Monday, 20 July 2020

बालकाण्ड

सुनि बोले गुर अति सुखु पाई। पुन्य पुरुष कहुँ महि सुख छाई।। जिमि सरिता सागर महुँ जाहीं। जद्यपि ताहि कामना नाही।।__अर्थ__सब समाचार सुनकर और अत्यन्त सुख पाकर गुरु बोले___पुण्यात्मा पुरुष के लिये पृथ्वी सुखों से छायी हुई है। जैसे नदियाँ समुद्र में जाती हैं, यद्यपि समुद्र को नदी की कामना नहीं होती।





तिमि सुख संपति बिनहिं बोलाएँ। धरमसील पहिं जाहिं सुभाएँ।। तुम्ह गुर बिप्र धेनु सुर सेबी। तसि पुनीत कौसल्या देबी।।__अर्थ__वैसे ही सुख और सम्पत्ति बिना ही बुलाये स्वाभाविक ही धर्मात्मा पुरुष के पास जाती है। तुम जैसे गुरु ब्राह्मण, गाय और देवता की सेवा करनेवाले हो, वैसी ही पवित्र कौसल्या देवी भी हैं।





सुकृति तुम्ह समान जग माहीं। भयउ न है कोउ होनेउ नाहीं।। तुम्ह ते अधिक पुन्य बड़ काकें। राजन राम सरिस सुत जाकें।।___अर्थ___तुम्हारे समान पुण्यात्मा जगत् में न कोई हुआ् न है और न होने का ही है।। हे राजन् ! तुमसे अधिक पुण्य और किसका होगा, जिसके राम सरीखे पुत्र हैं।





बीर बिनीत धरम ब्रत धारी। गुन सागर बर बालक चारी। तुम्ह कहुँ सर्ब काल कल्याना। सजहु बरात बजाइ निसाना।___अर्थ___और जिसके चारों बालक वीर, विनम्र, धर्म का व्रत धारण करनेवाले और गुणों के सुन्दर समुद्र हैं। तुम्हारे लिये सभी कालों में कल्याण है। अतएव डंका बजाकर बरात सजवाओ।





चलहु बेगि सुन गुर बचन भलेहि नाथ सिरु नाइ। भूपति गवने भवन तब दूतन्ह बासु देवाइ।।___अर्थ___और जल्दी चलो। गुरुजी के ऐसे वचन सुनकर, हे नाथ ! बहुत अच्छा, कहकर और सिर नवाकर तथा दूतों को डेरा दिलवाकर राजा महल में गये।





राजा सबु रनिवास बोलाई। जनक पत्रिका बाचि सुनाई।। सुनि संदेसु सकल हरषानीं। अपर कथा सब भूप बखानीं।।___अर्थ___राजा ने सारे रनिवास को बुलाकर जनकजी की पत्रिका बाँचकर सुनायी। समाचार सुनकर सब रानियाँ हर्ष से भर गयीं। राजा ने फिर दूसरी सब बातों का ( जो दूतों के मुख से सुनी थीं ) वर्णन किया।





प्रेम प्रफुल्लित राजहिं रानी। मनहुँ सिखिनि सुनि बारिद बानी।। मुदित असीस देहिं गुर नारीं। अति आनंद मगन महतारी।।___अर्थ__प्रेम में प्रफुल्लित हुई रानियाँ ऐसी सुशोभित हो रही हैं जैसे मोरनी बादलों की गरज सुनसुनकर प्रफुल्लित होती हैं। बडी_बूढी [ अथवा गुरुओं की ] स्त्रियाँ प्रसन्न होकर आशीर्वाद दे रही हैं माताएँ आनन्द में मग्न हैं।



लेहिं परस्पर अति प्रिय पाती। हृदयँ लगाइ जुडावहिं छाती।। राम लखन कै कीरति करनी। बाहिं बार भूपबर बरनी।।_अर्थ_उस अत्यन्त प्रिय पत्रिका को आपस में लेकर सब हृदय से लगाकर छाती शीतल करती  है। राजाओं में श्रेष्ठ दशरथजी ने श्रीराम लक्ष्मण की कीरती और करनी का बार बार वर्णन किया।





सुनि प्रसादु कहि द्वार सिधाए। रानिन्ह तब महिदेव बोलाए। दिए दान आनन्द समेता। चले विप्रवर आसिष देता।।__अर्थ__’यह सब मुनि की कृपा है’ ऐसा कहकर वे बाहर चले आये। तब रानियों ने ब्राह्मणों को बुलाया और आनन्दसहित उन्हें दान दिये। श्रेष्ठ ब्राह्मण आशीर्वाद देते हुए चले।





जाचक लिये हँकारि दीन्ही निछावरि कोटि बिधि। चिरु जीवहुँ सुत चारि चक्रबर्ति दशरथ के।।__अर्थ___फिर भिक्षुकों को बुलाकर करोडों प्रकार की निछावरें उनको दीं। ‘चक्रवर्ती महाराज दशरथ के चारों पुत्र चिरंजीवी हों।‘





कहत चले पहिरें पट नाना। हरषि हने गहगहे निसाना।। समाचार सब लोगन्ह पाए। लागे घर घर होन बधाए।।_अर्थ_यों कहते हुए वे अनेक प्रकार सुन्दर वस्त्र पहन_पहनकर चले। आनन्दित होकर नगाड़ेवालों ने जोर से नगाड़ों पर चोट लगायी। सब लोगों ने जब यह समाचार पाया, तब घर_घर बधावे होने लगे।




भुवन चारिदस भरा उछाहू।  जनकसुता रघुबीर बिआहू।। सुनि सुभ कथा लोग अनुरागे। मग गृह गलीं सँवारन लागे।।_अर्थ_चौदहों लोकों में उत्साह भर गया कि जानकीजी और श्रीरघुनाथजी का विवाह होगा। यह शुभ समाचार पाकर लोग प्रेममग्न हो गये और रास्ते, घर तथा गलियाँ सजाने लगे।





जद्यपि अवध सदैव सुहावनी। रामपुरी मंगलमय पावनि।। तदपि प्रीति कै प्रीति सुहाई। मंगल रचना रची बनाई।।_अर्थ_यद्यपि अयोध्या सदा सुहावनी है, क्योंकि यह श्रीरामजी की मंगलमयी पवित्र पुरी है, तथापि प्रीति_पर_प्रीति होने होने से वह सुन्दर मंगलरचना से सजायी गयी।





ध्वज पताक पट चामर चारू। छावा परम बिचित्र बजारू।। कनक कलस तोरन मनि जाला। हरद दूध दधि अच्छत माला।।_अर्थ_ ध्वज, पताका, परदे और सुन्दर चँवरों से सारा बाजार बहुत ही अनूठा छाया हुआ है। सोने के कलश, तोरण, मणियों की झालरें, हल्दी, दूब, दही अक्षत और मालाओं से_





मंगलमय निज निज भवन लोगन्ह रचे बनाइ। बीथीं सीचीं चतुरसम चौकें चारु पुराइ।।_अर्थ_लोगों ने अपने_अपने घरों को सजाकर मंगलमय बना लिया। गलियों को चतुरसम से सींचा और [ द्वारों पर ] सुन्दर चौक पुराये। [ चन्दन, केशर, कस्तूरी और कपूर से बने एक सुगन्धित द्रव्य को चतुरसम कहते हैं।





जहँ तहँ जूथ मिलि भामिनि। सजि नव सप्त सकल दुति दामिनि।। बिधुबदनीं मृग सावक लोचनि। निज सरूप रति मानु बिलोचनि।।_अर्थ_बिजली_की_सी कान्तिवाली चन्द्रमुखी, हरिन के बच्चे के_से नेत्रवाली और अपने सुन्दर रूप से कामदेव की स्त्री रति के अभिमान को छुडानेवाली सुहागिन स्त्रियाँ सभी सोलहों श्रृंगार सजकर, जहाँ_तहाँ झुंड_की_झुंड मिलकर,





गावहिं मंगल मंजुल बानीं। सुनि कलरव कलकंठि लजानीं। भूप भवन किमि जाइ बखाना। बिस्व बिमोहन रचेउ बिताना।।__अर्थ__मनोहर वाणी से मंगलगीत गा रही हैं, जिनके सुन्दर स्वर को सुनकर कोयलें भी लजा जाती हैं। राजमहल का वर्णन कैसे किया जाय, जहाँ विश्व को विमोहित करनेवाला मण्डप बनाया गया है।





सोभा दसरथ भवन कइ को कबि बरनै पार। जहाँ सकल सुर सीस मनि राम लीन्ह अवतार।।__अर्थ__दशरथ के शोभा का वर्णन कौन कवि कर सकता है, जहाँ समस्त देवताओं के शिरोमणि रामचन्द्रजी ने अवतार लिया है।





भूप भरत पुनि लिए बोलाई। हय गय स्यंदन साजहु जाई।। चलहु बेगि रघुबीर बराता। सुनत पुलक पूरे दोउ भ्राता।।_अर्थ_फिर राजा ने भरतजी को बुला लिया और कहा कि जाकर घोडे, हाथी और रथ सजाओ, जल्दी रामचन्द्रजी की बरात में चलो। यह सुनते ही दोनों भाई ( भरतजी और शत्रुध्नजी ) आनन्दित हो गये।





भरत सकल साहनी बोलाए। आयसु दीन्ह मुदित उठि धाए।। रुचि रुचि जीन तुरग तिन्ह साजे। बरन बरन बर बाजि बिराजे।।_अर्थ_भरतजी ने सब साहनी ( घुडसाल के अध्यक्ष ) बुलाये और उन्हें [ घोडों को सजाने की ] आज्ञा दी, वे प्रसन्न होकर उठ दौडे। उन्होंने रुचि के साथ ( यथायोग्य ) जीनें कसकर घोडे सजाये। रंग रंग के उत्तम घोडे शोभित हुए।



सकल सुठि चंचल करनी। अय इव जरत धरत पग धरनी।। नाना जाति न जाहिं बखाने। निदरि पवनु जनु चहत उडाने।।_अर्थ_सब घोडे बडे ही सुन्दर और चंचल करनी ( चाल ) के हैं। वे धरती पर ऐसे पैर रखते हैं जैसे जलते हुए लोहे पर रखते हों। अनेकों जाति के घोडे हैं, जिनका वर्णन नहीं हो सकता। [ ऐसी तेज चाल के हैं ] मानो हवा का निरादर करके उड़ना  चाहते हैं।





तिन्ह सब छयल भए असवारा। भरत सरिस बय राजकुमारा।। सब सुंदर सब भूषनधारी। कर सर चाप तून कटि भारी।।_अर्थ_उन सब  घोडों पर भरतजी के समान अवस्थावाले सब छैल_छबीले राजकुमार सवार हुए। वे सभी सुन्दर हैं और आभूषण धारण किये हुए हैं।





छरे छबीले छयल सब सूर सुजान नबीन। जुग पदचर असवार प्रति जे असिकला प्रबीन।।_अर्थ_सभी चुने हुए छबीले छैल, शूरवीर, चतुर और नवयुवक हैं। प्रत्येक सवार के साथ दो पैदल सिपाही हैं, जो तलवार चलाने की कला में निपुण हैं।





बाँधे बिरद बीर रन गाढे। निकसि भए पुर बाहर ठाढे।। फेरहिं चतुर तुरग गति नाना। हरषहिं सुनि सुनि पनव निसाना।।_अर्थ_शूरता का बाना धारण किये हुए रणधीर वीर सब निकलकर नगर के बाहर आ खड़े हुए। वे चतुर अपने घोडों को तरह_तरह की चालों से फेर रहे हैं और भेरी कथा नगाडे की आवाज सुन_सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं।





रथ सारथिन्ह बिचित्र बनाए। ध्वज पताक मनि भूषन लाए।। चवँर चारु किंकिनि धुनि करहीं। भानु जान सोभा अपहरहीं।।_अर्थ_सारथियों ने ध्वजा, पताका, मणि और आभूषणों को लगाकर रथों को बहुत बिलक्षण बना दिया है। उनमें सुन्दर चँवर लगे हैं और घंटियाँ सुन्दर शब्द कर रही हैं। वे रथ इतने सुन्दर हैं मानो सूर्य के रथ की शोभा छीने लेते हैं।





सावँकरन अगनित हय होते। ते तिन्ह रथन्ह सारथि जोते।। सुंदर सकल अलंकृत सोहे। जिन्हहि बिलोकत मुनि मन मोहे।।_अर्थ_अगणित श्यामकर्ण घोडे थे। उनको सारथियो ने उन रथों में जोत दिया है, जो सभी देखने में सुन्दर और गहनों से सजाये हुए सुशोभित हैं, और जिन्हें देखकर मुनियों के मन भी मोहित हो जाते हैं।





जे जल चलहिं थलहिं की नाईं। टाप न बूड़ बेग अधिकाई।। अस्त्र सस्त्र सबु साज बनाई। रथी सारथिन्ह लिए बोलाई।।_अर्थ_जो जल पर भी जमीन की तरह ही चलते हैं। नवेग की अधिकता से उनकी टाप पानी में नहीं डूबती। अस्त्र_शस्त्र और सब साज सजाकर सारथियों ने रथियों को बुला लिया।




चढ़ि चढ़ि रथ बाहेर नगर लागी जुरन बरात। होत सगुन सुंदर सबहि जो जेहि कारज जात।।_अर्थ_रथों पर चढ़चढ़कर बारात नगर के बाहर जुटने लगी। जो जिस काम के लिये जाता है, सभी को सुन्दर शकुन होते हैं।





कलित करिबरन्हि परीं अँबारीं। कहिं न जाहिं जेहि भाँति सँवारी।। चले मत्त गज घंट बिराजी। मनहुँ सुभग सावन घन राजी।।_अर्थ_ श्रेष्ठ हाथियों पर अंबारियाँ पड़ी हैं। वे जिस प्रकार सजायी गयी थीं, जो कहा नहीं जा सकता। मतवाले हाथी घंटों से सुशोभित होकर ( घंटे बजाते हुए ) चले, मानो सावन के सुन्दर बादलों के समूह [ गरजते हुए ] जा रहे हों।




 बाहन अपर अनेक बिधाना। सिबिका सुखद सुखासन जाना।। तिन्ह चढ़ि चले बिप्रबर वृंदा। जनु तनु धरे सकल श्रुति छंदा।।_अर्थ_सुंदर पालकियाँ, सुख से बैठने योग्य तामजान ( जो कुर्सीनुमा होते हैं ) और रथ आदि और भी अनेकों प्रकार की सवारियाँ हैं। उनपर श्रेष्ठ ब्राह्मणों के समूह चढ़कर चले, मानो सब वेदों के छन्दही शरीर धारण किये हुए हों।





मागध सूत बंदि गुननायक। चले जान चढ़ि जो जेहि लायक।। बेसर ऊँट बृषभ बहु जाती। चले बस्तु भरि अगनित भाँती।।_ अर्थ_मागध, सूत, भाट और गुण गानेवाले सब, जो जिस योग्य थे, वैसी सवारी पर चढकर चले। बहुत जातियों के ऊँट, बैल और खच्चर असंख्यों प्रकार की वस्तुएँ लाद_लादकर चले।





कोटिन्ह काँवरि चले कहारा। बिबिध बस्तु को बरनै पारा।। चले सकल सेवक समुदाई। निज निज साज समाज बनाई।।_अर्थ_कहार करोडो़ं काँवरें लेकर चले। उनमें अनेकों प्रकारकी इतनी वस्तुएँ थीं कि जिनका वर्णनकौन  कर सकता है। सब सेवकों के समूह अपना_अपना साज_समाज बनाकर चले।





सब कें उदर निर्भर हरषु पूरित पुलक सरीर। कबहिं देखिबे नयन भरि रामु लखनु दोउ बीर।।_अर्थ_सबके हृदय में अपार हर्ष है और शरीर पुलकित हैं। ( सबको एक ही लालसा लगी है कि ) हम श्रीराम_लक्षमण दोनों भाइयों को नेत्र भरकर कब देखेंगे।





गरजहिं गज घंटा धुनि घोरा। रथ रव बाजि हिंस चहु ओरा।। निदरि घनहि घुम्र्मरहिं निसाना। निज पराइ कछु सुनिअ न काना।।_अर्थ_हाथी गरज रहे हैं,उनके घंटों की भीषण ध्वनि हो रही है। चारों ओर रथों की घरघराहट और घोड़ो़ं की हिनहिनाहट हो रही है। बादलों का निरादर करते हुए नगाड़े घोर शब्द कर रहे हैं। किसी को अपनी परायी कोई बात कानों से सुनाई नहीं देती।





महा भीर भूपति के द्वारें। रज होइ जाइ पषान पबारें।। चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नारीं। लिएँ आरती मंगल थारीं।।_अर्थ_राजा दशरथ के द्वार पर इतनी भारी भीड़ हो रही है कि वहाँ पत्थर फेंका जाय तो भी वह पिसकर धूल हो जाय। अटारियों पर चढ़ी स्त्रियाँ मंगल थालों में आरती लिये देख रही हैं।





गावहिं गीत मनोहर नाना। अति आनंद न जाइ बखाना।। तब सुमंत्र दुइ स्यंदन साजी। जोते रबि हय निंदक बाजी।।_अर्थ_और नाना प्रकार के मनोहर गीत गा रही हैं। उनके अत्यन्त आनन्द का बखान नहीं हो सकता। तब सुमन्त्रजी ने दो रथ सजाकर उनमें सूर्य के घोडों को भी मात करनेवाले घोड़े जोते।





दोउ रथ रुचिर भूप पहिं आने। नहिं सारद पहिं जाहिं बखाने।। राज समाजु एक रथ साजा। दूसर तेज पुंज अति भ्राजा।।_अर्थ_दोनों सुन्दर रथ वे राजा दशरथ के पास ले आये, जिनकी सुन्दरता का वर्णन सरस्वती से भी नहीं हो सकता। एक रथ पर राजसी समान सजाया गया। और दूसरा जो तेज का पुंज और अत्यन्त ही शोभायमान था,





तेहिं रथ रुचिर बसिष्ठ कहुँ हरषि चढ़ाइ नरेसु। आपु चढ़ेउ स्यंदन सुमिरि हर गुर गौरि गनेसु।।_अर्थ_उस सुन्दर रथ पर राजा वसिष्ठजी को हर्षपूर्वक चढ़ाकर फिर स्वयं शिव, गुरु, गौरी ( पार्वती ) और गणेशजी का स्मरण करके [ दूसरे ] रथ पर चढ़े।





सहित बसिष्ठ सोह नृप कैसें। सुर गुर संग पुरंदर जैसें।। करि कुल रीति बेद बिधि राऊ। देखि सबहिं सब भाँति बनाऊ।।_अर्थ_वसिष्ठजी के साथ [ जाते हुए ]  राजा दशरथजी कैसे शोभित हो रहे हैं, जैसे देवगुरु वृहस्पतिजी के साथ इन्द्र हों। वेद की विधि से और कुल की रीति के अनुसार सब कार्य करके तथा सबको सब प्रकार से सजे देखकर,





 सुमिरि रामु गुर आयसु पाई। चले महीपति संख बजाई।। हरषे बिबुध बिलोकि बराता। बरसहिं सुमन सुमंगल दाता।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके, गुरु का आज्ञा पाकर पृथ्वीपति दशरथजी शंख बजाकर चले। बारात देखकर देवता हर्षित हुए और सुन्दर मंगलदायक फूलों की वर्षा करने लगे।





भयउ कोलाहल हय गय गाजे। ब्योम बरात बाजने बाजे ।। सुर नर नारी सुमंगल गाईं। सरस राग बाजहिं सहनाई।।_अर्थ_बड़ा शोर मच गया, घोड़े और हाथी गरजने लगे। आकाश में और बरात में [ दोनों जगह ] बाजे बजने लगे। देवांगनाएँ और मनुष्यों की स्त्रियाँ सुंदर मंगलगान करने लगे। देवांगनाएँ और मनुष्षों की स्त्रियाँ सुन्दर मंगलगान करने लगीं और रसीले राग से शहनाइयाँ बजने लगीं।





घंट घंटि धुनि बरनि न जाहीं। सरव करहिं पाइक फहराहीं।। करहिं बिदूषक कौतुक नाना। हास कुसल कल गान सुजाना।।_अर्थ_ घंटे_घंटियों की ध्वनि का वर्णन नहीं हो सकता। पैदल चलनेवाले सेवकगण अथवा पट्टेबाज कसरत कर रहे हैं और फहरा रहे हैं ( आकाश में ऊँचे उछलते हुए जा रहे हैं )। हँसी करने में निपुण और सुन्दर गाने में चतुर बिदूषक ( मसखरे ) तरह_तरह के तमाशे कर रहे हैं।






तुरग नचावहिं कुँअर बर अकनि मृदंग निसान। नागर नट चितवहिं चकित डगहिं न ताल बँधान।।_अर्थ_सुन्दर राजकुमार मृदंग और नगाड़े का शब्द सुनकर घोडो़ं को उन्हीं के अनुसार इस प्रकार नचा रहे है कि वे ताल के बंधान से जरा भी डिगते नहीं हैं। चतुर नट चकित होकर यह देख रहे हैं।





बनइ न बरनत बनी बराता। होहिं सगुन सुंदर सुखदाता।। चारा चाषु बाम दिसि लेई। मनहुँ सकल मंगल कहि देई।।_अर्थ_बारात ऐसी बनी है कि उसका वर्णन करते नहीं बनता। सुन्दर शुभदायक शकुन हो रहे हैं। नीलकंठ पक्षी बायीं ओर चारा ले रहा है, मानो संपूर्ण मंगलों की सूचना दे रहा हो।





दाहिन काग सुखेत सुहावा। नकुल दरसु सब काहु पावा।। सानुकूल बह त्रिबिध बयारी। सघट सबाल आव बर नारी।।_अर्थ_दाहिनी ओर कौवा सुन्दर खेत में शोभा पा रहा है। नेवले का दर्शन भी सब किसी ने पाया। तीनों प्रकार की ( शीतल, मन्द, सुगन्धित ) हवा अनुकूल दिशा में चल रही है। श्रेष्ठ ( सुहागिनी ) स्त्रियाँ भरे हुए घड़े और गोद में बालक लिये हुए आ रही हैं।





लोवा फिरि फिरि दरसु देखावा। सुरभी सनमुख सिसुहि पिआवा।। मृगमाला फिरि दाहिनि आई। मंगल गन जनु दीन्हि देखाई।।_अर्थ_लोमड़ी फिर_फिरकर ( बार_बार ) दिखायी दे जाती है। गायें सामने खड़ी बछड़ों को दूध पिलाती हैं। हरिनों की टोली [ बायीं ओर से ] घूमकर दाहिनी ओर को आयी, मानो सभी मंगलों का समूह दिखायी दिया।





छेमकरी कह छेम बिसेषी। स्यामा बाम सुतरु पर देखी।। सनमुख आयउ दधि अरु मीना। कर पुस्तक दुइ बिप्र प्रबीना।।_अर्थ_क्षेमकरी ( सफेद सिरवाली चील )  विशेष रूप से क्षेम ( कल्याण ) कह रही है। स्यामा बायीं ओर सुन्दर पेड़ पर दिखायी पड़ी। दही, मछली और दो विद्वान ब्राह्मण हाथ में पुस्तक लिये सामने आये।






मंगलमय कल्यानमय अभिमत फल दातार। जनु सब साचे होन हित भए सगुन एक बार।।_अर्थ_सभी मंगलमय, कल्याणमय और मनोवांछित फल देनेवाले शकुन मानो सत्चे होने के लिये एक ही साथ हो गये।





मंगल सगुन सुगम सब ताकें। सगुन ब्रह्म सुन्दर सुत जाकें।। राम सरिस बरु दुलहिनि सीता। समधी दशरथ जनक पुनीता।।_अर्थ_स्वयं सगुन ब्रह्म जिनके सुन्दर पुत्र हैं,उसके लिये सब मंगल सगुन सुलभ हैं। जहाँ श्रीरामचन्द्रजी सरीखे दुल्हा और सीताजी जैसी दुलहिन हैं तथा दशरथजी और जनकजी जैसे पवित्र समधी हैं,





 सुनि अस ब्याहु सगुन सब नाचे। अब कीन्हे बिरंचि हम साँचे।। एहि बिधि कीन्ह बरात पयाना। हय गय गाजहिं हने निसाना।।_अर्थ_ऐसा ब्याह सुनकर मानो सभी शकुन नाच उठे। [ और कहने लगे_] अब ब्रह्माजी ने हमको सच्चा कर दिया। इस तरह बरात ने प्रस्थान किया। घोड़े, हाथी गरज रहे हैं और नगाड़ों पर चोट लग रही है।





आवत जानि भानुकुल केतू। सरितन्ह जनक बँधाए सेतू।। बीच बीच बर बास बनाए। सुरपुर सरिस संपदा छाए।।_अर्थ_सूर्यवंश के पताकास्वरूप दशरथजी को आते हुए जानकर जनकजी ने नदियों पर पुल बँधवा दिये। बीच_बीच में ठहरने के लिये सुन्दर घर ( पड़ाव ) बनवा दिये, जिनमें देवलोक के समान सम्पदा छायी है।





असन सयन बर बसन सुहाए। पावहिं सब निज निज मन भाए।। नित नूतन सुख लहि अनुकूले। सकल बरातिन्ह मंदिर भूले।।_अर्थ_और जहाँ बरात के सब लोग अपने_अपने मन की पसंद के अनुसार सुहावने उत्तम भोजन, बिस्तर और वस्त्र पाते हैं। मन के अनुकूल नित्य नये सुखों को देखकर सभी बराती अपने घर भूल गये।





आवत जानि बरात बर सुनि गहगहे निसान। सजि गज रथ पदचर तुरग लेन चले अगवान।।_अर्थ_बड़े जोर से बजते हुए नगाड़ों की आवाज सुनकर श्रेष्ठ बारात को आती हुई जानकर अगवानी करनेवाले हाथी, रथ, पैदल और घोड़े सजाकर बारात लेने चले।

Saturday, 30 May 2020

बालकाण्ड

अति गहगहे बाजने बाजे। सबहिं मनोहर मंगल साजे।। जूथ जूथ मिलि सुमुखि सुनयनीं। करहिं गान कल कोकिलबयनी।।____ अर्थ____खूब जोर से बाजे बजने लगे। सभी ने  मनोहर मंगल_ साज सजे। सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाली तथा कोयल के समान मधुर होनेवाला स्त्रियाँ झुंड_की_झुंड मिलकर सुन्दर गान करने लगीं।





सुखु बिदेह कर बरनि न जाई। जन्मदरिद्र मनहुँ निधि पाई।। बिगत त्रास भई सीय सुखारी। जनि बिधु उदयँ चकोरकुमारी।।___ अर्थ____ जनकजी के सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता; मानो जन्म का दरिद्र  धन का खजाना पा गया हो ! सीताजी का भय जाता रहा; वे ऐसी सुखी हुई जैसे चन्द्रमा के उदय होने से चकोर की कन्या सुखी होती है।





जनक कीन्ह कौसिकहि प्रनामा। प्रभु प्रसाद धनु भंजेउ रामा।। मोहि कृतकृत्य कीन्ह दुहुँ भाई। अब जो उचित सो कहिअ गोसाईं।।___ अर्थ___ जनकजी ने विश्वामित्रजी को प्रणाम किया  [और कहा___]  प्रभु ही की कृपा से श्रीरामचन्द्रजी ने धनुष तोड़ा है। दोनों भाइयों ने मुझे कृतार्थ कर दिया। हे स्वामी ! अब जो उचित हो सो कहिये।
कह मुनि सुनु नरनाथ प्रबीना। रहा बिबाहु चाप आधीना।। टूटतहीं धनु भयउ बिबाहू। सुर नर नाग बिदित सब काहू।।___ मुनि ने कहा___ हे चतुर नरेश ! सुनो, यों तो विवाह धनुष के अधीन था; धनुष के टूटते ही विवाह हो गया। देवता, मनुष्य और नाग सब किसी को यह मालूम है।





तदपि जाइ तुम्ह करहु अब जथा बंस ब्यवहारु। बूझि बिप्र कुरुवृद्ध गुर बेद बिदित आचारु।।___ अर्थ____ तथापि तुम जाकर अपने कुल का जैसा व्यवहार हो, ब्राह्मणों, कुल के बूढ़ों और गुरुओं से पूछकर और वेदों में वर्णित जैसा आचार हो वैसा करो।





दूत अवधपुर पठवहु जाई। आनहिं नृप दसरथहिं बुलाई।। मुदित राउ कहि भलेहिं कृपाला। पठए दूत बोलि तेहि काला।।___ अर्थ___ जाकर अयोध्या को दूत भेजो, जो राजा दशरथ को बुला लावें। राजा ने प्रसन्न होकर कहा___हे कृपालु ! बहुत अच्छा ! और उसी समय दूतों को  बुलाकर भेज दिया।





बहुरि महाजन सकल बोलाए। आइ सबन्हि सादर सिर नाए।। हाट बाट मन्दिर सुरबासा। नगरु सँवारहु चारिहुँ पासा।।___ अर्थ____ फिर सब महाजनों को बुलाया और सबने आकर राजा को आदरपूर्वक सिर नवाया। [ राजा ने कहा___ ]  बाजार, रास्ते, घर, देवालय और सारे नगर को चारों ओर से सजाओ।





हरषि चले निज निज गृह आए। पुनि परिचारक बोलि पठाए।। रचहु विचित्र बितान बनाई। सिर धरि बचन चले सचु पाई।।___ अर्थ___महाराज प्रसन्न होकर चले और अपने_ अपने घर आये। फिर राजा ने नौकरों को बुला भेजा [ और उन्हें आज्ञा दी कि ] विचित्र मण्डप सजाकर तैयार करो। यह सुनकर वो सब राजा के वचन सिर पर धर कर और सुख पाकर चले।




पठए बोलि गुनी तिन्ह नाना। जे बितान बिधि कुसल सुजाना।। बिधिहि बंदि तिन्ह कीन्ह अरंभा। बिरचे कनक कदलि के खंभा।।___ अर्थ___उन्होंने अनेक कारीगरों को बुला भेजा, जो मण्डप बनाने में कुशल और चतुर थे। उन्होंने ब्रह्मा की वन्दना करके कार्य आरम्भ किया और [ पहले ] सोने के केले के खम्भे बनाये।





हरित मनिन्ह के पत्र फल पदुमराग के फूल। रचना देखि बिचित्र अति मनु बिरंचि कर भूल।।____ अर्थ____ हरी_ हरी मणियों ( पन्ने ) के पत्ते और फल बनाये तथा पद्मराग मणियों ( माणिक ) के फूल बनाये। मण्डप की अत्यन्त विचित्र रचना देखकर ब्रह्मा का मन भी भूल गया।





बेनु हरित मनिमय सब कीन्हे। सरल सपरब परहिं नहीं चीन्हे।। कनक कलित अहिबेलि बनाई। लखि नहीं परइ  सपरन सुहाई।।___ अर्थ___ बाँस सब हरी_हरी मणियोंं ( पन्ने ) के सीधे और गाँठों से युक्त ऐसे बनाये जो पहचाने नहीं जाते थे [ कि मणियों के  हैं या साधारण ] । सोने की सुन्दर नागबेलि ( पान की लता ) बनायी, जो पत्तों सहित ऐसी भली मालूम होती थी कि पहचानी नहीं जाती थी।





तेहि ते रचि पचि बंध बनाए। बिच बिच मुकुता दाम सुहाए।। मानिक मरकत कुलिस पिरोजा। चीरि कोरि पचि रचे सरोजा।।___ अर्थ___उसी नागबेलि को रचकर और पच्चीकारी करके बन्धन ( बाँधने की रस्सी ) बनाए। बीच_बीच में मोतियों के सुन्दर झालरें हैं। माणिक, पन्ने, हीरे और फिरोजे, इन रत्नों को चीरकर, कोरकर और पच्चीकारी करके, इनके [ लाल, हरे, सफेद और फिरोजी रंग के ] कमल बनाये।





किए भृंग बहुरंग बिहंगा। गुंजहिं कूजहिं पवन प्रसंगा। सुर प्रतिमा खंभन्ह गढ़ि काढ़ीं। मंगल द्रव्य लिएँ सब ठाढ़ीं।।____ अर्थ____भौंरे और बहुत रंगों के पक्षी बनाये, जो हवा के सहारे गूँजते और कूजते थे। खंभों पर देवताओं की मूर्तियाँ गढकर निकालीं, जो सब मंगलद्रव्य लिये खड़ी थीं।





चौंंके भाँति अनेक पुराईं। सिंधुर मनिमय सहज सुहाई।।___ अर्थ___ गजमुक्ताओं के सहज ही सुहावने अनेकों तरह के चौक पुराये।





सौरभ पल्लव सुभग सुठि किए नीलमनि कोरि। हेम बौर मरकत घवरि लसत पाटमय डोरि।।___ अर्थ___नीलमणि के अत्यन्त सुन्दर आम के पत्ते बनाए। सोने के बौर ( आम के फूल ) और रेशम की डोरी से बँधे हुए पन्ने के बने फलों के गुच्छे सुशोभित हैं।





रचे रुचिर पर बंदनिवारे। मनहुँ मनोभवँ फंद सँवारे।। मंगल कलस अनेक बनाए। ध्वज पताक पट चमक सुहाये।।___ अर्थ___ऐसे सुंदर और उत्तम बंदनवार बनाये मानो कामदेव ने फंदे सजाये हों। अनेकों मंगल_कलश और सुन्दर ध्वजा, पताका परदे और चँवर बनाये।





दीप मनोहर मनिमय नाना। जाइ न बरनि बिचित्र बिताना।। जेहिं मंडप दुलहिनि बैदेही। सो बरनै  असि मति कबि केही।।___ अर्थ____जिसमें मणियों के अनेकों सुन्दर दीपक हैं, उस बिचित्र मण्डप का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। जिस मण्डप में श्रीजीनकीजी दुलहिन होंगी, किस कवि की ऐसी बुद्धि है जो उसका वर्णन कर सके।





दूलहु राम रूप गुन सागर। सो बितानु तिहुँ लोक उजागर।। जनक भवन कै सोभा जैसी। गृह गृह प्रति पुर देखिए तैसी।।___ अर्थ___ जिस मण्डप में रूप और गुणों के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी दूल्हे होंगे, वह मण्डप तीनों लोकों में प्रसिद्ध होना ही चाहिये। जनता को महल की जैसी शोभा है, वैसी ही शोभा नगर के प्रत्येक घर की दिखायी देती है।





जेहिं तेरहुति तेहि समय निहारी। तेहि लघु लगहिं भुवन दस चारी।। जो संपदा नीच गृह सोहा। सो बिलोकि सुरनायक मोहा।।___ अर्थ___उस समय जिसने तिरहुत को देखा, उसे चौदह भुवन तुच्छ जान पड़े। जनकपुर में नीच के घर भी उस समय  जो सम्पदा सुशोभित थी, उसे देखकर इन्द्र भी मोहित हो जाता था।





बसइ नगर जेहि लच्छि करि कपट नारि पर बेषु। तेहि पुर कै शोभा कहत सकुचहिं सारद सेषु।।___ अर्थ___ जिस नगर में साक्षात् लक्ष्मीजी कपट से स्त्री का सुन्दर वेष बनाकर बसती है, उस पुर की शोभा का वर्णन करने में सरस्वती और शेष भी सकुचाते हैं।






पहुँचे दूत राम पुर पावन। हरषे नगर बिलोकि सुहावन।। भूप द्वार तिन्ह खबरि जनाई। दसरथ नृप सुनि लिए बोलाई।।___ अर्थ___ जनकजी के दूत श्रीरामचन्द्रजी की पवित्र पुरी अयोध्या में पहुँचे। सुन्दर नगर देखकर वे हर्षित हुए। राजद्वार पर जाकर उन्होंने खबर भेजी; राजा दशरथजी ने सुनकर उन्हें बुला लिया।





करि प्रणामु तिन्ह पाती दीन्ही। मुदित महीप आपु उठि लीन्ही।। बारि विलोचन बाँचत पाती। पुलक गात आईं भरि छाती।।___ अर्थ___ दूतों ने प्रणाम करके चिट्ठी दी। प्रसन्न होकर राजा ने स्वयं उठकर उसे लिया। चिट्ठी बाँचते समय उनके नेत्रों में जल ( प्रेम और आनन्द के आँसू ) छा गया, शरीर पुलकित हो गया और छाती भर आयी। 





रामु लखनु उर कर बर चीठी। रही गए कहत न खाटी मीठी।। पुनि धरि धीर पत्रिका बाँची। हरषी सभा बात सुनि साँची।।___ अर्थ___ हृदय में राम और लक्ष्मण हैं, हाथ में सुन्दर चिठ्ठी है, राजा उसे हाथ में लिये ही रह गये, खट्टी_मीठी कुछ भी नहीं कह सके। फिर धीरज कर कर उन्होंने पत्रिका पढ़ी। सारी सभा सच्ची बात सुनकर हर्षित हो गयी।





खेलत रहे तहाँ सुधि पाई। आए भरत सहित हित भाई।। पूछत अति सनेह सकुचाई। तात कहाँ तें पाती आई।।___ अर्थ___भरतजी अपने भाई और शत्रुध्न के साथ जहाँ खेलते थे, वहीं समाचार पाकर वे आ गये। बहुत प्रेम से सकुचाते हुए पूछते हैं__पिताजी ! चिट्ठी कहाँ से आई है ?



कुशल प्रानप्रिय बंधु दोउ अहहिं केहिं देस। सुनि सनेह साने बचन बाची बहुरि नरेस।।___ अर्थ___ हमारे प्राणों से प्यारे दोनों भाई, कहिये सकुशल तो हैं और वे किस देश में हैं ? स्नेह से सने ये वचन सुनकर राजा ने फिर से चिट्ठी पढ़ी।





सुनि पाती पुलके दोउ भ्राता। अधिक सनेहु समात न गाता।। प्रीति पुनीत भरत कै देखी। सकल सभाँ सुख लहेउ बिसेषी।।___ अर्थ___ चिट्ठी सुनकर दोनो भाई पुलकित हो गये। स्नेह इतना अधिक हो गया कि वह शरीर में समाता नहीं। भरतजी का पवित्र प्रेम देखकर सारी सभा ने विशेष सुख पाया।





तब नृप दूत निकट बैठारे। मधुर मनोहर बचन उचारे।। भैया कहहु कुसल दोउ बारे। तुम्ह नीकें निज नयन निहारे।।___ अर्थ___ तब राजा दूतों को पास बिठाकर मन को हरनेवाले मीठे वचन बोले___भैया ! कहो, दोनों बच्चे कुशल से तो हैं ? तुमने अपनी आँखों से अच्छी तरह देखा है न ?





 स्यामल गौर धरें धनु भाथा। बय किसोर कौसिक मुनि साथा।। पहिचानहु तुम्ह कहहु सुभाऊ। प्रेम बिबस पुनि पुनि कह राऊ।।___ अर्थ____ और गोरे शरीरवाले वे धनुष और तरकस धारण किये रहते हैं, किशोर अवस्था है, विश्वामित्र मुनि के साथ हैं। तुम उनको पहचानते हो तो उनका स्वभाव बताओ। राजा प्रेम के विशेष वश होने से बार_बार इस प्रकार कह  ( पूछ ) रहे हैं।





जा दिन तें मुनि गए लवाई। तब तें आजु साँचि सुधि  पाई।। कहहु बिदेह कवन बिधि जाने। सुनि प्रिय बचन दूर मुसुकाने।।___ अर्थ___[ भैया ! ] जिस दिन से मुनि उन्हें लिवा ले गये, तबसे आज ही हमने सच्ची खबर पायी है। कहो तो महाराज जनक ने उन्हें कैसे पहचाना ? ये प्रिय ( प्रेमभरे )  वचन सुनकर दूर मुस्कराये।





सुनहु महीपति मुकुटमनि तुम्ह सम धन्य न कोउ। रामु लखनु जिन्ह के तनय बिस्व विभूषण दोउ।।__अर्थ___[ दूतों ने कहा___ ] हे राजाओं के मुकुटमणि ! सुनिये, आपके समान धन्य कोई नहीं है, जिनके राम_ लक्ष्मण जैसे पुत्र हैं, जो दोनों विश्व के विभूषण हैं। चन्द्रमा मलिन और प्रताप के आगे सूर्य शीतल लगता है।






पूछन जोगु न तनय तुम्हारे। पुरुषसिं तिहु पुर उजियारे।। तिन्ह के जस प्रताप कें आगे। ससि मलीन रबि सीतल लागे।।___ अर्थ___आपके पुत्र पूछने योग्य नहीं हैं। वे पुरुषसिंह तीनों लोकों के प्रकाशस्वरूप हैं। जिनके यश के आगे चन्द्रमा मलिन और प्रताप के आगे सूर्य शीतल लगता है।





तिन्ह कहँ कहिअ नाथ किमि चीन्हे। देखिअ रबि कि दीप कर लीन्हे।। सीय स्वयंबर भूप अनेका। समिटे सुभट एक तैं एका।।___ अर्थ___ हे नाथ ! उनके लिये आप कहते हैं कि उन्हें कैसे पहचाना !  क्या सूर्य को हाथ में दीपक लेकर देखा जा सकता है ? सीताजी के स्वयंवर में अनेकों राजा और एक_से_एक बढकर योद्धा एकत्र हुए थे।
संभु सरासनु काहुँ न टारा। हारे सकल बीर बरिआरा।। तीनि लोक महँ जे भटमानी। सभ कै सकति संभु धनु भानी।।___ अर्थ___ परन्तु शिवजी के धनुष को कोई भी नहीं हटा सका। सारे बलवान् वीर हार गये। तीनों लोकों में जो वीरता के अभिमानी थे, शिवजी के धनुष ने सबकी शक्ति तोड़ दी।





सकइ उठाइ सरासुर मेरू। सोउ हिय हारि गयउ करि फेरू।। जेहि कौतुक शिवशैलु उठावा। सोउ तेहि सभा पराभउ पावा।।---अर्थ---बाणासुर, जो सुमेरु को भी उठा सकता था, वह भी हृदय में हारकर परिक्रमा करके चला गया और जिसने खेल से ही कैलास को उठा लिया था, वह रावण भी उस सभा में पराजय को प्राप्त हुआ‌।





तहाँ राम रघुबंशमणि सुनिअ महा महिपाल। भंजेउ चाप प्रयास बिनु जिमि गज पंकज नाल।।__अर्थ__हे महाराज ! सुनिये, वहाँ ( जहाँ ऐसे_ऐसे योद्धा हार मान गये ) रघुवंशमनि श्रीरामचन्द्रजी ने बिना ही प्रयास शिवजी के धनुष को वैसे ही तोड़ डाला जैसे हाथी कमल की डंडी को तोड़ डालता है।





सुनि सरोष भृगुनायकु आए। बहुत भाँति तिन्ह आँख देखाए।। देखि राम बलु निज धनु दीन्हा। करि बहु बिनय गवनु बन कीन्हा।।___अर्थ___धनुष टूटने की बात सुनकर परशुरामजी क्रोध भरे आये और उन्होंने बहुत प्रकार से आँखें दिखायीं। अन्त में उन्होंने भी श्रीरामचन्द्रजी का बल देखकर उन्हें अपना धनुष दे दिया और बहुत प्रकार से विनती करके वन को गमन किया।





राजन रामु अतुलबल जैसें। तेज निधान लखनु पुनि तैसें।। कंपहिं भूप बिलोकत जाकें। जिमि गज हरि किसोर के ताकें।।__अर्थ__हे राजन् ! श्रीरामचन्द्रजी अतुलनीय बली हैं, वैसे ही तेजनिधान फिर लक्षमणजी भी हैं, जिनके देखनेमात्र से राजालोग ऐसे काँप उठते थे, जैसे हाथी सिंह के बच्चे के ताकने से काँप उठते हैं।





देव देखि तव बालक दोऊ। अब न आँखि तर आवत कोऊ।। दूत बचन रचना प्रिय लागी। प्रेम प्रताप बीर रस पागी।।__अर्थ__हे देव ! आपके दोनों बालकों को देखने के बाद अब आँखों के नीचे कोई आता ही नहीं ( हमारी दृष्टि पर कोई चढता ही नहीं )। प्रेम, प्रताप और वीर_रस में पगी हुई दूतों की वचनरचना सबको बहुत प्रिय लगी।





सभा समेत राउ अनुरागे। दूतन्ह देन निछावरि लागे।। कहि अनीति ते मूदहिं काना। धरमु बिचारि सबहिं सुखु माना।।__अर्थ__सभासहित राजा प्रेम में मग्न हो गये और दूतों को निछावर देने लगे। [ उन्हें निछावर देते देखकर ] यह नीति विरुद्ध है, ऐसा कहकर दूत अपने हाथों से कान मूँदने लगे । धर्म को विचारकर ( उनका धर्मयुक्त वर्ताव देखकर ) सभी ने सुख माना।






तब उठि भूप बसिष्ठ कहुँ दीन्हि पत्रिका जाइ। कथा सुनाई गुरहि सब सादर दूत बोलाइ।।___अर्थ___तब राजा ने उठकर वशिष्ठजी के पास जाकर उन्हें पत्रिका दी और आदरपूर्वक दूतों को बुलाकर सारी कथा गुरुजी को सुना दी।

Sunday, 19 April 2020

बालकाण्ड

 नाथ सम्भुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।___ अर्थ___ हे नाथ ! शिवजी का धनुष तोड़नेवाला कोई एक आपका ही दास होगा। क्या आज्ञा है सो मुझसे क्यों नहीं कहते ? मुनि गुस्साकर बोले___





 सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।। सुनहु राम जेहि सिव धनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।___ अर्थ___ सेवक वह है जो सेवकाई करे। जो शत्रु का काम करे उससे तो लड़ाई ही करनी चाहिए। सुनो राम ! जिसने शिव_धनुष को तोड़ा है वह सहस्त्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।




सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।। सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहिं अपमाने।।___ अर्थ____वह इस समाज से अलग निकल आवे नहीं तो सब राजा मारे जायेंगे। मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मणजी मुसकाये और परशुरामजी का अपमान करते हुए बोले___





 बहु धनुहीं तोरी लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्ह गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाई कह भृगुकुलकेतू।।___ अर्थ____ लड़कपन में हमने बहुत सी धनुही तोड़ी, हे गोसाईं ! तब ऐसा गुस्सा आपने कभी नहीं किया। इसी धनुष पर ममता किस कारण है ? यह सुन परशुराम क्रोधित होकर कहने लगे___





रे नृप बालक कालबस, बोलत तोहि न संभार। धनुही सम त्रिपुरारि धनुष, विदित सकल संसार।।___ अर्थ___ हे राजपुत्र ! तू काल के अधीन होने से संभालकर नहीं बोलता। संसार_ प्रसिद्ध शिवधनुष क्या धनुही के समान है ?





 लखन कहा हँसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।। का छति लाभ जून धनु तोरे। देखा राम नयन के भोरें।।___ अर्थ____ लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा___ हे देव ! सुनिए हमारी समझ में सब धनुष बराबर है। पुराने धनुष का तोड़ना क्या हानि_लाभ है ? श्रीरामचन्द्रजी ने तो नवीन के धोखे से इसे देखा था।





छुअत टूट रघुपतिहिं न दोषू। मुनि बिनु काज करिअ कर रोषू।। बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।___ अर्थ___ फिर वह छूते ही टूट गया, इसमें रामचन्द्रजी का दोष नहीं है ? हे मुनि ! बिना प्रयोजन क्यों क्रोध करते हो ? परशुरामजी अपने फरसे की ओर देखकर बोले___ हे शठ ! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना।





बालक बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानिहि मोही।। बाल ब्रह्मचारी अति कोही। विश्वविदित छत्रिय कुल द्रोही।।___ अर्थ___ बालक जानकर मैं तुझे नहीं मारता हूँ। रे जड़ ! तूने मुझे केवल मुनि ही जाना है। मैं बाल ब्रह्मचारी बड़ा क्रोधी हूँ और जगत् में क्षत्रियवंश का प्रसिद्ध बैरी हूँ।





भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। विपुल बार महीदेवन्ह दीन्ही। सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।___ अर्थ___ अपने भुजाओं के बल से पृथ्वी को बिना राजाओं के करके अनेक बार उसे ब्राह्मणों को दे दिया है। हे राजकुमार ! सहसबाहु की भुजाओं को काटनेवाले इस फरसे को तू देख।





मातु पितहिं जनि सोचबस करसि महीपकिसोर। गर्भहु के अर्भक दलन, परसु मोर अति घोर।।___ अर्थ___ हे राजकिशोर ! तू अपने माता_ पिता को सोच के वश मत कर। मेरा यह कुठार गर्भों के बालकों को मारनेवाला बड़ा भयंकर है।



 बिहसि लखन बोले मृदु बानी। अहो मुनीस महा भटमानी।। पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।।___ अर्थ___ लक्ष्मणजी हँसकर मधुर वाणी बोले___ अहो ! मुनिश्वर अपने को बड़ा शूरवीर मानते हैं। इसी से मुझे बारंबार कुठार दिखाते हैं। फूँककर पहाड़ उड़ाना चाहते हैं।



इहाँ कुम्हडबतिया कोऊ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।। देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।___ यहाँ कोई कुम्हडे का बतियाँ नहीं है जो तरजनी अँगुली देखते ही मुरझा जाती है। कुठार और धनुष_ बाण देखकर ही मैंने अभिमान के साथ कहा है।





भृगुसुत समुझि जनेऊ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ किस रोकी।। सुर महीसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।___ अर्थ___भृगुवंशी ब्राह्मण समझकर और जनेऊ देखकर ही जो कुछ आपने कहा है वह मैंने क्रोध रोककर सहा है। देवता, ब्राह्मण, हरिभक्त और गाय, इन पर हमारे कुल में शूरता नही दिखायी जाती।




बधें पाप अपकीरति हारे। मारत हूँ पा परिअ तुम्हारे।। कोटि कुलिस सम बचन तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बाण कुठारा।___ अर्थ___क्योंकि इन्हें मारने में पाप और इनसे हारने में अपयश है। आप मारें तो भी आपके पाँव ही पड़ना चाहिये। करोड़ों वज्रों के समान तो आपका वचन ही है। आप धनुष_बाण और कुठार तो व्यर्थ ही धारण किये हैं।





जो बिलोकि अनुचित कहेऊँ, छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंशमनि बोले गिरा गभीर।।___ अर्थ___ हे वीर महामुनि ! इन्हें देखकर मैंने जो कुछ अनुचित कहा हो, उसे क्षमा कीजिये। यह सुनकर भृगुवंशमणि परशुरामजी क्रोध के साथ गम्भीर वाणी बोले___



कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।। भानु बंस राकेस कलंकु। निपट निरंकुस अबुध असंकू।।___ अर्थ___ हे विश्वामित्र !  सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, काल के वश होकर यह अपने कुल का घालक बन गया है। यह सूर्यवंशरूपी पूर्णचन्द्र का कलंक है। यह बिलकुल उद्गार, मूर्ख और निडर है।





काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।। तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बसु रोषु हमारा।।___ अर्थ____ अभी क्षण_भर में यह काल का ग्रास हो जायगा। मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो।





लखन कहा मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।। अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।।___ अर्थ___ लक्ष्मणजी ने कहा___ हे मुनि !  आपका सुयश आपके रहते दूसरा कौन वर्णन कर सकता है ? आपने अपने ही मुँह से अपनी करनी अनेकों बार बहुत प्रकार से वर्णन की है।





नहिं संतोष त पुनि कुछ कहहू। जनि किस रोकि दुःसह दुःख सहहू।। बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देर न पावहु सोभा।।___ अर्थ___ इतने पर भी संतोष न हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिये। क्रोध रोककर असह्य दुःख मत सहिये। आप वीरता का व्रत धारण करनेवाले, धैर्यवान् और क्षोभरहित हैं। गाली देते शोभा नहीं पाते।





सूर समर करनी करहिं कहा न जनावहिं आप। विद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रताप।।___ अर्थ____ शूरवीर तो युद्ध में करनी ( शूरवीरता का कार्य) करते हैं, कहकर अपने को नहीं जनाते। शत्रु को युद्ध में उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रताप की डींग मारा करते हैं।




तुम्ह तौं कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।। सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।___ अर्थ___आप तो मानो काल को हाँक लगाकर बार बार उसे मेरे लिये बुलाते हैं।
लक्ष्मणजी के कठोर वचन सुनते ही परशुरामजी ने अपने भयानक फरसे को सुधारकर हाथ में ले लिया।





अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।। बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।।___ अर्थ____और बोले___ अब लोग मुझे दोष न दें। यह कड़ुआ बोलनेवाला बालक मारे जाने के योग्य है। इसे बालक देखकर मैंने बहुत बचाया, पर अब यह सचमुच मरने को ही आ गया है।





कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।। खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही।।___ अर्थ___ विश्वामित्रजी ने कहा___अपराध क्षमा कीजिये। बालकों के दोष और गुण को साधुलोग नहीं गिनते। परशुरामजी बोले____ तीखी धार का कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने।





उतर देरइ छोडेउँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।। न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहिं उरिन होतेउँ श्रम थोरें।।____ अर्थ____उत्तर दे रहा है। इतने पर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, सो हे विश्वामित्र! केवल तुम्हारे  शील ( प्रेम ) से। नहीं तो इसे इस कठोर कुठार से काटकर थोड़े ही परिश्रम से गुरु से उऋिण हो जाता।





 गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ। अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहूँ न बूझ अबूझ।।____ अर्थ____ विश्वामित्रजी ने हृदय में हँसकर कहा___ मुनि को हरा_ही_हरा सूझ रहा है ( अर्थात् सर्वत्र विजयी होने के कारण ये श्रीराम_ लक्ष्मण को भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं)। किन्तु यह लोहमयी ( केवल फौलाद की बनी हुई ) खाँड़ ( खाँड़ा_ खड्ग ) है, भी बेसमझ बने हुए हैं; इनके प्रभाव को नहीं समझ रहे हैं।





कहेउ लखन मुनि सील तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा।। माता पितहि उरिन भए नीकें। गुरु रिनु रहा सोच बड़ जी कें।।___ अर्थ____ लक्ष्मणजी ने कहा___ हे मुनि ! आपके सील को कौन नहीं जानता ? वह संसारभर में प्रसिद्ध है। आप माता_पिता से अच्छी तरह उऋिण हो ही गये, अब गुरु का ऋण रहा, जिसका जी में बड़ा सोच लगा है।





सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।। अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।___अर्थ___ वह मानो हमारे ही मत्थे काढ़ा था। बहुत दिन बीत गये, इससे ब्याज भी बहुत बढ़ गया होगा। अब किसी हिसाब करनेवाले को बुला लाइये, तो मैं तुरंत थैली खोलकर दे दूँ।





सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।। भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही।।___ अर्थ____ लक्ष्मणजी के कड़वे वचन सुनकर परशुरामजी ने कुठार संभाला। सारी सभा हाय ! हाय ! करके पुकार उठी। [ लक्ष्मणजी ने कहा___] हे भृगुश्रेष्ठ ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं ? पर हे राजाओं के शत्रु ! मैं ब्राह्मण समझकर बचा रहा हूँ।





मिले न कबहुँ वीर रन गाढ़े। द्विज देवता घरहिं के बाढ़े।। अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखन नेवारे।।___ अर्थ___ आपको कभी रणधीर बलवान् वीर नहीं मिले। हे ब्राह्मण देवता !  आप घर ही में बड़े हैं। यह सुनकर ‘अनुचित है, अनुचित है' कहकर सब लोग पुकार उठे। तब श्रीरघुनाथजी ने इशारे से लक्ष्मणजी को रोक दिया।





लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोप कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।___ अर्थ___ लक्ष्मणजी के उत्तर से, जो आहुति के समान थे, परशुरामजी के क्रोधरूपी अग्नि को बढ़ते देखकर रघुकुल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी जल के समान ( शान्त करनेवाले ) वचन बोले__





नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।। जौं है प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौं कि बराबरि करत अयाना।।___ अर्थ___ हे नाथ ! बालक पर कृपा कीजिये। इस सीधे और दुधमुँहे बच्चे पर क्रोध न कीजिये। यदि यह प्रभु का ( आपका ) कुछ भी प्रभाव जानता, तो क्या यह बेसमझ आपकी बराबरी करता ?





 जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।। करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील कीर मुनि ग्यानी।।___ अर्थ____ बालक यदि कुछ चपलता भी करते हैं, तो गुरु, पिता और माता मन में आनन्द से भर जाते हैं। अतः इसे छोटा बच्चा और सेवक जानकर कृपा कीजिये। आप तो समदर्शी, सुशील, धीर और ग्यानी मुनि हैं।





राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने।। हँसत देखि नख सिख रिस व्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी।।___ अर्थ____ श्रीरामचन्द्रजी के वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े। इतने में लक्ष्मणजी कुछ कहकर फिर मुस्करा दिये। उनको हँसते देखकर परशुरामजी के नख से शिखा तक ( सारे शरीर में ) क्रोध छा गया। उन्होंने कहा___ हे राम ! तेरा भाई बड़ा पापी है।





गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं।। सहज टेढ़ अनुकरिय न तोही। नीचु मीचु सम देख न मोही।।___ अर्थ___ यह शरीर से गोरा, पर हृदय का बड़ा काला है। यह  विषमुख है, दुधमुँहा नहीं। स्वभाव से ही टेढ़ा है, तेरा अनुकरण नहीं करता ( तेरे जैसा शीलवान् नहीं है )। यह नीच मुझे काल के समान नहीं देखता।





लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल। जेहि बस जन अनुचित करहिं करहिं विस्व प्रतिकूल।।___ अर्थ___ लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा____ हे मुनि ! सुनिये, क्रोध पाप का मूल है, जिसके वश में होकर मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठते हैं और विश्वभर के प्रतिकूल चलते ( सबका अहित करते ) हैं।





मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।। टूट चाप नहिं जुरिहिं रिसाने। बैठिय होइहिं पाय पिराने।।___ अर्थ___ हो मुनिराज ! मैं आपका दास हूँ। अब क्रोध त्यागकर दया काजिये। टूटा हुआ धनुष क्रोध करने से जुड़ नहीं जायगा। खड़े_ खड़े पैर दुखने लगे होंगे, बैठ जाइये।





जौं अति प्रिय तौं करिअ उपाई। जोरिअ कोऊ बर गुनी बोलाई।। बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भर नाहीं।।___ अर्थ____ यदि धनुष अत्यन्त ही प्रिय हो, तो कोई उपाय किया जाय और किसी बड़े गुणी ( कारीगर ) को बुलाकर जुड़वा दिया जाय। लक्ष्मणजी के बोलने से जनकजी डर जाते हैं और कहते हैं___ बस, चुप रहिये, अनुचित बोलना अच्छा नहीं।





थर थर काँपहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी।। भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी।  रिस तन जरइ होइ बल हानी।।___ अर्थ___ जनकपुर के स्त्री_ पुरुष थर_थर काँप रहे हैं [ और मन_ही_मन कह रहे हैं कि ] छोटा कुमार बड़ा ही खोटा है। लक्ष्मणजी की निर्भय बाणी सुन_सुनकर परशुरामजी की शरीर क्रोध से जला जा रहा है और उनके बल की हानि हो रही है ( उनका बल घट रहा है )।





बोले रामहिं देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।। मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें।।___ अर्थ___ तब श्रीरामचन्द्रजी पर एहसान जनाकर परशुरामजी बोले____ तेरा छोटा भाई समझकर मैं इसे बचा रहा हूँ। यह मन का मैला और शरीर की कैसा सुन्दर है, जैसे विष के रस से भरा हुआ सोने का घड़ा।





सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम। गुरु समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।____ अर्थ____ यह सुनकर लक्ष्मणजी फिर हँसे। तब श्रीरामचन्द्रजी ने तिरछी नजर से उनकी ओर देखा, जिससे लक्ष्मणजी सकुचाकर, विपरीत बोलना छोड़कर, गुरुजी के पास चले गये।





अति विनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।। सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।।___ अर्थ____ श्रीरामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ कोमल और शीतल वाणी बोले___ हे नाथ ! सुनिये,  आप तो स्वभाव से ही समझदार हैं। आप बालक के वचन पर ध्यान न दीजिये ( उसे सुना_ अनसुना कर दीजिये )।


बररै बालकु एकु सुभाऊ। इन्हहिं न संत बिदूषहिं काऊ।। तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा।।___ अर्थ____बरैं और बालक एक स्वभाव है। संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते। फिर उसने ( लक्ष्मणने ) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ ! आपका अपराधी तो मैं हूँ।





कृपा कोप बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई।। कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई।।___ अर्थ___अतः हे स्वामी ! कृपा, क्रोध, वध और बन्धन, जो कुछ करना हो, दास की तरह ( अर्थात दास समझकर ) मुझपर कीजिये। जिस प्रकार से शीघ्र आपका क्रोध दूर हो, हे मुनिराज ! बताइये, मैं वही उपाय करूँ।





कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहूँ अनुज तव चितव अनैसें।। एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा। तो मैं काह कोपु करि दीन्हा।।___ अर्थ___मुनि ने कहा___ हे राम ! क्रोध कैसे जाय; अब भी तेरा छोटा भाई टेढ़ा ही ताक रहा है। उसकी गर्दन पर मैंने कुठार न चलाया, तो क्रोध करके किया ही क्या ?





 गर्भ स्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर । परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर।।___ अर्थ___मेरे जिस कुठार की घोर करनी सुनकर राजाओं की स्त्रियों के गर्भ गिर पड़ते हैं, उसी फरसे के रहते मैं इस शत्रु राजपुत्र को जीवित देख रहा हूँ।





बहइ न हाथु दहइ किस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।। भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ।।___अर्थ___हाथ चलता नहीं, क्रोध से छाती जली जाती है। [ हाय ! ] राजाओं का घातक यह कुठार भी कुंठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदय में किसी समय भी कृपा कैसी ?








आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा।। बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन. झरत जनु फूला।।___ अर्थ___ आज दया मुझे यह दुःसह दुःख सहा रही है। यह सुनकर लक्ष्मणजी ने मुस्कराकर सिर नवाया [ और कहा___ ] आपकी कृपारूपी वायु भी आपकी मूर्ति के अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं मानो फूल झड़ रहे हैं ! 





जौं पैं कृपा जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु  राख बिधाता।। देखु जनक हठि बालकु एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।।____ अर्थ___ हे मुनि ! यदि कृपा करने से आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होने पर तो शरीर की रक्षा विधाता ही करेंगे। [ [परशुरामजी ने कहा___] हे जनक ! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरी में घर ( निवास ) करना चाहता है।





बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृपु ढोटा।। बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूँदे आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।___ अर्थ___इसको शीघ्र ही आँखों की ओट क्यों नहीं करते ? यह राजपुत्र देखने में छोटा है, पर है बड़ा खोटा। लक्ष्मणजी ने हँसकर मन_ही_मन कहा___ आँख मूँद लेने पर कहीं कोई नहीं है।





परसुराम तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु। संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमारे प्रबोधु।।___ अर्थ___ तब परशुरामजी हृदय में अत्यन्त क्रोध भरकर श्रीरामजी से बोले___ अरे शठ ! तू शिवजी का धनुष तोड़कर उल्टा हमीं को ज्ञान सिखाता है !




बंधु कहइ कटु संमत तोंरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।। करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा।।___अर्थ___ तेरा यह भाई तेरी ही सम्मति से कटु वचन बोलता है और तू छल से हाथ जोड़कर विनय करता है। या तो युद्ध में मेरा संतोष कर नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे।





छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही।। भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसुकाहीं रामु सिर नाएँ।।___ अर्थ___अरे सिवद्रोही ! छल त्यागकर मुझसे युद्ध कर। नहीं तो भाईसहित तुझे मार डालूँगा। इस प्रकार परशुरामजी कुठार उठाये बकवास रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी सिर झुकाये मन_ही_मन मुस्करा रहे हैं।





गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू।। डेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चन्द्रमहि ग्रसइ न राहू।।___ अर्थ____[ श्रीरामचन्द्रजी ने मन_ ही_मन कहा___] गुनाह ( दोष ) तो लक्ष्मण का और क्रोध मुझपर करते हैं। कहीं कहीं सीधेपन में भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सबलोग किसी की भी वंदना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमा को राहू  भी नहीं ग्रसता।





राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा।। जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानिअ आपन अनुगामी।।___ अर्थ___ श्रीरामचन्द्रजी ने [ प्रकट ] कहा___ हे मुनीश्वर ! क्रोध छोड़िये। आपके हाथ में कुठार है और मेरा यह सिर आगे है। जिस प्रकार आपका क्रोध जाय, हे स्वामी ! वही कीजिये। मुझे अपना अनुचर ( दास ) जानिये।




प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रवर रोसु। बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु।।____ अर्थ___स्वामी और सेवक में युद्ध कैसा ? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! क्रोध का त्याग कीजिये। आपका [ वीरों_ का_सा ] वेष देखकर ही बालक ने कुछ कह डाला था; वास्तव में उसका भी कोई दोष नहीं है।





देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।। नामु जान पै तुम्हहिं न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा।।___अर्थ___आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किये देखकर और वीर समझकर बालक को क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने वंश ( रघुवंश ) के स्वभाव के अनुसार उसने उत्तर दिया।





जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।। छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।।___ अर्थ___ यदि आप मुनि की तरह आते तो हे स्वामी ! बालक आपके चरणों की धूलि सिर पर रखता। अनजाने की भूल को क्षमा कर दीजिये। ब्राह्मणों के हृदय में बहुत अधिक दया होनी चाहिये।





हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।। राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।___ अर्थ___ हे नाथ ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी ? कहिये न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक ! कहाँ मेरा राममात्र छोटा_सा नाम और कहाँ आपका परशु सहित बड़ा नाम।





देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारे।। सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।___ अर्थ___ हे देव ! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके पास परम पवित्र [ शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता___ ये ] नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं। हे विप्र ! हमारे अपराधों को क्षमा कीजिये।





बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम। बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम।।___ अर्थ____ श्रीरामचन्द्रजी ने परशुराम को बार_बार ‘मुनि’ और ‘विप्रवर’ कहा। तब भृगुपति ( परशुरामजी ) कुपित होकर [ अथवा क्रोध की हँसी_ हँसकर ] बोले___ तू भी अपने भाई के समान ही टेढ़ा है।





 निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।। चाप स्रुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू।।___ अर्थ___ तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है ? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुष को स्रुवा, बाण को आहुति और मेरे क्रोध को अत्यन्त भयंकर अग्नि जान।





समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई।। मैं एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे।।___अर्थ___ चतुरंगिणी सेना सुन्दर समिधाएँ ( यज्ञ में जलाई जानेवाली लड़कियाँ ) हैं। बड़े_ बड़े राजा उसमें आकर बलि के पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसे से काटकर बलि दिया है। ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किये हैं ( अर्थात् जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक ‘स्वाहा’ शब्द के साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार_पुकारकर राजाओं की बलि दी है। )।





मोर प्रभाउ विदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें।। भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा।।___ अर्थ___मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसी से तू ब्राह्मण के धोखे से मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमण्ड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसार को जीतकर खड़ा है।





राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।। छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेतु करौं अपमाना।।____ अर्थ____ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा______ हे मुनि ! विचारकर बोलिये। आपका क्रोध बहुत बड़ा है। और मेरी भूल बहुत छोटी है। पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया। मैं किस कारण अभिमान करूँ ? 





जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ। तो अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ।।____ अर्थ____ हे भृगुनाथ ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो यह सत्य सुनिये, फिर संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डरके मारे माथा नवायें ?





 देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।। जौ रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ।।___ अर्थ____ देवता, दैत्य, राजा या बहुत_से योद्धा, वे चाहे बल में हमारे बराबर हों चाहे अधिक बलवान् हों, यदि हमें रण में कोई भी ललकारे तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे, चाहे काल ही क्यों न हो ?





छत्रिय रवि धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना।। कहउँ सुभाउ न कुलहिं प्रसंसी। कालहुँ डरहिं न रन रघुबंसी।।____ अर्थ___क्षत्रिय का शरीर धर कर जो युद्ध में डर गया, उस नीच ने अपने कुल पर कलंक लगा लिया। मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, कुल की प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते।





बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहिं डेराई।। सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधरमति के।।___ अर्थ___ ब्राह्मणवंश की ऐसी ही प्रभुता ( महिमा ) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है [ अथवा जो भयरहित होता है वह भी आपसे डरता है ]। श्रीरघुनाथजी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी का बुद्धि के परदे खुल गये।





राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू।। देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ।।___ अर्थ___[ परशुरामजी ने कहा___] हे राम ! हे लक्ष्मीपति ! धनुष को हाथ में [ अथवा अथवा लक्ष्मीपति विष्णु का धनुष ] लीजिये और इसे खींचिये, जिससे मेरा संदेह मिट जाय। परशुरामजी धनुष लेने लगे, तब वह आप ही चला गया। तब परशुरामजी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।





जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात। जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेम अमात।।___ अर्थ___ तब उन्होंने श्रीरामजी का प्रभाव जाना, [ जिसके कारण ] उसका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। वे हाथ जोड़कर वचन बोले___ प्रेम उनके हृदय में नही समाता था।





जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू।। जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।।___ अर्थ____ हे रघुकुलरूपी कमलवन के सूर्य ! हे राक्षसों के कुलरूपी घने जंगल को जलानेवाले अग्नि ! आपकी जय हो ! हे देवता, ब्राह्मण और गौ का हित करनेवाले ! आपकी जय हो !  हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम के हरनेवाले ! आपकी की जय हो।





बिनय सील  करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर।। सेवक सुखद सुभग सब अंगा।। जय सरीर छबि कोटि अनंगा।।___ हे विनय, शील, कृपा आदि गुणों के समुद्र और वचनों की रचना में अत्यन्त चतुर ! आपकी जय हो। हे सेवकों के सुख देनेवाले, सब अंगों से सुन्दर और शरीर में करोड़ों कामदेव की छबि धारण करनेवाले ! आपकी जय हो !





 करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।। अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामन्दिर दोष भ्राता।।____ अर्थ___ मैं एक मुख से आपकी क्या प्रशंसा करूँ ? हे महादेवजी के मनरूपी मानसरोवर के हंस ! आपकी जय हो ! मैंने अनजान आपको बहुत_से अनुचित वचन कहे। हे क्षमा के मन्दिर दोनों भाई ! मुझे क्षमा के मन्दिर दोनों भाई ! मुझे क्षमा कीजिये।





 कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।। अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहि पराने।।___ अर्थ____ हे रघुकुल के पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। ऐसा कहकर परशुरामजी वन में तप को चले गये। [ यह देखकर ] दुष्ट राजालोग बिना ही कारण के ( मनःकल्पित ) डर से ( रामचन्द्रजी से तो परशुरामजी भी हार गये, हमने इनका अपमान किया था, अब कहीं ये उसका बदला न लें, इस व्यर्थ के डर से ) डर गये, वे कायर चुपके से जहाँ_तहाँ भाग गये।





देवन्ह दीन्हीं  दुंदुभीं प्रभु पर बरसहिं फूल। हरषे सुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल।।___ अर्थ___ देवताओं ने नगाड़े बजाये, वे प्रभु के ऊपर फूल बरसाने लगे। जनकपुर के स्त्री_पुरुष सब हर्षित हो गये। उनका मोहमय ( अज्ञान से उत्पन्न ) शूल मिट गया।










Wednesday, 15 January 2020

बालकाण्ड

मनहिं   मन मानव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।। करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।।___ अर्थ___ वे व्याकुल होकर मन_ही_मन कह रही हैं___ हे शिव_पार्वती मुझपर प्रसन्न होइए। मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सफल करिए और हित करके धनुष का भारीपन हर लीजिए।

गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउ तुअ सेवा।। बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी।।___ अर्थ____ हे वर देनेवाले देवता गणेशजी ! आजतक मैंने इसी हेतु आपकी सेवा की थी। बारम्बार मेरी विनती सुनकर धनुष का भारीपन कम कर दीजिए।

देखि देखि रघुवीर तन, सुर मनाव धरि धीर। भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली शरीर।।___ अर्थ___ वे रामजी को देखकर, धीरज धरकर देवताओं को मनाने लगीं। उनके नेत्रों में प्रेमजल भर आया और शरीर रोमांचित हो गया।

नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।। अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।।___ अर्थ___भली_ भाँति नेत्र भरकर रामजी की शोभा को देखकर पिता के प्रण को स्मरण करके उनका मन क्षुब्ध हो गया। अहो ! पिताजी ने कठिन हठ ठानी है, वे कुछ लाभ और हानि नहीं समझते।



सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़  अनुचित होई।। कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।।___ अर्थ___मन्त्री भी डर के मारे कोई सीख नहीं देते, बुधजनों की सभा में यह बड़ा अनुचित हो रहा है। कहाँ तो यह बज्र से भी अधिक कठोर धनुष और कहाँ यह श्यामसुन्दर कोमल अंग के किशोर।



बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।। सकल सभा कै मति भई भोरी। अब मोहि सम्भु चाप गति तोरी।।___ अर्थ____ हे विधाता ! मैं किस प्रकार मन में धीरज धरूँ, सिरस के फूल से हीरा कैसे बेधा जायगा ? सारी सभा की बुद्धि भूल गयी है। अत: हे शिव_धनुष ! अब मैं तेरी ही शरण हूँ।




निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।। अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सम जाहीं।।___ अर्थ___अपनी कठोरता लोगों पर डालकर, श्रीरामचन्द्रजी को देखकर हल्के हो जाओ। इस प्रकार सीताजी के मन में बहुत दुःख हुआ, लव निमेष मात्र भी युग के समान हारने लगा।



प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि, राजत लोचन लोल। खेलत मनसिज मीन जुग, जनु बिधु मंडल डोल।।___ अर्थ___प्रभु रामजी की ओर देख फिर पृथ्वी की ओर देखती हुई श्रीजानकीजी के चंचल नेत्र ऐसे शोभायमान हो रहे हैं मानो चन्द्रमण्डल रूपी डोल में कामदेव की दो मछलियाँ खेल रही हों।



गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।। लोचनु जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना।।___ अर्थ____सीताजी के मुखरूपी कमल ने लाजरूपी रात्रि को देखकर वाणरूपी भ्रमर को रोक लिया है। नेत्रों का जल नेत्रों के कोने में ही रह गया है जैसे किसी कंजूस का सोना कोने में ही गढ़ा रह जाता है।



सकुची व्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।। तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पग  सरोज चितु राचा।।___ अर्थ___सीताजी अपनी घबराहट जानकर सकुचाईं फिर मन में धीरज कर विश्वास ले आईं कि यदि तन, मन और वचन से मेरा प्रण सच्चा है और रघुनाथजी के चरणारविन्दों में मेरा मन वास्तव में लगा है।



तौं भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर की दासी।। जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कुछ संदेहू।।____ अर्थ___तो सबके हृदय में बास करनेवाले भगवान मुझे रघुनाथजी की दासी बनायेंगे जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसको मिलता ही है, इसमें कुछ संदेह नहीं।



प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान रामु सब जाना।। सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें। चितव गरुड़ लघु ब्यालहिं जैसें।।___ अर्थ____सीताजी ने प्रभु रामचन्द्रजी की ओर देखकर प्रेम का पन ठान लिया। कृपानिधान रामचन्द्रजी ने सब जान लिया और सीताजी को देखकर धनुष को ऐसे देखा जैसे गरुड़ छोटे साँप को देखता है।




लखन लखेउ रघुबंसमनि, ताकेउ हर कोदण्डु।। पुलकि गति बोले बचन, चरन चापि ब्रह्मण्डु।।____ अर्थ___लक्ष्मणजी ने देखा कि श्रीरामचन्द्रजी ने शिवजी के धनुष की ओर ताका है, तब पुलकित हो पृथ्वी को चरणों से दबाकर यह बोले___



दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।। रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा।।___ अर्थ___ हे दिग्गजों ! हे कच्छप ! हे शेषनाग ! हे बराह ! तुम सब धीरज कर कर पृथ्वी को धारण किये रहो, यह डोलने न पावे। श्रीरामजी धनुष तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुन तुम सब सावधान हो जाओ।



चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।। सब कर संसउ अरु अज्ञानू। मन्द महीपन्ह कर अभिमानू।।___अर्थ____ धनुष के पास जब रामचन्द्रजी आए तब सब स्त्री_पुरुषों का संदेह और अज्ञान, मूर्ख राजाओं का अभिमान।



भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई।। सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा।।___ अर्थ____ परशुरामजी के अहंकार की गुरुता, देवताओं और मुनिश्वरों की घबराहट, सीताजी का सोच, जनक का पछतावा और रानियों की कठिन दुखरूपी दावानल।




सम्भुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई।। राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू।।___ अर्थ___ यह सब शिवजी के धनुषरूपी बड़े जहाज को पाकर एक साथ उसपर जा चढ़े। वे रामचन्द्रजी के भुजाओं के बलरूपी अपार समुद्र के पार जाना चाहते हैं, पर कोई मल्लाह नहीं है।



राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि। चितई सीय कृपायतन, जानी बिकल बिसेषि।।___ अर्थ___श्रीरामजी ने सब लोगों को देखा तो उन्हें चित्रलिखे से देखकर कृपानिधान ने सीताजी की ओर देखा तो उन्हें बहुत ही बेचैन जाना।



देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।। तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।।___ अर्थ___ उन्होंने सीताजी को बहुत ही विकल देखा। उनका एक_एक क्षण कल्प के समान बीत रहा था। प्यासे ने यदि बिना जल पिये ही शरीर छोड़ दिया हो तो मर जाने पर अमृत की तालाब भी क्या करेगा?



का बरषा जब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें।। अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।।___ अर्थ___ जब खेती सूख जाय तब वर्षा से क्या लाभ ? ऐसा जी में जानकर  धनुष को देख, उनकी अधिक प्रीति समझ प्रभु रामचन्द्रजी पुलकायमान हुए।



गुरहि प्रणाम मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा। दमके दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनुमंडल सम भयऊ।।___ अर्थ___ गुरु को मन_ही_मन प्रणाम किया और बहुत फुर्ती से धनुष को उठा लिया। जब उसे हाथ में लिया तो वह बिजली के समान चमका, फिर धनुष आकाश में मण्डलाकार हो गया।



लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देखि सब ठाढ़ें। तेहि छन मध्य राम धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।___ अर्थ___ धनुष को लेते, चढ़ाते और दृढ़ता से खींचते हुए किसी ने नहीं देखा, सबने रामजी को खड़े ही देखा, उसी क्षण रामचन्द्रजी ने धनुष को तोड़ दिया। उसकी घोर ध्वनि संसार में भर गई।



भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले।। सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहिं। कोदण्ड खण्डेउ राम तुलसी जयती बचन उचारहिं।।____ अर्थ___ संसार में घोर शब्द भर गया, सूर्य के,घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे, दिग्गज चिघ्घाड़ने व पृथ्वी जिसने लगी, शेष, कच्छप और बराह कलमलाने लगे। देवता, असुर, मुनिजन सब कानों पर हाथ दे बेचैन होकर बिचारने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं कि जब प्रभु ने धनुष तोड़ डाला तो सब जयजयकार करने लगे।



संकर चापु जहाजु, सागरु रघुबर बाहुबल। बूड़ सो सकल समाजु, चढ़ा जो प्रथमहिं मोहबस।।___ अर्थ____शिवजी का धनुष जहाज है और रामचन्द्रजी की भुजाओं राजा बल समुद्र है। धनुष टूटने से वह सब समाज डूब गया जो मोहवश पहले इस जहाज पर चढ़ा था।



प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।। कौसिक रूप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।।___ अर्थ____प्रभु ने दोनों खण्ड पृथ्वी पर फेंक दिये। यह देखकर सब लोग सुखी हुए। विश्वामित्ररूपी पवित्र समुद्र में प्रेमरूपी जल भरा है।



रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।। बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना।।___ अर्थ___ रामरूपी चन्द्रमा को निहारकर पुलकावली रूपी ऊँची तरंगें बढ़ने लगीं। आकाश में आनन्द के नगाड़े बजने लगे। देवांगनाएँ गीत गा_गाकर नाचने लगीं।



ब्रह्मादिक मुनि सिद्ध मुनीसा। प्रभुहिं प्रसंसहिं देहिं असीसा।। बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किन्नर गीत रसाला।।____ अर्थ____ ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वर प्रभु की बड़ाई करने लगे,और आशीर्वाद देने लगे और अनेक रंग की पुष्प मालाएँ बरसाने लगे, किन्नर गण रसीले गीत गाने लगे।



रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुष भंग धुनि जात न जानी।। मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम सम्भु धनु भारी।।___ अर्थ____ संसार में जयजयकार की ध्वनि छा गयी। जिससे धनुषभंग की ध्वनि नहीं जानी जाती। आनंदित होकर जहाँ_ तहाँ स्त्री_पुरुष कहने लगे कि रामचन्द्रजी ने भारी शिवधनुष तोड़ दिया।



बन्दी मागध सूतगन, बिरुद बदहिं मतिधीर। करहिं निछावरि लोग सब, हय गय मनि चीर।।___ अर्थ____ चतुर भाट, मागध और सूत कीर्ति बखानने लगे और सब लोग घोड़ा, हाथी, मनि धन और वस्त्र निछावर करने लगे।



झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुन्दुभी सुहाई।। बाजहिं बहु बाजने सुहाये। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाये।।___ अर्थ___झाँझ, मृदंग, शंख, नफिरी, तुरही, ढोल, नगाड़े आदि सुन्दर बाजे बजने लगे और जहाँ_ तहाँ युवतियों ने मंगल गीत गाये।



सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी।। जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थके थाह जनु पाई।।____ अर्थ____ सखियों सहित रानी प्रसन्न हुईं मानो सूखते हुए धान पर पानी पड़ गया हो। राजा जनक ने शोक छोड़कर ऐसा सुख पाया माने थके हुए तैरनेवाले मे थाह पा ली हो।



श्री हत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे।। सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती।। जनु चातकी पाइ जनु स्वाती।।___ अर्थ___धनुष टूटने पर राजा लोग ऐसे कांतिहीन हुए जैसे दिन में दीपक की शोभा जाती रहती है। सीताजी का सुख किस भाँति वर्णन किया जाय ?  जैसे चातकी स्वाति का जल पी गई हो।



रामहि लखन बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें।। सतानन्द तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा।।___अर्थ____ रामचन्द्रजी को लक्ष्मणजी ऐसे देखने लगे जैसे चन्द्रमा को चकोर का बच्चा देखता है। सतानंदजी ने आज्ञा दी तो सीताजी रामचन्द्रजी के पास चलीं।



संग सखीं सुन्दर चतुर, गावहिं मंगलचार। गवनी बाल मरालगति, सुषमा अंग अपार।।___ अर्थ____साथ में सुन्दर चतुर सखियाँ मंगल गीत गाती हुई जा रहीं हैं, सीताजी बाल_ राजहंसिनी की चाल चलीं, उनके अंगों में अपार शोभा थी।



सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।। कर सरोज जयमाल सुहाई। विश्वविजय शोभा जनु पाई।।____ अर्थ___सखियों के बीच में सीताजी ऐसे सुशोभित हो रही थीं जैसे सुन्दरताओं के बीच महा सुन्दरता हो। कर_ कमलों में सुन्दर जयमाल थीं, जिसमें संसार विजय की शोभा छा रही थी।



तन सकोच मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेम लखि परइ न काहू।। जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी।।___ अर्थ___शरीर में लाज तथा बहुत उमंग थी, यह गुप्त प्रेम किसी को जान नहीं पड़ता। निकट जानकर रामचन्द्रजी की शोभा देखकर राजकुमारी जानकीजी चित्र में लिखी सी रह गईं।



चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।। सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाइ।।___ अर्थ____ यह दशा देखकर चतुर सखी ने समझाकर कहा__सुन्दर जयमाला पहना दो। सुनते ही दोनों हाथों से माला उठाई पर प्रेम के वश पहनाई नहीं जाती।



सोहत जनु जुग जल जल नाला। ससिहि सभीत देत जयमाला।। गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।।___ अर्थ___ऐसी शोभा हुई मानो डंडियों सहित दो कमल संकुचित होकर चन्द्रमा को जयमाला दे रहे हों। ऐसी शोभा देख सखियाँ जाने लगीं। तब सीताजी ने जयमाला श्रीरामचन्द्रजी के गले में पहना दी।



रघुबर उर जयमाल, देखि देव बरसहिं सुमन। सकुचे सकल भुआल, जनु बिलोकि रबि कुमुदगन।।___ अर्थ___ रामचन्द्रजीकेे हृदय पर जयमाला देखकर देवता पुष्प बरसाने लगे और राजालोग ऐसे सकुचाये जैसे सूर्य को देखकर नलिनियों का समूह मुरझा जाता है।



पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।। सुर किन्नर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा।।___ अर्थ___नगर और आकाश में बाजे बजने लगे, दुष्ट उदास और सब सज्जन प्रसन्न हुए। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनीश्वर जय_जयकार कर आशीर्वाद देने लगे।



नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं।। जहँ बिप्र बेद धुनि करहीं। बन्दी बिरिदावली उच्चरहीं।। अर्थ___ देवताओं की स्त्रियाँ नाचने लगीं और बारम्बार पुष्पों की वर्षा करने लगीं। जहाँ_ तहाँ ब्राह्मण वेद ध्वनि करने लगे, भाट वंश का गान करने लगे।



महि पाताल नाल जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा।। करहिं आरति पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी।।___ अर्थ___ भूमि, पाताल, स्वर्ग में यश छा गया कि रामचन्द्रजी ने धनुष को तोड़ा है और सीताजी को वर लिया। नगर के स्त्री_ पुरुष से अधिक न्यौछावर देने लगे।



सोहति सीय राम कै जोरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी।। सखी कहहिं प्रभु पद गहु सीता। कर तिन चरन परस अति भीता।।___ अर्थ___ श्रीसीतारामजी की जोड़ी ऐसे सोहती थी मानो शोभा और श्रृंगार एकत्र हुए हों। सखियों ने कहा___ सीता ! प्रभु के चरण छुओ। परन्तु सीताजी बहुत डरकर चरण नहीं छूतीं।



गौतम नारि गति सुरति करि, नहिं परसति पग पानि। मन बिहसे रघुबंसमनि, प्रीति अलौकिक जानि।।___ अर्थ___  गौतम ऋषि की स्त्री अहल्या की गति की स्मरण करके वे रामचन्द्रजी के चरणों को हाथ से नहीं छूती, इस अनोखी प्रीति को जानकर रघुवंशमनि श्रीरामचन्द्रजी मन में हँसे।



तब समय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।। उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे।।___ अर्थ___ उस समय सीताजी को देख कुछ राजा ललचा उठे। वे दुष्ट, कपूत और मूर्ख मन में डाह करने लगे। वे अभागे उठ_उठकर कवच आदि टजहाँ_तहाँ गाल बजाने लगे।



लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।। तोरें धनुषु चाह नहिं सरई। जीवत हमहिं कुअँरि को बरई।।___ अर्थ___कोई बोले_सीताजी को छीन लो और दोनों राजकुमारों को पकड़कर बाँध लो। धनुष तोड़ डालने से ही इच्छा पूरी नहीं होगी, हमारे जीते_ जी कौन राजकुमारी को ब्याह सकता है ?



जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई।। साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहिं लाज लजानी।।___ अर्थ___ यदि राजा जनक कुछ सहायता करें तो दोनों भाइयों सहित युद्ध में उन्हें जीत लो। यह बात सुनकर साधु राजा बोले___ इस राजसभा में को लाज भी लजा गई है।



बलु प्रतापु, वीरता बड़ाई। नाक पिनाकहिं संग सिधाई।। सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुँह मसि लाई।।___ अर्थ___बल, प्रताप, वीरता, बड़ाई और मर्यादा ये सब धनुष के साथ ही चले गए। वही शूरता थी या अब कहीं से पागए ? ऐसी दुष्ट बुद्धि है तभी तो ब्रह्मा ने तुम्हारे मुख पर स्याही लगा दी।



देखहु रामहि नयन भरि, तजि रिष मदु कोहु। लखन रोष पावक प्रबल, जानि सलभ जनि होहु।।___ अर्थ___ बार घमण्ड और क्रोध छोड़कर नेत्र भर रामचन्द्रजी को देख लो। लक्ष्मणजी के क्रोध को,प्रचंड अग्नि जानकर पतंगे मत बनो।



बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नागअरि भागू।। जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।।___ अर्थ__ जैसे गरुड़ का भाग कौआ चाहे, बिना कारण क्रोध करनेवाला कुशलता चाहे और शिवजी का बैरी सुख_दुःखादि संपदा चाहे।



लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता की कामी लहई।। हरि पद बिमुख परम गति चाहा। बस तुम्हार लालच नरनाहा।।___ अर्थ___ लोभी_ लालची सुन्दर कीर्ति चाहे, कामी पुरुष क्या निष्कलंकता पा सकता है ? श्रीहरि के चरणों से विमुख मुक्ति चाहे, हे राजाओं ! वैसे ही तुम्हारा लालच व्यर्थ है।



कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखी लबाई गईं जहँ रानी।। रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेह बरनत मन माहीं।।___ अर्थ___राजाओं का हल्ला सुनकर सीताजी डर गयीं। सब सखियाँ वहाँ लिवा ले गईं जहाँ रानी थीं। रामजी सीधे स्वभाव से सीताजी की मन में बड़ाई करते हुए गुरुजी के पास चले।



रानिन्ह सहित सोच बस सीया। अबधौं बिधिहि काह करनीया।। भूप बचन सुनि इतने उर तकहिं। लषनु राम डर बोलि न सकहीं।।___ _ अर्थ____ रानियों सहित सीताजी सोचविचार में पड़ गईं कि न जाने विधाता को और क्या करना है ? राजाओं की बातचीत सुनकर लक्ष्मणजी इधर_ उधर देखने लगे, पर रामजी के डर से कुछ नहीं कह सकते।



अरुन नयन भृकुटी कुटिल, चितवत नृपन्ह सकोप। मनहुँ मत्त गजगन निरखि, सिंघ किसोरहिं चोप।।___ अर्थ____उनके नेत्र लाल और भौंहें टेढ़ी हो गईं और वे राजाओं को क्रोध से देखने लगे, रामजी के डर से कुछ कह नहीं सकते।



खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।। तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयऊ भृगुकुल कमल पतंगा।।___ अर्थ___ हलचल देखकर नगर की स्त्रियाँ बेचैन हो गईं और वे राजाओं को गालियाँ देने लगीं। उसी समय शिव_ धनुष का टूटना सुनकर भृगुकुलरूपी कमल के सूर्य परशुरामजी आए।



देखि मुनिहि सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने।। गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुण्ड बिराजा।।___ अर्थ___उन्हें देखकर राजालोग सकुचा गये जैसे बाज की झपट से बटेर छिप जाते हैं। गोरे शरीर में सुन्दर विभूति शोभायमान है और चौड़े मस्तक पर त्रिपुण्ड विराजमान है।



सीस जटा ससि बदनु सुहावा। रिस बस कछुक अरुन होइ आवा।। भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।।___ अर्थ____ सिर पर जटाजूट है और मुखचन्द्र क्रोध से कुछ लाल हो गया है। भौंहें टेढ़ी और नेत्र क्रोध से लाल हो रहे हैं। सहज ही देखते हैं तो भी ऐसा जान पड़ता है कि मानो क्रोध से भरे हैं।



बृषभ कन्ध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला।। कटि मुनिबसन तून दुई बाँधे। धनु सर कर कुठार कल काँधे।।___ अर्थ___बृषभ_के से ऊँचे कंधे, चौड़ी छाती, लम्बी भुजाएँ, सुन्दर जनेऊ और माला पहने हैं तथा मृगछाला लिये हैं। कमर में मुनिवस्त्र पहने, दो तर्कस बाँधे, धनुषबाण हाथ में लिये सुन्दर फरसा कंधे पर है।



सांत बेषु करनी कठिन, बरनि न जाइ सरूप। धरि मुनि तनु जनु बार रसु, आयउ जहँ सब भूप।।___अर्थ___शान्त बेष है, पर करनी कठिन है, स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता। जहाँ सब राजा थे वहाँ मानो वीररस ही मुनि_ शरीर धारण करके आया है।



देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।। पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दण्ड प्रणामा।।___ अर्थ____ परशुरामजी का भयानक रूप देखकर सब राजा घबरा उठे और पिता समेत अपना_ अपना नाम कह_कहकर सब दण्डवत् प्रणाम करने लगे।



जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खटानी।। जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बुलाइ प्रनामु करावा।।___ अर्थ___जिसे हितू जानकर भी साधारण दृष्टि से देखते, वह जानता कि मेरी आयु बीत गई। फिर जनकजी ने आकर सिर नवाया और सीताजी को बुलाकर प्रणाम कराया।



आसिष दीन्हि सखी हरषानी। निज समाज लै गईं सयानी।। बिश्वामित्र मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।।___ अर्थ___ परशुरामजी ने आशीर्वाद दिया। चतुर सखी प्रसन्न हुईं और अपने साथ जानकीजी को ले गईं। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और दोनों भाइयों से मुनि के चरण कमलों को प्रणाम कराया।



रामु लखन दशरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।। रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।___ अर्थ____ ये राम_ लक्ष्मण महाराज दशरथ के पुत्र हैं। उनकी सुन्दर जोड़ी देखकर आशीर्वाद दिया। कामदेव के अभिमान को दूर करनेवाले रामचन्द्रजी के रूप को नेत्रों से देख स्तंभित रह गये।



बहुरि बिलोकि बिदेह सन, कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि, व्यापेउ कोपु सरीर।।___ अर्थ____फिर राजा जनक की ओर देखकर बोले___ कहो ! यह भीड़ क्यों है। जानकर भी अज्ञानी की तरह पूछते हुए शरीर में क्रोध भर आया।



समाचार कहि जनक सुनाये। जेहि कारन महीप सब आये।। सुनत बचन फिरि अनंत निहारे। देखे चापखण्ड मही डारे।।___ अर्थ___ तब राजा जनक ने सब हाल कह सुनाया कि जिस कारण सब राजा इकट्ठे हुए थे। उनके बचन सुनकर फिर दूसरी ओर देखा तो धनुष के दो खण्ड पृथ्वी पर पड़े हुए देखे।



अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तब राजू।।___ अर्थ____बड़े क्रोध से कठोर बचन बोले____रे मूर्ख जनक ! कह धनुष किसने तोड़ा है ? रे मूढ़ ! उसे जल्दी दिखा, नहीं तो आज ही जहाँ तक तेरा राज्य है वहाँ तक की पृथ्वी को उलट दूँगा।



अति डरु उतरु देत नृप नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।। सुर मुनि नाग नगर मर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।___ अर्थ___बड़े डर से राजा जनक उत्तर नहीं देते। यह देख कुटिल राजा अपने मन में प्रसन्न हुए और देवता, मुनि, नाग, नगर के स्त्री पुरुष सब अपने_ अपने मन में डरकर काँपने लगे।



मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।। भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।___ अर्थ___ सीताजी की माता मन में कहने लगीं कि ब्रह्मा ने बनी बनाई बात बिगाड़ दी।परशुरामजी का स्वभाव सुनकर सीताजी को आधा क्षण भी कल्प के बराबर लगा।



सभय बिलोके लोग सब, जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरष विषादु कछु, बोले श्रीरघुबीर।।___ अर्थ____ सब लोगों को डरे हुए देख और सीताजी को बेचैन जानकर, जिसके मन में हर्ष_विषाद कुछ भी नहीं है, ऐसे श्रीरामचन्द्रजी बोले__