Thursday, 18 December 2025

अयोध्याकाण्ड

अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो। किएं बिचारु न सोचु खरो सो।। आरती मोर नाथ कर छोहू। दुहूं मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू।।_अर्थ_मुझे सब प्रकार से ऐसा बहुत भरोसा है। विचार करने पर तिनके के बराबर ( जरा_सा ) भी सोच नहीं रह जाता। मेरी दीनता और स्वामी का स्नेह दोनों ने मिलकर मुझे जबर्दस्ती ढ़ीठ बना दिया है।

यह बड़ दोषु दूरी करि स्वामी। तजि संकोच सिखइअ अनुगामी।। भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी। खीर नीर बिबरन गति हंसी।।_अर्थ_हे स्वामी ! इस बड़े दोष को दूर करके संकोच को त्यागकर मुझ सेवक को शिक्षा दीजिये। दूध और जल को अलग_अलग करने में हंसिनीकी_सी गतिवाली भरतजी की विनती सुनकर उसकी सभी ने प्रसंशा की।

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दिन छलहीन।देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन।।_अर्थ_ दीनबंधु और परम चतुर श्रीरामजी भाई भरतजी के दिन और छलरहित वचन सुनकर देश, काल और अवसर के अनुकूल वचन बोले _।

तात तुम्हारि मोरि परिजन की। चिंता गुरहिं नृपहिं घर बन की।। माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू। हमहिं तुम्हहिं सपनेहुं न ।_अर्थ_हे तात ! तुम्हारी, मेरी, परिवार की,  घर की और वन की सारी चिंता गुरु वशिष्ठजी और महाराज जनकजी को है। हमारे सिर पर जब गुरुजी, गुरु विश्वामित्रजी और मिथिलापति जनकजी हैं, तब हमें और तुम्हें स्वप्न में भी क्लेश नहीं है।

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु। स्वारथु सुजस धरम परमारथु।। पितु आयसु पालिहि दुहुं भाई। लोक बेद भल भूप भलाई।।_अर्थ_मेरा और तुम्हारा जो परम पुरुषार्थ, स्वार्थ, सुयश, धैर्य और परमार्थ इसी में है कि हम दोनों पिताजी की आज्ञा का पालन करें। राजा की भलाई ( उसके व्रत की रक्षा )_से ही लोक और वेद दोनों में भला है।

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें। चले हुं कुमार पग परहिं न खालें।। अस बिचारि सब सोच बिहाई। पारसु अवध अवधि भरि जाई।।_अर्थ_गुरु, पिता, माता, और स्वामी की शिक्षा ( आज्ञा )_का पालन करने पर कुमार्ग पर भी चलने से पैर गड्ढे में नहीं पड़ता ( पतन नहीं हसीं होता )। ऐसा विचारकर सब सोच छोड़कर अवध जाकर अवधिभर उसका पालन करो।

देसु कोसी परिजन परिवारू। गुर पद राजहिं लाख छरुभारू।। तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी। पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी।।_अर्थ_देश, खजाना, कुटुम्ब परिवार आदि सबकी जिम्मेदारी तो गुरुजी की चरण रज पर है।तुम तो मुनि वशिष्ठजी, माताओं और मंत्रियों की शिक्षा मानकर तदनुसार पृथ्वी, प्रजा और राजधानी का पालन ( रक्षा ) भर करते रहना। 

मुखिया मुख सो चाहिऐ खान पान कहुं एक। पालइ पोषइ सकल अंग तुलसी सहित बिबेक।।_अर्थ_तुलसीदासजी कहते हैं_(श्रीरामजी ने कहा_) मुखिया मुख के समान होना चाहिये, जो खाने_पीने को तो एक अकेला है, परन्तु विवेकपूर्वक सब ( अकेला ) है, परन्तु विवेकपूर्वक सब अंगों का पालन _पोषण करता है।

राजधरम सरबसु एतनोई। जिमि मन मांस मनोरथ गोई।। बंधु प्रबोधु कीन्ह बहुत भांती। बिनु आधार मन तोषी न सांती।।_अर्थ_ राजधर्म का सर्वस्व ( सार ) भी इतना ही है। जैसे मन के भीतर मनोरथ छिपा रहता है। श्रीरघुनाथजी ने भाई भरत को बहुत प्रकार से समझाया। परन्तु कोई अवलम्ब पाये बिना उनके मन में न संतोष हुआ न शांति।

भरत सील गुर सचिव समाजू। सकुच स्नेह बिबस रघुराजू।। प्रभु करि कृपां पआंवरईं दीन्हा सादर भरत सीस धरि लीन्हीं।।_अर्थ_इधर तो भरतजी का शील ( प्रेम ) और उधर गुरुजनों, मंत्रियों और समाज की उपस्थिति! यह देखकर श्रीरघुनाथजी संकोच तथा स्नेह के विशेष वशीभूत हो गये। ( अर्थात् भरतजी के प्रेमवश उन्हें पांवरी देना चाहते हैं, किन्तु साथ ही गुरु आदि का संकोच भी होता है। ) आखिर ( भरतजी के प्रेमवश ) प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने कृपा कर खड़ाऊं दे दीं और भरतजी ने उन्हें आदरपूर्वक सिर पर धारण कर लिया।

चरन पीठ करुनानिधान के। जनु जुग जामिनि प्रजा प्रान के। संपुट भरत सनेहं रतन के। आखर जुग जनु जीव जतन के।।_अर्थ_ करुणानिधान श्रीरामचन्द्रजी के दोनों खड़ाऊं प्रजा के प्राणों की रक्षा के लिये मानो दो पहरेदार हैं। भरतजी के प्रेम रुपी रत्न के लिये मानो डिब्बा है और जीवन के साधन के लिये मानो राम_नाम के दो अक्षर हैं।

कुल कपाट कर कुसल करम के। बिमल नयन सेवा सुधरम के। भरत मुदित अवलम्ब लहे तें। अस सुख जस सिर रामु रहे तें।।_अर्थ_रघुकुल ( की रक्षा )_के लिये दो किवाड़ हैं। कुशल ( श्रेष्ठ ) कर्म करने के लिये दो हाथ की भांति ( सहायक ) हैं। और सेवा रूपी श्रेष्ठ  धर्म को बुझाने के लिये निर्मल नेत्र हैं। भरतजी इस अधर्म।ब के मिल जाने से परम आनंदित हैं। उन्हें ऐसा ही सुख हुआ, जैसे श्रीसीतारामजी के रहने से होता।

मागेउ विदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ। लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ।।_अर्थ_भरतजी ने प्रणाम करके विदा मांगी, तब श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें हृदय से लगा लिया। इधर कुटिल इन्द्र ने बुरा मौका पाकर लोगों का उच्चाटन कर दिया।

सो कुचालि सब कहं भी नीकी। अवधि इस समय जीवनि जी की।। नतरु लखन सिय राम बियोगा। हहरि मरत सब लोग कुरोगा।।_अर्थ_वह कुचाल भी सबके लिये हितकर हो गयी। अवधि के आशा के समान ही जीवन के लिये संजीवनी हो गयी। नहीं तो ( उच्चाटन न होता तो ) लक्ष्मणजी, सीताजी और श्रीरामचन्द्रजीके वियोग रूपी बुरे लोग से सब लोग घबराकर (हाय_हाय करके ) मर ही जाते।

रामकृपां अवरेब सुधारी। बिबुध धारा भी गुनद गोहारी।। भेंटत भुज भरी भाई भरत सो राम प्रेम हो कहा न परत सो।।_अर्थ_श्रीरामजी की कृपा ने सारी उलझन सुधार दी। देवताओं की सेना जो लूटने आई थी, वहीं गुणदायक ( हितकारी ) और रक्षक बन गयी। श्रीरामजी भुजाओं में भरकर भरत से मिल रहे हैं। श्रीरामजी के प्रेम का वह रस ( आनन्द ) कहते नहीं बनता।

तन मन बचन उमंग अनुरागा। धीर धुरंधर धीरजु त्यागा।। बारिज लोचन मोचत बारी। देखि दशा सुर सभा दुखारी।।_अर्थ_तन, मन और वचन तीनों में प्रेम उमड़ पड़ा। धीरज की धूरी धारण करनेवाले श्रीरघुनाथजी ने धीरज त्याग दिया। वे कमलसदऋश नेत्रों से ( प्रेमाश्रुओं का जल बहाने लगे। उनकी यह दशा देखकर देवताओं की सभा ( समाज ) दु:खी हो गयी।

मुनिगन गुर धुर धीर जनक से। ग्यान अनल मन कसें कनक से।। जे बिरंचि निरलेप उपाए। पदुम पत्र जिमि जग जल जाए।।_अर्थ_मुनिगन, गुरु वशिष्ठजी और जनकजी_सरीखे धीर धुरंधर जो अपने मनों को ज्ञानरुपी अग्नि में सोने के समान कस चुके थे, जिनको ब्रह्माजी ने निर्लेप ही रचा और जो जगत् रूपी जल में कमल के पत्ते के तरह ही ( जगत् में रहते हुए भी जगत् से अनासक्त ) पैदा हुए।

तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार। भए मगन मन तन बचन सहित बिरागु बिचार।।_अर्थ_वे भी श्रीरामजी और भरतजी के उपमारहित अपार प्रेम को देखकर वैराग्य और विवेक सहित तीन, मन, वचन से उस प्रेम में मग्न हो गये।

जहां जनक गुरु गति मति भोरी। प्राकृत प्रीति कहते बड़ि खोरी।। बरनत रघुबर भरत बियोगू।  सुनि कठोर छबि जानहिं लोगू।।_अर्थ_जहां जनकजी और गुरु वशिष्ठजी की बुद्धि की गति कुण्ठित हो गयी, उस दिव्य प्रेम को प्राकृत ( लौकिक ) कहने में बड़ा दोष है। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी के वियोग का वर्णन करते सुनकर लोग कवि को कठोर हृदय कहेंगे।

सो सकोच रही अकथ सुबानी। समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी।। भेंटि भरत रघुबर समुझाए। पुनि रिपुदवनू हर्षा उर लाए।।_अर्थ_वह संकोच रस अकथनीय है। अतएव कवि की सुन्दर वाणी उस समय उसके प्रेम को स्मरण करके सकुचा गये। भरतजी को भेंटकर श्रीरघुनाथजी ने उनको समझाया। फिर हर्षित होकर श्रीरघुनाथजी को हृदय लगा लिया।

सेवक सचिव भरत रुख पाई। निज निज काज लगे सब जाई।। सुनि दारुन दुखु दुहूं समाजा। लगे चलन के साजन साजा।।_अर्थ_सेवक और मंत्री भरतजी का रुख पाकर सब अपने_अपने कामों में जा लगे। यह सुनकर दोनों समाजों में दारुण दु:ख छा गया। वे चलने की तैयारियां करने लगे।

प्रभु पद पदुम बंदी दोउ भाई। चले सीस धरि राम रजाई।। मुनि तापस बनदेव निहोरी। सब सनमानि बहोरि बहोरी।।_अर्थ_प्रभु के चरणकमलों की वन्दना करके तथा श्रीरामजी की आज्ञा को सिर पर रखकर भरत_शत्रुध्न दोनो भाई चले। मुनि, तपस्वी और वनदेवता सबका बार_बार सम्मान करके उनकी विनती की।

लखनहिं भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि। चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि।।_अर्थ_फिर लक्ष्मणजी को क्रमशः भेंटकर तथा प्रणाम करके और सीताजी के चरणों की धूरलि को सिर पर धारण करके और समस्त मंगलों के मूल आशीर्वाद सुनकर वे प्रेम सहित चले।

सानुज राम नृपहिं सिर नाई। कीन्ह बहुबिधि बिनय बड़ाई।। देव दया बस दुखी पायी। सहित समाज काननहिं आयु।।_अर्थ_छोटे भाई लक्ष्मणजी समेत श्रीरामजी ने राजा जनकजी को सिर नवाकर उनकी बहुत प्रकार से विनती की ( और कहा_) है देव ! दयावश आपने बहुत दु:ख पाया। आप समाजसहित वन में आये।

पुर पगु धारिअ देख असीसा। कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा।। मुनि महिदेव साधु सनमाने। विदा किए हरि हर सम जाने।।_अर्थ_अब आशीर्वाद देकर नगर को पधारिये। यह सुन राजा जनकजी ने धीरज धरकर गमन किया। फिर श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि ब्राह्मण और साधुओं को विष्णु और शिव के समान जानकर सम्मान कर उनको विदा किया।

सासु समीप गए दोउ भाई। फिरे बंदी पग आसिफ पाई।। कौसिक बामदेव जाबाली। पुरजन परिजन सचिव सुचाली।।_अर्थ_ तब श्रीराम लक्ष्मण दोनों भाई ( सुनयनाजी) के पास गये और उनके चरणों की वन्दना करके छोटे भाई लक्ष्मण सहित आशीर्वाद पाकर लौट आये। फिर विश्वामित्र, वामदेव, जाबालि और शुभ आचरण वाले कुटुम्बी, नगर निवासी और मंत्री_

जथा जोगु करि विनय प्रनामा। विदा किए सब सानुज रामा।। नारी पुरुष लघु मध्यम बड़ेरे। सब सनमानि कृपानिधि फेरे।।_अर्थ_सबको छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीरामचन्द्रजी ने जथायोग्य विनय एवं प्रणाम करके विदा किया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने छोटे, मध्यम और बड़े सभी श्रेणी के स्त्री-पुरुषों का सम्मान करके उनको लौटाया।

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेह मिला भेंटि। विदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि।।_अर्थ_भरत की माता कैकेयी के चरणों की वन्दना करके प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने पवित्र ( निश्छल ) प्रेम के साथ उनसे मिल_भेंटकर तथा उनके सारे संकोच और सोच को मिटाकर पालकी सजाकर उनको विदा किया।

परिजन मातु पिता मिलि सीता। फिर प्रानप्रिय प्रेम पुनीता।। करि प्रणाम भेंटी सब सासू। प्रीति कहते कबि हियं न हुलासू।।_अर्थ_प्राणप्रिय पति श्रीरामचन्द्रजी के साथ पवित्र प्रेम करनेवाली सीताजी नैहर के कुटुम्बभर तथा माता_पिता से मिलकर लौट आयीं। फिर प्रणाम करके सब सासुओं से गले लगकर मिलीं। उसने प्रेम का वर्णन करने के लिये कवि के हृदय में हुलास ( उत्साह ) नहीं होता।

सुनि सिख अभिमत आसिष पाई। रही सीय दुहुं प्रीति समाई। रघुपति पटु पालकीं मगाईं। करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई।।_अर्थ_उनकी शिक्षा सुनकर और मनचाहा आशीर्वाद पाकर सीताजी सासुओं तथा माता_पिता दोनों ओर की प्रीति में हमारी ( बहुत देर तक निमग्न ) रहीं। ( तब ) श्रीरघुनाथजी ने सुन्दर पालकियां मंगवायीं और सब माताओं को आश्वासन देकर उनपर चढ़ाया।
 
बार बार मिलि मिलि दुहुं भाई। हम सनेहं जननीं पहुंचाईं।। साजि बाजी गए बाहन नाना। भरत भूप दल कीन्ह पयाना।।_अर्थ_ दोनों भाइयों ने ने माताओं से समान प्रेम से बार_बार मिलजुलकर उनको पहुंचाया। भरतजी और राजा जनकजी के दलों ने घोड़े, हाथी आदि पशु हृदय में सारे ( शिथिल ) हुए परवश मन मारे चले जा रहे हैं।






Monday, 17 November 2025

अयोध्याकाण्ड

धन्य भरत जय राम गोसाईं। कहत देव हर्षित बरिआई।। मुनि मिथिलेस समां सब काहू। भरत बचन सुनि भयउ उछाहू।।_अर्थ_'भरतजी धन्य हैं, स्वामी श्रीरामजी की जय हो !' ऐसा कहते हुए देवता बलपूर्वक ( अत्यधिक ) हर्षित होने लगे। भरतजी के वचन सुनकर मुनि वशिष्ठजी, मिथिलापति जनकजी और सभा में सब किसी को बड़ा उत्साह ( आनन्द ) हुआ।

भरत राम गुन ग्राम सनेहू। पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू।।  सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन। नेमु पेमु अति पावन पावन।।_अर्थ_ भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी के गुणसमूह तथा प्रेम की विदेहराज जनकजी पुलकित होकर प्रशंसा कर रहे हैं। सेवक और स्वामी दोनों का सुन्दर स्वभाव है। इनके नियम और प्रेम पवित्र को भी अत्यन्त पवित्र करनेवाले हैं।

मति अनुसार सराहन लागे। सचिव सभासद सब अनुरागे।। सुनि सुनि राम भरत संबादू। दुहुं समाज हियं हर्ष बिषादू।।_अर्थ_मंत्री और सभासद सभी प्रेम मुग्ध होकर अपनी अपनी बुद्धि के अनुसार सराहना करने लगे। श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी का संवाद सुन_सुनकर दोनों समाजों के हृदयों में हर्ष और विषाद ( भरतजी के सेवाधर्म को देखकर हर्ष और राम वियोग की संभावना से विषाद ) दोनों हुए।

राम मातु दुखु सुखु सब जानी। कहि गुन राम प्रबोधीं रानी।। एक कहहिं रघुबीर बड़ाई। एक सराहत। भरत भलाई।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी दु:ख और सुख को समान जानकर श्रीरामजी के गुण कहकर दूसरी रानियों को धैर्य बंधाया। कोई श्रीरामजी की बड़ाई ( बड़प्पन )_की चर्चा कर रहैं, तो कोई भरतजी के अच्छेपन की सराहना करते हैं।

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप। राखिअ तीरथ तोय तहं पावन अमिअ अनूप।।_अर्थ_तब अत्रिजी ने भरतजी से कहा_इस पर्वत के समीप ही एक सुंदर कुआं है। इस पवित्र, अनुपम और अमृत_जैसे तीर्थस्थल को उसी में स्थापित कर दीजिये।

भरत अत्रि अनुसासन पाई। जल भाजन सब दिए चलाई।। सानुज आपु अत्रि मुनि साधू। सहित गए जहं कूप अगाधू।।_अर्थ_भरतजी ने अत्रि मुनि की आज्ञा पाकर जल के सब पात्र रवाना कर दिये और छोटे भाई शत्रुध्न, अत्रइमउनइ तथा अन्य साधु_संतों सहित आप वहां गये जहां वह अथाह कुआं था।

पावन पार पुन्यथल राखा। प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा।। तात अनादि सिद्ध थल एहू। लोपेज काल बिदित नहीं केहू।।_अर्थ_ ऋषि ने प्रेम से आनंदित होकर ऐसा कहा_हे तात ! यह अनादि सिद्ध स्थल है। कालक्रम से यह लोप हो गया था इसलिये किसी को इसका पता नहीं था।

तब सेवकन्ह सरस जलु देखा। कीन्ह सुजल हित कूप बिसेषा।। बिधि बस भयउ बिस्व पुकारूं। सुगम अगम अति धरम बिचारू।।_अर्थ_तब ( भरतजी के ) सेवकों ने उस जलयुक्त स्थान को देखा और उस सुन्दर ( तीर्थों के ) जल के लिये एक खास कुआं बना लिया। दैवयोग से विश्वभर का उपकार हो गया। धर्म का विचार जो अत्यन्त अगम था, वह ( इस कूप के प्रभाव से ) सुगम हो गया।

भरतकूप अब कहिहहिं लोगा।  अति पावन तीर्थ जल जोगा।। प्रेम स्नेह निमज्जन प्रानी। होइहिं बिमल करम मन बानी।।_अर्थ_अब इसको लोग भरतकूप कहेंगे। तीर्थों के जल के संयोग से तो यह अत्यन्त पवित्र हो गया। इसमें प्रेमपूर्वक नियम से स्नान करने पर प्राणी मन, वचन और कर्म से निर्मल हो जायेंगे।

कहत कूप महिमा सकल गए जहां रघुराउ। अत्रि सुनायी रघुबरहिं तीर्थ पुन्य प्रभाउ।।_अर्थ_कूप की महिमा कहते हुए सब लोग वहां गये जहां श्रीरघुनाथजी थे। श्रीरघुनाथजी को अत्रिजी ने उस तीर्थ का पुण्य प्रभाव सुनाया।

कहत धरम इतिहास सप्रीती। भयउ भोर निसि सो सुख बीती।। नित्य निबाहा भरत दोउ भाई। राम अत्रि गुर आयसु पाई।।_अर्थ_प्रेमपूर्वक धर्म का इतिहास कहते वह रात सुख से बीत गयी और सवेरा हो गया। भरत_शत्रुध्न दोनों भाई नइत्यक्रइयआ पूरी करके, श्रीरामजी, अत्रिजी और गुरु वशिष्ठ जी की आज्ञा पाकर,।

सहित समाज साज सब सादें। चले राम बन अटल पयादें।। कोमल चरन चलत बिनु पनहीं। भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं।।_अर्थ_समाजसहित सब सादें साथ से श्रीरामजी के वन में भ्रमण ( प्रदक्षिणा ) करने के लिये पैदल ही चले। कोमल चरण है और बिना जूते के चल रहे हैं, यह देखकर पृथ्वी मन_ही_मन सकुचाकर कोमल हो गयी।

कुस कंटक कांकरी कुराईं। खटीक कठोर कुबस्तु दुराई।। महि मंजुल मृदु मार्ग कीन्हे। बहुत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे।।_अर्थ_कुश, कांटे, कंकड़ी, दरारें आदि कड़वी, कठोर और बुरी वस्तुओं को छिपाकर पृथ्वी ने सुन्दर और कोमल मार्ग कर दिये। सुखों को साथ लिये ( सुखदायक ) शीतल, मन्द, सुगन्ध हवा चलने लगी।

सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं। बिटप फूला बलि त्न मृदुताहीं।। मृग बिलोकि खग बोलि सुबानि। से वहां सकल राम प्रिय जानी।।_अर्थ_रास्ते में देवता फूल बरसाकर, बादल छाया करके, वृक्ष फूल_फलकर, तृण अपनी कोमलता से, मृग ( पशु ) देखकर और पक्षी सुन्दर और    वाणी बोलकर_सभी भरतजी को श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे जानकर उनकी सेवा करने लगे।

सुलभ सिद्धि सब प्राकृत ही राम कहते जमुहात। राम प्रानप्रिय भरत कहुं यह न होई बड़ि बात।।_अर्थ_ जब एक साधारण मनुष्य को भी ( आलस्य से ) जंभाई लेते समय 'राम' कह देने से ही सब सिद्धियां सुलभ हो जाती हैं, तब श्रीरामचन्द्रजी ने भरतजी के लिये यह कोई बड़ी (आश्चर्य ) की बात नहीं है।

एहि बिधि भरत फिरत बन माहीं। नेमु प्रेमी लखि मुनि सकुचाहीं।। पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा। खग मृग तरु त्न गिरि बन बागा।।_अर्थ_इस प्रकार भरतजी वन में फिर रहे हैं।उनके नियम और प्रेम को देखकर मुनि भी सकुचा जाते हैं। पवित्र जल के स्थान ( नदी, बावली, कुण्ड आदि ), पृथ्वी के पृथक्_पृथक् भाग, पक्षी, पशु, वृक्ष, तृण ( घास ), पर्वत, वन और बगीचे_।

चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी। बूझत भरतुसभी विशेष रूप से दिव्य सब देखी।। सुनि मन मुदित कहते रिषिराऊ। हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ।।_अर्थ_सभी विशेष रूप से सुन्दर, विचित्र, पवित्र और दिव्य देखकर भरतजी पूछते हैं और उनका प्रश्न सुनकर ऋषिराज अत्रिजी प्रसन्न मन से सबके कारण, नाम, गुण और पुण्य प्रभाव को कहते हैं।

कतहुं निमज्जन कतहुं प्रनामा। कतहुं बिलोकत मन अभिराम।। कतहुं बैठ मुनि आयसु पाई। सुमिरत सीय सहित दोउ भाई।।_अर्थ_भरतजी कहीं स्नान करते हैं, कहीं प्रणाम करते हैं, कहीं मनोहर स्थानों के दर्शन करते हैं और मुनि अत्रिजी की आज्ञा पाकर बैठकर, सीताजी सहित श्रीराम _लक्ष्मण दिनों भाइयों का स्मरण करते हैं।

देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा। देहिं असीस मुदित बनदेवा फिरहिं गेंद दिन पहले अढ़ाई। प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई।।_अर्थ_भरतजी के स्वभाव, प्रेम और सुन्दर सेवाभाव को देखकर वनदेवता आनन्दित होकर आशीर्वाद देते हैं। यों घूम_फिरकर ढ़ाई पहर दिन बीतने परलोक पड़ते हैं और आकर प्रभु श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों का दर्शन करते हैं।

देखे थल तीरथ सकल भरत पांच दिन माझ। कहत सुनत हरि हर सुजसु गयी दिवस भइ सांझ।।_अर्थ_ भरतजी ने पांच दिनों में सब तीस्थानों के दर्शन कर लिये। भगवान् विष्णु और महादेवजी का सुन्दर यश कहते_सुनते वह ( पांचवां ) दिन भी बीत गया, सन्ध्या हो गयी।

भोर न्हाइ सब जुरा समाजू। भरत भूमि सुर तेरहुति राजू।। भल दिन आजु जानि मन माहीं। रामु कृपाल कहत सकुचा हीं।।_अर्थ_(अगले छठे दिन ) सवेरे स्नान करके भरतजी, ब्राह्मण, राजा जनक और सारा समाज आ जुटा। आज सबको विदा करने के लिये अच्छा दिन है, यह मन में जानकर भी कृपालु श्रीरामजी कहने में सकुचा रहे हैं।

गुर नृप भरत सभा अवलोकी। सकुचा राम फिरि अवनि बिलोकी।। सील सराही सभा सब सोची। कहुं न राम सम स्वामि संकोची।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने गुरु वशिष्ठजी, राजा जनकजी, भरतजी और सारी सभा की ओर देखा, किन्तु फिर सकुचाकर दृष्टि फेरकर वे पृथ्वी की ओर ताकने लगे। सभा उनके शील की सराहना करके सोचती है कि श्रीरामचन्द्रजी के समान संकोची स्वामी कहीं नहीं है।

भरत सुजान राम रुख देखी। उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी।। करि दंडवत कहत कर जोरी। राखीं नाथ सकल रुचि मोरी।।_ अर्थ_सुजान भरतजी श्रीरामचन्द्रजी का रुख देखकर प्रेमपूर्वक उठकर, विशेष रूप से धीरज धारण कर दण्डवत् करके हाथ जोड़कर कहने लगे_हे नाथ ! आपने मेरी सभी रुचियां रखीं।

मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू। बहुत भांति दुखु पावा आपू। अब गोसाईं मोहि देउ रजाई। सेवौं अवध अवधि भरि जाई।।_अर्थ_मेरे लिये सब लोगों ने सन्ताप सहा और अपने भी बहुत प्रकार से दुख पाया। अब स्वामी मुझे आज्ञा दें। मैं जाकर अवधिभर ( चौदह वर्ष तक ) अवध का सेवन करूं। 

जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखें दीनदयाल। सो सिख देइअ अवधि लगि कओसलपआल कृपाल।।_अर्थ_हे दीनदयालु! जिस उपाय से यह दास फिर चरणों का दर्शन करे_हे कोसलाधीश ! हे कृपालु ! अवधिभर के लिये मुझे वहीं शिक्षा दीजिये।

पुरजन परिजन प्रजा गोसाईं। सब सुचि सरस सनेहं सगाईं।। राउर बदि भल भव दुख दाहू। प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू।।
_अर्थ_हे गोसाईं ! आपके प्रेम और सम्बन्ध से अवधपुर वासी, कुटुम्बी और प्रजा सभी पवित्र रस ( आनन्द )_से युक्त हैं। आपके लिये भव दु:ख ( जन्म_मरणके दु:ख )_की ज्वाला में जलना भी अच्छा है और प्रभु ( आप )_के बिना परमपद ( मोक्ष )_का लाभ भी व्यर्थ है।

स्वामि सुजानु जानि सब ही की। रुचि लालसा रहना जन जी की।। प्रनतपालु पालिहि सब काहू। देऊं दुहू दिसि ओर निबाहू।।_अर्थ_हे स्वामी ! आप सुजान हैं, सभी के हृदय की और मुझ सेवक के मन की रुचि, लालसा ( अभिलाषा ) और रहनी जानकर, है प्रनतपाल ! आप सब किसी का पालन करेंगे और है देव ! दोनों तरफ को ओर अंत तक निबाहेंगे।

Tuesday, 21 October 2025

अयोध्याकाण्ड

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू। आपने मोर परम हित धरमू।। मोहि सब भांति भरोस तुम्हारा। तदपि कहउं अवसर अनुसारा।।_अर्थ_ तुमको सबके कर्मों ( कर्तव्यों )_का और अपने तथा मेरे परम
हितकारी धर्म का पता है। यद्यपि मुझे तुम्हारा सब प्रकार से भरोसा है, तथापि मैं समय के अनुसार कुछ कहता हूं।

तात तात बिनु बात हमारी। केवल गुरुकुल कृपां संभारी।। नतरु प्रजा परिजन परिवारू। हमहिं सहित सबु होत खुआरू।।_अर्थ_हे तात ! पिताजी के बिना ( उनकी अनुपस्थिति में ) हमारी बात केवल कुरुवंश की कृपा ने ही संभाल रखी है; नहीं तो हमारे सहित प्रजा, कुटुंब, परिवार सभी बर्बाद हो जाते।

जौं बिनु अवसर अथवं दिनेसू। जग केहि कहहु न होई कलेसू।। तब उत्पात तात बिधि कीन्हा। मुनि मिथिलेस राखी सबु लीन्हा।।_अर्थ_यदि बिना समय के ( संध्या से पूर्व ही ) सूर्य अस्त हो जाय तो कहो जगत् में किसको क्लेश न होगा ? हे तात ! उसी प्रकार का उत्पात विधाता ने यह ( पिता की असामयिक मृत्यु ) किया है। पर मुनि महाराज ने तथा मिथिलेश्वर ने सबको बचा लिया।

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम। गुर प्रभाउ पालिहि सबहिं भल होइहि परिनाम।।_अर्थ_राज्य का सब कार्य, लज्जा, प्रतिष्ठा, धर्म, पृथ्वी, धन, घर_इन सभी का पालन ( लक्षण ) गुरुजी का प्रभाव ( सामर्थ्य ) करेगा और परिणाम शुभ होगा।

सहित समाज तुम्हार हमारा। घर बन गुर प्रसाद रखवारा।। मातु पिता गुर स्वामि निदेसू। सकल धरम धरनीधर सेसू।।_अर्थ_गुरुजी का प्रसाद ( अनुग्रह ) ही घर में और वन में समाजसहित तुम्हारा और हमारा रक्षक है। माता, पिता, गुरु और स्वामी की आज्ञा (का पालन ) समस्त धर्म रुपी पृथ्वी को धारण करने में शेषजी के समान है।

सो तुम्ह करहु करावहु मोहू। तात तरनि कुल पालक होहू।। साधक एक सकल सिधि देनी। कीरति सुगति भूतिमय बेनी।।_अर्थ_हे तात ! तुम वही करो और मुझसे भी कराओ तथा सूर्यकुल के रक्षक बनो। साधक के लिये यह एक ही ( आज्ञापालनरूपी साधना ) संपूर्ण सिद्धियों को देनेवाली, कीतिमयी, सद्गतिमयी और ऐश्वर्यमयी त्रिवेणी है।

सो बिचारी सही संकटु भारी। करहु प्रजा परिवारु सुखारी।। बांटी बिपति सबहिं मोहि भाई। तुम्हहिं अवधि भरी बड़ि कठिनाई।।_अर्थ_इसे विचारकर भारी संकट सहकर भी प्रजा और परिवार को सुखी करो। हे भाई ! मेरी विपत्ति सभी ने बांट ली है, परन्तु तुमको तो अवधि ( चौदह वर्ष )_तक बड़ी कठिनाई है ( सबसे अधिक दु:ख है )।


जानि तुम्हहि मृदु कहउं कठोरा। कुसमयं तात न अनुचित मोरा।। होहिं कुठायं सुबंधु सुहाए। ओड़िअहिं हाथ असनिहुं के घाए।।_अर्थ_तुमको कोमल जानकर मैं भी कठोर ( वियोग की बात ) कह रहा हूं। हे तात ! बुरे समय में मेरे लिये कोई अनुचित बात नहीं है। कुठौर ( कुअवसर )_में श्रेष्ठ भाई ही सहायक होते हैं। वज्र के आघात भी हाथ से ही रोके जाते हैं।

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिब होइ। तुलसी प्रीति की रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।। _अर्थ_सेवक हाथ, पैर और नेत्रों के समान और स्वामी मुख के समान होना चाहिये। तुलसीदासजी कहते हैं कि  सेवक_स्वामी की ऐसी प्रीति की रीति सुनकर सुकबि उसकी सराहना करते हैं।

सभा सकल सुनि रघुबर बानी। प्रेम पयोधि अमिअं जनु सानी।। सिथिल समाज सनेहं समाधी। देखि दसा चुप सारद साधी।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी की वाणी सुनकर, मानो प्रेमरूपी समुद्र के ( मन्थन से निकले हुए ) अमृत में सनी हुई थी, सारा समाज शिथिल हो गया; सबको प्रेम समाधि लग गयी। यह दशा देखकर सरस्वती ने चुप साध ली।

भरतहिं भयउ परम संतोषू। सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू।।_अर्थ_मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू। भा जनु गूंगेहि गिरा प्रसादू।।_अर्थ_भरतजी को परम संतोष हुआ। स्वामी के (अनुकूल ) होते ही उनके दु:ख और दोषों ने मुख मोड़ लिया ( उन्हें छोड़कर भाग गये )। उनका मुंह प्रसन्न हो गया और मन का विषाद मिट गया। मानो गूंगे पर सरस्वतीकी कृपा हो गयी।

कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी। बोले पानी पंकरुह जोरी।। नाथ भयउ सुखु साथ गए को। लहेउं लाहु जग जनमु भए को।।_अर्थ_उन्होंने फिर प्रेमपूर्वक प्रणाम किया और करकमलों को जोड़कर वे बोले_हे नाथ ! मुझे आपके साथ जाने का सुख प्राप्त हो गया और मैंने जगत में जन्म लेने का लाभ भी पा लिया।

अब कृपाल जस आयसु होई। करौं सीस धरि सादर सोई।। सो अवलंब देव मोहि देती। अवधि पार पावौं जेहि सेई।।_अर्थ_ है कृपाल ! अब जैसी आज्ञा हो, उसी को मैं सिर पर धरकर आदरपूर्वक करूं। परंतु देव ! आप मुझे वह अवलम्ब ( कोई सहारा ) दें जिसकी सेवा कर मैं अवधि का पार पा जाऊं ( अवधि को बिता दूं ) ।

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ। आनेउं सब बिधि तीर्थ सलिलु तेहि कहं काह रजाइ।।_अर्थ_ है देव ! स्वामी ( आप ) के अभिषेक के लिये गुरुजी की आज्ञा पाकर मैं सब तीर्थों का जल लेता आया हूं; उसके लिये क्या आज्ञा होती है ?

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं। सभयं सकोच जात कहि नाहीं।। कहहु तात प्रभु आयसु पाई। बोले बानि सनेह सुहाई
।।_अर्थ_मेरे मन में एक और बड़ा मनोरथ है, जो भय और संकोच के कारण कहा नहीं जाता। ( श्रीरामचन्द्रजी ने कहा_) है भाई ! कहो। तब प्रभु की आज्ञा पाकर भरतजी स्नेहपूर्ण सुन्दर वाणी बोले_ ।

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन। खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन।। प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी। आयसु होई त आवौं देखी।।_अर्थ_आज्ञा हो तो चित्रकूट के पवित्र स्थान, तीर्थ, वन, पशु_पक्षी, तालाब_नदी, झरने और पर्वतों के समूह तथा विशेषकर प्रभु ( आप )_के चरण चिन्हों से अंकित भूमि को देख आऊं।

अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू। तात बिगतभय कानन चरहू।। मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता। पावन परम सुहावन भ्राता।।_अर्थ_( श्रीरघुनाथजी बोले_) अवश्य ही अत्रि ऋषि की आज्ञा को सिर पर धारण करो ( उनसे पूछकर वे जैसा कहें वैसा करो ) और निर्भय होकर वन में विचरण करो। हे भाई ! अत्रि मुनि के प्रसाद से वन मंगलों को देनेवाला, परम पवित्र और अत्यन्त सुन्दर है_।

रिषिनायकु जहं आयसु देहीं। राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं।। सुनि प्रभु बचन भरत सुखु पावा। मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा।।_अर्थ_और ऋषियों के प्रमुख अत्रिजी जहां आज्ञा दें, वहीं ( लाया हुआ ) तीर्थों का जल स्थापित कर देना। प्रभु का वचन सुनकर भरतजी ने सुख पाया और आनंदित होकर मुनि अत्रिजी के चरणकमलों में सिर नवाया।

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल। सुर स्वारथी सराहि कुल बरसात सुरतरु फूल।।_अर्थ_समस्त सुन्दर मंगलों का मूल भरतजी और श्रीरामचन्द्रजी का संवाद सुनकर स्वार्थी देवता रघुकुल की सराहना करके कल्पवृक्ष के फूल बरसाने लगे।

Wednesday, 1 October 2025

अयोध्याकाण्ड

प्रभु पद पदुम पराग दोहाईं। सत्य सुकृति सुख सीव सुहाई।। सो करि कहुं हाए अपने की। रुचि जागत सोवत सपने की।।_अर्थ_प्रभु ( आप )_के चरणकमलों की रज, जो सत्य, सुकृति ( पुण्य ) और सुख की सुहावनी सीमा ( अवधि ) है, उसकी दुहाई करके मैं अपने हृदय को जागते, सोते और स्वप्न में में भी बनी रहनेवाली रुचि ( इच्छा ) कहता हूं।

सहज सनेहं स्वामि सेवकाई। स्वारथ छल बल चारि बिहाई।। क्या हम न सुसाहिब सेवा। सो प्रसादु जन पावै देवा।।_अर्थ_वह रुचि है_कपट, स्वार्थ और ( अर्थ_धर्म, काम_मोक्षरूप ) चारों फलों को छोड़कर स्वाभाविक प्रेम से स्वामी की सेवा करना। और आज्ञापालन के समान श्रेष्ठ स्वामी की और कोई सेवा नहीं है। हे देव ! अब वही आज्ञा रूप प्रसाद सेवक को मिल जाय।

अस कहि प्रेम बिबस में भारी। पुलक सरीर बिलोचन बारी।। प्रभु पद कमल इसे अकुलाई। समउ सनेह न सो कहि जाई।।_अर्थ_भरतजी ऐसा कहकर प्रेम के बहुत ही विवश हो गये। शरीर पुलकित हो उठा। नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर आया। अकुलाकर ( व्याकुल होकर ) उन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमल पकड़ लिये। उस समय को और स्नेह को कहा नहीं जा सकता।

कृपासिंधु सनमानि सुबानि। बैठिये समीप गहि पानी।। भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ। सिथिल सनेहं सभा रघुराऊ।।_अर्थ_कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी ने सुन्दर वाणी से भरतजी का सम्मान करके हाथ पकड़कर उनको अपने पास बिठा लिया। भरतजी की विनती सुनकर उनका स्वभाव देखकर सारी सभा और श्रीरघुनाथजी स्नेह से शिथिल हो गये।

रघुराउ सिथिल सनेहं साधु समाज सुनि मिथिला धनी। मन महुं सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी।। भरतहिं प्रसंसत बिबुध बरसात सुमन मानस मलिन से‌। तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी, साधुओं का समाज, मुनि वशिष्ठजी और मिथिलापति ननकजई प्रेम से शिथिल हो गये। सब मन_ही_मन श्रीभरतजी के भाईपन और उनकी भक्ति की अतिशय महिमा को सराहने लगे। देवता मलिन मन से भरतजी की प्रशंसा करते हुए उनपर फूल बरसाने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं _सब लोग भरतजी का भाषण सुनकर व्याकुल हो गये और ऐसे सकुचा गये जैसे रात्रि के आगमन से कमल।

देखि दुखारी दीन दुहुं समाज नर नारी सब। मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत।।_अर्थ_दोनों समाजों के सभी नर_नारियों को दिन और दु:खी देखकर महामलिन मन इन्द्र मरे हुए को मारकर अपना मंगल चाहता है।

कपट कुचालि सीवं सुरराजू। पर अकाज प्रिय आपन काजू।। काक समान पाकरिपु रीती। छली मलिन कतहुं न प्रतीती।।_अर्थ_ देवराज इन्द्र कपट और कुचाल की सीमा हैं। उसे प्यारी हानि और अपना लाभ ही प्रिय है। इन्द्र की रीति कौए के समान है। वह चली और मलिन_मन है, उसका कहीं किसी पर विश्वास नहीं है।

प्रथम कुमत करि कपटु संकेला। सो उचाटु सब कें सिर मेला।। सुर्खियां सब लोग बिमोहे। राम प्रेम अतिसय न बिछोहे
।।_अर्थ_पहले तो कुमत ( बुरा विचार ) करके कपट को बटोरा ( अनेक प्रकार के कपट का साज सजा )। फिर वह कपटजनित ) उचाट करके सिर पर बाल दिया। फिर देवमाता से सब लोगों को विशेष रूप से मोहित कर दिया। किन्तु श्रीरामचन्द्रजी के प्रेम से उनका अत्यंत बिछोह नहीं हुआ ( अर्थात् उनका श्रीरामजी के प्रति प्रेम कुछ तो बना ही रहा )।

भय उचाट बस मन थिर नाहीं। जन बन रुचि छन सदन सोहाहीं।। जुबिन मनोगति प्रजा दुखारी। सरित सिंधु संगम जनु बारी।।_अर्थ_भय और उचाट के वश किसी का मन स्थिर नहीं है। क्षण में उनकी वन में रहने की इच्छा होती है और क्षण में उन्हें घर अच्छे लगने लगते हैं। मन के इस प्रकार की दुविधामयी स्थिति से प्रजा दु:की हो रही है। मानो नदी और समुद्र के संगम का जल क्षुब्ध हो रहा है। ( जैसे नदी और समुद्र के संगम का जल स्थिर एक सननहीं रहता, कभी इधर आता और कभी उधर जाता है, उसी प्रकार की दशा प्रजा के मन की हो गयी। )

दुखित कतहुं परितोषु न लहहीं। एक एक सन मरमु न कहहीं।। लखि हियं हंसि कह कृपानिधानू। सरिस स्वान भगवान जुबानू।।_अर्थ_चित्त दोतरफा हो जाने से वे कहीं संतोष नहीं पाते और एक_दूसरे से अपना मर्म भी नहीं कहते। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी यह दशा देखकर हृदय में हंसकर कहने लगे_कुत्ता, इन्द्र और नवयुवक ( कामी पुरुष ) एक_सरीखे ( एक ही स्वभाव के )  हैं। पाणिनीय व्याकरण के अनुसार श्वन्, युवन् और मधवन् शब्दों के रूप भी एक_सरीखे होते हैं।)

भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ। लागी देवमाता सबहिं जथाजोगु जनु पाइ।।_अर्थ_भरतजी, जनकजी, मुनिजन, मंत्री और ज्ञानी साधु_संतों को छोड़कर अन्य सभी पर जिस मनुष्य को जिस योग्य ( जिस प्रकृति और जिस स्थिति का )पाया, उसपर उसपर वैसे ही देवमाता लग गयी।

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे। निज सनेहं सुरपति छल भारे।। सभा राउ गुर महिसुर मंत्री। भरत भगति सब को मति जंत्री।।_अर्थ_ कृपासिंधु श्रीरामचन्द्रजी ने लोगों को अपने स्नेह और देवराज इन्द्र के भारी छल से दु:खी देखा। सभा, राजा जनक, गुरु, ब्राह्मण और मंत्री आदि सभी की बुद्धि को भरतजी की भक्ति ने कुल कर दिया।

रामहि चितवत चित्र लिखे से। सकुचत बोलत बचन सिखे से।। भरत प्रीति अति बिनय बड़ाई। सुनत सुखद बरनत कठिनाई।।_अर्थ_सब लोग चित्रलिखे_से श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख रहे हैं। सकुचाते हुए सिखाये हुए_से वचन बोलते हैं। भरतजी की प्रीति, नम्रता, विनय और बड़ाई सुनने में सुख देनेवाली है, पर उसके वर्णन करने में कठिनता है।

जासु बिलोकि भगति लवलेसू। प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू।। महिमा तासु कहे किमि तुलसी। भगति सुभायं सुमति हियं हुलसी।।_अर्थ_जिनकी भक्ति का लवलेस देखकर मुनिगन और मिथिलेश्वर जनकजी प्रेम में मग्न हो गये, उन भरतजी की महिमा तुलसीदास कैसे कहें ? उनकी भक्ति और सुन्दर भावसे ( कवि के ) हृदय में सुबुद्धि हुलस रही है ( विकसित हो रही है )।

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी। कबिकुल कानि मानि सकुचानी।। कहां न सकता गुन रुचि अधिकाई। मति गति बाल बचन की नाई।।_अर्थ_परन्तु वह बुद्धि अपने को छोटी और भरतजी की महिमा को बड़ी जानकर कवि परम्परा की मर्यादा को मानकर सकुचा गयी ( उसका  वर्णन करने का साहस नहीं कर सकी )। उसकी गुणों में रुचि तो बहुत है; पर उन्हें कह नहीं सकती। बुद्धि की गति बालक के वचनों की तरह हो गयी ( वह कुण्ठित हो गयी )।

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि। उदित बिमल जन हृदय  नभ एकटक रही निहारि।।_अर्थ_ भरतजी का निर्मल यश निर्मल चन्द्रमा है और कवि की बुद्धि चकोरी है, जो भक्तों के हृदय रूपी निर्मल आकाश में उस चन्द्रमा को उदित देखकर उसकी ओर टकटकी लगाये देखती ही रह गयी है ( तब उसका वर्णन कौन करे ? )।

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूं। लघु मति चापलता कबि छमहूं।। कहत सुनत संता भाई भरत को। सीय राम पद होई न रत को।।_अर्थ_भरतजी के स्वभाव का वर्णन वेदों के लिये भी सुगम नहीं है। ( अतः ) मेरी तुच्छ बुद्धि की चंचलता को कवि लोग क्षमा करें !  भरतजी के सद्भाव 
 को कहते_सुनते कौन मनुष्य श्रीसीतारामजी के चरणों में अनुरक्ति न हो जायगा।

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को। जेहिं न सुलभु  तेहि सरिस बाम को।।  देखि दयाल दसा सबही की। राम सुजान जानि जन जी की।।_अर्थ_भरतजी का स्मरण करने से जिसको श्रीरामजी का प्रेम सुलभ न हुआ, उसके समान वाम ( अभागा ) और कौन होगा ? दयालु और सुजान श्रीरामजी ने सभी की दशा देखकर और भक्त ( भरतजी )_के हृदय की स्थिति जानकर_।

धर्म धुरीन धीर जय नागर। सत्य सनेह सील गुन सागर।। देसु कालु लखि समउ समाजू। नीति प्रीति पालक रघुराजू।।_अर्थ_धर्मधुरंधर, धीर, नीति में चतुर, समय, स्नेह सील और सुख के समुद्र, नीति और प्रीति को पालन करनेवाले श्रीरघुनाथजी देश, काल और अवसर को देखकर;


बोले बचन बानी सरबसु से। हित परिनाम सुनत ससि रही से।। तात भरत तुम्ह धरम धुरीना। लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना।।_अर्थ_( तदनुसार ) ऐसे वचन बोले जो मानो वाणी के सर्वस्व ही थे, परिणाम में हितकारी थे और सुनने में चन्द्रमा के रस ( अमृत )_सरीखे थे। ( उन्होंने कहा_) हे तात भरत ! तुम धर्म की धूरी को धारण करनेवाले हैं, लोक और वेद दोनों के जाननेवाले और प्रेम में प्रवीण हो।

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात। गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयं किमि कहि जात।।_अर्थ_हे तात ! कर्म से, वचन से और मन से निर्मल तुम्हारे समान तुही हो। गुरुजनों के समाज में और ऐसे कुसमय में छोटे भाई के गुन किस तरह कहे जा सकते हैं ?

जानहु तात तरनि कुल रीती। सत्यसंध पितु कीरति प्रीती।। समउ समाजु लाज गुर्जन की। उदासीन हित अनहित मन की।।_अर्थ_हे तात ! तुम सूर्यकुल की रीति को, सत्यरतिज्ञ पिताजी की कीर्ति और प्रीति को, समय, समाज और गुरुजनों की लज्जा ( मर्यादा )_को तथा उदासीन, मित्र और शत्रु सके मन की बात जानते हो।

Monday, 8 September 2025

अयोध्याकाण्ड

समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।। जनक भरत संबादु सुनाई । भरत कहाउति कही सुहाई।।_अर्थ_तब रघुकुल के पुरोहित वशिष्ठजी समय, समाज और धर्म के अवइरओधई ( अर्थात् अनुकूल ) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजी का संवाद सुनाया। फिर भरतजी की कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायीं।

तात राम जस आयसु देहू। सो सबु करै मोर मत एहू।। सुनि रघुनाथ जोरी जुग पानी। बोले सत्य सरल मृदु बानी।_अर्थ_( फिर बोले_) है तात राम ! मेरा मत तो यह है कि तुम जैसी आज्ञा दो, वैसी ही सब करें ! यह सुनकर दोनों हाथ जोड़कर श्रीरघुनाथजी सत्य, सरल और कोमल वाणी बोले_

विद्यमान आपुनि मिथिलेसू। मोर कहब सब भांति भदेसू।। राउर राय रजायसु होई। राउरि सपथ सही सिर सोई।।_अर्थ_ आपके और मिथिलेश्वर जनकजी के विद्यमान रहते मेरा कुछ कहना सब प्रकार से भद्दा ( अनुचित ) है। आपकी और महाराज की जो आज्ञा होगी, मैं आपकी शपथ करके कहता हूं वह सत्य ही सबको शिरोधार्य होगी।

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत। बिकल बिलोकर भरत मुखु बना न ऊतरु देत।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी की शपथ सुनकर सभा समेत मुनि और जनकजी सकुचा गये ( स्तम्भित रह गये )। किसी से उत्तर देते नहीं बनता, सबलोग भरतजी का मुंह ताक रहे हैं।

सभा सकुच बस भरत निहारी। राम बन्धु धरि धीरज भारी।। कुसमउ देखि सनेहु संभारा बिंधि जिमि घटज निवारा।।_अर्थ_ भरतजी ने सभा को संकोचवश देखा। राम बन्धु ( भरतजी ) ने बड़ा भारी धीरज धरकर और कुसमय देखकर अपने ( उमड़ते हुए ) प्रेम को संभाला, जैसे बढ़ते हुए विंध्याचल को अगस्त जी ने रोका था।

सोक कनकलोचन मति छोनी। हरी बिमल गुन गन जगजोनी।। भरत बिबेक सराहन बिसाला। अनायास चौधरी तेहि काला।।_अर्थ_ शोक रुपी हिरण्याक्ष ने ( सारी सभा की ) बुद्धि रुपी पृथ्वी को हर लिया जो विमल गुणसमूहरूपी जगत् की योनि ( उत्पन्न करनेवाली ) थी। भरतजी के विवेकरूपी विशाल बराह ( वराहरूपधारी भगवान् )_ने ( शोक रुपी हिरण्याक्ष को नष्ट कर दिया ) बिना ही परिश्रम उसका उद्धार कर दिया।

करि प्रनामु सब कहं कर जोरे। रामु राउ गुर साधु निहोरे।। छमब आजु अति अनुचित मोरा। कहउं बदन मृदु बचन कठोरा।।_अर्थ_ भरतजी ने प्रणाम करके सबके प्रति हाथ जोड़े तथा श्रीरामचन्द्रजी, राजा जनकजी, गुरु वशिष्ठजी  और साधु_संत सबसे विनती की और कहा_आज मेरे इस अत्यन्त अनुचित वर्ताव को क्षमा कीजिएगा। मैं कोमल ( छोटे ) मुख से कठोर ( धृष्टता पूर्ण ) वचन कह रहा हूं।

हियं सुमिरि सारदा सुहाई। मानस में मुख पंकज आई।। बिमल बिबेक धर्म नय साली। भरत भारती मंजु मराली।।_अर्थ_ फिर उन्होंने हृदय में सुहावनी सरस्वतीजी का स्मरण किया। वे मानस से ( उनके मन रुपी मानसरोवर से ) उनके मुखारविंद पर आ विराजीं। निर्मल विवेक, धर्म और नीति से युक्त भरतजी की वाणी सुन्दर हंसिनी ( के समान गुण_दोष का विवेचन करनेवाली ) है।

निरखि बिबेक बिलोचन्हि सिथिल सनेहं समाजु। करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु।।_अर्थ_विवेक के नेत्रों से सारे समाज को प्रेम से शिथिल देख, सबको प्रणाम कर, श्रीसीताजी और श्रीरघुनाथजी का स्मरण करके भरतजी बोले_

प्रभु पितु मातु सुहृद गुर स्वामी। पूज्य परम हित अंतरजामी।। सरत्न सुसाहिबु सील निधानू। प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू।।_अर्थ_हे प्रभु ! आप पिता, माता  सुहृद् ( मित्र ), गुरु, स्वामी, परम हितैषी और अन्तर्यामी हैं। सरल हृदय, श्रेष्ठ मालिक, शील के भण्डार, शरणागत की रक्षा करनेवाले, सर्वज्ञ, सुजान,

समरथ  सरनागत हितकारी। गुनगाहकु अवगुन अघ हारी।। स्वामि गोसांइहिं सरिस गोसाईं। मोहि समान मैं साईं दोहाईं।।_अर्थ_समर्थ, शरणागत का हित करनेवाले, गुणों का आदर करनेवाले और अवगुणों तथा पापों को हरनेवाले हैं। हे गोसाईं ! आप सरीखे स्वामी आप ही हैं और स्वामी से द्रोह करने में मेरे समान मैं ही हूं।

प्रभु पितु बचन मोह बस पेली। आयीं इंसान समाजु सकेली।। जग भला पोच ऊंच अरु नीचू। अमिअ अमरपद माहुरु मीचू।।_अर्थ_ मैं मओहवश प्रभु ( आप )_ के और पिताजी के वचनों का उल्लंघन कर और समाज बटोरकर यहां आया हूं। जगत् में भले_बुरे, ऊंचे और नीचे अमृत और अमरपद ( देवताओं का पद ), विष और मृत्यु आदि_

राम रजाइ मेट मन माहीं। देखा सुना कतहुं कोई नाहीं।। सो मैं सब बिधि कीन्ह ढ़िठाई। प्रभु मानी सनेह सेवकाई।।_अर्थ_किसी को भी कहीं ऐसा नहीं देखा_सुना जो मन में भी श्रीरामचन्द्रजी ( आपकी ) आज्ञा को भेंट दे। मैंने सब प्रकार से वही ढ़िठाई की, परन्तु प्रभु ने उस ढ़िठाई को स्नेह और सेवा मान लिया।

कृपां भलाईं अपनी नाथ कीन्ह भल मोर।दूषन में दूषन सुजसु चारु चहुं ओर।।_अर्थ_हे नाथ ! आपने अपनी कृपा और भलाई से मेरा भला किया, जिससे मेरा दूषण ( दोष ) भी भूषण ( गुण )_के समान  हो गये और चारों ओर मेरा यश छा गया।

राउरि रीति सुबानि बड़ाई। जगत विदित निगमागम गाई। कूल कुटिल खल कुमति कलंकी। नीच निसील निरीस निसंकी।।_अर्थ_हे नाथ ! आपकी रीति और सुन्दर स्वभाव की बड़ाई जगत् में प्रसिद्ध है और वेद_शास्त्रों ने गायी है। जो क्रूर, कुटिल, दुष्ट, कुबुद्धि, कलंकी, नीच, शईलरहइत, निरीश्वरवादी ( नास्तिक) और नि:शंख ( निडर ) है।


तेउ सुनि सरन सामुहें आए। सुकृति प्रनामु किहें अपनाए।। देखि दोष कबहुंक न उर आने। सुनि गुन साधु समाज बखाने।।_अर्थ_उन्हें भी आपने शरण में सम्मुख आया सुनकर एक बार प्रणाम करने पर ही अपना लिया। उन ( शरणागतों )_ के दोषों को देखकर भी आप कभी हृदय में नहीं लाये और उनके गुणों को सुनकर साधुओं के समाज में उनका बखान किया।

को साहिब सेवकहि नेवाजी। आपु समाज साथ सब साजी।। निज करतूति न समुझिअ सपनें। सेवक सकुच सोचु उर अपनें।।_अर्थ_ऐसा सेवक पर कृपा करनेवाला स्वामी कौन है जो आप ही सेवक का सारा साज_समान से दे ( उसकी सारी आवश्यकताओं को पूर्ण कर दे ) और स्वप्न में भी अपनी कोई करनी न समझकर ( कर।थात् मैंने सेवक के लिये कुछ किया है ऐसा न समझकर ) उलटा सेवक को संकोच होगा, इसका सोच अपने हृदय में रखे।

सो गोसाईं नहिं दूसरे कोपी। भुजा उठाइ कहउं पन रोपी।।  पसु नाचते सुख पाठ प्रबीना। गुन गति नट पाठक आधीना।।_अर्थ_मैं भुजा उठाकर और प्रण रोपकर ( बड़े जोर के साथ ) कहता हूं, ऐसा स्वामी आपके सिवा दूसरा कोई नहीं है।
( बंदर आदि ) पशु नाचते और तोते ( सीखें हुए ) पाठ में प्रवीण हो जाते हैं। परन्तु तोते का ( पाठप्रवीणतारूप ) गुण और पशु के नाचने की गति ( क्रमशः ) पढ़ानेवाले और नचानेवाले के अधीन है।

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर। को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर।।_अर्थ_इस प्रकार अपने सेवकों की ( बिगड़ी ) बात सुधारकर और सम्मान देकर आपने उन्हें साधुओं का शिरोमणि बना दिया। कृपालु ( आप )_के सिवा अपनी विरदावली का और कौन जबर्दस्ती ( हठपूर्वक ) पालन करेगा ?

सोक सनेहं कि बाल सुभाएं। आयउं लाइ रजायसु बाएं।। तबहुं कृपाल हेरि निज ओरा। सबहिं भांति भल  मानेउ मोरा।।_मैं शोक से या स्नेह से या बालक स्वभाव से आज्ञा को बाएं लाकर ( न मानकर ) चला आया, तो भी कृपालु स्वामी ( आप )_ने अपनी ओर देखकर सभी प्रकार से मेरा भला ही माना ( इस अनुचित कार्य को अच्छा ही समझा )।

देखउं पाय सुमंगलमूला। जानेंउ स्वामि सहज अनुकूला।। बड़े समाज बिलोकउं भागू। बड़ी चूक साहिब अनुरागू।।_अर्थ_मैंने सुन्दर मंगलों के मूल आपके चरणों का दर्शन किया, और यह जान लिया कि स्वामी मुझपर स्वभाव से ही अनुकूल हैं। इस बड़े समाज में अपने भाग्य को देखा कि इतनी बड़ी चूक होने पर भी स्वामी का मुझपर कितना अनुराग है।

कृपा अनुग्रहु अंगु अघाई। कीन्ह कृपानिधि सब अधिकाई।। राखा मोर दुलार गोसाईं। अपने सील सुभायं बड़ाई।।_अर्थ_कृपानिधान ने मुझपर सांगोपांग भरपेट कृपा और अनुग्रह, सब अधिक ही किये हैं ( अर्थात् मैं जिसके जरा भी लायक नहीं था उतनी अधिक सर्वांगपूर्ण कृपा आपने मुझपर की है )। हे गोसाईं ! आपने अपने शील, स्वभाव और भलाई से मेरा दुलार रखा।

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई। स्वामि समाज सकोच बिहारी।। अभिनय बिनय जथारुचि बानी। तमसा देऊ अति आरती जानी।।_अर्थ_ है नाथ ! मैंने स्वामी और समाज के संकोच को छोड़कर अभिनय या वइनयभरई जैसी रुचि हुई वैसी ही वाणी कहकर सर्वथा ढ़िठाई की है। हे देव ! मेरे आर्तभआव ( आतुरता )_को जानकर आप क्षमा करेंगे।

सुहृदं सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ी खोरि। आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारि मोरि।।_अर्थ_सुहृद ( बिना ही हेतु के हित करनेवाले ), बुद्धिमान और श्रेष्ठ मालिक से बहुत कहना बड़ा अपराध है। इसलिये हे देव ! अब मुझे आज्ञा दीजिये, आपने मेरी सभी बात सुधार दी।



Saturday, 16 August 2025

अयोध्याकाण्ड

राम बचन गुरु नृपहिं सुनाए। सील स्नेह सुभायं सुहाए। महाराज अब कीजिअ सोई। सब कर धर्म सहित हित होई।।_अर्थ_गुरुजी ने श्रीरामचन्द्रजी के शील और स्नेह से युक्त स्वभाव से ही सुन्दर वचन राजा जनकजी को सुनाये ( और कहा_ ) हे महाराज ! अब वही कीजिये जिसमें सबका धर्म सहित हित हो।

ग्यान निधान सुजान सुचि धर्मवीर नरपाल। तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल ।।_अर्थ_हे राजन् ! तुम ग्यान के भण्डार, सुजान, पवित्र और धर्म में धीर हो। इस समय तुम्हारे बिना इस  दुविधा को दूर करने में और कौन समर्थ है ?

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे। लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे।। सिथिल सनेहं गुनत मन माहीं। आए यहां कीन्ह भल नाहीं।।_अर्थ_ मुनि वशिष्ठजी के वचन सुनकर जनकजी प्रेम में मग्न हो गये। उनकी दशा देखकर ग्यान और वैराग्य को भी वैराग्य हो गया ( अर्थात् उनके ज्ञान_वैराग्य छूट_से गये ) वे प्रेम से शिथिल हो गये और मन में विचार करने लगे कि हम यहां आये, यह अच्छा नहीं किया।

रामहिं रांय कहेउ बन जाना। कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना।। हम अब बन तें बनहि पठाई। प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई।।_अर्थ_राजा दशरथ जी ने श्रीरामचन्द्रजी को वन में जाने के लिये कहा और स्वयं अपने प्रिय के प्रेम को प्रमाणित ( सच्चा ) कर दिया ( प्रिय वियोग में प्राण त्याग दिये )। परन्तु अब इन्हें वन से ( और गहन ) वन को भेजकर अपने विवेक की बड़ाई में आनन्दित होते हुए लौटेंगे ( कि हरमें जरा भी मोह नहीं है; हम श्रीरामजी को वन में छोड़कर चले आये, दशरथ जी की तरह मरे नहीं ! )

तापस मुनि महिसुर सुनि देखी। भए प्रेमबस बिकल बिसेषी।। समउ समुझि धरि धीरजु राजा। चले भरत पहिं सहित समाजा।।_अर्थ_ तपस्वी, सुनि और ब्राह्मण सब यह सुन और देखकर प्रेमवश बहुत ही व्याकुल हो गये। समय का विचार करके राजा जनकजी धीरज धरकर समाजसहित भरत के पास चले।

भरत आइ आगें भइ लीन्हे। अवसर सरिस सुआसन दीन्हे।। तात भरत कह तेरहुति राऊ। तुम्हहिं विदित रघुबीर सुभाऊ।।_अर्थ_भरतजी ने आकर उन्हें आगे होकर लिया ( सामने आकर उनका स्वागत किया ) और समयानुकूल अच्छे आसन दिये। तेरहुतिराज जनकजी कहने लगे _हे तात भरत ! तुमको श्रीरामजी का स्वभाव मालूम ही है।

राम सत्यव्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु। संकट सहित सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी सत्यव्रती और धर्मपरायण हैं, सबका शील और स्नेह रखनेवाले हैं, इसीलिये वे संकोचवश संकट सह रहे हैं; अब तुम जो आज्ञा दो, वह उनसे कही जाय।

सुनि तन पुलक नयन भरी बारी। बोले भर्ती धीर धरि भारी।। प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू। कुल गुरु सम हित मार न बापू।।_अर्थ_भरतजी यह सुनकर पुलकशरीर हो नेत्रों में जल भरकर बड़ा भारी धीरज धरकर बोले_हे प्रभु ! आप हमारे पिता के समान प्रिय और पूज्य हैं। और कुल गुरु श्रीवशिष्ठजी के समान हितैषी तो माता_पिता भी नहीं है।

कौसिकादि मुनि सचिव समाजू। ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू।। सासु सेवकु आयसु अनुगामी। जानि मोहि सिख देइअ स्वामी।।_अर्थ_ विश्वामित्रजी आदि मुनियों और मंत्रियों का समाज है। और आज के दिन ग्यान के समुद्र आप भी उपस्थित हैं। हे स्वामी ! मुझे अपना बच्चा , सेवक और आज्ञानुसार चलनेवाला समझकर शिक्षा दीजिये।

एहिं समाज थल बूझब राउर। मौन मलिन मैं बोलब बाउर।। छोटे बदन कहौं बड़ि बाता। छमब तात लखि बाम बिधाता।।_अर्थ_इस समाज और ( पुण्य ) स्थल में आप ( जैसे ज्ञानी और पूज्य )_का पूछना ! इसपर यदि मौन रहता हूं तो मलिन समझा जाऊंगा; और बोलना पागलपन होगा तथापि मैं छोटे मुंह से बड़ी बात कहता हूं। हे तात ! विधाता को प्रतिकूल जानकर क्षमा कीजिएगा।

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना। सेवाधरमु कठिन जगु जाना।। स्वामि धर्म स्वारथहिं बिरोधू। बैरु अंध प्रेमहिं न प्रबोधू।।_अर्थ_वेद, शास्त्र और पुराणों में प्रसिद्ध है और जगत् जानता है कि सेवाधर्म बड़ा कठिन है। स्वामि धर्म में ( स्वामी के प्रति कर्तव्यपालन में ) और स्वार्थ में विरोध है ( दोनों एक साथ नहीं निभ सकते ) वैर अंधा होता है और प्रेम को ज्ञान नहीं रहता ( मैं स्वार्थवश कहूंगा या प्रेमवश, दोनों में ही भूल होने का भय है।

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि। सब करें संमत सिर्फ हित करिअ पेमु पहिचानि।।_अर्थ_अतएव मुझे पराधीन जानकर ( मुझसे न पूछकर ) श्रीरामचन्द्रजी के रुख ( रुचि ), धर्म और ( सत्य के ) व्रत को रखते हुए, जो सबके सम्मत और सबके लिये हितकारी है तो आप सबका प्रेम पहचानकर वही कीजिये।

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ। सहित समाज सराहत राऊ।। सुगम अगम मृदु मंजुल कठोरे। अरथु अमित अति आखर थोरे।।_अर्थ_भरतजी के वचन सुनकर और उनका स्वभाव देखकर समाजसहित राजा जनक उनकी सराहना करने लगे। भरतजी के वचन सुगम और अगम, सुन्दर, कोमल और कठोर हैं। उनमें अक्षर थोड़े हैं परन्तु अर्थ अत्यन्त अपार भरा हुआ है।

ज्यों मुखु मुकुर मुकुरु निज पानी। इसी न जाइ अस अदभुत बानी।। भूप भरत मुनि सहित समाजू। गए जहं बिबुध कुमुद द्विजराजू।।_अर्थ_ जैसे ( मुख का प्रतिबिम्ब दर्पण में दिखता है और दर्पण अपने हाथ में है, फिर भी वह ( मुख का प्रतिबिम्ब पकड़ा नहीं जाता, इसी प्रकार भरतजी की यह अद्भुत वाणी भी पकड़ में नहीं आती ( शब्दों से उसका आशय समझ में नहीं आता )। ( किसी से कुछ उत्तर देते नहीं बना ), तब राजा जनकजी, भरतजी तथा मुनि वशिष्ठजी समाज के साथ वहां गये जहां देवता रुपी कुमुदों को खिलानेवाले ( सुख देनेवाले ) चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी थे।

सुनि सुनि सोच बिकल सब लोगा। मनहुं मीनगन नव जल जोगा।। देवं प्रथम कुलगुर गति देखी। निरखि बिदेह सनेह बिसेषी।।_अर्थ_यह समाचार सुनकर सबलोग सोच से व्याकुल हो गये, जैसे नये ( पहली वर्षा के ) जल के संयोग से मछलियां व्याकुल होती हैं। देवताओं ने पहले कुलगुरू वशिष्ठजी की ( प्रेमविह्वल दशा देखी,फिर विदेहराज के विशेष स्नेह को देखा।

राम भगतिमय भरतु निहारे। सुर स्वार्थी हहरि हियं हारे।। सब कोई राम प्रेममय पेखा। भए अलेख सोचबस लेखा।।_अर्थ_और तब श्रीराम भक्ति से ओत-प्रोत भरतजी को देखा। इन सबको देखकर स्वार्थी देवता घबराकर हृदय में हार मान गये ( निराश हो गये )।  उन्होंनेसब किसी को श्रीराम प्रेम में सराबोर देखा। इससे देवता इतने सोच के वश हो गये कि जिसका कोई हिसाब नहीं।

रामु सनेह सकोचबस कह ससोच सुरराजु। राहु प्रपंचहिं पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु।।_अर्थ_ देवराज इन्द्र सोच में भरकर कहने लगे कि श्रीरामचन्द्रजी तो स्नेह स्नेह और संकोच के वश में हैं। इसलिये सबलोग मिलकर कुछ प्रपंच ( माया ) रचो; नहीं तो काम बिगड़ा ( ही समझो )।

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही। देबि देव संरचनागत पाहीं।। फेरी भरत मति करि निज माया। पाली बिबुध कुल करि छल छाया।।_अर्थ_ देवताओं ने सरस्वती का स्मरण कर उनकी सराहना ( स्तुति ) की और कहा _हे देवी ! देवता आपके शरणागत हैं, उनकी रक्षा कीजिये। अपनी माया रचकर भरतजी की बुद्धि को फेर दीजिये। और छल की छाया कर देवताओं के कुल का पालन ( रक्षा ) कीजिये।

बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी। बोली सुर स्वारथ जड़ जानी।। मैं सन कहहु भरत मति फेरूं। लोचन सहस न सूझ सुमेरू।।_अर्थ_ देवताओं की विनती सुनकर और देवताओं के स्वार्थ के वश होने से मूर्ख जानकर बुद्धिमती सरस्वतीजी बोलीं_मुझसे कह रहे हो कि भरतजी की मति पलट दो ! हजार नेत्रों से भी तुमको सुमेरु नहीं सूझ पड़ता।

बिधि हरि हर माया बड़ा भारी। सोउ न भरत गति सका निहारी।। सो मति मोहि कहत करु भोरी। चंदिनि कर कि चंडकर चोरी।।_अर्थ_ रस्ता, विष्णु और महेश की माया बड़ी प्रबल है। किन्तु वह भी भरतजी की बुद्धि की ओर ताक नहीं सकती। उस बुद्धि को, तुम मुझसे कह रहे हो कि बोली करदो ( भुलावे में डाल दो ) । अरे ! चांदनी कहीं प्रचंड किरण वाले सूर्य को चुरा सकती है ?

भरत हदय श्रीराम निवासू। तहं कि तिमिर जहं तरनि प्रकासू।। अस कहि सारद गई बिधि लोका। बिबुध बिकल निसि मानहुं कोका।।_अर्थ_भरतजी के हृदय में श्रीसीतारामजी का निवास है। जहां सूर्य का प्रकाश है, वहां कहीं अंधेरा रह सकता है ? ऐसा कहकर सरस्वतीजी ब्रह्मलोक को चली गयीं। देवता ऐसे व्याकुल हुए जैसे रात्रि में चकवा व्याकुल होता है।

सुर स्वार्थी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु। रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु।।_अर्थ_मलिन मन वाले स्वार्थी देवताओं ने बुरी सलाह करके बुरा ठाट ( षड्यंत्र ) रचा। प्रबल मायाजाल रचकर भय, भ्रम, अप्रीति और उच्चाटन फैला दिया।

करि कुचालि सोचत सुरराजू। भरत हाथ सभी काजु अकाजू।। गए जनकु रघुनाथ समीपा। सनमाने सब रबिकुल दीपा।।_अर्थ_कुचाल करके देवराज इन्द्र सोचने लगे कि काम का बनना_बिगड़ना सब भरतजी के हाथ है। इधर राजा जनकजी ( मुनि वशिष्ठ आदि के साथ ) श्रीरघुनाथजी के पास गये। सूर्यकुल के दीपक श्रीरामचन्द्रजी ने सबका सम्मान किया।

समय समाज धरम अबिरोधा। बोले तब रघुबंस पुरोधा।। जनक भरत संबादु सुनाई । भरत कहाउति कही सुहाई।।_अर्थ_तब रघुकुल के पुरोहित वशिष्ठजी समय, समाज और धर्म के अवइरओधई ( अर्थात् अनुकूल ) वचन बोले। उन्होंने पहले जनकजी और भरतजी का संवाद सुनाया। फिर भरतजी की कही हुई सुन्दर बातें कह सुनायी।



Tuesday, 22 July 2025

अयोध्याकाण्ड

जनक राम गुर आयसु पाई। चले थलहइं सिय देखी आई।। लीन्ह लाइ उर जनक जानकी। पाहुनी पावन पेम प्रान की।।_अर्थ_जनकजी श्रीरामजी के गुरु वशिष्ठजी की आज्ञा पाकर डेरे को चले और आकर उन्होंने सीताजी को देखा। जनकजी ने अपने पवित्र प्रेम और प्राणों की पाहुनी जानकीजी को हृदय से लगा लिया।

उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू। भयउ भूप मनु मनहुं पयागू।। सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा। ता पर राम पेम सिसु सोहा।।_अर्थ_उनके हृदय में ( वात्सल्य ) प्रेम का समुद्र उमड़ पड़ा। राजा का मन मानो प्रयाग हो गया। उस समुद्र के अंदर उन्होंने ( आदिशक्ति ) सीताजी के ( अलौकिक) स्नेह रूपी अक्षय वट को बढ़ते हुए देखा। उस ( सीताजी के प्रेमरूपी वट )_पर श्रीरामजी का प्रेमरूपी बालक ( बालरूपधारी भगवान् ) सुशोभित हो रहा है।

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु। बूड़ती लहेउ बाल अवलंबनु।। मोह मगन मति नहिं बिदेह की। महिमा सिय रघुबर स्नेह की।।_अर्थ_जनकजी का ज्ञानरूपी चिरंजीवी ( मार्कण्डेय मुनि व्याकुल होकर डूबते_डूबते मानो उस श्रीरामप्रेमरूपी बालक का सहारा पाकर बच गया। वस्तुत: ( ज्ञानशिरोमणि ) विदेहराज की बुद्धि मोह में मग्न नहीं है। यह तो श्रीसीतारामजी के प्रेम की महिमा है ( जिसने उन जैसे महान् ज्ञानी के ज्ञान को भी विकल कर दिया )।

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी संभारि। धरनिसुतां धीरजु धरएउ समउ सुधरमु बिचारि।।_अर्थ_पिता_माता के प्रेम के मारे सीताजी ऐसी विकल हो गयीं कि अपने को संभाल न सकीं। ( परन्तु परम धैर्यवती ) पृथ्वी की कन्या सीताजी ने समय और सुन्दर धर्म का विचार कर धैर्य धारण किया।

तापस बेष जनक सिय देखी। भयउ पेमु परितोषु बिसेषी।। पुत्री पित्र किए कुल दोऊ। सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ।।_अर्थ_सीताजी को तपस्विनी_वेष में देखकर जनकजी को विशेष प्रेम और संतोष हुआ। (उन्होंने कहा__) बेटी ! तूने दोनों कुल पवित्र कर दिये। तेरे निर्मल यश से सारा जगत् उज्जवल हो रहा है; ऐसा सब कोई कहते हैं।

जिमि सुरसरि कीरति सरि तोरी। गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी।। गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे। एहिं किए साधु समाज घनेरे।।_अर्थ_तेरी कीर्तिरूपी नदी देवनदी गंगाजी को भी जीतकर ( जो एक ही ब्रह्माण्ड में बहती है) करोड़ों ब्रह्मांडों में बह चली है। गंगाजी ने तो पृथ्वी पर तीन ही स्थानों ( हरिद्वार, प्रयागराज और गंगासागर)_को बड़ा ( तीर्थ ) बनाया है। पर तेरी इस कीर्तिनगर ने तो अनेकों संतसमआजरूपई तीर्थस्थान बना दिये हैं।

पितु कह सत्य सनेह सुबानी। सीयं सकुच महुं मनहुं समानी।। पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई। सिख असीस हित दीन्ह सुहाई।।_अर्थ_पिता जनकजी ने तो स्नेह से सच्ची सुन्दर वाणी कहीं। परन्तु अपनी बड़ाई सुनकर सीताजी मानो संकोच में समा गयीं। माता_पिता ने उन्हें फिर हृदय से लगा लिया और हितभरी सुदर सीख और अशीष दी।

कहति न सीय सकुचि मन माहीं। कहां बसब रजनी भल नाहीं।। लखि रुख रानी जनायउ राऊ। हृदयं सराहत सीलु सुभाऊ।।_अर्थ_सीताजी कुछ कहती नहीं हैं परन्तु मन में सकुचा रही हैं कि रात में ( सासुओं की सेवा छोड़कर ) यहां रहना अच्छा नहीं है। रानी सुनयनाजी ने जानकीजी का रुख देखकर ( उनके मन की बात समझकर ) राजा जनकजी को जना दिया। तब दोनों अपने हृदय में सीताजी के शील और स्वभाव की सराहना करने लगे।

बार बार मिलि भेंटि सिय बिदा कीन्हि सनमानि। कही समय सिर भरत गति रानी सुबानि सयानी।।_अर्थ_ राजा_रानी ने बार_बार मिलकर और हृदय से लगाकर तथा सम्मान करके सीताजी को विदा किया। चतुर रानी ने समय पाकर राजा से सुन्दर वाणी में भरतजी की दशा का वर्णन किया।

सुनि भूपाल भरत व्यवहारू। सोन सुगंध सुधा ससि सारू।। मूदे सजन नयन पुलके तन। सुजसु सराहन लगे मुदित मन।।_अर्थ_सोने में सुगंध और ( समुद्र से निकाली हुई ) सुधा में चन्द्रमा के साथ अमृत के समान भरतजी का व्यवहार सुनकर राजा ने ( प्रेमविह्वल ) होकर अपने ( प्रेमाश्रुओं के ) जल से भरे नेत्रों को मूंद लिया। ( वे भरतजी के प्रेम में मानो ध्यानस्थ हो गये )। वे शरीर से पुलकित हो गये और मन में आनंदित होकर भरतजी के सुंदर यश की सराहना करने लगे।

सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनी। भरत कथा भव बंधन बिमोचनी।। धरम राजनय ब्रह्मबिचारू। कहां जथामति मोर प्रचारू।।_अर्थ_( वे बोले )_हे सुमुखि ! हे सुनयनी ! सावधान होकर सुनो। भरतजी की कथा संसार के बन्धन से छुड़ाने वाली है। धर्म, राजनीति और ब्रह्मविचार_ इन तीनों विषयों में अपनी बुद्धि के अनुसार मेरी ( थोरी_बहुत ) गति है ( अर्थात् इनके सम्बन्ध में, मैं कुछ नहीं जानता हूं )

सो मति मोरी भरत महिमा ही। कहे काह छवि छुअति न छांही।। बिधि गणपति अहिपति सिव सारद। कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद।।_अर्थ_वह ( धर्म, राजनीति और ब्रह्मज्ञान में प्रवेश रखनेवाली ) मेरी बुद्धि भरतजी की महिमा का वर्णन तो क्या करें, छल करके उसकी छाया तक को छू नहीं पाती ! ब्रह्माजी, गणेशजी, शेषजी, महादेवजी, सरस्वतीजी, कवि, ज्ञानी, पण्डित और बुद्धिमान _

भरत चरित कीरती करतूती। धरम सील गुन बिमल बिभूती।। समुझत सुनते सुखद सब काहू। सुचि सुरसरि रुचि निद्रा सुधाहू।।_अर्थ_ सब किसी को भरतजी के चरित्र, कीर्ति, करनी, धर्मशील, गुण और निर्मल ऐश्वर्य समझने में और सुनने में सुख देनेवाले हैं और पवित्रता में गंगाजी का स्वाद ( मधुरता )_में अमृत का भी तिरस्कार करनेवाले हैं।

निरवधि गुन निरुपम षउरउषउ भरतु भरत सम जानि।। कहिअ सुमेरु कि सेर हम कबिकुल मति सकुचानि।।_अर्थ_भरतजी असीम गुणसम्पन्न और उपमारहित पुरुष हैं। भरतजी के समान बस भरतजी ही हैं, ऐसा जानो। सुमेरु पर्वत को क्या सेर के बराबर कह सकते हैं ? इसलिये ( उन्हें किसी पुरुष के साथ उपमा देने में ) कवि समाज की बुद्धि भी सकुचा गई।

अगम सबहि  बरनत बरबरनी। जिमि जलहीन मीन गमु धरनी।। भरत अमित महिमा सुनु रानी। जानहिं रामु न सकहीं बखानी।।_अर्थ_हे श्रेष्ठ वर्णवाली ! भरतजी की महिमा का वर्णन करना सभी के लिये वैसे ही अगम है जैसे जलरहित द्वीप पर मछली का चलना। हे रानी ! सुनो, भरतजी की अपरिमित महिमा को एक श्रीरामचन्द्रजी ही जानते हैं; किन्तु वे भी उसका वर्णन नहीं कर सकते।

बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ। तिय जियं की रुचि लखि कह राऊ।। बहुरहिं लखनउ भरतु बन जाहीं। सब कर भल सबके मन माहीं।।_अर्थ_इस प्रकार प्रेमपूर्वक भरतजी के प्रभाव का वर्णन करके, फिर पत्नी के मन की रुचि जानकर राजा ने कहा_ लक्ष्मणजी लौट जायें और भरतजी वन को जायं, इसमें सभी का भला है और यही सबके मन में है।

देबि परंतु भरत रघुबर की। प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकीं।। भरतु अवधि सनेह ममता की। यद्यपि रामु सीम समता की।।_अर्थ_परंतु हे देवि ! भरतजी और श्रीरामजी का प्रेम और एक_दूसरे पर विश्वास, बुद्धि और विचार की सीमा में नहीं आ सकता। यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी समता की सीमा हैं तथापि भरतजी प्रेम और ममता कईं सीमा हैं।

परमारथ स्वारथ सुख सारे। भरत न सपनेहुं मनहुं निहारे।। साधन सिद्धि राम पग नेहू। मोहि लखि परत भरत मत एहू।।_अर्थ_( श्रीरामचन्द्रजी के प्रति अनन्य प्रेम को छोड़कर) भरतजी ने समस्त परमार्थ, स्वार्थ और सुखों की ओर स्वप्न में भी मन से नहीं ताका है। श्रीरामजी के चरणों में प्रेम ही उनका साधन है और वही सिद्धि है। मुझे तो भरतजी का बस एकमात्र सिद्धांत जान पड़ता है।

भोरेहुं भरत न पेलिहहिं मनसहुं राम रजाइ। करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ।।_अर्थ_ राजा ने बिलखकर ( प्रेम से गद्गद् होकर ) कहा_भरतजी भूलकर भी श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा को मन से भी नहीं टालेंगे। अतः स्नेह के वश होकर चिंता नहीं करनी चाहिये।

राम भरत गुन गनत सप्रीती। निसि दंपतिहिं पलक सम बीती।। राज समाज प्रात जुग जागे। न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे।_अर्थ_श्रीरामजी और भरतजी के गुणों की प्रेमपूर्वक गणना करते ( कहते_सुनते ) पति_पत्नी  को रात पलक के समान बीत गयी। प्रात:काल दोनों राज-समाज जागे और नहा_नहाकर देवताओं की पूजा करने लगे।

गए नहाइ गुर पहिं रघुराई। बंदि चरन बोले रुख पाई।। नाथ भरत पुरजन महतारी। सोक बिकल बनबास दुखारी।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी स्नान करके गुरु वशिष्ठजी के पास गये और चरणों की वन्दना कर उनका रुख पाकर बोले_हे नाथ ! भरत, अवध पुरवासी तथा माताएं, सब शोक से व्याकुल और लें हाथावनवास से दु:खी हैं।

सहित समाज राउ मिथिलेसू। बहुत दिवस में सहित कलेसू।। उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा। हित सबही कर रौरें हाथा।।_अर्थ_मिथिलापति राजा  जनकजी को भी समाजसहित क्लेश सहते बहुत दिन हो गये। इसलिये हे नाथ ! जो उचित हो वहीं कीजिये। आपही के हाथ सभी का हित है।

अस कहि अति सकुचे रघुराऊ। मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ।। तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा। नरक सरिस दुहुं राज समाजा।।_अर्थ_ऐसा कहकर श्रीरघुनाथजी अत्यन्त ही सकुचा गये। उनका सील स्वभाव देखकर ( प्रेम और आनन्द से मुनि वशिष्ठजी पुलकित हो गये। ( उन्होंने खुलकर कहा_) हे राम ! तुम्हारे बिना ( घर_बार आदि ) संपूर्ण सुखोंके साज दोनों राज-समाजों को नरक के समान हैं।

प्रान प्रान के जीव के जीव सुख के सुख राम। तुम्ह तजि तात सोहाती गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम।।_अर्थ_ हे राम ! तुम प्राणों के प्राण, आत्मा के भी आत्मा और सुख के भी सुख हो। हे तात ! तुम्हें छोड़कर जिन्हें घर सुहाता है, उन्हें विधाता विपरीत है।

सो सुख करमु धरमु जरिए जाऊ। जहं न राम पद पंकज भाऊ।। जोगु कुजोगु ग्यान अग्यानू। जहं नहिं राम पेम परधानू।।_अर्थ_ जहां श्रीराम के चरणकमलों में प्रेम नहीं है, वह सुख,  कर्म और धर्म जल जाय। जिसमें श्रीराम प्रेम की प्रधानता नहीं है, वह योग कुयोग है और ज्ञान अज्ञान है।

तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं। तुम्ह जानहु जिय जो जेहिं केहीं।। राउर आयसु सिर सबही कें। बिदित कऋपआलहइं गति सब नीके।।_अर्थ_तुम्हारे बिना ही सब दुखी हैं और जो सुखी हैं वे तुम्हीं से सुखी हैं। जिस किसी के जी में जो कुछ है वह सब तुम जानते हो। आपकी आज्ञा सभी के सिर पर है। कृपालु ( आप )_को सभी की स्थिति अच्छी तरह मालूम है।

आपु आश्रमहिं धारिअ पाऊ। भयऊ सनेह सिथिल मुनिराऊ।। करि प्रनामु तब रामु सिधाए। रिषि धरि धीर जनक पहिं आए।।_अर्थ _अत: आप आश्रम को पधारिये। इतना कह मुनिराज स्नेह से सिथिल हो गये । तब श्रीरामजी प्रणाम करके चले गये और ऋषि वशिष्ठजी धीरज धरकर जनकजी के पास आये।














Wednesday, 25 June 2025

अयोध्याकाण्ड

सादर सब कहं रामगुर पठए भरि भरि भार। पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करने फरहार।।_अर्थ_श्रीरामजी के गुरु वशिष्ठजी ने सबके पास बोझे भर_भरकर आदरपूर्वक भेजे। तब वे पितर, देवता, अतिथि और गुरु की पूजा करके फलाहार करने लगे।

एहि बिधि बासर बीते चारी। रामु निरखि नर नारि सुखारी।। दुहुं समाज अहि रुचि मन माहीं। बिनु सिय राम फिरि भल नाहीं।।_अर्थ_इस प्रकार चार दिन बीत गये। श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सभी नर_नारी सुखी हैं। दोनों समाजों के मन में ऐसी इच्छा है कि श्रीसीतारामजी के बिना लौटना अच्छा नहीं है।

सीता राम संग बनवासू। कोटि अमरपुर सहित सुपासू।। परिहरि लखन रामु बैदेही। जेहिं घरु भाव बाम बिधि तेही।।_अर्थ_श्रीसीतारामजी के साथ वन में रहना करोड़ों देवलोकों के ( निवास ) के समान सुखदायक है। श्रीलक्ष्मणजी, श्रीरामजी और श्रीजानकीजी को छोड़कर जिसको घर अच्छा लगे, विधाता उसके विपरीत है।

दाहिने दइउ होइ जब सबही। राम समीप बसइअ बन तबही।। मन्दाकिनी मज्जनु तिहुं काला। राम दरसु मुद मंगल माला।।_अर्थ_जब दैव सबके अनुकूल हो, तभी श्रीरामजी के पास वन में निवास हो सकता है। मन्दाकिनीजी का तीनों समय स्नान और आनंद तथा मंगलों की माला ( समूह ) रूप श्रीराम का दर्शन,।

अटनु राम गिरि बन तापस थल। असनु अमिअ सम कंद मूल फल।। सुख समेत संबत दुइ साता। पल सम होइ न जनिअहिं जाता।।_अर्थ_श्रीरामजी के पर्वत ( कामदनाथ), वन और तपस्वियों के स्थानों में घूमना और अमृत के समान कन्द, मूल फलों का भोजन। चौदह वर्ष सुख के साथ पल के समान हो जायेंगे ( बीत जायेंगे ), जाते हुए जान ही न पड़ेंगे।

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहां अस भागु। सहज सुभायं समाज दुहुं राम चरन अनुरागु।।_अर्थ_ सब लोग कह रहे हैं कि हम इस सुख के योग्य नहीं हैं, हमारे ऐसे भाग्य कहां ? दोनों समाजों का श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सहज स्वभाव से ही प्रेम है।

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं। बचन सप्रेम सुनते मन हरहीं।। सीयं मातु तेहि समय पठारी। दासीं देखि सुअवसरु आईं।।_अर्थ_इस प्रकार सब मनोरथ कर रहे हैं। उनके प्रेमयुक्त वचन सुनते ही ( सुननेवालों के ) मनों को हर लेते हैं। उसी समय सीताजी की माता श्रीसुनयनाजी की भेजी हुई दासियां ( कौसल्याजी आदि के मिलने का ) सुंदर अवसर देखकर आयीं।
 
सावकास सुनि सब सिय सासू। आयु जनकराज रनिवासू।। कौसल्यां सादर सनमाने। आसन दिए समय सम आनी।।_अर्थ_उनसे यह सुनकर कि सीताजी की सब सासुओं इस समय फुर्सत में हैं, जनकराज का रनिवास उनसे मिलने आया। कौसल्याजी ने आदरपूर्वक उनका सम्मान किया और समयोचित आसन लाकर दिये।

सीलु सनेहु सकल दुहु ओरा। द्रवहिं देखि सुनि सुनि कुलिस कठोरा।। पुलक सिथिल तन बारिश बिलोचन। महि नख लइखनलगईं सब सोचन।।_अर्थ_दोनों ओर सबके शील और प्रेम को देखकर और सुनकर कठोर वज्र भी पिघल जाते हैं। शरीर पुलकित और शिथिल हैं और नेत्रों में ( शोक और प्रेम के ) आंसू हैं। सब अपने ( पैरों के ) नखों से जमीन कुरेदने और सोचने लगीं।

सब सिय राम प्रीति की सी मूरति। जनु करुना बहुत बेष बिसूरती।। सीयं मातु कह बिधि बुद्धि बांटी। जो पर फेनु पबि टांकी।।_अर्थ_सभी श्रीसीतारामजी के प्रेम की मूर्ति_सी हैं, मानो स्वयं करुणा ही बहुत _से वेष ( रूप ) धारण करके विसूर रही हो ( दु:ख कर रही हो )। सीताजी की माता सुनयनाजी ने कहा_विधाता की बुद्धि बड़ी टेढ़ी है, जो दूध के फेन जैसी कोमल वस्तु को वज्र की टांकी से फोड़ रहा है ( अर्थात् जो अत्यंत कोमल और निर्दोष है उनपर विपत्ति_पर_विपत्ति ढ़हा रहा है)।

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल। जहं तहं काक उलूक बक मानस सकृत मराल।।_अर्थ_अमृत केवल सुनने में आता है और विष जहां _तहां प्रत्यक्ष देखें जाते हैं। विधाता की सभी करतूतें भयंकर हैं। जहां _तहां कौए, उल्लू और बगुले ही ( दिखायी देते ) हैं; हंस तो एक मानसरोवर में ही है।

सुनि ससोच कह देवि सुमित्रा। बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा।। जो सृजित पालि हरि बहोरी। बालकेलि सम बिधि मति भोरी।।_अर्थ_यह सुनकर देवी सुमित्राजी शोक के साथ कहने लगीं_विधाता की चाल बड़ी ही विपरीत और विचित्र है, जो सृष्टि को उत्पन्न करके पालता है और फिर नष्ट कर डालता है। विधाता की बुद्धि बालकों के खेल के समान भोली ( विवेकशून्य ) है।

कौसल्या कह दोसु न काहू। कर्म बिबस दुख सुख छति लाहू।। कठिन कर्मगति जान बिधाता। जो सुभ असुभ सकल फल दाता।।_अर्थ_कौसल्याजी ने कहा_किसी का दोष नहीं है; दु:ख_सुख हानि_लाभ सब कर्म के अधीन हैं। कर्म की गति कठिन ( दुर्विज्ञेय ) है, उसे विधाता ही जानता है, जो शुभ और अशुभ सभी फलों का देनेवाला है।

ईस रजाई सीस सबहिं कें। उतपति थिति लय बिषहु अमी कें।। देखि मोहि बस सोचिए बादी। बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी।।_अर्थ_ईश्वर की आज्ञा सभी के सिर पर है। उत्पत्ति, स्थिति ( पालन ) और लय ( संहार ) तथा अमृत और विष के भी सिर पर है ( ये सब भी उसी के अधीन हैं )। हे देवि ! मओहवश सोच करना व्यर्थ है। विधाता का प्रपंच ऐसा ही अचल और अनादि है।

भूपति जिअब मरब उर आनी। सोचिए सखि लखि निज हित हानी।। सीयं मातु कह सत्य सुबानी। सुकृति अवधि अवध पति रानी।।_अर्थ_महाराज के मरने और जीने की बात को हृदय में याद करके जो चिन्ता करती है, वह तो हे सखी ! हम अपने ही हित की हानि देखकर ( स्वार्थवश ) करती हैं। सीताजी की माता ने कहा_आपका कथन उत्तम और सत्य है। आप पुण्यात्माओं के सीमा रूप अवध पति ( महाराज दशरथ जी )_की ही तो रानी हैं। ( फिर भला ऐसा क्यों न कहेंगी )

लखन राम सिय जाहुं बन भल परिनाम न पोचु। गहबरि हियं कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु।।_अर्थ_कौसल्याजी ने दु:खबरें हृदय से कहा_श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन में जायं, इसका परिणाम तो अच्छा ही होगा, बुरा नहीं। मुझे तो भरत की चिंता है।

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी। सुत सउतवधू देवसरी बारी।। राम संपत मैं कीन्ह न काऊ। सो करि कहुं सखी सतिभाऊ।।_अर्थ_ईश्वर के अनुग्रह और आपके आशीर्वाद से मेरे ( चारों ) पुत्र और ( चारों ) बहुएं गंगाजी के जल के समान पवित्र हैं। हे सखी ! मैंने कभी श्रीरामजी की सौगंध नहीं की, सो आज श्रीरामजी की शपथ करके सत्य भाव से कहती हूं_


भरत सील गुन बिनय बड़ाई। भायप भगति भरोस भलाई।। कहत सारदहु कर मति हीचे। सागर सीप कि जाहिं उलीचे।।_अर्थ_भरत के सील, गुन, नम्रता, बड़प्पन, भाईपन, भक्ति, भरोसे और अच्छेपन का वर्णन करने में सरस्वती जी की बुद्धि भी हिचकती है। सीप से कहीं समुद्र उलीचे जा सकते हैं।

जानउं सदा भरत कुलदीपा। बार बार मोहि कहेउ महीपा।। कसें कनक मनि पारिख पाएं। पुरुष परिखिअहिं समयों सुभाएं।।_अर्थ_मैं भरत को सदा कुल का दीपक कहती हूं। महाराज ने भी मुझे बार_बार यही कहा था। सोना कसौटी पर कसे जाने पर और रत्न पारखी ( जौहरी )_के मिलने पर ही पहचाना जाता है। वैसे ही पुरुष की परीक्षा समय पड़ने पर उसके स्वभाव से ही ( उसका चरित्र देखकर ) हो जाती है।

अनुचित आजु कहब अस मोरा। सोक सनेह सयानप थोरा।। सुनि सुरसरि सम पावनि बानी। भईं सनेह बिकल सब रानीं।।_अर्थ_किन्तु आज मेरा ऐसा कहना भी अनुचित है । सोक और स्नेह में सयानापन ( विवेक ) कम हो जाता है ( लोग कहेंगे कि मैं स्नेहवश भरत की बड़ाई कर रही हूं )। कौसल्याजी की गंगाजी के समान पवित्र करनेवाली वाणी सुनकर सब रानियां स्नेह के मारे विकल हो उठीं।

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसु। को बिबेकनिधि बल्लभहिं तुम्हहिं सकि उपदेसि।।_अर्थ_कौसल्याजी ने धीरज धरकर कहा_हे देवि मिथिलेश्वरी ! सुनिये, ज्ञान के भण्डार श्रीजनकजी की प्रिया आपको कौन उपदेश दे सकता है ?

रानि राय सन अवसरु पाई। अपनी भांति कहब समुझाई।। रखिअहिं लखनु भरतु गवनहिं बन। जौं यह मत मानो महीप मन।।_अर्थ_हे रानी ! मौका पाकर आप राजा को अपनी ओर से जहां तक हो सके समझकर कहियेगा कि लक्ष्मण को घर रख लिया जाय और भरत वन को जायं। यदि यह राय राजा के मन में ( ठीक ) जंच जाए।

तौं भल जतन करब सुबिचारी। मोरें सोचु भरत कर भारी।। गूढ़ स्नेह भरत मन माहीं। रहें नीक मोहि लागत नाहीं।।_अर्थ_तो भली-भांति खूब विचारकर ऐसा यत्न करें। मुझे भरत का अत्यधिक सोच है। भरत के मन में गूढ़ प्रेम है। उनके घर रहने में मुझे भलाई नहीं जान पड़ती ( यह डर लगता है कि उनके प्राणों को कोई भय न हो जाय )।

लखि सुभाऊ सुनि सरल सुबहानी। सब भी मगन करुन रस रानी।। नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि। सिथिल सनेहं सिद्ध जोगी मुनि।।_अर्थ_ कौसल्याजी का स्वभाव देखकर और उनकी सरल और उत्तम वाणी को सुनकर सब रानियां करुणरस में निमग्न हो गयीं। आकाश से पुष्प वर्षा की झड़ी लग गयी और धन्य_धन्य की ध्वनि होने लगी। सिद
ध, योगी और मुनि स्नेह से शिथिल हो गये।

सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ। तब धरि धीर सुमित्रा कहेऊ।। देबि दंड जुग जामिनि बीती। राम मातु सुनि उठी सप्रीती।।_अर्थ_ सारा रनिवास देखकर थकित रह गया ( निस्तब्ध हो गया ), तब सुमित्राजी ने धीरज धरकर कहा कि हे देवि ! दो घड़ी रात बीत गयी है। यह सुनकर श्रीरामजी की माता कौसल्याजी प्रेमपूर्वक उठीं_

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेह सतिभाय। हमरें तौ अब इस गति को मिथिलेस सहाय।।_अर्थ_और प्रेम सहित सद्भाव से बोलीं_अब आप शीघ्र डेरे को पधारिये। हमारे तो अब अब ईश्वर ही गति हैं, अथवा मिथिलेश्वर जनकजी सहायक हैं।

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता। जनक प्रिया गह पाय पुनीता।। देबि उचित अहि बिनय तुम्हारी। दशरथ घरिनि राम महतारी।।_अर्थ_कौसल्याजी के प्रेम को देखकर और उनके विनम्र वचनों को सुनकर जनकजी की प्रिय पत्नी ने उनके पवित्र चरण पकड़ लिये और कहा_हे देवी ! आप राजा दशरथ जी की रानी और श्रीरामजी की माता हैं। आपकी ऐसी नम्रता उचित ही है।

प्रभु अपने नीचहुं आदरहीं। अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं।। सेवकु राउ कर्म मन बानी। सदा सहाय महेसु भवानी।।_अर्थ_प्रभु अपने नीच जनों का आदर भी करते हैं। अग्नि धुएं को पर्वत तृण ( घास )_ को अपने सिर पर धारण करते हैं। हमारे राजा तो कर्म, मन और वाणी से आपके सेवक हैं और सदा सहायक तो श्रीमहादेव_पार्वतीजी हैं।

रउरे अंग जोगु जग को है। दीप सहाय कि दिनकर सोहै।। रामु जाइ बनु करि सुरकाजू। अचल अवधपुर करिअहिं राजू।।_अर्थ_आपका सहाय होने योग्य जगत् में कोन है ? दीपक सूर्य की सहायता करने जाकर कहीं शोभा पा सकता है ? श्रीरामचन्द्रजी वन में जाकर देवताओं का कार्य करके अवधपुरी में अचल राज्य करेंगे।

अमर नाग नर राम बाहुबल। सुख बसिहहिं अपने अपने थल।। यह सब जागबलिक कहि राखा। देबि न होइ मुदा मुनि भाषा।।_अर्थ_देवता, नाग और मनुष्य सब श्रीरामचन्द्रजी के भुजाओं के बल पर अपने_अपने स्थानों ( लोकों )_में सुखपूर्वक बसेंगे। यह सब याज्ञवल्क्य मुनि ने पहले से कह रखा है। हे देवी ! मुनि का कथन व्यर्थ ( झूठा ) नहीं हो सकता।

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ। सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ।।_अर्थ_ऐसा कहकर बड़े प्रेम से पैरों पड़कर सीताजी ( को साथ भेजने )_के लिये विनती करके और सुन्दर आज्ञा पाकर तब सीताजी समेत सीताजी की माता डेरे पर चलीं।

प्रिय परिजनहिं मिली बैदेही। जो जेहिं जोगु भांति तेहि तेही।। तापस बेष जानकी देखी। भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी।।_अर्थ_जानकीजी अपने प्यारे कुटुम्बीसहित_जो जिस योग्य था, उससे उसी प्रकार मिलीं। जानकीजी को तपस्विनी के वेष में देखकर सभी शोक से अत्यंत व्याकुल हो गये।











Sunday, 25 May 2025

अयोध्याकाण्ड

बिषम बिषाद तोरावती धारा। भय भ्रम भंवर अबर्त अपारा।। केवट बुध बिंद्रा बड़ि नावा। सकहिं न खेइ एक नहिं आवा।।_अर्थ_ भयानक विषाद ( शोक ) ही उस नदी की तेज धारा है। भय और भ्रम ( मोह ) ही उसके असंख्य भंवर और  चक्र हैं। विद्वान मल्लाह हैं, विद्या ही बड़ी नाव है। परंतु वे उसे के नहीं सकते हैं, ( उस विद्या का उपयोग नहीं कर सकते हैं ), किसी को उसकी अटकल ही नहीं आती है।

बनचर कोल किरात बिचारे। थके बिलोकि पथिक हियं हारे।। आश्रम उदधि मिली जब जाई। मनहुं उठी अंबुधि अकुलाई।।_अर्थ_ वन में विचरनेवाले बेचारे कोल किरात ही यात्री हैं, जो उस नदी को देखकर हृदय में हारकर थक गये हैं। यह करुणा_नदी जब आश्रम समुद्र में जाकर मिलीं तो मानो वह समुद्र अकुला उठा ( खौल उठा )।

सोक बिकल दोउ राज समाजा। रहा न ज्ञानु न धीरज लाजा।। भूप रूप गुन सील सराही। रोवहिं सोक सिंधु अवगाही।।_अर्थ_दोनों राजसमाज शोक से व्याकुल हो गये। किसी को न ज्ञान रहा, न धीरज और न लाज ही रही। राजा दशरथ जी के रूप, गुण और शील की सराहना करते हुए सब रो रहे हैं और शोक समुद्र में डुबकी लगा रहे हैं।

अवगाही सोक समुद्र सओचहइं नारि नर व्याकुल महा। दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा।। सुर सिद्ध तापस जओगइजन मुनि देखि दशा बिदेह की। तुलसी न समर्थ कोई जो तरि सकै सहित सनेह की।।_अर्थ_ शोक_समुद्र में डुबकी लगाते हुए सभी स्त्री _पुरुष महान् व्याकुल होकर सोच ( चिंता ) कर रहे हैं। ये सब विधाता को दोष देते हुए क्रोधयुक्त होकर कह रहे हैं कि प्रतिकूल विधाता ने यह क्या किया ? तुलसीदासजी कहते हैं कि देवता, सिद्ध, तपस्वी, योगी और मुनिगण में कोई भी समर्थ नहीं है जो उस समय विदेह ( जनकराज )_की दशा देखकर प्रेम की नदी को पार कर सके ( प्रेम में मग्न हुए बिना रह सके )।

किए अमित उपदेसु जहां तहां लोगन्ह मुनिबरन्ह। धीरजु धरइअ नरएस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन।।_अर्थ_जहां_तहां श्रेष्ठ मुनियों ने लोगों को अपरिमित उपदेश दिये और वशिष्ठजी ने विदेह ( जनकजी )_से कहा_हे राजन् ! आप धैर्य धारण कीजिये।

जासु ज्ञानु रबि भव निसि नासा। बचन किरन मुनि कमल बिकासा।। तेहि कि मोह ममता निअराई। यह सिय राम स्नेह बड़ाई।।_अर्थ_ जिस राजा जनक का ज्ञानरूपी सूर्य भव ( आवागमन ) रूपी रात्रि का नाश कर देता है, और जिसकी वचन रूपी किरणें मुनि रूपी कमलों को खिला देती है ( आनंदित करती है ), क्या मोह और ममता उसके निकट भी आ सकते हैं ? यह तो श्रीसीतारामजी के प्रेम की महिमा है ! ( अर्थात् राजा जनक की यह दशा श्रीसीतारामजी के अलौकिक प्रेम के कारण हुई, लौकिक मोह_ममता के कारण नहीं। जो लौकिक मोह_ममता को पार कर चुके हैं उनपर भी श्रीसीतारामजी का प्रेम अपना प्रभाव दिखाते बिना नहीं रहता।

बिषई साधक सिद्ध सयाने। त्रिबिध जीव जग बेद बखाने।। राम सनेह सरस मन जासू। साधु सभां बड़ आदर तासू।।_अर्थ_बिषयी, साधक और ज्ञानवान् सिद्ध पुरुष_जगत् में ये तीन प्रकार के जीव वेदों ने बताये हैं। इन तीनों में जिसका चित्त श्रीरामजी के स्नेह से सरस ( सराबोर ) रहता है, साधुओं की सभा में उसी का बड़ा आदर होता है।

सोह न राम पेम बिनु ग्यानू। करनाल बिनु जिमि जलजानू।। मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए। रामघाट सब लोग नहाए।।_अर्थ_श्रीरामजी के प्रेम के बिना ज्ञान शोभा नहीं देता, जैसे कर्णधार के बिना जहाज। वशिष्ठजी ने विदेहराज ( जनकजी )_को बहुत प्रकार से समझाया। तदनन्तर सब लोगों ने श्रीरामजी के घाट पर स्नान किया।

सकल सोक संकुल नर नारी। सो बासर बीतेउ बिनु बारी।। पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू। प्रिय परिजन कर कौन बिचारू।।_अर्थ_स्त्री_पुरुष सब शोक से पूर्ण थे। वह दिन बिना ही जल के बीत गया ( भोजन की बात तो दूर रही, किसी ने जल तक नहीं पिया )। पशु_पक्षी और हिरनों तक ने कुछ अहार नहीं किया। तब प्रियजनों एवं कुटुम्बीसहित का तो विचार ही क्या किया जाय ?

दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात। बैठे सब बट बिटप तर मन मलिन कृस गात।।_अर्थ_निमिराज जनकजी और रघुराज श्रीरामचन्द्रजी तथा दोनो ओर के समाज ने दूसरे दिन सबेरे स्नान किया और सब बड़ के वृक्ष के नीचे जा बैठे। सबके मन उदास और शरीर दुबले हैं।

जे महिसुर दसरथ पुर बासी। जे मिथिला पति नगर निवासी।। हंस हंस गुर जनक पुरोधा। जिन्ह जग मगु परमारथ सोधा।।_अर्थ_ जो दशरथ जी की नगरी अयोध्या के रहनेवाले और जो मिथिलापति जनकजी के नगर जनकपुर के रहनेवाले ब्राह्मण थे, तथा सूर्यवंश के गुरु वशिष्ठजी तथा जनकजी के पुरोहित शतानंदजी, जिन्होंने सांसारिक अभ्युदय का मार्ग का मार्ग तथा परमार्थ का मार्ग छान रखा था,।

लगे कहन उपदेस अनेका। सहित धर्म नय बिरति बिबेका।। कौशिक कहा कि कथा पुरानीं। समुझाए सब सभा सउबआनईं।।_अर्थ_ वे सब धर्म, नीति, वैराग्य तथा विवेकयुक्त अनेकों उपदेश देने लगे। विश्वामित्रजी ने पुरानी कथाएं ( इतिहास ) कह-कहकर सारी सभा को सुन्दर वाणी से समझाया।

 तब रघुनाथ कौसिकहि कहेऊ। नाथ कालि जल बिनु सब रहेऊ।। मुनि कहा उचित कहत रघुराई। गये बीती दिन पहले अढ़ाई।।_अर्थ_ तब श्रीरघुनाथजी ने विश्वामित्रजी से कहा कि हे नाथ ! कल सब लोग बिना जल पीये ही रह गये थे ( अब कुछ आहार करना चाहिये )। विश्वामित्रजी ने कहा कि श्रीरघुनाथजी उचित ही कह रहे हैं। ढ़ाई पहर दिन ( आज भी ) बीत गया।

रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू। कहां उचित नहिं असन अनाजू।। कहा भूप भल सबहिं सोहाना। पाइ रजायसु चले नहाना।।_अर्थ_ विश्वामित्र का रुख देखकर तेरहुतिराज जनकजी ने कहा_यहां अन्न खाना उचित नहीं है। राजा का सुन्दर कथन सबके मन को अच्छा लगा। सब आज्ञा पाकर नहाने चले।

तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार। लि आए बनचर बिपुल भरि भरि कांवरि भार।।_अर्थ_ उसी समय अनेकों प्रकार के बहुत _से फल, फूल, पत्ते, मूल आदि बहंगियों और बोझों में भर_भरकर वनवासी ( कोल_किरात ) लोग ले आये।

कामद गिरि में राम प्रसादा। अवलोकत अपहरत बिषादा।। सर सरिता बन भूमि बिभागा। जनु उमगत आनंद अनुरागा।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी की कृपा से सब पर्वत मनचाही वस्तु देनेवाले हो गये। वे देखने मात्र से ही दु:खों को सर्वथा हर लेते थे। वहां के तालाबों, नदियों, वन और पृथ्वी के सभी भागों में मानो आनंद और प्रेम उमड़ रहा है।

बेलि बिटप सब सफल सफूला। बोलत खग मृग अलि अनुकूला।।  तेहि अवसर बन अधिक उछाहू।  त्रिबिध समीर सुखद सब काहू।।_अर्थ_बेलें और वृक्ष सभी फल और फूलों से युक्त हो गये। पक्षी, पशु और भौंरे अनुकूल बोलने लगे। उस अवसर पर वन में बहुत उत्साह ( आनन्द ) था, सब किसी को सुख देनेवाली शीतल, मन्द सुगन्ध हवा चल रही थी।

जाइ न बरनी मनोहरताई। जनु महि करता जनक पहुनाई।। तब सब लोग नहाइ नहाई। राम जनक मुनि आयसु पाई।। देखि देखि तरुबर अनुरागे। जहं तहं पुरजन उतरन लागे।। दल फल फूल कंद बिधि नाना। पावन सुंदर सुधा समाना।।_अर्थ_वन की मनोहरताई वर्णन नहीं की जा सकती, मानो पृथ्वी जनकजी की पहुनाई कर रही है। तब जनकपुरवासी सब लोग नहा_नहाकर श्रीरामचन्द्रजी, जनकजी और मुनि की आज्ञा पाकर सुंदर वृक्षों को देख_देखकर 
प्रेम में भरकर जहां _तहां उतरने लगे। पवित्र, सुन्दर और अग्नि के समान ( स्वादिष्ट ) अनेकों प्रकार के पत्ते, फल, मूल और कन्द_

Monday, 5 May 2025

अयोध्याकाण्ड

रानि कुचालि सुनत नरपालहिं। सूझ न कछु जिमि मनि बिनु ब्यालहिं भरत राज रघुबर बनवासू। भा मिथिलेसहिं हृदयं हरासूं।।_अर्थ_रानी की कुचाल जानकर राजा जनकजी को कुछ सूझ न पड़ा, जैसे मणि के बिना सांप को नहीं सूझता। फिर भरतजी को राज्य और रामचन्द्रजी का वनवास सुनकर मिथिलेश्वर जनकजी के हृदय में बड़ा दु:ख हुआ।

नृप बूझे बुध सचिव समाजू। कहहु बिचारि उचित का आजू।। समुझि अवधि असमंजस दोऊ। चलिए कि रहिअ न कह कछु कोऊ।।_अर्थ_ राजा ने विद्वानों और मंत्रियों के समाज से पूछा कि विचारकर कहिये, आज ( इस समय ) क्या करना उचित है ? अयोध्या की दशा देखकर और दोनों प्रकार से असमंजस जानकर 'चलिये या रहिये ?' किसी ने कुछ नहीं कहा।

नृपहिं धीर धरि हृदयं बिचारी। पड़े अवध चतुर चर चारी।। बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ। आएहु बेगि न होइ लखाऊ।।_अर्थ_( जब किसी ने कोई सम्मति नहीं दी ) तब राजा ने धीरज धर हृदय में विचारकर चार चतुर गुप्तचर _ ( जासूस ) अयोध्या को भेजे ( और उनसे कह दिया कि ) तुमलोग ( श्रीरामजी के प्रति ) भरतजी के सद्भाव ( अच्छे भाव, प्रेम ) या दुर्भाव ( बुरा भाव, विरोध )_का ( यथार्थ ) पता लगाकर जल्दी लौट आना, किसी को तुम्हारा पता न लगने पावे।

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति। चले चित्रकूटहिं भरतु चार चले तेरहूति।।_अर्थ_ गुप्तचर अवध को गये और भरतजी का ढ़ंग जानकर और उनकी करनी देखकर जैसे ही भरतजी चित्रकूट को चले, वे तिरहुत ( मिथिला ) _को चल दिये।

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी। जनक समाज जथामति बरनी।। सुनि गुर परिजन सचिव महिपति। भए सब सोच सनेह बिकल अति।।_अर्थ_( गुप्त ) दूतों ने आकर राजा जनकजी की सभा में भरतजी की करनी का अपनी बुद्धि के अनुसार वर्णन किया। उसे सुनकर गुरु, कुटुम्बी, मंत्री और राजा सभी सोच और स्नेह से अत्यन्त व्याकुल हो गये।

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई। लिए सुभट साहनी बोलाई।। घर पुर देस राखि रखवारे। हम गया रथ बहुत जान संवारे।।_अर्थ_फिर जनकजी ने धीरज धरकर और भरतजी की बड़ाई करके अच्छे योद्धाओं और साहसियों को बुलाया। घर, नगर और देश में रक्षकों को रखकर घोड़े, हाथी, रथ आदि बहुत _सी सवारियां सजवायीं।

दुघरी साधि चले ततकाला। किए विश्राम न मग महिपाला।। भोरहि आजु नहाइ प्रयागा। चले जमुन उतरन सबु लागा।।_अर्थ_ वे दुघरिया मुहूर्त साधकर उसी समय चल पड़े। राजा ने रास्ते में कहीं विश्राम भी नहीं किया। आज ही सवेरे प्रयागराज में स्नान करके चले हैं। जब सब लोग यमुनाजी उतरने लगे,।

खबरि लेन हम पठए नाथा। तिन्ह कहा अस महि नायउ माथा।। साथ किरात छ सातक दीन्हा। मुनिबर तुरंत बिदा चर कीन्हे।।_अर्थ_तब हे नाथ ! हमें खबर लेने को भेजा। उन्होंने ( दूतों ने ) ऐसा कहकर पृथ्वी पर सिर नवाया। मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी ने कोई छ:_सात भीलों को साथ लेकर दूतों को तुरंत विदा कर दिया।

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु। रघुनंदनहिं सकोच बड़ सोच बिबस सुरराजु।।_अर्थ_जनकजी का आगमन सुनकर अयोध्या का सारा समाज हर्षित हो गया। श्रीरामजी को बड़ा संकोच हुआ और देवराज इन्द्र तो विशेष रूप से सोच के वश में हो गये।

गरइ ग लानि कुटिल कैकेई। काहि कहे केहि दूषनु देई।। अस मन आनि मुदित नर नारी। भयउ बहोरि रहब दिन चारी।।_अर्थ_कुटिल कैकेयी मन_ही_मन ग्लानि ( पश्चाताप )_ से गली जाती है। किससे कहें और किसको दोष दे ? और सब नर_नारी मन में ऐसा विचारकर प्रसन्न हो रहे हैं कि ( अच्छा हुआ, जनकजी के आने से ) चार ( कुछ ) दिन और रहना हो गया।

एहि प्रकार गत बासर सोऊ। प्रात नहान लाग सबु कोऊ।। करि मज्जनु पूजहिं नर नारी। गनपत गौरी त्रिपुरारि तमारी।।_अर्थ_इस प्रकार वह दिन भी बीत गया। दूसरे दिन प्रात:काल सब कोई स्नान करने लगे। स्नान करके सब नर_नारी गणेशजी, गौरीजी, महादेवजी और सूर्य भगवान की पूजा करते हैं।

रमा रमन पद बंदि बहोरी। बइनवहइं अंजुलि अंचल जोरी।। राजा रामु जानकी रानी। आनंद अवधि अवध रजधानी।।_अर्थ_ फिर लक्ष्मीपति भगवान् विष्णु के चरणों की वन्दना करके, दोनों हाथ जोड़कर, आंचल पसारकर विनती करते हैं कि श्रीरामजी राजा हों, जानकी जी रानी हों तथा राजधानी अयोध्या आनंद की सीमा होकर_।

सुबस बसु फिर सहित समाजा। भरतहिं रामु करहुं जुबराजा।। एहि सुख सुधां सींचि सब काहू। देव दएहू जग जीवन लाहू।।_अर्थ_ फिर समाजसहित सुखपूर्वक बसे और श्रीरामजी भरतजी को युवराज बनावें। हे देव ! इस सुख रूपी अमृत से सींचकर सब किसी को जगत् में जीने का लाभ दीजिये।

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुरं होउ। अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ।।_अर्थ_गुरु, समाज और भाइयों समेत श्रीरामजी का राज अवधपुरी में हो और श्रीरामजी के राजा रहते ही हमलोग अयोध्या में मरें। सब कोई यही मांगते हैं।

सुनि सनेहमय पुरजन बानी। निंदहिं जोग बिरति मुनि ज्ञानी।। एहि बिधि नित्य कर्म करि पुरजन। रामहिं करहिं प्रनामु पुलकित तन।।_अर्थ_अयोध्यानिवासियों की प्रेममयी वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि भी अपने योग और वैराग्य की निंदा करते हैं। अवध वासी इस प्रकार नित्यकर्म करके श्रीरामजी को पुलकित शरीर हो प्रणाम करते हैं।

ऊंच नीच मध्यम नर नारी। लहहीं दरसु निज निज अनुहारी।। सावधान सबहिं सनमानहिं। सकल सराहत कृपानिधानहिं।।_अर्थ_ऊंच, नीच और मध्यम सभी श्रेणियों के स्त्री-पुरुष अपने_अपने भाव के अनुसार श्रीरामजी का दर्शन प्राप्त करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी सावधानी के साथ सबका सम्मान करते हैं और सभी कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी की सराहना करते हैं।

लरिकाइहि तें रघुबर बानी। पालतू नीति प्रीति पहिचानी।। सील संकोच सिंधु रघुराऊ। सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ।।_अर्थ_श्रीरामजी की लड़कपन से ही यह बान है कि वे प्रेम को पहचानकर नीति का पालन करते हैं। श्रीरघुनाथजी शील और संकोच के समुंद्र हैं। वे सुंदर मुख के ( या सबके अनुकूल रहनेवाले ), सुंदर नेत्र वाले ( या सबको कृपा और प्रेम की दृष्टि से देखनेवाले ) और सरल स्वभाव हैं।

कहत राम गुन गन अनुरागे। सब निज भाग सराहन लागे।। हम सम पुन्यपुंज जग थोरे। जिन्हहि राम जानत करि मोरे।।_अर्थ_श्रीरामजी के गुणसमूहों को कहते_कहते सब लोग प्रेम में भर गये और अपने भाग्य की सराहना करने लगे कि जगत में हमारे समान पुण्य की बड़ी पूंजी वाले थोड़े ही हैं; जिन्हें श्रीरामजी अपना करके जानते हैं ( ये मेरे हैं ऐसा जानते हैं )।

प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेश। सहित समाज संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु।।_अर्थ_उस समय सब लोग प्रेम में मग्न हैं। इतने में ही मिथिला पति जनकजी को आते हुए सुनकर सूर्यकुलरूपी कमल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी सभासहित आदरपूर्वक जल्दी से उठ खड़े हुए।

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा। आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा।। गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं। करि प्रनामु रथ त्यागें तबाहीं।।_अर्थ_भाई, मंत्री, गुरु और पुरवासियों को साथ लेकर रघुनाथजी आगे ( जनकजी की अगवानी में ) चले। जनकजी ने ज्योंही पर्वतश्रेष्ठ कामदनाथ को देखा, त्योंही प्रणाम करके उन्होंने रथ छोड़ दिया ( पैदल चलना शुरू कर दिया )।

राम दरस लालसा उछाहू। पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू।। मन तहं जहां रघुबर बैदेही। बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही।।_अर्थ_श्रीरामजी के दर्शन और लालसा के उत्साह के कारण किसी को और रास्ते की थकावट और क्लेश जरा भी नहीं है। मन तो वहां है जहां ‌श्रीराम और जानकी जी हैं। बिना मन के शरीर के दु:ख_सुख की सुध किसको हो ?

आवत जनकु चले एहि भांती। सहित समाज प्रेम मति माती।। आए निकट देखि अनुरागे। सादर मिलन परस्पर लागे।।_अर्थ_जनकजी इस प्रकार चले आ रहे हैं। समाजसहित उनकी बुद्धि प्रेम में मतवाली हो रही है। निकट आये देखकर सब प्रेम में भर गये और आदरपूर्वक आपस में मिलने लगे।

लगे जनक मुनि जन पद बंदन। रिषिन्ह राम कीन्ह रघुनन्दन।। भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहिं। चले लवाई समेत समाजहिं।।_अर्थ_ जनकजी ( वशिष्ठ आदि अयोध्यावासी ) मुनियों के चरणों की वन्दना करने लगे और श्रीरामचन्द्रजी ने ( शतानंद आदि जनकपुरवासी ) ऋषियों को प्रणाम किया। फिर भाइयों सहित श्रीरामजी राजा जनकजी से मिलकर उन्हें समाजसहित अपने आश्रम को लिवा चले।

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु। सेन मनहुं करुना सरित लिएं जाहिं रघुनाथ।।_अर्थ_श्रीरामजी का आश्रम शआंतरसरूपई पवित्र जल से परिपूर्ण समुद्र है। जनकजी की सेना ( समाज ) मानो करुणा ( करुणरस )_की नदी है, जिसे श्रीरघुनाथजी ( उस आश्रम रूपी शान्तरस के समुद्र में मिलाने के लिये ) लिये जा रहे हैं।

बोरति ग्यान बिराग करारे। बचन ससओक मिलता नद नारे।। सोच उसास समीर तरंगा। धीरज तट तरुबर कर भंगा।।_अर्थ_ यह करुणा की नदी ( इतनी बढ़ी हुई है कि ) ज्ञान_वैराग्यरूपी किनारों को डुबाती जाती है। शोकभरे वचन नद और नाले हैं, जो इस नदी में मिलते हैं; और सोच की लम्बी सांसें ( आहें ) हो वायु के झंकोरों से उठनेवाली 
तरंगें हैं जो धैर्य रूपी किनारों के उत्तम वृक्षों को तोड़ रही हैं।









Saturday, 12 April 2025

अयोध्याकाण्ड

जगु अनुभव भल एकउ गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाई।। देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।_अर्थ_सारा जगत् बुरा ( करनेवाला ) हो, किन्तु हे स्वामी ! केवल एक आप ही भले ( अनुकूल ) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाई से भला हो सकता है ? हे देव ! आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है; वह भी कभी किसी के सम्मुख ( अनुकूल ) है, न विमुख ( प्रतिकूल )।

जाइ निकट पहिचानी तरु छांह समनि सब सोच। मागत अभिमत पांव जग राउ रिंकु भल पोच।।_अर्थ_उस वृक्ष ( कल्पवृक्ष ) को पहचानकर जो उसके पास जाय, तो उसकी छाया ही सारी चिंताओं का नाश करनेवाली है। राजा_रंक, भले_बुरे, जगत् में सभी उससे मांगते ही मनचाही वस्तु पाते हैं।

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू। मिटी छोभु नहिं मन संदेहू।। अब अरउनआकर कीजिअ सोई। जन हित प्रभु चित छोभु न होई।।_अर्थ_गुरु और स्वामी का सब प्रकार से स्नेह देखकर मेरा छोभ मिट गया, मन में कुछ भी संदेह नहीं रहा। हे दया के खान ! अब वही कीजिये जिसमें दास के लिये प्रभु के चित्त में छोभ ( किसी प्रकार का विचार ) न हो।

जो सेवकु साहिबहिं संकोची। निज हित चहइ तासु मति पोची।। सेवक हित साहिब सेवकाई। करै सकल सुख लोभ बिहाई।।_अर्थ_जो सेवक स्वामी को सोच में डालकर अपना भला चाहता है, उसकी बुद्धि नीच है। सेवक का हित तो इसी में है कि वह समस्त सुखों और लोभों को छोड़कर स्वामी की सेवा ही करे।

स्वारथु नाथ फिरें सबहिं का। किएं रजाइ कोटि बिधि नीका।। यह स्वार्थ परमार्थ सारू। सकल सुकृति फल सुसंगति सिंगारू।।_अर्थ_हे नाथ ! आपके लौटने में सभी का स्वार्थ है, और आपकी आज्ञा पालन करने में करोड़ों प्रकार के कल्याण है। यही स्वार्थ और परमार्थ का सार ( निचोड़ ) है, समस्त पुण्यों का फल और संपूर्ण शुभ गतियों का श्रृंगार है।

देव एक विनती सुनि मोरी। उचित होइ तस करब बहोरी।। तिलक समाजु साजिश सबु आना। करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना।।_अर्थ_हे देव ! आप मेरी विनती सुनकर, फिर जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये। राजतिलक की सब सामग्री सजाकर लायी गयी है, यदि प्रभु का मन माने तो उसे सफल कीजिये ( उसका उपयोग कीजिये। 

सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहिं सनाथ। नतरु फेरिअहि बंधु दोउ नाथ चलों मैं साथ।।_अर्थ_छोटे भाई शत्रुध्न समेत मुझे वन में भेज दीजिये और ( अयोध्या लौटकर ) सबको सनाथ कीजिये। नहीं तो किसी तरह भी ( यदि आप अयोध्या जाने के लिये तैयार न हों ) हे नाथ ! लक्ष्मण और शत्रुघ्न दोनों भाइयों को लौटा दीजिये और मैं आपके साथ चलूं।

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई। बहुरिअ सीय सहित रघुराई।। जेहिं बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई। करीना सागर कीजिअ सोई।।_अर्थ_ अथवा हम तीनों भाई वन चले जायें और हे श्रीरघुनाथजी ! आप श्रीसीताजी सहित ( अयोध्या ) लौट जाइये। हे दया सागर ! जिस प्रकार से प्रभु का मन प्रसन्न हो वही कीजिये।

देवं दीन्ह सबु मोहि अभारू। मोरें नीति न धरम बिचारू।। कहउं बचन सब स्वारथ हेतू। रहत न आरत कें चित चेतू।।_अर्थ_हे देव ! आपने सारा भार ( जिम्मेवारी ) मुझपर रख दिया। पर मुझमें न तो नीति का विचार है, न धर्म का। मैं तो अपने स्वार्थ के लिये सब बातें कह रहा हूं। आर्त ( दु:खी ) मनुष्य के चित्त में चेत ( विवेक ) नहीं रहता।

उतरु देखि सुनि स्वामि रजाई। सो सेवकु लखि राज रजाई।। अस मैं अवगुन उदधि अगाधू। स्वामि सनेह सराहत साधू।।_अर्थ_स्वामी की आज्ञा सुनकर जो उत्तर दे, ऐसे सेवक को देखकर लज्जा भी लजा जाती है। मैं अवगुणों का ऐसा अथाह समुद्र हूं ( कि प्रभु को उत्तर दे रहा हूं )। किन्तु स्वामी ( आप ) स्नेहवश साधु कहकर मुझे सराहते हैं।

अब कृपाल मोहि सो मत भावा। सकुच स्वामि मन जाईं न पावा।। प्रभु पद साथ कहुं सति भाऊ। जग मंगल हित एक उपाऊ।।_अर्थ_हे कृपालु ! अब तो वहीं मत मुझे भाता है, जिससे स्वामी का मन संकोच न पावे।। प्रभु के चरणों की सपथ है, मैं सत्यभाव से कहता हूं, जगत् के कल्याण के लिये यही एक उपाय है।

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहिं आयसु देब। सो सिर धरि धरि करिहिं सबु मिटिहि अनट अवरेब।।_अर्थ_प्रसन्न मन से संकोच त्यागकर प्रभु जिसे जो आज्ञा देंगे, उसे सब लोग सिर चढ़ा_चढ़ाकर ( पालन ) करेंगे और सब उपद्रव और उलझनें मिट जायेंगी।

भरत बचन सुनि सुनि सुर हरषे। साधु सराहि सुमन बहु बरसे।। असमंजस बस अवध नेवासी। प्रमुदित मन तापस बनवासी।।_अर्थ_ भरतजी के पवित्र वचन सुनकर देवता हर्षित हुए और साधु_साधु कहकर सराहना करते हुए देवताओं ने फूल बरसाये। अयोध्या निवासी असमंजस के वश हो गये ( कि देखें अब श्रीरामजी क्या कहते हैं ) तपस्वी तथा वनवासी लोग ( श्रीरामजी के रहने की आशा से ) मन में परम आनन्दित हुए।

चुपहिं रहे रघुनाथ संकोची। प्रभु गति देखि सभा सब सोची।। जनक दूत तेहि अवसर आए। मुनि बसिष्ठजी सुनि बेनि बोलाए।।_अर्थ_किन्तु संकोची रघुनाथजी चुप ही रह गये। प्रभु की यह स्थिति ( मौन देख सारी सभा सोच में पड़ गयी। उसी समय जनकजी के दूत आये, यह सुनकर मुनि वशिष्ठजी ने उन्हें तुरंत बुलवा लिया।

करि प्रणाम तिन्ह राम निहारे। बेषु देखि में निपट दुखारे।। दूतन्ह मुनिबर बूझि बाता। कहहु बिदेहू भूप कुसलाता।।_अर्थ_उन्होंने ( आकर ) प्रणाम करके श्रीरामचन्द्रजी को देखा। उनका ( मुनियोंका_सा ) वेष देखकर वे बहुत दु:खी हुए। मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी ने दूतों से बात पूछी कि जनक का कुशल_समाचार कहो।

सुनि सकुचाई नाइ महि माथा। बोले चरबर जोरें हाथा।। बूझब राउर सादर साईं। कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं।।_अर्थ_ यह ( मुनि का कुशलप्रश्न ) सुनकर सकुचाकर पृथ्वी पर मस्तक नवाकर वे श्रेष्ठ दूत हाथ जोड़कर बोले _हे स्वामी ! आपका आदर के साथ पूछना,  यही हे गोसाईं ! कुशल का कारण हो गया।


नाहिं त कोसलनाथ कें साथ कुसल गई नाथ। मिथिला अवध बिसेषी तें जगु सब भयउ अनाथ।।_अर्थ_नहीं तो हे नाथ ! कुसल_क्षेम तो सब कोसलनाथ दसरथजई के साथ ही चली गयी। ( उनके चले जाने से ) यों तो सारा जगत् ही अनाथ ( स्वामी के बिना असहाय) हो गया, किन्तु मिथिला और अवध तो विशेष रूप से अनाथ हो गये।

कोसलपति गति सुनि जनकौरा।  भे सब लोक सोकबस बौरा।। जेहिं देखें तेहि समय बिदेहू। नाम सत्य अस लाग न केहू।।_अर्थ_अयोध्यानाथ की गति ( दशरथ जी का मरण ) सुनकर जनकपुर वासी सभी लोग शोकवश बावले हो गये ( सुध_बुध भूल गये )। उस समय जिन्होंने विदेह को ( शोकमग्न ) देखा , उनमें से किसी को ऐसा न लगा कि उनका विदेह ( देहाभिमानरहित ) नाम सत्य है। ( क्योंकि देहाभिमान से शून्य पुरुष को शोक कैसा ?)

Monday, 24 March 2025

अयोध्याकाण्ड

मिटिहहि पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।_अर्थ_हे भरत ! तुम्हारा नाम_स्मरण करते ही सब पाप, प्रपंच ( अज्ञान ) और समस्त अमंगलों के समूह मिट जायेंगे तथा इस लोक में सुन्दर यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा।

कहुं सुभाऊ सत्य सिवा साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतर्क करहु जनि जाएं। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएं।।_अर्थ_हे भरत ! मैं स्वभाव से ही सत्य कहता हूं, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है‌ । हे तात ! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। वैर और प्रेम छिपाने नहीं छिपते।

मुनिगन निकट बिहंग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।। हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।।_अर्थ_पशु और पक्षी मुनियों के पास ( बेधड़क ) चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधइकओं को देखते ही भाग जाते हैं। मित्र और शत्रु को पशु_पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्य शरीर तो गुण और ज्ञान का भण्डार ही है।

तात तुम्हहिं हम जानउं नीकें। करौं काह असमंजस जी के।।  राखेउ रायन सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।।_अर्थ_ हे तात ! मैं तुम्हें अच्छी तरह से जानता हूं। क्या करूं ? जीने में बड़ा असमंजस ( दुविधा) है। राजा ने मुझे त्यागकर सत्य को रखा और प्रेम_प्रण के लिये शरीर छोड़ दिया।

तासु बचन मएटत मन सोचू। तेहि ते अधिक तुम्हार संकोचू।। ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहुं सोइ कीन्हा।।_अर्थ_उनके वचन को मेटते मन में सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उसपर भी गुरुजी ने मुझे आज्ञा दी है। इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वहीं करना चाहता हूं।

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।_अर्थ_ तुम मन को प्रसन्न कर और संकोच को त्यागकर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूं। सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजी का यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया।

सुरगन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।। बनत उपाऊ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।।_अर्थ_ देवगणों सहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना_बनाया काम बिगड़ना चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब वे सब मन_ही_मन श्रीरामजी की शरण गये।

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगति भगति बस कहहीं।। सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भए सुर सुरपति निपट निरासा।।_अर्थ_ फिर वे विचार करके आपस में कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्त की भक्ति के वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासा की ( घटना ) याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये।

सहे सुरन्ह बहुत काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।। लगा लगा कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।_अर्थ_पहले देवताओं ने बहुत समय तक दु:ख सहने। तब भक्त प्रह्लाद ने ही नृसिंह भगवान् को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानों से लग_लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब ( इस बार ) देवताओं का काम भरतजी के हाथ है।

आन उपाऊ न देखिअ देवा। मानता राम सुसेवक सेवा।। हियं सपेम सउमइरहउ सब भरतहिं। निज गुन सील राम बस करतहिं।।_अर्थ_हे देवताओं! और कोई उपाय नहीं दिखाई देता। श्रीरामजी अपने श्रेष्ठ सेवकों की सेवा मानते हैं ( अर्थात् उनके भक्त की कोई सेवा करता है तो उसपर बहुत प्रसन्न होते हैं)। अतएव अपने गुण और शील से श्रीरामजी को वश में करनेवाले भरतजी का ही सब लोग अपने-अपने हृदय में प्रेम सहित स्मरण करो।

सुनि सुरमत सुरगुरु कहेउ भल तुम्हार बड़ु भाग। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।_अर्थ_देवताओं का मत सुनकर देवगुरु बृहस्पति जी ने कहा_अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े भाग्य हैं। भरतजी के चरणों का प्रेम जगत् में समस्त शुभ मंगलों का मूल है।

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु समय सरिस सुहाई।। भरत भगति तुम्हें मन आई। तजहु सोच बिधि बात बनाई।।_अर्थ_सीतानाथ श्रीरामजी के सेवक की सेवा सैकड़ों कामधेनुओं के समान सुंदर है। तुम्हारे मन में भरतजी की भक्ति आई है, तो अब सोच छोड़ दो। विधाता ने बात बना दी।

देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायं बिबस रघुराऊ।। मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहिं जानि राम परिछाहीं।।_अर्थ_हे देवराज ! भरतजी का प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभाव से ही उनके पूर्ण रूप से वश में हैं। हे देवताओं ! भरतजी को श्रीरामचन्द्रजी की परछाईं ( परछाईं की भांति उनका अनुसरण करनेवाला ) जानकर मन स्थिर करो, डर की बात नहीं है।

सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहिं संकोचू।। निज सिर भारी भरत जियं जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमान।।_अर्थ_ देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओं की सम्मति ( आपस का विचार ) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजी को संकोच हुआ। भरतजी ने अपने सब बोझा अपने ही सिर पर जाना और हृदय में करोड़ों ( अनेकों ) प्रकार के अनुमान ( विचार ) करने लगे।

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।। निज पन तजि राखेउ पन मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।_अर्थ_सब तरह से विचार करके अन्त में उन्होंने मन में यही निश्चय किया कि श्रीरामजी की आज्ञा में ही अपना कल्याण है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा। यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया ( अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया ) ।

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ। करि प्रनामु बोले भरत जोरी जलज जुग हाथ।।_अर्थ_श्रीजानकीनाथ ने सब प्रकार से मुझपर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया। तदनन्तर भरतजी दोनों करकमलों को जोड़कर प्रणाम करके बोले_

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।। गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।।_अर्थ_हे स्वामी ! हे कृपा के समुद्र ! हे अन्तर्यामी ! अब मैं ( अधिक ) क्या कहूं और क्या कहां ? गुरु महाराज को प्रसन्न और स्वामी को अनुकूल जानकर मेरे मलिन मन की कल्पित पीड़ा मिट गयी।

अपडर डरेउं न सोच समूलें। रबिहिं न दोसु देव दिसि भूलें।। मोर अभागा मातु कुटिलाईं। बिधि गति विषम काल कठिनाई।।_अर्थ_मैं मिथ्या डर से ही डर गया था। मेरे सोच की जड़ ही न थी। दिशा भूल जाने पर हे देव ! सूर्य का दोष नहीं है। मेरा दुर्भाग्य, माता की कुटिलता, विधाता की टेढ़ी चाल और काल की कठिनता,

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।। यह नि रीति न राउरि होई। लोकहुं बेद बिदित नहिं गोई।।_अर्थ_इन सबने मिलकर पैर रोपकर ( प्रण करके ) मुझे नष्ट कर दिया था। परन्तु शरणागत के रक्षक आपने अपना ( शरणागत की रक्षा का ) प्रण निबाहा ( मुझे बचा लिया )। यह आपकी कोई अनोखी रीति नहीं है। यह लोक और वेदों में प्रकट है, छिपी नहीं है।

जगु अनुभव भल एकउ गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाई।। देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।_अर्थ_सारा जगत् बुरा ( करनेवाला ) हो, किन्तु हे स्वामी ! केवल एक आप ही भले ( अनुकूल ) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाई से भला हो सकता है ? हे देव ! आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है; वह भी कभी किसी के सम्मुख ( अनुकूल ) है, न विमुख ( प्रतिकूल )।

Thursday, 6 March 2025

अयोध्याकाण्ड

सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किया मुदित फुर भाषे।। प्रथम जो आयसु मो कहुं होई। मारें माना करउं सिख सोई।।_अर्थ_आपका रुख रखने में और आपकी आज्ञा को सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करने में ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षा को माथे पर चढ़ाकर करूं।

पुनि जेहिं कहं जस कहब गोसाईं। सो सब भांति घटिहिं सेवकाई।। कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहं बिचारु न राखा।।_अर्थ_फिर हे गोसाईं ! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से सेवा में लग जायगा ( आज्ञापालन करेगा )। मुनि वशिष्ठजी कहने लगे_हे राम ! तुमने सच कहा पर भरत के प्रेम ने विचार को नहीं रहने दिया।

तेहि ते कहंउ बहोरी बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।। मोरें जान भरत रुचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।_अर्थ_इसलिये मैं बार_बार अहंता हूं, मेरी बुद्धि भरत की भक्ति के वश हो गयी है। मेरी समझ में तो भरत की रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा।

भरत विनय सादर सुनिअ करिअ विचारी बहोरि। करीब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।_अर्थ_पहले भरत की विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उसपर विचार कीजिये। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ ( सार ) निकालकर वैसा ही ( उसी के अनुसार) कीजिये।

गुर अनुरागु भरत पर देखी। राम हृदय आनंदु बिसेषी।। भरतहिं धर्म धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।_अर्थ_भरतजी पर गुरुजी का स्नेह देखकर श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में विशेष आनंद हुआ। भरतजी को धर्मधुरंधर और तन, मन, वचन से अपना सेवक जानकर_

बोले गुर आयसु अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगल मूला।। नाथ साथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी गुरु की आज्ञा के अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याण के मूल वचन बोले_हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजी के चरणों की दुहाई है ( मैं सत्य कहता हूं कि ) विश्वभर में भरत के समान भाई कोई हुआ ही नहीं।

जे गुर पद अंबुज अनुरागी। तें लोकहुं बेद हुं बड़भागी।। राउर जा पर अस अनुरागू। को कहा सकइ भरत कर भागू।।_अर्थ_जो लोग गुरु के चरणकमलों के अनुरागी हैं, वे लोक में ( लौकिक दृष्टि से ) और वेद में ( पारमार्थिक दृष्टि से ) भी बड़भागी होते हैं ! ( फिर ) जिसपर आप ( गुरु ) का ऐसा स्नेह है, उस भरत के भाग्य को कौन कह सकता है ?

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।। भरतउज्ञकहहइं सोइ किएं भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।_अर्थ_छोटा भाई जानकर भरत के मुंह पर उसकी बड़ाई करने में मेरी बुद्धि सकुचाती है। ( फिर भी मैं तो यही कहूंगा कि ) भरत जो कुछ कहें, वहीं करने में भलाई है। ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी चुप हो रहे।

तब मुनि बोले भरत सन सब संकोचु तजि तात। कृपा सिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय के बात।।_अर्थ_तब मुनि भरतजी से बोले_हे तात ! सब संकोच त्यागकर कृपा के समुद्र अपने प्यारे भाई से अपने हृदय की बात कहो।

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।। लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहीं कछु करहिं बिचारू।।_अर्थ_ मुनि के वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर_गुरु तथा स्वामी को अपने अनुकूल जानकर_सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे।

पुलकि सरीर सभां में ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े।। कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।।_अर्थ_शरीर से पुलकित होकर वे सभा में खड़े हो गये। कमल के समान नेत्रों में प्रेमाश्रुओं  की बाढ़ आ गयी। ( वे बोले _) मेरा कहना तो मुनिनाथ ने ही निबाह दिया ( जो कुछ मैं कह सकता था वह उन्होंने ही कह दिया )। इससे अधिक मैं क्या कहूं ?

मैं जानउं निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।। मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूं देखी।।_अर्थ_अपने स्वामी का स्वभाव मैं जानता हूं। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेल में भी कभी उनकी रिस ( अप्रसन्नता) नहीं देखी।

सिसुपन तें परिहरेउं न संगू। कबहुंक न कीन्ह मोर मन भंगू।।  मैं प्रभु कृपा रीति जियं जोही। हारेहुं खेल जितावहिं मोहीं।।_अर्थ_बचपन से ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मन को कभी नहीं तोड़ा ( मेरे मन के प्रतिकूल कोई काम नहीं किया )। मैंने प्रभु की कृपा की रीति को हृदय में भली-भांति देखा (अनुभव किया है )। मेरे हारने पर भी खेल_खेल में मुझे जिता देते रहे हैं।

महूं सनेह संकोच बस सनमुख कहीं न बैन। दरसनु तृपित न आजु लगि पेम पियासे नैन।।_अर्थ_मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुंह नहीं खोला। प्रेम के प्यासे मेरे नेत्र प्रभु के दर्शन से तृप्त नहीं हुए।

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।। यहु कहते मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा।।_अर्थ_परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माता के बहाने ( मेरे और स्वामी के बीच ) अन्तर डाल दिया। यह भी कहना मुझे आज शोभा नहीं देता। क्योंकि अपनी समझ से कौन साधु और और पवित्र हुआ है ? ( जिसको दूसरे साधु और पवित्र माने वही साधु है )।

मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।। फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।।_अर्थ_माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूं, ऐसा हृदय में लाना ही करोड़ दुराचार के समान है। क्या कोदो की बाली उत्तम धान फल सकती है ? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है ?

सपनेहुं दोसक लेसु न काहू। मोर अभागा उदधि अवगाहू।। बिनु समझें निज अघ परिपाकू। जारिउं जायं जननि कहि काकू।।_अर्थ_स्वप्न में भी किसी को दोषी का वेष भी नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है। मैंने अपने पापों का परिणाम समझे बिना ही माता को कटु वचन कहकर व्यर्थ ही जलाया।

हृदयं हेरि हारेहुं सब ओरा। एकहि भांति भलेहिं भल मोरा।। गुर गोसाईं साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।_अर्थ_मैं अपने हृदय में सब ओर खोजकर हार गया ( मेरी भलाई का कोई साधन नहीं सूझता )। एक ही प्रकार भले ही ( निश्चय ही ) मेरा भला है। वह यह है कि गुरु महाराज सर्वसमर्थ हैं और श्रीसीतारामजी मेरे स्वामी हैं। इसी से परिणाम मुझे अच्छा जान पड़ता है।

साधु सभां गुर प्रभु निकट कहुं सुथल सतिभाउ। प्रेम प्रपंच कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।_अर्थ_ साधुओं की सभा में गुरुजी और स्वामी के समीप इस पवित्र तीर्थ_स्थान में मैं सत्यभाव से कहता हूं। यह प्रेम या प्रपंच ( छल_कपट ) झूठ है या सच ? इसे ( सर्वज्ञ ) मुनि वशिष्ठजी और ( अन्तर्यामी ) श्रीरघुनाथजी जानते हैं।

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगती सबु साखी।। देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जेहिं दुसह जर पुर नर नारीं।।_अर्थ_ प्रेम के प्रण को निबाहकर महाराज ( पिताजी)_का मरना और माता की कुबुद्धि, दोनों का सारा संसार साक्षी है। माताएं व्याकुल हैं, वे देखी नहीं जातीं। अवधपुरी के नर नारी दु:सह ताप से जल रहे हैं।

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउं सब सूला।। सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेस लखन सिय साथा।। बिनु पानहिन्ह पयादेहिं पाएं। संकरु साखी रहेंउं एहि घाएं।। बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।_अर्थ_मैं ही इन सारे अनर्थों का मूल हूं, यह सुन और समझकश्र मैंने दु:ख सहा है। श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण और सीताजी के साथ मुनियों का_सा वेष धारण कर बिना जूते पहने पांव_प्यादे ( पैदल ) ही वन को चले गये, यह सुनकर शंकरजी भी साक्षी हैं, इस घाव से मैं जीता रहा गया ( यह सुनते ही मेरे प्राण नहीं निकल गये ! फिर निषादराज का प्रेम देखकर भी इस वज्र से भी कठोर हृदय में छेद नहीं हुआ ( यह फटा नहीं)।

अब सबु आंखिन्ह देखेउं आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।। जिन्हहि निरखि मग सांपिनि बीती। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।_अर्थ_अब यहां आकर सब आंखों देखा लिया। यह जड़ जीव जीता रहकर सभी सहावेगा। जिनको देखकर रास्ते की सांपिनि और बीती भी अपने भयानक विष और तीव्र क्रोध को त्याग देती है_।

तेहि रघुनंदन लखनु सिय अनहित लागे जाहि। जासु तनय तजि दुसह दुख दैव सहावइ काहि।।_अर्थ_ वे ही श्रीरघुनंदन, लक्ष्मण और सीता जिसको शत्रु जान पड़े, उस कैकेयी के पुत्र मुझको छोड़कर दैव दु:सह दुख और किसे सहावेगा ?

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरती प्रीति विनय नय सानी।। सोक मगन सब सभा कहां खभारू। मनहुं कमल बन प्रेम तुषारू।।_अर्थ_ अत्यन्त व्याकुल तथा दु:ख, प्रेम, विनय और नीति में सनी हुई भरतजी की श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोक में मग्न हो गये, सारी सभा में विषाद छा गया। मानो कमर के वन पर पाला पड़ गया हो।

कहि अनेक विधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ज्ञानी।। बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।_अर्थ_तब ज्ञानी मुनि वशिष्ठजी ने अनेक प्रकार की पुरानी ( ऐतिहासिक ) कथाएं कहकर भरतजी का समाधान किया। फिर सूर्यकुल रूपी कुमुद वन के प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा श्रीरघुनन्दन उचित वचन बोले_।

तात जायं जियं करहु गलानी। इस अधीन जीव गति जानी।। तीनों काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें।।_अर्थ_हे तात ! तुम अपने हृदय में व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीव की गति को इश्वर के अधीन जानो। मेरे मत में ( भूत, भविष्य, वर्तमान ) तीनों कालों और ( स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल ) तीनों लोकों के सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं।

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाईं। जाइ लोक परलोकु नसाई।। दोसु देहिं जननिहिं जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभां नहिं सेई।।_अर्थ_हृदय में तुमपर भी कुटिलता का आरोप करने से यह लोक ( यहां के सुख_यश आदि ) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है ( मरने के बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती )। माता कैकेयी को तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया है।

मिटिहहि पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।_अर्थ_हे भरत ! तुम्हारा नाम_स्मरण करते ही सब पाप, प्रपंच ( अज्ञान ) और समस्त अमंगलों के समूह मिट जायेंगे तथा इस लोक में सुन्दर यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा।

कहुं सुभाऊ सत्य सिवा साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतर्क करहु जनि जाएं। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएं।।_अर्थ_हे भरत ! मैं स्वभाव से ही सत्य कहता हूं, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है‌ । हे तात ! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। वैर और प्रेम छिपाने नहीं छिपते।