हरि पद पावहिं ते न परहिं भवकूपा।।___ अर्थ___माता की वह बुद्धि बदल गयी, तब फिर वह बोली___ हे तात ! यह रूप छोड़कर अत्यंत प्रिय बाललीला करो, [ मेरे लिये ] यह सुख परम अनुपम होगा। [ माताका ] यह वचन सुनकर देवताओं के स्वामी सुजान भगवान् ने बालक [ रूप ] होकर रोना शुरू कर दिया। [ तुलसीदासजी कहते हैं___] जो इस चरित्र का गान करते हैं, वे श्रीहरि का पद पाते हैं और [ फिर ] संसाररूपी कूप में नहीं गिरते।

बिप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार। निज इच्छा निर्मित तनु माया गुन गो पार।।___ अर्थ___ब्राह्मण, गौ, देवता और संतों के लिये भगवान् ने मनुष्य का अवतार लिया। वे [ अज्ञानमयी, मलिना ] माया और उसके गुण ( सत्, रज, तम )  और [ बाहरी तथा भीतरी ] इन्द्रियों से परे है। उनका [ दिव्य ] शरीर अपनी इच्छा से ही बना है [ किसी कर्मबन्धन से परवश त्रिगुणात्मक भौतिक पदार्थों के द्वारा नहीं ]।

सुनि सिसु रुदन परम प्रिय बानी। संभ्रम चली आईं सब रानी।। हरषित जहँ चहँ धाईं दासी। आनँद मगन सकल पुरबासी।।___ अर्थ___बच्चे के रोने की बहुत ही प्यारी ध्वनि सुनकर सब रानियाँ उतावली होकर दौड़ी चली आयीं। दासियाँ हर्षित होकर जहाँ तहाँ दौड़ीं। सारे पुरवासी आनन्द में मग्न हो गये।

दसरथ पुत्रजन्म सुनि काना। मानहुँ ब्रह्मानंद समाना।। परम प्रेम मन पुलक सरीरा। चाहत उठन करत मतिधीरा।।___अर्थ___राजा दशरथजी पुत्र का जन्म कानों से सुनकर मानो ब्रह्मानंद में समा गये। मन में अतिशय प्रेम है, शरीर पुलकित हो गया। [ आनंद में अधीर हुई ] बुद्धि रो धीरज देकर [ और प्रेम में शिथिल हुए शरीर को संभालकर ] वे उठना चाहते हैं।

जाकर नाम सुनत सुभ होई। मोरें गृह आवा प्रभु सोई।। परमानंद पूरि मन राजा। कहा बोलाई बजावहु बाजा।।___ अर्थ_____ जिनका नाम सुनते ही कल्याण होता है, वही प्रभु मेरे घर आये हैं। [ यह सोचकर ] राजा का मन परम आनंद से पूर्ण हो गया। उन्होंने बाजेवाले को बुलाकर कहा कि बाजा बजाओ।

गुर बसिष्ठ कहँ गयउ हँकारा। आए द्विजन्ह सहित नृपद्वारा।। अनुपम बालक देखेन्हि जाई। रूप रासि गुन रही न सिराई।।___अर्थ___ गुरु वशिष्ठजी के पास बुलावा गया। वे ब्राह्मणों को साथ लिये राजद्वार पर आये। उन्होंने जाकर अनुपम बालक को देखा, जो रूप की राशि है और जिसके गुण कहने ले समाप्त नहीं होते।

नंदीमुख सराध करि जातकरम सब कीन्ह। हाटक धेनु बसन मनि नृप बिप्रन्ह कहँ दीन्ह।।___अर्थ____ फिर राजा ने नान्दीमुख श्राद्ध करके सब जातकर्म_ संस्कार आदि किये और ब्राह्मणों को सोना, गौ, वस्त्र और मणियों का दान दिया।

ध्वज पताक तोरन पुर छावा। कहि न जाइ जेहि भाँति बनावा।। सुमनबृष्टि अकास तें होई। ब्रह्मानंद मगन सब लोई।।___ अर्थ____ध्वजा, पताका और तोरणों से नगर छा गया। जिस प्रकार से वह सजाया गया, उसका तो वर्णन ही नहीं हो सकता। आकाश से फूलों की वर्षा हो रही है, सब लोग ब्रह्मानन्द में मग्न हैं।

बृंद बृंद मिलि चलाईं लोगाईं। सहज सिंगार किएँ उठी धाईं।। कनक कलस मंगल भरि थारा। गावत पैठहिं भूप दुआरा।।____अर्थ____स्त्रियाँ झुंड_ की_ झुंड चलीं। स्वाभाविक श्रृंगार किये ही वे उठ दौडीं। सोने का कलश लेकर और थालों में मंगल द्रव्य भरकर गाती हुई राजद्वार में प्रवेश करती हैं।

करि आरति नेवछावरि करहीं। बार बार सिसु चरनन्हि परहीं। मागध सूत बंदिगन गायक। पावन गुन गावहिं रघुनायक।।____ अर्थ____ वे आरती करके निछावर करती हैं और बार_ बार बच्चे के चरणों पर गिरती हैं। मागध, सूत, वन्दीजन और गवैये रघुकुल के स्वामी के पवित्र गुणों का गान करते हैं।

सर्बस दान दीन्ह सब काहू। जेहि पावा राखा नहिं ताहू।। मृगमद चंदन कुंकुम कीचा। मची सकल बीथिन्ह बिच बीचा।।___ अर्थ___राजा ने सब किसी को भरपूर दान दिया। जिसने पाया उसने भी नहीं रखा ( लुटा दिया ) । [ नगरकी ] सभी गलियों के बीच_ बीच में कस्तूरी, चंदन और केसर की कीच मच गयी।

गृह गृह बाज बधाव सुभ प्रगटे सुषमा कंद। हरषवंत सब जहँ तहँ नगर नारि नर बृंद।।___ अर्थ___
घर_घर मंगल बधावा बजने लगा, क्योंकि शोभा के मूल भगवान् प्रकट हुए हैं। नगर के स्त्री_ पुरुषों के झुंड_ के_ झुंड जहाँ_ तहाँ आनन्दमग्न जो रहे हैं।

Tuesday, 24 July 2018

बालकाण्ड

मासपारायण छठा विश्राम

बाढ़े खल बहु चोर जुआरा। जे लंपट परधन परदारा।। मानहिं मातु पिता नहिं देवा। साधुन्ह सन करवावहिं सेवा।।___अर्थ___पराये धन और परायी स्त्री पर मन चलानेवाले, दुष्ट, चोर और जुआरी बहुत बढ़ गये। लोग माता_पिता और देवताओं को नहीं मानते थे और साधुओं [ की सेवा करना तो दूर रहा, उलटे उन ] से सेवा करवाते थे।

जिन्ह के यह आचरन भवानी। ते जानेहु निसिचर सब प्रानी।। अतिसय देखि धर्म कै ग्लानी। परम सभीत धरा अकुलानी।।___अर्थ___[ श्रीशिवजी कहते हैं कि___] हे भवानी ! जिनके ऐसे आचरण हैं, उन सब प्राणियों को राक्षस ही समझना। इस प्रकार धर्म के प्रति [ लोगों ] की अतिसय ग्लानि ( अरुचि, अनास्था ) देखकर पृथ्वी अत्यंत भयभीत और व्याकुल हो गयी।

गिरि सर सिंधु भार नहिं मोही। जल मोहि गरुअ एक परद्रोही।। सकल धर्म देखइ बिपरीता। कहि न सकइ रावन भयभीता।।___अर्थ___[ वह सोचने लगी कि ] पर्वतों, नदियों और समुद्रों का बोझ मुझे इतना भारी नहीं जान पड़ता, जितना भारी मुझे एक परद्रोही ( दूसरों का अनिष्ट करनेवाला ) लगता है। पृथ्वी सारे धर्मों को विपरीत देख रही है, पर रावण से भयभीत हुई वह कुछ बोल नहीं सकती।

धेनु रूप धरि हृदयँ बिचारी। गई तहाँ जहँ सुर मुनि झारी।। निज संताप सुनाएसि रोई। काहू तें कछु काज न होई।।___अर्थ___[ अंत में ] हृदय में सोच_विचारकर, गौ का रूप धारण कर धरती वहाँ गयी, जहाँ सब देवता और मुनि  [ छिपे ] थे। पृथ्वी ने होकर अपना दुःख सुनाया, पर किसी से कुछ काम न बना।

सुर मुनि गंधर्बा मिला करि सर्बा गे बिरंचि के लोका। सँग गोतनु धारी भूमि बिचारी परम बिकल भय सोका।। ब्रह्मा सब जाना मन अनुमाना मोर कछू न बसाई। जा करि तैं दासी सो अबिनासी हमरेउ तोर सहाई।।___अर्थ____तब देवता, मुनि और गन्धर्व सब मिलकर ब्रह्माजी के लोक ( सत्यलोक ) को गये। भय और शोक से व्याकुल बेचारी पृथ्वी भी गौ का शरीर धारण किये हुए उनके साथ थी। ब्रह्माजी सब जान गये। उन्होंने मन में अनुमान किया कि इसमें मेरा कुछ भी वश नहीं चलने का। [ तब उन्होंने पृथ्वी से कहा कि___ ] जिसकी तू दासी है, वही अविनाशी हमारा और तुम्हारा दोनों का सहायक है।

धरनि धरहि मन धीर तह बिरंचि हरि पद सुमिरु। जानत जन की पीर प्रभु भंडार दारुन बिपति।।____ अर्थ ___ ब्रह्माजी ने कहा___ हे धरती !  मन में धीरज धारण करके श्रीहरि के चरणों का स्मरण करो। प्रभु अपने दासों की पीड़ा को जानते हैं, ये तुम्हारी कठिन विपत्ति का नाश करेंगे।

बैठे सुर सब करहिं बिचारा। कहँ पाइअ प्रभु करिअ पुकारा।। रुक बैकुंठ जान कह कोई। कोउ कह पयनिधि बस प्रभु सोई।।___अर्थ___सब देवता बैठकर  विचार करने लगे कि प्रभु को कहाँ पावें ताकि उनके सामने पुकार ( फरियाद ) करें। कोई वैकुण्ठपुरी जाने को कहता था और कोई कहता था कि वही प्रभु क्षीरसमुद्र में निवास करते हैं।

जाके हृदयँ भगति जसि प्रीती। प्रभु तहँ प्रकट सदा तेहिं रीती।। तेहिं समाज गिरिजा मैं रहेऊँ। अवसर पाइ बचन एक कहेऊँ।।___अर्थ___जिसके हृदय में जैसी भक्ति और प्रीति होती है, प्रभु वहाँ ( उसके लिये ) सदा उसी रीति से प्रकट होते हैं। हे पार्वती ! उस समाज में मैं भी था। अवसर पाकर मैंने एक बात कही___

हरि ब्यापक सर्बत्र समाना। प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना।। देस काल दिसि बिदिसिहु माहीं। कहहु सो कहाँ जहाँ प्रभु माहीं।___अर्थ___मैं तो यह जानता हूँ कि भगवान् सब जगह समान रूप से व्याप्त हैं, प्रेम से वे प्रकट हो जाते हैं। देश, काल, दिशा, विदिशा में बताओ, ऐसी जगह कहाँ है, जहाँ प्रभु न हों।

अग जगमय सब रहित बिरागी। प्रेम तें प्रगटइ जिमि आगी।। मोर बचन सब के मन माना। साधु साधु करि ब्रह्म बखाना।।___अर्थ____वे चराचरमय ( चराचर में व्याप्त ) होते हुए ही सबसे रहित हैं और विरक्त हैं ( उनका कहीं आसक्ति नहीं है ); वे प्रेम से प्रकट होते हैं, जैसे अग्नि ( अग्नि अव्यक्त रूप से  सर्वत्र व्याप्त है, परन्तु जहाँ उसके लिये अरणिमन्थनादि साधन किये जाते हैं, वहाँ वह प्रकट होती है। इसी प्रकार सर्वत्र व्याप्त भगवान् भी प्रेम से प्रकट होते हैं। ) मेरी यह बात सबको प्रिय लगी। ब्रह्माजी ने ‘ साधु, ‘ साधु’ कहकर बड़ाई की।

सुनि बिरंचि मन हरष तन पुलकि नयन बह नीर। अस्तुति करत जोरि कर सावधान मतिधीर।।___अर्थ___मेरी बात सुनकर ब्रह्माजी के मन में  बड़ा हर्ष हुआ; उनका तन पुलकित हो गया और नेत्रों से [ प्रेम के ] आँसू बहने लगे। तब ले धीरबुद्धि ब्रह्माजी सावधान होकर हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।

जय जय सुरनायक जनसुखदायक प्रनतपाल भगवंता। जो द्विज हितकारी जय असुरारी सिंधुसुता प्रिय कंता।। पालन सुरधरनी अद्भुत करनी मरम न जानइ कोई। जो सहज कृपाला दीनदयाला करउ अनुग्रह सोई।।___ अर्थ___हे देवताओं के स्वामी, सेवकों को सुख देनेवाले, शरणागत की रक्षा करनेवाले भगवान् ! आपकी जय हो ! जय हो ! ! हे जो_ब्राह्मणों के हित करनेवाले, असुरों का विनाश करनेवाले, समुद्र की कन्या ( श्रीलक्ष्मीजी ) के प्रिय स्वामी ! आपकी जय हो। हे देवता और पृथ्वी का पालन करनेवाले ! आपकी लीला अद्भुत है, उसका भेद कोई नहीं जानता। ऐसे जो स्वभाव से ही कृपालु और दीनदयालु हैं, वे ही हमपर कृपा करें।


जय जय अबिनासी सब घट बासी ब्यापक परमानंदा। अबिगत गोतीतं चरित पुनीतं मायारहित मुकुंदा।। जेहि लागि बिरागी अति अनुरागी बिगत मोह मुनिबृंदा। निसि बासर ध्यावहिं गुन गन गावहिं जयति सच्चिदानंदा।।___अर्थ___हे अविनाशी, सबके हृदय में निवास करनेवाले ( अन्तर्यामी ), सर्वव्यापी परम आनन्दस्वरूप अज्ञेय, इन्द्रियों से परे, पवित्रचरित्र, माया से रहित मुकुन्द ( मोक्षदाता ) !  आपकी जय हो ! जय हो ! ! [ इस लोक और परलोक के सब भोगों से ] विरक्त तथा मोह से सर्वथा छूटे हुए ( ज्ञानी ) मुनिवृंद भी अत्यंत अनुरागी ( प्रेमी ) बनकर जिनका रात_दिन ध्यान करते हैं और जिनके गुणों के समूह का गान करते हैं, उन सच्चिदानन्द की जय हो।

जेहिं सृष्टि उपाई त्रिबिध बनाई संग सहाय न दूजा। सो करउ अघारी चिंत हमारी जानिअ भगति न पूजा।। जो भव भय रंजन मुनि मन रंजन गंजन बिपति बरूथा। मन बच क्रम बानी छाड़ि सयानी सरन सकल सुरजूथा।।___अर्थ____जिन्होंने बिना किसी दूसरे संगी अथवा सहायक के अकेले ही [ या स्वयं अपने को त्रिगुणरूप___ब्रह्मा, विष्णु, शिवरूप___बनाकर अथवा बिना किसी उपादान_कारण के अर्थात् स्वयं ही सृष्टि का अभिन्ननिमित्तोपादन कारण बनकर ] तीन प्रकार की सृष्टि उत्पन्न की, वे पापों का नाश करनेवाले भगवान् हमारी सुधि लें। हम न भक्ति जानते हैं न पूजा। जो संसार के  ( जन्म_मृत्यु के )  भय का नाश करनेवाले, मुनियों के मन को आनन्द देनेवाले और विपत्तियों के समूह को नष्ट करनेवाले हैं। हम सब देवताओं का समूह मन, वचन और कर्म से चतुराई करने की बात छोड़कर उन ( भगवान् ) की ( शरण ) आये हैं।

सारद श्रुति सेषा रिषय असेषा जा कहुँ कोउ नहिं जाना। जेहि दीन पियारे बेद पुकारे द्रवउ सो श्रीभगवाना।। भव बारिधि मंदर सब बिधि सुंदर गुनमंदिर सुखपुंजा। मुनिसिद्ध सकल सुर परम भयातुर नमत नाथ पदकंजा।।____ अर्थ____सरस्वती, वेद, शेषजी और संपूर्ण ऋषि कोई भी जिनको नहीं जानते, जिन्हें दीन प्रिय हैं, ऐसा वेद पुकारकर कहते हैं, वे ही श्रीभगवान् हमपर दया करें। हे संसाररूपी समुद्र के [ मंथन के ] लिये मन्दराचलरूप, सब प्रकार से सुन्दर, गुणों के धाम और सुखों की राशि नाथ ! आपके चरणकमलों में मुनि, सिद्ध और सारे देवता भय से,अत्यंत व्याकुल होकर नमस्कार करते हैं।

जानि सभय सुर भूमि सुनि बचन समेत सनेह। गगनगिरा गंभीर भइ हरनि लोक संदेह।।___ अर्थ___ देवता और पृथ्वी को भयभीत जानकर और उनके स्नेहयुक्त वचन सुनकर शोक और संदेह को हरनेवाली गंभीर आकाशवाणी हुई___

जनि डरपहु मुनि सिद्ध सुरेसा। तुम्हहि लागि धरिहउँ नर बेसा। अंसन्ह सहित मनुज अवतारा। लेहउँ दिन कर बंस उदारा।।___अर्थ____हे मुनि, सिद्ध और देवताओं के स्वामियों ! डरो मत। तुम्हारे लिये मैं मनुष्य का रूप धारण करूँगा और उदार ( पवित्र ) सूर्यवंश में अंशोंसहित मनुष्य का अवतार लूँगा।

कस्यप अदिति महातप कीन्हा। तिन्ह कहुँ मैं पूरब बर दीन्हा।। ते दसरथ कौसल्या रूपा। कोसलपुरीं प्रगट नर भूपा।।___कश्यप और अदिति ने बड़ा भारी तप किया था। मैं पहले ही उनको वर दे चुका हूँ। वे ही दशरथ और कौसल्या के रूप में मनुष्यों के राजा होकर श्रीअयोध्यापुरी में प्रकट हुए हैं।

तिन्ह कें गृह अवतरिहउँ जाई। रघुकुलतिलक सो चारिउ भाई।। नारद बचन सत्य सब करिहउँ। परम सक्ति समेत अवतरिहउँ।।___ अर्थ___उन्हीं के घर जाकर मैं रघुकुल में श्रेष्ठ चार भाइयों के रूप में अवतार लूँगा। नारद के सब वचन को सत्य करूँगा और अपनी पराशक्ति के सहित अवतार लूँगा।

हरिहउँ सकल भूमि गरुआई। निर्भय होहु देव समुदाई।। गगन ब्रह्मबानी सुनि काना। तुरंत फिरे सब हृदय जुड़ाना।।___ अर्थ____मैं पृथ्वी का सब भार हर लूँगा। हे देववृंद ! तुम निर्भय हो जाओ। आकाश में ब्रह्म ( भगवान् ) की वाणी को कान से सुनकर देवता तुरंत लौट गये। उनका हृदय शीतल हो गया।

तब ब्रह्मा धरनिहि समुझावा। अभय भई भरोस जियँ आवा।।___अर्थ___तब ब्रह्माजी ने पृथ्वी को समझाया। वह भी निर्भय हुई और उसके जी में भरोसा ( ढाढ़स ) आ गया।

निज लोकहि बिरंचि गे देवन्ह इहइ सिखाइ। बानर तनु धरि धरि महि हरि पद सेवहु जाइ।।___अर्थ___देवताओं को यही सिखाकर कि वानरों का शरीर धर_धरकर तुमलोग पृथ्वी पर जाकर भगवान् के चरणों की सेवा करो, ब्रह्माजी अपने लोक को चले गये।

गए देव सब निज निज धामा। भूमि सहित मन कहुँ  बिश्रामा।। जो कुछ आयसु ब्रह्माँ दीन्हा। हरषे देव बिलंब न कीन्हा।।___ अर्थ____सब देवता अपने_अपने लोक को चले गये। पृथ्वी सहित सबके मन को शान्ति मिली। ब्रह्माजी ने जो कुछ आज्ञा दी, उससे देवता बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने [ वैसा करने में ] देर नहीं की।

बनचर देह धरी छिति माहीं। अतुलित बल प्रताप तिन्ह पाहीं।। गिरि तरु नख आयुध सब बीरा। हरि मारग चितवहिं मतिधीरा।।___अर्थ___पृथ्वी पर उन्होंने वानरदेह धारण की। उनमें अपार बल और प्रताप था। सभी शूरवीर थे; पर्वत, वृक्ष और नख ही उनके अस्त्र थे। वे कीर बुद्धिवाले [ वानररूप देवता ] भगवान् के आने की राह देखने लगे।

गिरि कानन जहँ तहँ भरि पूरी। रहे निज निज अनीक रचि रूरी।। यह सब रुचिर चरित मैं  भाषा। अब सो सुनहु जो बीचहिं राखा।।___अर्थ____ वे [ वानर ] पर्वतों और जंगलों में जहाँ_तहाँ अपनी_अपनी सुन्दर सेना बनाकर भरपूर छा गये। यह सब सुन्दर चरित्र मैंने कहा। अब वह चरित्र सुनो जिसे बीच में ही छोड़ दिया था।