Monday, 7 September 2026

अरण्यकाण्ड

रूप ताहि विधि नारि संवारी। रति संत कोटि जासु बलिहारी।। जासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करिहिं परिहासा।।_अर्थ_विधाता ने उस स्त्री को ऐसी रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति ( कामदेव की स्त्री ) उसपर निछावर हैं । उन्हीं के छोटे भाई ने मेरे नाक_कान काट डाले। मैं तेरी बहिन हूं, यह सुनकर वे मेरी हंसी करने लगे।

खर दूषन सुनि लगे पुकारा।। छन महुं सकल कटक उन्ह मारा।। खर दूषन थिसिरा कर गाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।_अर्थ_मेरी पुकार सुनकर खर_दूषण सहायता करने आये। पर उन्होंने क्षणभर में सारी सेना को मार डाला। खर_दूषण और त्रिशिरा का वध सुनकर रावण के सारे अंग जल उठे।

सूपनखहिं समुझाई करि बल बोलेसि बहु भांति। गयउ भवन अति सोचबस नींद परि नहिं राति।।_अर्थ_उसने सूर्पनखा को समझाकर बहुत प्रकार से अपने बल का बखान किया, किन्तु ( मन में ) वह अत्यन्त चिंता वश होकर अपने महल में गया, उसे रातभर नींद नहीं आयी।

सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहं कोउ नाहीं।। खर दूषण मोहि हम बलवंता। तिन्हहिं को मारइ बिनु भगवंता।।अर्थ_( वह मन_,ही_मन विचार करने लगा_) देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियों में ऐसा कोई नहीं जो मेरे सेवक को भी पा सके। खर_दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे। उन्हें भगवान् के सिवा और कौन मार सकता है ?

सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।। जौं मैं जाइ बैरु सखि करऊं। प्रभु सर प्रान तजे भव तरऊं।।_अर्थ_देवताओं को आनंद देनेवाले और पृथ्वी का भार हरण करनेवाले भगवान् ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूंगा और प्रभु के बाण ( के आघात )_से प्राण छोड़कर भवसागर से तय जाऊंगा।


होइहहिं भजन न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।। जौं नर रूप भूपसुत कोए। हरि ऊं नारि जीतिए रन दोऊ।।_अर्थ_इस तामस शरीर से भजन तो होगा नहीं; अतएव मन, वचन और कर्म से यही दृढ़ निश्चय है। और यदि वे मनुष्य रूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनों को रण में जीतकर उनकी स्त्री को हर लूंगा।


चला अकेल जान चढ़ि तहवां। बस मारीच सिंधु तट जहवां।। इहां राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।_अर्थ_( यों विचारकर ) रावण रथ पर चढ़कर अकेला ही वहां गया, जहां समुद्र के तट पर मारीच रहता था। ( शिवजी कहते हैं कि_) हे पार्वती ! यहां श्री रामचन्द्रजी ने जैसी युक्ति रची, वह सुन्दर कथा सुनो।


लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद। जनक सुता सन बोले बिवन में गये, तब हसि कृपा सुख बृंद।।_अर्थ_लक्ष्मणजी जब कन्द_मूल_फल लेने के लिये वन में गये, तब ( अकेले में ) कृपा और सुख के समूह श्रीरामचन्द्रजी हंसकर जानकी जी से बोले_।


सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुशीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।। तुम्ह पावक महुं करहु निवासा। जौं लगि करौं निसार नासा।।_अर्थ_हे प्रियेश ! हे सुन्दर पतिव्रत धारण करनेवाली सुशीले ! सुनो ! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूंगा। इसीलिये जबतक मैं राक्षसों का नाश करूं, जबतक तुम अग्नि में निवास करो।


 जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियं अनल समानी।। निज प्रतिबिम्ब राखि तब सीता। तैसा सील रूप सुबिनीता।।_अर्थ_श्रीरामजी ने ज्योंहि सब समझाकर कहा, त्योंही सीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गयीं। सीताजी ने अपनी ही छाया मूर्ति वहां रख दी, जो उनके जैसे_ही शील_स्वभाव और रूपधारी तथा वैसे ही विनम्र थी।


लछिमनहु यह मरम न जाना । जो कछु चरित रचा भगवाना।
दसमुख गयउ जहां मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।।अर्थ_भगवान ने कुछ लीला रची, इस रहस्य को लक्ष्मण जी ने भी नहीं जाना। स्वार्थपरायण और नीच रावण वहां गया जहां मारीच था और उसको सिर नवाया।

नवनि नीच के अति दुखदाई। जिमि अंकुश धनु उरग बिलाई।। भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।_अर्थ_नीच का झुकना ( नम्रता ) भी अत्यन्त दुखदायी होता है। 
जैसे अंकुश, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना है। हे भवानी ! दुष्ट की मीठी वाणी भी ( उसी प्रकार ) भय देनेवाली होती है जैसे बिना ऋतु के फूल ।

करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन व्यग्र अति
अक्सर आयहु तात।।_अर्थ_तब मारीच ने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी_हे तात ! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं।

दसमुख सकल कथा तेहि आगे। कही सहित अभिमान अभागे।। दसमुख सकल कथा तेहि आगे। कही सहित अभिमान अभागे।।_अर्थ_भाग्यहीन रावण ने सारी कथा अभिमान सहित उसके सामने कही ( और फिर कहा_) तुम छल करनेवाले कपटमृग बनो, जिस उपाय से मैं उस राजवधू को हर लाऊं।


तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नर रूप चराचर ईसा।। तासों तात बयरु नहीं कीजै। मारें मारिअ जिआएं जीजै।।_अर्थ_तब उसने ( मारीच ) ने कहा_हे दशशीश ! सुनिये, वे मनुष्य रूप में चराचर के ईश्वर हैं। हे तात ! उनसे वैर न कीजिये। उन्हीं के मारने से मरना और जिलाने से जीना होता है। सबका जीवन_मरण उन्हीं के अधीन है।

मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।। सत जोजन आयउं छन माहीं। तिन्ह सन बयरु कियें भल नाहीं।।_यही राजकुमार मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिये गये थे। उस समय श्री रघुनाथजी ने बिना फर का बाण मुझे मारा था , जिससे मैं क्षणभर में सौ योजन पर आ गिरा। उनसे वैर करने ममें भलाई नहीं है।

भइ मम कीट भृंग की नाई। जहं तहं मैं देखउं दोउ भाई।। जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।_अर्थ_मेरी दशा तो भृंगी के कीड़े की_सी हो गयी है। अब मैं जहां _तहां श्रीराम लक्ष्मण दोनों भाईयों को ही देखता हूं। और हे तात ! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करने में पूरा न पड़ेगा  ( सफलता नहीं मिलेगी )।


जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड। खरदूषन थिसिरा बधेउ मनुज कि अब बरिबंड।।_अर्थ_जिसने ताड़का और सुबाहु को मारकर शिवजी का धनुष तोड़ दिया और खर,दूषण और त्रिशिरा का वध कर डाला, ऐसा प्रचंड बलि भी कहीं मनुष्य हो सकता है ?


जासु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।  गुरु जिमि मूढ़ कृषि मम बोधा।  कहुं जग मोहि समान को जोधा।।_अर्थ_अत: अपने कुल की कुशल वविचारकर आप घर लौट जाइये। यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत _सी गालियां दी ( दुर्वचन कहे )। ( कहा_) अरे मूर्खो ! तू गुरु की तरह मुझे ज्ञान सिखाता है ? बताओ तो, संसार में मेरे समान योद्धा कौन है ? 

तब मारीच हृदयं अनुमाना। नवहि बिरोधें नहीं कल्याना। सस्त्री भर्ती प्रभु सठ धनी। बैल संधि कि भानस गुनी।।_अर्थ_तब मारीच ने हृदय में अनुमान किया कि शस्त्री  ( शस्त्रधारी ), मर्मी ( भेद जाननेवाला ), समर्थ, स्वामी, मूर्ख, धनवान, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया_इन नौ व्यक्तियों से विरोध ( वैर ) करने में कल्याण ( कुशल ) नहीं होता।

उभय भांति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।। उतरु देते मोहि बध भागें। कह न मरौं रघुपति सर लागे।।_अर्थ_जब मारीच ने दोनों प्रकार से अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजी की शरण तकी ( अर्थात् उनकी शरण जाने में ही कल्याण समझा )। ( सोचा कि ) उत्तर देते ही ( माहीं करते ही ) यह अभागा मुझे मारा डालेगा। फिर श्री रघुनाथ जी के बाण लगने से ही क्यों न मरूं ?

अब जिअं जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।। मन अति हरष जनाव न तेंही। अंजु देखि उन परम सनेही।।_अर्थ_हृदय में ऐसा समझकर वह रावण के साथ चला। श्रीरामजी के चरणों में उसका अखंड प्रेम है। उसके मन में इस बात का अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्नेही श्रीरामजी को देखूंगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावण को नहीं जनाया।

निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं। श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं।। निर्बान दायक क्रोध जाकर भगति अबसहि बसकरी। निज पानि सर संधानि हो मोहि बधिहि सुख सागर हरी।।_अर्थ_( वह मन_ही_मन सोचने लगा_)अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों को सफल करके सुख पाऊंगा। जानकी सहित और छोटे भाई लक्ष्मण सहित कृपा निधान श्रीरामजी के चरणों में मन लगाऊंगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश ( किसी के वश में न होनेवाले स्वतंत्र भगवान् )_को भी वश में करनेवाली है, कहा ! वे ही आनंद के समुद्र श्रीहरि अपने हाथों से बाण संधानकर मेरा वध करेंगे !

मम पाछें धर दावत धरें सरासन बाण। फिरि फिलिम प्रभुहिं बिलोकिहउं धन्य न हो सम आन।।_अर्थ_धनुष_बाण धारण किये मेरे पीछे_पीछे पृथ्वी पर ( पकड़ने के लिये ) दौड़ते हुए प्रभु को मैं फिर_फिरकर देखूंगा। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है।

तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।  अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।।_अर्थ_जब रावण उस वन के ( जिस वन में श्रीरघुनाजी रहते थे ) निकट पहुंचा, तब मारीच कपटमृग बन गया। वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ ।वर्णन नहीं किया जा सकता। सोने का शरीर मणियों को जड़कर बनाया था।

सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर वेषा।। सुनहु देव रघुवीर कृपाला। जेहिं मृग कर अति सुंदर छाला।।_अर्थ_सीता ने उस परम सुंदर हिरण को देखा, जिसके अंग अंग की छटा अत्यन्त मनोहर थी। ( वे कहने लगीं _) हे देव ! हे कृपालु रघुवीर ! सुनिये ! इस मृग की छाल बहुत ही सुंदर है।

सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।। तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काज संवारन।।_अर्थ_जानकीजी ने कहा_हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो ! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये। तब श्रीरघुनाथजी ( मारीच के कपटमृग बनने का ) सब कारण जानते हुए भी, देवताओं का कार्य बनाने के लिये हर्षित होकर उठे।

मृग बिलोकि कटि परिकर बांधा। करतल चाप रुचिर सर सांधा।। प्रभु लछिमनहिं कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।।_अर्थ_हिरन को देखकर श्रीरामजी ने कमर में फेंका बांधा और हाथ में धनुष लेकर उसपर सुंदर ( दिव्य ) बाण चढ़ाया। फिर प्रभु ने लक्ष्मण जी को समझाकर कहा_हे भाई ! वन में बहुत _से राक्षस फिरते हैं।


सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।। प्रभु हि बिलोकि चला मृग भांजी। धाए राम सरासन साजी।।_अर्थ_तुम बुद्धि और विवेक के द्वारा बल और समय का विचार करके सीता की रखवाली करना। प्रभु को देखकर मृग भाग चला। श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े।

निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।। कबहुं निकट पुनि दूरि पराई। कबहुंक प्रगटइ कबहुं छपाई।।_अर्थ_वेद जिनके विषय में  'नेति_नेति' कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यान में नहीं पाते ( अर्थात् जो मन और वाणी से नितांत परे हैं ), वे ही श्रीरामजी माया से बने हुए मृग के पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रगट हो जाता है कभी छिप जाता है। इधर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भीष्मजी का भक्तिभाव देखकर सहसा उठे और तुरंत रथ पर जा बैठे।


प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयी लै दूरी।। तब ताकि राम कठिन सर मारा। धरि परेउ करि घोर पुकारा।।_अर्थ_इस प्रकार प्रकट होता हुआ और छिपता हुआ तथा बहुतेरे छल करता हुआ वह प्रभु को दूर ले गया। तब श्रीरामचन्द्र जी ने तककर ( निशाना साधकर ) कठोर बाण मारा, ( जिसके लगते ही ) वह घोर शब्द करके पृथ्वी पर गिर पड़ा।

लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पांचवें सुमिरेसि मन महुं रामा।। प्रान तजे प्रगटेसि निज देहा। सुमेरेसि रामु समेत सनेहा।।_अर्थ_पहले लक्ष्मण जी का नाम लेकर उसने पीछे मन में श्रीरामजी का स्मरण किया। प्राण त्याग करते समय उसने अपना ( राक्षसी ) शरीर प्रकट किया और प्रेम सहित श्रीरामजी का स्मरण किया।


अंतर प्रेम जासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।_अर्थ_सुजान ( सर्वज्ञ ) श्रीरामजी ने उसके हृदय के प्रेम को पहचानकर उसे यह गति ( अपना परमपद ) जो मुनियों को भी दुर्लभ है।