Wednesday, 16 June 2021

द्वितीय सोपान अयोध्याकाण्ड

यस्यांके च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके। भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि ब्यालराट्।। सोऽयं भूति विभूषण: सुरवर: सर्वाधीप: सर्वदा। शर्व: सर्वगत: शिव: शशिनिभ: श्रीशंकर: पातु माम्।।_अर्थ_जिनकी गोद में हिमाचलसुता पार्वतीजी, मस्तक पर गंगाजी, ललाट पर द्वितीया का चन्द्रमा, कण्ठ में हलाहल विष और वक्ष:स्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर संहारकर्ता ( या भक्तों के पापनाशक ), सर्वव्यापक, कल्यानरूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण शंकरजी सदा मेरी रक्षा करें।

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्लेवनवासदु:खत:। मुखाम्बुज श्रीरघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मंजुलमंगलप्रदा।।_अर्थ_रघुकुल को आनन्द देनेवाले श्रीरामचन्द्रजी के मुखारविंद की जो शोभा राज्याभिषेक ( राज्याभिषेक की बात सुनकर ) न तो प्रसन्नता हुई और न वनवास के दु:ख से मलीन ही हुई, वह ( मुखकमल की छवि ) मेरे लिये सदा सुन्दर मंगलों की देनेवाली हो।

नीलाम्बुजश्यामलकोमलांगं सीतासमारोहपितवामभागम्। पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम्।।_अर्थ_नीले कमल के समान श्याम और कोमल जिनके अंग हैं, श्रीसीताजी जिनके वाम_भाग में विराजमान हैं और जिनके हाथों में ( क्रमशः ) अमोघ बाण और सुन्दर धनुष हैं, उन रघुवंश के स्वामी श्रीरामचन्द्र जी को मैं नमस्कार करता हूं।





श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि। बरनी रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि।।_अर्थ_श्रीगुरुजी के चरणकमलों की रज से अपने मनरूपी दर्पण को साफ करके मैं श्री रघुनाथ जी के उस निर्मल यश का वर्णन करता हूं, जो चारों फलों को ( धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष को ) देनेवाला है।





जब तें रामु ब्याहि घर आए। नित नव मंगल मोद बधाए।। भुवन चारिदस भूधर भारी। सुकृत मेघ बरसहिं सुख बारी।।_अर्थ_जबसे श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये, तबसे ( अयोध्या में ) नित नये मंगल हो रहे हैं और आनन्द के बधावे बज रहे हैं। चौदहों लोकरूपी बड़े भारी पर्वतों पर पुण्यरूपी मेघ सुखरूपी जल बरसा रहे हैं।





रिधि सिद्धि संपति नदीं सुहाई। उमगि अवध अंबुधि कहुं आई।। मनि गन पुर नर नारि सुजाती। सुचि अमोल सुंदर बहु भांति।।_अर्थ_ रिद्धि_सिद्धि और संपत्ति रूपी सुहावनी नदियां उमड़_उमड़कर अयोध्यारूपी समुद्र में आ मिलीं। नगर के स्त्री_पुरुष अच्छी जाति के मणियों के समूह हैं, जो सब प्रकार से अमूल्य, पवित्र और सुन्दर हैं।





कहि न जाइ कछु नगर बिभूती। तनु एतनीय बिरंचि करतूती।। सब बिधि सब पुर लोग सुखारी। रामचंद मुख चंद निहारी।।_अर्थ_नगर का ऐश्वर्य कुछ कहा नहीं जाता। ऐसा जान पड़ता है, मानो ब्रह्माजी की कारीगरी बस इतनी ही  है। सब नगरनिवासी श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को देखकर सब प्रकार से सुखी हैं।





मुदित मातु सब सखी सहेली। फलित बिलोकि मनोरथ बेली।। राम रूपु गुन सीलु सुभाऊ। प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ।।_अर्थ_सब माताएं और सखी_सहेलियां अपनी मनोरथरूपी बेल को फली हुई देखकर आनन्दित हैं। श्रीरामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को देख_सुनकर राजा दशरथजी बहुत ही आनंदित होते हैं।





 सब के उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु। आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु।।_अर्थ_सबके हृदय में ऐसी अभिलाषा है और सब महादेवजी को मनाकर ( प्रार्थना करके ) कहते हैैं कि राजा अपने जीते_जी श्रीरामचन्द्रजी को युवराज पद दे दें।





एक समय सब सहित समाजा। राजसभां रघुराज बिराजा।। सकल सुकृति मूर्ति नरनाहू। राम सुजसु सुनि अतिथि उछाहू।।_अर्थ_एक समय रघुकुल के राजा दशरथजी अपने सारे समाज सहित राजसभा में विराजमान थे। महाराज समस्त पुण्यों की मूर्ति हैं, उन्हें श्रीरामचन्द्रजी का सुन्दर यश सुनकर अत्यन्त आनन्द हो रहा है।






बालकाण्ड

देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।। मारग जात भयावनि भारी। केहिबिधि तात ताड़का मारी।।_अर्थ_श्रीरामजी के सांवले सुन्दर कोमल अंगों को देखकर सब माताएं प्रेम सहित  वचन कहे रही हैं_हे तात ! मार्ग में जाते हुए तुमने बड़ी सयानी ताड़का राक्षसी को किस प्रकार से मारा ?





घोर निसाचर बिकट समर गनहिं नहिं काहु। मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु।।_अर्थ_बड़े भयानक राक्षस जो बिकट योद्धा थे और जो युद्ध में किसी को कुछ नहीं गिनते थे, उन दुष्ट मारीच और सुबाहु को सहायकों सहित तुमने कैसे मारा?





मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईंस अनेक करवरें टारी।। मख रखवारी करि दुहुं भाई। गुरु प्रसाद सब विद्या पाई।।_अर्थ_हे तात ! मैं बलैया लेती हूं, मुनि की कृपा से ही ईश्वर ने बहुत_सी बलाओं को टाला। दोनो भाइयों ने यज्ञ की रखवाली करके गुरुजी के प्रसाद से सब विद्याएं पायीं।





मुनि तिय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरी पूरी।। कमल पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुं सिव धनु तोरा।।_अर्थ_चरणों की धूलि लगते ही मुनि पत्नी अहिल्या तर गयी। विश्व भर में यह कीर्ति पूर्ण रूप से व्याप्त हो गयी कच्छप की पीठ, वज्र और पर्वत से भी कठोर शिवजी के धनुष को राजाओं के समाज में तुमने तोड़ दिया।





बिस्व बिजय जसु जानकी पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।। सकल अमानुष  करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपां सुधारें।।_अर्थ_ विश्वविजय के यश और जानकी को पाया और सब भाइयों को ब्याहकर घर आये। तुम्हारे सभी कर्म अमानुषी हैं ( मनुष्य की शक्ति से बाहर हैं ), जिन्हें केवल विश्वामित्रजी की कृपा ने सुधारा है ( सम्पन्न किया है )।





आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।। जे दिन  गए तुम्हहिं  बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।_अर्थ_हे तात ! तुम्हारा चन्द्रमुख देखकर आज हमारा जगत्  जन्म लेना सफल हुआ। तुमको बिना देखे जो दिन बीते हैं, उनको ब्रह्मा गिनती में न लावें ( हमारी आयु में शामिल न करें)।





राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन। सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन।।_अर्थ_ विनय से भरे उत्तम वचन कहकर श्रीरामचन्द्र जी ने माताओं को संतुष्ट किया। फिर शिवजी, गुरु और ब्राह्मणों के चरणों का स्मरण कर नेत्रों को नींद के वश किया ( अर्थात् वे हो रहे )।





नींदउं बदन सोह सठि लोना। मनहुं सांझ सरसीरुह सोना।। घर घर करहिं जागरन नारी। देहिं परस्पर मंगल गारी।।_अर्थ_नींद में भी उनका अत्यन्त सलोना मुखड़ा ऐसा सोह रहा था, मानो सन्ध्या के समय का लाल कमल सोह रहा हो। स्त्रियां घर_घर जागरण कर रही हैं और आपस में ( एक_दूसरी को ) मंगलमयी गालियां दे रही हैं।





पुरी बिराजति  राजति रजनी। रानी कहहिं बिलोकहु सजनी।। सुन्दर बधून्ह सासु लै सोईं। फनिकन्ह तनु सिरमनि उर गोईं।।_अर्थ_रानियां कहती हैं_हे सजनी ! देखो ( आज ) रात्रि  कैसी शोभा है, जिससे अयोध्या पुरी विशेष सुशोभित हो रही है ! यों कहती हुई सासुएं सुन्दर बहुओं को लेकर सो गईं, मानो सर्पों ने अपने सिर की मणियों को हृदय में छिपा लिया है।





प्रातः पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे।। बन्दि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन्ह आए।।_अर्थ_प्रात:काल पवित्र ब्रह्ममुहुर्त में प्रभु जागे। मुर्गे सुन्दर बोलने लगे। भाट और मागधों  ने गुणों का गान किया तथा नगर के लोग द्वार पर जोहार करने को आए।





बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाई असीस मुदित सब भ्राता।। जननिन्ह सादर बदन निहारे भूपति संग द्वार पगु धारे।।_अर्थ_ब्राह्मणों, देवताओं, गुरु, पिता और माताओं की वन्दना कर आशीर्वाद पाकर सब भाई प्रसन्न हुए। माताओं ने आदर के साथ उनके मुखों को देखा। फिर वे राजा के साथ दरवाजे ( बाहर ) पधारे।





कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ। प्रातः क्रिया करि तात पहिं आए चारिउ  _अर्थ_स्वभाव से ही पवित्र चारों भाइयों ने सब शौचादि से निवृत होकर पवित्र सरयू नदी में स्नान किया और प्रातः क्रिया ( सन्ध्या_वन्दनादि ) करके वे पिता के पास आये।





नवाह्नपारायण तीसरा विराम

भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठे हरषि रजायसु पाई।। देखि राम सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी।। राजा ने देखते ही उन्हें हृदय से लगा लिया। तदनन्तर वे आज्ञा पाकर हर्षित होकर बैठ गये। श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कर और नेत्रों के लाभ की बस यही सीमा है, ऐसा अनुमान कर सारी सभा शीतल हो गयी ( अर्थात् सबके तीनों प्रकार के ताप सदा के लिये मिट गये )।





पुनि बसिष्टु मुनि कौसिकु आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए।। सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखहिं रामु दोउ गुर अनुरागे।।_अर्थ_फिर मुनि बसिष्ठजी और विश्वामित्रजी आए। राजा ने उनको सुन्दर आसनों पर बैठाया और पुत्रों समेत उनकी पूजा करके उनके चरणों लगे। दोनो गुरु श्रीरामजी को देखकर प्रेम में मुग्ध हो गये।





कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीस सहित रनिवासा।। मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी।।_अर्थ_बसिष्टजी धर्म के इतिहास कह रहे हैं और राजा रनिवास सहित सुन रहे हैं। जो मुनियों के मन को भी अगम्य है, ऐसी विश्वामित्र जी की करनी को बसिष्टजी ने आनन्दित होकर बहुत प्रकार से वर्णन किया।





बोले बामदेउ सब सांची। कीरति कवित लोक तिहुं माची।। सुनि आनंदु भरी सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू।।_अर्थ_वामदेवजी बोले_ये सब बातें सत्य हैं। विश्वामित्रजी की सुन्दर कीर्ति तीनों लोकों में छायी है। यह सुनकर सब किसी को आनन्द हुआ। श्रीराम_लक्ष्मण के हृदय में अधिक उत्साह ( आनंद ) हुआ।





मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भांति। उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति।।_अर्थ_नित्य मंगल, आनंद और उत्सव होते हैं; इस तरह आनंद से भरकर उमड़ पड़ी, आनंद की अधिकता अधिक_अधिक बढ़ती ही जा रही है।





सुदिन सोधि कल कंकन छोरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।। नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं।।_अर्थ_ अच्छा दिन ( शुभ मुहूर्त ) शोधकर सुन्दर कंकण खोले गये। मंगल, आनंद और विनोद कुछ कम नहीं हुए ( अर्थात् बहुत हुए )। इस प्रकार नित्य नये सुख को देखकर देवता सिहाते हैं और अयोध्या में जन्म पाने के लिये ब्रह्माजी से याचना करते हैं।





बिस्वामित्रु चलन नित चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं।। दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ।।_अर्थ_विश्वामित्रजी नित्य ही चलना ( अपने आश्रम जाना ) चाहते हैं, पर रामचन्द्रजी के स्नेह और विनयवश  रह जाते हैं। दिनों-दिन राजा का सौगुना भाव ( प्रेम ) देखकर महामुनिराज  विश्वामित्रजी उनकी सराहना करते हैं। 





मागत विदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ भए आगे।। नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवक समेत सुत नारी।।_अर्थ_अन्त  जब विश्वामित्रजी ने विदा मांगी, तब राजा प्रेममग्न हो गये और पुत्रोंसहित आकर खड़े हो गये। ( वे बोले_ ) हे नाथ ! यह सारी सम्पदा आपकी है। मैं तो स्त्री_पुत्रोंसहित आपका सेवक हूं।





करब सदा लरिकन्ह पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू।। अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी।।_अर्थ_हे मुनि ! लड़कों पर सदा स्नेह करते रहियेगा। ऐसा कहकर पुत्रों और रानियोंसहित राजा दशरथजी विश्वामित्रजी के चरणों पर गिर पड़े। ( प्रेमविह्वल हो जाने के कारण ) उनके मुंह से बात नहीं निकलती।





दीन्हि असीस बिप्र बहु भांति। चले न प्रीति की रीति कहि जाती।। रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुंचाई।।_अर्थ_ ब्राह्मण विश्वामित्रजी ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद दिये और वे चल पड़े, प्रीति की रीति कहीं नहीं जाती। सब भाइयों को साथ लेकर श्रीरामजी प्रेम के साथ उन्हें पहुंचाकर और आज्ञा पाकर लौटे।





राम रूप भूपति भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु। जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु।।_अर्थ_गाधिकुल के चन्द्रमा विश्वामित्रजी  बड़े हर्ष के साथ श्रीरामचन्द्रजी के रूप, राजा दशरथ जी की भक्ति ( चारों भाइयों के ) विवाह और ( सबके ) उत्साह को मन_ही_मन सराहते जाते हैं।





बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।। सुनि सुनि सुजस मनहिं मन राऊ। बरनी आपन पुन्य प्रभाऊ।।_अर्थ_ बामदेवजी और रघुकुल के गुरु ज्ञानी वसिष्ठजी ने फिर विश्वामित्रजी की कथा बखानकर कही। मुनि का सुन्दर यश सुनकर राजा मन_ही_मन अपने पुण्यों के प्रभाव का बखान करने लगे।





बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहं गयऊ।। जहं तहं राम ब्याहु सब गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुं छावा।।_अर्थ_आज्ञा हुई तब सब लोग ( अपने अपने घरों को ) लौटे। राजा दशरथजी भी पुत्रोंसहित महल में गये। जहां_तहां सब श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की गाथाएं गा रहे हैं। श्रीरामचन्द्रजी का पवित्र सुयश तीनों लोकों में छा गया।





आए  रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।। प्रभु बिबाहं जब भयउ उछाहू। सकइ न बरनि गिरा अहिनाहू।।_अर्थ_जब से श्रीरामचन्द्रजी विवाह करके घर आये,  तबसे सब प्रकार का आनंद अयोध्या में आकर बसने लगा। प्रभु के विवाह में जैसा आनंद उत्साह हुआ, उसे सरस्वती और सर्पों के राजा शेष जी भी नहीं कह सकते।





कबिकुल जीवन पावन जानी। राम सीय जसु मंगल खानी।। तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।_अर्थ_श्रीसीतारामजी के यश को कविकुल के जीवन को पवित्र करनेवाला और मंगलों की खान जानकर, इससे मैंने अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये कुछ ( थोड़ा_सा ) बखान कर कहा है।





निज गिरा करन कारन राम जसु तुलसी कहृयो। रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौने लह्यो।। उपबीत  ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं। बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं।।_अर्थ_अपनी वाणी को पवित्र करने के लिये तुलसी ने राम का यश कहा है। ( नहीं तो ) श्रीरघुनाथजी का चरित्र अपार समुद्र है, किस कवि ने उसका पार पाया है ? जो लोग यज्ञोपवीत और विवाह के मंगलमय उत्सव का वर्णन आदर के साथ सुनकर गावेंगे, वे लोग श्रीजानकीजी और श्रीरामजी  की कृपा से सदा सुख पावेंगे।





 रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुं सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।_अर्थ_श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी के विवाह प्रसंग को लोग प्रेमपूर्वक गायेंगे_सुनेंगे उनके लिखे सदा उत्साह ( आनंद )_ही_उत्साह है; क्यों कि श्रीरामचन्द्रजी का यश मंगल का नाम है।





मासपारायण, बारहवां विश्राम

इति श्रीरामचरितमानसे सकलकलिकलुष विध्वंसने प्रथम सोपान: समाप्त
कलियुग के संपूर्ण पापों को विध्वंस करनेवाले श्रीरामचरितमानस का यह पहला सोपान समाप्त हुआ।

Monday, 3 May 2021

बालकाण्ड

चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।। तिन्ह पर कुअंरि कुअंर बैठारे। सादर पाय पुनीत पखारे।।_अर्थ_स्वाभाविक ही सुन्दर चार सिंहासन थे, जो मानो कामदेव ने अपने हाथ से बनाये थे। उनपर माताओं ने राजकुमारियों और राजकुमारों को बैठाया और आदर के साथ उनके पवित्र चरण धोये।





धूप दीप नैबेद बेदबिधि। पूजे बर दुलहिनी मंगलनिधि।। बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढ़रहीं।।_अर्थ_ फिर वेद की विधि के अनुसार मंगलों के निधान दूलह और दुलहिनों की धूप, दीप और नैवेद्य आदि के द्वारा पूजा की। माताएं बारंबार आरती कर रही हैं और वर_वधूओं के सिरों पर सुन्दर पंखे तथा चंवर ढल रहे हैं।





बस्तु अनेक निछावरि होहीं। भरी प्रमोद मातु सब सोहीं।। पावा परम तत्व तनु जोगीं। अमृतु लहेउ जनु संतत रोगीं।।_अर्थ_अनेकों वस्तुएं निछावर हो रही हैं; सभी माताएं आनंद से भरी हुईं ऐसी सुशोभित हो रही हैं मानो योगी ने परम तत्व को प्राप्त कर लिया।





परम रंक जनु पारस पावा। अंधहिं लोचन लाभु सुहावा।। मूक बदन तनु सारद छाई। मानहुं समर सूर जय पाई।।_अर्थ_जन्म का दरिद्रि मानो पारस पा गया। अंधे को सुंदर नेत्रों का लाभ हुआ। गूंगे के मुख में मानो सरस्वती आ विराजीं और शूरवीर ने मानो युद्ध में विजय पा ली।





एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु। भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु।।_अर्थ_इन सुखों से भी सौ करोड़ गुना बढ़कर आनंद माताएं पा रही हैं। क्योंकि रघुकुल के चन्द्रमा श्रीरामजी विवाह करके भाइयों सहित घर आये हैं।





लोक रीति जननि करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं। मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ राम मनहिं मुसुकाहिं।।_अर्थ_ माताएं लोकरीति करती हैं और दूलह_दुलहिनें सकुचाते हैं। इस महान् आनंद और विनोद को देखकर श्रीरामजी मन_ही_मन मुस्करा रहे हैं।





देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।। सबहि बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।।_अर्थ_मन की सभी वासनाएं पूरी हुई जानकर देवता और पितरों का भली-भांति पूजन किया सबकी वन्दना करके माताएं यही वरदान मांगती हैं कि भाइयों सहित श्रीरामजी का कल्याण हो।





अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेहीं।। भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।।_अर्थ_देवता छिपे हुए ( अन्तरिक्ष से ) आशीर्वाद दे रहे हैं और माताएं आनन्दित हो आंचल भरकर ले रही हैं। तदनन्तर राजा ने बरातियों को बुलवा लिया और उन्हें सवारियां, वस्त्र, मणि ( रत्न ) और आभूषणादि दिये।





आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहिं।। पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन सकल बनाए।।_अर्थ_आज्ञा पाकर, श्रीरामजी को हृदय में रखकर वे सब आनन्दित होकर अपने घर गये। नगर के समस्त स्त्री_पुरुषों को राजा ने कपड़े और गहने पहनाये। घर_घर बनावे बजने लगे।




जाचक जन जाचहिं जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।। सेवक सकल बजनिया नाना। पूरन किए दान सनमाना।।_अर्थ_याचक लोग जो जो मांगते हैं, विशेष प्रसन्न होकर राजा उन्हें वही_वही देते हैं। संपूर्ण सेवकों और बाजेवालों को राजा ने नाना प्रकार के दान और सम्मान से संतुष्ट किया।





देहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ। तब गुर भूसुर सहित गृह गवनु कीन्ह नरनाथ।।_अर्थ_सब जोहार ( वन्दन ) करके आशिष देते हैं और गुणसमूहों की कथा गाते हैं। तब गुरु और ब्राह्मणों सहित राजा दशरथजी ने महल में गमन किया।





जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।। भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठी भाग्य बर जानी।।_अर्थ_वशिष्ठजी ने जो आज्ञा दी, उसे लोक और वेद की विधि के अनुसार राजा ने आदरपूर्वक किया। ब्राह्मणों की भीड़ देख कर अपना बड़ा भाग्य जानकर सब रानियां आदर के साथ उठीं।




पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजी बहुविधि भूप जेवांए।। आदर दान प्रेम परितोषे। देत असीस चले मन तोषे।।_अर्थ_ चरण धोकर उन्होंने सबको स्नान कराया और राजा ने भली_भांति पूजन करके उन्हें भोजन कराया। आदर, दान और प्रेम से पुष्ट हुए वे संतुष्ट मन से आशीर्वाद दे ते हुए चले।





बहुबिधि कीन्ह गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा।। कीन्हि प्रशंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्ही पग धूरी।।_अर्थ_राजा ने गाधिपुत्र विश्वामित्र जी की बहुत तरह से पूजा की और कहा_हे नाथ ! मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है। राजा ने उनकी बहुत प्रशंसा की और रानियों सहित उनकी चरणधूलि को ग्रहण किया।





भीतर भवन दीन्ह बर बासू। मन जोगवत रह नृपु रनिवासु।। पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्ह बिनती उर प्रीति न थोरी।।_अर्थ_उन्हें महल के भीतर ठहरने का उत्तम स्थान दिया, जिसमें राजा और सब रनिवास उनका मन जोहता रहे ( अर्थात् जिसमें राजा और महल की सारी रानियां स्वयं उनके इच्छानुसार उनके राम की ओर दृष्टि रख सकें ), फिर राजा गुरु वसिष्ठ जी के चरण कमलों की पूजा की और विनती की। उनके हृदय में प्रीति कम न थी ( अर्थात् बहुत प्रीति थी।)





बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु। पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीसु महीसु।।_अर्थ_बहुओंसहित सब राजकुमार और सब रानियों समेत राजा बार गुरुजी के चरणों की वन्दना करते हैं और मुनीश्वर आशीर्वाद देते हैं।





बिनय कीन्ह उर अति अनुरागें। सुख संपदा राखि सब आगें।। नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा।। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा।।_अर्थ_राजा ने अत्यन्त प्रेमपूर्ण हृदय पुत्रों को और सारी सम्पत्ति को सामने आकर ( उसे स्वीकार करने के लिये ) विनती की। परन्तु मुनिराज ने ( पुरोहित के नाते ) केवल अपना नेग मांग लिया और बहुत तरह से आशीर्वाद दिया।





उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता।। बिप्रबधू सब भूप बोलाईं। चैल चारु भूषन पहिराई।।_अर्थ_फिर सीताजी सहित श्रीरामजी को हृदय में रखकर गुरु वशिष्ठ जी हर्षित होकर अपने स्थान को गये। राजा ने सब ब्राह्मणों की स्त्रियों को बुलवाया और उन्हें सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण पहनाये।





बहुरि बोलाइ सुवासिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्ही।। नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरूप भूपमनि देहीं।।_अर्थ_फिर सब सुआसिनिओं को ( नगरभर की सौभाग्यवती बहिन, बेटी, भानजी आदि को ) बुलवा लिया और उनकी रुचि समझकर ( उसी के अनुसार ) उन्हें पहिरावनी दी। नेगी लोग अपना-अपना नेग_जोग लेते और राजाओं के शिरोमणि दशरथजी उनकी इच्छा के अनुसार देते हैं।





प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भांति सनमाने।। देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरसि प्रसून प्रसंसि उछाहू।।_अर्थ_ जिन मेहमानों को प्रिय और पूजनीय जाना, उसका राजा ने भली_भांति सम्मान किया। देवगण श्रीरघुनाथजी का विवाह देखकर, उत्सव की प्रशंसा करके फूल बरसाते हुए_।





चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदय समाइ।।_अर्थ_नगाड़े बजाकर और ( परम) सुख प्राप्त कर अपने_अपने लोकों को चले। वे एक_दूसरे से श्रीरामजी का यश कहते जाते हैं। हृदय में प्रेम समाता नहीं है।





सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयं भरि पूरि उछाहू।। जहं रनिवास तहां पंगु धारे। सहित बधूटिन्ह कुंअर निहारे।।_अर्थ_सब प्रकार से सबका प्रेमपूर्वक  भली-भांति आदर_सत्कार कर लेने पर राजा दशरथजी के हृदय में पूर्ण उत्साह ( आनन्द ) भर गया। जहां रनिवास था, वे वहां पधारे और बहुओं समेत उन्होंने कुमारों को देखा।





लिए गोद करि मोद  समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु देता।। बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियं हरषि दुलारीं।।_अर्थ_राजा ने आनन्द सहित पुत्रों को गोद में ले लिया। उस समय राजा को जितना सुख हुआ उसे कौन कह सकता है ? फिर पुत्रवधुओं को प्रेम सहित गोदी में बैठाकर, बार बार हृदय में हर्षित  उन्होंने उनका  दुलार ( लाड़ चाव ) किया।





देखि समाजु मुदित रनिवासू। सबकें उर आनंद कियो बासू।। कहेउ भूप जिमि भयऊ बिबाहू। सुनि सुनि हरषु होत सब काहू।।_अर्थ_यह समाज ( समारोह ) देखकर रनिवास प्रसन्न हो गया। सबके हृदय में आनंद ने निवास कर लिया। तब राजा ने जिस तरह विवाह हुआ था वह सब कहा। उसे सुन-सुनकर सबको हर्ष होता है।





जनक राज गुन सील बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई।। बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी।।_अर्थ_राजा जनक के गुण, शील, महत्व, प्रीति की रीति और सुहावनी सम्पत्ति का वर्णन राजा ने भाट की तरह बहुत प्रकार से किया। जनकजी की करनी सुनकर सब रानियां बहुत प्रसन्न हुईं।





सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति। भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति।।_अर्थ_पुत्रोंसहित स्नान करके राजा ने ब्राह्मण, गुरु और कुटुम्बियों को बुलाकर अनेक प्रकार के भोजन किये। ( यह सब करते करते पांच घड़ी रात बीत गयी।





मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुख मूल मनोहर जामिनि। अंचइ पान सब काहू पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए।।_अर्थ_सुंदर स्त्रियां मंगलगान कर रही हैं। वह रात्रि सुख की मूल और मनोहारिणी हो गयी। सबने आचमन करके पान खाये और फूलों की माला, सुगंधित द्रव्य आदि से विभूषित होकर सब शोभा से छा गये।





रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई।।  प्रेम प्रमोदु बिनोदु बड़ाई। समउ समाजु मनोहरताई।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी को देखकर और आज्ञा पाकर सब आज्ञा पाकर अपने_अपने घर को चले। वहां के प्रेम, विनोद, आनंद, महत्व, समय, समाज और मनोहरता को___।





कहि न सकहिं सत सारद सेसू।  बेद बिरंचि महेस गनेसू।। सो मैं कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरि कि धरनी।।_अर्थ_सैकड़ों  सरस्वती, शेष, वेद, ब्रह्मा, शिव और गणेश भी जिसका वर्णन नहीं कर सकते, उसका वर्णन मैं कैसे कर सकता?  कहीं केंचुआ भी धरती को सिर पर ले सकता है ?





नृप सब भांति सबहिं  सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाईं रानी।। बधू लरिकनी पर घर  आईं। राखेहु नयन पलक की नाईं।।_अर्थ_राजा ने सब प्रकार से सम्मान करके, कोमल वचन कहकर रानियों को बुलाया और कहा_बहुएं अभी बच्ची हैं, पराये घर से आयी हैं। इनको इस तरह से रखना जैसे नेत्रों को पलकें रखती  हैं ( जैसे पलकें नेत्रों की रक्षा करती हैं और उन्हें सुख पहुंचाती हैं वैसे ही इन्हें सुख पहुंचाना।)





लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ। अब कहि गे विश्रामगृहं राम चरन चितु लाइ।।_अर्थ_ लड़के थके हुए नींद के वश हो रहे, इन्हें ले जाकर शयन कराओ। ऐसा कहकर राजा श्रीरामचन्द्र जी के चरणों में मन लगाकर विश्राम भवन चले गये।





भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलंग डसाए।। सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपोतीं नाना।।_अर्थ_राजा के स्वभाव से ही सुन्दर वचन सुनकर ( रानियों ने ) मणियों से जुड़े सुवर्ण के पलंग बिछवाये। ( गद्दों पर ) गौ के दूध के फेन के समान सुन्दर एवं कोमल अनेकों सफेद चादरें बिछायीं।





उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनि मंदिर माहीं।। रतनदीप सुनि चारु चंदोवा। कहत न बनइ जान जेहि जोवा ।।_अर्थ_सुन्दर तकियों का वर्णन नहीं किया जा सकता। मणियों के मन्दिर में फूलों की मालाएं और सुगंध द्रव्य सजे हैं। सुन्दर रत्नों के दीपकों और सुन्दर चंदोवे की शोभा कहते नहीं बनती। जिसने उन्हें देखा हो वही जान सकता है।





सेज रुचिर रचित रामु उठाए। प्रेम सहित पलंग पौढ़ाए।। अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयध तिन्ह कीन्ही।।_अर्थ_इस प्रकार सुन्दर शय्या सजाकर ( माताओं ने ) श्रीरामचन्द्र जी को उठाया और प्रेम सहित पलंग पर पौढ़ाया। श्रीरामजी ने बार बार भाइयों को आज्ञा दी। तब वे भी अपनी अपनी शय्याओं पर सो गये।


Sunday, 28 March 2021

बालकाण्ड

भरि भरि बसहँ अपार कहारा। पठईं जनक अनेक सुसारा।। तुरग लाख रथ सहस पचीसा। सकल सँवारे नख अरु सीसा।।_अनगिनत बैलों और कहारों पर भर_भरकर ( लाद_लादकर ) भेजी गयी। साथ ही जनकजी ने अनेकों सुंदर शय्याएँ ( पलँग ) भेजीं। एक लाख घोड़े और पचीस हजार रथ सब नख से शिखा तह ( ऊपर से नीचे तक ) सजाये हुए,





मत्त सहस दस सिंधु साजे। जिन्हहिं देखि दिसिकुंजर लाजे।। कनक बसन  मनि भरि भरि जाना। महिषीं धेनु बस्तु बिधि नाना।।_अर्थ_दस हजार सजे हुए मतवाले हाथी, जिन्हें देखकर दिशाओं के हाथी भी लजा जाते हैं, गाड़ियों में भर_भरकर सोना, वस्त्र और रत्न ( जवाहिरात ) और भैंस, गाय तथा नाना प्रकार की चीजें दी।





दाइज अमित न सकिअ कहि दीन्ह बिदेहँ बहोरि। जो अवलोकत लोकपति लोक संपदा थोरि।।_अर्थ_[ इस प्रकार]  जनकजी ने फिर से अपरिमित दहेज दिया, जो कहा नहीं जा सकता और जिसे देखकर लोकपालों के लोकों की संपदा भी थोड़ी जान पड़ती थी।





सबु समाजु एहि भाँति बनाई। जनक अवधपुर दीन्ह पठाई। चलिहिं बरात सुनत सब रानीं। बिकल मीनगन जनु लघु पानी।।_अर्थ_इस प्रकार सब समान सजाकर राजा जनक ने अयोध्यापुरी को भेज दिया। बारात चलेगी, यह सुनते ही सब रानियाँ ऐसी विकल हो गयीं, मानो थोड़े जल में मछलियाँ छटपटा रही हों।





पुनि पुनि सीय गोद करि लेहीं। देइ असीस सिखावनु देहीं।। होएहु संतत पियहि पियारी। चिरु अहिवात असीस हमारी।।_अर्थ_वे बार बार सीताजी को गोद कर लेती हैं और आशीर्वाद देकर सिखावन देती हैं_ तुम सदा अपने पति की प्यारी होओ, तुम्हारा सोहाग अचल हो; हमारी यही आशिष है।





सासु ससुर गुर सेवा करेहू। पति रुख लखि आयसु अनुसरेहू।। अति सनेह बस सखी सयानी। नारि धरम सिखवहिं मृदु बानी।।_अर्थ_सास, ससुर और गुरु की सेवा करना। पति का रुख देखकर उनकी आज्ञा का पालन करना। सयानी सखियाँ अत्यन्त स्नेह के वश कोमल वाणी से स्त्रियों के धर्म सिखलाती हैं।





सादर सकल कुअँरि समुझाई। रानिन्ह बार बार उर लाईं।। बहुरि बहुरि भेटहिं महतारीं। कहहिं बिरंचि रचीं कत नारीं।।_अर्थ_आदर के साथ सब पत्रियों को [ स्त्रियों के धर्म ] समझाकर रानियों ने बार_बार उन्हें हृदय से लगाया। माताएँ फिर फिर भेंटती और कहती हैं कि ब्रह्मा ने स्त्री जाति को क्यों रचा।





तेहि अवसर भाइन्ह सहित रामु भानुकुल केतु। चले जनक मंदिर मुदित बिदा करावन हेतु।।_अर्थ_उसी समय सूर्यवंश के पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी भाइयों सहित प्रसन्न होकर विदा कराने के लिये जनकजी के महल को चले।





चारिउ भाइ सुभायँ सुहाए। नगर नारि नर देखन धाए।। कोउ कह चलन चहत हहिं आजू। कीन्ह बिदेह बिदा कर साजू।।_अर्थ_स्वभाव से ही सुन्दर चारों भाइयों को देखने के लिये नगर के स्त्री पुरुष दौड़े। कोई कहता है_ आज ये जाना चाहते हैं। विदेह ने विदाई का सब सामान तैयार कर लिया है।





लेहु नयन भरि रूप निहारी। प्रिय पाहुने भूप सुत चारी।। को जानै केहि सुकृत सयानी। नयन अतिथि कीन्हे बिधि आनी।।_अर्थ_राजा के चारों पुत्र,  इन प्यारे मेहमानों के [ मनोहर रूप को ] नेत्र भरकर देख लो। हे सयानी ! कौन जाने, किस पुण्य से बिधाता ने इन्हें यहाँ लाकर हमारे नेत्रों का अतिथि बनाया है।





मरनशीलु जिमि पाव पिऊषा। सुरतरु लहै जनम कर भूखा।। पाव नारकी हरिपदु जैसें। इन्ह कर दरसनु हम कहँ तैसें।।_अर्थ_मरनेवाला जिस तरह अमृत पा जाय, जन्म का भूखा कल्पवृक्ष पा जाय और नरक में रहनेवाला ( या नरक के योग्य ) जीव जैसे भगवान् के परमपद को प्राप्त हो जाय, हमारे लिये इनके दर्शन वैसे ही हैं।





निरखि राम शोभा उर धरहू। निज मन फनि मूरति मनि करहू।। एहि बिधि सबहिं नयन फलु देता। गए कुअँर सब राजनिकेता।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी की शोभा को निरखकर हृदय में धर लो। अपने मन को साँप और इनकी मूर्ति को मणि बना लो। इस प्रकार सबको नेत्रों का फल देते हुए सब राजकुमार राजमहल में गये।





रूप सिंधु सब बंधु लखि हरषि उठा रनिवासु। करहिं निछावरि आरती महा मुदित मन सासु।।_अर्थ_रूप के समुद्र सब भाइयो को देखकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। सासुएँ महान् प्रसन्न मन से निछावर और आरती करती हैं।





देखि राम छबि अति अनुरागीं। प्रेम बिबस पुनि पुनि पद लागीं।। रही न लाज प्रीति उर छाईं। सहज सनेहु बरनि किमि जाई।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्जी की छबि देखकर वे प्रेम में अत्यन्त मग्न हो गयीं और प्रेम के वश होकर बार_बार चरणों लगीं। हृदय में प्रीति छा गयी, इससे लज्जा नहीं रह गयी। उनके स्वाभाविक स्नेह का वर्णन किस तरह किया जा सकता है।





भाइन्ह सहित उबटि अन्हवाए। छरस असन अति हेतु जेवाँए।।  बोले रामु सुअवसरु जानी। सील सनेह सकुचमय बानी।।_अर्थ_ उन्होंने भाइयोंसहित श्रीरामजी को उबटन करके स्नान कराया और बड़े प्रेम से षटरस भोजन कराया। सुअवसर जानकर श्रीराचन्द्रजी शील, स्नेह और संकोचभरी बाणी बोले_





राउ अवधपुर चहत सिधाए। बिदा होन हम इहाँ पठाए।। मातु मुदित मन आयसु देहू। बालक जानि करब नित नेहू।।_अर्थ_महाराज अयोध्यापुरी को चलना चाहते हैं, उन्होंने हमें विदा होने के लिये यहाँ भेजा है। हे माता ! प्रसन्न मन से आज्ञा दीजिये और हमें अपना बालक जानकर सदा स्नेह बनाये रखियेगा।





सुनत बचन बिलखेउ रनिवासू। बोलि न सकहिं प्रेमबस सासू।। हृदयँ लगाइ कुअँरि सब लीन्ही। पतिन्ह सौंपि बिनती अति कीन्ही।।_अर्थ_इन वचनों को सुनते ही रनिवास उदास हो गया। सासुएँ प्रेमवश बोल नहीं सकतीं। उन्होंवे सब कुमारियों को हृदय से लगा लिया और उनके पतियों को सौंपकर बहुत विनती की।





करि बिनय सीय रामहि समरपी जोरि कर पुनि पुनि कहै। बलि जाउँ तात सुजान तुम्ह कहुँ बिदित गति सब की अहै।। परिवार पुरजन मोहि राजहि प्रानप्रिय सिय जानिबी।। तुलसीस सीलु सनेहु लखि निज किंकरी करि मानिबी।।_अर्थ_विनती करके उन्होंने सीताजी को श्रीरामचन्द्रजी को समर्पित किया और हाथ जोड़कर बार_बार कहा_ हे तात् !  हे सुजान ! मैं बलि जाती हूँ, तुमको सबकी गति ( हाल ) मालूम है। परिवार को, पुरवासियों को, मुझको  और राजा को सीता प्राणों के समान प्रिय है, ऐसा जानियेगा। हे तुलसी के स्वामी ! इसके सील और स्नेह को देखकर इसे अपनी दासी करके मानियेगा।






तुम्ह परिपूरन काम जान सिरोमनि भावप्रिय। जन गुन गाहक राम दोष दलन करुणायतन।।_अर्थ_तुम पूर्णकाम हो, सुजानशिरोमणि हो और भावप्रिय हो ( तुम्हें प्रेम प्यारा है )। हे राम ! तुम भक्तों के गुणों को ग्रहण करनेवाले, दोषों को नाश करनेवाले और दया के धाम हो।





अस कहि रही चरन गहि रानी। प्रेम पंक जनु गिरा समानी।। सुनि सनेह सानी बर बानी। बहुबिधि राम सासु सनमानी।।_अर्थ_ऐसा कहकर रानी चरणों को पकड़कर [ चुप ] रह गयीं। मानो उनकी वाणी प्रेमरुपी दलदल में समा गयी हों। स्नेह से सनी हुई श्रेष्ठ वाणी सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने सास का बहुत प्रकार से सम्मान किया।





राम विदा मागत कर जोरी। कीन्ह प्रणाम बहोरि बहोरि।। पाइ असीस बहुरि सिर नाई। भाइन्ह सहित चले रघुराई।।_अर्थ_तब श्रीरामचन्द्रजी ने हाथ जोड़कर विदा माँगते हुए बार_बार प्रणाम किया। आशीर्वाद पाकर और फिर सिर नवाकर भाइयोंसहित श्रीरघुनाथजी चले।





मंजु मधुर मूरति उर आनी। भईं सनेह सिथिल सब रानी।। पुनि धीरजु धरि कुअँरि हँकारीं। बार बार भेंटहिं महतारी।।_अर्थ_ श्रीरामजी की सुन्दर मधुर मूर्ति को हृदय में लाकर सब रानियाँ स्नेह से शिथिल हो गयीं। फिर धीरज धारण कर कुमारियों को बुलाकर माताएँ बारंबार उन्हें ( गले लगाकर ) भेंटने लगीं।





पहुँचावहिं फिरि मिलहिं बहोरी। बढ़ी परस्पर प्रीति न थोरी।। पुनि पुनि मिलत सखिन्ह बिलगाई। बाल बच्छ जिमि धेनु लवाई।।_अर्थ_पुत्रियों को पहुँचाती हैं, फिर लौटकर मिलती हैं। परस्पर में कुछ थोड़ी प्रीति नहीं बढ़ी ( अर्थात् बहुत प्रीति बढ़ी )। बार_बार मिलती हुई माताओं को सखियों ने अलग कर दिया। जैसे हाल की ब्यायी हुई गाय को कोई उसके बालक बछड़े [ या बछिया ] से अलग कर दे।





प्रेम बिबस नर नारि सब सखिन्ह सहित रनिवासु। मानहुँ कीन्ह बिदेहपुर करुनाँ बिरहँ निवास।।_अर्थ_सब स्त्री_पुरुष और सखियोंसहित सारा रनिवास प्रेम के विशेष वश हो रहा है। [ ऐसा लगता है ] मानो जनकपुर में करुणा और विरह ने डेरा डाल दिया है।





सुक सारिका जानकीं ज्याए। कनक पिंजनन्हि राखि पठाए।। ब्याकुल कहहिं कहाँ बैदेही। सुनि धीरजु परिहरइ  न केही।।_अर्थ_ जानकीजी ने जिन तोता और मैना को पाल_पोसकर बड़ा किया था और सोने के पिंजड़ों में रखकर पढ़ाया था। उनके ऐसे वचनों को सुनकर धीरज किसको नहीं त्याग देगा ( अर्थात् सबका धैर्य जाता रहा )।





भए बिकल खग मृग एहि भाँती। मनुज दसा कैसे कहि जाती।। बंधु समेत जनकु तब आए। प्रेम उमगि लोचन जल छाए।।_अर्थ_जब पक्षी और पशु तक इस तरह विकल हो गये, तब मनुष्यों की दशा कैसे कही जा सकती। तब भाइसहित जनकजी वहाँ आये। प्रेम से उमड़कर उनके नेत्रों में [ प्रेमाश्रुओं का ] जल भर आया।






सीय बिलोकि धीरता भागी। रहे कहावत परम बिरागी।। लीन्ह रायँ उर लाइ जानकी। मिटी महामरजाद ग्यान की।।_अर्थ_वे परम वैराग्यवान् कहलाते थे; पर सीताजी को देखकर उनका भी धीरज भाग गया। राजा ने जानकीजी को हृदय से लगा लिया। [ प्रेम के प्रभाव से ] ज्ञान की महान् मर्यादा मिट गयी ( ज्ञान का बाँध टूट गया )।





समुझावत सब सचिव सयाने। कीन्ह बिचारु न अवसर जाने।। बारहिं बार सुता उर लाईं। सजि सुन्दर पालकीं मगाईं।।__अर्थ_सब बुद्धमान मंत्री उन्हें समझाते हैं। तब राजा ने विषाद करने का समय न जानकर विचार किया। बारंबार पुत्रियों को हृदय से लगाकर सुन्दर सजी हुई पालकियाँ मँगवायी।





प्रेम बिबस परिवारु सबु जानि सुलगन नरेस। कुअँरि चढ़ाईं पालकिन्ह सुमिरे सिद्धि गनेस।।_अर्थ_ सारा परिवार प्रेम  विवस है। राजा ने सुन्दर मुहूर्त जानकर सिद्धिसहित गणेशजी का स्मरण करके कन्याओं को पालकियों पर चढ़ाया।






बहुबिधि भूप सुता समुझाईं। नारिधरमु कुल रीति सिखाई।। दासीं दास दिये बहुतेरे। सुचि सेवक जे प्रिय सिय केरे।।_अर्थ_राजा ने पुत्रियों को बहुत प्रकार से समझाया और उन्हें स्त्रियों का धर्म और कुल की रीति सिखायीं। बहुत से दास_दासी दिये, जो सीताजी के प्रिय और विश्वासपात्र सेवक थे।





सीय चलत व्याकुल पुरबासी। होहिं सगुन सुभ मंगल रासी।। भुसूर सचिव समेत समाजा। संग चले पहुँचावन राजा।।_अर्थ_सीताजी के चलते समय जनकपुरवासी व्याकुल हो गये। मंगल की राशि शुभ शकुन हो रहे हैं। ब्राह्मण और मंत्रियों के समाजसहित राजा जनकजी उन्हें पहुँचाने के लिये साथ चले।





समय बिलोकि बाजने बाजे। रथ गज बाजि बरातिन्ह साजे।। दसरथ बिप्र बोलि सब लीन्हे। दान मान परिपूरन कीन्हे।।_अर्थ_समय देखकर बाजे बजने लगे। बरातियों ने रथ, हाथी और घोड़े सजाये। दशरथजी ने सब ब्राह्मणों को बुला लिया और उन्हें दान और सम्मान से परिपूर्ण कर दिया।





चरन सरोज धूरि धरि सीसा। मुदित महीपति पाइ असीसा।। सुमिरि गजाननु कीन्ह पयाना। मंगलमूल सगुन भए नाना।।_अर्थ_उनके चरणकमलों की धूलि सिर पर धरकर और आशिष पाकर राजा आनंदित हुए और गणेशजी का स्मरण करके उन्होंने प्रस्थान किया। मंगलों के मूल अनेकों शकुन हुए।





सुर प्रसून बरसहिं हरषि करहिं अपछरा गान।। चले अवधपति अवधपुर मुदित बजाइ निसान।।_अर्थ_देवता हर्षित होकर फूल बरसा रहे हैं और अप्सराएँ गान कर रही हैं। अवधपति दशरथजी नगाड़े बजाकर अयोध्यापुरी को चले।





नृप करि बिनय महाजन फेरे। सादर सकल मागने टेरे।। भूषन बसन बाजि गज दीन्हे।।_अर्थ_राजा दशरथजी ने विनती करके प्रतिष्ठित जनों को लौटाया और आदर के साथ सब मंगनों को बुलाया। उनको गहने_कपड़े, घोडे_हाथी और प्रेम से पुष्ट करके सबको संपन्न अर्थात् बलयुक्त कर दिया।





बार-बार बिरिदावली भाषी। फिरे सकल रामहिं उर राखी।। बहुरि बहुरि कोसलपति कहहीं। जनक प्रेम बस फिरै न चहहीं।।-अर्थ-वे बारंबार विरुदावली ‌‌बखानकर और श्रीरामचन्द्रजी को हृदय में रखकर लौटे। कोसलाधीस दशरथजी बार-बार लौटने को कहते हैं, परन्तु जनकजी प्रेमवश लौटना नहीं चाहते।





पुनि कह भूपति बचने सुहाए। फिरिय महीप दूरि बड़ि आए।। राउ बहोरि उतरि भए काढ़े। प्रेम प्रबाह बिलोचन साढ़े।।-अर्थ-दशरथजी ने फिर सुहावने वचन कहे-हे राजन् ! बहुत दूर आ गये, अब लौटिये। फिर राजा दशरथ जी रथ  से उतरकर खड़े हो गये उनके नेत्रों में प्रेम का प्रवाह बढ़ गया।






‌तब बिदेह बोले कर जोरी। बचन सनेह सुधा तनु बोरी।। करौं कवन बिधि बिनय बनाई। महाराज मोहि दीन्ह बड़ाई।।_अर्थ_तब जनकजी हाथ जोड़कर मानो स्नेह रूपी अमृत में डुबोकर बचन बोले_मैं किस तरह बनाकर ( किन शब्दों में ) विनती करूं। हे महाराज ! आपने मुझे बड़ाई दी है।





कोसलपति समधी सजन सनमाने सब भांति। मिलनि परस्पर बिनय अति प्रीति न हृदय समाति।।-अर्थ-अयोध्यानाथ दशरथ जी ने अपने स्वजन समधी का सब प्रकार से सम्मान किया। उनके आपस के मिलने में अत्यन्त विनय थी और इतनी प्रीति थी जो हृदय में समाती न थी।





मुनि मंडलिहि जनक सिरु नावा। आसिरबादु सबहिं सन पावा।। सादर पुनि भेंटे जामाता। रूप सील गुन निधि सब भ्राता।।-अर्थ-जनकजी ने मुनिमंडली को सिर नवाया और सभी से आशीर्वाद पाया। फिर आदर के साथ वे रूप, शील और गुणों के निधान सब भाइयों---अपने दामादों से मिले।





जोरि पंकरुह पानि सुहाए। बोले बचन
 प्रेम जनु जाए।। राम करौं केहि भांति प्रशंसा। मुनि महेस मन मानस हंसा।।-अर्थ-और सुन्दर कमल के समान हाथों को जोड़कर ऐसे वचन बोले जो मानो प्रेम से ही जन्मे हों। हे रामजी ! मैं किस प्रकार आपकी प्रशंसा करूं ! आप मुनियों और महादेवजी के मनरूपी मानसरोवर के हंस हैं। 





करहिं जोग जोगी जेहि लागी। कोहु मोहु ममता मधु त्यागी।। ब्यापकु ब्रह्म अलखु अबिनासी। चिदानन्दु निरगुन गुन रासी।।_अर्थ_जोगी लोग जिनके लिये क्रोध, मोह, ममता और मद को त्यागकर योग-साधन करते हैं, जो सर्वव्यापक ब्रह्म अव्यक्त, अविनाशी, चिदानन्द, निर्गुण और गुणों की राशी हैं,।।




मन समेत जेहि जान न बानी। तरकि न सहहिं सकल अनुमानी।। महिमा निगमु नेति कहि कहई।। जो तिहुं काल एकरस रहई।।_अर्थ_जिनको मनसहित वाणी नहीं जानती और सब जिनका अनुमान ही करते हैं, कोई तर्क नहीं  कर सकते; जिनकी महिमा को वेद ,’नेति’  कहकर वर्णन करता है और जो ( सच्चिदानन्द ) तीनों कालों में एकरस ( सर्वथा निर्विकार ) रहते हैं।




नयन बिषय मो कहुं भयउ हो समस्त सुख मूल। सबइ राहु जग जीव कहीं भएं ईसु अनुकूल।।_अर्थ_वे ही समस्त सुखों के मूल ( आप ) मेरे नेत्रों के विषय हुए। ईश्वर के अनुकूल होने पर जगत् में जीव को लाभ_ही_लाभ है।





सबहि भांति मोहि दीन्हि बड़ाई। निज जन जानि लीन्ह अपनाई।। होहिं सहस दस सारद सेषा। करहिं कल्प कोटिक हरि लेखा।।_अर्थ_आपने मुझे सभी प्रकार से बड़ाई दी और अपना जन जानकर अपना लिया। यदि दस हजार सरस्वती और शेष हों और करोड़ों कल्पों तक गणना करते रहें।




मोर भाग्य राउर गुन गाथा। कहिए न सिराहिं सुनहु रघुनाथा।। मैं कछु कहउं एक बल मोरें। तुम्ह रीझहु स्नेह सुठि थोरे।।_अर्थ_तो भी हे रघुनाथजी ! सुनिये, मेरे सौभाग्य और आपके गुणों की कथा कहकर समाप्त नहीं की जा सकती। मैं जो कुछ कह रहा हूं, वह अपने  इस एक ही बल पर कि आप अत्यन्त थोड़े प्रेम से प्रसन्न हो जाते हैं।





बार बार मागउं कर जोरें। मनु परिहरै चरन जनि भोरें।। सुनि बर बचन प्रेम जनु पोषे। पूरनकाम रामु परितोषे।।_अर्थ_मैं हाथ जोड़कर बार_बार हाथ जोड़कर यह मांगता हूं कि मेरा मन भूलकर भी आपके चरणों को न छोड़े। जनकजी के श्रेष्ठ बचनों को सुनकर, जो मानो प्रेम से पुष्ट किये हुए थे, पूर्णकाम श्रीरामचन्द्रजी संतुष्ट हुए।





करि बर बिनय ससुर सनमाने। पितु कौसिक बसिष्ठ करि जाने।। बिनती बहुरि भरत सन कीन्ही। मिलि सप्रेम मुनि आसिष दीन्ही।_अर्थ_ उन्होंने सुन्दर विनती करके पिता दशरथ जी, गुरु विश्वामित्र जी और कुलगुरु वशिष्ठ जी के समान जानकर ससुर जनकजी का सम्मान किया। फिर जनकजी ने भरतजी से विनती की और प्रेम के साथ मिलकर फिर उन्हें आशीर्वाद दिया।




मिले लखन रिपुसूदनहि दीन्ह असीस महीस। भए परसपर प्रेमबस फिरि फिरि नावहिं सीस।।_अर्थ_फिर राजा ने लक्ष्मणजी और शत्रुघ्नजी से मिलकर उन्हें आशीर्वाद दिया। वे परस्पर प्रेम के वश होकर बार_बार आपस में सिर नवाने लगे।





बार-बार करि बिनती बड़ाई। रघुपति चले संग सब भाई।। जनक गहे कौसिक पद जाई।चरन रेनु सिर नयनन्ह लाई।।_अर्थ_जनकजी की बार_बार विनती और बड़ाई करके श्रीरघुनाथजी सब भाईयों के साथ चले। जनक जी ने जाकर विश्वामित्रजी के चरण पकड़ लिये और उनके चरणों की रज को सिर और नेत्र में लगाया।





सुनु मुनीस बर दरसन तोरें। अगमु न कछु प्रतीति मन मोरें।। जो सुखु सुजसु लोकपति चहहीं। करत मनोरथ सकुचत अहहिं।।_अर्थ_(उन्होंने कहा_ ) हे मुनीश्वर ! सुनिये, आपके सुन्दर दर्शन से कुछ भी दुर्लभ नहीं है, मेरे मन में विश्वास है। जो सुख और सुयश लोकपाल चाहते हैं; परन्तु ( असंभव समझकर ) जिसका  मनोरथ करते हुए सकुचाते हैं।





जो सुखु सुजसु सुलभ मोहि स्वामी। सब सिधि तव दरसन अनुगामी।। कीन्हि बिनय पुनि पुनि सिरु नाई। फिरे महीसु आसिषा पाई।।_अर्थ_हे स्वामी ! वहीं सुख और सुयश मुझे सुलभ हो गया; सारी सिद्धियां आपके दर्शनों की अनुगामिनी अर्थात् पीछे-पीछे चलने वाली है। इस प्रकार बार_बार विनती की और सिर नवाकर तथा उनसे आशीर्वाद पाकर राजा जनक लौटे।





चली बरात निसान बजाई। मुदित छोट बड़ सब समुदाई।। रामहिं निरखि ग्राम नर नारी। पाई नयन बलु होहिं सुखारी।।_अर्थ_डंका बजाकर बरात चली। छोटे_बड़े सभी समुदाय प्रसन्न हैं ( रास्ते के ) गांवों के स्त्री_पुरुष श्रीरामचन्द्र जी को देखकर नेत्रों का फल पाकर सुखी होते हैं।





बीच बीच बर बास करि मग लोगन्ह सुख देत। अवध समीप पुनीत दिन पहुंची आई जनेत।।_अर्थ_बीच बीच में सुन्दर मुकाम करती हुई तथा मार्ग के लोगों को सुख देती हुई वह बरात पवित्र दिन में अयोध्यापुरी के समीप आ गई।




होन निसान पनव बर बाजे। भेरि संख धुनि हय गय गाजे।। झांझि बिरव डिंडिमीं सुहाई। सरस राग बाजहिं सहनाई।।_नगाड़ों पर चोटें पड़ने लगीं; सुन्दर ढ़ोल बजने लगे। भेरी और शंख की बड़ी आवाज हो रही है; हाथी घोड़े गरज रहे हैं।
विशेष शब्द करने वाली झांझें, सुहावनी डालियां तथा रसीले राग से शहनाइयां बज रही हैं।





पुर जन आवत अकनि बराता। मुदित सकल पुलकावलि गाता।। निज निज सुंदर सदन संवारे। हाट बाट चौहट पुर द्वारे।।_अर्थ_बरात को आती हुई सुनकर नगरवासी प्रसन्न हो गये। सबके शरीरों पर पुलकावली छा गयी। सबने अपने-अपने सुन्दर घरों, बाजारों, गलियों, चौराहों और नगर के द्वारों को सजाया।





गलीं  सकल अरगजां सिंचाई। जहं तहं चौके चारु पुराईं।। बना बजारु न जाइ बखाना। तोरन केतु पताक बिताना।।_अर्थ_सारी गलियां अरगजे से सिंचायी गयीं, जहां_तहां सुन्दर चौक पुराने गये। तोरणों, ध्वजा_पताकाओं और मण्डपों से बाजार ऐसा सजा कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।





सफल पूगफल कदलि रसाला। रोपे बकुल कदंब तमाला।। लगे सुभग तरु परसत धरनीं। मनिमय आलबाल कल करनी।।_अर्थ_फलसहित सुपारी, केला, आम, मौलसिरी, कदम्ब और तमाल के वृक्ष लगाये गये। वे लगे हुए सुन्दर वृक्ष ( फलों के भार से ) पृथ्वी को छू रहे हैं। उनके मणियों के ताले बड़ी सुन्दर कारीगरी से बनाये गये हैं।





बिबिध भांति मंगल कलश गृह गृह रचे संवारि। सुर ब्रह्मादि बिसाहिन सब रघुबर पुरी निहारि।।_अर्थ_अनेक प्रकार के मंगल_कलश घर_घर सजाकर बनाये गये हैं। श्रीरघुनाथजी की पुरी ( अयोध्या ) को देखकर ब्रह्मा आदि सब देवता सिहाते है।





भूप भवन तेहि अवसर सोहा। रचना देखि मदन मनु मोहा।। मंगल सगुन मनोहरताई। रिधि सिधि सुख संपदा सुहाई।।_अर्थ_उस समय राजमहल ( अत्यन्त ) शोभित हो रहा था। उसकी रचना देखकर कामदेव का भी मन मोहित हो जाता था। शकुन, मनोहरता, ऋद्धि_सिद्धि, सुख, सुहावनी सम्पत्ति।





तनु उछाह सब सहज सुहाए। तनु धरि धरि दसरथ गृह छाए।। देखन हेतु राम बैदेही। कहहु लालसा होहि न केही।।_अर्थ_और सब प्रकार के उत्साह ( आनन्द ) मानो सहज सुन्दर शरीर धर_धरकर दशरथ जी के घर में छा गये हैं। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के दर्शनों के लिये भला कहिये, किसे लालसा न होगी।





जूथ जूथ मिलि चलीं सुआसिनि। निज छबि निदरहिं मदन बिलासिनि।। सकल सुमंगल बजें आरती। गावहिं तनु बहु बेस भारती।।_अर्थ_सुहागिनी स्त्रियां झुंड_की_झुंड मिलकर चलीं, जो अपनी छबि से कामदेव की स्त्री रति का भी निरादर कर रही हैं। सभी सुन्दर मंगलमय द्रव्य एवं आरती सजाये हुए गा रही हों।





भूपति भवन कोलाहलु होई। जाइ न बरनि समउ सुखु सोई।। कौसल्यादि राम महतारी। प्रेम बिबस तन दसा बिसारीं।।_ अर्थ_राजमहल में ( आनन्द के मारे ) शोर मच रहा है। उस समय का और सुख का वर्णन नहीं किया जा सकता कौशल्याजी आदि श्रीरामचन्द्रजी की सब माताएं प्रेम के विशेष वश होने से शरीर की सुध भूल गयीं।





दिए दान  बिप्रन्ह बिपुल पूजि गनेस पुरारि। प्रमुदित परम दरिद्र जनु पाई पदारथ चारि।।_अर्थ_गणेशजी और त्रिपुरारि शिवजी का पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणों को बहुत_सा दान दिया। वे ऐसी परम प्रसन्न हुईं मानो अत्यन्त दरिद्र चारों पदार्थ पाए गया हो।





मोद प्रमोद बिबस सब माता। चलहिं न चरन सिथिल भए गाता।। राम दरस हित अति अनुरागीं। परिजन साजु सजन सब लागीं।।_अर्थ_सुख और महान् आनंद से विवश होने के कारण सब माताओं के शरीर शिथिल हो गये हैं, उनके चरण चलते नहीं हैं। श्रीरामचन्द्रजी के दर्शनों के लिये वे अत्यन्त अनुराग में भरकर परछन का सामान सजाने लगीं।





बिबिध बिधान बाजने बाजे। मंगल मुदित सुमित्रां साजे।। हरद दूब दधि पल्लव फूला। पान पूगफल मंगल मूला।।_अर्थ_अनेकों प्रकार के बाजे बजते थे। सुमित्राजी ने आनन्दपूर्वक मंगल साज सजाये। हल्दी, दूब, दही, पत्ते, फूल, पान और सुपारी आदि मंगल वस्तुएं।





अच्छत अंकुर लोचन लाजा। मंजुल मंजरि तुलसि बिराजा।। तुम्हें पुरट घट सहज सुहाए। मदन सकुन तनु नीर बनाए।।_अर्थ_तथा अक्षत ( चावल ), अंखुए, गोरोचन, लावा और तुलसी की सुन्दर मंजरियां सुशोभित हैं। नाना रंगों से चित्रित किये हुए सहज सुहावने सुवर्ण के कलश ऐसे मालूम होते हैं, मानो कामदेव के पक्षियों ने घोंसले बनाते हों।





सगुन सुगंध न जाहीं बखानी। मंगल सकल सजहिं सब रानी।। रचीं आरतीं बहुत बिधाना। मुदित करहिं कल मंगल गाना।।_अर्थ_शकुन की सुगंधित वस्तुएं बखानी नहीं जा सकतीं। सब रानियां संपूर्ण मंगल साज सज रही हैं। बहुत प्रकार की आरती बनाकर वे आनंदित हुईं सुन्दर मंगलगान कर रही हैं।




कनक थार भरि मंगलन्हि कमल करन्हि लिएं मात। चलीं मुदित परिछनि करन पुलक प्रफुल्लित गाता।।_अर्थ_सोने के थालों को मांगलिक वस्तुओं से भरकर अपने कमल के समान ( कोमल ) हाथों में लिये हुए माताएं आनन्दित होकर परछन करने चलीं। उनके शरीर पुलकावली से छा गये हैं।





धूप धूम नभु मेचक भयऊ। सावन घन घमंडु तनु ठयऊ।। सुरतरु सुमन माल सुर बरसहिं। मनहुं बलाक अवलि मनु करषहिं।।_अर्थ_धूप के धुएं से आकाश ऐसा काला हो गया है मानो सावन के बादल घुमड़_घुमड़कर  छा गये हों। देवता कल्पवृक्ष के फूलों की मालाएं बरसा रहे हैं। वे ऐसी लगती जहै मानो बगुलों की पांति मन को ( अपनी ओर ) खींच रही हो।





मंजुल मनिमय बंदनिवारे। मनहुं पाकरिपु चाप संवारे।। प्रगटहिं दुरहिं अटन्ह पर भामिनि। चारु चपल जनु दमकहिं दामिनि।।_अर्थ_सुंदर मणियों से बने बंदनवार ऐसे मालूम होते हैं मानो इन्द्रधनुष सजाये हों। अटारियों पर सुन्दर और चपल स्त्रियां प्रकट होती है और छिप जाती हैं ( आती_जाती हैं ); वे ऐसी जान पड़ती हैं मानो बिजलियां चमक रही हों।





दुंदुभि धुनि घन गरजनि घोरा। जाचक चातक दादुर मोरा।। सुर सुगंध सुचि बरसहिं बारी। सुखी सकल ससि पुर नर नारी।।_अर्थ_नगाडों की ध्वनि मानो बादलों की घोर गर्जना है। याचकगण पपीहे, मेढ़क और मोर हैं। देवता पवित्र सुगन्ध रूपी जल बरसा रहे हैं, जिससे खेती के समान नगर के सब स्त्री_पुरुष सुखी हो रहे हैं।





समउ जानि गुर आयसु दीन्हा। पुर प्रवेस रघुकुलमनि कीन्हां।। सुमिरि संभु गिरिजा गनराजा। मुदित  महीपति सहित समाजा।।_अर्थ_( प्रवेश का समय जानकर गुरु वशिष्ठजी ने आज्ञा दी। तब रघुकुलमणि महाराज दशरथजी ने  शिवजी, पार्वतीजी और गणेशजी का स्मरण करके समाजसहित आनंदित होकर नगर में प्रवेश किया।






होहिं सगुन बरसहिं सुमन सुर दुंदुभि बजाइ। बिबुध बंधू नाचहिं मुदित मंजुल मंगल गाइ।।_अर्थ_शकुन हो रहे हैं, देवता दुंदुभि बजा_बजाकर फूल बरसा रहे हैं। देवताओं की स्त्रियां आनंदित होकर सुन्दर मंगलगीत गा_गाकर  नाच रही हैं।





मागध सूत बंदि नट नागर। गावहिं जसु तिहु लोक उजागर।। जय धुनि बिमल बेद बर बानी। दस दिसि सुनिअ सुमंगल सानी।।_अर्थ_मागध, सूत, भाट और चतुर नट तीनों लोकों के उजागर ( सबको प्रकाश देनेवाले, परम प्रकाश स्वरूप ) श्रीरामचन्द्रजी का यश गा रहे हैं। जयध्वनि तथा निर्मल श्रेष्ठ वाणी सुन्दर मंगल से सनी हुई दसों दिशाओं में सुनायी पड़ रही है।





बिपुल बाजने साजन लागे। नभ सुर नगर लोग अनुरागे।। बने बराति बरनि न जाहीं। महा मुदित मन सुख न समाहीं।।_अर्थ_बहुत से बाजे बजने लगे। आकाश में देवता और नगर में लोग सब प्रेम में मगन हैं। बराती ऐसे बने_ठने हैं कि उनका वर्णन नहीं हो सकता। परम आनंदित हैं, सुख उनके मन में समाता ही नहीं है।





पुरबासिन्ह तब राय जोहारे। देखत रामहिं भए सुखारे।। करहिं निछावरि मनिगन चीरा। बारि बिलोचन पुलक सरीरा।।_अर्थ_तब अयोध्यावासियों ने राजा को जोहार ( वन्दना )की। श्रीरामचन्द्रजी को देखते ही वे सुखी हो गये। सब मणियां और वस्त्र निछावर कर रहे हैं। नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भरा है और शरीर पुलकित हो रहा है।





आरति करहिं मुदित पुर नारी। हरषहिं निरखहिं कुअंर बर चारी।। सिबिका सुभग ओहार उतारी। दुलहिनिन्ह होहिं सुखारी।।_अर्थ_नगर की स्त्रियां आनंदित होकर आरती कर रही है और सुन्दर चारों कुमारों को देखकर हर्षित हो रही हैं। पालकियों के सुन्दर पर्दे हटा_हटाकर वे दुलहिनों को देखकर सुखी होती हैं।





एहि बिधि सबही देते सुखु आए राजदुआर। मुदित मातु परिछन करहिं बधुन्ह समेत कुमार।।_अर्थ_इस प्रकार सबको सुख देते हुए राजद्वार पर आये। माताएं आनन्दित होकर बहुओं सहित कुमारों का परछन कर रही हैं।





करहिं आरती बारहिं बारा। प्रेमु प्रमोदु कहै को पारा।। भूषण मनि पट नाना जाती। करहिं निछावरि अगनित भांती।।_अर्थ_वे बार_बार आरती कर रही है। उस प्रेम और महान् आनंद को कौन कह सकता है ! अनेकों प्रकार के आभूषण, रत्न और वस्त्र तथा अगनित प्रकार की अन्य वस्तुएं निछावर कर रही है।





बधुन्ह समेत देखि सुत चारी। परमानन्द मगन महतारी।। पुनि पुनि सीय राम छबि देखी। मुदित सफल जग जीवन देखी।।_अर्थ_बहुओंसहित चारों पुत्रों को देखकर माताएं परमानन्द में मगन हो गयीं। सीताजी और श्रीरामजी की छबि को बार_बार देखकर वे जगत् में अपने जीवन को सफल मानकर आनंदित हो रही हैं।





सखीं सीय मुख पुनि पुनि चाही। गान करहिं नित सुकृति सराही।। बरसहिं सुमन छनहिं छन देवा। नाचहिं गावहिं लावहिं सेवा।।_अर्थ_सखियां सीताजी के मुख को बार बार देखकर अपने पुत्रों की सराहना करते हुए गान कर रही हैं। देवता क्षण_क्षण में फूल बरसाते, नाचते गाते तथा अपनी_अपनी सेवा_ समर्पण करते हैं।





देखि मनोहर चारिउ जोरीं। सारद उपमा सकल ढ़ंढ़ोरीं।। देत न बनहिं निपट लघु लागीं। एकटक रहीं रूप अनुरागीं।।_अर्थ_चारों मनोहर जोड़ियों को देखकर सरस्वती ने सारी उपमाओं को खोज डाला; पर कोई उपमा देते नहीं बनी, क्योंकि उन्हें सभी बिलकुल तुच्छ जान पड़ीं। तब हारकर वे भी श्रीरामजी के रूप में अनुरक्त होकर एकटक देखती रह गयीं।






Monday, 4 January 2021

बालकाण्ड

मासपरायण ग्यारहवाँ विश्राम


स्याम सरीरु सुभायँ सुहावन। सोभा कोटि मनोज लजावन।। जावक जुत पद कमल सुहाए। मुनि मन मधुप रहत जिन्ह छाए।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी का साँवला शरीर स्वभाव से ही सुन्दर है। उसकी शोभा करोड़ों कामदेव को लजानेवाली है। महावर से युक्त चरणकमल बड़े सुहावने लगते हैं, जिनपर मुनियों के मन रूपी भौंरे सदा छाये रहते हैं।





पीत पुनीत मनोहर धोती। हरति बाल रबि दामिनि जोती।। कल किंकिनि कटि सूत्र मनोहर। बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर।।_अर्थ_पवित्र और मनोहर पीली धोती प्रातःकाल के सूर्य और बिजली की ज्योति को हरे लेती है। कमर में सुंदर किंकिणी और कटिसूत्र हैं। विशाल भुजाओं में सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं।





पीत जनेऊ महाछबि देई। कर मुद्रिका चोरि चितु लेई।। सोहित ब्याह साज सब साजे। उर आयत उरभूषण राजे।।_अर्थ_पीला जनेऊ महान् शोभा दे रहा है। हाथ की अंगूठी चित् को चुरा लेती है। ब्याह के सब साज सजे हुए वे शोभा पा रहे हैं। चौड़ी छाती पर हृदय के पहनने के सुन्दर आभूषण सुशोभित हैं।





पियर उपरना काखासोती। दुहुँ आचरन्हि लगे मनि मोती।। नयन कमल कल कुंडल काना। बदनु सकल सौंदर्ज निधाना।।_अर्थ_पीला दुपट्टा  काँखासोती ( जनेऊ के तरह ) शोभित हैं, जिसके दोनों छोरों पर मणि और मोती लगे हैं। कमल के समान सुन्दर नेत्र हैं, कानों में सुन्दर कुण्डल हैं और मुख तो सारी सुन्दरता का खजाना ही  है।





सुंदर भृकुटि मनोहर नासा। भाल तिलकु रुचिरता निवासा।। सोहत मौरु मनोहर माथे। मंगलमय मुकुतामनि गाथे।।_अर्थ_सुन्दर भौंहें और मनोहर नासिका है। ललाट पर तिलक तो सुन्दरता का घर ही हे। जिसमें मंगलमय मोती और मणि गुँथे हुए हैं, ऐसा मनोहरमौर माथे पर सोह रहा है।





गाथे महामनि मौर मंजुल अंग सब चित्त चोरहीं। पुर नारि सुंदर सुंदरीं बरहिं बिलोकि सब तिन तोरहीं। मनि बसन भूषन वारि आरति करहिं मंगल गावहीं। सुर सुमन बरिसहिं सूत मागध बंदि सुजसु सुनावहीं।।__अर्थ_सुंदर मौर में बहुमूल्य मणियाँ गुँथी हुई हैं, सभी अंग चित्त को चुराये लेते हैं। सब नगर की स्त्रियाँ और देवसुन्दरियाँ दूलह को देखकर तिनका तोड़ रही हैं ( उनकी बलैयाँ ले रही हैं ) और मणि, वस्त्र तथा आभूषण निछावर करके आरती उतार रही और मंगलगान गा रही हैं। देवता फूल बरसा रहे हैं और सूत, मागध तथा भाट सुयश सुना रहे हैं।





कोहबरहिं आने कुअँर कुँअरि सुआसिन्ह सुख पाइ कै। अति प्रीति लौकिक रीति लागीं करन मंगल गाइ कै।। लहकौरि गौरि सिखाव रामहिं सीय सन सारद कहैं। रनिवासु हास बिलास रस बस जन्म को फलु सब लहैं।_ अर्थ_सुहागिनी स्त्रियाँ सुख पाकर कुँअर और कुमारियों को कोहबर ( कुलदेवता के स्थान ) में लायीं और अत्यन्त प्रेम से मंगल गीत गा_गाकर लौकिक रीति करने लगीं। पार्वतीजी श्रीरामचन्द्रजी को लहकौर ( वर_वधू का परस्पर ग्रास देना ) सिखाती हैं और सरस्वतीजी सीताजी को सिखाती हैं। रनिवास हास_विलास के आनन्द में मग्न है, [ श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी को देख_देखकर ] सभी जन्म का परम फल प्राप्त कर रही हैं।



निज पानि मनि महुँ देखिअति मूरति सरूपनिधान की। चालति न भुजबल्ली बिलोकनि बिरह भय बस जानकी।। कौतुक बिनोद प्रमोदु प्रेमु न जाइ कहि जानहिं अलीं। बर कुअँरि सुंदर सकल सखीं लवाइ जनवासेहि चलीं।।_अर्थ_अपने हाथ की मणियों में सुन्दर रूप के भण्डार श्रीरामचन्द्रजी की परछाहीं दीख रही है। यह देखकर जानकीजी दर्शन में वियोग होने के भय से बाहुरूपी लताको और दृष्टि को हिलाती डुलाती नहीं हैं। उस समय हँसी खेल और विनोद का आनन्द और प्रेम कहा नहीं जा सकता, उसे सखियाँ ही जानती हैं। तदनन्तर वर_कन्याओं को सब सुन्दर सखियाँ जनवासे को लिवा चलीं।





तेहि समय सुनि असीस जहँ तहँ नगर नभ आनंदु महा। चिरु जिअहुँ जोरी चारयो मुदित मन सबही कहा।। जोगीन्द्र सिद्ध मुनीस देव बिलोकि प्रभु दुंदुभि हनी। चले हरषि बरषि प्रसून निज निज लोक जय जय जय भनी।।_अर्थ_उस समय नगर और आकाश में जहाँ सुनिये, वहीं आशीर्वाद की ध्वनि सुनायी दे रही हैं और महान् आनन्द छाया है। सभी ने प्रसन्न मन से कहा कि सुंदर चारों जोड़ियाँ चिरंजीवी हों। योगीराज, सिद्ध मुनीश्वर और देवताओं ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखकर दुंदुभी बजायी और हर्षित होकर फूलों की वर्षा करते हुए ‘ जय हो, जय हो, जय हो’ कहते हुए वे अपने अपने लोक को चले।






सहित बधूटिन्ह कुअँर सब तब आए पितु पास। सोभा मंगल मोद भरि उमगेउ जनु जनवास।।_ अर्थ_ तब ( चारों कुमार )  बहुओं सहित पिताजी के पास आये। ऐसा मालूम होता था कि शोभा, मंगल और आनन्द से भरकर जनवासा उमड़ पड़ा।





पुनि जेवनार भई बहु भाँति। पठए जनक बोलाइ बराती।। परत पाँवड़े बसन अनूपा। सुतन्ह समेत गवन कियो भूपा।।_अर्थ_फिर बहुत प्रकार की रसोई बनी। जनकजी ने बरातियों को बुला भेजा। राजा दशरथजी ने पुत्रोंसहित गमन किया। अनुपम वस्त्रों के पाँवड़े पड़ते जाते हैं।





सादर सबके पाय पखारे। जथाजोगु पीढ़न्ह बैठारे।। धोए जनक अवधपति चरना। सीलु सनेहु जाइ नहीं बरना।।_अर्थ_आदर के साथ सबके चरण धोए और सबको यथायोग्य पीढ़ों पर बैठाया। तब जनकजी ने अवधपति दशरथजी के चरण धोये। उनका शील और सनेह वर्णन नहीं किया जा सकता।





बहुरि राम पद पंकज धोए। जे हर हृदय कमल महुँ गोए।। तीनिउ भाइ राम सम जानी। धोए चरन जनक निज पानी।।_अर्थ_ फिर श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों को धोया, जो श्रीशिवजी के हृदय कमल में छिपे रहते हैं। तीनों भाइयों को श्रीरामचन्द्रजी के ही समान जानकर जनकजी ने उनके भी चरण अपने हाथों से धोए।





आसन उचित सबहिं नृप दीन्हे। बोलि सूपकारी सब लीन्हे।। सादर लगे परन जेवनारे। कनक कील मनि पान सँवारे।।_अर्थ_राजा जनकजी ने सभी को उचित आसन दिये और सब परसनेवालों को बुला लिया।  आदर के साथ पत्तलें पड़ने लगीं, जो मणियों के पत्तों से सोने की कील लगाकर बनायी गयी थीं।





सूपोदन सरभि सरपि सुंदर स्वादु पुनीत। छन महुँ सब कें परुसि गे चतुर सुआर बिनीत।।_चतुर और विनीत रसोइये सुन्दर, स्वादिष्ट और पवित्र दाल_भात और जायका [ सुगन्धित ] घी क्षणभर में सबके सामने परस गये।





पंच कवल करि जेवन लागे। गारि गान सुनि अति अनुरागे।। भाँति अनेक परे पकवाने। सुधा सरिस नहिं जाहिं बखाने।।_अर्थ_सबलोग पंचकौर करके ( अर्थात्’ प्राणाय स्वाहा, अपानाय स्वाहा, व्यानाय स्वाहा और समानाय स्वाहा’ इन मंत्रों का उच्चारण करते हुए पहले पाँच ग्रास लेकर ) भोजन करने लगे। गाली का गाना सुनकर वे अत्यन्त प्रेममग्न हो गये। अनेकों तरह के अमृत के समान ( स्वादिष्ट ) पकवान परसे गये, जिनका बखान नहीं हो सकता।





परुसन लगे सुआर सुजाना। बिंजन बिबिध नाम को जाना।। चारि भाँति भोजन बिधि गाई। एक एक बिधि बरनि न जाई।।_अर्थ_चतुर रसोइये नाना प्रकार के व्यंजन परसने लगे, उनका नाम कौन जानता है। चार प्रकार के ( चव्यर्, चोष्य, लेह्य, पेय अर्थात् चबाकर, चूसकर, चाटकर और पीकर खानेयोग्य ) भोजन की विधि कही गयी है, उनमें से एक_एक विधि के इतने पदार्थ बने थे कि जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता।





छरस रुचिर बिंजन बहु जाती। एक एक रस अगनित बहु भाँति।। जेवँत देहिं मधुर धुनि गारी। लै लै नाम  पुरुष अरु नारी।।_अर्थ_ छहों रसों के बहुत तरह के सुंदर ( स्वादिष्ट )  व्यंजन हैं। एक_एक रस के अनगिनती प्रकार के बने हैं। भोजन करते समय पुरुष और स्त्रियों के नाम ले_लेकर स्त्रियाँ मधुर ध्वनि से गाली दे रही हैं ( गाली गा रही हैं )।





समय सुहावनि गारि बिराजा। हँसत राउ सुनि सहित समाजा।। एहि बिधि सबहिं भोजन कीन्हा। आदर सहित आचमनु दीन्हा।।_अर्थ_समय की सुहावनी गाली शोभित हो रही है। उसे सुनकर समाजसहित राजा दशरथजी हँस रहे हैं। इस रीति से सभी ने भोजन किया और तब सबको आदरसहित आचमन ( हाथ_मुँह धोने के लिये जल ) दिया गया।





देइ पान पूजे जनक दसरथु सहित समाज। जनवासेहि गवने मुदित सकल भूप सिरताज।।_अर्थ_फिर पान देकर जनकजी ने समाजसहित दशरथजी का पूजन किया। सब राजाओं के सिरमौर ( चक्रवर्ती ) श्रीदशरथजी प्रसन्न होकर जनवासे को चले।





नित नूतन मंगल पुर माहीं। निमिष सरिस दिन जामिनि जाहीं।।  बड़े भोर भूपतिमनि जागे। जाचक गुन गन गावन लागे।।_अर्थ_जनकपुर में नित्य नये मंगल हो रहे हैं। दिन और रात पल के समान बीत जाते हैं। बड़े सवेरे राजाओं के मुकुटमणि दशरथजी जागे। याचक उनके गुणसमूह का गान करने लगे।





देखि कुअँर बर बधुन्ह समेता। किमि कहि जात मोदु मन जेता।। प्रातक्रिया करि गे गुर पाहीं। महाप्रमोदु प्रेमु मन माहीं।।_अर्थ_चारों कुमारों को सुन्दर वधुओं सहित देखकर उनके मन में जितना आनन्द है, वह किस प्रकार कहा जा सकता है ? वे प्रातःक्रिया करके गुरु वसिष्ठजी के पास गये। उनके मन में महा आनन्द और प्रेम भरा है।





करि प्रनामु पूजा कर जोरी। बोले गिरा अमिअँ जनु बोरी।। तुम्हरी कृपाँ सुनहु मुनिराजा। भयउँ आज मैं पूरन कामा।।_अर्थ_राजा प्रणाम और पूजन करके, फिर हाथ जोड़कर मानो अमृत में डुबोयी हुई वाणी बोले_हे मुनिराज ! सुनिये, आपकी कृपा से आज मैं पूर्णकाम हो गया।





अब सब बिप्र बोलाइ गोसाईं। देहु धेनु सब भाँति बनाईं।। सुनि गुर कर महिपाल बड़ाई। पुनि पठए मुनिबृंद बोलाई।।_अर्थ_ हे स्वामिन् ! अब सब ब्राह्मणों को बुलाकर उनको सब तरह ( गहनों_कपड़ों ) से सजी हुई गायें दीजिये। यह सुनकर गुरुजी ने राजा की बड़ाई करके फिर मुनिगणों को बुलवा भेजा।





बामदेउ अरु देवरिषि बालमीकि जाबालि। आए मुनिबर निकर तब कौसिकादि तपसालि।।_अर्थ_तब बामदेव, देवर्षि नारद, बाल्मीकि, जाबालि और विश्वामित्र आदि तपस्वी श्रेष्ठ मुनियों के समूह आये।





दंड प्रणाम सबहिं नृप कीन्हे। पूजि सप्रेम बरासन दीन्हे।। चारि लच्छ बर धेनु मगाईं। काम सुरभि सम सील सुहाईं।।__अर्थ_राजा ने सबको दण्डवत् प्रणाम किया और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें उत्तम आसन दिये। चार लाख उत्तम गायें मँगवायीं, जो कामधेनु के समान अच्छे स्वभाववाली और सुहावनी थीं।





सब बिधि सकल अलंकृत कीन्हीं। मुदित महीप महीदेवन्ह दीन्हीं।। करत बिनय बहुबिधि नरनाहू। लहेऊँ  आजु जगजीवन लाहू।।_अर्थ_उन सबको सब प्रकार से [ गहनों_कपड़ों से ] से सजाकर राजा प्रसन्न होकर भूदेव ब्राह्मणों को दिया। राजा बहुत तरह से विनती कर रहे हैं कि जगत् में मैंने आज ही जीने का लाभ पाया।





पाइ असीस महीस अनंदा। लिए बोलि पुनि जाचक बृंदा।। कनक बसन मनि हय गय स्यंदन। दिए बूझि रुचि रविकुलनंदन।।_अर्थ_[ ब्राह्मणों से ]  आशीर्वाद पाकर राजा आनन्दित हुए। फिर याचकों के समूह को बुला लिया और सबको उनकी रुचि पूछकर सोना, वस्त्र, मणि, घोड़ा, हाथी और रथ ( जिसने जो चाहा सो) सूर्यकुल को आऩंदित करनेवाले दशरथजी ने दिये।





चले पढ़त गावत गुन गाथा। जय जय जय दिनकरकुलनाथा।। एहि बिधि राम बिआह उछाहू। सकइ न बरनि सहस मुख जाहू।।_अर्थ_वे सब गुणानुवाद गाते और ‘सूर्यकुल के स्वामी की जय हो, जय हो, जय हो, कहते हुए चले। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के विवाह का उत्सव हुआ। जिन्हें सहस्त्र मुख हैं वे शेषजी भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।





बार बार कौसिक चरन सीसु नाइ कह राउ। यह सबु सुखु मुनिराज तव कृपा कटाच्छ पसाउ।।_अर्थ_बार बार विश्वामित्रजी के चरणों में सिर नवाकर राजा कहते हैं_हे मुनिराज ! यह सब आपके ही कृपाकटाक्ष का प्रसाद है।




जनक सनेह सील करतूती। नृप सब भाँति सराह विभूती।। दिन उठि विदा अवधपति मागा। राखहिं जनक सहित अनुरागा।।_अर्थ_राजा दशरथजी जनकजी के स्नेह सील करनी और ऐश्वर्य की सब प्रकार से सराहना करते हैं। प्रतिदिन ( सवेरे ) उठकर अयोध्यानरेश विदा माँगते हैं। पर जमकजी उन्हें प्रेम से रख लेते हैं।





नित नूतन आदरु अधिकाई। दिन प्रति सहस भाँति पहुनाई।। नित नव नगर अनंद उछाहू। दसरथ गवनु सोहाइ न काहू।।_अर्थ_आदर नित्य नया बढ़ता जाता है। प्रतिदिन हजारों प्रकार से मेहमानी होती है। नगर में नित नया आनंद और उत्साह रहता है, दशरथजी का जाना किसी को नहीं सुहाता।





बहुत दिवस बीते एहि भाँति। जनु सनेह रजु बँधे बराती।। कौसिक सतानंद तब जाई। कहा बिदेह नृपहिं समुझाई।।_अर्थ_इस प्रकार बहुत दिन बीत गये, मानो बराती स्नेह की रस्सी से बँध गये हैं। तब विश्वामित्रजी और सतानंदजी ने जाकर राजा जनक को समझाकर कहा__






अब दशरथ कहँ आयसु देहू। जद्यपि छाड़ि न सकहु सनेहू।। भलेहिं नाथ कहि सचिव बोलाए। कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए।।_अर्थ_यद्यपि आप स्नेह [ वश उन्हें ] नहीं छोड़ सकते, तो भी अब दशरथजी को आज्ञा दीजिये। ‘हे नाथ, बहुत अच्छा’ कहकर जनकजी ने मंत्रियों को बुलवाया। वे आये और ‘जय जीव’ कहकर उन्होंने मस्तक नवाया।





अवधनाथु चाहत चलन भीतर करहु जनाउ। भए प्रेमबस सचिव सुनि बिप्र सभासद राउ।।_अर्थ_[जनकजी ने कहा_] अयोध्यानाथ चलना चाहते हैं, भीतर ( रनिवास में ) खबर कर दो। यह सुनकर मंत्री, ब्राह्मण, सभासद और राजा जनक भी प्रेम के वश हो गये।





पुरबासी सुनि चलिहि बराता। बूझत बिकल परस्पर बाता।। सत्य गवनु सुनि सब बिलखाने। मनहुँ साँझ सरसिज सकुचाने।।_अर्थ_जनकपुरवासियों ने सुना कि बारात जायगी, तब वे व्याकुल होकर एक_दूसरे से बात पूछने लगे। जाना सत्य है, यह सुनकर सब ऐसे उदास हो गये मानो संध्या के समय कमल सकुचा गये हों।





जहँ जहँ आवत बसे बराती। तहँ तहँ सिद्ध चला बहु भाँती।। बिबिध भाँति मेवा पकवाना। भोजन साजु न जाइ बखाना।।_अर्थ_आते समय जहाँ_जहाँ बराती ठहरे थे, वहाँ_वहाँ बहुत प्रकार का सीधा ( रसोई का सामान ) भेजा गया। अनेकों प्रकार के मेवे, पकवान और भोजन  की सामग्री जो बखानी नहीं जा सकती_

Tuesday, 24 November 2020

बालकाण्ड

जो सुखु भा सिय मातु मन देखि राम बर बेषु। सो न सकहिं कहि कलप  सत सहस सारदा सेषु।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का वर वेष देखकर सीताजी की माता सुनयनाजी के मन में जो सुख हुआ, उसे हजारों सरस्वती और शेषजी सौ कल्पों में भी नहीं कह सकते।





नयन नीरु हटि मंगल जानी। परिछन करहिं मुदित मन रानी।। बेद बिहित अरु कुल आचारू। कीन्ह भली बिधि सब ब्यवहारू।।_अर्थ_मंगल_अवसर जानकर नेत्रों के जल को रोके हुए रानी प्रसन्न मन से परछन कर रही है। वेदों में कहे हुए तथा कुलाचार के अनुसार सभी व्यवहार रानी ने भली_भाँति किये।





पंच सबद धुनि मंगल गाना। पट पाँवड़े परहिं बिधि नाना।। करि आरति अरघु तिन्ह दीन्हा। राम गमनु मंडप तब कीन्हा।।_अर्थ_पंचशब्द ( तत्री, ताल, झाँझ, नगारा और तुरहि _इन पाँच प्रकार के बाजों का शब्द, पंचध्वनि ( वेदध्वनि, वन्दिध्वनि, जयध्वनि, शंखध्वनि और हुलूध्वनि ) और मंगलगान हो रहे हैं। नाना प्रकार के वस्त्रों के पाँवड़े पड़ रहे हैं। उन्होंने ( रानी ने ) आरती करके अर्ध्य दिया, तब श्रीरामजी ने मण्डप में गमन किया।





दसरथु सहित समाज बिराजे। बिभव बिलोकि लोकपति लाजे।। समयँ समयँ सुर बरसहिं फूला। सांति पढहिं महिसुर अनुकूला।।_अर्थ_दशरथजी अपनी मण्डली सहित विराजमान हुए। उनके वैभव को देखकर लोकपाल भी लजा गये। समय_समय पर देवता फूल बरसाते हैं और भूदेव ब्राह्मण समयानुकूल शान्तिपाठ करते हैं।





नभ अरु नगर कोलाहल होई। आपनि पर कछु सुनई न कोई।।  एहि बिधि राम मंडपहिं आए। अरघु देइ आसन बैठाए।।_अर्थ_आकाश और नगर में शोर मच रहा है। अपनी परायी कोई कुछ नहीं सुनता। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी मण्डप में आए और अर्ध्य देकर आसन पर बैठाए गए।





बैठारि आसन आरती करि निरखि बरु सुखु पावहीं। मनि बसन भूषन भूरि वारहिं नारि मंगल गावहीं। ब्रम्हादि सुरबर बिप्र बेष बनाइ कौतुक देखहीं। अवलोकि रघुकुलकमल रबि छबि सुफल जीवन लेखहीं।।_अर्थ_आसन पर बैठाकर, आरती करके दूलहे को देखकर स्त्रियाँ सुख पा रही हैं। वे ढ़ेर_के_ढ़ेर मणि, वस्त्र और गहने निछावर करके मंगल गा रही हैं। ब्रह्मा आदि श्रेष्ठ देवता ब्राह्मण का वेष बनाकर कौतुक देख रहे हैं। वे रघुकुलरूपी कमल के प्रफुल्लित करनेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखकर अपना जीवन सफल मान रहे हैं।





नाऊ बारि भाट नट राम निछावरि पाइ। मुदित असीसहिं नाइ सिर हरषु न हृदयँ समाइ।।_अर्थ_नाई, बारी, भाट और नट श्रीरामचन्द्रजी की निछावर पाकर आनन्दित हो सिर नवाकर आशिष देते हैं; उनके हृदय में हर्ष समा नहीं रहा।





मिले जनकु दसरथु अति प्रीतीं। करि बैदिक लौकिक सब रीतीं।। मिलत महा दोउ राज बिराजे। उपमा खोजि खोजि कबि लाजे।।_अर्थ_वैदिक और लौकिक सब रीतियाँ करके जनकजी और दशरथजी बड़े प्रेम से मिले। दोनों महाराज मिलते हुए बड़े शोभित हुए, कवि उनके लिये उपमा खोज_खोजकर लजा गये।





लही न कतहुँ हारि हियँ मानी। इन्ह सम एइ उपमा उर आनी।। सामध देखि देव अनुरागे। सुमन बरषि जसु गावन लागे।।_अर्थ_जब कहीं भी उपमा नहीं मिली, तब हृदय में हार मानकर उन्होंने मन में यही उपमा निश्चित की कि इनके समान ये ही हैं। समधियों का मिलाप या परस्पर संबंध देखकर देवता अनुरक्त हो गये और फूल बरसाकर उनका यश गाने लगे।





जगु बिरंचि उपजावा जब तें। देखे सुने ब्याह बहु तब तें।। सकल भाँति सम साजू समाजू। सम समधी देखे हम आजू।।_अर्थ_[ वे कहने लगे_] जबसे ब्रह्माजी ने जगत् को उत्पन्न किया, तबसे हमने बहुत विवाह देखे_सुने; परन्तु सब प्रकार से समान साज_समाज और बराबरी के ( पूर्ण समतायुक्त ) समधी तो आज ही देखे।





देवगिरा सुनि सुंदर साँची। प्रीति अलौकिक दुहुँ दिसि माची।। देत पाँवड़े अरघु सुहाए। सादर जनकु मंडपहिं ल्याए।।_अर्थ_देवताओं ती सुंदर सत्यवाणी सुनकर दोनों ओर अलौकिक प्रीति छा गयी।  सुन्दर पाँवड़े और अर्ध्य देते हुए जनकजी दशरथजी को आदरपूर्वक मण्डप में ले आए।





मंडपु बिलोकि बिचित्र रचना रुचिरताँ मुनि मन हरे। निज पानि जनक सुजान सब कहुँ आनि सिंघासन धरे।। कुल इष्ट सरिस बसिष्ट पूजे बिनय करि आसिष लही। कौसिकहि पूजत परम प्रीति की रीति तौ न परै कही।।__अर्थ_ मण्डप को देखकर उसकी विचित्र रचना और सुन्दरता से मुनियों के मन भी हरे गये ( मोहित हो गये )। 





सुजान जनकजी ने  अपने हाथों से ला_लाकर सबके लिये सिंहासन रखे। उन्होंने अपने कुल के इष्टदेवता के समान वसिष्ठजी की पूजा की और विनय करके आशीर्वाद प्राप्त किया। विश्वामित्रजी की पूजा करते समय की परम प्रीति की रीति तो कहते ही नहीं बनती।




बामदेव आदिक रिषय पूजे मुदित महीस। दिए दिव्य आसन सबहि सब सन लही असीस।।_अर्थ_राजा ने बामदेव आदि ऋषियों की प्रसन्न मन से पूजा की। सभी को दिव्य आसन दिये और सबसे आशीर्वाद प्राप्त किया।





बहुरि कीन्ह कोसलपति पूजा। जानि ईस सम भाउ न दूजा।। कीन्ह जोरि कर बिनय बड़ाई। कहि निज भाग्य बिभव बहुताई।।_अर्थ_फिर उन्होंने कोसलाधीश राजा दशरथजी की पूजा उन्हें ईश ( महादेवजी ) के समान जानकर की, कोई दूसरा भाव न था। तदनन्तर [ उनके सम्बन्ध से ] अपने भाग्य और वैभव के विस्तार की सराहना करके हाथ जोड़कर विनती और बड़ाई की।




पूजे भूपति सकल बराती। समधी सम सादर सब भाँती।। आसन उचित दिए सब काहू। कहौं काह मुँह एक उछाहू।।_ अर्थ_राजा जनकजी ने सब बरातियों का समधी दशरथजी के समान ही सब प्रकार से आदरपूर्वक पूजन किया और सब किसी को उचित आसन दिये। मैं एक मुख से उत्साह का क्या वर्णन करूँ।





सकल बरात जनक सनमानी। दान मान बिनती बर बानी।। बिधि हरिहरु दिसिपति दिनराऊ। जे जानहिं रघुबीर प्रभाऊ।।_अर्थ_राजा जनक ने दान, मान_सम्मान, विनय और उत्तम वाणी से सारी बारात का सम्मान किया। ब्रह्मा, विष्णु, शिव, दिक्पाल और सूर्य जो श्रीरघुनाथजी का प्रभाव जानते हैं,





कपट विप्र बर बेष बनाएँ। कौतुक देखहिं अति सच पाएँ।। पूजे जनक देवसम जानें। दिए सुआसन बिनु पहिचाने।।_अर्थ_ वे कपट से ब्राह्मणों का सुन्दर वेष बनाये बहुत ही सुख पाते हुए सब लीला देख रहे थे। जनकजी ने उनको देवताओं के समान जानकर उनका पूजन किया और बिना पहचाने भी उन्हें सुन्दर आसन दिये।





 पहिचान को केहि जान सबहि अपान सुधि भोरि भई। आनंद कंदु बिलोकि दूलहु उभय दिसि आनंदभई।। सुर लखे राम सुजानपूजे मानसिक आसन दए। अवलोकि सीलु सुभाउ प्रभु को बिबुध मन प्रमुदित भए।।_अर्थ_कौन किसको जाने_पहिचाने ! सबको अपनी ही सुध भूली हुई है।  सुजान ( सर्वज्ञ ) श्रीरामचन्द्रजी ने देवताओं को पहचान लिया और उनकी मानसिक पूजा करके उन्हें मानसिक आसन दिये। प्रभु का शील_स्वभाव देखकर देवगण मन में में बहुत आनंदित हुए।





रामचन्द्र मुख चन्द छबि लोचन चारु चकोर। करत पान सादर सकल प्रेमु प्रमोदु न थोर।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के मुखरूपी चन्द्रमा की छबि को सभी के सुन्दर नेत्ररूपी चकोर आदरपूर्वक पान कर रहे हैं; प्रेम और आनन्द कम नहीं है ( अर्थात् बहुत है )।





समउ बिलोकि बसिष्ठ बोलाए। सादर सतानंदु सुनि आए।। बेगि कुअँरि अब आनहु जाई। चले मुदित  मुनि आयसु पाई।।__अर्थ_समय देखकर वसिष्ठजी ने शतानंदजी को आदरपूर्वक बुलाया। वे सुनकर आदर के साथ आये। वसिष्ठजी ने कहा_अब जाकर राजकुमारी को शीघ्र ले आइये। मुनि की आज्ञा पाकर वे प्रसन्न होकर चले।





रानी सुनि उपरोहित बानी। प्रमुदित सखिन्ह समेत सयानी।। विप्रवधू कुलविप्र बोलाई। करि कुलरीति सुमंगल गाई।।_अर्थ_बुद्धिमति रानी पुरोहित की वाणी सुनकर सखियों सहित बहुत प्रसन्न हुई। ब्राह्मणों ती स्त्रियों और कुल की बूढ़ी स्त्रियों को बुलाकर उन्होंने कुलरीति करके सुन्दर मंगलगीत गाये।




नारि बेष जे सुर बर बामा। सकल सुभायँ सुन्दरी स्यामा।। तिन्हहिं देखि सुख पावहिं नारीं। बिनु पहिचानि प्रानहुँ ते प्यारी।।_अर्थ_श्रेष्ठ देवांगनाए, जो सुन्दर मनुष्य_स्त्रियों के वेष में हैं, सभी स्वभाव से ही सुन्दरि और स्यामा ( सोलह वर्ष की अवस्थावाली ) हैं। उनको देखकर रनिवास की स्त्रियाँ सुख पाती हैं और बिना पहचान के ही वे सबको प्राणों से प्यारी हो रही हैं।





बार बार सनमानहिं रानी। उमा रमा सारद सम जानी।। सीय सँवारि समाज बनाई। मुदित मंडपहिं चली लवाई।।_अर्थ_उन्हे पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के समान जानकर रानी बार_बार उनका सम्मान करती हैं। [ रनिवास की स्त्रियाँ और सखियाँ ] सीताजी का श्रृंगार करके, मण्डली बनाकर, प्रसन्न होकर उन्हें लिवा चलीं।




चलि ल्याइ  सीतहिं सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं। नवसप्त साजें सुन्दरीं सब मत्त कुंजर गामिनीं। कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं। मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं।।_अर्थ_सुन्दर मंगल का साज सजकर [ रनिवास की ] स्त्रियाँ  और सखियाँ आदरसहित सीताजी को लिवा चलीं। सभी सुन्दरियाँ सोलहों श्रृंगार किये हुए मतवाले हाथियों की चाल से चलनेवाली हैं। उनके मनोहर गान को सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेव की कोयलें लजा जाती हैं। पायजेब, पैंजनी और सुन्दर कंकण ताल की गति पर बड़े सुन्दर बज रहे हैं।





सोहति बनिता बृंद महुँ सहज सुहावनि सीय। छबि ललना गन मध्य जनु सुषमा तिय कमनीय।।_अर्थ_सहज ही सुन्दरी सीताजी स्त्रियों के समूह में इस प्रकार शोभा पा रही हैं, मानो छबिरूपी ललनाओं के समूह के बीच साक्षात् मनोहर शोभारूपीस्त्री सुुशोभित है।





सिय सुंदरता बरनि न जाई। लघुमति बहुत मनोहरताई।। आवत दीखि बरातिन्ह सीता। रूप रासि सब भाँति पुनीता।।_अर्थ_ सीताजी की सुन्दरता का वर्णन नहीं हो सकता, क्योंकि बुद्धि बहुत छोटी और मनोहरता बहुत बड़ी है। रूप की राशि और सब प्रकार से पवित्र सीताजी को बरातियों को आते देखा।





सबहिं मनहिं मन कीन्ह प्रनामा। देखि राम भए पूरनकामा।। हरषे दसरथ सुतन्ह समेता। कहि न जाइ उर आनँदु जेता।।_ अर्थ_ सभी ने उन्हें मन_ही_मन प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर तो सभी पूर्णकाम ( कृतकृत्य ) हो गये। राजा दशरथजी पुत्रोंसहित हर्षित हुए। उनके हृदय में जितना आनंद था कहा नहीं जा सकता।
सुर प्रणाम करि बरिसहिं फूला। मुनि असीस धुनि मंगल मूला।। गान निसान कोलाहलु भारी। प्रेम प्रमोद मगन नर नरी।।_ अर्थ_ देवता प्रणाम करके फूल बरसा रहे हैं। मंगलों की मूल मुनियों के आशीर्वादों की ध्वनि हो रही है। गानों और नगाड़ों के शब्द से बड़ा शोर मच रहा है। सभी नर नारी प्रेम में मगन हैं।





एहि बिधि सीय मंडपहिं आई। प्रमुदित सांति पढ़हिं मुनिराई।। तेहि अवसर कर बिधि ब्यवहारू। दुहुँ कुलगुर सब कीन्ह आचारू।।_अर्थ_इसप्रकार सीताजी मण्डप में आयीं। मुनिराज बहुत ही आनंदित होकर शांतिपाठ कर रहे हैं। उस अवसर की सब रीति, व्वहार और कुलाचार दोनों कुलगुरुओं ने किये।





आचारु करि गुर गौरि गनपति मुदित बिप्र पुजावहिं। सुर प्रगटि पूजा लेहिं देहिं असीस अति सुखु पावहीं।। मधुपर्क मंगल द्रब्य जो जेहि समय मुनि मन महुँ चहैं। भरे कनक कोपर कलस सो तब लिएहिं परिचारक रहैं।।_अर्थ_कुलाचार करके गुरुजी प्रसन्न होकर गौरीजी, गणेशजी और ब्राह्मणों की पूजा करा रहे हैं [ अथवा ब्राह्मणों के द्वारा गौरी और गणेश की पूजा करवा रहे हैं ] । देवता प्रकट होकर पूजा ग्रहण करते हैं, आशीर्वाद देते हैं और अत्यन्त सुख पा रहे हैं। मधुपर्क आदि जिस किसी भी मांगलिक पदार्थ की मुनि जिस समय मन में चाहमात्र करते हैं, सेवकगण उसी समय सोने की परातों में और कलशों में भरकर उन पदार्थों को लिये तैयार रहते हैं।




कुल रीति प्रीति समेत रबि कहि देत सब सादर कियो। एहि भाँति देव पुजाइ सीतहिं सुभग सिंहासन दियो।। सिय राम अवलोकनि परस्पर प्रेम काहुँ न लखि परै। मन बुद्धि बर बानी अगोचर प्रगट कबि कैसे करैं।।_अर्थ_स्वयं सूर्यदेव प्रेमसहित अपने कुल की सब रीतियाँ बता देते हैं और वे सब आदरपूर्वक की जा रही हैं। इस प्रकार देवताओं की पूजा करा के मुनियों ने सीताजी को सिंहासन दिया। श्रीसीताजी और श्रीरामजी का आपस में एकदूसरे का देखना तथा तथा उनका परस्पर प्रेम किसी को पता नहीं चल रहा है। जो बात मन, बुद्धि और वाणी से भी परे ह, उसे कवि क्योंकर प्रगट करे?





जय धुनि बंदि बेद धुनि मंगल गान निसान। सुनि हरषहिं बरषहिं बिबुध सरतरु सुमन सुजान।।_अर्थ_जयध्वनि, बन्दिध्वनि, वेदध्वनि, मंगलगान और नगाड़ों की ध्वनि सुनकर चतुर देवगण हर्षित हो रहे हैं और कल्पवृक्ष के फूलों को बरसा रहे हैं।





कुअँरु कुअँरि कल भावँरि देहीं। नयन लाभु सब सादर लेहीं।। जाइ न बरनि मनोहर जोरी। जो उपमा कछु कहौं सो थोरी।।_अर्थ_वर और कन्या सुन्दर भाँवरे दे रहे हैं। सबलोग आदरपूर्वक [ उन्हें देखकर ] नेत्रों का परम लाभ ले रहे हैं। मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं हो सकता, जो कुछ उपमा होगी वही थोड़ी होगी।





राम सीय सुन्दर प्रतिछाहीं। जगमगात मनि खम्भन्ह माहीं।। मनहुँ मदन रति धरि बहुरूपा। देखत राम बिआह अनूपा।।_अर्थ_श्रीरामजी और श्रीसीताजी की सुन्दर परछाई मणियों के खम्भों में जगमगा रही है, मानो कामदेव और रति बहुत_से रूप धारणकरके  श्रीरामजी के अनुपम विवाह को देख रहे हैं।

दरस लालसा सकुच न थोरी। प्रगटत दुरत बहोरि बहोरि।। भए मगन सब देखनिहारे। जनक समान अपान बिसारे।।_अर्थ_उन्हें ( कामदेव और रति को ) दर्शन की लालसा और संकोच दोनों ही कम नहीं है ( अर्थात् बहत हैं ); इसलिये वे बार_बार प्रकट होते और छिपते हैं। सब देखनेवाले आनंदमग्न हो गये और जनकजी की भाँति सभी अपनी सुध भूल गये।





प्रमुदित मुनिन्ह भावँरीं फेरीं। नेगसहित सब रीति निबेरीं।। राम सीय सिर सेंदुर देहीं। सोभा कहि न जात बिधि केहीं।।_अर्थ_मुनियों ने  आनन्दपूर्वक भाँवरें फिरायीं और नेगसहित सब रीतियों को पूरा किया। श्रीरामचन्द्रजी सीताजी के सिर में सिंदूर दे रहे हैं; यह शोभा किसी प्रकार भी कही नहीं जाती।






अरुन पराग जलजु भरि नीकें। ससिहि भूष अहि लोभ अमी कें।। बहुरि बसिष्ठ दीन्हि अनुसासन। बरु दुलहिनि बैठे एक आसन।।_अर्थ_मानो कमल को लाल पराग से अच्छी तरह भरकर अमृत के लोभ से साँप चन्द्रमा को भूषित कर रहा है। ( यहाँ श्रीराम के हाथ को कमल की, सेंदुर को पराग की, श्रीराम के श्याम भुजाओं को साँप की और सीताजी के मुख को चन्द्रमा की उपमा दी गयी है ) फिर वसिष्ठजी ने आज्ञा दी, तब दूलह और दुलहिन एक आसन पर बैठे।





बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए। तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु फल नए।। भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा। केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगल महा।।_अर्थ_ श्रीरामजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसन पर बैठे; उन्हें देखकर दशरथजी मन में बहुत आनंदित हुए। अपने सुकृतरूपी कल्पवृक्ष में नये फल [ आये ] देखकर उनका शरीर बारबार पुलकित हो रहा है। चौदहों भुवनों में उत्साह भर गया; सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजी का विवाह हो गया। जीभ एक है और यह मंगल महान् है; फिर भला, वह वर्ण करके किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है!





तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै। मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै।। कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई। सब रीति प्रीति समेत सो ब्याहि भूप भरतहिं दई।।_अर्थ_तब बसिष्ठजी की आज्ञा पाकर जनकजी ने विवाह का समान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्ति और उर्मिलाजी_इन तीनों राजकुमारियों को बुला लिया। कुशध्वज की बड़ी कन्या माण्डवीजी को, जो गुण, शील, सुख और शोभा की रूप ही थीं, राजा जनक ने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरतजी को ब्याह दिया।





जानकी लघु भगिनी सकल सुन्दर सिरोमनि जानि कै। सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहिं सकल बिधि सनमानि कै।। जेहि नामु श्रुतिकीरति सुलोचनि सकल गुन आगरी। सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी।।_अर्थ_जानकीजी की छोटी बहिन उर्मिलाजी को सब सुन्दरियों में शिरोमणि जानकर उस कन्या को सब प्रकार से सम्मान करके, लक्ष्मणजी को ब्याह दिया; और जिसका नाम श्रुतकीर्ति है और जो सुन्दर नेत्रोंवाली, सुन्दर मुखवाली, सब गुणों की खान और रूप तथा शील में उजागर है, उनको राजा ने शत्रुध्न को ब्याह दिया। 





अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहिं। सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं।। सुन्दरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं। जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं।।_अर्थ_दूलह और दुलहिनें परस्पर अपने_ अपने अनुरूप जोड़ी को देखकर सकुचते हुए हृदय में हरषित हो रही हैं। सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुन्दरता की सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं।सब सुन्दरी दुलहिनें सुन्दर दूल्हों के साथ एक ही मण्डप में ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीव के हृदय में चारों अवस्थाएँ ( जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय ) अपने चारों स्वामियों ( विश्व, तैजस, प्राज्ञ और ब्रह्म ) सहित विराजमान हों।





मुदित अवधपति सकल सुत बधुन्ह समेत निहारि। जनु पाए महिपालमनि क्रियन्ह सहित फल चारि।।_अर्थ_ सब पुत्रों को बहुओंसहित देखकर अवधनरेश दशरथजी ऐसे आनन्दित हैं मानो वे राजाओं के शिरोमणि क्रियाओं ( यज्ञक्रिया, श्रद्धाक्रिया, योगक्रिया और ज्ञानक्रिया ) सहित चारों फल ( अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष ) पा गये हों।





जसि रघुबीर ब्याह बिधि बरनी। सकल कुअँर ब्याहे तेहिं करनी।। कहि न जाइ कछु दाइज भूरी।। रहा कनकमनि मंडपु पूरी।।_ अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी के विवाह की जैसी विधि वर्णन की गयी, उसी रीति से सब राजकुमार विवाहे गये। दहेज की अधिकता कुछ कही नहीं जाती; सारा मंडप सोने और मणियों से भर गया।





कंबल बसन बिचित्र पटोरे। भाँति भाँति बहु मोल न थोरे।। गज रथ तुरग दास अरु दासी। धेनु अलंकृत कामदुहा सी।।_अर्थ_बहुत से कंबल वस्त्र और भाँति_भाँति के विचित्र रेशमी कपड़े, जो थोड़ी कीमत के न थे ( अर्थात् बहुमूल्य थे ) तथा हाथी, रथ घोड़े, दास,_दासियाँ और गहनों से सजी हुई कामधेनु_सरीखी गायें_





बस्तु अनेक करिअ किमि लेखा। कहि न जाइ जानहिं जिन्ह देखा।। लोकपाल अवलोकि सिहाने। लीन्ह अवधपति सबु सुखु माने।।_अर्थ_ [ आदि ] अनेकों  वस्तुएँ हैं, जिनकी गिनती कैसे की जाय। उनका वर्णन नहीं किया जा सकता, जिन्होंने देखा है वही जानते हैं। उन्हेंवदेखकर लोकपाल भी सिहा गये। अवधराज दशरथजी ने सुख मानकर प्रसन्नचित्त से सबकुछ ग्रहण किया।





दीन्ह जाचकन्ह जो जेहि भावा। उबरा सो जनवासेहिं आवा।। तब कर जोरि जनक मृदु बानी बोले सब बरात सनमानी।।_अर्थ_उन्होंने वह दहेज का सामान याचकों को, जो जिसे अच्छा लगा दे दिया। जो बच रहा, वह जनवासे में चला आया। तब जनकजी ने हाथ जोड़कर सारी बरात का सम्मान करते हुए कोमल वाणी से बोले_





सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै। प्रमुदित महामुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै।। सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ। सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ।।_अर्थ_आदर, दान, विनय और बड़ाई के द्वारा सारी बरात का सम्मान कर राजा जनक ने महान् आनन्द के साथ प्रेमपूर्वक  लड़ाकर ( लाड़ करके ) मुनियों के समूह की पूजा एवं वन्दना की। सिर नवाकर, देवताओं को मनाकर, राजा हाथ जोड़कर सबसे कहने लगे कि देवता और साधु तो भाव ही चाहते हैं ( वे प्रेम से ही प्रसन्न हो जाते हैं, उन पूर्णकाम महानुभावों को कोई कुछ देकर कैसे संतुष्ट कर सकता है ); क्या एक अंजलि जल देने से कहीं समुद्र संतुष्ट हो सकता है।





कर जोरि जनक बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों। बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों।। संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए। एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए।।_अर्थ_फिर जनकजी भाई सहित हाथ जोड़कर कोसलाधीश दशरथजी से स्नेह, शील और सुन्दर प्रेम में सानकर मनोहर वचन बोले_हे राजन् ! आपके साथ संबंध हो जाने से अब हम सब प्रकार से बड़े हो गये। इस राज_पाट सहित हम दोनों को आप बिना दाम के लिये हुए सेवक ही समझियेगा।





ए दारिका परिचारिका करि पालिबि करुना नईं। अपराधु छमिबों बोलि पठए बहुत हौं ढ़ीठ्यो कईं।। पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए। कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए।।_अर्थ_ इन लड़कियों को टहलनी मानकर, नयी_नयी दया करके पालन कीजियेगा। मैंने बड़ी ढ़िठाई की कि आपको यहाँ बुला भेजा, अपराध क्षमा कीजियेगा। फिर सूर्यकुल के भूषण दशरथजी ने समधी जनकजी को संपूर्ण सम्मान का निधि कर दिया ( इतना सम्मान किया कि वे सम्मान के भण्डार ही हो गये )। उनकी परस्पर की विनय कही नहीं जाती, दोनों के हृदय प्रेम से परिपूर्ण हैं।





बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहिं चले। दुंदुभी जय धुनि  बेद धुनि नगर कौतूहल भले।। तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै। दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै।।_अर्थ_देवतागण फूल बरसा रहे हैं; राजा जनवासे को चले। नगाड़े की ध्वनि, जयध्वनि और वेद की ध्वनि हो रही है; आकाश और नगर दोनों में खूब कौतूहल हो रहा है ( आनन्द छा रहा है ), तब मुनिश्वर की आज्ञा पाकर सुंदरी सखियाँ मंगलगान करती हुईं दुलहिनों सहित दूल्हों को लिवाकर कोहबर को चलीं।





पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचित मनु सकुचै न। हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पियासे नैन।।सीताजी बार_बार रामजी को देखती हैं और सकुचा जाती हैं; पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेम के प्यासे उनके नेत्र सुन्दर मछलियों के छबि को हर रहे हैं।

Sunday, 4 October 2020

बालकाण्ड

मासपरायण दसवाँ विश्राम

कनक कलस मरि कोपर थारा। भाजन ललित अनेक प्रकारा।।  भरे सुधा सम सब पकवाने। नाना भाँति न जाहिं बखाने।।_अर्थ_ [ दूध, शर्बत, ठंडाई और जल आदि से ]  भरकर सोने के कलश तथा जिनका वर्णन नहीं हो सकता ऐसे अमृत के समान भाँति_भाँति के सब पकवानों से भरे हुए परात , थाल आदि अनेक प्रकार के सुन्दर बर्तन







फल अनेक बर बस्तु सुहाईं। हरषि भेंट हित भूप पठाईं।। भूषन बसन महामनि नाना। खग मृग हय गय बहुबिधि जाना।_अर्थ_ उत्तम फल तथा और भी अनेकों सुन्दर वस्तुएँ राजा ने हर्षित होकर भेंट के लिषे भेजीं। गहने, कपड़े, नाना प्रकार की मूल्यवान मणियाँ ( रत्न ), पक्षी, पशु, घोड़े, हाथी और बहुत तरह की सवारियाँ,






मंगल सगुन सुगंध सुहाए। बहुत भाँति महिपाल पठाए।। दधि चिउड़ा उपहार अपारा। भरि भरि काँवरि चले कहारा।।_अर्थ_तथा बहुत प्रकार के सुहावने तथा मंगल द्रव्य और सगुन के पदार्थ राजा ने भेजे। दही चिउड़ा और अगणित उपहार की चीजें काँवरों में भर_भरकर कहार चले।






अगवानन्ह जब दीख बराता। उर आनन्दु पुलक भर गाता।। देखि बनाव सहित अगवाना। मुदित बरातिन्ह हने निसाना।।_अर्थ_अगवानी करनेवालों को जब बरात दिखायी दी, तब उनके हृदय में आनन्द छा गया और शरीर रोमांच से भर गय। अगवानों को सज_धज के साथ देखकर बरातियों ने प्रसन्न होकर नगाड़े बजाये।





हरषि परस्पर मिलन हित कछुक चले बगमेल। जनु आनंद समुद्र दुइ मिलत बिहाइ सुबेल।।_अर्थ_ [ बराती तथा अगवानों में से ] कुछ लोग परस्पर मिलने के लिये हर्ष के मारे बाग छोड़कर ( सरपट ) दौड़ चले,और ऐसे मिले मानो आनन्द के दो समुद्र मर्यादा छोड़कर मिलते हों।





बरषि सुमन सुर सुंदरि गावहिं। मुदित देव दुंदुभि बजावहिं।। बस्तु सकल राखी नृप आगें। बिनय कीन्हि तिन्ह अति अनुरागें।।_अर्थ_ देवसुन्दरियाँ फूल बरसाकर गीत गा रही हैं, और देवता आनंदित होकर नगाड़े बजा रहे हैं। [ अगवानी में आये हुए ] उन लोगों ने सब दशरथजी के आगे रख दीं और अत्यन्त प्रेम से विनती की।





प्रेम समेत रायँ सब लीन्हा। भै बकसीस जाचकन्हि दीन्हा।। करि पूजा मान्यता बड़ाई।। जनवासे कहुँ चले लवाई।।_अर्थ_राजा दशरथजी ने प्रेमसहित सब वस्तुएँ ले लीं, फिर उनकी बख्शीशें होने लगीं और वे याचकों को दे दी गयीं। तदनन्तर पूजा, आदर_सत्कार और बड़ाई करके अगवानलोग उनको जनवासे की ओर लिवा ले चले।





बसन बिचित्र पाँवड़े परहीं। देखि धनदु धन मदु परिहरहीं।। अति सुंदर दीन्हेउ जनवासा। जहँ सब कहँ सब भाँति सुपासा।।_अर्थ_विलक्षण वस्त्रों के पाँवड़े पर रहे हैं, जिन्हें देखकर कुबेर भी अपने धन का अभिमान छोड़ देते हैं। बड़ा सुंदर जनवासा दिया गया, जहाँ सबको सब प्रकार का सुविधा था।





जानि सीय बरात पुर आई। कछु निज महिमा प्रगटि जनाई।। हृदयँ सुमिरि सब सिद्धि बोलाई। भूप पहुनई करन पठाई।।_अर्थ_सीताजी ने बरात जनकपुर में आयी जानकर अपनी कुछ महिमा प्रगट करके दिखलायी। हृदय में स्मरण कर सब सिद्धियों को बुलाया और उन्हें राजा दशरथजी की मेहमानी करने के लिये भेजा।





सिधि सब सिय आयसु अकनि गईं जहाँ जनवास। लिएँ संपदा सकल सुख सुरपुर भोग बिलास।।_अर्थ_सीताजी की आज्ञा सुनकर सब सिद्धियाँ जहाँ जनवासा था वहाँ सारी सम्पदा, सुख और इन्द्रपुरी के भोगविलास को लिये हुए गयीं।





निज निज बास बिलोकि बराती। सुरसुख सकल सुलभ सब भाँती।। विभव भेद कछु कोउ न जाना। सकल जनक कर करहिं बखाना।।_अर्थ_ बरातियों ने अपने_अपने ठहरने के स्थान देखे तो वहाँ देवताओं के सब सुखों को सब प्रकार से सुलभ पाया। इस ऐश्वर्य का कुछ भी भेद कोई जान न सका। सब जनकजी की बड़ाई कर रहे हैं।




सिय महिमा रघुनायक जानी। हरषे हृदय हेतू पहिचानी।। पितु आगमनु सुनत दोउ भाई। हृदयँ न अति आनंदु अमाई।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी यह सब सीताजी की महिमा जानकर और उनका प्रेम जानकर हृदय में हर्षित हुए। पिता दशरथजी के आने का समाचार सुनकर दोनों भाइयों के हृदय में महान् आनन्द था।






सकुचन्ह कहि न सकत गुर पाहीं। पितु दरसन लालचु मन माहीं।। बिस्वामित्र बिनय बड़ि देखी। उपजा उर संतोषु बिसेषी।।_अर्थ_संकोचवश वे गुरु विश्वामित्रजी से कह नहीं सकते थे; परन्तु मन में पिताजी के दर्शनों की लालसा थी। विश्वामित्रजी ने उनकी बड़ी नम्रता देखी, तो उनके हृदय में बहुत संतोष उत्पन्न हुआ।





हरषि बंधु दोउ हृदयँ लगाए। पुलक अंग अंबक जल छाए।। चले जहाँ दसरथु जनवासे।  मनहुँ सरोबर तकेउ पिआसे।।_अर्थ_प्रसन्न होकर उन्होंने हृदय से लगा लिया। उनका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर गया। वे उस जनवासे को चले, जहाँ दशरथजी थे। मानो सरोवर प्यासे की ओर लक्ष्य करके चला हो।





भूप बिलोके जबहिं मुनि आवत सुतन्ह समेत। उठे हरषि सुखसिंधु महुँ चले थाह सी लेत।।_अर्थ_जब राजा दशरथजी ने पुत्रों सहित मुनि को आते देखा, तब वे हर्षित होकर उठे और सुख के समुद्र में थाह सी लेते हुए चले।





मुनिहि दंडवत् कीन्ह महीसा। बार बार पद रज धरि सीसा।। कौसिक राउ लिए उर लाई। कहि असीस पूछी कुसलाई।।_अर्थ_पृथ्वीपति दशरथजी ने मुनि की चरणधूलि को बारंबार सिर पर चढ़ाकर उनको दण्डवत् प्रणाम किया। 
विश्वामित्रजी ने राजा को उठाकर हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद देकर कुशल पूछी।





पुनि दंडवत करत दोउ भाई। देखि नृपति उर सुखु न समाई।। सुत हियँ लाइ दुसह दुख मेटे। मृतक सरीर प्रान जनु भेंटे।।_अर्थ_फिर दोनों भाइयों को दण्डवत्_प्रणाम करते देखकर राजा के हृदय में अपार सुख हो रहा था। पुत्रों को [ उठाकर ] हृदय से लगाकर उन्होंने अपने [ वियोगजनित ] दुःसह दुःख को मिटाया। मानो मृतक शरीर को प्राण मिल गये हों।





पुनि बसिष्ठ पद सिर तिन्ह नाए। प्रेम मुदित मुनिबर उर लाए।। बिप्र बृंद बंदे दुहुँ भाई।  मनभावति  असीसें पाई।।_अर्थ_ फिर उन्होंने बसिष्ठजी के चरणों में सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ  ने प्रेम के आनन्द में उन्हें हृदय से लगा लिया। दोनों भाइयों ने सब ब्राह्मणों की वन्दना की और मनभाये आशीर्वाद पाये।





भरत सहानुज कीन्ह प्रणामा। लिए उठाई लाई उर रामा।। हरषे लखन देखि दोउ भ्राता। मिले प्रेम परिपूरित गाता।।_अर्थ_भरतजी ने छोटे भाई शत्रुध्नसहित श्रीरामचन्द्रजी को प्रणाम किया। श्रीरामजी ने उन्हें उठाकर हृदय से लगा लिया। लक्ष्मणजी दोनों भाइयों को देखकर हर्षित हुए और प्रेम से परिपूर्ण हुए शरीर से उनसे मिले।





पुरजन परिजन जातिजन जाचक मंत्री मीत। मिले जथाबिधि सबहि प्रभु परम कृपाल बिनीत।।_अर्थ_तदनन्तर परम कृपालु और विनयी  श्रीरामचन्द्रजी अयोध्यावासियों, कुटुम्बियों, जाति के लोगों, याचकों, मंत्रियों और मित्रों_ सभी से यथायोग्य मिले।





रामहिं देखि बरात जुड़ानी। प्रीति कि रीति न जाति बखानी।। नृप समीप सोहहिं सुत चारी। जनु धन धरमादिक तनुधारी।।_ अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी को देखकर बरात शीतल हुई ( राम के वियोग में सबके हृदय में जो आग जल रही थी, वह शान्त हो गयी)। प्रीति की रीति का बखान नहीं हो सकता। राजा के पास चारों पुत्र ऐसे शोभा पा रहे हैं मानो अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष शरीर धारण किये हुए हों।





सुतन्ह समेत दशरथहि देखी। मुदित नगर नर नारि बिसेषी।। सुमन बरसि सुर हनहिं निसाना। नाकनटीं नाचहिं करि गाना।।_अर्थ_पुत्रोंसहित दशरथजी को देखकर नगर के स्त्री_पुरुष बहुत ही प्रसन्न हो रहे हैं। [ आकाशमें ] देवता फूलों की वर्षा करके नगाड़े बजा रहे हैं और अप्सराएँ गागाकर नाच रही हैं।





सतानंद अरु बिप्र सचिव गन। मागध सूत बिदुष बंदीजन।। सहित बरात राउ सनमाना। आयसु मागि फिरे अगवाना।।_अर्थ_अगवानी में आये हुए शतानन्दजी, अन्य ब्राह्मण, मंत्रीगण, मागध, सूत, विद्वान और भाटों ने बरातसहित राजा दशरथजी का आदर_सत्कार किया। फिर आज्ञा लेकर वे वापस लौटे।





प्रथम बरात लगन ते आई। तातें पुर प्रमोदु अधिकाई।। ब्रह्मानंदु लोग सब लहहीं। बढ़हुँ दिवस निसि बिधि सन कहहीं।।_अर्थ_ बरात लग्न के पहले दिन से पहले आ गयी है, इससे जनकपुर में अधिक आनंद छा रहा है। सब लोग ब्रह्मानंद प्राप्त कर रहे हैं और विधाता से मनाकर कहते हैं कि दिन रात बढ़ जायँ ( बड़े हो जायँ )।





राम सीय सोभा अवधि सुकृत अवध दोउ राज। जहँ तहँ पुरजन  कहहिं अस मिलि नर नारि समाज।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी और सुन्दरता की सीमा हैं और दोनों राजा पुण्य की सीमा हैं, जहाँ_तहाँ जनकपुरवासी स्त्री_पुरुषों के समूह इकट्ठे हो_ होकर यही कह रहे हैं।





जनक सुकृति मूरति बैदेही। दशरथ सुकृति रामु धरें देही।। इन्ह सम काहु न सिव अवराधे। काहुँ न इन्ह समान फल लाधे।।_अर्थ_ जनकजी के सुकृत ( पुण्य ) की मूर्ति जानकीजी हैं और दशरथजी के सुकृत देह धारण किये हुए श्रीरामजी हैं। इन [ दोनों राजाओं ] के समान किसी ने शिवजी की अराधना नहीं की; और न इनके समान किसी ने फल ही पाये।





इन्ह सम कोउ न भयउ जग माहीं। है नहीं कतहूँ होनेउ नाहीं।। हम सब सकल सुकृति कै रासी। भए जग जनमि जनकपुर बासी।।_अर्थ_इनके समान जगत् में न कोई हुआ, न कहीं है, न होने का ही है। हम सब भी संपूर्ण पुण्यों की राशि हैं, जो जगत् में जन्म लेकर जनकपुर के निवासी हुए।





जिन्ह जानकी राम छबि देखी। को सुकृति हम सरिस बिसेषी।। पुनि देखब रघुबीर बिआहू। लेब भली बिधि लोचन लाहू।।_ अर्थ_ और जिन्होंने जानकीजी और श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखी है। हमारे सरीखा विशेष पुण्यात्मा कौन होगा ! और अब हम श्रीरघुनाथजी का विवाह देखेंगे और भलीभाँति लोचन का लाभ लेंगे।





कहहिं परस्पर कोकिलबयनीं। एहि बिआहँ बड़ लाभु सुनयनीं।। बड़ें भाग बिधि बात बनाईं। नयन अतिथि होइहहिं दोउ भाई।।_अर्थ_कोयल के समान मधुर बोलनेवाली स्त्रियाँ आपस में कहती हैं कि हे सुन्दर नेत्रोंवाली ! इस विवाह में बड़ा लाभ है। बड़े भाग्य से विधाता ने सब बात बना दी है, ये दोनों भाई हमारे नेत्रों के अतिथि हुआ करेंगे।





बारहिं बार सनेह बस जनक बोलाउब सीय। लेन आइहहिं बंधु दोउ कोटि काम कमनीय।।_अर्थ_जनकजी स्नेहवश बार_बार सीताजी को बुलावेंगे, और करोड़ों कामदेवों के समान सुन्दर दोनों भाई सीताजी को लेने ( विदा कराने )  आया करेंगे।





बिबिध भाँति होइहहिं पहुनाई। प्रिय न काहि अस सासुर माई।। तब तब राम लखनहिं निहारी। होइहहिं सब पुर लोग सुखारी।।_अर्थ_तब उनकी अनेकों प्रकार से पहुनाई होगी। सखी ! ऐसी ससुराल किसे प्यारी न होगी ! तब_तब हम सब नगरवासी श्रीराम_लक्ष्मण को देख_देखकर सुखी होंगे।




सखि जस राम लखन कर जोटा। तैसेइ भूप संग दुइ ढोटा।। स्याम गौर सब अंग सुहाए। ते सब कहहिं देखि जे आए।।_अर्थ_सखी ! जैसा श्रीराम_ लक्ष्मण का जोड़ा है, वैसे ही दो कुमार राजा के साथ और भी हैं। वे भी एक श्याम और दूसरे गौर वर्ण के हैं, उनके भी सब अंग बहुत सुन्दर हैं। जो लोग उन्हें देख आये हैं, वे सब यही कहते हैं।





कहा एक मैं आजु निहारे। जनु बिरंचि निज हाथ सँवारे।। भरतु रामहिं की अनुहारी। सहसा लखि न सकहिं नर नारी।।_ अर्थ_एक ने कहा__मैंने आज ही उन्हें देखा है; इतने सुन्दर हैं मानो ब्रह्माजी ने उन्हें अपने हाथों से सँवारा है। भरत तो श्रीरामचन्द्रजी की ही शकल सूरत के हैं। स्त्री_पुरुष उन्हें सहसा पहचान नहीं सकते।





लखनु सत्रुसूदनु एकरूपा। नख सिख ते सब अंग अनूपा।। मन भावहिं मुख बरनि न जाहीं। उपमा कहुँ त्रिभुवन कोउ नाहीं।।_अर्थ_ लक्ष्मण और शत्रुध्न दोनों का एक रूप है। दोनों के नख से शिखा तक सभी अंग अनुपम हैं। मन को बड़े अच्छे लगते हैं, पर मुख से उनका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी उपमा के योग्य तीनों लोकों में कोई नहीं है।





उपमा न कोउ कह दास तुलसी कतहुँ कबि कोबिद कहैं। बल बिनय बिद्या सील सोभा सिंधु इन्ह से एइ अहैं।। पुर नारि सकल पसारि अंचल बिधिहिं बचन सुनावहीं। ब्याहिअहु चारिउ भाइ एहिं पुर हम सुमंगल गावही।।_अर्थ_तुलसीदास कहता है कवि और कोविद ( विद्वान) कहते हैं, इनकी उपमा कहीं कोई नहीं है। बल, विनय, विद्या, शील और शोभा के समुद्र इनके समान ये ही हैं। जनकपुर की सब स्त्रियाँ आँचल फैलाकर विधाता को यह वचन ( विनती ) सुनाती हैं कि चारों भाइयों का विवाह इसी नगर में हो और हम सब सुन्दर मंगल गावें।





कहहिं परस्पर नारि बारि बिलोचन पुलक तन। सखि सब करब पुरारि पुन्य पयोनिधि भूप दोउ।।_अर्थ_नेत्रों में  [ प्रेमाश्रुओं का ]
 का जल भरकर पुलकित शरीर से स्त्रियाँ आपस में कह रही हैं कि यह सखी ! दोनों राजा पुण्य के समुद्र हैं। त्रिपुरारी शिवजी सब मनोरथ पूर्ण करेंगे।





एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। आनंद उमगि उमगि उर भरहीं।। जे नृप सीय स्वयंबर आए। देखि बंधु सब तिन्ह सुख पाए।।_अर्थ_ इस प्रकार सब मनोरथ कर रही हैं और हृदय को आनंद से भर रही हैं। सीताजी के स्वयंवर में जो राजा आए थे, उन्होंने भी चारों भाइयों को देखकर सुख पाया।





कहत राम जसु बिसद बिसाला। निज निज भवन गए महिपाला।। गए बीति कछु दिन एहि भाँति। प्रमुदित पुरजन सकल बराती।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का निर्मल और महान् यश कहते हुए राजालोग अपने_अपने घर गये। इस प्रकार कुछ दिन बीत गये। जनकपुरनिवासी और बराती सभी बड़े आननंदित हैं।




मंगल मूल लगन दिनु आवा। हिमरितु अगहनु मासु सुहावा।। ग्रह तिथि नखतु जोगु बर बारू। लगन सोधि बिधि कीन्ह बिचारू।। _अर्थ_मंगलों का मूल लग्न का दिन आ गया। हेमन्त ऋतु और सुहावना अगहन का महीना था। ग्रह, तिथि, नक्षत्र, योग और वार श्रेष्ठ थे। लग्न ( मुहूर्त ) शोधकर ब्रह्माजी ने उसपर विचार किया।





पठै दीन्हि नारद सन सोई। गनी जनक के गनकन्ह जोई।। सुनी सकल लोगन्ह यह बाता। कहहिं जोतिषी आहिं बिधाता।।_ अर्थ_ और उस ( लग्नपत्रिका ) को नारदजी के हाथ [ जनकजी के यहाँ ] भेज दिया। जनकजी के ज्योतिषियों ने भी यही गणना कर रखी थी। जब सब लोगों ने यह बात सुनी तब वे कहने लगे_ यहाँ के ज्योतिषी ब्रह्माजी हैं।





धेनुधूरि बेला बिमल सकल सुमंगल मूल। बिप्रन्ह कहेउ बिदेह सन जानि सगुन अनुकूल।।_अर्थ_निर्मल और सभी सुन्दर मंगलों की मूल गोधूलि की पवित्र वेला आ गयी और अनुकूल शकुन होने लगे, यह जानकर ब्राह्मणों ने जनकजी से कहा।





उपरोहितहि कहेउ नरनाहा। अब बिलंबु कर कारनु काहा।। सतानंद तब सचिव बोलाए। मंगल सकल साजि सब ल्याए।।_अर्थ_तब राजा जनक ने पुरोहित शतानंदजी से कहा कि अब देर का क्या कारण है। तब शतानंदजी ने मंत्रियों को बुलाया। वे सब मंगल का सामान सजाकर ले आये।





संख निसान पनव बहु बाजे। मंगल कलस सगुन सुभ साजे।। सुभग सुआसिनि गावहिं गीता। करहिं  बेद धुनि बिप्र पुनीता।।_अर्थ_शंख, नगाड़े, ढ़ोल और बहुत से बाजे बजने लगे तथा मंगलकलश औरशुभ शकुन की वस्तुएँ ( दधि, दूर्वा  आदि) सजायी गयीं। सुन्दर सुहागिन स्त्रियाँ गीत गा रही हैं और पवित्र ब्राह्मण वेद की ध्वनि कर रहे हैं।






लेन चले सादर एहि भाँती। गए जहाँ जनवास बराती।। कोसलपति कर देखि समाजू। अति लघु लाग तिन्हहि सुरराजू।।_अर्थ_सबलोग इस प्रकार आदरपूर्वक बरात को लेने चले और जहाँ बरातियों का जनवासा था, वहाँ गये। अवधपति दशरथजी का समाज ( वैभव ) देखकर उनको देवराजइन्द्र भी बहुत तुच्छ लगने लगे।





भयउ समउ अबधारिय पाऊ।  यह सुनि परा निसानहिं घाऊ।। गुरहि पूछि करि कुल बिधि राजा। चले संग मुनि साधु समाजा।।_अर्थ_[ उन्होंने जाकर विनती की_ ] समय हो गया, अब पधारिये। यह सुनते ही नगाड़ों पर चोट पड़ी। गुरु वशिष्ठजी से पूछकर और कुल की सब रीतियों को करके राजा दशरथजी मुनियों और साधुओं के समाज के साथ लेकर चले।





भाग्य विभव अवधेस कर देखि देव ब्रह्मादि। लगे सराहन सहस मुख जानि जनम निज बादि।।_अर्थ_अवधनरेश दशरथजी का भाग्य और वैभव देखकर और अपना जन्म व्यर्थ समझकर, ब्रह्माजी आदि देवता हजारों मुखों से उसकी सराहना करने लगे।





सुरन्ह सुमंगल अवसरु जाना। बरषहिं सुमन बजाइ निसाना।। सिव ब्रह्मादिक बिबुध बरूथा। चढ़े बिमानन्हि नाना जूथा।।_अर्थ_देवगण सुन्दर मंगल का अवसर जानकर, नगाड़े बजा_बजाकर फूल बरसाते हैं। शिवजी, ब्रह्माजी, आदि देववृंद टोलियाँ बना_बनाकर विमानों पर जा चढ़े।





प्रेम पुलक तन हृदय उछाहू। चले बिलोकन राम बिआहू।। देखि जनकपुरु सुर अनुरागे। निज_निज लोक सबन्हि लघु लागे।।_अर्थ_और प्रेम से पुलकित शरीर तथा हृदय में उत्साह भरकर श्रीरामचन्द्रजी का विवाह देखने  चले। जनकपुर को देखकर देवता इतने अनुरक्त हो गये कि उन सबको अपने_ अपने लोक बहुत तुच्छ लगने लगे।





चितवहिं चकितबिचित्र बिताना। रचना सकल अलौकिक नाना। नगर नारि नर रूप निधाना। सुघर सुधरम सुसील सुजाना।।_अर्थ_विचित्र मण्डप को तथा नाना प्रकार की सब अलौकिक रचनाओं को वे चकित होकर देख रहे हैं। नगर के स्त्री_पुरुष रूप के भण्डार, सुघड़, श्रेष्ठ धर्मात्मा, सुशील और सुजान हैं।





तिन्हहीं देखि सब सुर सुरनारीं। भए नखत जनु बिधु उजियारीं।।  बिधिहि भयउ आचरजु बिषेषी। निज करनी कछु कतहुँ न देखी।।_अर्थ_उन्हें देखकर सब देवता और देवांगनाएँ ऐसे प्रभाहीन हो गये जैसे चन्द्रमा के उजियाले में तारागण फीके पड़ जाते हैं। ब्रह्माजी को विशेष आश्चर्य हुआ; क्योंकि वहाँ उन्होंने अपनी कोई करनी ( रचना ) तो कहीं देखी ही नहीं।





सिवँ समुझाए देव सब जनि आचरज भुलाहु। हृदयँ बिचारहु धीर धरि सिय रघुबीर बिआहु।।__ अर्थ_तब शिवजी ने सब देवताओं को समझाया कि तुमलोग आश्चर्य में मत भूलो। हृदय में धीरज धरकर विचार करो कि यह [ भगवाव् की महिमामयी निजशक्ति ] श्रीसीताजी और [ अखिल ब्रह्माण्डों के परम ईश्वर साक्षात् भगवान् ] श्रीरामचन्द्जी का विवाह है।





जिन्ह कर नाम लेत जग माहीं। सकल अमंगल मूल नसाहीं।। करतल होहिं पदारथ चारी। तेइ सिय राम कहेउ कामारी।।_अर्थ_जिनका नाम लेते ही जगत् में सारे अमंगलों की जड़ कट जाती है और चारों पदारथ ( अर्थ,धर्म,काम और मोक्ष ) मुट्ठी में आ जाते हैं, ये वही ( जगत् के माता_पिता ) श्री सीतारामजी हैं; काम के शत्रु शिवजी ने ऐसा कहा।





एहि बिधि संभु सुरन्ह समुझावा। पुनि आगें बर बसह चलावा।। देवन्ह देखे दसरथु जाता। महामोद मन पुलकित गाता।।_अर्थ_ इस प्रकार शिवजी ने देवताओं को समझाया और फिर अपने श्रेष्ठ बैल नन्दीश्वर को आगे बढ़ाया। देवताओं ने देखा कि दशरथजी मन में मन में बड़े ही प्रसन्न और शरीर से पुलकित हुए चले जा रहे हैं।





साधु समाज संग महिदेवा। जनु तनु धरे करहिं सुख सेवा।। सोहत साथ सुभग सुत चारी। जनु अपबरग सकल तनु धारी।।_अर्थ_उनके साथ [ परम हर्षयुक्त ] साधुओं और ब्राह्मणों की मण्डली ऐसी शोभा दे रही है, मानो समस्त सुख शरीर धारण कर उनकी सेवा कर रहे हों। चारों सुन्दर पुत्र साथ में ऐसे सुशोभित हैं, मानो संपूर्ण मोक्ष ( सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सायुज्य ) शरीर धारण किये हुए हों।





मरकत कनक बरन बर जोरी। देखि सुरन्ह भै प्रीति न थोरी।। पुनि रामहिं बिलोकि हियँ हरषे। नृपहिं सराहि सुमन तिन्ह बरसे।।_ अर्थ_मरकतमणि और सुवर्ण के रंग की सुन्दर जोड़ियों को देखकर देवताओं को कम प्रीति नहीं हुई ( अर्थात् बहुत ही प्रीति हुई ) । फिर श्रीरामराचन्द्रजी को देखकर वे हृदय में ( अत्यन्त ) हर्षित हुए और राजा की सराहना करके उन्होंने फूल बरसाये।





राम रूपु नख सिख सुभग बारहिं बार निहारि। पुलक गात लोचन सजल उमा समेत पुरारि।।_अर्थ_नख से शिखा तक श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर रूप को बार बार देखते हुए पार्वतीजी सहित श्री शिवजी  का शरीर पुलकित हो गया और उनके नेत्र [ प्रेमाश्रुओं के ] जल से भर गये।





केकि कंठ दुति स्यामल अंगा। तड़ित बिनिंदक बसन सुरंगा।। ब्याह बिभूषन बिबिध बनाए। मंगल सब सब भाँति सुहाए।।_अर्थ_रामजी के मोर के कण्ठ की_सी कांतिवाला [ हरिताभ ] श्याम शरीर है। बिजली का अत्यन्त निरादर करनेवाले प्रकाशमय सुन्दर [ पीत ] रंग के वस्त्र हैं। सब मंगलरूप और सब प्रकार से सुन्दर भाँति_भाँति के विवाह के आभूषण शरीर पर सजाये हुए हैं।





सरद बिमल बिधु बदनु सुहावन। नयन नवल राजीव लजावन।। सकल अलौकिक सुन्दरताई। कहि न जाइ मनहिं मन भाई।।_अर्थ_उनका सुन्दर मुख शरत्पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान और [ मनोहर ] नेत्र नवीन कमल को लजानेवाले हैं। सारी सुन्दरता अलौकिक है। ( माया की बनी नहीं है, दिव्य सच्चिदानन्दमयी है ) वह कहि नहीं जा सकती, मन_ही_मन बहुत प्रिय लगती है।





बंधु मनोहर सोहहिं संगा। जात नचावत चपल तुरंगा।। राजकुअँर बर बाजि देखावहिं। बंस प्रसंसक बिरिद सुनावहिं।।_अर्थ_साथ में मनोहर भाई शोभित हैं, जो चंचल घोड़ों को नचाते हुए चले जा रहे हैं। राजकुमार श्रेष्ठ घोड़ों को ( उनकी चालको ) दिखला रहे हैं और वंश की प्रशंसा करनेवाले ( मागध_भाट ) विरुदावली सुना रहे हैं।





जेहि तुरंग पर राम बिराजे । गति बिलोकि खगनायकु लाजे।। कहि न जाइ सब भाँति सुहावा। बाजि बेषु जनु काम बनावा।।_अर्थ_जिस घोड़े पर श्रीरामजी विराजमान हैं, उसकी [ तेज ] चाल देखकर गरुड़ भी लजा जाते हैं। उसका वर्णन नहीं हो सकता, वह सब प्रकार सुन्दर है। मानो कामदेव ने ही घोड़े का वेष धारण कर लिया हो।






जनु बाजि बेषु बनाइ मनसिजु राम हित अति सोहई। आपनें बय बल रूप गुन गति सकल भुवन बिमोहई।। जगमगत जीनु जराव जोति सुमोति मनि मानिक लगे। किंकिनि ललाम लगामु ललित बिलोकि सुर नर मुनि ठगे।।_अर्थ_मानो श्रीराचन्द्रजी के लिये कामदेव घोड़े का वेष बनाकर अत्यन्त शोभित हो रहा है। वह अपनी अवस्था, बल, रूप, गुण और चाल से समस्त लोकों को मोहित कर रहा है। सुन्दर मोती, मणि और माण्क्य लगी हुई जड़ाऊ जीन ज्योति से जगमगा रहा। उसकी सुन्दर घुँघरू लगी ललित लगाम को देखकर देवता, मनुष्य और मुनि सभी ठगे जाते हैं।





प्रभु मनसहिं लयनीन मनु चलत बाजि छबि पाव। भूषित उड़गण तड़ित घनु जनु बर बरहिं नचाव।।_अर्थ_प्रभु की इच्छा में अपने मन को लीन किये चलता हुआ वह घोड़ा बड़ी शोभा पा रहा है। मानो तारागण तथा बिजली से अलंकृत मेघ सुन्दर मोर को नचा रहा हो।





जेहि बर बाजि राम असवारा। तेहि सारदउ न बरनै पारा।। संकरु राम रूप अनुरागे। नयन पंचदस अति प्रिय लागे।।_अर्थ_जिस श्रेष्ठ घोड़े पर श्रीरामचन्द्रजी सवार हैं उसका वर्णन सरस्वतीजी भी नहीं कर सकतीं। शंकरजी श्रीरामचन्द्रजी के रूप में ऐसे अनुरक्त हुए कि कि उन्हें अपने पंद्रह नेत्र इस समय बहुत ही प्यारे लगने लगे।





हरि हित सहित रामु जब जोहे। रमा समेत रमापति मोहे।। निरखि राम छबि बिधि हरषाने। आठइ नयन जानि पछिताने।।_अर्थ_भगवान् विष्णु ने जब प्रेमसहित श्रीराम को देखा, तब वे  [ रमणीयता की मूर्ति ] श्रीलक्ष्मीजी के पति श्रीलतक्ष्मीजीसहित मोहित हो गये। श्रीरामचन्द्रजी की शोभा देखकर ब्रह्माजी बड़े प्रसन्न हुए, पर अपने आठ ही नेत्र जानकर पछताने लगे।





सुर सेनप उर बहुत उछाहू। बिधि ते डेवढ़ लोचन लाहू।। रामहिं चितव सुरेस सुजाना। गौतमु श्रापु परम हित माना।_अर्थ_देवताओं के सेनापति स्वामी कार्तिकेय के हृदय में बड़ा उत्साह है, क्योंकि वे ब्रह्माजी से ड्योढ़े अर्थात् बारह नेत्रों से रामदर्शन का सुन्दर लाभ उठा रहे हैं। सुजान इन्द्र [ अपने हजार नेत्रों से ] श्रीरामचन्द्रजी को देख रहे हैं और गौतमजी के शाप को अपने लिये परम हितकर मान रहे हैं।





देव सकल सुरपतिहि सिहाहीं। आजु पुरंदर सम कोउ नाहीं।। मुदित देवगन रामहिं देखी। नृपसमाज दुहुँ हरषु बिसेषी।।_अर्थ_सभी देवता देवराज इन्द्र से ईर्ष्या कर रहे हैं [ और कह रहे हैं ]  कि आज इन्द्र के समान भाग्यवान्  दूसरा कोई नहीं है। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर देवगण प्रसन्न हैं और दोनों राजाओं के समाज में विशेष हर्ष छा रहा है।





अति हरषु राजसमाज दुहु दिसि दुंदुभि बाजहिं घनी। बरषहिं सुमन सुर हरषि कहि जय जयति जय रघुकुलमनि।। एहि भाँति जानि बरात आवत बाजने बहु बाजहीं। रानी सुआसिनि बोलि परिछनि हेतु मंगल साजहीं।।_अर्थ_दोनों ओर से  राजसमाज में अत्यंत हर्ष है और बड़े जोर से नगाड़े बज रहे हैं। देवता प्रसन्न होकर ‘रघुकुलमणि श्रीराम की जय हो,जय हो, जय हो’ कहकर फूल बरसा रहे हैं। इस प्रकार बरात को आती हुई जानकर बहुत प्रकार के बाजे बजने लगे और रानी सुहागिन स्त्रियों को बुलाकर परछन के लिये मंगलद्रव्य सजाने लगीं।





सजि आरति अनेक बिधि मंगल सकल सँवारि। चलि मुदित परिछनि करन गजगामिनि बर नारि।।_अर्थ_अनेक प्रकार से आरती सजाकर और समस्त मंगलद्रव्यों को यथायोग्य सजाकर गजगामिनि ( हाथी_की सी चालवाली ) उत्तम स्त्रियाँ आनन्दपूर्वक परछन के लिये चलीं।
बिधुबदनीं सब सब मृगलोचनि। सब निज तन छबि रति मदु मोचनि।। पहिरे बरन बरन बर चीरा। सकल बिभूषन सजें सरीरा।।_अर्थ_सभी स्त्रियाँ चन्द्रमुखी ( चन्द्रमा के समान मुखवाली ) और सभी मृगलोचनी ( हरिण के समान आँखोंवाली ) हैं और सभी अपने शरीर की शोभा से रति के गर्व को चूर करनेवाली हैं। रंग रंग की सुन्दर साड़ियाँ पहने हैं और शरीर पर सब आभूषण सजे हुए हैं।





सकल सुमंगल अंग बनाएँ। करहिं गान कलकंठि लजाएँ।। कंकन किंकिनि नूपुर बाजहिं। चालि बिलोकि काम गज लाजहिं।।_अर्थ_समस्त अंगों को सुंदर मंगल पदार्थों से सजाये हुए वे कोयल को भी लजाती हुई [ मधुर स्वर से ] गान कर रही हैं। कंगन, करधनी और नूपुर बज रहे हैं। स्त्रियों के चाल देखकर कामदेव के हाथी भी लजा जाते हैं।





बाजहिं बाजने बिबिध प्रकारा। नभ अरु नगर सुमंगलचारा।। सची सारदा रमा भवानी। जे सुरतिय सुचि सहज भवानी।।_अर्थ_अनेक प्रकार के बाजे बज रहे हैं, आकाश और नगर दोनों स्थानों में सुन्दर मंगलाचार हो रहे हैं। शची (इन्द्राणी ), सरस्वती, लक्ष्मी, पार्वती और जो स्वभाव से ही पवित्र और सयानी देवांगनाएँ थीं,





कपट नारि बर बेष बनाई। मिलि सकल रनिवासन्ह जाई।। करहिं गान कल मंगलबानीं। हरष बिबस सम काहु न जानी।।_अर्थ_वे सब कपट से सुन्दर स्त्री का वेष बनाकर रनिवास में जा मिलीं और मनोहर वाणी से मंगलगान करने लगीं। सब कोई हर्ष के विशेष वश थे इसलिये उन्हें किसी ने पहचाना नहीं।






को जान केहि आनंद बस सब ब्रह्मु बर परिछन चली। कल गान मधुर निसान बरषहिं सुमन सुर सोभा भली।। आनंदकंदु बिलोकि दूलहु सकल हियँ हरषित भई। अंभोज अंबक अंबु उमगि सुअंग पुलकावलि छई।।_अर्थ_कौन किसे जाने_पहिचाने !  आनंद के बस हुई सब दूलह बने हुए ब्रह्म का परिछन करने चलीं। मनोहर गान हो रहा है। मधुर_मधुर नगाड़े बज रहे हैं, देवता फूल बरसा रहे हैं, बड़ी अच्छी शोभा है। आनन्दकन्द दूलह को देखकर सब स्त्रियाँ हृदय में हरषित हुईं। उनके कमल सरीखे नेत्रों में प्रेमाश्रुओं का जल उमड़ आया और सुन्दर अंगों में पुलकावली छा गयी।