लै जानकिहि जाहु गिरि अंदर। आवा निसिचर कटकु भयंकर।।रहेहु सजग सुनि प्रभु कै बानी। चले सहित श्री सर धनु पानी।।_अर्थ_राक्षसों की भयानक सेना आ गयी है। जानकी जी को लेकर तुम पर्वत की कंदरा में चले जाओ। सावधान रहना। प्रभु श्री रामचन्द्रजी के वचन सुनकर लक्ष्मण जी हाथ में धनुष _बाण लिये श्रीसीताजीसहित चले।
देखि राम रिपुदल चलि आवा। बिहसि कठिन कोदंड चलावा।।_अर्थ_शत्रुओं की सेना ( समीप ) चली आयी है, यह देखकर श्रीरामजी ने हंसकर कठिन धनुष को चढ़ाया।
कोदंड कठिन चढ़ाई सिर जटा जूट बांधते सोह क्यों।हरकत सरल पर व्रत दामिनि कोटि हो जुग भुजंग ज्यों।।कटि कसिनिषंग बिहार भुज गहि चाप डिसिक सुधारिए कै। चित्त मनहुं मृगराज प्रभु गजराज घंटा निहारि कै।।_अर्थ_कठिन धनुष चढ़ाकर सिर पर जटा का जूड़ा बांधते हुए प्रभु कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे मरकतमणि ( पन्ने )_के पर्वत पर करोड़ों बिजलियों से दो सांप लड़ रहे हों। कमर में तरकस कसकर, विशाल भुजाओं में धनुष लेकर और बात सुधारकर प्रभु श्री रामचन्द्रजी राक्षसों की ओर देख रहे हैं। मानो मतवाले हाथियों के समूह को ( आता ) देखकर सिंह ( उनकी ओर ) ताक रहा हो।
आइ गए बगमेल धरहु धरहु धावत सुभट। जरा बिलोकि अकेले बाल रबिहि घेरत दनुज।।_अर्थ_'पकड़ो_पकड़ो' पुकारते हुए राक्षस योद्धा बाग छोड़कर (बड़ी तेजी से ) दौड़े हुए आये ( और उन्होंने श्रीरामजी के चारों ओर से घेर लिया), जैसे बालसूर्य (उदयकालीन सूर्य )_को अकेला देखकर मन्देह नामक दैत्य घेर लेते हैं।
प्रभु बिलोकि सर सकहिं न डाली। थकित भी रजनीचर धारी।। सचिव बोलि बोले खरदूषन। यह कोई नृपबालक नरभूषन।।_अर्थ_( सौन्दर्य माधुर्य निधि ) प्रभु श्रीरामजी को देखकर राक्षसों की सेना थकित रह गयी। वे उनपर बात नहीं छोड़ सके। मंत्री को बुलाकर खर_दूषन ने कहा_यह राजकुमार कोई मनुष्यों का भूषण है।
नाग असुर सुर नर मुनि देते देखें जिते होते हम केते। हम भरि जनम
सुनहु सब भाई। देखी नहिं असि सुंदरताई।।_अर्थ_जितने भी नाग, देवता, असुर, मनुष्य और मुनि हैं, उनमें सबसे हमने न जाने कितने ही देखें, जीते और मार डाले हैं। पर हे सब भाइयों ! सुनो, हमने जन्म भर में ऐसी सुंदरता कहीं नहीं देखी।
यद्यपि भगिनि कीन्हि कुरूपा। बध लायक नहिं पुरुष अनूपा।। देहु तुरंत निज नारि दुराई। जिअत भवन जासु द्वौ भाई।।_अर्थ_यद्यपि इन्होंने हमारी बहिन को कुरूप कर दिया तथापि ये अनुपम पुरुष वध करने योग्य नहीं हैं। 'छिपायी हुई अपनी स्त्री हमें तुरंत दे दो और दोनों भाई जीते-जी घर लौट जाओ।
मोर कहा तुम्ह ताहि सुनावहु। जासु बचन सुनि आतुर आवहु।। दूतन्ह कहा राम सन जाई। सुनत राम बोले मुसुकाई।।_अर्थ_मेरा यह कथन तुमलोग उसे सुनाओ और उसका वचन ( उत्तर ) सुनकर शीघ्र आओ। दूतों ने जाकर यह संदेश श्रीरामचन्द्रजी से कहा। उसे सुनते ही श्रीरामचन्द्रजी मुस्कराकर बोले_।
हम छत्री मृगया बन कहीं। तुम से कल मृग खोजते फिरहीं।। रिपु बलवंत देखि नहिं बरसीं। एक बार कालहुं सन लरहीं।।_अर्थ_हम क्षत्रिय हैं, वन में शिकार करते हैं और तुम्हारे _सरीखे दुष्ट पशुओं को तो ढ़ूंढ़ते ही फिरते हैं।हम बलवान शत्रु को देखकर नहीं डरते। ( लड़ने को आवे तो ) एक बार तो हम काल से ही लड़ सकते हैं।
यद्यपि मनुज दनुज कुल घालक। मुनि पालक खल सालक बालक।। जौं न होई बल घर फिरि जाहू। समय बिमुख मैं हुं न काहू।।_अर्थ_यद्यपि हम मनुष्य हैं, परन्तु दैत्य कुल का नाश करनेवाले और मुनियों की रक्षा करनेवाले हैं। हम बालक हैं परन्तु दुष्टों को दण्ड देनेवाले। यदि बल न हो तो घर लौट जाओ। पीठ दिखानेवाले किसी को मैं नहीं मारता।
रन चढ़ि करिअ कपट चतुराई। रिपु पर कृपा परम कदराई।। दूतन्ह जाइ तुरत सब कहेऊ। सुनि खल दूषन उर अति दहेऊ।।_अर्थ_रण में आकर कपट_चतुराई करना और शत्रु पर कृपा करना ( दया दिखाना तो भारी कायरता है। दूतों ने लौटकर तुरंत सब बातें कहीं, जिन्हें सुनकर खर_दूषण का हृदय अत्यन्त जल उठा।
उर दहेऊ कहेउ कि धरहु धाए बिकट भट रजनीचरा। सर चाप तोमर सक्ति सूल कृपान परिघ परसु धरा।। प्रभु कीन्ह धनुष टकोर प्रथम कठोर प्रथम घोर भयावहा। भए फ़िर व्याकुल जातुधान न घ्यान तेहि अवसर रहा।_अर्थ_( खर_दूषण ) का हृदय जल उठा। तब उन्होंने कहा_पकड़ लो ( कैद कर लो )। ( यह सुनकर ) भयानक राक्षस योद्धा बात, धनुष, तोमर, शक्ति ( सांग ), शूल ( बरछी ), कृपाण ( कटार ), परिचय और फरसा धारण किये हुए दौड़ पड़े। प्रभु श्रीरामजी ने पहले धनुष का बड़ा कठोर, घोर और भयानक टंकार किया, जिसे सुनकर राक्षस बहरे और व्याकुल हो गये। उस समय उन्हें कुछ भी होश न रहा। सावधान होई धाए जानि सफल आराति। लागे बरसन राम पर अस्त्र शस्त्र बहुत भांति।।_अर्थ_फिर वे शत्रु को बलवान जानकर सावधान होकर दौड़े और श्रीरामचन्द्रजी के ऊपर बहुत प्रकार के अस्त्र _शस्त्र बरसाने लगे।
तिन्ह के आयुध तिल हम करि काटे रघुबीर। तानि सरासन श्रवन लगि पुनि छांड़े निज तीर।।_अर्थ_श्रीरघुवीरजी ने उनके हथियारों को तिल के समान ( टुकड़े _टुकड़े ) करके काट डाला। फिर धनुष को कानतक तानकर अपने तीर छोड़े।
तब चले बान कराल।फुंकरत जनु बहु ब्याल।। कोपेउ समर श्रीराम। चले बिसिख निसित निकाम।।_अर्थ_तब भयानक बात ऐसे चले, मानो फुफकारते हुए बहुत _से सर्प जा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी संग्राम में क्रुद्ध हुए और अत्यन्त तीक्ष्ण बाण चले।
अवलोकि खरतर तीर। मुनि चले निसिचर बीर।। भए क्रुद्ध तीनिउ भाई। जो भागिए रन थे जाइ।।_अर्थ_अत्यन्त तीक्ष्ण बाणों को देखकर राक्षस वीर पीठ दिखाकर भाग चलें। तब कर, दूषण और त्रिनिदाद तीनों भाई क्रुद्ध होकर बोले_जो रण से भागकर जायगा,
तेहि बध हम निज पानि। फिरे मरन मन कहुं जानि।। आयुध अनेक प्रकार। सनमुख ते करिहिं प्रहार।।_अर्थ_उसका हम अपने हाथों से वध करेंगे। तब मन में मरना ठानकर भागते हुए राक्षस लौट पड़े और स मने होकर वे अनेकों प्रकार के हथियारों से श्रीरामजी पर प्रहार करने लगे।
रिपु परम कोपेउ जानि। प्रभु धनुष सर संधानि।। छांड़े बिपुल नारायण। लगे कटन विकट पिसाच।।_अर्थ_शत्रु को अत्यन्त कुपित जानकर प्रभु ने धनुष पर बाण चढ़ाकर बहुत_से बाण छोड़े, जिन्हें भयानक राक्षस कटने लगे।
उर सीस भुज कर चरन। जहं_तहं लगे महि परन।। चिक्करत लागत बान। धर परत कुधर समान।।_अर्थ_उनकी छाती, सिर, भुजा, हाथ और पैर जहां_तहां पृथ्वी पर गिरने लगे। बाण लगते ही वे हाथी के तरह चिग्घाड़ते हैं। उनके पहाड़ के समान धड़ कट_कटकर गिर रहे हैं।
भट कटत तन सत खंड। पुनि उठत करि पाषंड। नभ उड़त बहु भुज मुंड। बिनु मौलिक दावत रुंड।।_अर्थ_योद्धाओं के शरीर कटकर सैकड़ों टुकड़े हो जाते हैं। वे फिर माया करके उठ खड़े होते हैं। आकाश में बहुत सी भुजाएं और सिर उड़ रहे हैं तथा बिना सिर के धड़ दौड़ रहे हैं।
खग कंक काट सृकाल। कटकटहिं कठिन कराल।।_अर्थ_चील ( या क्रौंच ), कौए आदि पक्षी और सियार कठोर और भयंकर कट_कट शब्द कर रहे हैं।
कटकटहिं जंबुक भूत प्रेत पिसाच खर्पर संचहीं। बेताल वीर कपाल ताल बजाई जोगिनि नंचहीं।। रघुबीर बान प्रचंड खंडहिं भटन्ह के उर भुज सिरा। जहां तहां परहिं उठिए लरहिं धरु धरु करिहिं भयंकर गिरा।।_अर्थ_सियार खटखटाते हैं, भूत, प्रेत और पिशाच खोपड़ियां बटोर रहे हैं ( अथवा खप्पर भर रहे हैं )। वीर_वैताल खोपड़ियों पर ताल दे रहे हैं और योगिनियां नाच रही हैं। श्रीरघुवीर के प्रचंड बाण योद्धाओं के वक्ष:स्थल, भुजा और सिरों के टुकड़े _टुकड़े कर डालते हैं। उनके धड़ जहां _तहां गिर पड़ते हैं। फिर उठते हैं और लड़ते हैं और पकड़ो_पकड़ो का भयंकर शब्द करते हैं।
अंतावरीं गहिं उड़त गीध पिसाच कर नहिं धावहीं। संग्राम पुर बासी मनहुं बहु बाल गुड़ी उड़ावहीं।। मारे मारे उर बिदारे बिपुल भट कहंरत परे। अवलोकि निज दल बिकल भटतिसिरादि खर दूषन फिरे।।_अर्थ_अंतरियों के एक छोर को पकड़कर गीध उड़ते हैं और उन्हीं का दूसरा छोर पकड़कर पिशाच दौड़ते हैं, ऐसा मालूम होता है, मानो संग्राम रूपी नगर के निवासी बालक पतंग उड़ा रहे हों। अनेकों योद्धा मारे और पछाड़ें गये। बहुत से, जिनके हृदय विदीर्ण हो गये हैं, पड़े कराह रहे हैं। अपनी सेना को व्याकुल देखकर त्रिशिरा और खर-दूषण आदि योद्धा श्रीरामजी की ओर मुड़े।
सर सक्ति तोमर परसु सूल कृपान एकहिं बारहीं। करि कोप श्रीरघुबीर पर अगनित निसाचर डारहीं।। प्रभु निमिष महुं रिपु सर निवारि पचारि डारे सायका। दस_दस बिसिख उर माझ मारे सकल निसिचर नायका।।_अर्थ_अनगिनत राक्षस क्रोध करके बाण, शक्ति, तोमर, फरसा, शूल और कृपाण एक ही बार में श्रीरघुवीर पर छोड़ ने लगे। प्रभु ने पलभर में शत्रुओं के बाणों को काटकर, ललकारकर उनपर अपने बाण छोड़े। सब राक्षस सेनापतियों के हृदय में दस_दस बाण मारे।
महि परत उठि भट भिरत मरत न करत माया अति घनी। सुर डरत चौदह बहस प्रेत बिलोकि एक अवध धनी।। सुर मुनि सभय प्रभु देखि मायानाथ अति कौतुक कर्यो। लेकिन परस्पर राम करि संग्राम रिपुदल लरि मर्यो।_अर्थ_योद्धा पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, फिर उठकर भिड़ते हैं। मरते नहीं, बहुत प्रकार की अतिशय माया रचते हैं। देवता यह देखकर डरते हैं कि प्रेत (राक्षस ) चौदह हजार हैं और अयोध्यानाथ श्रीरामजी अकेले हैं। देवता और मुनियों को भयभीत देखकर माया के स्वामी प्रभु ने एक बड़ा कौतुक किया, जिससे शत्रुओं की सेना एक_दूसरे को रामरूप देखने लगी और आपस में ही युद्ध करके लड़ मरी। राम राम कहि तनु तर्जहिं पावहिं पद निर्बान। करि उपाय रिपु मारे तन महुं कृपानिधान।।_अर्थ_सब ( ' यही राम है, इसे मारो' ) इस प्रकार) राम_राम कहकर शरीर छोड़ते हैं और निर्वाण ( मोक्ष ) पद पाते हैं। कृपा निधान श्रीरामजी ने यह उपाय करके क्षणभर में शत्रुओं को मार डाला। हर्षित बरसहिं सुमन सुर बाजहिं गगन निसान। अस्तुति करि करि सब चले सोभित बिबिध बिमान।।_अर्थ_देवता हर्षित होकर फूल बरसाते हैं, आकाश में नगाड़े बज रहे हैं। फिर वेज्ञसब स्तुति कर_करके अनेकों विमानों पर सुशोभित हुए चले गये।
जब रघुनाथ समर रिपु जीते। सुर नर मुनि सब के भय बीते।। तब लछिमन सीतहिं लै आए। प्रभु पद परत हरषि उर लाए।।_अर्थ_जब श्रीरघुनाथजी ने युद्ध में शत्रुओं को जीत लिया तथा देवता, मनुष्य, मुनि सबके भय नष्ट हो गये, तब लक्ष्मण जी सीताजी को ले आये। चरणों में पड़ते हुए उनको प्रभु ने प्रसन्नतापूर्वक उठाकर हृदय से लगा लिया।
सीता चितव स्याम मृदु गाता। परम प्रेम लोचन न अघाता।। पंचबटीं बसि श्रीरघुनायक। करत चरित सुर मुनि सुखदायक।।_अर्थ_सीताजी श्रीरामजी के श्याम और कोमल शरीर को परम प्रेम के साथ देख रही है, नेत्र अघाते नहीं हैं। इस प्रकार पंचबटीं में बसकर श्रीरघुनाथजी देवताओं और मुनियों को सुख देनेवाले चरित्र करने लगे।
धुआं देखि खरदूषन केरा। जाइ सूपनखां रावन प्रेरणा।। बोली बचन क्रोध करि भारी। देस कोस कैसुरति बिहारी।।_अर्थ_खर_दूषण का विध्वंस देखकर सूर्पनखा ने जाकर रावण को भड़काया। वह बड़ा क्रोध करके वचन बोली_तूने देश और खजाने की सुधि ही भुला दी।
करसि पान सोवसि दिन राती। सुधि नहिं तव सिर पर आराती।। राज नीति बिनु धन बिनु धर्मा। हरिहिं समर्पे बिनु सत्कर्मा।। विद्या बिनु डिबेट उपजाएं। श्रम फल पढ़ें कियें अरु पाएं।। संग में जाती कुमंत्र तें राजा। मान ते ज्ञान पान तें लाजा।।_अर्थ_शराब पी लेता है और दिन_रात पड़ा सोना रहता है। तुझे खबर नहीं है कि शत्रु तेरे सिर पर खड़ा है ? नीति के बिना राज्य और धर्म के बिना धन प्राप्त करने से, भगवान् को समर्पण किये बिना उत्तम कर्म करने से और विवेक उत्पन्न किये विद्या पढ़ने से परिणाम में श्रम ही हाथ लगता है। विषयों के संग से संन्यासी, बुरी सलाह से राजा, मान से ज्ञान, मदिरापान से लज्जा,।
प्रीति प्रनय बिनु मद ते गुनी। नासहिं बेगि नीति अब सुनी।।_अर्थ_नम्रता के बिना ( नम्रता न होने से ) प्रीति और मद ( अहंकार )_से गुणवान् शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं, इस प्रकार नीति मैंने सुनी है।
रिपु रुज पावक पाप प्रभु अहि गनिअ न छोट करि। अब कहिए बिबिध बिलाप करि लागी रोदन करन।।_अर्थ_ शत्रु, रोग, अग्नि, पाप, स्वामी और सर्प को छोटा करके नहीं समझना चाहिये। ऐसा कहकर सूर्पनखा अनेक प्रकार से विलाप करके रोने लगी।
सभा माझ परि व्याकुल बहु प्रकार कह रोइ। मोहि जिअत दसकन्धर मोरि कि अब गति होइ।।_अर्थ_( रावण की ) सभा में वह व्याकुल होकर पड़ी हुई बहुत प्रकार से रो_रोकर कह रही है कि अरे दशग्रीव ! तेरे जीते जी मेरी क्या ऐसी दशा होनी चाहिये ?
सुनत सभासद उठे अकुलाई। समुझाई गहि बांह उठाई।। कह लंकेस कहसि निज बाता। केइं तव नासा कान निपाता।।_अर्थ_शूर्पनखा के वचन सुनते ही सभासद् अकुला उठे। उन्होंने सूर्पनखा की बांह पकड़कर उसे उठाया और समझाया। लंकापति रावण ने कहा_अपनी बात तो बता, किसने तेरे नाक कान काट लिये।
अवध नृपति दसरथ के जाए। पुरुष सिंघ बन खेलन आए।। समुझि परी मोहि उन्ह कै करनी। रहित निसार करिहहिं धरनी।।_अर्थ_( वह बोली_) अयोध्या के राजा दशरथ के पुत्र, जो पुरुषों में सिंह के समान हैं, वन में शिकार खेलने आये हैं। मुझे उनकी करनी ऐसी समझ पड़ी है कि वे पृथ्वी को राक्षसों से रहित कर देंगे।
जिन्ह कर भुजबल पाई दसानन। अभय भए बिचरते मुनि कानन।। देखत बालक काल समाना। परम वीर धन्वी गुन नाना।।_अर्थ_जिनकी भुजाओं का बल पाकर हे दशमुख ! मुनि लोग वन में निर्भय होकर विचरने लगे हैं। वे देखने में तो बालक हैं, पर हैं, काल के समान ! वे परम वीर, श्रेष्ठ धनुर्धर और अनेकों गुणों से युक्त हैं।
अतुलित बल प्रताप द्वौ भ्राता। खल बन रथ सुर मुनि सुख दाता।। सोभाधाम राम अस नामा। तिन्ह के संग नारि एक स्यामा।।_अर
थ_दोनों भाइयों का बल और प्रताप अतुलनीय है। वे दुष्टों के वध करने में लगे हैं और देवता तथा मुनियों को सुख देनेवाले हैं। वे शोभा के नाम हैं, 'राम' ऐसा उनका नाम है। उनके साथ एक तरुणी सुन्दर स्त्री है।