Sunday, 25 December 2016

बालकाण्ड---

 बालकाण्ड
प्रभु तोषेउ सुनि संकर बचना। भक्ति बिबेक धर्म जुत रचना।। कह प्रभु हर तुम्हार पन रहेऊ। अब उर राखेहु जो हम कहेऊ।।---अर्थ---शिवजी की भक्ति, ज्ञान और धर्म से युक्त वचन रचना सुनकर प्रभु रामचन्द्रजी संतुष्ट हो गये। प्रभु ने कहा---हे हर ( शिव ) आपकी प्रतिज्ञा पूरी हो गयी। अब हमने जो कहा है उसे हृदय में रखना।




अंतरधान भए अस भाषी। संकर सोइ मूरति उर राखी।। तबहिं सप्तरिषि सिव पहिं आए। बोले प्रभु अति बचन सुहाए।।---अर्थ---इस प्रकार कहकर श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्धान हो गये। शिवजी ने उनकी यह मूर्ति अपने हृदय में रख ली। उसी समय सप्तर्षि शिवजी के पास आये। प्रभु महादेवजी ने उनसे अत्यन्त सुहावने वचन कहे।




पारबती पहिं जाइ तुम्ह प्रेम परिच्छा लेहु। गिरिहिं प्रेरि पठएहु भवन दूरि करेहु संदेहु।।---अर्थ---आपलोग पारबती के पास जाकर उनके प्रेम की परीक्षा लीजिये और हिमाचल को कहकर ( उन्हें पार्वती को लिवा लाने के लिये भेजिये तथा ) पार्वती को घर भिजाइये और उनके संदेह को दूर कीजिये।  




रिषिन्ह गौरि देखी तहँ कैसी। मूरतिमंत तपस्या जैसी।। बोले मुनि सुनु सैलकुमारी। करहु कवन कारन तपु भारी।।---अर्थ---ऋषियों ने ( वहाँ जाकर) पार्वती को मूर्तिमान् तपस्या के रूप में देखा। मुनि बोले---हे सैलकुमारी ! सुनो, तुम किसलिये इतना कठोर तप कर रही हो।




केहि अवधाहहु का तुम्ह कहहु। हम सन सत्य मरमु किन कहहु।। कहत बचन मनु अति सकुचाई। हँसिहहु सुनि हमारि जड़ताई।।---अर्थ---तुम किसकी अराधना करती हो और क्या चाहती हो ? हमसे अपना सच्चा भेद क्यों नहीं कहती ? ( पार्वती ने कहा---) बात कहते मन बहुत सकुचाता है। आपलोग मेरी मूर्खता सुनकर हँसेंगे।



मनु हठ पड़ा न सुनइ सिखावा। चहत बारि पर भीति उठावा।। नारद कहा सत्य सोइ जाना। बिनु पंखन्ह हम उड़ाना।।---अर्थ---मन ने हठ पकड़ लिया है, वह उपदेश नहीं सुनता और जल पर दीवाल उठाना चाहता है। नारदजी ने जो कह दिया उसे सत्य जानकर मैं बिना ही पंख के उड़ना चाहती हूँ।



देखहु मुनि अबिबेकु हमारा। चाहिय सदा सिवहिं भरतारा।।---अर्थ---हे मुनियों ! आप मेरा अज्ञान तो देखिये कि मैं सदा शिवजी को ही पति बनाना चाहती हूँ।



सुनत बचन बिहसे रिषय गिरिसंभव तव देह। नारद कर उपदेसु सुनि कहहु बसेहु किस गेह।।---अर्थ---पार्वतीजी की बात सुनते ही रिषिलोग हँस पड़े और बोले---तुम्हारा शरीर पर्वत से ही तो उत्पन्न हुआ है। भला, कहो तो नारद का उपदेश सुनकर आजतक किसका घर बसा है ?






 दच्छसुतन्ह उपदेसेन्हि जाई। तिन्ह फिरि भवन देखा आई।। चित्रकेतु कर घरु उन घाला। कनकसिपु कर पुनि अस हाला।।---अर्थ---उन्होंने जाकर दच्छ के पुत्रों को उपदेश दिया था, जिससे उन्होंने लौटकर फिर घर का मुँह भी नहीं देखा। चित्रकेतू के घर को नारद ने ही चौपट किया। फिर यही हाल हिरण्यकशिपु का हुआ।




नारद सिख जे सुनहिं नर नारी। अवसि होहिं तजि भवन भिखारी।। मन कपटी तन सज्जन चीन्हा। आपु सरिस सबहिं चह कीन्हा।।---अर्थ---जो स्त्री-पुरुष नारद की सीख सुनते हैं, वे घर-बार छोड़कर अवश्य ही भिखारी हो जाते हैं। उनका मन तो कपटी है, शरीर पर सज्जनों के चिह्न हैं। वे सभी को अपने समान बनाना चाहते हैं।




तेहि कें बचन मानि बिस्वासा। तुम्ह चाहहु पति सहज उदासा।। निर्गुण निल्लज कुबेस कपाली। अकुल अगेह दिगम्बर ब्याली।।---अर्थ---उनके



वचनों पर विश्वास मानकर तुम ऐसा पति चाहती हो जो स्वभाव से ही उदासीन, गुणहीन, निर्लज्ज, बुरे वेषवाला, नर-कपालों की माला पहननेवाला, कुलहीन, बिना घर-बार का, नंगा और शरीर पर साँपों को लपेटे रखनेवाला है।




कहहु कवन सुख अस बरु पाएँ। भल भूलेहु ठग कै बौराएँ।। पंच कहे सिवँ सती बिबाही। पुनि अवडेरि मराएन्हि ताही।।---अर्थ---ऐसे वर के मिलने से कहो, तुम्हे क्या सुख होगा ? तुम उस ठग ( नारद ) के बहकावे में आकर खूब भूलीं। पहले पंचों के कहने से शिव ने सती से विवाह किया था, परन्तु फिर उसे त्यागकर मरवा डाला।




अब सुख सोवत सोचु नहिं भीख मागि भव खाहि। सहज एकाकिन्ह के भवन कबहुँ कि नारि खटाहिं।।---अर्थ---अब शिव को कोई चिन्ता नहीं रही, भीख माँगकर खा लेते हैं और सुख से सोते हैं। ऐसे स्वभाव से ही अकेले रहनेवाले के घर भी भला कभी स्त्रियाँ टिक सकती हैं।




अजहूँ मानहु कहा हमारा। हम तुम्ह कहुँ नीक बिचारा।। अति सुन्दर सुचि सुखद सुशीला। गावहिं बेद जासु जस लीला।।---अर्थ---अब भी हमारा कहा मानो, हमने तुम्हारे लिये अच्छा वर विचारा है। वह बहुत ही सुन्दर, पवित्र, सुखदायक और सुशील है, जिसका यश और लीला वेद गाते हैं।



दूषन रहित सकल गुन रासी। श्रीपति पुर बैकुण्ठ निवासी।। अस बरु तुम्हहिं मिलाउब आनी। सुनत बिहसि कह बचन भवानी।।---अर्थ---वह दोषों से रहित, सारे सद्गुणों की राशि, लक्ष्मी का स्वामी और बैकुण्ठपुरी का रहनेवाला है। हम ऐसे वर को लाकर तुमसे मिला देंगे। यह सुनते ही पार्वतीजी हँसकर बोलीं---





सत्य कहेहु गिरिभव तनु एहा। हठ छूट छूटै यह देहा।। कनकउ पुनि पषान तें होईं। जारेहुँ सहजु परिहर सोई।।---अर्थ---आपने यह सत्य ही कहा कि मेरा यह शरीर पर्वत से उत्पन्न हुआ है। इसलिये हठ नहीं छूटेगा, शरीर भले ही छूट जाय। सोना भी पत्थर से ही उत्पन्न होता है, सो यह जलाये जाने पर भी अपने स्वभाव ( सुवर्णत्व ) को नहीं छोड़ता।





नारद बचन मैं परिहरऊँ। बसउ भवनु उजरउ नहिं डरऊँ।। गुर के बचन प्रतीति जेहि। सपनेहुँ सुगम सुख सिधि तेही।।---अर्थ---अतः मैं नारदजी के वचनों को नहीं छोड़ूँगी; चाहे घर बसे या उजड़े, इससे मैं नहीं डरती। जिसको गुरु के वचनों में विश्वास नहीं है, उसको सुख और सिद्धि स्वप्न में भी सुगम नहीं होती।




महादेव अवगुन भवन विष्णु सकल गुन धाम। जेहि कर मन रम जाहि सन
तेहि तेही सन काम।।---अर्थ---माना कि महादेवजी अवगुणों के भवन हैं और विष्णु समस्त सद्गुणों के धाम हैं; पर जिसका मन जिसमें रम गया, उसको तो उसी से काम है।




जौं तुम्ह मिलतेहु प्रथम मुनीसा। सुनतिउँ सिख तुम्हार धरि सीसा।। अब मैं जन्मु संभु हित हारा। को गुन दूषन करै बिचारा।।---अर्थ---हेे मुनीश्वरों ! यदि आप पहले मिलते, तो मैं आपका उपदेश सिर माथे रखकर सुनती। परन्तु अब मैं अपना जन्म शिवजी के लिये हार चुकी। फिर गुण दोषों का विचार कौन करे ?





जौं तुम्हरे हठ हृदय बिसेषी। रहि जाइ बिनु किएँ बरेषी।। तौं कौतुकिअन्ह आलस नाहीं। बर कन्या अनेक जग माहीं।।---अर्थ---यदि आपके हृदय में बहुत ही हठ है और विवाह की बातचीत किये बिना आपसे रहा ही नहीं जाता, तो संसार में वर-कन्या बहुत हैं। खिलवाड़ करनेवालों को आलस्य तो होता ही नहीं ( और कहीं जाकर कीजिये )




जन्म कोटि लगि रगर हमारी। बरउँ संभु रहउँ कुआरी।। तजउँ नारद कर उपदेसू। आपु कहहिं सत बार महेसू।।---अर्थ---मेरा तो करोड़ जन्मों तक यही हठ रहेगा कि या तो शिवजी को वरूँगी, नहीं तो कुमारी ही रहूँगी। स्वयं शिवजी सौ बार कहें, तो भी नारदजी के उपदेश को छोड़ूँगी।



मैं पा परउँ कहइ जगदंबा। तुम्ह गृह गवनहु भयउ बिलंबा।। देखि प्रेम बोले मुनि ज्ञानी। जय-जय जगदंबिके भवानी।।---अर्थ---जगजननी पार्वतीजी ने फिर कहा कि मैं आपके पैरों पड़ती हूँ। आप अपने घर जाइये, बहुत देर हो गयी। ( शिवजी में पार्वतीजी का ऐसा प्रेम) देखकर ज्ञानीमुनि बोले---हे जगजननी ! हे भवानी ! आपकी जय हो ! जय हो !




तुम्ह माया भगवान सिव सकल जगत पितु मातु। नाइ चरन सिर मुनि चले पुनि पुनि हरषत गात।।---अर्थ---आप माया हैं और शिवजी भगवान् हैं। आप दोनो समस्त जगत के माता पिता हैं। ( यह कहकर ) मुनि पार्वतीजी के चरणों में सिर नवाकर चल दिये। उनके शरीर बार-बार पुलकित हो रहे थे।




जाइ मुनिन्ह हिमवंत पठाए। करि बिनती गिरिजहिं गृह ल्याए। बहुरि सप्तरिषि सिव पहिं जाई। कथा उमा कै सकल सुनाई।।---अर्थ---मुनियों ने जाकर हिमवान् को पा्वतीजी के पास भेजा और वे विनती करके उनको घर ले आए; फिर सप्तर्षियों ने शिवजी के पास जाकर उनको पार्वतीजी की सारी कथा सुनायी। 



भए मगन सिव सुनत सनेहा। हरषि सप्तरिषि गवने गेहा।। मनु थिर करि तब संभु सुजाना। लगे करन रघुनायक ध्याना।।---अर्थ---पार्वतीजी का प्रेम सुनते ही शिवजी आनन्दमग्न हो गये। सप्तर्षि प्रसन्न होकर अपने घर ( ब्रह्मलोक ) को चले गये। तब सुजान शिवजी मन को स्थिर करके श्रीरघुनाथजी का ध्यान करने लगे।




तारकु असुर भयउ तेहि काला। भुज प्रताप बल तेज बिसाला।। तहिं सब लोक लोकपति जीते। भए देव सुख संपति रीते।।---अर्थ---उसी समय तारक नाम का असुर हुआ, जिसकी भुजाओं का बल प्रताप और तेज बहुत बड़ा था। उसने सब लोक और लोकपालों को जीत लिया, सब देवता सुख और संपत्ति से रहित हो गये।




अजर अमर सो जीति जाई। हारे सुर करि बिबिध लड़ाई। तब बिरंचि सन जाइ पुकारे। देखे बिधि सब देव दुखारे।।.---अर्थ--- वह अजर-अमर था, इसलिये किसी से जीता नहीं जाता था। देवता उसके साथ बहुत तरह की लड़ाइयाँ लड़कर हार गये। तब उन्होंने ब्रह्माजी के पास जाकर पुकार मचायी। ब्रह्माजी ने सब देवताओं को दुःखी देखा।


सब सन कहा बुझाइ बिधि दनुज निधन तब होइ। संभु सुक्र संभूत सुत एहि जीतइ रन सोइ।।---अर्थ---ब्रह्माजी ने सबको समझाकर कहा---इस दैत्य की मृत्यु तब होगी जब शिवजी केवार्य से पुत्र उत्पन्न हो, इसको युद्ध में वही जीतेगा।


मोर कहा सुनि करहु उपाईं। होइहिं ईस्वर करिहिं सहाई।। सतीं जो तजी दच्छ मख देहा। जनमी जाइ हिमाचल गेहा।।---अर्थ---मेरी बात सुनकर उपाय करो। ईश्वर सहायता करेंगे और काम हो जायगा। सतीजी ने जो दक्ष के यज्ञ में देह का त्याग किया था, उन्होंने अब हिमाचल के घर जाकर जन्म लिया है।



तेहि तप कीन्ह संभु पति लागी। सिव समाधि बैठे सबु त्यागी।। जदपि अहइ असमंजस भारी। तदपि बात एक सुनहु हमारी।।---अर्थ---उन्होंने शिवजी को पति बनाने के लिये तप किया है, इधर शिवजी सब छोड़-छाड़कर समाधि लगा बैठे हैं। यद्यपि है तो बड़े असमंजस की बात; तथापि मेरी एक बात सुनो।

Friday, 18 November 2016

बालकाण्ड---

बालकाण्ड---

सतीं मरत हरि सन बरु मागा। जनम जनम शिव पद अनुरागा।। तेहि कारण हिमगिरि गृह जाईं। जनमीं पारबती तनु पाई।।---अर्थ---सती ने मरते मय हरि से यह वर माँगा कि मेरा जन्म-जन्म में शिवजी के चरणों में अनुराग रहे। इसी कारण उन्होंने हिमाचल के घर जाकर पार्वती के शरीर से जन्म लिया।


जब ते उमा सैल गृह जाईं। सकल सिद्धि संपति तहँ छाईं।। जहँ तहँ मुनिन्ह सुआश्रम कीन्हे। उचित बास हिम भूधर दीन्हे।।---अर्थ---जबसे उमाजी हिमाचल के घर जन्मीं तबसे वहाँ सारी सिद्धियाँ एवं सम्पत्तियाँ छा गयीं। मुनियों ने जहाँ-तहाँ सुन्दर आश्रम बना लये और हिमाचल ने उनको उचित स्थान दिये।


सदा सुमन फल सहित सब द्रुम नव नाना जाति। प्रगटीं सुन्दर सैल पर मनि आकर बहु भाँति।।---अर्थ---उस सुन्दर पर्वत पर बहुत प्रकार के सब नये-नये वृक्ष सदा पुष्प-फलयुक्त हो गये और वहाँ बहुत तरह के मणियों की खानें प्रगट हो गयीं।


सरिता सब पुनीत जलु बहहिं। खग मृग मधुप सुखी सब रहहिं।। सहज बयरु सब जीवन्ह त्यागा। गिरि पर सकल करहिं अनुरागा।।---अर्थ---सारी नदियों में पवित्र जल बहता है और पक्षी, पशु, भ्रमर सभी सुखी रहते थे। सब जीवों ने अपना स्वाभाविक वैर छोड़ दिया और भवानी के पिता पर्वतराज पर सभी स्नेह रखते थे।


सोह सैल गिरिजा गृह आएँ। जिमि जनु रामभगति के पाएँ। नित नूतन मंगल गृह तासू। ब्रह्मादिक गावहिं जसु जासू।।---अर्थ---पार्वतीजी के आ जाने से पर्वत ऐसे शोभायमान हो रहा है जैसा रामभक्ति को पाकर भक्त शोभायमान होता है। उस ( पर्वतराज ) के घर नित्य नये-नये मंगलोत्सव होते हैं, जिसका ब्रह्माद यश गाते हैं।


नारद समाचार सब पाए। कौतुकहिं गिरि गेह सिधाए।। सैलराज बड़ आदर कीन्हा। पद पखारि बर आसनु दीन्हा।।---अर्थ---जब नारदजी ने ये समाचार सुना तो खेल-खेल में हिमाचल के घर पधारे। र्वतराज ने बड़ा आदर किया और चरण धोकर उनको उत्तम आसन दिया।



नारि सहित मुनि पद सिरु नावा। चरन सलिल सब भवन सिंचावा।। निज सौभाग्य बहुत गिरि बरना। सुता बोलि मेलि मुनि चरना।।---अर्थ---फिर अपनी स्त्री सहित मुनि के चरणों में सिर नवाया और उनके चरणोदक को सारे घर में छिड़काया। हिमाचल ने अपने सौभाग्य का बहुत बखान किया और पुत्री को बुलाकर मुनि के चरणों पर डाल दिया।



त्रिकालग्य सर्बग्य तुम्ह गति सर्बत्र तुम्हारि। कहहु सुता के दोष गुन मुनिबर हृदयँ बिचारि।।---अर्थ---( और कहा---) हे मुनिवर ! आप त्रिकालज्ञ और सर्बज्ञ हैं, आपकी सर्वत्र पहुँच है। अतः आप हृदयँ में विचारकर कन्या के दोष-गुण कहिये।



कह मुनि बिहसि गूढ़ मृदु बानी। सुता तुम्हारी सकल गुन खानि।। सुंदर सहज सुशील सयानी। नाम उमा अंबिका भवानी।।---अर्थ---नारद मुनि ने हँसकर रहस्ययुक्त कोमल वाणी से कहा---तुम्हारी कन्या सब गुणों की खान है। वह स्वभाव से ही सुन्दर सुशील और समझदार है। उमा, अम्बिका और भवानी इसके नाम हैं।



सब लच्छन सम्पन्न कुमारी। होइहि संतत पियहिं पियारी।। सदा अचल एहि कर अहिवाता। एहि ते जसु पैहहिं पितु माता।।---अर्थ---कन्या सब सुलच्छणों से सम्पन्न है, यह अपने पति को सदा प्यारी होगी। इसका सुहाग सदा अचल रहेगा और इससे इसे माता-पिता जस पावेंगे।



होइहि पूज्य सकल जग माहीं। एहि सेवत कछु दुर्लभ नाहीं।। एहि कर नामु सुमिरि संसारा। त्रिय चढ़िहहिं पतिब्रत असिधारा।।---अर्थ---यह सारे जगत में पूज्य होगी और इसकी सेवा करने से कुछ भी दुर्लभ न होगा। संसार में स्त्रियाँ इसका नाम स्मरण करके पतिव्रत रूपी तलवार की धार पर चढ़ जायेंगी।



सैल सुलच्छन सुता तुम्हारी। सुनहु जे अब अवगुण दुइ चारी।। अगुन अमान मातु पितु हीना। उदासीन सब संसय छीना।।---अर्थ---हे पर्वतराज ! तुम्हारी कन्या सुलच्छनी है। अब इसमें जो दो चार अवगुण हैं, उन्हें भी सुन लो। गुणहीन, मानहीन, माता-पिता-विहीन, उदासीन, संशयहीन ( लापरवाह ),



जोगी जटिल अकाम मन नगन अमंगल बेष। अस स्वामी एहि कह मिलहिं परी हस्त असि रेख।।---अर्थ---जोगी, जटाधारी, निष्कामहृदय, नंगा और अमंगल वेषवाला, ऐसा पति इसको मिलेगा। इसके हाथ में ऐसी ही रेखा पड़ी है।



सुनि मुनि गिरा सत्य जियँ जानी। दुख दंपतिहिं उमा हरषानी।। नारदहूँ यह भेद न जाना। दसा एक समुझब बिलगाना।।---अर्थ---नारद मुनि की वाणी सुनकर और उसको हृदय में सत्य जानकर पति-पत्नी ( हिमवान और मैना ) को दुःख हुआ और पार्वतीजी प्रसन्न हुईं। नारदजी ने भी इस रहस्य को नहीं जाना, क्योंकि सबकी बाहरी दशा एक सी होने पर भी भीतरी समझ भिन्न-भिन्न थी।



सकल सखी गिरिजा गिरि मैना। पुलक सरीर भरे जल नैना।। होई न मृषा देवरिषि भाषा। उमा सो वचनु हृदयँ धरि राखा।।---अर्थ---सारी सखियाँ, सती, पर्वतराज हिमाचल और मैना सभी के शरीर पुलकित थे और सभी के नेत्रों में जल भरा था। देवर्षि के वचन असत्य नहीं हो सकते, ( यह विचारकर ) पार्वती ने उन वचनों को हृदय में धारण कर लिया।



उपजेउ सिव पद कमल सनेहू। मिलन कठिन मन भा संदेहू।। जानि कुअवसरु प्रीति दुराई। सखी उछंग बैठ पुनि जाई।।---अर्थ---उन्हें शिवजी के चरण कमलों में स्नेह उत्पन्न हो आया, परन्तु मन में यह संदेह हुआ कि उनका मिलना कठिन है। अवसर ठीक न जानकर उमा ने अपने प्रेम को छिपा लिया और फिर वे सखी की गोद में जाकर बैठ गयी।



झूठि न होइ देवरिषि बानी। सोचहिं दंपति सखी सयानी।। उर धरि धीर कहइ गिरिराऊ। कहहु नाथ का करिअ उपाऊ।।---अर्थ---देवर्षि की वाणी झूठी न होगी, यह विचारकर हिमवान्, मैना और सारी चतुर सखियाँ चिन्ता करने लगीं। फिर हृदय में धीरज धरकर पर्वतराज ने कहा---हे नाथ ! कहिये, अब क्या उपाय किया जाय ?



कह मुनीस हिमवंत सुनु जो बिधि लिखा लिलार। देव दनुज नर नाग मुनि कोउ न मेटनिहार।।---अर्थ---मुनीश्वर ने कहा---हे हिमवान् ! सुनो, विधाता ने ललाट परर जो कुछ लिख दिया है, उसको देवता, दानव, मनुष्य, नाग और मुनि कोई भी नहीं मिटा सकते।



तदपि एक मैं कहउँ उपाई। होइ करैं जौं दैव सहाई।। जस बरु मैं बरनेउँ तुम्ह पाहीं। मिलिहिं उमहिं ततस संसय नाहीं।।---अर्थ---तो भी एक उपाय मैं बताता हूँ। यदि दैव सहायता करें तो वह सिद्ध हो सकता है। उमा को वर तो निःसंदेह वैसा ही मिलेगा जैसा मैने तुम्हारे सामने वर्णन किया है।



जे जे बर के दोष बखाने। ते सब सिव पहिं मैं अनुमाने।। जौं बिबाहु संकर सन होई। दोषहुँ गुन म कह सब कोई।।---अर्थ---परन्तु मैने वरके जो-जो दोष बतलाये हैं, मेरे अनुमान से वे सभी शिवजी में हैं। यदि शिवजी के साथ विवाह हो जाय तो दोषों को भी सब लोग गुणों के समन ही कहेंगे।



जौं अहि सेज सयन हरि करहिं। बुध कछु तिन्ह कर दोषु न धरहिं।। भानु कृसानु सर्ब रस खाहीं। तिन्ह कहँ मन्द कहत कोऊ नाहीं।।---अर्थ---जैसे विष्णुभगवान् सेज की नैया पर सोते हैं, तो भी बुद्धिमाान लोग उनपर कोई दोष नहीं लगाते। सूर्य और अग्निदेव अच्छे-बुरे सभी रसों का भक्षण करते हैं, परन्तु उनको कोई बुरा नहीं कहता।



सुभ अरु अशुभ सलिल सब बहई। सुरसरि कोउ अपुनीत न कहई।। समरथ कहँ नहिं दोषु गोसाईं। रवि पावक सुरसरि की नाईं।---अर्थ---गंगाजी में शुभ और अशुभ सब जल बहता है, पर कोई उन्हें अपवित्र नहीं कहता। सूर्य, अग्नि और गंगाजी की भाँति समर्थ को दोष नहीं लगता।



जौं अस हिसिषा करहिं नर जड़ बिबेक अभिमान। परहिं कलप भरि नरक महुँ जीव की ईस समान।।---अर्थ---यदि मूर्ख मनुष्य ज्ञान के अभिमान से इस प्रकार होड़ करते हैं तो वे कल्प-भर के लिये नरक में पड़ते हैं। भला कहीं जीव भी ईश्वर के समान (सर्वथा स्वतंत्र) हो सकता है ?



सुरसरि जल कृत बारुनि जाना। कबहुँ न संत करहिं तेहि पाना।। सुरसरि मिले सो पावन जैसें। ईस अनीसहिं अंतरु जैसे।।---अर्थ---गंगाजल से भी बनायी हुई मदिरा को जानकर संतलोग कभी उसका मान नहीं करते। पर वही गंगाजी में मिल जाने पर जैसे पवित्र हो जाती है, ईश्वर और जीव में भी वैसा ही भेद है।



संभु सहज समरथ भगवाना। एहि बिबाहँ सब बिधि कल्याना।। दुरााध्य पै अहहिं महेसू। आसुतोष पुनि किएँ कलेसू।।---अर्थ---शिवजी सहज ही समर्थ हैं, क्योंकि वे भगवान् हैं। इसलिे इस विवाह में ब प्रकार कल्याण है। परन्तु महादेवजी की अराधना बड़ी कठिन है, फिर भी क्लेश (तप) करने से वे बहुत जल्द संतुष्ट हो जाते हैं।



जौं तपु करै कुमारि तुम्हारी। भाविउ मेटि सकहिं त्रिपुरारी।। जद्यपि बर अनेक जग माहीं। एहि कहँ शिव तजि दूसर नाहीं।।---अर्थ---यदि तुम्हारी कन्या तप करे तो त्रिपुरारि महादेवजी होनहार को मिटा सकते हैं। यद्यपि संसार में अनेक वर हैं, पर इसके लिये शिवजी को छोड़कर दूसरा वर नहीं है।



बरदायक प्रनतारति भंजन। कृपासिंधु सेवक मन रंजन।। इच्छित फल बिनु सिव अवराधें। लहिअ न कोटि जोग जप साधें।।---अर्थ---शिवजी वर देनेवाले, शरणागतों के दुःखों के नाश करनेवाले, कृपा के समुद्र और सेवकों के मन को प्रसन्न करनेवाले हैं। शिवजी की अराधना किये बिना करोड़ों योग और जप करने पर भी वांछित फल नहीं मिलता।



अस कहि नारद सुमिरि हरि गिरिजहिं दीन्ह असीस। होइहिं यह कल्यान अब संसय तजहु गिरीस।।---अर्थ---ऐसा कहकर भगवान् का स्मरण करके नारदजी ने पार्वती को आशीर्वाद दिया। ( और कहा कि---) हे पर्वतराज ! तुम संदेह का त्याग कर दो, अब यह कल्याण ही होगा।


कहि अस ब्रह्मभवन मुनि गयउ। आगिल चरित सुनहु जस भयऊ।। पतिहि एका्त पाइ कह मैना। नाथ न मैं समुझे मुनि बैना।।--अर्थ---यों कहकर नारद मुनि ब्रह्मलोक को चले गये। अब आगे जो चित्र हुआ उसे सुनो। पति को एकान्त में पाकर मैना ने कहा---हे नाथ ! मैने मुनि के वचनों का अर्थ नहीं समझा।



जौं घरु बरु कुलु होइ अनूपा। करिअ बिबाहु सुता अनुरूपा।। न त कन्या बरु रहउ कुआरी। कंत उमा मम प्राणपिआरी।।---अर्थ---यदि हमारी कन्या के अनुकूल घर, वर और कुल उत्तम हो तो विवाह कीजिये। नहीं तो लड़की चाहे कुमारी ही रहे ( मैं अयोग्य वर के साथ उसका विवाह नहीं करना चाहती ); क्योंकि हे स्वामिन् ! पार्वती मुझे पार्वती प्राणों के समान प्यारी है।



जौं न मिलिहिं बरु गिरिजहिं जोगू। गिरि जड़ सहज कहिहिं सब लोगू।। सोइ बिचारि पति करेहु बिबाहू। जेेहि न बहोरि होइ उर दाहू।---यदि पार्वती  के योोग्य वर न मिला तो सब लोग कहेंगे कि पर्वत स्वभाव से ही जड़ ( मूर्ख ) होते हैं। हे स्वामी ! इस बात को विचारकर ही विवाह कीजियेगा, जिससे बाद में हृदय में कोई संताप न रहे।



अस कहि परी चरन धरि सीसा। बोले सहित सनेह गिरीसा।। बरु पावक प्रगटै ससि माहीं। नारद बचनु अन्यथा नाहीं।।---अर्थ---इस प्रकार कहकर मैना पति के चरणों पर मस्तक रखकर गिर पड़ीं।.  तब हिमवाान् ने प्रेम से कहा---चाहे चन्द्रमा  में अग्नि प्रकट हो जाय, पर नारदजी के वचन झूठे नहीं हो सकते।



प्रिया सोचु परिहरहु सबु सुमिरहु श्रीभगवान। पारबतिहिं निरमयउ जेहिं सोई करिहिं कल्यान।।---अर्थ---हे प्रिये ! सब सोच छोड़कर श्रीभगवान् का स्मरण करो। जिन्होंने पार्वती को रचा है, वे ही कल्याण करेंगे।




अब जौं तुम्हहिं सुता पर नेहू। तौं अस जाइ सिखावनु देहू।। करै सो तपु जेहि मिलहिं महेसू। आन उपायँ न मिटहिं कलेसू।।---अर्थ---अब यदि तुम्हें कन्या पर प्रेम है तो जाकर उसे यह शिक्षा दो कि वह ऐसा तप करे जिसे शिवजी मिल जायँ। दूसरे उपाय से यह क्लेश नहीं मिटेगा।




नारद बचन सगर्भ सहेतू। सुन्दर सब गुण बिधि बृषकेतू।।---अर्थ---नारदजी के वचन रहस्य से युक्त और सकारण है। शिवजी समस्त सुन्दर गुणों के भण्डार हैं। यह विचारकर तुम (मिथ्या) सन्देह को छोड़ दो। शिवजी सभी तरह से निष्कलंक हैं।




सुनि पति बचन हरषि मन माहीं। गई तुरत उठि गिरिजा पाहीं।। उमहिं बिलोकि नयन भरे बारी। सगित सनेह गोद बैठारी।---अर्थ---पति के बचन सुन मन में प्रसन्न होकर मैना उठकर तुरन्त पार्वती के पास गयीं। पार्वती को देखकर उनके आँखों में आँसू भर आये। उसे स्नेह के साथ गोद में बैठा लिया।



बारहिं बार लेति उर लाई। गद्गद् कंठ न कछु कहि जाई।। जगत मातु सर्बज्ञ भवानी।। मातु सुखद बोली मृदु बानी।।---अर्थ---फिर बार-बार उसे हृदय से लगाने लगीं। प्रेम से मैना का का गला भर आया, कुछ कहा नहीं जाता। जगजननी भवानीजी तो सब कुछ जाननेवाली हैं। ( माता के मन की दशा को जानकर ) वे माता को सुख देनेवाली कोमल वाणी से बोलीं---



सुनहि मातु मैं दीख अस सपन सुनावउँ तोहि। सुन्दर गौर सुविप्रवर अस उपदेसेउ मोहि।।---अर्थ---माँ ! सुन, मैं तुझे सुनाती हूँ; मैने ऐसा स्वप्न देखा है कि मुझे एक सुन्दर गौरवर्ण श्रेष्ठ ब्राह्मण ने ऐसा उपदेश दिया है---



करहि जाइ तपु सैलकुमारी। नारद कहा सो सत्य बिचारी।। मातु पितहि पुनि यह मत भावा। तपु सुखप्रद दुख दोष नसावा।।---अर्थ---हे पार्वती ! नारदजी ने जो कहा है, उसे सत्य समझकर तू जाकर तप कर। फिर यह बात तेरे माता-पिता को अच्छी लगी है। तप सुख देनेवाला और दुःख-दोष का नाश करनेवाला है।



तपबल रचइ प्रपंच विधाता। तपबल बिष्णु सकल जग त्राता।। तपबल संभुकरहिं संघारा। तपबल सेषु धरइ महिभारा।।---अर्थ---तप के बल से ही ब्रह्मा संसार को रचते हैं और तप के बल से ही विष्णु सारे जगत् का पालन करते हैं, तप के ही बल से शंभु ( रौद्ररूप से जगत् का ) संहार करते हैं और तप के ही बल से शेषजी पृथ्वी का भार ग्रहण करते हैं।




तप अधार सब सृष्टि भवानी। करहि जाइ तप अस जियँ जानी। सुनत बचन बिसमित महतारी। सपन सुनायउ गिरिहिं हँकारी।।---अर्थ---हे भवानी ! सारी सृष्टि तप के ही आधार पर है ऐसा जी में जानकर तू तप कर। यह बात सुनकर माता को बड़ा अचरज हुआ और उसने हिमवान को बुलाकर वह स्वप्न सुनाया।



मातु पितहिं बहुबिधि समुझाई। चलीं उमा तप हित हरषाईं।। प्रिय परिवार पिता अरु माता। भए बिकल मुख आव न बाता।।---अर्थ---माता-पिताजी को बहुत तरह से समझाकर बड़े हर्ष से पार्वतीजी तप करने के लिये चलीं।। प्यारे कुटुम्बी, पिता और माता सब व्याकुल हो गये। किसी के मुँह से बात नहीं निकलती।



बेदसिरा मुनि आइ तब सबहिं कहा समुझाई। पारबती महिमा सुनत रहे प्रबोधहिं पाइ।।---अर्थ---तब वेदशिरा मुनि ने आकर सबको समझाकर कहा। पारबतीजी की महिमा सुनकर सबको समाधान हो गया।



उर धरि उमा प्राणपति चरना। जाइ बिपिन लागीं तप करना।। अति सुकुमर न तनु तप जोगू। पति पद सुमिरि तजेउ सबु भोगू।।---अर्थ---प्राणपति ( शिवजी ) के चरणों को हृदय में धारण करके पार्वतीजी वन में जाकर तप करने लगीं। पार्वतीजी का अत्यन्त सुकुमार शरीर तप के योग्य नहीं था, तो भी पति के चरणों का स्मरण करके उन्होंनें सब खुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया।



नित नव चरऩ उपज अनुरागा। बिसरी देह तपहिं मनु लागा।। संबत सहस मूल फल खाए। सागु खाइ सत बरस गवाँए।।---अर्थ---स्वामी के चरणों में नित्य नया अनुराग उत्पन्न होने लगा और तप में ऐसा मन लगा कि देह का ध्यान ही न रहा। एक हजार वर्षों तक उन्होंने फल-मूल खाये, फिर सौ वर्ष साग खाकर बिताये।



कछु दिन भोजनु बारि बतासा। किए कठिन कछु दिन उपबासा।। बेल पाती महि परइ सुखाई। तीनि सस संबत सोइ खाई।।---अर्थ---कुछ दिन जल और वायु का भोजन किया और  कुछ दिन कठोर उपवास किये। जो बेलपत्र गिरकर पृथ्वी पर गिरते थे, तीन हजार वर्ष तक उन्हीं को खाया।



पुनि परिहरे सुखानेउ परना।उमहिं नाम तब भयउ अपरना।। देेखि उमहिं तप खीन शरीरा। ब्रह्मगिरा भै गगन गभीरा।।---अर्थ---फिर सूखे पत्ते भी छोड़ दिये, तभी पार्वती का नाम 'अपर्णा' हुआ। तप से उमा का शरीर क्षीण देखकर आकाश से गम्भीर ब्रह्मवाणी हुई।



भयउ मनरथ सुफल तब सुनु गिरिराजकुमारि। परिहरि दुसह कलेस सब अब मिलिहहिं त्रिपुरारि।।---अर्थ--- हे पर्वतराज की बेटी ! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशों को त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे।



अस तपु काहु न कीन्ह भवानी। भए अनेक धीर मुनि ग्यानी।। अब उर धरहु ब्रह्म बर बानी। सत्य सदा संतत सुचि जानी।।---अर्थ--- हे पर्वतराजकुमारी ! सुन, तेरा मनोरथ सफल हुआ। तू अब सारे असह्य क्लेशों को ( कठिन तप को ) त्याग दे। अब तुझे शिवजी मिलेंगे।



आवै पिता बोलावन जबहिं। हठ परिहरि घर जायहु तबहिं।। मिलहिं तबहिं जब सप्त रिषीसा। जानेहु तब प्रमान बागीसा।।---जब तेरे पिता बुलाने को आवें, तब हठ छोड़कर घर चली जाना और जब तुम्हें सप्तर्षि मिलें तब इस वाणी को ठीक समझना।



सुनत गिरा बिधि गगन बखानी। पुलक गात गिरिजा हरषानी।। उमा चरित सुन्दर मैं गावा। सुनहु संभु कै चरित सुहावा।।---अर्थ---आकाश से कही हुई ब्रह्मा की वाणी को सुनते ही पार्वतीजी प्रसन्न हो गयीं और (हर्ष के मारे) उनका शरीर पुलकित हो गया। ( याज्ञवल्क्यजी भरद्वाजजी से बोले कि ) मैने पार्वती का सुन्दर चरित्र सुनाया, अब शिवजी का सुहावना चरित्र सुनो।




जब ते सती जाइ तनु त्यागा। तब ते सिव मन भयउ बिरागा।। जपहिं सदा रघुनायक नामा। जहँ-तहँ सुनहिं राम गुन ग्रामा।।---अर्थ---जबसे सती ने जाकर शरीर त्याग किया, तबसे शिवजी के मन में वैराग्य हो गया। वे सदा श्रीरघुनाथजी का नाम जपने लगे और जहाँ-तहाँ श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की कथाएँ सुनने लगे।



चिदानंद सुखधाम सिव बिगत मोह मद काम। बिचरहिं महि धरि हृदयँ हरि सकल लोक अभिराम।।---अर्थ---चिदानंद, सुख के धाम, मोह, मद और काम से रहित शिवजी संपूर्ण लोकों को आनन्द देने वाले भगवान् श्रीहरि को हृदय में धारण कर ( भगवान् के ध्यान में मस्त हुए ) पृथ्वी पर विचरने लगे।



कतहुँ मुनिन्ह उपदेसहिं ज्ञाना। कतहुँ राम गुन करहिं बखाना।। जदपि अकाम तदपि भगवाना। भगत बिरह दुख दुखित सुजाना।।---अर्थ---वे कहीं मुनियों को ज्ञान का उपदेश करते और कहीं श्रीरामचन्द्रजी के गुणों का वर्णन करते थे। यद्यपि शिवजी सब कुछ जाननेवाले और निष्काम हैं, तो भी वे भगवान् अपने भक्त ( सती ) के वियोग के दुःख से दुःखी हैं।



एहि बिधि गयउ कालु बहु काल बहु बीती। नित नै होई राम पर प्रीती।। नेमु प्रेमु संकर कर देखा। अबिचल हृदय भगति कर रेखा।।---अर्थ---इस प्रकार बहुत समय बीत गया। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में नित नयी प्रीति हो रही है। शिवजी केे ( कठोर ) नियम, ( अनन्य ) प्रेम और उनके हृदय में भक्ति की  अटल टेक को ( जब श्रीरामचन्द्रजी ) ने देखा,




प्रगटे राम कृतग्य कृपाला। रूप सील निधि तेज बिसाला।। बहु प्रकार संकरहिं सराहा। तुम्ह बिनु अस ब्रतु को निरबाहा।।---अर्थ---तब कृतज्ञ, कृपालु, रूप और शील के भण्डार, महान् तेजपुंज भगवान् श्रीरामचन्द्रजी प्रकट हुए। उन्होंने बहुत तरह से शिवजी की सराहना की और कहा कि आपके बिना ऐसा ( कठिन ) व्रत कौन निबाह सकता है।



बहुबिधि राम सिवहिं समुझावा। पारबती कर जनमु सुनावा।। अति पुनीत गिरिजा कै करनी। बिस्तर सहित कृपानिधि बरनी।।---अर्थ---श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत प्रकार से शिवजी को समझाया और पार्वतीजी का जन्म सुनाया। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने विस्तारपूर्वक पार्वतीजी की अत्यन्त पवित्र कार्य का वर्णन किया।



अब बिनती मम सुनहु सिव जौं मो पर निज नेहु। जाइ बिबाहहु सैलजहिं यह मोहि मागें देहु।।---अर्थ---( फिर उन्होंने शिवजी से कहा---) हे शिवजी ! यदि मुझपर आपका स्नेह है तो अब आप मेरी विनती सुनिये। मुझे यह माँगे दीजिये कि आप जाकर पार्वती के साथ विवाह कर लें।



कह सिव जदपि उचित अस नाहीं। नाथ बचन पुनि मेटि न जाहीं।। सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा। परम धरमु यह नाथ हमारा।।---अर्थ---शिवजी ने कहा---यद्यपि ऐसा उचित नहीं है, परन्तु स्वामी की बात भी मेटी नहीं जा सकती। हे नाथ ! मेरा यही परम धर्म है कि मैं आपकी आज्ञा को सिर पर रखकर उसका पालन करूँ।



मातु पिता गुर प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी।। तुम्ह सब भाँति परम हितकारी। अग्या सिर पर नाथ तुम्हारी।।---अर्थ---माता, पिता, गुरु और स्वामी की बात को बिना ही बिचारे शुभ समझकर करना चाहिये। फिर आप तो मेरे सब प्रकार से परम हितकारी हैं। हे नाथ ! आपकी आज्ञा मेरे सिर पर है।






Monday, 19 September 2016

बालकाण्ड---

बालकाण्ड---
सतीं समुझि रघुबीर प्रभाऊ। भय बस सिव सन कीन्ह दुराऊ।। कछु न परीछा लीन्हि गोसाईं। कीन्ह प्रणामु तुम्हारिहिं नाईं।।---अर्थ---सतीजी ने श्रीरघुनाथजी के प्रभाव को समझकर डर के मारे शिवजी से छिपाव किया और कहा---हे स्वामिमिन् । मैंने कुछ भी परीक्षा नहीं ली, ( वहाँ जाकर ) आपकी ही तरह प्रणाम किया।


जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरे मन प्रतीति अति सोई।। तब शंकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सब जाना।।---अर्थ---आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मन में यह बड़ा ( पूरा ) विश्वास है। तब शिवजी ने ध्यान करके देखा और सतीजी ने जो चरित्र किया था, सब जान लिया।



बहुरि राममायहिं सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूठ कहावा। हरि इच्छा भावी बलवाना। हृद बिचारत संभु सुजाना।।---अर्थ---फिर श्रीरामचन्द्रजी के माया को सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सती के मुँह से झूठ कहला दिया। सुजान शिवजी ने मन में विचार किया कि हरि की इच्छारूपी भावी प्रबल है।


सती कीन्ह सीता कर बेषा। सिव उर भयउ बिषाद बिसेषा।। जौं अब करउँ सती सन प्रीती। मिटइ भगति पथ होई अनीति।।---अर्थ---सतीजी ने सीताजी का वेष धारण किया, यह जानकर शिवजी के हृदय में बड़ा बिषाद हुआ। उन्होंने सोचा कि यदि अब मैं सती से प्रीति करता हूँ तो भक्तिमार्ग लुप्त हो जाता है और बड़ा अन्याय होता है।

परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु।। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदय अधिक संतापु।।---अर्थ---सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ने भी नहीं बनता और प्रेम करने में बड़ा पाप है। प्रकट करक महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदय में बड़ा संताप है।

तब शंकर प्रभु पद सिरु नावा। सुमिरत रामु हृदयँ अस आवा।। एहिं तन सतिहिं भेंट मोहि नाहीं। सिव संकल्प कीन्ह मन माहीं।।---अर्थ---तब शिवजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों में सिर नवाया और श्रीरामजी का स्मरण करते ही उनके मन में यह आया कि सती के साथ इस शरीर से मेरी ( पती-पत्नी रूप में ) भेंट नहीं हो सकती और शिवजी ने अपने मन में यह संकल्प कर लिया। 



अस बिचारि शंकरु मतिधीरा। चले भवन सुमिरत रघुबीरा।। चलत गगन भै गिरा सुहाई। जय महेस भलि भगति दृढ़ाई।।---अर्थ---स्थिरबुद्धि शंकरजी ऐसा विचारकर श्रीरघुनाथजी का स्मरण करते हुए अपने घर ( कैलास ) को चले। चलते समय सुन्दर आकाशवाणी हुई कि हे महेश ! आपकी जय हो। आपने भक्ति की अच्छी दृढ़ता की।



अस पन तुम्ह बिनु करइ को आना। रामभगत समरथ भगवाना।। सुनि नभगिरा सती उर सोचा। पूछा सिवहि समेत सकोचा।।---अर्थ---आपको छोड़कर दूसरा कौन ऐसी प्रतीज्ञा कर सकता है ? आप श्रीरामचन्द्री के भक्त हैं, समर्थ हैं और भगवान हैं। इस आकाशवाणी को सुनकर सतीजी के मन में चिंता हुई और उन्होंने सकुचाते हुए शिवजी से पूछा---



कीन्ह कवन पन कहहु कृपाला। सत्यधाम प्रभु दीनदयाला।। जदपि सतीं पूछा बहु भाँती। तदपि न कहेउ त्रिपुर आराती।।---अर्थ---हे कृपालु ! कहिये, आपने कौन सी प्रतीज्ञा की है ? हे प्रभो ! आप सत्य के धाम और दीनदयालु हैं। यद्यपि सतीजी ने बहुत प्रकार से पूछा परन्तु त्रिपुरारि शिवजी ने कुछ न कहा।



सती हृदयँ अनुमान किय सबु जानेउ सर्बग्य। कीन्ह कपट मैं शंभु सन नारि सहज जड़ अज्ञ।।---अर्थ---सतीजी ने हृदय में अनुमान किया कि सर्वज्ञ शिवजी सब जान गये। मैंने शिवजी से कपट किया, स्त्री स्वभाव से ही मूर्ख और नासमझ होती हैं।



जलु पय सरिस बिकाइ देखहु प्रीति की रीति भलि। बिलग होइ रसु जाइ कपट खटाई परत पुनि।।---अर्थ---प्रीति की सुन्दर रीति देखिये कि जल भी ( दूध के साथ मिलकर ) दूध के समान भाव बिकता है; परन्तु फिर कपटरूपी खटाई पड़ते ही पानी अलग हो जाता है ( दूध फट जाता है ) और स्वाद ( प्रेम ) जाता रहता है।



हृदय सोचु समझत निज करनी। चिंता अमित जाइ नहीं बरनी।। कृपासिंधु शिव परम अगाधा। प्रगटन कहेउ मोर अपराधा।।---अर्थ--- अपनी करनी को याद करके सतीजी के हृदय में इतना सोच है और इतनी अपार चिंता है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। ( उन्होंने समझ लिया कि ) कि शिवजी कृपा के परम अथाह सागर हैं, इससे प्रकट में उन्होंने मेरा अपराध नहीं कहा।



संकर रुख अवलोकि भवानी। प्रभु मोहि तजेउ हृदयँ अकुलानी।। निज अघ समुझि न कछु कहि जाई। तपई अवाँ इव उर अधिकाई।।---अर्थ---शिवजी का रुख देखकर सतीजी ने जान लिया कि स्वामी ने मेरा त्याग कर दिया है और वह हृदय में व्याकुल हो उठीं। अपना पाप समझकर कुछ कहते नहीं बनता; परन्तु हृदय ( भीतर-ही-भीतर ) कुम्हार के आँवे के समान अत्यन्त जलने लगा।

सतिहीं ससोच जानि बृषकेतू। कहीं कथा सुन्दर सुखहेतू।। बरनत पंथ बिबिध इतिहासा। बिस्वनाथ पहुँचे कैलासा।।---अर्थ---बृषकेतू शिवजी ने सती को चिंतायुक्त जानकर उन्हें सुख देने के लिये सुन्दर कथाएँ कहीं। इस प्रकार मार्ग में विविध प्रकार के इतिहासों को कहते हुए विश्वनाथ कैलास जा पहुँचे।

तहँ पुनि संभु समुझि पन आपन। बैठे बट तर कमलासन।। संकर सहज सरूपु सम्हारा। लागि समाधि अखंड अपारा।।---अर्थ---वहाँ फिर शिवजी अपनी प्रतिज्ञा को याद करके बड़ के पेड़ के नीचे पद्मासन लगाकर बैठ गये। शिवजी ने अपना स्वाभाविक रूप सँभाला। उनकी अखंड और अपार समाधि लग गयी।

सती बसहिं कैलास तब अधिक सोचु मन माहीं। मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं। मरमु न कोऊ जान कछु जुग सम दिवस सिराहिं।।---अर्थ---तब सतीजी कैलास पर रहने लगीं। उनके मन में बड़ा दुःख था। इस रहस्य को कोई कुछ भी नहीं जानता था। उनका एक-एक दिन युग के समान बीत रहा था।

नित नव सोच सती उर भारा। कब जैहउँ दुख सागर पारा।। मैं जो कीन्ह रघुपति अपमाना। पुनि पतिबचनु मृषा करि जाना।।---अर्थ---सतीजी के हृदय में नित्य नया और भारी सोच हो रहा था कि मैं इस दुःख समुद्र केपार कब जाऊँगी। मैंने जो श्रीरघुनाथजी का अपमान किया और पति के वचनों को झूठ जाना।



सो फल मोहि विधाता दीन्हा। जो कछु उचित रहा सोइ कीन्हा।। अब बिधि अस बूझिय नहीं तोही। संकर बिमुख जिआवसि मोही।।---अर्थ---उसका फल विधाता ने मुझको दिया, जो उचित था, वही किया; परन्तु हे विधाता ! अब तुझे यह उचित नहीं है जो शंकर से विमुख होने पर भी मुझे जिला रहा है।



कहि न जाइ कछु हृदय गलानी। मन महँ रामहिं सुमिर सयानी।। जौं प्रभु दीनदयालु कहावा। आरति हरन वबेद जसु गावा।।---अर्थ---सतीजी के हृदय की गलानि कुछ कही नहीं जाती। बुद्धिमति सतीजी ने मन में श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण किया और कहा---हे प्रभो ! यदि आप दीनयालु कहलाते हैं और बेदों ने आपका यह यश गाया है कि आप दुःख को हरनेवाले हैं।



तौं मैं विनय करउँ कर जोरी। छूटउ बेगि देह यह मोरी।। जौं मोरे शिव चरण सनेहू। मन क्रम वचन सत् व्रत ऐहू।।---अर्थ---तो मैं हाथ जोड़कर विनती करती हूँ कि इस देह से जल्दी छुटकारा मिल जाय। यदि मेरा शिवजी के चरणों में प्रेम है और यह प्रेम ( प्रेम का ) व्रत मन, वचन और कर्म ( आचरण ) से सत्य है।



तौ सबदरसी सुनिय प्रभु करउ सो बेगि उपाइ। होइ मरनु जेहि बिनहिं श्रम दुसह बिपत्ति बिहाइ।।---अर्थ---तो हे सर्वदर्शी प्रभो ! सुनिये और शीघ्र वह उपाय कीजिे जिससे मेरा मरण हो और बिना ही परिश्रम यह ( पति-परित्यागरूपी ) असह्य विपत्ति दूर हो जाय।



एहि बिधि दुखित प्रजेसकुमारी। अकथनीय दारुन दुखु भारी।। बीते संवत सहस सतासी। तजी समाधि संभु अबिनासी।।---अर्थ---दक्षसुता सतीजी इस प्रकार बहुत दुःखी थीं, उनके दारुण दुःख का वर्णन नहीं किया जा सकता। सत्तासी हजार वर्ष बीत जाने पर अविनासी शिवजी ने समाधि खोली।



राम नाम सिव सुमिरन लागे। जानेउ सती जगतपति जागे।। जाइ संभु पद बंदनु कीन्हा। सन्मुख शंकर आसनु दीन्हा।।---अर्थ---शिवजी राम नाम का स्मरण करने लगे, तब सतीजी ने जाना कि अब जगत् के स्वामी ( शिवजी ) जागे। उन्होंने जाकर शिवजी के चरणों में प्रणाम किया। शिवजी ने उनको बैठने के लिेये सामने आसन दिया।



लगे कहन हरि कथा रसाला। दच्छ प्रजेस भए तेहि काला।। देखा बिधि बिचारि सब लायक। दच्छहिं कीन्ह प्रजापति नायक।।---अर्थ---शिवजी भगवान् हरि की रसमयी कथा कहने लगे। उसी समय दक्ष प्रजापति हुए। ब्रह्माजी ने सब प्रकार से देख-समझकर दक्ष को प्रजापति नायक बना दिया।



बड़ अधिकार दक्ष जब पावा। अति अभिमानु हृदय तब आवा।। नहिं कोऊ अस जनमा जग माहीं। प्रभुता पाइ जाहि मद नाहीं।।---अर्थ---जब दक्ष ने इतना बड़ा अधिकार पाया तब उनके हृदय में अत्यन्त अभिमान आ गया। संसार में ऐसा कोई पैदा नहीं हुआ जिसको प्रभुता पाकर मद न हुआ हो।



दच्छ लिये मुनि बोलि तब करन लगे बड़ जाग। नेवते सादर सकल सुर जे पावत मख भाग।।---अर्थ---दक्ष ने सब मुनियों को बुला लिया और वे बड़ा यज्ञ करने लगे। जो देवता यज्ञ का भाग पाते हैं, दक्ष ने उन सबको आदर सहित निमंत्रित किया।



किंनर नाग सिद्ध गंधर्बा। बधुन्ह समेत चले सुर सर्बा। बिष्णु बिरंचि महेसु बिहाई। चले सकल सुर जान बनाई।।---अर्थ---( दक्ष का निमंत्रण पाकर ) किंनर, नाग, सिद्ध, गन्धर्व और सब देवता अपनी-अपनी स्त्रियोंसहत चले। विष्णु, ब्रह्मा और महादेवजी को छोड़कर सभी देवता अपना-अपना विमान सजाकर चले।



सतीं बिलोके ब्योम बिमाना। जात चले सुन्दर बिधि नाना।। सुर सुन्दरी करहिं कल गाना। सुनत श्रवण छूटहिं मुनि ध्याना।।----अर्थ---सतीजी ने देखा कि अनेकों प्रकार के सुन्दर विमान आकाश में चे जा रहे हैं। देव सुन्दरियाँ मधुर गान कर रही हैं, जिन्हें सुनकर मुनियों का ध्यान छूट जाता है।


पूछेउ तब सिवँ कहेउ बखानी। पिता जग्य सुनि कछु हरषानी। जौं महेसु मोहि आयसु देहीं। कछु दिन जाइ रहौं मिस एही।।---अर्थ---सतीजी ने ( विमानों में देवताओं के जाने का कारण ) पूछा, तब शिवी ने सब बातें बतलायीं। पिता के यज्ञ की बात सुनकर सती कुछ प्रसन्न हुईं और सोचने लगीं कि यदि महादेवजी मुझे आज्ञा दें, तो इसी बहाने कुछ दिन पिता के घर जाकर रहूँ।



पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कहइ न निज अपराध बिचारी।। बोली सती मनोहर बानी। भय संकोच प्रेम रस सानी।।---अर्थ---क्योंकि उसके हृदय में पति द्वारा त्यागी जाने का बड़ा भारी दुःख था, पर अपना अपराध समझकर वे कुछ कहती न थीं। आखिर सतीजी भय, संकोच और प्रेमरस में सनी हुई मनोहर वाणी से बोलीं---



पिता भवन उत्सव परम जौं प्रभु आयसु होइ। तौं मैं जाउँ कृपायतन सादर देखन सोइ।।---अर्थ---हे प्रभो ! मेरे पिता के घर बहुत बड़ा उत्सव है। यदि आपकी आज्ञा हो तो हे कृपाधाम ! मैं आदरसहित उसे देखने जाऊँ।



कहेहु नीक मोरे मन भावा। यह अनुचित नहीं नेवत पठावा।। द्छ सकल निज सुता बोलाईं। हमरे बयर तुम्हहु बिसराईं।।---शिवजी ने कहा--तुमने बात तो अच्छी कही, यह मेरे मन को भी पसंद आयी। पर उन्होंने न्यौता नहीं भेजा, यह अनुचित है। दक्ष ने अपनी सब लड़कयों को बुलाया है; किन्तु हमारे वैर के कारण उन्होंने तुमको भी भुला दिया।



ब्रह्मसभा हम सन दुखु माना। तेहि ते अजहूँ करहिं अपमाना।। जौं बिनु बोले जाहु भवानी। रहइ न सीलु सनेहु न कानी।।---अर्थ---एक बार ब्रह्मा की सभा में हमसे अप्रसन्न हो गये थे, उसी से वे अब भी  हमारा अपमान करते हैं। हे भवानी ! तुम बिना बुलाये जाओगी तो न शील-स्नेह ही रहेगा और न मान मर्यादा ही रहेगी।



जदपि मित्र प्रभु पितु गुर गेहा। जाइअ बिनु बोले न संदेहा।। तदपि बिरोध मान जहँ कोई। तहाँ गये कल्यानु न होई।।---अर्थ---यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि मित्र, स्वामी, पिता और गुरु के घर बिना बुलाये भी जाना चाहिये तो भी जहाँ कोई विरोध मानता हो, उसके घर जाने से कल्याण नहीं होता।



भाँति अनेक संभु समुझावा। भावी वश न ग्यानु उर आवा।। कह प्रभु जाहु जो बिनहिं बोलाएँ। नहिं भलि बात हमारे भाएँ।।---अर्थ---शिवजी ने बहुत प्रकार से समझाया, पर होनी वश सती के हृदय में बोध नहीं हुआ। फिर शिवजी ने कहा कि यदि बिना बुलाये जाओगी, तो हमारी समझ से अच्छी बात न होगी।



करि देखा हर जतन बहु रहइ न दच्छकुमारि। दिए मुख्य गन संग तब बिदा कीन्ह त्रिपुरारि।।---अर्थ--- शिवजी ने बहुत प्रकार से कहकर देख लिया, किन्तु जब सती किसी भी प्रकार नहीं रुकीं तब महादेवजी ने अपने मुख्य गणों को साथ देकर उनको विदा कर दिया।

पिता भवन जब गईं भवानी। दच्छ त्रास काहुँ न सनमानी।। सादर भलेहिं मिली एक माता। भगिनीं मिलीं बहुत मुसुकाता।।---अर्थ---भवानी जब पिता (दच्छ) के घर पहुँचीं, तब दक्ष के डर के मारे किसी ने उनकी आवभगत नहीं की, केवल एक माता भले ही आदर से मिली। बहिनें बहुत मुस्कुराती हुई मिलीं।



दच्छ न कछु पूछी कुसलाता। सतिहिं बिलोकि जरे सब गाता।। सतीं जाइ देखेउ तब जागा। कतहुँ न दीख संभु कर भागा।।---अर्थ---दक्षने तो उनकी कुछ कुशल तक नहीं पूछी, सतीजी को देखकर उलटे उनके सारे अंग जल उठे। तब सतीजी ने जाकर यज्ञ देखा तो वहाँ कहीं शिवजी का भाग दिखायी नहीं दिया।



तब चित्त चढ़ेउ जो शंकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ।। पाछिल दुखु न हृदयँ उर व्यापा। जस यह भयेउ महा परितापा।।---अर्थ---तब शिवजी ने जो कहा था वह उनकी समझ में आया। स्वामी का अपमान समझकर सती का हृदय जल उठा। पिछला ( पतिपरित्याग का) दुःख उसके हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय ( पति-अपमान के कारण ) हुआ।



जद्यपि जग दारुण दुःख नाना। सब ते कठिन जाति अवमाना।। समुझ सो सतिहिं भयउ अति क्रोधा। बहुबिधि जननी कीन्ह प्रबोधा।।---अर्थ---जद्यपि इस संसार मे बहुत कठिन दुःख हैं तथापि पति अपमान सबसे बढ़कर कठिन है। यह समझकर सतीजी को बड़ा क्रोध हो आया। माता ने उन्हें बहुत प्रकार से समझाया बुझाया।



सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहिं हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध।।---अर्थ---परन्तु उनसे शिवजी का अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदय को कुछ भी शान्त्वना नहीं मिली। तब वे सारी सभा को हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे बचन बोलीं---

सुनहु सभासद सकल मुनिंदा। कही सुनी जिन्ह शंकर निंदा।। सो फल तुरत लहब सब काहूँ। भली-भाँति पछिताब पिताहूँ।।---अर्थ---हे सभासदों और सब मुनिश्वरों ! सुनो ! जिनलोगों ने यहाँ शिवजी की निंदा की या सुनी है, उन सबको उसका फल तुरंत ही मिलेगा और मेरे पिता दक्ष भी भली-भाँति पछताएँगे।


संत संभु श्रीपति अपवादा। सुनिय जहाँ तहँ असि मरजादा।। काटिय ताहि जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई।।---अर्थ---जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान् की निंदा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस ( निंदा करनेवाले ) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूँदकर वहाँ से भाग जाय।



जगदातमा महेसु पुरारी। जगत जनक सब के हितकारी।। पिता मंदमति निंदत तेही। दच्छ सुक्र संभव यह देही।।---अर्थ---त्रिपुर दैत्य को मारनेवाले भगवान् महेश्वर संपूर्ण जगत् के आत्मा हैं, वे जगत्पिता और सबका हित करनेवाले हैं। मेरा मंदबुद्धि पिता उनकी निंदा करता है; और मेरा यह शरीर दक्ष ही के वीर्य से उत्पन्न है।



तजिहउँ तुरत देह तेहि हेतू। उर धरि चन्द्रमौलि बृषकेतू।। अस कि जोग अगिनि तनु जारा। भयउ सकल मख हाहाकारा।।---अर्थ---इसलिये चन्द्रमा को ललाट पर धारण करने वाले बृषकेतू शिवजी को को हृदय में धारण करके मैं इस शरीर को तुरंत ही त्याग दूँगी। ऐसा कहकर सतीजी ने योगाग्नि में अपना शरीर भष्म कर डाला। सारी यज्ञशाला में हाहाकार मच गया।



सती मरनु सुनि संभु गन लगे करन मख खीस। जग्य बिधंस बिलोकि भृगु रच्छा कीन्ह मुनीस।।---अर्थ---सती का मरण सुनकर शिवजी के गण यज्ञ विधंस करने लगे। यज्ञ विध्वंस होते देख मुनीवर भृगुजी ने उसकी रक्षा की।



समाचार सब संकर पाए। बीरभद्र करि कोप पठाए।। जग्य विधंस जाइ तिन्ह कीन्हा। सकल सुरन्ह बिधिवत फलु दीन्हा।।---अर्थ---ये सब समाचार शिवजी को मिले, तब उन्होंने क्रोध करके वीरभद्र को भेजा। उन्होंने वहाँ जाकर यज्ञ विध्वंस कर डाला और सब देवताओं को यथोचित फल (दण्ड) दिया।



भै जगबिदित दच्छ गति सोई। जसि कछु संभु बिमुख कै होई।। यह इतिहास सकल जग जानी। ताते मैं संक्षेप बखानी।।---अर्थ---दक्ष की जगत्प्रसिद्ध वही गति हुई जो शिवद्रोही को हुआ करती है। यह इतिहास सारा संसार जानता है, इसलिये मैने संक्षेप में वर्णन किया।