Tuesday, 19 November 2019

बालकाण्ड

सहज मनोहर मूरति दोऊ। कोटि काम उपमा लघु सोऊ।। सरदचन्द सम  मुख नीके। नीरज नयन भावतेजी के।।___ अर्थ____ दोनों के स्वरूप स्वभाव से ही मन को हरनेवाले हैं। करोड़ों कामदेव की उपमा भी उनके आगे तुच्छ हैं। शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा को लजानेवाला सुन्दर मुख और कमल के समान मनभावने नेत्र हैं।

चितवन चारु मार मनु हरनी। भावति हृदयँ जाति नहिं बरनी।। कल कपोल श्रुति कुण्डल लोला। चिबुक अधर सुन्दर मृदु बोला।।___अर्थ___ कामदेव के घमंड को हरनेवाली सुन्दर चितवन मन को भली लगती है। परन्तु वाणी से कही नहीं जा सकती। सुन्दर गालों पर कानों के कुण्डल झूल रहे हैं। सुन्दर ठोड़ी और मधुर वाणी है।

कुमुद बन्धु कर निंदक हाँसा। भृकुटी बिकट मनोहर नासा।। भालबिसाल तिलक झलकाहीं। कच बिलोकि अलि अवलि लजाहीं।।___ अर्थ____ चन्द्रमा की किरणों को लजानेवाली हँसी, कमान के समान टेढ़ी भौंहें और मनोहर नासिका हैं। चौड़े मस्तकों पर तिलक झलक रहे हैं और बालों को देखकर भौंरों की पांति लजा रही है।

पीत चौतनीं सिरन्हिं सुहाई। कुसुम कलीं बिच बीच बनाईं।। रेखें रुचिर कम्बु कल गीवाँ। जनु त्रिभुवन सुषमा  की सीवाँ।।___अर्थ___पीली चौकोनी टोपियाँ सिरों पर सुशोभित हैं जिन पर फूलों की कलियाँ बनाई हुईं हैं। शंख के समान सुन्दर कण्ठ में मनोहर तीन रेखाएँ हैं जो मानो तीनों लोकों की सुन्दरता की सीमा हैं।

कुंजर मनि कण्ठा कलित, उरन्हि तुलसिका माल। बृषभकन्ध केहरि ठबनि, बल निधि बाहु बिसाल।।___ अर्थ___हृदयों पर गजमुक्ताओं के कण्ठे और तुलसी की मालाएँ सुशोभित हो रही हैं। बैलों के_से ऊँचे कन्धे हैं, सिंह की सी चाल है और भुजाएँ बल की समुद्र और लम्बी हैं।

कटि तूनीर पीतपट बाँधे। कर सर धनुष बाम बर काँधे।। पीत जस उपबीत सुहाये। नख सिख मंजु महाछबि छाये।।___अर्थ____ कमर में तरकस और पीताम्बर बाँधे हैं, हाथों में बाण और बायें कन्धे पर सुन्दर धनुष और पीले जनेऊ सुशोभित हैं। नख से चोटी तक सब अंग शोभायमान हैं।

देखि लोग सब भये सुखारे। एकटक लोचन टलत न टारे।। हरषे जनकु देखि दोउ भाई। मुनि पद कमल गहे तब  जाई।।___अर्थ____उन्हें देखकर सबलोग सुखी हुए। नेत्र एकटक और तारे भी नहीं चलते। राजा जनक दोनों भाइयों को देखकर प्रसन्न हुए। तब उन्होंने जाकर मुनि के चरणकमलों पकड़ लिये।

करि बिनती निज कथा सुनाई। रंग अवनि सब मुनिहि देखाई।। जहँ जहँ जाहिं कुअँर बर दोऊ। तहँ तहँ चकित चितव सबु कोऊ।।___अर्थ___ विनती करके अपनी कथा सुनाई और रंगभूमि की सब रचना मुनि को दिखाई। जहाँ_ जहाँ दोनों राजकुमार जाते हैं, वहाँ_वहाँ चकित होकर देखने लगते हैं।

निज निज रुख रामहिं सबु देखा। कोई न जान कछु मरमु बिसेषा।। भलि रचना मुनि नृप सन कहुऊ। राजा मुदित महासुख लहेऊ।।___अर्थ___सबों ने अपनी अपनी ओर से श्रीरामजी को देखा, पर यह भेद किसी ने नहीं जाना। मुनि ने राजा से कहा__ रंगभूमि की रचना बहुत अच्छी है, यह सुन राजा प्रसन्न हुए तथा बड़ा सुख पाया।

सब मंचन्ह तें मंच एक, सुन्दर सुखद बिसाल। मुनि समेत दोउ बंधु तहँ बैठारे महिपाल।।___सब मंचों से एक मंच सुन्दर, उज्ज्वल और विशाल था। उसपर राजा ने मुनि समेत दोनो भाइयों को बैठाया।

प्रभुहिं देखि सब नृप हियँ हारे। जनु राकेस उदय भएँ तारे।। असि प्रतीति सबके मन माहीं। राम चाप तोरब सकि नाहीं।।____अर्थ___प्रभु को देखकर सब राजा मन में ऐसे निराश हो गये जैसे चन्द्रमा के उदय होने ये तारे मन्द पड़ जाते हैं। सबके मन में ऐसा विश्वास हो गया कि श्रीरामचन्द्रजी ही धनुष को तोड़ेंगे, इसमें संदेह नहीं है।

बिनु भंजेहु भव धनुष बिसाला। मेलिहि सीय राम उर माला।। अस बिचारि गवनहु घर भाई। जसु प्रताप बल तेजु गवाँई।।___ अर्थ___ शिवजी के इस बड़े धनुष को बिना तोड़े भी सीताजी रामजी के गले में ही जयमाला डालेंगी। हे भाई ! ऐसा बिचारकर यश, प्रताप, बल और तेज गँवाकर अपने अपने घर चलो।

बिहँसे अपर भूप सुनि बानी। जे अबिबेक अंध अभिमानी।। तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा। बिनु तोरें को कुअँरि बियाहा।।___ अर्थ___इस बात को सुनकर दूसरे राजा जो अज्ञान से अंधे और घमंडी थे, हँस पड़े और बोले___ धनुष तोड़ने पर भी ब्याह होना कठिन है। फिर बिना धनुष तोड़े तो  राजकुमारी को ब्याह ही कौन सकता है ?

एक बार कालउ किन होउ। सिय हित समर जितब हम सोउ।। यह सुनि अपर भूप मुसकाने। धरमशील हरिभगत सयाने।।___ अर्थ____ काल ही क्यों न हो एक बार तो सीताजी के लिये समर में हम उसे भी जीतेंगे। यह सुनकर अन्य धर्मात्मा एवं हरिभक्त और चतुर राजा हँसने लगे।

सीय बियाहबि राम, गरब दूरि करि नृपन्ह के। जीति को यह संग्राम, दसरथ के रन बाँकुरे।।___ अर्थ___ राजाओं का घमण्ड दूर करके रामचन्द्रजी सीताजी को ब्याहेंगे। महाराज दशरथजी के रणबाँकुरे पुत्रों को संग्राम में जीत ही कौन सकता है ?

ब्यर्थ करहु जनि गाल बजाई। मन मोदकन्हि कि भूख बुताई।। सिख हमारि पुनि परम पुनीता। जगदम्बा जानहु जियँ सीता।।___ अर्थ___ वृथा गाल मत बजाओ, मन के लड्डुओं से भूख शान्त नहीं होती। हमारी परम पवित्र सीख को सुनकर अपने मन में सीताजी को जगत्माता जानो।

जगतपिता रघुपतिहि बिचारी। भरि लोचन छबि लेहु निहारी। सुन्दर सुखद सकल गुन रासी। ए दोउ बन्धु सम्भु उर बासी।।____ अर्थ___और रामचन्द्रजी को जगतपिता समझकर नेत्र भरकर इनकी शोभा देख लो। सुन्दर, सुखदेनेवाले और और गुणों की राशि ये दोनों भाई महादेवजी के हृदय में वास करते हैं।

सुधा समुद्र समीप बिहाई। मृगजल निरखि मरहु कत धाई। करहु जाइ जा कहुँ जोइ भावा। हम तौ आजु जनम फलु पावा।।____अर्थ____पास ही अमृत का समुद्र छोड़कर, मृगतृष्णा के जल को देखकर दौड़कर क्यों मरे जाते हो ? जिसे जो अच्छा लगे सो करो, हमने तो,आज जन्म लेने का फल पा लिया।

अस कहि भले भूप अनुरागे। रूप अनूप बिलोकन लागे।। देखहिं सुर नभ चढ़े बिमाना। बरसहिं सुमन करहिं कल गाना।।___ अर्थ____ऐसे कहकर भले राजा प्रेम में मगन हुए और अनुपम रूप को देखने लगे। देवता भी आकाश से विमानों पर चढ़े हुए देख रहे थे और पुष्प बरसाते हुए मधुर गीत गा रहे थे।

जानि सुअवसरु सीय तब, पठई जनक बुलाइ। चतुर सखी सुन्दर सकल, सादर चलीं लवाइ।।___ अर्थ___ तब राजा जनक ने  शुभ समय जानकर सीताजी को बुला भेजा। चतुर और सुन्दर रूपवाली सखियाँ आदर सहित उन्हें लिवा चलीं।

सिय सोभा नहिं जाइ बखानी। जगदम्बिका रूप गुन खानी।। उपमा सकल मोहि लघु लागीं। प्राकृत नारि अंग अनुरागीं।।___ अर्थ____सीताजी की शोभा कही नहीं जा सकती, क्योंकि वे जगत् की माता और रूप और गुण की खान हैं। सब उपमायें मुझको तुच्छ जान पड़ती हैं क्योंकि वे सब संसारी स्त्रियों के अंग लग चुकी हैं।

सिय बरनिअ तेई उपमा देई। कुकबि कहाई अजसु को लेई।। जौं पटरिअ तीय सम सीया। जग असि जुबति कहाँ कमनीया।।___ अर्थ___सीताजी का किसी से उपमा देकर कुकबि ( तुलसीदास कहते हैं ) नहीं कहाना। यदि किसी स्त्री के साथ सीताजी की तुलना करें तो ऐसी स्त्री इस संसार में कहाँ है।

गिरा मुखर तन अरध भवानी। रति अति दुःखित अतनु पति जानी।। बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही। कहिअ रमा सम किमि बैदेही।।___अर्थ___ सरस्वती बहुत बोलनेवाली हैं, पार्वतीजी अर्धांगिनी हैं (  उनका आधा अंग शिवजी का है ) रति पति को अनंग जानकर बहुत दुःखी रहती है और विष और बारुणी जिनके प्यारे भाई हैं उन लक्ष्मीजी के समान सीताजी को कहा ही कैसे जाय?

जौं छबि सुधा पयोनिधि होई। परम रूपमय कच्छपु सोई।। सोभा रजु मन्दरु सिंगारू। मथै पानि पंकज जिमि मारू।।___ अर्थ___ जो छबिरूपि अमृत का समुद्र हो और दिव्यरूप का कछुआ हो, शोभारूपी रस्सी हो, श्रृंगार रूपी मन्दराचल हो और कामदेव स्वयं अपने करकमलों से मथें।

एहि बिधि उपजै लच्छि जब, सुन्दरता सुख मूल।। तदपि सकोच समेत कबि, कहहिं सीय समतूल।।___ अर्थ ___इस प्रकार जब सुन्दरता और सुख की मूल लक्ष्मी उत्पन्न हों, तो भी कवि सीताजी को संकोच के साथ लक्ष्मी के समान कह सकते हैं।

चली संग लै सखी सयानी। गावत गीत मनोहर बानी।। सोलह नवल तनु सुन्दर सारी। जगत जननि अतुलित छबि भारी।।___ अर्थ____ चतुर सखियाँ सीताजी को साथ लेकर मनोहर बाणी से सुरीले गीत गाती हुई चलीं। सीताजी के नवल शरीर पर सुन्दर साड़ी शोभायमान हैं। जगत्माता जानकीजी की शोभा अतुलनीय है।

भूषन सकल सुदेश सुहाये। अंग अंग रचि सखिन्ह बनाये।। रंगभूमि जब सिय पगु धारी। देखि रूप मोहे नर नारी।।___ अर्थ____सब गहने सब अंगों में सुशोभित हैं जिन्हें अंग अंग में सजाकर सखियों ने पहनाये हैं। रंगभूमि में जब सीताजी ने चरण रखा तो रूप देखकर सब नर नारी मोहित हो गये।

हरषि सुरन्ह दुंदुभि बजाईं। बरसि प्रसून अपछरा गाई।। पानि सरोज सोह जयमाला। अवचट चितए सकल भुआला।।___अर्थ___ देवताओं ने हर्षित होकर नगाड़े बजाए और पुष्प बरसाकर अप्सराएँ गाने लगीं। सीताजी के करकमलों में जयमाला सुशोभित है। सीताजी ने अचानक सब राजाओं की ओर देखा, दृष्टि को कहीं नहीं रोकी।

सीय चकित चित रामहिं चाहा। भए मोहवश सब नरनाहा।। मुनि समीप देखे दोउ भाई। लगे ललकि लोचन निधि पाई।।___ अर्थ___ सीताजी चकित चित्त से रामजी को देखने लगीं, तब सब राजा मोह के वश हो गये। फिर मुनि के पास बैठे दोनों भाइयों को देखा तो दोनो नेत्र अपनी निधि पाकर मानो वहीं स्थिर हो गये।

गुरजन लाज समाजु बड़, देखि सीय सकुचानि। लगी बिलोकन सखिन्ह तन, रघुबीरहिं उर आनि।।___ अर्थ___परन्तु गुरुजनों की लाज से तथा बड़े समाज को देखकर सीताजी सकुचा गईं। वे श्रीरामजी को हृदय में रखकर सखियों की ओर देखने लगीं।

राम रूपु अरु सिय छबि देखें। नर नारिन्ह परिहरीं निमेषें।। सोचहिं सकल कहत सकुचाहीं। बिधि सन बिनय करहिं मन माहीं।।___ अर्थ____रामचन्द्रजी का रूप और सीताजी की शोभा देखकर नर नारियों ने पलक झपकाना छोड़ दिया।

हरु बिधि बेगि जनक जड़ताई। मति हमारि असि देहि सुहाई।। बिनु बिचार पनु तजि नरनाहू। सीय राम कर करै बिबाहू।।___ अर्थ___हे विधाता ! जनकजी के हठ को जल्दी दूर करे और उन्हें हमारी_सी अच्छी बुद्धि दो, जिससे वे बिना विचार किये ही अपने प्रण को छोड़कर सीताजी का श्रीरामजी से विवाह कर दें।

जगु भल कहिहि भाव सब काहू। हठ कीन्हें अंतहुँ उर दाहू।। एहिं लालसाँ मगन सब लोगू। बरु साँवरो जानकी जोगू।।___ अर्थ____ संसार उन्हें भला कहेगा क्योंकि यह सबको भला ही लगेगा। हठ करने से अंत में हृदय में दुख होगा। इसी लालसा में सब मग्न हैं कि जानकी के योग्य तो यह साँवला वर ही है।

तब बन्दीजन जनक बोलाये। बिरिदावली कहत चलि आये।। कह नृप जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा।।___ अर्थ___ तब जनकजी ने बन्दीजनों को बुलाया, वे पूर्वजों का यश बखानते हुए चले आए। राजा ने कहा___जाकर हमारा प्रण सबसे कहो। भाट हृदय में प्रसन्न होते हुए चले।

बोले बन्दी बचन बर, सुनहु सकल महीपाल। पन बिदेह कर कहहिं हम, भुजा उठाइ बिसाल।।___ अर्थ___भाट सुन्दर बचन बोले___ हे राजा लोगों ! सुनो, जनकजी का प्रण हम ऊँची भुजा उठाकर कहते हैं।

नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू।। रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवहिं सिधारे।।___ अर्थ____ राजाओं की भुजाओं का बल चन्द्रमा है, शिवजी का धनुष राहू है। यह भारी और कठोर है, यह सबको मालूम है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी धनुष को देखकर चुपचाप लौट गए।

सोइ पुरारि कोदण्डु कठोरा। राज समाज आजु जोइ तोरा।। त्रिभुवन जय समेत बैदेही। बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही।।___ अर्थ___उसी कठोर शिव_धनुष को इस राज_समाज में आज जो तोड़ेगा, उसे ही तीनों लोकों की विजय समेत सीताजी बिना विचारे ही हठपूर्वक वरेंगी।

सुनि पन सकल भूप अभिलाषे। भटमानी अतिसय मन माखे।। परिकर बाँधि उठे अकुलाई। चले इष्टदेवन्ह सिर नाई।।___ अर्थ___ प्रण सुनकर सब राजा ललचा उठे। जो अभिमानी राजा थे वे क्रोधित हुए, कमर बाँध घबराकर उठे और अपने_ अपने इष्टदेवों को शीश नवाकर चले।

तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप, उठइ न चलहिं लजाइ। मनहुँ पाइ भट बाहुबल, अधिकु अधिकु गरुआइ।।___ अर्थ___ मूर्ख राजा झुँझलाकर धनुष पकड़ते हैं, परन्तु जब नहीं उठता तब लजाकर चल देते हैं। मानो वीरों की भुजाओं का बल पाकर धनुष अधिक अधिक भारी हो रहा है।

सब नृप भए जोगु उपहासी। जैसे बिनु बिराग सन्यासी।। कीरति बिजय बीरता भारी। चले चाप कर बरबस हारी।।___ अर्थ___ सब राजा हँसी के योग्य हो गये जैसे बिना वैराग्य के सन्यासी हँसने योग्य हो जाता है। वे उस धनुष के यश, विजय और शूरवीरता विवश होकर हार गये।

श्री हत भए हारी हियँ राजा। बैठे निज निज जाइ समाजा।। नृपन्ह बिलोकि जनकु अकुलाने। बोले बचन रोष जनु साने।।___ अर्थ___राजालोग हृदय में हार मानकर कांतिहीन हो गए और अपने_अपने समाज में जा बैठे। उन राजाओं को असफल देखकर जनकजी घबराये और ऐसे बचन बोले जो मानो क्रोध से भरे हों।

दीप दीप के भूपति नाना। आये सुनि हम जो पनु ठाना।। देव दनुज धरि मनुज सरीरा। बिपुल बीर आये रनधीरा।।___अर्थ____मैंने जो प्रण किया है उसे सुनकर द्वीप द्वीप के अनेकों राजा आये हैं तथा बहुत से रणधीर भी आये हैं।

कुअँरि मनोहर बिजय बड़ि, कीरति अति कमनीय। पावनिहार बिरंचि जनु, रचेउ न धनु दमनीय।।___ अर्थ___धनुष को तोड़कर बड़ी विजय, बहुत ही सुन्दर कीर्ति_ रूपी मनोहर राजकुमारी को पानेवाला मानो ब्रह्मा ने किसी को रचा ही नहीं।

कहहु काहि यह लाभु न भावा। काहुँ न संकर चाप चढ़ावा।। रहउ चढ़ाउब तोरब भाई। तिलु भर भूमि न सके छुड़ाई।।___ अर्थ___ कहो, किसे यह लाभ भला नहीं लगा ? किसी ने इस शिव_ धनुष को नहीं चढ़ाया। अरे भाई चढ़ाना और तोड़ना तो अलग रहा, कोई तिल भर भूमि भी नहीं छुड़ा सका।

अब जनि कोउ माखे भटमानी। बीर बिहीन मही मैं जानी।। तजहु आस निज निज गृह जाहू। लिखा न बिधि बैदेहि बिबाहु।।___ अर्थ___ अब कोई अपने को योद्धा मानकर घमण्ड मत करे। मैंने जान लिया कि पृथ्वी वीरों से खाली हो गयी है। अब आशा छोड़कर अपने_ अपने घर जाओ, ब्रह्माजी ने जानकी का विवाह नहीं लिखा।

सुकृत जाइ जौं पनु परिहरऊँ। कुअँरि कुआँरि रहउ का करऊँ।। जौं जनतेउँ बिनु भट भुबि भाई। तौं पनु करि होतेउँ न हँसाई।।___,अर्थ___ यदि अपनी प्रतिज्ञा भंग करूँ तो पुण्य क्षीण हो जाय, कन्या कुँआरी ही रहे तो क्या करूँ ? हे भाई ! यदि मैं जानता कि पृथ्वी पर कोई शूरवीर नहीं है तो प्रण करके मैं अपनी हँसी नहीं कराता।

जनक बचन सुनि सब नर नारी। देखि जानकिहि भये दुखारी।। माखे लखन कुटिल भइँ भौंहें। रदपट फरकत नयन रिसौहें।।___ अर्थ___ जनकजी के वचन सुनकर सब नर_ नारी सीताजी को देखकर दुःखी हुए। परन्तु लक्ष्मणजी को क्रोध आ गया, भौंहें टेढ़ी हो गईं, होठ फड़कने लगे, आँखें क्रोध से लाल हो गयीं।

कहि न सकत रघुबीर डर, लगे वचन जनु बान। नाइ राम पद कमल सिरु, बोले गिरा प्रमान।।___ अर्थ___ रामजी के डर से कुछ नहीं कह सकते, पर जनकजी के वचन उन्हें बाण से लगे। रामजी को चरणों में सिर नवाकर यथोचित वचन बोले___

रघुबंसिन्ह महुँ जहँ कोउ होई। तेहिं समाज अस कहइ न कोई।। कही जनक जस अनुचित बानी। विद्यमान रघुकुल मनि जानी।।___ रघुवंशियों में कोई भी जहाँ होता है उस सभा में ऐसी कठोर बात कोई नहीं कहता, जैसी अनुचित बात जनकजी ने रघुवंशमणि श्री रामचन्द्रजी को बैठे जानकर भी कही है।

सुनहु भानुकुल पंकज भानू। कहउँ सुभाउ न कछु अभिमानू।। जौं राउर अनुशासन पावौं। कन्दुक इन ब्रह्माण्ड उठावौं।।___ अर्थ___ हे सूर्यकुल_कमल_भास्कर ! सुनिए, मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, कुछ अभिमान से नहीं, यदि मैं आपकी आज्ञा पाऊँ तो गेंद के समान ब्रह्मांड को उठा लूँ।

काचे घट जिमि डारौं फोरी। सकउँ मेरु मूलक जिमि तोरी।। तब प्रताप महिमा भगवाना। का बापुरो पिनाक पुराना।। ___अर्थ___और उसे कच्चे घड़े के समान फोड़ डालूँ। मैं सुमेरु पर्वत को मूली के समान तोड़ सकता हूँ। ये बेचारा पुराना धनुष क्या वस्तु है ?

नाथ जानि अस आयसु होऊ। कौतुक करौं बिलोकिअ सोऊ।। कमल नाल जिमि चाप चढ़ावौं। जोजन सत प्रमान लै धावौं।।___ अर्थ____ हे नाथ ! ऐसा जानकर आज्ञा हो तो कुछ खेल करूँ, उसे भी देखिए। कमल की डण्डी के समान धनुष को चढाऊँ और सौ योजन तक लेकर दौड़ा चला जाऊँ।

तोरौं छत्रक दण्ड जिमि, तब प्रताप बल नाथ। जौं न करौं प्रभु पद सपथ, पुनि न धरौं धनु हाथ।।___अर्थ___ हे नाथ ! आपके प्रताप के बल से धनुष को कठफूल की डंडी के समान तोड़ डालूँ, यदि ऐसा न करूँ तो प्रभु के चरणों की सौगन्ध खाकर कहता हूँ कि फिर मैं धनुष को हाथ से न पकड़ूँगा।

लखन सकोप बचन जे बोले। डगमगानि महि दिग्गज डोले।। सकल लोग सब भूप डेराने। सिय हियँ हरषु जनकु सकुचाने।।___ अर्थ____ जब लक्ष्मणजी क्रोध के साथ यह बचन बोले तब पृथ्वी हिलने लगी और दिशाओं के हाथी काँप उठे। सब लोग और राजा डर गये। सीताजी मन में प्रसन्न हुईं और जनकजी सकुचा गये।

गुर रघुपति सब मुनि मन माहीं। मुदित भये पुनि पुनि पुलकाहीं। सयनहिं रघुपति लखनु नेबारे। प्रेम सहित निकट बैठारे।।___ अर्थ___ गुरु विश्वामित्रजी, रामजी और सब मुनिजन मन में प्रसन्न हुए और बारम्बार पुलकित होने लगे। श्रीरामजी ने इशारे से लक्ष्मणजी को मना किया और प्रेमसहित अपने पास बैठा लिया।

बिस्वामित्र समय सुभ जानी। बोले अति सनेहमय बानी।। उठहु राम भंजहु सिव चापा। मेटहु तात जनक परितापा।।___अर्थ___विश्वामित्र शुभ समय जानकर बड़ी प्रेम भरी वाणी से बोले___ हे राम ! उठो, शिव_ धनुष तोड़ो और जनकजी का संताप दूर करो।

सुनि गुर बचन चरन सिरु नावा। हरषु बिषादु न कछु उर आवा।। ठाढ़े भए उठी सहज सुभाएँ। ठवनि जुवा मृगराज लजाएँ।।__ अर्थ___ गुरु के वचन सुनकर चरणों में सिर नवाया। उनके मन में हर्ष, शोक कुछ भी न हुआ। वे अपने खड़े होने की शान से सिंह को भी लज्जित करते थे।

उदित उदयगिरि मंच पर, रघुबर बाल पतंग। बिकसे संत सरोज सब, हरषे लोचन भृंग।।___ अर्थ___उदयाचलरूपी मंच पर रामचन्द्रजी के उदय होते ही संतजन_रूपी कमल खिल गये और भौंरारूपी नेत्र प्रसन्न हुए।

नृपन्ह केरि आसा निस नासी। बचन नखत अवलीन प्रकासी।। मानी महिप कुमुद सकुचाने। कपटी भूप उलूक लुकाने।।___ अर्थ___ राजाओं की आशारूपी रात्रि नष्ट हो गई और उनके दुर्वचनरूपी नक्षत्रों का प्रकाश नहीं रहा। घमण्डी राजा कुमुद के समान सिकुड़ गये और कपट वेषधारी राजा उल्लू के समान छिप गये।

भए बिसोक कोक मुनि देवा। बरसहिं सुमन जनावहिं सेवा।।  गुरुपद बंदि सहित अनुरागा। रामु मुनिन्ह सन आयसु मागा।।___ अर्थ___ चकवारूपि मुनि और देवता शोक से रहित हुए और फूल बरसाकर अपनी सेवा जताने लगे। श्रीरामजी ने गुरु के चरणों की वन्दना कर प्रेमसहित मुनियों से आज्ञा माँगी।

सहजहिं चले सकल जग स्वामी। मत्त मंजु बर कुंजर गामी।। चलत राम सब पुर नर नारी। पुलक पूरि तन भए सुखारे।।___ अर्थ___ सब जगत के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर मतवाले गजराज के समान चाल से स्वाभाविक ही चले। रामचन्द्रजी के चलते ही नगर के सब नर_नारी रोमांच से भर गये और वे सुखी हुए।

बन्दि पितर सुर सुकृत सँभारे। जौं कछु पुण्य प्रभाउ हमारे।। तौं सिवधनु मृनाल की नाईं। तोरहुँ राम गनेस गोसाईं।।___ अर्थ____उन्होंने पितर और देवताओं की वन्दना कर अपने सत्कर्मों को याद किया कि हमारे पुण्यों की कुछ प्रभाव हो तो हे गणेश गोसाईं ! रामजी शिवजी के धनुष को कमल के डंडी के समान तोड़ डालें।

रामहिं प्रेम समेत लखि, सखिन्ह समीप बोलाई। सीता मातु सनेह बस, बचन कहइ बिलखाइ।।___ अर्थ ___ रामचन्द्रजी को प्रेमसहित देखकर और सखियों को पास बुलाकर, सीताजी की माता प्रीतिवश बिलखकर यह वचन बोलीं___


सखि सब कौतुक देख निहारे। जेउ कहावत हितू हमारे।। कोई न बुझाई कहइ गुर पाहीं। ए बालक असि हठ भलि नाहीं।।___ अर्थ___ हे सखी ! ये सब तमाशा देखनेवाले जो हमारे हितू कहलाते हैं उनमें से कोई भी गुरु विश्वामित्र से यह समझाकर नहीं कहता कि सब बालक हैं, ऐसा हठ अच्छा नहीं है।



रावन बान छुआ नहिं चापा। हारे सकल भूप करि दापा।। सो धनु राजकुँअर कर देहीं। बाल मराल कि मंदर लेहीं।।___ अर्थ___रावण और बाणासुर ने धनुष छुआ तक नहीं और सब राजालोग बल लगाकर हार गये, वही धनुष राजकुमार के हाथ में देते हैं। हंस के बच्चे क्या मन्दराचल को उठा सकते हैं?




भूप सयानप सकल सिरानी। सखि बिधि गति कछु जाति न जानी।। बोली चतुर सखी मृदु बानी। तेजबन्त लघु गनिअ न रानी।।___ अर्थ____ राजा की चतुराई जाती रही, हे सखी ब्रह्मा की गति कुछ जानी नहीं जाती। यह सुन चतुर सखी मधुर बाणी से बोली___ हे रानी ! तेजधारी लोगों को छोटा नहीं समझना चाहिए।



कहँ कुम्भज कहँ सिंधु अपारा। सोषेउ सुजसु सकल संसारा।। रबि मंडल देखत लघु लागा। उदयँ तासु त्रिभुवन तम भागा।।___ अर्थ___ कहाँ तो अगस्त्य मुनि और कहाँ अपार समुद्र ! उन्होंने उसे सोख लिया जिससे अब संसार में  उनका सुयश फैल रहा है। सूर्य_मण्डल देखने से छोटा प्रतीत होता है परन्तु उसके उदय होने से त्रिलोक का अन्धकार दूर हो जाता है।



मन्त्र परम लघु जासु बस, बिधि हरि हर सुर सर्ब। महामत्त गजराज कहुँ, बस कर अंकुस खर्ब।।___ अर्थ___मन्त्र बहुत छोटा होता है परन्तु ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सब देवता उसके अधीन हैं। महामत्तवाले गजराज को छोटा_सा अंकुश वश में कर लेता है।



काम कुसुम धनु सायक लीन्हे। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती।। देबि तजिअ संसउ अस जानी। भंजव धनुषु राम सुनु रानी।।___ अर्थ____ कामदेव ने फूलों का ही धनुष लेकर सब भवनों को अपने वश में कर रक्खा है। हे देवी ! ऐसा जानकर संशय छोड़ दो। सुनो, हे रानी ! यह रामजी धनुष को अवश्य तोडेंगे।



सखी बचन सुनी भै परतीती। मिटा बिषादु बढ़ी अति प्रीती।। तब रामहिं बिलोकि बैदेही। सभय हृदयँ बिनवति जेहि तेही।।___ अर्थ___ सखी के वचन सुन रानी को विश्वास हुआ, दुख दूर हो गया और श्रीरामजी के प्रति बहुत प्रेम बढ़ा। उसी समय रामजी को देखकर सीताजी मन में  जिस किस देवता की विनती करने लगीं।



Thursday, 12 September 2019

बालकाण्ड

कटि पट पीत धर, सुषमा सील निधान। देखि भानुकुलभूषनहिं, बिसरा सखिन्ह अपान।।___अर्थ___ सिंह की_सी पतली कमर में पीताम्बर धारण किये, शोभा और शील के भूषण श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सखियाँ अपने आप को भूल गईं।

धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।। बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू।।___अर्थ____एक चतुर सखी धीरज धरकर और हाथ पकड़कर सीताजी से बोली___ पार्वतीजी का ध्यान फिर कर लेना राजकुमारों को क्यों नहीं देख लेतीं।

सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सन्मुख दोउ रघुसिंघ निहारे।। नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।।___अर्थ____ तब सीताजी ने सकुचाकर आँखें खोलीं और अपने सामने दोनों रघुवंशी सिंहों को देखा। नख से चोटी तक श्रीरामचन्द्रजी की शोभा देखकर और पिता का पन  स्मरण करके उनका मन बहुत घबराया।

पर बस सखीन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता।। पुनि आउब एहि बेरिया काली। अस कहि मन बिहँसि एक आली।।___ अर्थ___ सखियों ने जब सीताजी को विवश देखा तब सब डरकर कहने लगीं___ बहुत देर हो गयी है। कल इसी समय फिर आवेंगी ऐसे कहकर एक सखी मन मेंहँसी।

गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयऊ बिलम्बु मातु भय मानी।। धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितु बस जाने।।___ अर्थ___ सखी की गूढ़ बाणी सुनकर सीताजी लज्जित हुईं और बिलम्ब हुआ जानकर माता ने डर माना। फिर धीरज कर रामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं और अपने को पिता के वश में जानकर लौटीं।

देखन मिस मृग बिहग तरु, फिरइ बहोरि बहोरि। निरखि निरखि रघुवीर छबि, बाढ़इ प्रीति न थोरि।।___ अर्थ___ पशु, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बारम्बार लौटती हैं और रामचन्द्रजी की छबि को देखकर उनकी प्रीति बहुत बढ़ती जाती है।

जानि कठिन सिब चाप बिसूरति। चलि राखि उर स्यामल मूरति।। प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी।।__ अर्थ___शिवजी के धनुष को कठोर जानकर सीताजी सुख पाती हुईं श्रीरामजी की साँवली मूर्ति हृदय में रखकर चलीं। प्रभु ने जब सुख, स्नेह, शोभा और गुण की खान जानकी को जाते हुए जाना।

परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही।। गई भवानी भवन बहोरी। बन्दि चरन बोली कर जोरी।।___ अर्थ____ तब पूर्ण प्रेमरूपी उत्तम स्याही से अपने हृदय पट पर उनका स्वरूप चित्रित कर लिया। सीताजी फिर पार्वतीजी के मन्दिर में गईं और चरणों में प्रणाम कर हाथ जोड़कर बोलीं___

जयजयजय गिरिराजकिसोरी। जय महेस मुख चन्द्र चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगतजननि दामिनि दुति गाता।।___ अर्थ___हे गिरिराजकिशोरी पार्वती ! आपकी जय हो ! हे महादेवजी के मुखरूपी चन्द्रमा की चकोरी ! आपकी जय हो। हे हाथी के मुखवाले गणेशजी और छ: मुखवाले स्वामी कार्तिकेयजी की माता ! हे जगदम्बा ! हे बिजली के समान प्रकाशित शरीरवाली ! आपका जय हो।

नहिं तव आदि  मध्य अनुमाना। अमिति प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभवकारिनि। बिश्वबिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।___अर्थ___आपका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, वेद भी आपकी महिमा को नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करनेवाली ! आपकी जय हो।


पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम रन रेख। महिमा अमित न सकहि कहि, सहस सारदा सेष।।___ अर्थ____ हे माता ! पति को देवता माननेवाली श्रेष्ठ स्त्रियों में आपकी पहली गिनती है। हजारों सरस्वती और शेषजी भी आपकी अनंत महिमा का वर्णन नहीं कर सकते।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पियारी।। देबि पूजी पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।____अर्थ___ हे वर देनेवाली ! हे त्रिपुरारी शिवजी की प्रियतमा ! आपकी सेवा करने से चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवि ! आपके चरण_कमल पूजने से देवता, मनुष्य और मुनि सब सुखी होते हैं।


मोर मनोरथ जानहु नीके। बसहु सदा उरपुर सबही के।। कीन्हेहु प्रकट न कारन तेहीं। असि कहि चरण गहे बैदेही।।___ अर्थ___ मेरी मनोकामना आप भली_भाँति जानती हैं क्योंकि आप सदैव सबही के मन मन्दिर में वास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर सीता ने उमा के चरण पकड़ लिये।


बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।।___ अर्थ___ श्रीपार्वतीजी सीताजी की विनती और प्रेम के वश में हो गईं। उनकी माला खसक पड़ी और मूर्ति मुसकाई। उसको सीताजी ने आदरसहित सिर पर धारण किया। पार्वतीजी का हृदय आनन्द से भर गया और बोलीं__

सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो वर मिलेउ जाहिं मनु राचा।।___ अर्थ____ हे सीता ! हमारी सच्ची असीस सुनो, तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। नारदजी का वचन पवित्र और सत्य है वही वर तुम्हें मिलेगा जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है।

मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो। करुनानिधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषी अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मन्दिर चली।।___ अर्थ___ जिसमें तुम्हारा मन लगा है, वही स्वभाव से ही सुन्दर साँवला वर तुमको मिलेगा। वह करुणानिधान तथा सर्वज्ञ हैं, तुम्हारे सील और स्नेह को जानते हैं। इस भाँति पार्वतीजी की असीष सुनकर सीताजी हृदय में प्रसन्न होती हुईं भवानी को पूजकर अपने घर को चलीं।

जानि गौरि अनुकूल, सिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।___ अर्थ___ पार्वतीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के हृदयँ में जो आनन्द हुआ वह कहा नहीं जा सकता। सुन्दर मंगलसूचक बायें अंग फरकने लगे।

हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुरु समीप गवने दोउ भाई।। राम कहा सब कौसिक पाहीं। सहज सुभाऊ न छल नाहीं।।___ अर्थ___ सीताजी की सुन्दरता को हृदय में सराहना करते हुए दोनों भाई गुरु के पास गये। रामचन्द्रजी ने सब बात विश्वामित्रजी से कह दिया, क्योंकि वे सरल स्वभाव के हैं, छल तो उन्हें छूता भी नहीं।

सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्हि दीन्ही। सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।___ अर्थ___ फूल पाकर मुनि ने पूजा की। फिर दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिये कि तुम्हारे मनोरथ सफल हों। यह सुनकर श्रीराम_ लक्ष्मण सुखी हुए।

करि भोजनु मुनिबर विग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी।। बिगत दिवस गुरु आयसु पाई। सन्ध्या करन चले दोउ भाई।।___ अर्थ___भोजन करके ज्ञानी मुनि कुछ प्राचीन कथा कहने लगे। दिन बीत जाने पर मुनि की आज्ञा पाकर दोनों भाई सन्ध्या करने चले।

प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुख पावा। बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं।।___ अर्थ____ पूर्व दिशा से सुन्दर चन्द्रमा उदय हुआ। श्रीरामजी ने उनको सीताजी के मुख के समान देखकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि सीताजी के मुख के समान यह चन्द्रमा नहीं है।

जनमु सिंधु पुनि बन्धु बिशप, दीन मलीन सकलंक।। सिय सुख समता पाव किमि, चन्दु बापुरो रंक।।___ अर्थ___ जन्म खारे समुद्र से, फिर विष इसका भाई, दिन में तेजहीन, ऐसा बेचारा चन्द्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे पा सकता है।

घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसई राहु निज संधिहिं पाई।। कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चन्द्रमा तोही।।___अर्थ___फिर यह नित्य घटता बढ़ता है, बिरही लोगों को दुःख देता है, राहु इसे अपनी संधि में पाकर ग्रस लेता है। यह चकवे को दुःख देनेवाला और कमल का बैरी है। हे चन्द्रमा ! तुझमें बहुत से अवगुण हैं।

बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होहिं दोषु बर अनुचित कीन्हे।। सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी।।___ अर्थ___ सीताजी के मुख की तुमसे उपमा देने में अनुचित कर्म का बड़ा भारी दोष होगा। इस प्रकार सीताजी के मुख की सोभा चन्द्रमा के बहाने से वर्णन कर, बहुत रात हो गई जानकर वे गुरु के पास चले।

करि मुनि चरन सरोज प्रणामा। आयसु पाइ कीन्ह विश्रामा। बिगत निसा रघुनायक जागे। बन्धु बिलोकि कहन अस लागे।।___ अर्थ___ मुनि के चरणकमलों में प्रणाम कर, आज्ञा पाकर उन्होंने विश्राम किया। रात हारने पर श्रीरामचन्द्रजी जागे और भाई को देखकर ऐसा कहने लगे___


उभय अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।। बोले लखन जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी।।___अर्थ____ हे तात ! देखो, अरुणोदय हो गया जो कमल, चकवा और संसार को सुख देनेवाला है। यह सुनकर लक्ष्मणजी हाथ जोड़कर प्रभु के प्रभाव को प्रकट करनेवाली मधुर वाणी बोले__

अरुणोदय सकुचे कुमुद, उडगन जोति मलीन। जिमि तुम्हार आगमन सुनि, भए नृपति बलहीन।।___ अर्थ___ जैसे अरुणोदय होने से कुमुदिनी सकुचा गई है और तारागणों की ज्योति मन्द पड़ गयी है, इसी प्रकार आपका आना सुनकर राजालोग निर्बल हो गये हैं।

नृप सब नखत करहिं उजियारी। टारि न सकहिं चापतम भारी।। कमल कोक मधुकर खगनाना। हरषे सकल निसा अवसाना।।___अर्थ___ सब राजालोग तारों के समान उजाला कर तो हैं परन्तु वे धनुषरूपी घोर अन्धकार को नहीं मिटा सकते। कमल, चकवा, भौंरे और अनेक पक्षी रात बीत जाने पर जैसे प्रसन्न हो गये हैं,

ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटे धनुष सुखारे।। उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा।।___अर्थ____ इसी प्रकार हे स्वामी ! आपके सब भक्त धनुष टूटने पर सुखी होंगे। सूर्य के उदय होने से बिना परिश्रम अन्धकार का नाश हो गया, तारे छिप गए, संसार में तेज का प्रकाश फैल गया।

रवि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया।। तव भुजबल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।।___ अर्थ____ हे रघुनाथजी ! सूर्य ने अपने उदय होने के बहाने से आपका प्रताप सब राजाओं को दिखलाया है। आपकी भुजाओं के बल को प्रकट करने के लिये ही धनुष तोड़ने की प्रथा चली है।

बन्धु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।। नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आये। चरन सरोज सुभग सिर नाये।।___अर्थ___भाई के वचन सुनकर प्रभु मुसकाए। फिर शौच क्रिया से निवृत होकर स्वभाव से ही पवित्र रामजी ने स्नान किया।


सतानन्द तब जनक बोलाये। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाये।। जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिये दोउ भाई।।___ अर्थ____ तब राजा जनकजी ने सतानन्दजी को बुलाया और तुरन्त विश्वामित्र मुनि के पास भेजा। उन्होंने आकर जनकजी की विनती सुनाई। विश्वामित्रजी ने प्रसन्न होकर दोनों भाइयों को बुलाया।

सतानन्द पद बन्दि प्रभु, बैठे गुरु पहिं जाइ। चलहु तात मुनि कहें तब, पठवा जनक बोलाइ।।___अर्थ___सतानन्दजी के चरणो में प्रणाम कर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी गुरु के पास जा बैठे। तब मुनि ने कहा___ हे तात ! चलो राजा जनकजी ने बुलावा भेजा है।

सीय स्वयंवर देखिय जाई। ईस काहि धौं देइ बड़ाई।। लखन कहा जग भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जा पर होई।।___अर्थ___ अब सीताजी का स्वयंवर जाकर देखना चाहिये, ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। लक्ष्मणजी ने कहा___ हे नाथ ! वही यश का पात्र होगा जिस पर आपकी कृपा होगी।

हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्ह असीस सबहिं सुखु मानी।। पुनि मुनिबृन्द समेत कृपाला। देखन चले धनुष मखसाला।।___अर्थ___सब मुनि सुन्दर वाणी सुनकर प्रसन्न हुए। सबने खुश होकर आशीर्वाद दिया। फिर मुनिमण्डली सहित कृपालु रामजी धनुष_यज्ञशाला देखने चले।

रंगभूमि आये दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।। चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।।___अर्थ____रंगभूमि में दोनों भाई आये हैं, यह समाचार जब नगरवासियों ने पाया तो सब बालक, युवा, बूढ़े_नर, सभी घर का राम छोड़कर चले।

देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिये हँकारी।। तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहु सब काहू।।___ अर्थ____ जनकजी ने देखा कि बड़ी भीड़ हो गयी है, तब सब सेवकों को बुलाकर कहा___ तुम सब तुरन्त लोगों के पास जाओ और सबको यथायोग्य आसन दो।

कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह, बैठारे नर नारि। उत्तम मध्यम नीच लघु, निज निज थल अनुहारि।।___ अर्थ___उन्होंने विनयपूर्वक मधुर वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच, लघु सब स्त्री_ पुरुषों को अपने_अपने योग्य स्थान पर बैठाया।

राजकुँवर तेहि अवसर आये। मनहुँ मनोहरता तन छाये।। गुन सागर नागर बर बीरा। सुन्दर स्यामल गौर सरीरा।।___ अर्थ___उसी समय राजकुमार आ पहुँचे। मानो मनोहरता उनके शरीरों पर छायी हो। वे गुणों के समूह, चतुर, शूरवीरों में श्रेष्ठ, सुन्दर साँवेर शरीरवाले हैं।

राज समाज विराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।। जिन्हकें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।___ अर्थ___ वे राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हैं जैसे तारागणों में दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, उन्होंने प्रभु की मूर्ति वैसी ही देखी।


देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।। डरे कुटिल नृप प्रभुहिं निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।।___ अर्थ___बड़े रणधीर राजा प्रभु को ऐसा देख रहे हैं मानो वीर रस शरीर धारण किये हैं। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डरे, मानो भयानक मूर्ति हो।

रहे असुर छल जो नृप वेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।। पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषण लोचन सुखदाई।।___अर्थ___ जो असुर छल से राजा के वेष में वहाँ बैठे थे, उन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखा। पुरबासियों ने दोनों भाइयों को मनुष्यों में शिरोमणि और नयनों को सुख देनेवाला देखा।

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ, निज निज रुचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि, मूरति परम अनूप।।___ अर्थ____ स्त्रियाँ हृदय में प्रसन्न हो अपनी_ अपनी रुचि के अनुसार देख रही हैं। मानो श्रृंगाररस बहुत सुन्दर मूर्ति धारण किए शोभायमान हैं।

बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीखा। बहु मुख पग लोचन सीसा।। जनक जाति अवलोकहिं कैसे। सजन लगे प्रिय लागहिं जैसे।___अर्थ___पण्डितों ने प्रभु को विराट रूप में देखा जिसके बहुत से मुख, चरण, हाथ नेत्र और सिर हैं। जनकजी के सजातियों ने अपने सगे प्रियजन के समान देखा।

सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।। जोगिन्ह परम तत्वमय भाषा। सान्त सुद्ध सम सहज प्रकासा।।___अर्थ___ जनक सहित रानियाँ उनको पुत्र के समान देखने लगीं, उनकी प्रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। योगियों को वे शान्त, शुद्ध एकरस और स्वभाव से ही प्रकाशित परम तत्व को रूप में दिखे।

हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।। रामहिं चितव भाँय जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहीं कथनीया।।___अर्थ___ हरिभक्तों को दोनों भाई इष्टदेव के समान सब सुख देनेवाले जान पड़े। सीताजी श्रीरामचन्द्रजी को जिस भाव से देख रही थी, वह स्नेह और सुख तो कहा ही नहीं जाता।

उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।। एहि बिधि रहा जाहि जिय भाऊ। तेहिं तस देखे कोसलराऊ।।___ अर्थ___वे उस स्नेह और सुख का हृदय में अनुभव तो करती हैं परन्तु उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि किस प्रकार से उसको कहे ? जिसका जैसा भाव था उसने श्रीरामचन्द्रजी को वैसा ही देखा।

राजत राज समाज महुँ, कोसलराज किसोर। सुन्दर स्याम गौर तन, बिस्व बिलोचन चोर।।___ अर्थ___साँवले और गोरे शरीरवाले और संसार के नेत्रों को चुरानेवाले अयोध्यानरेश के कुमार राजसभा में सुशोभित हैं।