Thursday, 9 January 2025

अयोध्याकाण्ड

कोल किरात भिल्ल बनवासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।। भरि भरि परन पूटीं रचि रूरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।।_अर्थ_कोल, किरात और भील आदि वन के रहनेवाले लोग पवित्र, सुंदर और अमृत के समान स्वादिष्ट मधु ( शहद ) को सुंदर दोने बनाकर और उनमें भर_भरकर कंद_मूल, फल और अंकुर आदि की चूड़ियों आंटियों _को।

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानता साधु पेम पहिचानी।। तुम्ह सुकृति हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।_अर्थ_सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजों के अलग_अलग स्वाद, भेद ( प्रकार), गुण और नाम बता_बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम दूतए हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा लेने में श्रीरामजी की दुहाई देते हैं।

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानता साधु पेम पहिचानी।। तुम्ह सुकृति हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।_अर्थ_प्रेम में मग्न हुए वे कोमल वाणी से कहते हैं कि साधु लोग प्रेम को पहचानकर उसका सम्मान करते हैं ( अर्थात्, आप साधु हैं, आप हमारे प्रेम को देखिये, दाम देकर या वस्तुएं लौटाकर हमारे प्रेम का तिरस्कार न कीजिये )। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं। श्रीरामजी की कृपा से ही हमने आपलोगों के दर्शन पाये हैं।

हमहिं अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरना देवधुनि धारा।। राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रभु चहइअ जस राजा।।_अर्थ_हमलोगों को आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमि के लिये गंगाजी की धारा दुर्लभ है। ( देखिये, ) कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने निषाद पर जैसी कृपा की है। जैसा राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजा को भी होना चाहिए।

यह जियं जानि संकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु। हमहिं कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।_अर्थ_हृदय में ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करने के लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये।

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।। देब काह हम तुम्हहिं गोसाईं। ईंधनु पात किरात मिताई।।_अर्थ_आप प्रिय पाहुने वन में पधारे हैं। आपकी सेवा करने के योग्य हमारे भाग्य नहीं है। हे स्वामी ! हम आपको क्या देंगे ? भीलों की मित्रता तो बस, ईंधन ( लकड़ी ) और पत्तों तक ही है।

यह हमारी अति बड़ि सेवकाईं। लेहिं न बासन बसन चोराई।। हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाति।_अर्थ_हमारी तो यही बहुत भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन चुरा लेते। हमलोग जड़ जीव हैं, जीवों को हिंसा करनेवाले हैं, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं।

पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं।। सपनेहुं धरमबुद्वि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाउ।।_अर्थ_हमारे दिन रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारे कमरे में कपड़ा है और न पेट ही भरते हैं हममें स्वप्न में भी धरमबुद्वि कैसी ? यह सब तो श्रीरघुनाथजी के दर्शन का प्रभाव है।

जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।। बचन सुनि पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।_अर्थ_जब से प्रभु के चरणकमल देखे, तबसे हमारे दु:सह दु:ख और दोषों मिट गये। वनवासियों के वचन सुनकर अयोध्या के लोग प्रेम में भर गये और उनके भाग्य की सराहना करने लगे।

लागे सराहन भाग सब अनुराग सुनावहीं। बोलनि मिलनि सीय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं।। नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा।।_अर्थ_सब उनके भाग्य की सराहना करने लगे और प्रेम के वचन सुनाने लगे। उन लोगों के बोलने और मिलने का ढंग तथा श्रीसीतारामजी के चरणों में उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल_भीलों की बातें सुनकर सभी नर_नारी अपने प्रेम का निरादर करते हैं ( उसे धिक्कार देते हैं )। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी की कृपा है कि लोहा नौका को अपने ऊपर लेकर तैर गया।


बिसारहि बन चहुं ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए  पीन पावस प्रथम।।_अर्थ_सब लोग दिनों-दिन परम आनन्दित होते हुए वन में चारों ओर विचरते हैं। जैसे पहली वर्षा के जल से मेढ़क और मोर मोटे हो जाते हैं ( प्रसन्न होकर नाचते_कूदते हैं ) ।

पुरजन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं कल्प सम बीती।। सिय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करि सरिस सेवकाई।।_अर्थ_अयोध्यापुरी के पुरुष और स्त्री सभी प्रेम में अत्यन्त मगन हो रहे हैं। उनके दिन पल के समान बीत जाते हैं। जितनी सासुओं थीं, उतने ही वेष ( रूप ) बनाकर सीताजी सब सासुओं की आदरपूर्वक एक_सी सेवा करती है।

लखा न मरमु राम बिनु काहूं। माया सब सिय माया माहूं।। सीयं सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह रहा सुख सिख आसिफ दीन्हीं।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के सिवा इस भेद को और किसी ने नहीं जाना। सब माताएं ( पराशक्ति महामाया ) श्रीसीताजी की माया में ही है। सीताजी ने सासुओं को सेवा से वश में कर लिया। उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीर्वाद दिये।

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानी पछितानी अघाई।। अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।_अर्थ_सीताजी समेत दोनो भाईयों ( श्रीराम _लक्ष्मण )_का सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछताई ‌। वह पृथ्वी तथा यमराज से याचना करती है कि, धरती बीच ( फटकर समा जाने के लिये रास्ता ) नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता।

लोकहुं बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख जलु नरक न लहहीं।। यहु हंसी सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।_अर्थ_ लोक और वेद में प्रसिद्ध है और कवि ( ज्ञानी ) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजी से बिमुख हैं इन्हें नरक में भी ठौर नहीं मिलती। सबके मन में यह संदेह हो रहा था कि हे विधाता ! श्रीरामचन्द्रजी का अयोध्या जाना होगा या नहीं ।

Wednesday, 25 December 2024

अयोध्याकाण्ड

सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस रही मन मागी।। गुरुपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।।_अर्थ_सीताजी आकर मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी के चरणों लगीं और उन्होंने मनमांगी उचित आशीष पायीं। फिर मुनियों की स्त्रियों सहित गुरुपत्नी अरुंधतिजी से मिलीं। उनका जितना प्रेम था, वह कहा नहीं जाता।

बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।। सासु सकल जब सीयं निहारीं। मूंदे नयन सहमि सुकुमारी।।_अर्थ_सीताजी ने सभी के चरणों को अलग_अलग वन्दना करके अपने हृदय को प्रिय ( अनुकूल ) लगनेवाले आशीर्वाद पाये। जब सुकुमारी सीताजी ने सब सासुओं को देखा, तब उन्होंने सहमकर अपनी आंखें बन्द कर लीं।

परीं बधिक बस मनहुं मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचाली।। तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सब सहिअ जो दैव सहावा।।_अर्थ_( सासुओं की बुरी दशा देखकर ) उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो राजहंसिनियां बधिक के वश में पड़ गयी हों। ( मन में सोचने लगीं कि ) कुचाली विधाता ने क्या कर डाला ? उन्होंने भी सीताजी को देखकर बड़ा दु:ख पाया। ( सोचा ) जो कुछ दैव सहावें, वो सब सहना ही पड़ता है।

जनक सुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा‌। मिलि सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुणा महि छाई।।_अर्थ_ तब जानकी जी हृदय में धीरज धरकर, नील कमल समान नेत्रों में जल भरकर, सब सासुओं से जाकर मिलीं। उस समय पृथ्वी कर करुणा ( करुण_रस ) छा गयी।

लागी लागी पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग। हृदय असीसहिं पेम बस रहइअहउ भरी सोहाग।_अर्थ_ सीताजी सबके पैरों लग_लगकर प्रेम से मिले रही हैं, और सब सासुओं प्रेमवश हृदय से आशीर्वाद दे रही हैं कि तुम सुहाग से भरी रहो ( सदा सौभाग्यवती रहो ) ।

बिकल सनेह सीय सब रानीं। बैठन सबहिं कहेउ गुर ग्यानीं।। कहि जग मायिक मुनिनाथा। कहे कछउक परमार्थ गाथा।।_अर्थ_ सीताजी और सब रानियां स्नेह के मारे व्याकुल हैं। तब ग्यानी गुरु ने सबको बैठ जाने के लिये कहा। फिर मुनिनाथ बसिष्ठजी ने जगत् की गति को मायिक कहकर ( अर्थात् जगत् माया का है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर ) कुछ परमार्थ की कथाएं ( बातें ) कहीं।

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह  दुखु पावा।। मरन हेतु निज नेहरु बिचारी। भए अति बिकल धीर धुर धारी।।_अर्थ_तदनन्तर वशिष्ठजी ने राजा दशरथ जी के स्वर्ग गमन की बात सुनायी, जिसे सुनकर रघुनाथजी ने दु:सह दु:ख पाया।  और अपने प्रति उनके स्नेह को उनके मरने का कारण विचारकर धईरधउरन्धर श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त व्याकुल हो गये।

कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीता सब रानी।। सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहु राजु अकाजेउ राजू।।_अर्थ_ वज्र के समान कड़वी बाणी सुनकर लक्ष्मणजी, सीताजी और सब रानियां विलाप करने लगीं। सारा समाज शोक से अत्यंत व्याकुल हो गया। मानो राजा आज ही मरे हों।

मुनिबर बहुरि राम समझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।। ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहुं कहे जल काहु न लीन्हा।।_अर्थ_फिर मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी ने श्रीराम को समझाया। तब उन्होंने समाजसहित श्रेष्ठ मन्दाकिनीजी में स्नान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने निर्जल व्रत किया। मुनि वशिष्ठजी के कहने पर भी किसी ने जल ग्रहण नहीं किया।

भोरु भएं रघुनंदनहिं जो मुनि आयसु दीन्ह। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सब सादरु कीन्ह।।_अर्थ_दूसरे दिन सवेरा होने पर मुनि वशिष्ठजी ने श्रीरघुनाथजी को जो_जो आज्ञा दी वह सब कार्य प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने श्रद्धा_भक्तिसहित आदर के साथ किया।

करि पितु क्रिया बेद जिस बरनी। भए पुनीत पातक तम तरनी।। जासु नाम पावक अघ तूला।_अर्थ_वेदों में जैसा कहा गया है, उसी के अनुसार पिता की क्रिया करके, पापरुपी अन्धकार के नष्ट करनेवाले शुद्धरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए ! जिनका नाम पापरुपी रूई के ( तुरंत जला डालने के ) लिये अग्नि है; और जिनका स्मरण मात्र समस्त शुभ मंगलों का मूल है।

सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।। सुद्ध भए दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।।_अर्थ_वे ( नित्य शुद्ध_बुध ) भगवान् श्रीरामजी शुद्ध हुए। साधुओं की ऐसी सम्मति है कि उनका शुद्ध होना वैसे ही है जैसा तीर्थों के आवाह्न से गंगाजी शुद्ध होती हैं। ( गंगाजी तो स्वभाव से ही शुद्ध हैं, उनमें जिन तीर्थों का आवाहन किया जाता है उल्टे वे ही गंगाजी के संपर्क में आने से शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार सच्चिदानन्द रूप श्रीराम तो नित्य शुद्ध हैं, उनके संपर्क से कर्म ही शुद।ध हो गये।) जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गये तब श्रीरामचन्द्रजी प्रीति के साथ गुजजी से बोले_)

नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।। सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।।_अर्थ_हे नाथ ! सब लोग यहां अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। कन्द, मूल, फल और जल का ही आहार करते हैं। भाई भरत  को, मंत्रियों को और सब माताओं को देखकर मुझे एक_एक पल युग के समान बीत रहा है।

सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु यहां अमरावती राऊ।। बहुत कहुं सब किअउं ढ़िठाई।
उचित होइ तस करिअ गोसाईं।।_अर्थ_अत:सबके साथ आप अयोध्यावासी को पधारिये ( लौट जाइये )। आप यहां हैं और राजा  अमरावती ( स्वर्ग)_मे़ हैं ( अयोध्यापुरी सूनी है) ! मैंने बहुत कह डाला, यह सब बड़ी ढ़िठाई की है। है गोसाईं ! जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये।

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम। लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुं विश्राम।।_अर्थ_( वशिष्ठजी ने कहा_) हे राम ! तुम धर्म के सेतु और दया के धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो ? लोग दु:खी हैं। दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें।

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुं बिकल जहाजू।। सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुं मारुत अनुकूला।।_अर्थ_श्रीरामजी के वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया। मानो बीच समुद्र में जहाज डगमगा गया हो। परन्तु जब उन्होंने गुरु वशिष्ठजी की श्रेष्ठ कल्याणमूलक वाणी सुनी तो उस जहाज के लिये मानो हवा अनुकूल हो गयी हो।

पावन पयं तिहुं काल नहाहीं।  जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं।। मंगल मूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हर्षित दण्डित करि करि।।_अर्थ_सब लोग पवित्र पयस्वनि नदी में ( अथवा पयस्वनि नदी के पवित्र जल में ) तीनों समय ( सबेरे, दोपहर और सायंकाल ) स्नान करते हैं, जिसके दर्शन से ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और मंगलमूर्ति श्रीरामचन्द्रजी को दण्डवत् प्रणाम कर_करके उन्हें नेत्र भर_भरकर देखते हैं।

राम सैल बन देखने जाहीं। जहं सुख सकल सकल दुख नाहीं।। झरना झरहिं सउधआसम बारी। त्रिबिधि तापहर त्रिबिधि बयारी।।_अर्थ_ सब श्रीरामचन्द्रजी के पर्वत ( कामदगिरि ) और वन को देखने जाते हैं, जहां सभी सुख हैं और सभी दु:खों का अभाव है। झरने अमृत के समान जल झरते हैं और तीन प्रकार की ( शीतल, मंद, सुगंध ) हवा तीनों प्रकार के ( आध्यात्मिक, अधिभौतिक, आधिदैविक ) तापों को हर लेती है।

बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहुत भांति।। सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।_अर्थ_असंख्य जाति के वृक्ष, लताएं और तृण हैं, तथा बहुत तरह के फल, फूल और पत्ते हैं। सुन्दर शिलाएं हैं। वृक्षों की छाया सुख देनेवाली है। वन की शोभा किस्से वर्णन की जा सकती है ? सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजित भृंग। बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहु रंग।।_अर्थ_तालाबों में कमल खिल रहे हैं, जल के पक्षी कूजत रहे हैं, भौंरे गुंजार कर रहे हैं और बहुत रंगों के पक्षी और पशु वन में वऐररहइत होकर विहार कर रहे हैं।


Tuesday, 3 December 2024

अयोध्याकाण्ड

मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम। भूरि भायं भेंटे भरत लछिमन करत प्रणाम।।_अर्थ_फिर श्रीरामजी प्रेम के साथ शत्रुध्न से मिलकर तब केवट ( निषादराज) से मिले। प्रणाम करते हुए लक्ष्मणजी से भरतजी बड़े प्रेम से मिले।

भेंटेउ भरत ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई‌‌।_अर्थ_ तब लक्ष्मणजी ललककर ( बड़ी उमंग के साथ ) छोटे भाई शत्रुध्न से मिले। फिर उन्होंने निषादराज को हृदय से लगा लिया। फिर भरत_शत्रुध्न दोनों भाइयों ने ( उपस्थित) मुनियों को प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए।

सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।। पुनि पुनि करत प्रनामु उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।।_अर्थ_छोटे भाई शत्रुध्न सहित भरतजी प्रेम में उमंगकर सीताजी के चरणकमलों की रज सिर पर धारण कर बार_बार प्रणाम करने लगे। सीताजी ने उन्हें उठाकर उनके सिर को अपने करकमल से स्पर्श 
कर ( सिर पर हाथ फेरकर ) उन दोनों को बैठाया

सीयं असीस दीन्ह मन माहीं। मगन सनेहं देह सुधि नाहीं।। सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।।_अर्थ_सीताजी ने मन_ही_मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्नेह में मग्न हैं, उन्हें देह की सुध_बुध नहीं है। सीताजी को सब प्रकार से अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोचरहित हो गये और उनके मन का कल्पित भय जाता रहा।

कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूंछा। प्रेम भरा मन निज गति छूंछा।।तेहि अवसर केवटु धीरज धरि। जोरी पानि बिनवत प्रनामु करि।।_अर्थ_उस समय न तो कोई कुछ कहता है और न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेम से परिपूर्ण है, वह अपनी गति से खाली है ( अथवा संकल्प_विकल्प और चआंचल्य से शून्य है )। उस अवसर पर केवट ( निषादराज ) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा_

नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग। सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।_अर्थ_हे नाथ ! मुनिनाथ वशिष्ठ जी के साथ सब माताएं, नगरवासी, सेवक, सेनापति, मंत्री_आपके वियोग से व्याकुल होकर आये हैं।

सील सिंधु सुनि गुर आगवनू । सिय समीप राखे रिपुदवनू।। चले सवेग राम तेहि काला। धीर धर्म धुर दीनदयाला।।_अर्थ_ गुरु का आगमन सुनकर 
सील सिंधु श्रीरामचन्द्रजी ने सीता के पास शत्रुध्न को रख दिया और वे परम वीर, धर्मधुरंधर दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजी उसी समय वेग के साथ चल पड़े।

गुरहिं देखि सादर अनुरागे। दंड प्रणाम करने प्रभु लागे।। मुनिबर धाई लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।।_अर्थ_ गुरुजी के दर्शन करके लकक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी प्रेम में भर गये और दण्डवत् प्रणाम करने लगे। मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी ने दौड़कर उन्हें हृदय से लगा लिया और प्रेम में उमंगकर वे दोनों भाइयों से मिले।

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरी तें दण्ड प्रनामू।। रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुफ्त सनेह समेटा।।_अर्थ_फिर प्रेम से पुलकित होकर केवट ( निषादराज )_ने अपना नाम लेकर दूर से ही वशिष्ठजी को दण्ड प्रणाम किया। ऋषि वशिष्ठजी ने रामसखा जानकर उसको जबरदस्ती हृदय से लगा लिया। मानो जमीन पर लोटते हुए प्रेम को समेट लिया हो।

रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।। एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं । बड़ बसइष्ठ सम को जग माहीं।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी की भक्ति सुन्दर मंगलों का मूल है, इस प्रकार कहकर सराहना करते हुए देवता आकाश से फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे_जगत् में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वशिष्ठजी के समान बड़ा कौन है ?


जेहिं लखि लखनहुं तें अधिक मिले मुदित मुनाराउ। सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।_अर्थ_जिस_( निषाद ) को देखकर मुनिराज वशिष्ठजी लक्ष्मणजी से भी अधिक उससे आनन्दित होकर मिले। यह सब सीतापति श्रीरामचन्द्रजी के भजन का प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव है।

आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।। जो जेहिं भायं रहा अभिलाषी। तेहि तेहि को तसि तसि रुख राखी।।_अर्थ_ दया की खान, सुजान भगवान् श्रीरामजी ने सब लोगों को दु:खी ( मिलने के लिये व्याकुल ) जाना। तब जो जिस भाव से मिलने का अभिलाषी था, उस उस का उस उस प्रकार से रुख रखते हुए ( उसकी रुचि के अनुसार )

सानुज मिलि पल महुं सब काहू। कीन्ह दूरि दुख दारुने दाहू।। यह बड़ि बात राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।।_अर्थ_उन्होंने लक्ष्मणजी सहित पलभर में सब किसी से मिलकर उनके दु:ख और कठिन संताप को दूर कर दिया। श्रीरामचन्द्रजी के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है। जैसे करोड़ों घड़ों में एक ही सूर्य की ( पृथक्_पृथक् ) छाया ( प्रतिबिम्ब ) एक साथ ही दिखती है।

मिलि केवटहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।। देखीं राम दुखित महतारी। जनु सुबेलि अवलि हिम माहीं।।_अर्थ_समस्त पुरवासी प्रेम में उमंगकर केवट से मिलकर ( उसके भाग्य )की सराहना करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने सब माताओं को दु:खी देखा। मानो सुंदर लताओं की पंक्तियों को पाला मार गया हो।

प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायं भगति मति भेईं।। पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल कर्मी बिधि सिर धरि जोरी।।_अर्थ_ सबसे पहले रामजी कैकेयी से मिले और अपने सरल स्वभाव तथा भक्ति से उसकी बुद्धि को तर कर दिया। फिर चरणों में गिरकर काल, कर्म और विधाता के सिर दोष मढ़कर, श्रीरामजी ने उनको शान्त्वना दी।

भेंटी रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु। अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।_अर्थ_फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओं से मिले। उन्होंने सबको समझा_बुझाकर संतोष कराया कि हे माता ! जगत् ईश्वर के अधीन है। किसी को भी दोष नहीं देना चाहिए।

गुर तिय पद बंदे दुहु भाईं। सहित बिप्रतिय जे संग आईं।। गंग गौरी सम सब सनमानीं। देहिं असीसा मुदित मृदु बानी।।_अर्थ_फिर दोनों भाइयों ने ब्राह्मण की स्त्रियों के सहित_जो भरतजी के साथ आयीं थीं, गुरुजी की पत्नी अरुंधति के चरणों की वन्दना की और उन सबका गंगाजी तथा गौरीजी के समान सम्मान किया। वे सब आनंदित होकर कोमल वाणी से आशीर्वाद देने लगीं।


गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेंटी संपति अति रंका।। पुनि जननी चरननइ दोउ भ्राता। परे पेम व्याकुल सब गाता।।_अर्थ_तब दोनों भाई पैर पकड़कर सुमित्राजी की गोद में जा चिपटे। मानो किसी अत्यंत दरिद्र से संपत्ति की भेंट हो गयी हो। फिर दोनों भाई माता कौसल्याजी के चरणों में गिर पड़े। प्रेम के मारे उनके सारे अंग शिथिल हैं।






Friday, 15 November 2024

अयोध्याकाण्ड

राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाई सुराजा।। सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।।_ अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी के निवास से वन की संपत्ति ऐसे सुशोभित है मानो अच्छे राजा को पाकर प्रजा सुखी हो। सुहावना वन ही पवित्र देश है। विवेक उसका राजा है और वैराग्य मंत्री हैं।

भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।। सकल अंग सम्पन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।_अर्थ_यम ( अहिंसा,, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ) तथा नियम ( शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान) योद्दा हैं। पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियां हैं। वह श्रेष्ठ राजा राज्य के सब अंगों से पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के आश्रित रहने से उसके चित्त में चाव ) आनन्द या उत्साह है।
( स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना _ राज्य के सात अंग हैं । )

जीति मोह महिपाल दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राजु पुरं सुख संपदा सुकालु।।_अर्थ_मोहरूपी राजा को सेनासहित जीतकर विवेक रूपी राजा निष्कंटक राज कर रहा है। उसके नगर में सुख, संपति और सुकाल वर्तमान हैं।

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउं गन खेरे।। बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।_अर्थ_ वनरूपई प्रान्तों में जो बहुत _से मुनियों के निवास_स्थान हैं वहीं मानो शहरों, नगरों, गांवों और खेड़ों का समूह है। बहुत _से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रथाओं का समाज है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बऋष साजि सराहा।। बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहं तहं मनहुं सेन चतुरंगा।।_अर्थ_ गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर,भैंस और बैलों को देखकर राजा के साज को सराहते ही बनता है। ये सब आपस का वैर छोड़कर जहां _तहां एक साथ विचरते हैं। यही मानो चतुरंगिणी सेना है।

झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुं निसान बिबिध बिधि बाजहिं।। चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।।_अर्थ_पानी के झरने झड़ रहे हैं और मत्त हाथी चिग्घाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहां अनेक प्रकार के नगाड़े बज रहे हैं। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलों के समूह और सुंदर हंस प्रसन्न मन से कूजत रहे हैं।

आलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहुं ओरा।। बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।_अर्थ_भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं और मोर नाच रहे हैं। मानो उस अच्छे राज्य में चारों ओर मंगल हो रहा है। बेल, वृक्ष, तृण सब फल और फूलों से युक्त हैं। सारा समाज आनंद और मंगल का मूल बन रहा है।

राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयं अति पेमु। तापस फल जनु पाई जिमि सुखी सिराने नेमु।।_अर्थ_श्रीरामजी के पर्वत की शोभा देखकर भरतजी के हृदय में अत्यंत प्रेम हुआ। जैसे तपस्वी नियम का समाप्ति होने पर तपस्या का फल पाकर खुश होता है।

तब केवट ऊंचे चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।। नाथ देखिअहिं बिटप बिहाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।।_अर्थ_ तब केवट दौड़कर ऊपर चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतजी से कहने लगा_हे नाथ ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमिल के विशाल वृक्ष दिखाई देते हैं,।

जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसार देखि मनु मोहा।। नील सघन पल्लव फल लाला। अबिरल छांह सुखद सब काला।।_अर्थ_जिन श्रेष्ठ वृक्षों के बीच में एक सुन्दर विशाल वट का वृक्ष सुशोभित है, जिसको देखकर सब मोहित हो जाता है, उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे हैं। उसकी घनी छाया सब ऋतुओं को सुख देनेवाली है।

मनहु तिमिर अरुनमय रासी। बिरचि बिधि संकेलि सुषमा सी।। ए तरु सरित समीप गोसाईं। रघुबर परनकुटी जहं छाई।।_अर्थ_मानो ब्रह्माजी ने परम शोभा को एकत्र करके अन्धकार और लालिमामयी राशि_सी रच दी है। हे गोसाईं ! ये वृक्ष नदी के समीप है जहां श्रीराम की पर्णकुटी छाई है।

तुलसी तरुवर बिबिध सुहाए। कहुं कहुं सियं कहुं लखन लगाए।। बट छायां वेदिका बनाई। सिय निज पानि सरोज सुहाई।।_अर्थ_वहां तुलसी जी के बहुत _से सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं, जो कहीं_कहीं सीताजी और कहीं लक्ष्मणजी ने लगाये हैं। इसी बड़ की छाया में सीताजी ने अपने कर कमलों से सुन्दर वेदी बनायी है।

जहां बैठि मुनिगण सहित नित सिय रामु सुजान। सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।_अर्थ_जहां सुजान श्रीसीतारामजी मुनियों के वृंद समेत बैठकर नित्य  शास्त्र, वेद और पुराणों के सब कथा इतिहास सुनते हैं।

सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगें भरत बिलोचन बारी।। करत प्रणाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।।_अर्थ_सखा के वचन सुनकर वृक्षों को देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ गया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेम का वर्णन करने में सरस्वती जी भी सकुचाती है।

हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहु पारसु पायउ रंका।। रज सिर धरि हियं नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी के चरण चिन्ह देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले।

देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।। सबहिं सनेह बिबस मग भूला। कहि सउपंथ सुर बरिसहिं फूला।।_अर्थ_भरतजी की अत्यन्त अनिवर्चनीय दशा देखकर वन के पशु, पक्षी और जड़ ( वृक्षादि ) जीव प्रेम में मग्न हो गये। प्रेम के विशेष वश होने से सखा निषादराज को भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे।

निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।। होता न भूतल भाई भरत को। अचरज सचर चर अचर करत को।।_अर्थ_भरत के प्रेम की इस स्थिति को देखकर सिद।ध और साधक लोग भी अनुराग से भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेम की प्रशंसा करने लगे कि इस पृथ्वीतल पर भरत का जन्म ( अथवा प्रेम ) न होता, तो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कौन करता ?

पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गंभीर। मति प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।_अर्थ_प्रेम अमृत है, बिरह मन्दरआचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने देवता और साधुओं के हित के लिये स्वयं ( इस भरत रूपी गहरे समुद्र को अपने विरहरूपी मन्दराचल से ) मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है।

सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।। भरत दीख प्रभु आश्रम पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।।_अर्थ _सखा निषादराज सहित इस मनोहर जोड़ी को इस सघन वन की आड़ के कारण ढनलक्ष्मणजी नहीं देख पाये। भरतजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के समस्त सुमंगला के धाम और सुन्दर पवित्र आश्रम को देखा।

करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।। देखें भरत लखन प्रभु आगे। पूछें बचन कहत अनुरागे।।_अर्थ_आश्रम में प्रवेश करते ही भरतजी का दु:ख और दाह ( जलन ) मिट गया, मानो जोगी को परमार्थ ( परम तत्व ) की प्राप्ति हो गयी। भरतजी ने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभु के आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं ( पूछी हुई बात का प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं )।

सीस जटा कटि मुनि पट बांधे। तूने कसें कर सर्च धनु कांधे।। बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राज्य रघुराजू।।_अर्थ_ सिर पर जटा है। कमर में मुनियों का ( वल्कल ) वस्त्र बांधें हैं और उसी में तरकस कसे हैं। हाथ में बाण तथा कंधे पर धनुष है। वेदी पर मुनि तथा साधुओं का समुदाय बैठा है और सीताजी सहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं।

बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनिवेष कीन्ह रति कामा।। कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि भरत हंसी हेरत।।_अर्थ_श्रीरामजी के वलकल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है। ( सीतारामजी ऐसे लगते हैं ) मानो रति और कामदेव ने मुनि का वेश धारण किया हो। श्रीरामजी अपने कर_कमलों से धनुष _बाण फेर रहे हैं, और हंसकर देखते ही जी का जलन हर लेते हैं ( अर्थात् जिसकी ओर भी एकबार हंसकर देख लेते हैं, उसी को परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है। )

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचन्दु। ग्यान
सभां जनु तनु धरें गति सच्चिदानंदु।।_अर्थ_सुन्दर मुनि मंडली के बीच में सीताजी और रघुकुलचंद श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञान की सभा में साक्षात् भक्ति और सच्चिदानंद शरीर धारण करके विराजमान हैं।

सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।। पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं।।_अर्थ_ छोटे भाई शत्रुध्न और सखा निषादराज समेत भरतजी का मन ( प्रेम में ) मग्न हो रहा है। हर्ष_शोक, सुख_दुख आदि सब भूल गये हैं। 'हे नाथ ! रक्षा कीजिये, हे गोसाईं ! रक्षा कीजिये, ऐसा कहकर वे पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिर पड़े।

बचन सप्रेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियं जाने।। बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।।_अर्थ_प्रेमभरे वचनों से लक्ष्मणजी ने पहचान लिया और मन में जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। ( वे श्रीरामजी की ओर मुंह किये हुए खड़े थे, भरतजी पीठ_पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं।) अब इस ओर तो भाई भरतजी का सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजी की सेवा की प्रबल परवशता।

मिलि न जाई नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।। रहे राखि सेवा पर भालू चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।_अर्थ_न तो ( क्षणभर के लिये भी सेवा से पृथक् होकर ) मिलते ही बनता है और न ( प्रेमवश ) छोड़ते ( उपेक्षा करते ) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजी के चित्त की इस गति ( दुविधा)_का वर्णन कर सकता है। वे सेवा पर भार रखकर रह गये ( सेवा को ही विशेष महत्वपूर्ण समझकर उसी में लगे रहे ) मानो चढ़ी हुई पतंग को खिलाड़ी ( पतंग उड़ानेवाला ) खींच रहा हो।

कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनामु करत रघुनाथा।। उठे राम सुनि प्रेम अधीरा। कहुं पट कहुं निषंग धनु तीरा।। लक्ष्मणजी ने प्रेम सहित पृथ्वी पर मस्तक नवाकर कहा_हे रघुनाथजी! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेम में अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण ।

बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान। भरत राम की मिलनि लखि बिसरू सबहिं अपान।।_अर्थ_ कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। भरतजी और श्रीरामजी के मिलने की रीति को देखकर सबको अपनी सुध भूल गयी।

मिलनि प्रीति किमी जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।। परम प्रेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अस्मिता बिसराई।।_अर्थ_ मिलन की प्रीति कैसे बखानी जाय ? वह तो कबिकुल के लिये कर्म, मन, वाणी तीनों से अगम है। दोनों भाई ( भरतजी और श्रीरामजी) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भुलाकर परम प्रेम से पूर्ण हो रहे हैं।

कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।। कबिहि अरथ आखर बलु सांचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।।_अर्थ_कहिये, उस श्रेष्ठ प्रेम को कौन प्रगट करें ? कवि की बुद्धि किसकी छाया का अनुसरण करें ? कवि को तो अक्षर और अर्थ का ही सच्चा बल है। नट ताल की गति के अनुसार ही नाचता है।

अगम सनेह भरत रघुबर को।  जहं न जाइ मनु बिधि हरि हर को।। सो मैं कुमति कहुं केहि भांती। बाज सुराग कि गांडर तांती।।_अर्थ_भरतजी और श्रीरघुनाथजी का प्रेम अगम्य है, जहां ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेम को मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूं ! भला गांडर की तांत से भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है ? ( तालाबों और झीलों में एक तरह की घास होती है, उसे गांडर कहते हैं।

मिलनि बिलोके भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।। समुझाए सुरगुरु जग जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।।_अर्थ_भरतजी और श्रीरामजी के मिलने का ढ़ंग देखकर देवता भयभीत हो गये, उनकी धुकधुकी धड़कने लगी। देवगुरु बृहस्पतिजी ने समझाया, तब कहीं वे मूर्ख चेते और फूल बरसाकर प्रशंसा करने लगे।

Thursday, 10 October 2024

अयोध्याकाण्ड

एतना कहत नीति रस भूला। रन रस बिटपु पुलक मिस भूला।। प्रभु पद बंदि सीस रज राखी। बोले सत्य सहज बलु भाषी।।_अर्थ_इतना कहते ही लक्ष्मणजी नीतिरस भूल गये और युद्धरसरूपी वृक्ष के बहाने से फूल उठा ( अर्थात् नीति की बात कहते_कहते उनके शरीर में वीर_रस छा गया )। वे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणों की वन्दना करके, चरण_रज को सिर पर रखकर सच्चा और स्वाभाविक बल कहते हुए बोले।

अनुचित नाथ न मानब मोरा। भरत हमहि उपचार न थोड़ा।। कहं लगि सहिअ रहिअ मनु मारें। नाथ साथ धनु हाथ हमारे।।_अर्थ_ हे नाथ ! मेरा कहना अनुचित न मानियेगा। भरत ने  हमें कम नहीं प्रचारा है ( हमारे साथ कम छेड़छाड़ नहीं की है )। आखिर कहां तक सहा जाय और मन मारे रहा जाय, जब स्वामि हमारे साथ हैं और धनुष हमारे हाथ में है।

छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुज जगु जान।
लातहुं मारे चढ़ति सिर नीच को धूरि समान।।_अर्थ_ क्षत्रिय जाति, रघुकुल में जन्म और फिर मैं रामजी ( आप )_का अनुगामी ( सेवक ) हूं, यह जगत् जानता है। ( फिर भला कैसे सहा जाय ? ) धूल के समान नीच कौन है, परन्तु वह भी लात मारकर सिर ही चढ़ती ।

उठि कर जोरी रजायसु मागा। मनहुं बीर रस सोवत जागा।। बांधि जटा सिर कसि कटि माथा।
साजि सरासनु सायक हाथा।।_अर्थ_ यों कहकर लक्ष्मणजी ने उठकर, हाथ जोड़कर आज्ञा मांगी। मानो वीररस सोते से जाग उठा हो। सिर पर जटा बांधकर कमर में तरकस कस लिया और धनुष को सजकर तथा बाण हाथ हाथ में लेकर कहा _।

आजु राम सेवक जसु लेऊं। भरतहिं समर सिखावन देऊं।। राम निरादर कर फल पाई। सोवहु समर सेज दोउ भाई।।_अर्थ_ आज मैं श्रीराम ( आप )_का सेवक होने का यश लूं और भरत को संग्राम में शिक्षा दूं। श्रीरामचन्द्रजी ( आप )_के निरादर का फल पाकर दोनों भाई ( भरत_शत्रुध्न ) रणशैय्या पर सोवें।

आइ बना भल सकल समाजू। प्रगट करउं रिस पाछिल आजू।। जिमि करि निकर दलइ मृगराजू
। लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू।।_अर्थ_अच्छा हुआ जो सारा समाज आकर एकत्र हो गया। आज मैं पिछला सब क्रोध प्रकट करूंगा। जैसे सिंह हाथियों के झुंड को कुचल डालता है और बाज जैसे लिए को लपेट में ले लेता है।

तैसेहिं भरतहिं सेन समेता। सानुज निद्रा निपातउं खेता।। जौं सहाय कर संकरु आई। तौं मारउं रन राम दोहाई।।_अर्थ_वैसे ही भरत को सेनासमेत और छोटे भाई सहित तिरस्कार करके मैदान में पछाड़ूंगा। यदि शंकरजी भी आकर उनकी सहायता करें, तो भी, मुझे रामजी की सौगन्ध है, मैं उन्हें युद्ध में ( अवश्य) मार डालूंगा ( छोड़ूंगा नहीं)।

अतिसरोष माखे लखनु लखि सुनि साथ प्रवान। सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान।।_अर्थ_ लक्ष्मणजी को अत्यन्त क्रोध से तमतमाया हुआ देखकर और उनकी प्रामाणिक ( सत्य ) सौगन्ध सुनकर सबलोग भयभीत हो जाते हैं और लोकपाल घबराकर भागना चाहते हैं।

जगु भय मगन गगन भइ बानी। लखन बाहुबलु बिपुल बखानी।। तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा। को कहा सका को जाननिहारा।_अर्थ_सारा जगत् भय में डूब गया। तब लक्ष्मणजी के अपार बाहुबल की प्रशंसा करती हुई आकाशवाणी हुई _ हे तात ! तुम्हारे प्रताप और प्रभाव को कौन कह सकता है और कौन जान सकता है ?

अनुचित उचित काजु किछु होऊ। समुझि करिअ भल कह सब कोऊ।। सहसा करि पाछे पछिताहीं। कहहिं बेद बुध तें बुध नाहीं।।_अर्थ_परन्तु कोई भी काम हो, उसे अनुचित, उचित खूब समझ_बूझकर किया जाय तो सब कोई अच्छा कहते हैं। वेद और विद्वान कहते हैं कि जो बिना बिचारे जल्दी में किसी काम को करके पीछे पछताते हैं, वे बुद्धिमान नहीं हैं।

सुनि सुर बचन लखन सकुचाने। राम सीयं सादर सनमाने।। कहीं तात तुम्ह नीति सुहाई। सब तें कठिन राजमदु भाई।।_अर्थ_ देववाणी सुनकर लक्ष्मणजी सकुचा गये। श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी ने उनका आदर के साथ सम्मान किया ( और कहा_ ) हे तात ! तुमने बड़ी सुन्दर नीति कही। हे भाई ! राज्य का मद सबसे कठिन मद है।

जौं न होत जग जनम भरत को। सकल धर्म धुर  धरनि धरत को।। कबि कुल अगम भरत गुन गाथा। को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा।।_अर्थ_यदि जगत् में भरत का जन्म न होता, तो पृथ्वी पर संपूर्ण धर्मों की धूरी कौन धारण करता ? हे रघुनाथजी ! कविकुल के लिये अगम ( उनकी कल्पना से अतीत ) भरतजी के गुणों की कथा आपके सिवा और कौन जान सकता है ?

लखन राम सिय सुनि सुर बानी। अति सुख लहेउ न जाइ बखानी।। कहां भरत सब सहित सहाए। मंदाकिनी पुनीत नहाए।।_अर्थ_लक्ष्मणजी, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी ने देवताओं की वाणी सुनकर अत्यंत सुख पाया, जो वर्णन नहीं किया जा सकता। यहां भरतजी ने सारे समाज के साथ मंदाकिनी में स्नान किया। 


सरित समीप राखि सब लोगा। मागि मातु गुर सचिव नियोगा।। चले भरत जहं सीय रघुराई। साथ निषादनाथु लघु भाई।।_ अर्थ_ फिर सबको नदी के समीप ठहराकर तथा माता, गुरु और मंत्री की आज्ञा मांगकर निषादराज और शत्रुघ्न को साथ लेकर भरतजी वहां ठहराये जहां श्रीसीताजी और रघुनाथजी थे।

समुझि मातु करतब सकुचाहीं। करत कुतरक कोटि मन माहीं।। राम लखन सिय सुनि मम नाऊं। उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊं।।_अर्थ_ भरतजी अपनी माता कैकेयी की करनी को समझकर ( याद करके ) सकुचाते हैं और मन में करोड़ों ( अनेकों ) कुतर्क करते हैं ( सोचते हैं _) श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी मेरा नाम सुनकर स्थान छोड़कर कहीं दूसरी जगह न उठकर चले जायं।

मातु मते महुं मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर। अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि अपनी ओर।।_अर्थ_ मुझे माता के मत में मानकर वे जो कुछ भी करें सो थोड़ा है, पर वे अपनी ओर समझकर ( अपने विरद और संबंध को देखकर) मेरे पापों और अवगुणों को क्षमा करके मेरा आदर ही करेंगे।

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी। जौं सनमानहिं सेवक मानी।। मोरें सरन रामहिं कि पनही। राम सुस्वामि दोसु सब जनहीं।।_अर्थ_चाहे मलिन मन जानकर मुझे त्याग दें, चाहे अपना सेवक मानकर मेरा सम्मान करें ( कुछ भी करें ); मेरे तो श्रीरामचन्द्रजी की जूतियां ही शरण हैं। श्रीरामचन्द्रजी तो अच्छे स्वामी हैं, दोष तो सब दास का ही है।

जग जस भाजन चातक मीना। नेम पेम निज निपुन नवीना।। अस मग गुनत चले मग जाता। सकुच सनेहु सिथिल सब गाता।।_अर्थ_ जगत् में यश के पात्र तो चातक और मछली ही हैं, जो अपने नेम और प्रेम को सदा नया बनाने में निपुण हैं। ऐसा मन में सोचते हुए भरतजी मार्ग में चले जाते हैं। उनके सब अंग प्रेम और संकोच से शिथिल हो रहे हैं।

फेरति मनहुं मातु कृत खोरी। चलत भगति बल धीरज धोरी।। जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ। तब पथ परत उताइल पाउ।।_अर्थ_माता की की हुई बुराई मानो उन्हें लौटाती है, पर धीरज की धूरी को धारण करनेवाले भरतजी भक्ति के बल से चले जाते हैं। जब श्रीरघुनाथजी के स्वभाव को समझते ( स्मरण करते ) हैं तब मार्ग में  उनके पैर जल्दी_जल्दी पड़ने लगते हैं।

भरत दसा तेहि अवसर कैसी। जल प्रबाहं जल अलि गति जैसी।। देखि भरत कर सोचु सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।_अर्थ_उस समय भरत की दशा कैसी है ? जैसी जल के प्रवाह जल के भौंरे की गति होती है। भरतजी का संकोच और प्रेम देखकर उस समय निषाद विदेह हो गया ( देह की सुध_बुध भूल गया )।

लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु। मिटिहि सोच होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु।।
_अर्थ_मंगल शकुन होने लगे। उन्हें सुनकर और विचारकर निषाद कहने लगा_सोच मिटेगा, हर्ष होगा, पर फिर अन्त में दु:ख होगा।

सेवक बचन सत्य सब जाने। आश्रम निकट जाइ निअराने।। भरत दीख बन सैल समाजू। मुदित छुधित जनु पाई सुनाजू।।_अर्थ_भरतजी ने सेवक ( गुह )_के सब वचन सत्य जाने और वे आश्रम के समीप जा पहुंचे। वहां के वन और पर्वतों के समूह को देखा तो भरतजी इतने आनंदित हुए मानो कोई भूखा अच्छा अन्न पा गया हो।

ईति भीति जनु प्रजा दुखारी। त्रिबिधि ताप पीड़ित ग्रह मारी।। जाइ सुराज सुदेस सुखारी होहिं भरत गति तेहि अनुहारी।।_अर्थ_जैसे ईति के भय से दुखी हुई तीनों ( अध्यात्मिक, आधिदैविक और अधिभौतिक ) तापो तथा क्रूर ग्रहों तथा क्रूर ग्रहों और महामारियों से पीड़ित प्रजा उत्तम देश और उत्तम राज्य में जाकर सुखी हो जाय, भरतजी की गति ( दशा ) ठीक उसी प्रकार की हो रही है।
( अधिक जल बरसना, न बरसना, चूहों का उत्पात, टिड्डियां, तोते और दूसरे राजा की चढ़ाई_खेतों में बाधा देनेवाले छः उपद्रवों को 'ईति' कहते हैं। )

Sunday, 15 September 2024

अयोध्याकाण्ड

तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ। राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ।।_अर्थ_ उस दिन वहीं ठहरकर दूसरे दिन प्रात:काल ही श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके चले। साथ के सब लोगों को भरतजी के समान ही श्रीरामजी के दर्शन की लालसा ( लगी हुई ) है।

मंगल सगुन होहिं सब काहू। फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू।। भरतहिं सहित समाज उछाहू। मिलिहहिं राम मिटइ दुख दाहू।।_अर्थ_सबको मंगवसूचक शकुन हो रहे हैं। सुख देनेवाले ( पुरुषों के दाहिने और स्त्रियों के बायें ) नेत्र और भुजाएं फड़क रही हैं। समाजसहित भरतजी को उत्साह हो रहा है कि श्रीरामचन्द्रजी मिलेंगे और दु:ख का दाह मिट जायगा।

करत मनोरथ जस जियं जाके। जाहिं सनेह सुरां सब छाके।। सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं। बि बल बचन पेम बस बोलहिं।।_अर्थ_जिसके जी में जैसा है, वह वैसा ही मनोरथ करता है। सब स्नेह रूपी मदिरा से छके ( प्रेम में मतवाले हुए) चले जा रहे हैं। अंग शिथिल हैं, रास्ते में पैर डगमगा रहे हैं और प्रेमवश विह्वल बचन बोल रहे हैं।

रामसखा तेहि समय देखावा। सैल सिरोमनि सहज सुहावा।। जासु समीप स्थित पर तीरा। सीय समेत बसहिं दोउ बीरा।।_अर्थ_रामसखा निषादराज ने उसी समय स्वाभाविक ही सुहावना पर्वत शिरोमणि कामदगिरि दिखलाया, जिसके निकट ही पयस्वनइ नदी के तट पर सीता समेत दोनों भाई निवास करते हैं।

देखि करहिं सब दंड प्रनामा। कहि जय जानकी जीवन रामा।। प्रेम मगन अस राजसमाजू।  जनु फिरि अवध चले रघुराजू।।_अर्थ_सबलोग उस पर्वत को देखकर ' जानकी_जीवन श्रीरामचन्द्रजी की जय हो।' ऐसा कहकर दण्डवत् प्रणाम करते हैं। राज-समाज प्रेम में ऐसा मग्न है मानो श्रीरघुनाथजी अयोध्या लौट चले हों।

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु। कबिहि अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु।।_अर्थ_भरतजी का उस समय जैसा प्रेम था, वैसा शेषजी भी नहीं कह सकते। कवि के लिये तो वह वैसा ही अगम है जैसा अहंता और ममता से मलिन मनुष्यों के लिये ब्रह्मानंद।

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें। गए कोस दुइ दिनकर ढ़रकें।। जलु जलु देखि बसे निसि  बीतें। कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें।।_अर्थ_सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम के मारे शिथिल होने के कारण सूर्यास्त होने तक ( दिनभरमें ) दो ही कोस चल पाये और जल_स्थल का सुपास देखकर रात को वहीं ( बिना खाये पाये ही ) रह गये। रात बीतने पर श्रीरघुनाथजी के प्रेमी भरतजी ने आगे गमन किया।

उहां राम रजनी अवसेषा। जागे सीयं सपन अस देखा।। सहित समाज भरत जनु आये। नाथ वियोग ताप तन ताए।।_अर्थ_उधर श्रीरामचन्द्रजी रात शेष रहते ही जागे। रात को सीताजी ने ऐसा स्वप्न देखा ( जिसे वे श्रीरामजी को सुनाने लगीं )  मानो समाजसहित भरतजी यहां आये हैं। प्रभु के वियोग की अग्नि से उनका शरीर संतप्त किया।

सकल मलिन मन दीन दुखारी। देखीं सासु आन अनुहारी।। सुनि सिय सपन भरे जल लोचन। भए सोचबस सोच बिमोचन।।_अर्थ_सभी लोग मन में उदास, दीन और दु:खी हैं। सासुओं को दूसरी ही सूरत में देखा। सीताजी का स्वप्न सुनकर श्रीरामचन्द्रजी के नेत्रों में जल भर आया और सबको सोच से छुड़ा देनेवाले प्रभु स्वयं ( लीलासे ) सोच के वश हो गये।

लखन सपन यह नीक न होई। कठिन कुचाल सुनाइहि कोई। अस कहि बंधु समेत नहाने। पूजा पुरारि साधु सनमाने।। _अर्थ _( और बोले ) लक्ष्मण ! यह स्वप्न अच्छा नहीं है। कोई भीषण कुसमाचार ( बहुत ही बुरी खबर ) सुनावेगा।  ऐसा कहकर उन्होंने भाई सहित स्नान किया और त्रिपुरारि महादेवजी का पूजन करके साधुओं का सम्मान किया।

सनमानि सुर मुनिवृंद बैठे उतर दिसि देखत भए। नभ धूलि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए।। तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे। सब समाचार किरात कओलन्हइ आइ तेहि अवसर कहे।।_अर्थ_ देवताओं का सम्मान ( पूजन ) और मुनियों की वन्दना करके श्रीरामचन्द्रजी बैठ गये और उत्तर दिशा की ओर देखने लगे। आकाश में धूल छा रही है; बहुत _से पशु और पक्षी व्याकुल होकर भागे हुए प्रभु के आश्रम को आ रहे हैं। तुलसीदासजी कहते हैं कि प्रभु श्रीरामचन्द्रजी यह देखकर उठे और सोचने लगे कि क्या कारण है ? वे चित्त में आश्चर्य युक्त हो गये। इसी समय कोल_भीलों ने आकर सब समाचार कहे।

सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर। सर्द सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल।।_अर्थ_ तुलसीदासजी कहते हैं कि सुन्दर मंगल वचन सुनते ही श्रीरामजी के मन में बड़ा आनन्द हुआ। शरीर में पुलकावली छा गयी, और शरद ऋतु
के कमल के समान नेत्र प्रेमाश्रुओं से भर गये।

बहुरि सोचबस भे सियरवनू। कारन कवन भरत आगवनू।। एक आइ अस कहा बहोरी। सेना संग चतुरंग न थोरी।।_अर्थ_ सीतापति श्रीरामचन्द्रजी 
पुनः सोच के वश हो गये कि भरत के आने का क्या कारण है? फिर एक ने आकर कहा कि उनके साथ में बड़ी भारी चतुरंगिणी सेना भी है।

सो सुनि रामहिं भा अति सोचू। इत पितु बच इत बंधु सकोचू।। भरत सुभाऊ समुझि मन माहीं। प्रभु चित हित थिति पावती नाहीं।।_अर्थ_यह बात सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को अत्यंत सोच हुआ। इधर तो पिता का वचन और इधर भाई भरतजी का संकोच ! भरतजी के स्वभाव को मन में समझकर तो प्रभु श्रीरामचन्द्रजी चित
त को ठहराने के लिये कोई स्थान ही नहीं पाते हैं।

समाधान तब भा यह जाने। भरतु कहे महुं साधु सयाने।। लखन लखेउ प्रभु हृदय खभारु। कहत समय सब नीति बिचारू।।_अर्थ_ तब यह जानकर समाधान हो गया कि भरत साधु और सयाने हैं और मेरे कहने में ( आज्ञाकारी ) हैं। लक्ष्मणजी ने देखा कि प्रभु श्रीरामजी के हृदय में चिंता है तो वे समय के अनुसार अपना नीतियुक्त विचार कहने लगे_

बिनु पूछें कछु कहुं गोसाईं। सेवकों समान ढ़ईठ ढ़िठाई।। तुम्ह सर्बज्ञ सिरोमनि स्वामी। अपनी समुझि कहुं अनुगामी।।_अर्थ_ हे स्वामी ! आपके बिना ही पूछे मैं कुछ कहता हूं; सेवक समय पर ढ़िठाई करने से ढ़ीठ नहीं समझा जाता है ( अर्थात् जब आप पूछें तब मैं कहूं, ऐसा अवसर नहीं है; इसलिये मेरा यह कहना ढ़िठाई नहीं होगा ) । हे स्वामी ! आप सर्वज्ञ ओं में शिरोमणि हैं ( सब जानते ही हैं )। मैं सेवक तो अपनी समझ की बात कहता हूं।

नाथ सुहृदं सुचि सरल चित सील सनेह निधान। सब पर प्रीति प्रतीति जियं जानिअ आपु समान।।_अर्थ_ हे नाथ ! आप परम सुहृद ( बिना ही कारण परम हित करनेवाले), सरलहृदय तथा शील और स्नेह के भण्डार हैं, आपका सभी पर प्रेम और विश्वास है, और अपने हृदय में सबको अपने ही समान जानते हैं।

बिषई जीव पाइ प्रभु ताई। मूढ़ मोहबस होहिं जनाई।। भरतु नीति रत साधु सुजाना। प्रभु पद प्रेमु सकल जग जाना।।_अर्थ_ परन्तु मूढ़ विषयी जीव प्रभुता पाकर मओहवश अपने असली स्वरूप को प्रकट कर देते हैं। भरत नईतइपरआयण, साधु और चतुर हैं तथा प्रभु ( आप )_के चरणों में उनका प्रेम है, इस बात को सारा जगत् जानता है।

तेऊ आज राम पद पाई। चले धर्म मरजाद  मेटाई।। कुटिल कुबंधु कुअवसरु ताकी। जानि राम बनबास एकाकी।।_अर्थ_वे भरतजी आज श्रीरामजी ( आप )_का  पद ( सिंहासन या अधिकार) पाकर धर्म की मर्यादा को मिटाकर चले हैं। कुटिल खोटे भाई भरत कुसमय देखकर और यह जानकर कि रामजी ( आप ) वनवास में अकेले असहाय हैं,।।

करि कुमंत्रु मन साजि समाजू। आए करै अकंटक राजू।। कोटि प्रकार कलपि कुटिलाईं। आए दल बटोरि दोउ भाई।।_अर्थ_ अपने मन में बुरा विचार करके, समाज जोड़कर राज्य को निष्कंटक करने के लिये यहां आये हैं। करोड़ों ( अनेकों ) प्रकार की कुटिलताएं रचकर सेना बटोरकर दोनों भाई आये हैं।

जौं जियं होति न कपट कुचाली। केहि सोहाती रथ बाजि गजाली।। भरतहिं दोसु देखि को जाएं। जग बौराइ राजु पद पाएं।।_अर्थ_यदि इनके हृदय में कपट कुचाल न होती तो रथ, घोड़े, हाथियों की कतार ( ऐसे समय ) किसे सुहाती ? परन्तु भरत को ही व्यर्थ कौन दोष दे ? राजपद पा जाने पर सारा जगत् ही पागल ( मतवाला ) हो जाता है।

ससि गुर तिय गामी नहुष चढ़ेउ भूमि सुर जान। लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान।।_अर्थ_चन्द्रमा गुरुपत्नीगामी हुआ, राजा नहुष ब्राह्मणों की पालकी पर चढ़ा। और राजा वेन के समान नीच तो कोई नहीं होगा, जो लोक और वेद दोनों से विमुख हो गया।

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू। केहि न राजमद दीन्ह कलंकू।। भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ। रिपु रिन रंच न राखब काऊ।।_अर्थ _ सहस्त्रबाहु, देवराज इन्द्र और त्रिशंकू आदि किसको राजमद ने कलंक नहीं दिया ? भरत ने यह उपाय उचित ही किया है। क्योंकि शत्रु और ऋण को कभी जरा भी शेष नहीं रखना चाहिये।

एक कीन्ह नहिं भरत भलाई। निदरे राम जानि असहाई।। समुझि परहि सोच आजु बिसेषी। समर सरोष राम मुखु पेखी।।_अर्थ_हां, एक बात भरत ने अच्छी नहीं की, जो रामजी ( आप )_को  असहाय जानकर उनका निरादर किया ! पर आज संग्राम में श्रीरामजी ( आप )_का क्रोधपूर्ण मुख देखकर यह बात भी उनकी समझ में विशेष रूप से आ जायगी ( अर्थात् इस निरादर का फल वे भी अच्छी तरह पा जायेंगे )।

Friday, 23 August 2024

अयोध्याकाण्ड

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू। भयउ समय समय सबहिं सुपासू।। रातिहिं घाट घाट की तर्जनी। आईं अगनित जात न बरनी।।_अर्थ_उस दिन यमुनाजी के किनारे निवास किया। समयानुसार सबके लिये ( खान_पान आदि की ) सुन्दर व्यवस्था हुई। ( निषादराज का संकेत पाकर )  रात_ही_रात में घाट_घाट की अगनित नावें वहां आ गयीं, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

प्रात पार भए एकहिं खेवां।  तोषे रामसखा की सेवां।। चले नहाई नदिहि सिर नाई। साथ निषादनाथ दोउ भाई।।_अर्थ_सवेरे एक ही खेले में सब लोग पार हो गये और श्रीरामचन्द्रजी के सखा निषादराज की इस सेवा से संतुष्ट हुए। फिर स्नान करके नदी को सिर नवाकर निषादराज ज्ञके साथ दोनों भाई चले।

आगें मुनिवर बाहन आछें। राज-समाज जाइ सब पाछें।। तेहि पाछें दोउ बंधु पयआदएं। भूषन बसन बेष सुठि सादें।।_अर्थ_ आगे अच्छी_अच्छी सवारियों पर श्रेष्ठ मुनि हैं, उनके पीछे सारा राज-समाज जा रहा है। उसके पीछे दोनों भाई सादे भूषण_वस्त्र और वेष से पैदल चल रहे हैं।

सेवक सुहृद सचिवसुत साथा। सुमिरत लखनउ सीय रघुनाथा।। जहं जहं राम बास बिश्रामा। तहं तहं करहिं सप्रेम प्रनामा।।_अर्थ_ सेवक, मित्र और मंत्री के पुत्र उनके साथ हैं। लक्ष्मण, सीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते जा रहे हैं। जहां_जहां श्रीरघुनाथजी ने निवास और विश्राम किया था, वहां_वहां वे प्रेम सहित प्रणाम करते हैं।

मगवासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ। देखि सरूप सनेह सब मुदित जनमफल पाइ।।_अर्थ_मार्ग में रहनेवाले स्त्री _पुरुष यह सुनकर और घर का काम_काज छोड़कर दौड़ पड़ते हैं और उनके रूप ( सौंदर्य ) और प्रेम को देखकर वे सब जन्म लेने का फल पाकर आनन्दित होते हैं।

कहहिं सप्रेम एक एक पाहीं। रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं।। बय बपु बरन रूप सोइ आली।
सीलु सनेहु सरिस सम चाली।।_अर्थ_गांवों की स्त्रियां एक दूसरी से प्रेमपूर्वक कहती हैं_सखी ! ये राम लक्ष्मण हैं कि नहीं? हे सखी ! उनकी अवस्था, शरीर और रंग_रूप तो वही है। सील, स्नेह उन्हीं के सदृश है और चाल भी उन्हीं के समान है।

बेषु न सो सखि सीय न संगा। आगें अपनी चली चतुरंगा।। नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा। सखि संदेहु होइ एहिं भेदा।।_अर्थ_परन्तु हे सखी ! इनका न तो वह वेष ( वल्कलवस्त्रधारी मुनिवेष ) है, न सीताजी ही संग है। और इनके आगे चतुरंगिणी सेना चली जा रही है। फिर इनके मुख प्रसन्न नहीं हैं, इनके मन में खेद है। है सखी ! इसी भेद के कारण संदेह होता है।

जासु तरक तियगन मन मानी। कहहिं सकल तेहि सम न सयानी। तेहि सराहि बानी फुरि पूजी।_अर्थ_उसका तर्क ( युक्ति ) अन्य स्त्रियों के मन भाया। सब कहती हैं कि इसके समान सयानी। उसकी सराहना करके और  'तेरी वाणी सत्य है' इस प्रकार उसका सम्मान करके दूसरी स्त्री मीठे वचन बोली।

कहि सपेम सब कथा प्रसंगू। जेहिं बिधि राम राज रस भंगू।। भरतहिं बहुरि सराहन लागी। सील सनेह सुभाय सुभागी।।_अर्थ_ श्रीरामजी के राजतिलक का आनंद जिस प्रकार से भंग हुआ था वह सब कथा प्रसंग प्रेमपूर्वक कहकर फिर वह भाग्यवती स्त्री भरतजी के शील, स्नेह और स्वभाव की सराहना करने लगी।

चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु। जात मनावन रघुबरहिं भरत सरिस को आजु।।_अर्थ_( वह बोली_) देखो, ये भरतजी पिता के दिये हुए राज्य को त्यागकर पैदल चलते और फलाहार करते हुए श्रीरामजी को मनाने के लिये जा रहे हैं। इनके समान आज कौन है ?

भायप  भगति भरत आचरनू। कहत सुनत दुख दूषन हरनू।। जो किछु कहब थोर सखि सोई। राम बंधु अस काहे न होई।।_अर्थ_भरतजी का भाईपना, भक्ति  और इनके आचरण कहने और सुनने से दु:ख और दोषों को हरनेवाले हैं। हे सखी ! उनके संबंध में जो कुछ भी कहा जाय, वह थोड़ा है। श्रीरामचन्द्रजी के भाई ऐसे क्यों न हों !। 

हम सब सानुज भरतहिं देखें। भइन्ह धन्य जुबतीं जन देखें।। सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं। कैकइ जननी जोगु सुत नाहीं।।_,अर्थ_छोटे भाई शत्रुध्न सहित भरतजी को देखकर हम सब भी आज धन्य ( बड़भागिनि ) स्त्रियों की गिनती में आ गयीं। इस, प्रकार भरतजी के गुण सुनकर और उनकी दशा देखकर स्त्रियां पछतायीं हैं और कहती हैं _ यह पुत्र कैकेयी_जैसी माता के योग्य नहीं हैं।

कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन।  बिधि सब कीन्ह हमहि जो दाहिन।। कहं हम लोक बेद बिधि हीनी। लघु तिय कुल करतूति मलीनी।।_अर्थ
_कोई कहती है_ इसमें रानी का भी दोष नहीं है यह सब विधाता ने ही किया है जो हमारे अनुकूल है। कहां तो हम लोक और वेद दोनों की विधि ( मर्यादा)_से हीन, कुल और करतूत दोनों से मलिन तुच्छ स्त्रियां, ।

बसहिं कुदेस कुगांव कुबामा। कहं यह दरसु पुन्य परिनामा।। अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा।। जनु मरुभूमि कल्पतरु जामा।।_अर्थ_ जो बुरे देश ( जंगली प्रान्त) और बुरे गांव में बसती हैं और ( स्त्रियों में भी ) नीच स्त्रियां हैं। और कहां यह महान् पुण्यों का परिणामस्वरूप इनका दर्शन। ऐसा ही आनंद और आश्चर्य गांव_गांव में हो रहा है। मानो मरुभूमि में कल्पवृक्ष उग गया हो।

भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु। जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु।।_अर्थ_ भरतजी का स्वरूप देखते ही रास्ते में रहनेवाले लोगों के भाग्य खुल गये। मानो दैवयोग से सिंहल द्वीप के बसनेवालों को तीर्थराज प्रयाग सुलभ हो गया हो।

निज गुन सहित राम गुन गाथा। सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा। तीरथ मुनि आश्रम सुखधामा। निरखि निमज्जहिं करहिं प्रणामा।।_अर्थ_( इस प्रकार) अपने गुणों सहित श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की कथा सुनते और श्रीरघुनाथजी को स्मरण करते हुए भरतजी चले जा रहे हैं। वे तीर्थ देखकर स्नान एवं मुनियों के आश्रम तथा देवताओं के मंदिर देखकर प्रणाम करते हैं।

मनहीं मन माहीं बरु एहू। सीय राम पद पदुम सनेहू।। मिलहिं किरात कोल बनबासी। बैखानस बटु जती उदासी।।_अर्थ_और मन_ही_मन यह वरदान मांगते हैं कि श्रीसीतारामजी के चरणकमलों में प्रेम हो। मार।ग में भील, कोल आदि बनवासी तथा वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, संन्यासी और विरक्त मिलते हैं।

करि प्रनामु पूंछहिं जेहि तेही। केहि बन लखन रामु बैदेही। ते प्रभु समाचार सब कहहीं। भरतहिं देखि जन्म फलु लहहीं।।_अर्थ_उनमें से जिस तिस से प्रणाम करके पूछते हैं कि लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और जानकी जी किस वन में हैं ? वे प्रभु के सब समाचार कहते हैं और भरतजी को देखकर जन्म का फल पाते हैं।

जे जन कहहिं कुसल हम देखे। ते प्रिय राम लखन सम लेखे।। एहि बिधि बूझते सबहिं सुबानी। सुनत राम बन बनबास कहानी।।_अर्थ_जो लोग कहते हैं कि हमने उनको कुशलपूर्वक देखा है, उनको ये श्रीराम _लक्मण के समान ही प्यारे मानते हैं। इस प्रकार सबसे सुन्दर वाणी से पूछते और श्रीरामजी के वनवास की कहानी सुनते जाते हैं।