Tuesday, 29 September 2026

अरण्यकाण्ड

बिपुल सुमन सुर बरसहिं गावहिं प्रभु गुन गाथ। निज पद दीन्ह असुर कहुं दीनबंधु रघुनाथ।।_अर्थ_ देवता बहुत _से फूल बरसा रहे हैं और प्रभु के गुणों की गाथाएं ( स्तुतियां ) गा रहे हैं ( कि ) श्रीरघुनाथजी ऐसे दीनबंधु हैं कि उन्होंने असुर को भी अपना परम पद दे दिया।

खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तूनीरा।। आरत गिरा सुनि जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता।।_अर्थ_दुष्ट मारीच को मारकर श्रीरघुवीर तुरंत लौट पड़े। हाथ में धनुष और कमर में तरकस शोभा दे रहा है। इधर जब सीताजी ने दु:गहरी वाणी ( मरते समय मारीच की 'हा लक्षमण' की आवाज ) सुनी तो वे बहुत ही भयभीत होकर लक्ष्मणजी से कहने लगीं_

जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता।। भृकुटि बिंदास सृष्टि लय होई। सपनेहुं संकट परइ कि सोई।।_अर्थ_तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे बड़े भाई संकट में हैं। लक्ष्मण जी ने हंसकर कहा_हे माता ! सुनो, जिनके भृकुटिविलास ( भौं के इशारे ) मात्र से सारी सृष्टि का लय ( प्रलय हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वन में भी संकट में पड़ सकते हैं ?

मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला।।  बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहां रावन ससि राहू।।_अर्थ_ इसपर सीताजी जब कुछ मर्म_वचन ) कहने लगीं, तब भगवान् की प्रेरणा से लक्ष्मणजी का मन चंचल हो उठा वे श्री सीताजी को वन और दिशाओं के देवताओं को सौंपकर वहां चले जहां रावण रूपी चन्द्रमा के लिये राहूरूप श्रीरामजी थे।

सून बीच दसकंधर देखा। आशा निकट जती कें वेषा। जाके बल सुर असुर डेराहीं। निसि न नींद दिन अन्न न खाहीं।।_अर्थ_रावण सूना मौका देखकर रति ( संन्यासी ) के वेष में श्री सीताजी के समीप आया। जिसके डर से देवता और असुर इतना डरते हैं कि रात को नींद नहीं आती और दिन में ( भरपेट ) अन्न नहीं खाते_


सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितई चला भड़िहाईं।। जिमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा।।_ अर्थ_वही दस सिर वाला रावण कुत्ते की तरह इधर_उधर ताकता हुआ भड़िहाई ( चोरी )_के लिये चला।( काकभुशुंडीजी कहते हैं _) हे गरुड़जी ! इस प्रकार कुमार्ग पर पैर रखते ही शरीर में तेज तथा बुद्धि एवं बल का लेश भी नहीं रह जाता।


नाना विधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई।। कह सीता सुनु जाती गोसाईं। बोले हुं बचन दुष्ट की नाईं।।_अर्थ_रावण ने अनेकों प्रकार की सुहावनी कथाएं रचकर सीताजी को राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया। सीताजी ने कहा_हे जति गोसाईं ! तुमने तो दुष्ट की तरह वचन कहे।

तब रावण निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनाना।। कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहुं खल ठाढ़ा।।_अर्थ_तब रावण ने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गयीं। उन्होंने गहरा धीरज धरकर कहा_'अरे दुष्ट ! खड़ा तो यह, प्रभु आ गये।'

जिमि हरिबधुहि छुद्र सब चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा।। सुनत बचन दस-सीस रिसाना। मन महुं चरन बंधि सुख माना।।_अर्थ_जैसे सिंह की स्त्री को तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज ! तू ( मेरी चाह करके ) काल के वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावण को क्रोध आ गया, परन्तु मन में उसने सीताजी के चरणों की वन्दना करके सुख माना। 

क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ। चला गगनपथ आतुर भय रथ हांकि न जाई।।_अर्थ_फिर क्रोध में भरकर रावण ने पर कर रावण ने सीताजी को रथ पर बैठा लिया और वह बड़ी उतावली के साथ आकाशमार्ग से चला; किन्तु डर के मारे उससे रथ हांका नहीं जाता था।

हा जग एक वीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया।। आरति हरन सरन सरन सुखदायक। हा रघुकुलसरोज दिननायक।।_अर्थ_ ( सीताजी विलाप कर रही थीं_) हां जगत् के अद्वितीय वीर श्रीरघुनाथजी ! आपने किस अपराध से मुझपर दया भुला दी । हे दु:कों के रहनेवाले, हे शरणागत को सुख देनेवाले, हां रघुकुल के कमल सूर्य !

हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फल पायउं कीन्हेउं रोसा।। बिबिध बिलाप करि बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही।।_अर्थ_ हा लक्ष्मण ! तुम्हारा दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया, उसका फल पाया। श्रीजानकीजी बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं_( हाय ! ) प्रभु की कृपा तो बहुत है, परन्तु वे स्नेही प्रभु बहुत दूर रह गये हैं।

बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा।। सीता कै विलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी।।_अर्थ_प्रभु को मेरी यह विपत्ति कौन सुनावें ? यज्ञ के अन्न को गदहा खाना चाहता है। सीताजी का भारी विलाप सुनकर जड़_चेतन सभी जीव दु:की हो गये।

गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी।। अधम निसार लीन्हें जाई। जिमि म्लेच्छ बस कपिला गाई।।_अर्थ_गीधराज जटायु ने सीताजी की दु:गहरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी हैं। ( उसने देखा कि ) नीच राक्षस इनको ( बुरी तरह ) लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के पाले पड़ गयी हो।

सीते पुत्री करसि जनि त्रासा। करिहउं जातुधान कर नासा।। धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुं जैसे।।_अर्थ_( वह बोला_) हे बीते पुत्री ! भय मत कर। मैं इस राक्षस का नाश करूंगा। ( यह कह ) वह पक्षी क्रोध में भरकर ऐसे दौड़ा, जैसेज्ञपर्वत की ओर वज्र छूटता हो।


रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही। आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना।।_अर्थ_ ( उसने ललकारकर कहा_) रे रे दुष्ट ! खड़ा क्यों नहीं होता ? निडर होकर चल दिया! मुझे तुमने नहीं जाना ? उसको यमराज के समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मन में अनुमान करने लगा_)

की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।। जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीर्थ छांड़िहि देहा।।_अर्थ_यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़। पर वह ( गरुड़ ) तो अपने स्वामी विष्णु सहित मेरे बल को जानता है। ( कुछ पास आने पर ) रावण ने उसे पहचान लिया ( और  बोला_) यह तो बूढ़ा जटायु है ! यह मेरे हाथ रुपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा।

की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई।। जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छांड़िहि देहा।।_अर्थ_यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़। पर वह ( गरुड़ ) तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरे बल को जानता है। ( कुछ पास आने पर ) रावण ने उसे पहचान लिया ( और बोला_ ) यह तो बूढ़ा जटायु है ! यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा।

सुनत गीध क्रोधातुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा।। तजि जानकिहि कुल गृह जाहू। नाहिं त अब होइहि बहुबाहू।।_अर्थ_यह सुनते ही गीध क्रोध में भरकर बड़े वेग से दौड़ा और बोला_रावण ! मेरी सिखावन सुन ! जानकी जी को छोड़कर कुशलपूर्वक  अपने घर चला जा। नहिं तो हे बहुत भुजाओं वाले !ऐसा होगा कि_  

राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल नाश  कुल तोरा।। उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा।।_अर्थ_ श्रीरामजी के क्रोध रुपी अत्यन्त भयानक अग्नि में तेरा साया वंश पतिंगा ( होकर भस्म ) हो जायगा। योद्धा रावण कुछ उत्तर नहीं देता। तब गीध क्रोध करके दौड़ा।

धरि कच बिरज कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा।। चोचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेंही।।_अर्थ_उसने ( रावण के ) बाल पकड़कर उसे रथ के नीचे उतार दिया, रावण पृथ्वी पर गिर पड़ा। गीध सीताजी को एक ओर बैठाकर फिर लौटा और चोंच से मार_मारकर रावण के शरीर को विदीर्ण कर डाला। इसी से उसे एक घड़ी के लिये मूर्छा हो गयी।

Monday, 7 September 2026

अरण्यकाण्ड

रूप ताहि विधि नारि संवारी। रति संत कोटि जासु बलिहारी।। जासु अनुज काटे श्रुति नासा। सुनि तव भगिनि करिहिं परिहासा।।_अर्थ_विधाता ने उस स्त्री को ऐसी रूप की राशि बनाया है कि सौ करोड़ रति ( कामदेव की स्त्री ) उसपर निछावर हैं । उन्हीं के छोटे भाई ने मेरे नाक_कान काट डाले। मैं तेरी बहिन हूं, यह सुनकर वे मेरी हंसी करने लगे।

खर दूषन सुनि लगे पुकारा।। छन महुं सकल कटक उन्ह मारा।। खर दूषन थिसिरा कर गाता। सुनि दससीस जरे सब गाता।।_अर्थ_मेरी पुकार सुनकर खर_दूषण सहायता करने आये। पर उन्होंने क्षणभर में सारी सेना को मार डाला। खर_दूषण और त्रिशिरा का वध सुनकर रावण के सारे अंग जल उठे।

सूपनखहिं समुझाई करि बल बोलेसि बहु भांति। गयउ भवन अति सोचबस नींद परि नहिं राति।।_अर्थ_उसने सूर्पनखा को समझाकर बहुत प्रकार से अपने बल का बखान किया, किन्तु ( मन में ) वह अत्यन्त चिंता वश होकर अपने महल में गया, उसे रातभर नींद नहीं आयी।

सुर नर असुर नाग खग माहीं। मोरे अनुचर कहं कोउ नाहीं।। खर दूषण मोहि हम बलवंता। तिन्हहिं को मारइ बिनु भगवंता।।अर्थ_( वह मन_,ही_मन विचार करने लगा_) देवता, मनुष्य, असुर, नाग और पक्षियों में ऐसा कोई नहीं जो मेरे सेवक को भी पा सके। खर_दूषण तो मेरे ही समान बलवान थे। उन्हें भगवान् के सिवा और कौन मार सकता है ?

सुर रंजन भंजन महि भारा। जौं भगवंत लीन्ह अवतारा।। जौं मैं जाइ बैरु सखि करऊं। प्रभु सर प्रान तजे भव तरऊं।।_अर्थ_देवताओं को आनंद देनेवाले और पृथ्वी का भार हरण करनेवाले भगवान् ने ही यदि अवतार लिया है तो मैं जाकर उनसे हठपूर्वक वैर करूंगा और प्रभु के बाण ( के आघात )_से प्राण छोड़कर भवसागर से तय जाऊंगा।


होइहहिं भजन न तामस देहा। मन क्रम बचन मंत्र दृढ़ एहा।। जौं नर रूप भूपसुत कोए। हरि ऊं नारि जीतिए रन दोऊ।।_अर्थ_इस तामस शरीर से भजन तो होगा नहीं; अतएव मन, वचन और कर्म से यही दृढ़ निश्चय है। और यदि वे मनुष्य रूप कोई राजकुमार होंगे तो उन दोनों को रण में जीतकर उनकी स्त्री को हर लूंगा।


चला अकेल जान चढ़ि तहवां। बस मारीच सिंधु तट जहवां।। इहां राम जसि जुगुति बनाई। सुनहु उमा सो कथा सुहाई।।_अर्थ_( यों विचारकर ) रावण रथ पर चढ़कर अकेला ही वहां गया, जहां समुद्र के तट पर मारीच रहता था। ( शिवजी कहते हैं कि_) हे पार्वती ! यहां श्री रामचन्द्रजी ने जैसी युक्ति रची, वह सुन्दर कथा सुनो।


लछिमन गए बनहिं जब लेन मूल फल कंद। जनक सुता सन बोले बिवन में गये, तब हसि कृपा सुख बृंद।।_अर्थ_लक्ष्मणजी जब कन्द_मूल_फल लेने के लिये वन में गये, तब ( अकेले में ) कृपा और सुख के समूह श्रीरामचन्द्रजी हंसकर जानकी जी से बोले_।


सुनहु प्रिया ब्रत रुचिर सुशीला। मैं कछु करबि ललित नरलीला।। तुम्ह पावक महुं करहु निवासा। जौं लगि करौं निसार नासा।।_अर्थ_हे प्रियेश ! हे सुन्दर पतिव्रत धारण करनेवाली सुशीले ! सुनो ! मैं अब कुछ मनोहर मनुष्यलीला करूंगा। इसीलिये जबतक मैं राक्षसों का नाश करूं, जबतक तुम अग्नि में निवास करो।


 जबहिं राम सब कहा बखानी। प्रभु पद धरि हियं अनल समानी।। निज प्रतिबिम्ब राखि तब सीता। तैसा सील रूप सुबिनीता।।_अर्थ_श्रीरामजी ने ज्योंहि सब समझाकर कहा, त्योंही सीताजी प्रभु के चरणों को हृदय में धरकर अग्नि में समा गयीं। सीताजी ने अपनी ही छाया मूर्ति वहां रख दी, जो उनके जैसे_ही शील_स्वभाव और रूपधारी तथा वैसे ही विनम्र थी।


लछिमनहु यह मरम न जाना । जो कछु चरित रचा भगवाना।
दसमुख गयउ जहां मारीचा। नाइ माथ स्वारथ रत नीचा।।अर्थ_भगवान ने कुछ लीला रची, इस रहस्य को लक्ष्मण जी ने भी नहीं जाना। स्वार्थपरायण और नीच रावण वहां गया जहां मारीच था और उसको सिर नवाया।

नवनि नीच के अति दुखदाई। जिमि अंकुश धनु उरग बिलाई।। भयदायक खल कै प्रिय बानी। जिमि अकाल के कुसुम भवानी।।_अर्थ_नीच का झुकना ( नम्रता ) भी अत्यन्त दुखदायी होता है। 
जैसे अंकुश, धनुष, सांप और बिल्ली का झुकना है। हे भवानी ! दुष्ट की मीठी वाणी भी ( उसी प्रकार ) भय देनेवाली होती है जैसे बिना ऋतु के फूल ।

करि पूजा मारीच तब सादर पूछी बात। कवन हेतु मन व्यग्र अति
अक्सर आयहु तात।।_अर्थ_तब मारीच ने उसकी पूजा करके आदरपूर्वक बात पूछी_हे तात ! आपका मन किस कारण इतना अधिक व्यग्र है और आप अकेले आये हैं।

दसमुख सकल कथा तेहि आगे। कही सहित अभिमान अभागे।। दसमुख सकल कथा तेहि आगे। कही सहित अभिमान अभागे।।_अर्थ_भाग्यहीन रावण ने सारी कथा अभिमान सहित उसके सामने कही ( और फिर कहा_) तुम छल करनेवाले कपटमृग बनो, जिस उपाय से मैं उस राजवधू को हर लाऊं।


तेहिं पुनि कहा सुनहु दससीसा। ते नर रूप चराचर ईसा।। तासों तात बयरु नहीं कीजै। मारें मारिअ जिआएं जीजै।।_अर्थ_तब उसने ( मारीच ) ने कहा_हे दशशीश ! सुनिये, वे मनुष्य रूप में चराचर के ईश्वर हैं। हे तात ! उनसे वैर न कीजिये। उन्हीं के मारने से मरना और जिलाने से जीना होता है। सबका जीवन_मरण उन्हीं के अधीन है।

मुनि मख राखन गयउ कुमारा। बिनु फर सर रघुपति मोहि मारा।। सत जोजन आयउं छन माहीं। तिन्ह सन बयरु कियें भल नाहीं।।_यही राजकुमार मुनि विश्वामित्र के यज्ञ की रक्षा के लिये गये थे। उस समय श्री रघुनाथजी ने बिना फर का बाण मुझे मारा था , जिससे मैं क्षणभर में सौ योजन पर आ गिरा। उनसे वैर करने ममें भलाई नहीं है।

भइ मम कीट भृंग की नाई। जहं तहं मैं देखउं दोउ भाई।। जौं नर तात तदपि अति सूरा। तिन्हहि बिरोधि न आइहि पूरा।।_अर्थ_मेरी दशा तो भृंगी के कीड़े की_सी हो गयी है। अब मैं जहां _तहां श्रीराम लक्ष्मण दोनों भाईयों को ही देखता हूं। और हे तात ! यदि वे मनुष्य हैं तो भी बड़े शूरवीर हैं। उनसे विरोध करने में पूरा न पड़ेगा  ( सफलता नहीं मिलेगी )।


जेहिं ताड़का सुबाहु हति खंडेउ हर कोदंड। खरदूषन थिसिरा बधेउ मनुज कि अब बरिबंड।।_अर्थ_जिसने ताड़का और सुबाहु को मारकर शिवजी का धनुष तोड़ दिया और खर,दूषण और त्रिशिरा का वध कर डाला, ऐसा प्रचंड बलि भी कहीं मनुष्य हो सकता है ?


जासु भवन कुल कुसल बिचारी। सुनत जरा दीन्हिसि बहु गारी।।  गुरु जिमि मूढ़ कृषि मम बोधा।  कहुं जग मोहि समान को जोधा।।_अर्थ_अत: अपने कुल की कुशल वविचारकर आप घर लौट जाइये। यह सुनकर रावण जल उठा और उसने बहुत _सी गालियां दी ( दुर्वचन कहे )। ( कहा_) अरे मूर्खो ! तू गुरु की तरह मुझे ज्ञान सिखाता है ? बताओ तो, संसार में मेरे समान योद्धा कौन है ? 

तब मारीच हृदयं अनुमाना। नवहि बिरोधें नहीं कल्याना। सस्त्री भर्ती प्रभु सठ धनी। बैल संधि कि भानस गुनी।।_अर्थ_तब मारीच ने हृदय में अनुमान किया कि शस्त्री  ( शस्त्रधारी ), मर्मी ( भेद जाननेवाला ), समर्थ, स्वामी, मूर्ख, धनवान, वैद्य, भाट, कवि और रसोइया_इन नौ व्यक्तियों से विरोध ( वैर ) करने में कल्याण ( कुशल ) नहीं होता।

उभय भांति देखा निज मरना। तब ताकिसि रघुनायक सरना।। उतरु देते मोहि बध भागें। कह न मरौं रघुपति सर लागे।।_अर्थ_जब मारीच ने दोनों प्रकार से अपना मरण देखा, तब उसने श्रीरघुनाथजी की शरण तकी ( अर्थात् उनकी शरण जाने में ही कल्याण समझा )। ( सोचा कि ) उत्तर देते ही ( माहीं करते ही ) यह अभागा मुझे मारा डालेगा। फिर श्री रघुनाथ जी के बाण लगने से ही क्यों न मरूं ?

अब जिअं जानि दसानन संगा। चला राम पद प्रेम अभंगा।। मन अति हरष जनाव न तेंही। अंजु देखि उन परम सनेही।।_अर्थ_हृदय में ऐसा समझकर वह रावण के साथ चला। श्रीरामजी के चरणों में उसका अखंड प्रेम है। उसके मन में इस बात का अत्यन्त हर्ष है कि आज मैं अपने परम स्नेही श्रीरामजी को देखूंगा; किन्तु उसने यह हर्ष रावण को नहीं जनाया।

निज परम प्रीतम देखि लोचन सुफल करि सुख पाइहौं। श्री सहित अनुज समेत कृपानिकेत पद मन लाइहौं।। निर्बान दायक क्रोध जाकर भगति अबसहि बसकरी। निज पानि सर संधानि हो मोहि बधिहि सुख सागर हरी।।_अर्थ_( वह मन_ही_मन सोचने लगा_)अपने परम प्रियतम को देखकर नेत्रों को सफल करके सुख पाऊंगा। जानकी सहित और छोटे भाई लक्ष्मण सहित कृपा निधान श्रीरामजी के चरणों में मन लगाऊंगा। जिनका क्रोध भी मोक्ष देनेवाला है और जिनकी भक्ति उन अवश ( किसी के वश में न होनेवाले स्वतंत्र भगवान् )_को भी वश में करनेवाली है, कहा ! वे ही आनंद के समुद्र श्रीहरि अपने हाथों से बाण संधानकर मेरा वध करेंगे !

मम पाछें धर दावत धरें सरासन बाण। फिरि फिलिम प्रभुहिं बिलोकिहउं धन्य न हो सम आन।।_अर्थ_धनुष_बाण धारण किये मेरे पीछे_पीछे पृथ्वी पर ( पकड़ने के लिये ) दौड़ते हुए प्रभु को मैं फिर_फिरकर देखूंगा। मेरे समान धन्य दूसरा कोई नहीं है।

तेहि बन निकट दसानन गयऊ। तब मारीच कपटमृग भयऊ।।  अति बिचित्र कछु बरनि न जाई। कनक देह मनि रचित बनाई।।_अर्थ_जब रावण उस वन के ( जिस वन में श्रीरघुनाजी रहते थे ) निकट पहुंचा, तब मारीच कपटमृग बन गया। वह अत्यन्त ही विचित्र था, कुछ ।वर्णन नहीं किया जा सकता। सोने का शरीर मणियों को जड़कर बनाया था।

सीता परम रुचिर मृग देखा। अंग अंग सुमनोहर वेषा।। सुनहु देव रघुवीर कृपाला। जेहिं मृग कर अति सुंदर छाला।।_अर्थ_सीता ने उस परम सुंदर हिरण को देखा, जिसके अंग अंग की छटा अत्यन्त मनोहर थी। ( वे कहने लगीं _) हे देव ! हे कृपालु रघुवीर ! सुनिये ! इस मृग की छाल बहुत ही सुंदर है।

सत्यसंध प्रभु बधि करि एही। आनहु चर्म कहति बैदेही।। तब रघुपति जानत सब कारन। उठे हरषि सुर काज संवारन।।_अर्थ_जानकीजी ने कहा_हे सत्यप्रतिज्ञ प्रभो ! इसको मारकर इसका चमड़ा ला दीजिये। तब श्रीरघुनाथजी ( मारीच के कपटमृग बनने का ) सब कारण जानते हुए भी, देवताओं का कार्य बनाने के लिये हर्षित होकर उठे।

मृग बिलोकि कटि परिकर बांधा। करतल चाप रुचिर सर सांधा।। प्रभु लछिमनहिं कहा समुझाई। फिरत बिपिन निसिचर बहु भाई।।_अर्थ_हिरन को देखकर श्रीरामजी ने कमर में फेंका बांधा और हाथ में धनुष लेकर उसपर सुंदर ( दिव्य ) बाण चढ़ाया। फिर प्रभु ने लक्ष्मण जी को समझाकर कहा_हे भाई ! वन में बहुत _से राक्षस फिरते हैं।


सीता केरि करेहु रखवारी। बुधि बिबेक बल समय बिचारी।। प्रभु हि बिलोकि चला मृग भांजी। धाए राम सरासन साजी।।_अर्थ_तुम बुद्धि और विवेक के द्वारा बल और समय का विचार करके सीता की रखवाली करना। प्रभु को देखकर मृग भाग चला। श्रीरामचन्द्रजी भी धनुष चढ़ाकर उसके पीछे दौड़े।

निगम नेति सिव ध्यान न पावा। मायामृग पाछें सो धावा।। कबहुं निकट पुनि दूरि पराई। कबहुंक प्रगटइ कबहुं छपाई।।_अर्थ_वेद जिनके विषय में  'नेति_नेति' कहकर रह जाते हैं और शिवजी भी जिन्हें ध्यान में नहीं पाते ( अर्थात् जो मन और वाणी से नितांत परे हैं ), वे ही श्रीरामजी माया से बने हुए मृग के पीछे दौड़ रहे हैं। वह कभी निकट आ जाता है और फिर दूर भाग जाता है। कभी तो प्रगट हो जाता है कभी छिप जाता है। इधर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण भीष्मजी का भक्तिभाव देखकर सहसा उठे और तुरंत रथ पर जा बैठे।


प्रगटत दुरत करत छल भूरी। एहि बिधि प्रभुहि गयी लै दूरी।। तब ताकि राम कठिन सर मारा। धरि परेउ करि घोर पुकारा।।_अर्थ_इस प्रकार प्रकट होता हुआ और छिपता हुआ तथा बहुतेरे छल करता हुआ वह प्रभु को दूर ले गया। तब श्रीरामचन्द्र जी ने तककर ( निशाना साधकर ) कठोर बाण मारा, ( जिसके लगते ही ) वह घोर शब्द करके पृथ्वी पर गिर पड़ा।

लछिमन कर प्रथमहिं लै नामा। पांचवें सुमिरेसि मन महुं रामा।। प्रान तजे प्रगटेसि निज देहा। सुमेरेसि रामु समेत सनेहा।।_अर्थ_पहले लक्ष्मण जी का नाम लेकर उसने पीछे मन में श्रीरामजी का स्मरण किया। प्राण त्याग करते समय उसने अपना ( राक्षसी ) शरीर प्रकट किया और प्रेम सहित श्रीरामजी का स्मरण किया।


अंतर प्रेम जासु पहिचाना। मुनि दुर्लभ गति दीन्हि सुजाना।।_अर्थ_सुजान ( सर्वज्ञ ) श्रीरामजी ने उसके हृदय के प्रेम को पहचानकर उसे यह गति ( अपना परमपद ) जो मुनियों को भी दुर्लभ है।