Saturday, 9 December 2017

बालकाण्ड

कहउँ राम गुन गाथ भरद्वाज सादर सुनहु। भव भंजन रघुनाथ भजु तुलसी तजि मान मद।।___अर्थ___[ याज्ञवल्क्यजी कहते हैं___] हे भरद्वाज ! मैं श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की कथा कहता हूँ, तुम आदर से सुनो। तुलसीदासजी कहते हैं___मान और मद को छोड़कर आवागमन का नाश करने वाले रघुनाथजी को भजो। 

हिमगिरि गुहा एक अति पावनि। बह समीप सुरसरि सुहावनि।। आश्रम परम पुनीत सुहावा। देखि देवरिषि मन अति भावा।।___अर्थ___हिमालय पर्वत में एक बड़ी पवित्र गुफा थी। उसके समीप ही सुन्दर गंगाजी बहती थीं। वह परम पवित्र सुन्दर आश्रम देखने पर नारदजी के मन को बहुत ही सुहावना लगा।

निरखि सैल सरि बिपिन बिभागा। भयउ रमापति पद अनुरागा।। सुमिरत हरिहि श्राप गति बाधी। सहज बिमल मन लागि समाधी।।___अर्थ___पर्वत, नदी और वन के [ सुन्दर ] विभागों को देखकर नारदजी का लक्ष्मीकान्त भगवान् के चरणों में प्रेम हो गया। भगवान् का स्मरण करते ही उन ( नारदमुनि ) के शाप की ( जो शाप उन्हें दक्षप्रजापति ने दिया था और जिसके कारण वे एक स्थान पर नहीं ठहर सकते थे ) गति रुक गयी और मन के स्वाभाविक ही निर्मल होने से उनकी समाधि लग गयी।

मुनि गति देखि सुरेस डेराना। कामहि बोलि कीन्ह सनमाना।। सहित सहाय जाहु मम हेतू। चलेउ हरषि हियँ जलचरकेतू।।___अर्थ___नारदमुनि की [ यह तपोमयी ] स्थिति देखकर देवराज इन्द्र डर गया। उसने कामदेव को बुलाकर आदर_सत्कार किया [ और कहा कि ] मेरे [ हित के ] लिये तुम अपने सहायकों सहित [ नारद की समाधि भंग करने को ] जाओ। [ यह सुनकर ] मीनध्वज कामदेव मन में प्रसन्न होकर चला।

सुनासीर मन महुँ अति त्रासा। चहत देवरिषि मम पुर बासा।। जे कामी लोलुप जग माहीं। कुटिल काक इव सबहिं डेराहीं।।___अर्थ___ इन्द्र के मन में यह डर हुआ कि देवर्षि नारद मेरी पुरी ( अमरावती ) का निवास ( राज्य ) चाहते हैं। जगत् में जो कामी और लोभी होते हैं, वे कुटिल कौए की तरह सबसे डरते हैं।

सूख हाड़ लै भाग सठ स्वान निरखि मृगराज।छीनि लेइ जनि जान जड़ तिमि सुरपतिहिं न लाज।।___अर्थ____जैसे मूर्ख कुत्ता सिंह को देखकर सूखी हड्डी लेकर भागे और वह मूर्ख यह समझे कि कहीं उस हड्डी को सिंह छीन न ले, वैसे ही इन्द्र को [ नारदजी मेरा राज्य छीन लेंगे, ऐसा सोचते ] लाज नहीं आयी।

तेहि आश्रमहिं मदन जब गयऊ। निज मायाँ बसंत निरमयऊ।। कुसुमित बिबिध बिटप बहुरंगा। कूजहिं कोकिल गुंजहिं भृंगा।।___अर्थ___जब कामदेव उस आश्रम में गया, तब उसने अपनी माया से वहाँ वसंत_ऋतु को उत्पन्न किया। तरह_तरह के वृक्षों पर रंग_बिरंगे फूल खिल गये, उन पर कोयले दूर वे लगीं और भौंरे गुंजार करने लगे।

चली सुहावनि त्रिबिध बयारी। काम कृसानु बढ़ावनिहारी।। रंभादिक सुर नारि नबीना। सकल असमसर कला प्रबीना।।___अर्थ___तीनों प्रकार की सुहावनी पवन चलने लगीं जो कामाग्नि को बढ़ानेवाली है। रम्भा आदि युवा देवांगनाएँ जो सब कामकलाओं में चतुर हैं,

करहिं गान बहुत तान तरंगा। बहुबिधि क्रीड़हिं पानि पतंगा।। देखि सहाय मदन हरषाना। कीन्हेसि पुनि प्रपंच बिधि नाना।।___अर्थ____वे अनेक प्रकार की तान भरकर लय से जाने लगीं और हाथ में गेंद लेकर बहुत प्रकार से खेलने लगीं। अपने सहायकों को देखकर कामदेव प्रसन्न हुआ, उसने अनेक प्रकार के छल किये।

कामकला कछु मुनिहि न व्यापी। निज भयँ डरेउ मनोभव पापी।। सीम कि चाँपि सकइ कोउ तासू। बड़ रखवार रमापति जासू।।___अर्थ___जब कामदेव की माया का प्रभाव मुनि पर पर कुछ भी न हुआ, तब वह पापी अपने भय से आपही डर गया। क्या उसकी सीमा को कोई दबा सकता है ? जिसके बड़े रक्षक लक्ष्मीकान्त भगवान हों।

सहित सहाय सभीत अति, मानि हारि मन मैन। गहेसि जाइ मुनि चरन तब, कहि सुठि आकर बैन।।___ अर्थ___अपने सहायकों सहित कामदेव ने बहुत ही डरकर मन में हार मानकर दीन वचन कहते हुए नारदजी के चरण पकड़ लिये।

  भयउ न नारद मन कछु रोषा। कहि प्रिय वचन काम परितोषा।। नाइ चरन सिरु आयसु पाई। गयउ मदन तब सहित सहाई।।___अर्थ___नारदमुनि के मन में कुछ क्रोध न हुआ और उन्होंने मीठे वचन कहकर कामदेव को संतुष्ट किया। तब कामदेव अपने सहायकों सहित मुनि के चरणों में सिर मिलाकर आज्ञा पाकर देवतालोग को चला गया।

मुनि सुसीलता आपनि करनी। सुरपति सभाँ जाइ सब बरनी।। सुनि सब कें मन अचरजु आवा। मुनिहिं प्रसंसि हरिहिं सिरु नावा।।___अर्थ___देवराज इन्द्र की सभा में जाकर उसने मुनि की सुशीलता और अपनी करतूत सब कही, जिसे सुनकर सबके मन में आश्चर्य हुआ और उन्होंने मुनि की बड़ाई करके श्रीहरि को सिर नवाया।

तब नारद गवने सिव पाहीं। जिता काम अहमिति मन माहीं।। मार चरित संकरहिं सुनाए। अतिप्रिय जानि महेस सिखाए।।___अर्थ___तब नारदजी शिवजी के पास गये। उनके मन में इस बात का अहंकार हो गया कि हमने कामदेव को जीत लिया। उन्होंने कामदेव के चरित्र शिवजी को सुनाये और महादेवजी ने उन ( नारदजी ) को अत्यन्त प्रिय जानकर [ इस प्रकार ] शिक्षा दी___

बार बार बिनवउँ मुनि तोही। जिमि यह कथा सुनायहु मोही।। तिमि जनि हरिहि सुनावहु कबहूँ। चलेहुँ प्रसंग दुराएहु तबहूँ।।___अर्थ___हे मुनि ! मैं तुमसे बार_बार विनती करता हूँ कि जिस तरह यह कथा तुमने मुझे सुनायी है, उस तरह भगवान् श्रीहरि को कभी मत सुनाना। चर्चा भी चले तब भी इसको छिपा जाना।

संभु दीन्ह उपदेश हित नहिं नारदहि सोहान। भरद्वाज कौतुक सुनहु हरि इच्छा बलवान।।___अर्थ___यद्यपि शिवजी ने यह हित की शिक्षा दी, पर नारदजी को वह अच्छी न लगी। हे भरद्वाज ! अब कौतुक ( तमाशा ) सुनो। हरि की इच्छा बड़ी बलवान् है।

राम कीन्ह चाहहिं सोई होई। करै अन्यथा अस नहिं कोई।। संभु बचन मुनि मन नहिं भाए। तब बिरंचि के लोक सिधाए।।___अर्थ___श्रीरामचन्द्रजी जो करना चाहते हैं, वही होता है, ऐसा कोई नहीं जो उसके विरुद्ध कर सके। श्रीशिवजी के वचन नारदजी के मन को अच्छे नहीं लगे, तब वे वहाँ से ब्रह्मलोक को चल दिये।

एक बार करतल बर बीना। गावत हरि गुन गान प्रबीना। छीरसिंधु गवने मुनिनाथा। जहँ बस श्रीनिवास श्रुतिमाथा।।___अर्थ___एक बार गानविद्या में निपुण मुनिनाथ नारदजी हाथ में सुन्दर वीणा लिये, हरिगुण जाते हुए क्षीरसागर को गये, जहाँ वेदों के मस्तकस्वरूप ( मूर्तिमान् वेदान्ततत्व ) लक्ष्मीश्रीनिवास भगवान् श्रीनारायण रहते हैं।

हरषि मिले उठि रमानिकेता। बैठे आसन रिषिहि समेता।। बोले बिहसि चराचर राया। बहुते दिनन कीन्ह मुनि दाया।।___अर्थ____रमानिवास भगवान् उठकर बड़े आनन्द से उनसे मिले और नारदजी के साथ आसन पर बैठ गये। चराचर के स्वामी भगवान् हँसकर बोले___हे मुनि ! आज आपने बहुत दिनों पर दया की।

कामचरित नारद सब भाषे। जद्यपि प्रथम बरजि सिवँ राखे।। अति प्रचंड रघुपति कै माया। जेहि न मोह अस को जग जाया।।___अर्थ___यद्यपि शिवजी ने उन्हें पहले से ही बरज रखा था, तो भी नारदजी ने कामदेव का सारा चरित्र भगवान् को कह सुनाया। श्रीरघुनाथजी की माया बड़ी ही प्रबल है। जगत् में ऐसा कौन जन्मा है जिसे वह मोहित न कर दे।

रूख बदन करि बचन मृदु बोले श्रीभगवान। तुम्हरे सुमिरन तें मिटहिं मोह, मार, मद, मान।।____अर्थ____भगवान् रूखा मुँह करके कोमल वचन बोले___हे मुनिराज ! आपका स्मरण करने से दूसरों के मोह, काम, मद और अभिमान मिट जाते हैं [ फिर आपके लिये तो कहना ही क्या है ? ]

सुनु मुनि  मोह होइ मन ताकें। ग्यान बिराग हृदय नहिं जाकें। ब्रह्मचरज ब्रत रत मतिधीरा। तुम्हहि का करइ मनोभव पीरा।।___अर्थ___हे मुनि ! सुनिये, मोह तो उसके मन में होता है जिसके हृदय में ज्ञान_वैराग्य नहीं है। आप तो ब्रह्मचर्यव्रत में तत्पर और बड़े धीरबुद्धि हैं। भला, कहीं आपको भी कामदेव सता सकता है।

नारद कहेउ सहित अभिमाना। कृपा तुम्हारि सकल भगवाना।। करुनानिधि मन दीख बिचारी। उर अंकुरेउ गरब तरु भारी।।___अर्थ___ नारदजी ने अभिमान के साथ कहा___भगवन् ! यह सब आपकी कृपा है। कृपानिधान भगवान् ने मन में विचारकर देखा कि इनके मन में गर्व के भारी वृक्ष का अंकुर पैदा हो गया है।

बेगि सो मैं डारिहउँ उखारी। पन हमार सेवक हितकारी। मुनि कर हित मम कौतुक होई। अवसि उपाय करबि मैं सोई।।___अर्थ___मैं उसे तुरंत ही उखाड़ फेकूँगा, क्योंकि सेवकों का हित करना हमारा प्रण है। मैं अवश्य ही वह उपाय करूँगा जिससे मुनि का कल्याण और मेरा खेल हो।

तब नारद हरि पद सिर नाई। चले हृदय अहमिति अधिकाई।। श्रीपति निज माया तब प्रेरी। सुनहु कठिन करनी तेहि केरी।।___अर्थ___तब नारदजी भगवान् के चरणों में सिर नवाकर चले। उनके हृदय में अभिमान और भी बढ़ गया। तब लक्ष्मीपति भगवान् ने अपनी माया को प्रेरित किया। अब उसकी कठिन करनी सुनो।

बिरचेउ मग महुँ नगर तेहिं सत जोजन विस्तार। श्रीनिवासपुर तें अधिक रचना बिबिध प्रकार।।___अर्थ___ उस ( हरिमाया ) ने रास्ते में सौ योजन ( चार सौ कोस ) का एक नगर रचा। उस नगर की भाँति_भाँति रचनाएँ लक्ष्मीनिवास भगवान् विष्णु के नगर ( वैकुण्ठ ) से भी अधिक सुन्दर थीं।

बसहिं नगर सुंदर नर नारी। जनु बहु मनसिज रति तनु धारी। तेहिं पुर बसइ सीलनिधि राजा। अगनित हय गय सेन समाजा।।___अर्थ___उस नगर में ऐसे सुन्दर नर_नारी बसते थे मानो बहुत से कामदेव और [ उसकी स्त्री ] रति ही मनुष्य_शरीर धारण किये हुए हों। उस नगर में शीलनिधि नाम का राजा रहता था, जिसके यहाँ असंख्य घोड़े, हाथी और सेना के समूह ( टुकड़ियाँ ) थे।

सत सुरेस सम बिभव बिलासा। रूप तेज बल नीति निवासा।। बिस्वमोहिनी तासु कुमारी। श्री बिमोह जिसु रूपु निहारी।।___अर्थ___उसका वैभव और विलास सौ इन्द्रों के समान था। वह रूप, तेज और नीति का घर था। उसके विश्वविमोहिनी नाम की एक [ ऐसी रूपवती ] कन्या थी, जिसके रूप को देखकर लक्ष्मीजी भी मोहित हो जायँ।

सोइ हरिमाया सब गुन खानी। सोभा तासु कि जाइ बखानी।। करइ स्वयंवर सो नृपबाला। आए तहँ अगनित महिपाला।।___अर्थ___वह सब गुणों की खान भगवान् की माया ही थी। उसकी शोभा का वर्णन कैसे किया जा सकता है। वह राजकुमारी स्वयंवर करना चाहती थी, इससे वहाँ अगनित राजा आये हुए थे।

मुनि कौतुकी नगर तेहिं गयऊ। पुरबासिन्ह सब पूछत भयऊ।। सुनि सब चरित भूपगृह आए। करि पूजा नृप मुनि बैठाए।।___अर्थ___खिलवाड़ी मुनि नारदजी उस नगर में गये और नगरवासियों से उन्होंने सब हाल पूछा। सब समाचार सुनकर वे राजा के महल में आये। राजा ने पूजा करके मुनि को [ आसन पर ] बैठाया।

आनि देखाई नारदहि भूपति राजकुमारि। कहहु नाथ गुण दोष सब एहि के हृदयँ बिचारि।।___अर्थ____[ फिर ] राजा ने राजकुमारी को लाकर नारदजी को दिखलाया [ और पूछा कि__] हे नाथ ! आप अपने हृदय में विचारकर इसके सब गुण_दोष कहिये।

देखि रूप मुनि बिरति बिसारी। बड़ी बार लगी रहे निहारी।। लच्छन तासु बिलोकि भुलाने। हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने।।___अर्थ___उसके रूप देखकर मुनि वैराग्य भूल गये और बड़ी देर तक उसकी ओर देखते ही रह गये। उसके लक्षण देखकर मुनि अपने आप को भी भूल गये और हृदय में हर्षित हुए, पर प्रकटरूप में उन लक्षणों को नहीं कहा।

जो एहि बरइ अमर सोइ होई। समरभूमि तेहि जीत न कोई।। सेवहिं सकल चराचर ताही। बरइ सीलनिधि कन्या जाही।___अर्थ___[ लक्षणों को सोचकर वे मन में कहने लगे कि ] जो इसे ब्याहेगा, वह अमर हो जायगा और रणभूमि में कोई उसे जीत न सकेगा। यह सीलनिधि की कन्या जिसको वरेगी, सब चर_अचर जीव उसकी सेवा करेंगे।

लच्छन सब बिचारि उर राखे। कछुक बनाइ भूप सन भाषे।। सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं। नारद चले सोच मन माहीं।।___अर्थ___सब लक्षणों को विचारकर मुनि ने अपने हृदय में रख लिया और राजा से कुछ अपनी ओर से बनाकर कह दिया। राजा से लड़की के सुलक्षण कहकर नारदजी चल दिये। पर उनके मन में यह चिंता थी कि___

करौं जाइ सोइ जतन बिचारी। जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी।। जप तप कछु न होइ तेहि काला। हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला।।___अर्थ___मैं जाकर सोच_विचारकर अब वही उपाय करूँ, जिससे यह कन्या मुझे ही वरे। इस समय जप_तप से कुछ हो नहीं सकता। हे विधाता ! मुझे यह कन्या किस तरह मिलेगी ?

एहि अवसर चाहिय परम सोभा रूप बिसाल। जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल।।___अर्थ___इस समय तो बड़ी भारी शोभा और विशाल ( सुन्दर ) रूप चाहिये, जिसे देखकर राजकुमारी मुझपर रीझ जाय और जयमाल [ मेरे गले में ] डाल दे।

हरि सन मागौं सुन्दरताई। होइहिं जात गहरु अति भाई। मोरें हित हरिसम नहिं कोऊ। एहि अवसर सहाय सोई होऊ।।___अर्थ___[ एक काम करूँ कि ] भगवान् से सुन्दरता माँगूँ; पर भाई ! उनके पास जाने में तो बहुत देर हो जायगी। किन्तु श्रीहरि के समान मेरा हितू भी कोई नहीं है, इसलिये इस समय वे ही मेरे सहायक हों।

बहुबिधि बिनय कीन्ह तेहि काला। प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला।। प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने। होइहिं काजु हिएँ हरषाने।।___अर्थ___उस समय नारदजी ने भगवान् की बहुत प्रकार से विनती की। तब लीलामय कृपालु प्रभु [ वहीं ] प्रकट हो गये। स्वामी को देखकर नारदजी के नेत्र शीतल हो गये और वे मन में बड़े ही हर्षित हुए कि अब तो काम बन ही जायगा।

अति आरति कही कथा सुनाई। करहु कृपा करी होहु सहाई।। आपन रूप देहु प्रभु मोही। आन भाँति नहिं पावौं ओही।।___अर्थ___ नारदजी ने बहुत आर्त ( दीन ) होकर सब कथा कह सुनायी। [ और प्रार्थना की कि ] कृपा कीजिये और कृपा करके मेरे सहायक बनिये। हे प्रभो ! आप अपना रूप मुझको दीजिये और किसी प्रकार मैं उस ( राजकन्या )  को नहीं पा सकता।

जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा। करहु सो बेगि दास मैं तोरा। निज माया बल देखि बिसाला। हियँ हँसि बोले दीनदयाला।।___अर्थ___हे नाथ, जिस तरह मेरा हित हो, आप वही शीघ्र कीजिये ! मैं आपका दास हूँ। अपनी माया का विशाल बल देख दीनदयालु भगवान् मन_ही_मन हँसकर बोले___

जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार। सोई हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार।।___अर्थ___हे नारदजी ! सुनो, जिस प्रकार आपका परम हित होगा, हम वही करेंगे, दूसरा कुछ नहीं। हमारा वचन असत्य नहीं होता।

कुपथ माग रुज व्याकुल रोगी। बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी।। एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ। कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ।।___अर्थ___हे योगी मुनि ! सुनिये,  रोग से व्याकुल रोगी कुपथ्य माँगे तो वैद्य उसे नहीं देता। इसी प्रकार मैंने भी तुम्हारा हित करने की ठान ली है। ऐसा कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये।

माया बिबस भए मुनि मूढ़ा। समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा। गवने तुरंत तहाँ रिषिराई। जहाँ स्वयंवर भूमि बनाई।।___[ भगवान् की ] माया के वशीभूत हुए मुनि ऐसे मूढ़ हो गये कि वे भगवान् की अगूढ़ ( स्पष्ट ) वाणी को भी न समझ सके। ऋषिराज नारदजी तुरंत वहाँ गये जहाँ स्वयंवर की भूमि बनायी गयी थी।

निज निज आसन बैठे राजा। बहु बनाव करि सहित समाजा।। मुनि मन हरष रूप अति मोरें। मोहि तजि आनहि बरिहि न भोरें।।___ अर्थ___राजालोग खूब सज_धजकर समाजसहित अपने_ अपने आसन पर बैठे थे। मुनि ( नारद ) मन_ही_मन प्रसन्न हो रहे थे कि मेरा रूप सुन्दर है, मुझे छोड़ कन्या भूलकर भी दूसरे को न वरेगी।

मुनि हित कारण कृपानिधाना। दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना।। सो चरित्र लखि काहु न पावा। नारद जाना सबहिं सिरु नावा।।___अर्थ___कृपानिधान भगवान् ने मुनि के कल्याण के लिये उन्हें ऐसा कुरूप बना दिया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता; पर यह चरित कोई भी न जान सका। सबने उन्हें नारद जानकर ही प्रणाम किया।

रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ। बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ।।___अर्थ___वहाँ दो शिवजी के गण भी थे। वे सब भेद जानते थे और ब्राह्मण का वेष बनाकर सारी लीला देखते फिरते थे। न वे भी बड़े मौजी थे।

जेहि समाज बैठे मुनि जाई। हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई।। तहँ बैठे महेस गन दोऊ। विप्रबेष गति लखइ न कोऊ।।___अर्थ___नारदजी अपने हृदय में रूप का बड़ा अभिमान लेकर जिस समाज ( पंक्ति ) में जाकर बैठे थे, ये शिवजी के दोनो गण भी वहीं बैठ गये। ब्राह्मण के वेष में होने के कारण उनकी इस चालाकी को कोई न जान सका।

करहिं कूटि नारदहि सुनाई। नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई।। रीझिहि राजकुअँरि छबि देखी। इन्हहिं बरिहि हरि जानि बिसेषी।।___ अर्थ___वे नारदजी को सुना_सुनाकर व्यंग्य वचन कहते थे___भगवान् ने इनको अच्छी ‘सुन्दरता’ दी है। इनकी शोभा देखकर राजकुमारी रीझ ही जायगी और ‘हरि’ ( वानर ) जानकर इन्हीं को खास तौर से वरेगी।

मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ। हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ।। जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी। समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी।।___अर्थ___नारद मुनि को मोह हो रहा था, क्योंकि उनका मन दूसरे के हाथ ( माया के वश ) में था। शिवजी के गण बहुत प्रसन्न होकर हँस रहे थे। यद्यपि मुनि उनकी अटपटी बातें सुन रहे थे, पर बुद्धि भ्रम में सनी हुई होने के कारण वे बातें उनकी समझ में नहीं आती थीं ( उनकी बातों को वे प्रशंसा समझ रहे थे )।

काहुँ न लखा सो चरित बिषेषा। सो सरूप नृपकन्याँ देखा। मर्कट बदन भयंकर देही। देखत हृदयँ क्रोध भा तेही।।___अर्थ___इस विशेष चरित को किसी और ने नहीं जाना, केवल राजकन्याने [ नारदजी का ] वह रूप देखा। उनका बंदर_सा मुँह और भयंकर शरीर देखते ही कन्या के हृदय में क्रोध उत्पन्न हो गया।

सखीं संग लै कुअँरि तब रवि जनु राजमराल। देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल।।___अर्थ___तब राजकुमारी सखियों को साथ लेकर इस तरह चली मानो राजहंसिनी चल रही है। वह अपने कमल जैसे हाथों में जयमाला लिये सब राजाओं को देखती हुई घूमने लगी।

जेहि दिसि बैठे नारद फूली। सो दिसी तेहिं न बिलोकी भूली।। पुनि पुनि मुनि उकसहिं अकुलाहीं। देखि दशा हर गन मुसुकाहीं।।___अर्थ___जिस ओर नारदजी [ रूप के गर्व में ] फूले बैठे थे, उस ओर उसने भूलकर भी नहीं ताका। नारद मुनि बार_बार उचकते और छटपटाते हैं। उनकी दशा देखकर शिवाजी के गन मुस्कराते हैं।

धरि नृपतनु तहँ गयउ कृपाला। कुअँरि हरषि मेलेउ जयमाला।। दुलहिनि लै गे लच्छिनिवासा। नृपसमाज सब भयउ निरासा।।___अर्थ___कृपालु भगवान् भी राजा का शरीर धारण कर वहाँ पहुँचे। राजकुमारी ने हर्षित होकर उनके गले में जयमाला डाल दी। लक्ष्मीनिवास भगवन् दुलहिन को ले गये। सारी राजमण्डली निराश हो गयी।

मुनि अति बिकल मोहँ मति नाठी। मनि गिरि गईं छूटि जनु गाँठी। तब हर गन बोले मुसुकाई। निज मुख मुकुर बिलोकहु जाई।।___अर्थ___मोह के कारण मुनि की बुद्धि नष्ट हो गयी थी, इससे वे [ राजकुमारी को गयी देख ] बहुत ही विकल हो गये। मानो गाँठ से छूटकर मणि गिर गयी हो। तब शिवजी के गणों ने मुस्कराकर कहा___जाकर दर्पण में अपना मुख तो देखिये !

अस कहि दोउ भागे भयँ भारी। बदन दीख मुनि बारि निहारी।। बेषु बिलोकि क्रोध अति बाढ़ा। तिन्हहिं सराप दीन्ह अति गाढ़ा।।___अर्थ___ऐसा कहकर वे दोनों बहुत भयभीत होकर भागे। मुनि ने जल में झाँककर अपना मुँह देखा। अपना रूप देखकर उनका क्रोध बहुत बढ़ गया। उन्होंने शिवाजी के उन गणों को अत्यन्त कठोर शाप दिया।

होहु निसाचर जाइ तुम्ह कपटी पापी दोउ। हँसेहु हमहि सो लेहु फल बहुरि हँसेहु मुनि कोउ।।___अर्थ___ तुम दोनो कपटी और पापी जाकर राक्षस हो जाओ। तुमने हमारी हँसी की, उसका फल चखो। अब फिर किसी मुनि की हँसी करना।

पुनि जल दीख रूप निज पावा। तदपि हृदयँ संतोष न आवा।। फरकत अधर कोप मन माहीं। सपदि चले कमलापति पाहीं।।___ अर्थ___ मुनि ने फिर जल में देखा, तो उन्हें अपना ( असली ) रूप प्राप्त हो गया; तब भी उन्हें संतोष नहीं हुआ। उनके ओंठ फरक रहे थे और मन में क्रोध [ भरा ] था। वे तुरंत ही भगवान् कमलापति के पास चले।

देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई। जगत मोरि उपहास कराई।। बीचहिं पंथ मिले दनुजारि। संग रमा सोइ राजकुमारी।।___अर्थ___[ मन में सोचते जाते थे___ ] जाकर या तो शाप दूँगा या प्राण दे दूँगा। उन्होंने जगत् में मेरी हँसी करायी। दैत्यों के शत्रु भगवान् हरि उन्हें बीच रास्ते में ही मिल गये। साथ में लक्ष्मीजी और वही राजकुमारी थी।

बोले मधुर बचन सुरसाईं। मुनि कहँ चले बिकल की नाईं।। सुनत बचन उपजा अति क्रोधा। माया बस रहा न मन बोधा।।___अर्थ___देवताओं के स्वामी भगवान् ने मीठी  वाणी में कहा___हे मुनि ! व्याकुल की तरह कहाँ चले ? ये शब्द सुनते ही नारद को बड़ा क्रोध आया; माया के वशीभूत होने के कारण मन में चेत नहीं रहा।

पर संपदा सकहु नहीं देखी। तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी।। मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु। सुरन्ह प्रेरि बिष पान करायहु।।___अर्थ___[मुनि ने कहा___] तुम दूसरों की संपदा नहीं देख सकते, तुम्हारे ईर्ष्या और कपट बहुत हैं। समुद्र मथते समय तुमने शिवजी को बावला बना दिया और देवताओं को प्रेरित करके उन्हें विषपान कराया।

असुर सुरा बिष संकरहिं आपु रमा मनि चारु। स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु।___अर्थ___असुरों को मदिरा और शिवजी को विष देकर तुमने स्वयं लक्ष्मी और सुन्दर [ कौस्तुभ ] मणि ले ली। तुम बड़े धोखेबाज और मतलबी हो। सदा करंट का व्यवहार करते हो।

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई। भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई। भलेहि मंद मंदेहि भल करहू। बिसमय हरष न हियँ कछ धरहू।।___अर्थ___तुम परम स्वतंत्र हो, सिर पर तो कोई है नहीं, इससे जब जो मन भारी है, [ स्वच्छन्दता से ] वही करते हो। भले को बुरा और बुरे को भला कर देते हो। हृदय में हर्ष_विषाद कुछ भी नहीं लाते।

डहकि डहकि परिचेहु सब काहू। अति असंक मन सदा उछाहू। करम सुभासुभ तुम्हहिं न बाधा। अब लगी तुम्हहिं न काहूँ साधा।___अर्थ___सबको ठग_ठगकर परक गये हो और अत्यन्त निडर हो गये हो; इसी से [ ठगने के काम में ] मन में सदा उत्साह रहता है। शुभ_ अशुभ कर्म तुम्हें बाधा नहीं देते। अब तक तुमको किसी ने ठीक नहीं किया था।

भले भवन अब बायन दीन्हा। पावहुगे फल आपन कीन्हा।। बंचेहु मोहि जवनि धरि देहा। सोई तनु धरहु श्राप मम एहा।।___अर्थ___अबकी तुमने अच्छे घर बैना दिया है ( मेरे_जैसे जबर्दस्त आदमी से छेड़खानी की है )। अतः अपने किये का फल अवश्य पाओगे। जिस शरीर को धारण करके तुमने  मुझे ठहरा है, तुम भी वही शरीर कारण करो, यह मेरा शाप है।

कपि आकृति तुम्ह कीन्ह हमारी। करिहहिं कीस सहाय तुम्हारी।। मम अपकार कीन्ह तुम्ह भारी। नारि बिरह तुम्ह होब दुखारी।।___अर्थ___तुमने हमारी आकृति बन्दर की सी बनाई थी, इस कारण बन्दर ही तुम्हारी सहायता करेंगे, तुमने हमारा बड़ा निरादर किया, उस कारण स्त्री के नियोजन से तुम भी दुःखी होंगे।

श्राप सीस धरि हरषि हियँ, प्रभु बहु बिनती कीन्ह। निज माया कै प्रबलता, करषि कृपानिधि लीन्ह।।___ अर्थ___श्राप सिर पर चढ़ाकर प्रसन्न से प्रभु ने मुनि की बहुत विनती की। फिर कृपानिधान भगवान् ने अपनी माया की प्रबलता खींच ली।

जब हरि माया दूरि निवारी। नहिं तहँ रमा न राजकुमारी।। तब मुनि अति सभीत हरि चरना। गहे पाहि प्रनतारति हरना।।___ अर्थ___जब हरि भगवान् ने माया दूर कर दी तो वहाँ न लक्ष्मीजी रहीं न राजकुमारी ही। तब मुनि ने बहुत डरकर श्रीहरि के चरण पकड़ लिये और बोले___ हे भक्तों के दुःख दूर करनेवाले ! मेरी रक्षा करो।

मृषा होउ मम श्राप कृपाला। मम इच्छा कह दीनदयाला।। मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे। कह मुनि पाप मिटहिं किमि मेरे।।___अर्थ___हे कृपालु ! मेरा श्राप मिथ्या हो जाय। यह सुन दीनदयालु प्रभु ने कहा___यह मेरी इच्छा से ही हुआ है। नारदजी ने कहा___मैंने आपको अनेक दुर्वचन कहे हैं। मेरे यह पाप कैसे दूर होंगें?

जपहु जाइ संकर सतनामा। होइहिं हृदयँ तुरत विश्रामा। कोई नहिं सिव समान प्रिय मोरें। अति परतीति तजहु जनि भोरें।।___अर्थ___शिवजी के सतनाम जपो, हृदयँ तुरन्त शान्त हो जायगा। शिवजी के समान मुझे कोई भी प्यारा नहीं है। ऐसा विश्वास भूलकर भी न छोड़ना।

जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी। सो न पाव मुनि भगति हमारी।। अस उर धरि महि बिचरहु जाई। अब न तुम्हहिं माया निअराई।।___अर्थ___जिस पर शिवजी दया नहीं करते, हे मुनि ! वह हमारी भक्ति नहीं पा सकता। ऐसा मन में रख तुम पृथ्वी पर जाकर विचरो, अब तुम्हारे समीप माया नहीं आवेगी।

बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु, तब भए अन्तरधान। सत्यलोक नारद चले, करत राम गुन गान।।___अर्थ___तब बहुत प्रकार ये मुनि को समझाकर प्रभु अन्तर्धान हो गये। नारदजी भी राजमा के गुणों का दान करते हुए सत्यलोक ( ब्रह्मलोक ) चले।

हरगन मुनिहि जात पथ देखी। बिगत मोह मन हरष बिसेषी।। अति सभीत नारद पहिं आए। गहि पद आरत बचन सुनाए।।___ अर्थ___महादेवजी के गणों ने नारदमुनि को मोहरहित और बहुत प्रसन्न मन से मार्ग में जाते हुए देखा। वे बहुत डरते हुए उनके पास आए और चरण पकड़कर दुःख भरे हुए वचन बोले___।

हरगन हम न बिप्र मुनिराया। बड़ अपराध कीन्ह फल पाया।। श्राप अनुग्रह करहु कृपाला। बोले नारद दीनदयाला।।__अर्थ___हे मुनि ! हम शिवजी के गण हैं, ब्राह्मण नहीं हैं। हमने बड़ा अपराध किया, उसका फल पाया। हे कृपालु ! शाप दूर करने का कृपा कीजिए। यह सुनकर दीनदयालु नारदजी बोले

निसिचर जाइ होहु तुम्ह दोऊ। वैभव बिपुल तेज बल होऊ।। भुजबल विश्व जितब तुम्ह जहिया। धरिहहिं बिष्णु मनुज तनु तहिया।।___अर्थ___तुम दोनों जाकर राक्षस हो जाओ, तुम्हारा ऐश्वर्य, तेज, बल बहुत होगा। अपनी भुजाएँ के बल से जब तुम संसार तो जीतोगे तब हरि भगवान् मनुष्य का शरीर धारण करेंगे।

समर मरन हरि हाथ तुम्हारा। होइहहु मुकुत न पुनि संसारा।। चले जुगल मुनि पद सिर नाई। भए निसाचर कालहि पाई।।____अर्थ___युद्ध में श्रीहरि के हाथ से तुम्हारी मृत्यु होगी तब तुम मुक्त हो जाओगे, फिर संसार में जन्म न लोगे। वे दोनों मुनि को चरणों में सिर नवाकर चले गये और समय पाकर राक्षस हुए।

एक कलप एहि हेतु प्रभु, लीन्ह मनुज अवतार।। सुर रंजन सज्जन सुखद, हरि भंजन भुबि भार।।___अर्थ___देवताओं को आनन्द देनेवाले, सत्पुरुषों को सुख देनेवाले और भूमि का भार उतारनेवाले प्रभु ने इस कारण से मनुष्य का अवतार लिया।

एहि बिधि जनम करम हरि केरे। सुन्दर सुखद बिचित्र घनेरे।। कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहिं। चारुचरित नाना बिधि करहीं।।___अर्थ___इस प्रकार भगवान् के जन्म और कर्म अनेक सुन्दर, सुखदायक और बहुत विचित्र हैं। प्रत्येक कलर में जब भगवान् अवतार लेते हैं और अनेक प्रकार के सुन्दर चरित्र करते हैं।

तब तब कथा मुनिसन्ह गाई। परम पुनीत प्रबंध बनाई।। बिबिध प्रसंग अनूप बखाने। करहिं न सुनि आचरज सयाने।।___अर्थ___ तब_तब पवित्र काव्य रचकर उन मुनिश्वरों ने कथाओं का वर्णन किया है। उनमें भाँति_भाँति के अनुपम प्रसंग वर्णन किए हैं। जिन्हें सुनकर चतुर लोग आश्चर्य नहीं करते हैं।

Tuesday, 5 September 2017

बालकाण्ड

सुनु सुभ कथा भवानि, रामचरितमानस बिमल। कहा भुसुण्डि बखानि, सुनी बिहग नायक गरुड़।। सो सम्बाद उदार, जेहि बिधि भा आगें कहब। सुनहु राम अवतार, चरित परम सुन्दर अनघ।। हरिगुन नाम अपार, कथा रूप अगनित अमित। मैं निज मति अनुसार, कहउँ उमा सादर सुनहु।।___अर्थ___हे भवानी ! रामचरितमानस नामक निर्मल और शुभकारी कथा सुनो जिसको कागभुशुण्डिजी ने वर्णन किया और पक्षीराज गरुड़जी ने सुना। वह उत्तम संवाद जिस प्रकार से हुआ सो आगे कहूँगा, अभी तुम रामचन्द्रजी के अवतार का बहुत सुन्दर और पापनाशक चरित्र सुनो। हे पार्वती !  हरि के गुण, नाम, कथाएँ और रूप अपार, असंख्य और असीम हैं। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार कहता हूँ, आदर के साथ सुनो।

सुनु गिरिजा हरि चरित सुहाये। बिपुल बिसद निगमागम गाये।। हरि अवतार हेतु जेहि होई। इदमित्थं कही जाइ न सोई।।___अर्थ___हे पार्वती ! सुनो, वेद शास्त्रों ने हरि के सुन्दर और शुद्ध चरित्र वर्णन किये हैं। हरि का अवतार जिस कारण से होता है वह कारण ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता कि यह इसी प्रकार से है।

राम अतर्क्य बुद्धि मन वानी। मत हमार अस सुनहि सयानी।। तदपि संत मुनि वेद पुराना। जस कछु कहहिं स्वमति अनुमाना।।___अर्थ___हे भवानी हमारा मत तो यह है कि बुद्धि, मन और वाणी से श्रीरामचन्द्रजी का तर्कना नहीं की जा सकती। तथापि संत, मुनि और पुराण् जैसा कुछ अपनी बुद्धि के अनुसार कहते हैं।

तस मैं सुमुखि सुनावउँ तोही। समुझि परइ जस कारन मोही।। जब जब होय धरम कै हानी। बाढहिं असुर अधम अभिमानी।।___अर्थ___हे सुमुखी ! और जैसा मुझे समझ पड़ा है वैसा मैं तुम्हें सुनाता हूँ। जब जब धर्म की अवनति होती है और नीच अभिमानी असुर बढ़ जाते हैं।

करहिं अनीति जाय नहीं बरनी। सीदहिं बिप्र धेनु सुर धरनी।। तब तब धरि प्रभु बिबिध सरीरा। हरिहिं कृपानिधि सज्जन पीरा।।___अर्थ___और वे ऐसी अनीति करते हैं जो नहीं कही जा सकती। ब्राह्मण, गौ, देवता, पृथ्वी, ये सब दुःखी हो जाते हैं, तब वे कृपानिधान प्रभु अनेक प्रकार के शरीर धारण कर भक्तों के क्लेशों को दूर करते हैं।

असुर मारि थापहिं सुरन्ह राखहिं निज श्रुति सेतु। जग बिस्तारहिं बिसद जस, राम जन्म कर हेतु।।___अर्थ___वे असुरों को मारकर देवताओं को राज्य देते हैं और अपनी बाँधी हुई वेद मर्यादा की रक्षा करते हैं। तथा संसार में अपने निर्मल यश का विस्तार करते हैं। रामजी केवम जन्म लेने की यही कारण है।

सोइ जस गाइ भगति भव तरहीं। कृपासिन्धु जन हित तनु धरहीं।। राम जनम के हेतु अनेका। परम बिचित्र एक तें एका।।___अर्थ___वही यश गाकर भक्तजन संसार से तर जाते हैं। कृपासिंधु प्रभु भक्तों के लिये शरीर धारण करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के जन्म के अनेक कारण हैं जो एक से एक अधिक आश्चर्यवाले हैं।

जनम एक दुइ कहउँ बखानी। सावधान सुनु सुमति भवानी।। द्वारपाल हरि के प्रिय दोऊ। जय अरु विजय जान सब कोऊ।।___अर्थ___रामचन्द्रजी के एक दो जन्मों का वर्णन करता हूँ, हे बुद्धिवाली भवानी ! सावधान होकर सुनो। हरि भगवान् के दो प्यारे द्वारपाल जय और विजय हैं जिनको सब कोई जानता है।

विप्र श्राप तें दूनउ भाई। तामस असुर देह तिन्ह पाई।। कनकसिपु अरु हाटकलोचन। जगत विदित सुरपति मद मोचन।।___अर्थ___ब्राह्मणों के श्राप से दोनों भाइयों ने तामसी असुर शरीर पाया। हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्क्ष ये देने राक्षस जगत् में स्वराज इन्द्र के गर्व को चूर करनेवाले प्रसिद्ध हुए।

बिजई समर बीर बिख्याता। धरि बराह बपु एक निपाता।। होइ नरहरि दूसर पुनि मारा। जन प्रहलाद सुजस बिस्तारा।।___अर्थ___युद्ध में विजय पानेवाले दोनों प्रसिद्ध वीर थे। उनमें एक ( हिरण्याक्क्ष ) को बराह रूप धारण करके विष्णु ने मारा। फिर नृसिंह अवतार लेकर ( हिरण्यकशिपु ) को मारा और अपने भक्त का सुन्दर यश संसार में फैलाया।

भए निसाचर जाइ तेइ, महाबीर बलवान। कुम्भकरन रावन सुभट, सुर बिजई जग जान।।___अर्थ___फिर वे दोनों वीर बलवान् राक्षस जाकर कुम्भकर्ण और रावण नाम के महायोद्धा देवताओं को जीतनेवाले निसाचर हुए, जिन्हें संसार जानता है।

मुकुत न भए हते भगवाना। तीनि जनम द्विज बचन प्रवाना। एक बार तिन्ह के हित लागी। धरेउ सरीर भगत अनुरागी।।___अर्थ___दोनों राक्षस यद्यपि भगवान् के हाथ से मारे गये तथापि उनकी मुक्ति नहीं हुई। तीनों जन्मों तक राक्षस होने का उनको शाप था। एक बार उनके हित के लिये भक्तों पर स्नेह करनेवाले प्रभु ने जन्म लिया।

कस्यप अदिति तहाँ पितु माता। दसरथ कौसल्या बिख्याता।। एक कलप एहि बिधि अवतारा। चरित पवित्र किये संसारा।।___अर्थ____इस अवतार में कश्यप और अदिति माता_पिता दशरथ और कौसल्या के नाम से प्रसिद्ध हुए। एक कल्प में इस प्रकार अवतार लेकर संसार के बहुत से पवित्र चरित्र किये।

एक कलप सुर देखि दुखारे। समर जलम्धर सन सब हारे। सम्भु कीन्ह संग्राम अपारा। दनुज महाबल मरइ न मारा।।___अर्थ___एक कल्प में सब देवता जलंधर दैत्य से युद्ध में हार गये और उन्हें दुखी देखकर महादेवजी ने उससे बहुत युद्ध किया परन्तु वह दैत्य महाबली था, शिवजी के मारे नहीं मरा।

परम सती असुराधिप नारी। तेहिं बल ताहि न जितहिं पुरारी।।___अर्थ___दैत्यराज जलंधर की स्त्री बड़ी पतिव्रता थी, उसके पतिव्रत धर्म के बल से उसको शिवजी नहीं जीत सके।

छल करि टारेउ तासु ब्रत, प्रभु सुर कारज कीन्ह। जब तेहिं जानेउ मरम तब, श्राप कोप करि दीन्ह।।___अर्थ___प्रभु ने छल से उसका व्रत भंगकर देवताओं का कार्य पूरा किया। जब उस स्त्री ने यह भेद जाना तब कोप करके हरि को श्राप दिया।

तासु श्राप हरि कीन्ह प्रमाना। कौतुकनिधि कृपाल भगवाना। तहाँ जलम्धर रावन भयऊ। रन हति राम परम पद दयऊ।।___अर्थ___उसका श्राप लीलानिधि कृपालु भगवान् ने अंगीकार किया। वही जलम्धर रावण हुआ। उसे रामजी ने युद्ध में मारकर परम पद दिया।

एक जनम कर कारन एहा। जेहि लगा राम धरा नर देहा।। प्रति अवतार कथा प्रभु केरी। सुनु मुनि बरनी कबिन्ह घनेरी।।____अर्थ___एक जन्म का कारण यह है जिससे श्रीरामचन्द्रजी ने मनुष्य शरीर लिया। प्रभु के हर एक अवतार की कथा मुनियों ने सुन कवियों ने विस्तार से कही है।

नारद श्राप दीन्ह एक बारा। कलप एक तेहि लगि अवतारा। गिरिजा चकित भईं सुनि बानी। नारद विष्नु भगत पुनि ज्ञानी।।___अर्थ___ एक बार नारदजी ने श्राप दिया, एक कल्प में इसी कारण से अवतार हुआ। यह सुनकर आश्चर्यचकित हो पार्वतीजी बोलीं___नारदजी तो विष्णुभक्त और ज्ञानी मुनि हैं।

कारन कवन श्राप मुनि दीन्हा। का अपराध रमापति कीन्हा।। यह प्रसंग मोहि कहहु पुरारी। मुनि मन मोह अचरज भारी।।___अर्थ___मुनि ने किस कारण श्राप दिया ? लक्ष्मीपति भगवान् ने क्या अपराध किया था। हे त्रिपुरारी ! यह कथा मुझसे कहिये। नारद मुनि के मन में मोह उत्पन्न हो जाना यह बड़े आश्चर्य की बात है।

बोले बिहसि महेस तब ग्यानी मूढ़ न कोइ। जेहि जस रघुपति करहिं जब सो तस तेहि छन होइ।।___अर्थ___तब महादेवजी ने हँसकर कहा___न कोई ज्ञानी है म मूर्ख। श्रीरघुनाथजी जब जिनको जैसा करते हैं, वह उसी क्षण वैसा ही हो जाता है।

Friday, 4 August 2017

बालकाण्ड

राम सो परमातमा भवानी। तहँ भ्रम अति अबिहित तव बानी।। अस संसय आनत उर माहीं। ग्यान बिराग सकल गुन जाहीं।।___हे पार्वती ! वही परमात्मा श्रीरामचन्द्रजी हैं। उनमें भ्रम [ देखने में आता ] है, तुम्हारा ऐसा कहना अत्यन्त ही अनुचित है। इस प्रकार का संदेह मन में लाते ही मनुष्य के ज्ञान, वैराग्य और सारे सद्गुण नष्ट हो जाते हैं।

सुनि सिव के भ्रम भंजन बचना। मिटि गै सब कुतरक कै रचना।। भइ रघुपति पद प्रीति प्रतीती। दारुन असंभावना बीती।।___अर्थ___शिवजी के भ्रमनाशक वचनों को सुनकर पार्वतीजी के सब कुतर्कों की रचना मिट गयी। श्रीरघुनाथजी के चरणों में उनका प्रेम और विश्वास हो गया और कठिन असंभावना ( जिसका होना संभव नहीं, ऐसी मिथ्या कल्पना ) जाती रही।

पुनि पुनि प्रभु पद कमल गहि जोरि पंकरुह पानि। बोलीं गिरिजा बचन बर मनहुँ प्रेम रस सानि।।___अर्थ___बार_बार स्वामी ( शिवजी ) के चरणकमलों को पकड़कर और अपने कमल के समान हाथों को जोड़कर पार्वतीजी मानो प्रेमरस में सानकर सुन्दर वचन बोलीं।

ससि कर सम सुनि गिरा तुम्हारी। मिटा मोह सरदातप भारी।। तुम्ह कृपाल सबु संसउ हरेऊ। राम स्वरूप जानि मोहि परेऊ।।___अर्थ___आपकी चन्द्रमा की किरणों के समान शीतल वाणी सुनकर मेरा अज्ञानरूपी शरद_ऋतु ( क्वार ) की धूप का भारी ताप मिट गया। हे कृपालु ! आपने मेरा सब संदेह हर लिया, अब श्रीरामचन्द्रजी का यथार्थ स्वरूप मेरा समझ में आ गया।

नाथ कृपाँ अब गयउ बिषादा। सुखी भयउँ प्रभु चरन प्रसादा। अब मोहि आपनि किंकरि जानी। जदपि सहज जड़ नारि अयानी।।___अर्थ___हे नाथ ! आपकी कृपा से अब मेरा विषाद जाता रहा और आपके चरणों के अनुग्रह से मैं सुखी हो गयी। यद्यपि मैं स्त्री होने के कारण स्वभाव से ही मूर्ख और ज्ञानहीन हूँ, तो भी आप मुझे अपनी दासी जानकर___

प्रथम जो मैं पूछा सोइ कहहू। जौं मो पर प्रसन्न प्रभु अहहू।। राम ब्रह्म चिनमय अबिनासी।। सर्ब रहित सब उर पुर बासी।।___अर्थ___हे प्रभो ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो जो बात मैंने पहले आपसे पूछी थी, वही कहिये। [ यह सत्य है कि ] श्रीरामचन्द्रजी ब्रह्म हैं, चिन्मय ( ग्यानस्वरूप ) हैं, अविनाशी हैं, सबसे रहित और सबके मन में निवास करनेवाले हैं।

नाथ धरेउ नरतनु केहि हेतू। मोहि समुझाइ कहहु बृषकेतू।। उमा बचन सुनि परम विनीता। रामकथा पर प्रीति पुनीता।।___अर्थ___फिर हे नाथ ! उन्होंने मनुष्य का शरीर किस कारण से धारण किया ? हे धर्म की ध्वजा धारण करनेवाले प्रभो ! यह मुझे समझाकर कहिये। पार्वती के अत्यन्त नम्र वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजी की कथा में उनका विशुद्ध प्रेम देखकर___

हियँ हरषे कामारि तब संकर सहज सुजान। बहुत बिधि उमहि प्रसंसि पुनि बोले कृपानिधान।।___अर्थ___तब कामदेव के शत्रु, स्वाभाविक ही सुजान, कृपानिधान शिवजी मन में बहुत ही हर्षित हुए और बहुत प्रकार से पार्वती की बड़ाई करके फिर बोले___

Thursday, 3 August 2017

बालकाण्ड

तदपि असंका कीन्हिहु सोई। कहत सुनत सब कर हित होई।। जिन्ह हरि कथा सुनी नहिं काना। श्रवनरन्ध्र अहि भवन समाना।।___अर्थ___तो भी वही शंका की है जिसके कहने_सुनने से सबका कल्याण होगा। जिन्होंने हरि_कथा अपने कानों से नहीं सुनी उसके कान साँप के बिल के समान हैं।

नयनन्हि संत दरस नहिं देखा। लोचन मोरपंख कर लेखा।। ते सिर कटु तुंबरि समतूला। जे न नमत हरि गुरु पद मूला।।___अर्थ___जिसने नेत्रों से संतों के दर्शन नहीं किये उनके नेत्र मोरपंखों में लिखे हुए नेत्रों के समान हैं। वे सिर कड़वी तूँबी के समान हैं जो हरि गुरु के चरणों में नहीं झुकते।

जिन्ह हरिभगति हृदयँ नहीं आनी। जीवत मृत समान तेइ प्रानी।। जो नहिं करहिं राम गुन गाना। जीह सो दादुर जीह समाना।।___अर्थ___जिन्होंने अपने हृदय में हरिभक्ति धारण नहीं की, वे प्राणी जीते हुए मुर्दों के समान हैं। जो लोग रामगुण गान नहीं करते, उनकी जीभ मेढक के जीभ के समान है।

कुलिस कठोर निठुर सोइ छाती। सुनि हरि चरित न जो हरषाती। गिरिजा सुनहु राम कै लीला। सुर हित असुर बिमोहन सीला।।___अर्थ___वह छाती बज्र के समान कड़ी और निठुर है जो हरि_चरित्र को सुनकर प्रसन्न नहीं होती। हे पार्वती ! श्रीरामजी की लीला सुनो, जो देवताओं के हित करनेवाली और राक्षसों को मोहित करनेवाली है।

रामकथा सुरधेनु सम, सेवत सब सुख दानि। सतसमाज सुरलोक सब, को न सुने इस जानि।।___अर्थ___श्रीराम कथा कामधेनु के समान सेवा करने से सब सुखों को देनेवाली है, सत्पुरुषों की सभा देवलोक है, ऐसा जानकर इसे कौन न सुनेगा।

रामकथा सुन्दर करतारी। संसय बिहग उड़ावनिहारी।। रामकथा कलि बिटप कुठारी। सादर सुनु गिरिराजकुमारी।।___अर्थ___रामकथा हाथ की सुन्दर ताली है जो संदेहरूपी पक्षी को उड़ा देती है। रामजी की कथा कलियुग रूपी वृक्ष के काटने की कुल्हाड़ी है, हे पार्वती ! आदर के साथ इसे सुनो।

रामनाम गुनि चरित सुहाए। जनमकरम अगनित श्रुति गाए।। जथा अनन्त राम भगवाना। तथा कथा कीरति गुन नाना।।___अर्थ___वेदों ने श्रीरामजी के नाम, गुण, सुन्दर चरित्र, जन्म, कर्म सभी असंख्य कहे हैं। जैसे भगवान् राम अनन्त हैं, वैसे ही उनकी कथा, कीर्ति और अनेक गुणों का भी अन्त नहीं है।

जदपि जथा श्रुति जसि मति मोरी। कहिहउँ देखि प्रीति अति तोरी।। उमा प्रस्न तव सहज सुहाई। सुखद संतसम्मत मोहि भाई।।___अर्थ___जो भी जैसे मैंने सुनी और जैसी मेरी बुद्धि है उसके अनुसार तुम्हारी बहुत प्रीति देखकर कहूँगा। हे पार्वती ! तुम्हारे प्रश्न स्वाभाविक, सुहावने, सुखदायक और साधुसंमत हैं। मुझे भी अच्छे लगे हैं।

एक बात नहीं मोहि सोहानी। जदपि मोह बस कहेहु भवानी।। तुम्ह जो कहा राम कोउ आना। जेहि श्रुति गाव धरहिं मुनि ध्याना।।___अर्थ___हे पार्वती ! एक बात मुझे अच्छी नहीं लगी यद्यपि तुमने अग्यानवश होकर कही है। तुमने जो यह कहा है कि वे राम कोई और हैं जिन्हें वेद गाते  और मुनि जिनका ध्यान धरते हैं।

कहहिं सुनहिं अस अधम नर, ग्रसे जे मोह पिशाच। पाखण्डी हरि पद बिमुख, जानहिं झूठ न साच।।___अर्थ___ऐसी बात अधम मनुष्य ही कहते सुनते हैं, जो अग्यानरूपी पिशाच से ग्रस्त, पाखण्डी और हरि भगवान के चरणों से विमुख हैं और झूठ_सच कुछ नहीं जानते हैं।

अज्ञ अकोबिद अंध अभागी। काई विषय मुकुर मन लागी।। लंपट कपटी कुटिल बिसेषी। सपनेहुँ संतसभा नहीं देखी।।___अर्थ___जो अज्ञानी, मूर्ख, अंधे और अभागे हैं और जिनके मनरूपी दर्पण पर विषयरूपी काई लग रही है, जो लंपट, बली और कुटिल हैं और जिन्होंने सपने में भी कभी संत_समाज नहीं देखा।

कहहिं जे बेद असम्मत बानी। जिन्ह के सूझ लाभ नहिं हानी।। मुकुर मलिन अरु नयन बिहीना। रामरूप देखहिं किमि दीना।।___अर्थ___जिन्हें लाभ_हानि नहीं सूझती वे ही ऐसी वेद विरुद्ध बात कहते हैं। जिनका मनरूपी दर्पण मैला है और जिनके ज्ञानरूपी नेत्र नहीं, वे बेचारे श्रीरामचन्द्रजी के रूप को कैसे देखें।

जिन्ह के अगुन न सगुन बिबेका। जल्पहिं कल्पित बचन अनेका।। हरिमाया बस जगत भ्रमाहीं। उन्हहिं कहर कुछ अघटित नाहीं।।___अर्थ___जिनको निर्गुण और सगुण का ज्ञान नहीं है, जो अनेक प्रकार की मनमानी बातें बकते हैं, जो हरि की माया के वश में भ्रमते हैं उनको कुछ भी कह डालना असम्भव नहीं है।

बातुल भूत बिबस मतवारे। ये नहिं बोलहिं बचन बिचारे।। जिन्ह कृत महामोह मद पाना। तिन्ह कर कहा करिअ नहिं काना।।___अर्थ___जो बात_रोग से बकवाद करनेवाले, सन्निपाती, उन्मत्त और मतवाले हैं, वे संभालकर वचन नहीं बोलते। जिन्होंने भारी अज्ञानरूपी मदिरा को पी लिया है, उनके कहने पर ध्यान नहीं देना चाहिये।

अस निज हृदयँ बिचारि, तजु संशय भजु राम पद। सुनु गिरिराजकुमारि, भ्रम तम रबि कर बचन मम।।___अर्थ___ऐसा अपने मन में विचारकर संदेह को छोड़ दो और रामजी के चरणों को भजो। हे पार्वती ! संदेहरूपी अंधकार को दूर करने के लिए सूर्य की किरणों के समान मेरे वचनों को सुनो।

सगुनहि अगुनहि नहिं कछु भेदा। गावहिं मुनि पुरान बुध बेदा।। अगुन अरूप अलख अज जोई। भगत प्रेम बस सगुन सो सोई।।___अर्थ___सगुण_निर्गुण में कुछ भेद नहीं है। मुनि, पुराण, पण्डित और वेद ऐसा कहते हैं कि जो निर्गुण रूप रहित, अव्यक्त और अजन्मा है, वही भक्तों के प्रेमवश सगुण हो जाता है।

जो गुन रहित सगुन सोइ कैसें। जल हिम उपल बिलगनहिं जैसें।। जासु नाम भ्रम तिमिर पतंगा। तेहि किमि कहिअ बिमोह प्रसंगा।।___अर्थ___जो निर्गुण है वह सगुण कैसा होता है ? जैसे जल और ओले में कुछ अंतर नहीं है। जिसका नाम संदेहरूपी अंधकार को दूर करने के लिये सूर्य के समान है, उनको मोह होना कैसे कहा जा सकता है ?

राम सच्चिदानन्द दिनेसा। नहिं तँह मोह निशा लवलेसा। सहज प्रकाशरूप भगवाना। नहिं तहँ पुनि विग्यान बिहाना।।___अर्थ___रामचन्द्रजी सत्_चित्_आनन्द स्वरूप सूर्य हैं, वहाँ मोहरूपी रात्रि होती ही नहीं। भगवान् स्वभाव से ही प्रकाशरूप हैं, वहाँ सबेरा भी नहीं होता।

हरष बिषाद ग्यान अग्याना। जीव धर्म अह मिति अभिमाना।। राम ब्रह्म ब्यापक जग जाना। परमानन्द परेस पुराना।।___अर्थ___हर्ष, शोक, ज्ञान, अज्ञान, अहंकार, अभिमान ये सब जीव के धर्म हैं। श्रीरामजी तो साक्षात् ब्यापक, परमब्रह्म, परमानन्दस्वरूप, सबसे परे और महापुरुष हैं। इन्हें संसार जानता है।

पुरुष प्रसिद्ध प्रकाशनिधि, प्रगट परावर नाथ। रघुकुलमनि मम स्वामि सोइ, कहि सिव नायउ माथ।।___अर्थ___शास्त्रों में जो पुरुष नाम से प्रसिद्ध हैं, प्रकाश की खान हैं, प्रगट और सबके स्वामी हैं, वही रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी मेरे स्वामी हैं, यह कहकर शिवजी ने उनको मस्तक नवाया।

निज भ्रम नहिं समुझहिं अग्यानी। प्रभु पर मोह धरहिं जड़ प्राणी।। जथा गगन घन पटल निहारी। झाँपेहु भानु कहहिं कुबिचारी।।___अर्थ___अज्ञानी लोग  अपनी भूल तो नहीं समझते हैं, वे जड़ प्रभु पर उसका आरोप करते हैं। जैसे आकाश में सूर्य को बादल से ढका हुआ देखकर वे लोग कहते हैं कि सूर्य छिप गया।

चितव जो लोचन अंगुलि लाएँ। प्रगट जुगल ससि तेहि के भाएँ। उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।।___अर्थ___जो आँखों में अँगुली लगाकर देखता है, उसको तो दो चन्द्रमा प्रत्यक्ष दिखायी देते हैं। हे पार्वती ! रामजी के विषय में मोह की बात ऐसी है, जैसे आकाश में धुआँ, धूल और अंधेरे का दीखना।

बिषय करन सुर जीव समेता। सकल एक तें एक सचेता।। सब कर परम प्रकासक जोई। राम अनादि अवधपति सोई।।___अर्थ___ विषय, इन्द्रियाँ, इन्द्रियों के देवता और जीव, सब एक से एक चेतन हैं। इन सबके परम प्रकाश वही अनादि ब्रह्म अयोध्यापति श्रीरामचन्द्रजी हैं।

जगत प्रकास्य प्रकासक रामू। मायाधीस ग्यान गुन धामू।। जासु सत्यता तें जड़ माया। भास सत्य इव मोह सहाया।।___अर्थ___यह जगत् प्रकास्य है और श्रीरामचन्द्रजी इसके प्रकाशक हैं। वे माया के स्वामी और ज्ञान तथा गुणों को धाम हैं। जिनकी सत्ता से, मोह की सहायता पाकर जड़ माया भी सत्य_सी भासित होती है।

रजत सीप महुँ भास जिमि जथा भानु कर बारि। जदपि मृषा तिहुँ काल सोइ भ्रम न सकइ कोउ टारि।।___अर्थ___जैसे सीप में चाँदी की और सूर्य की किरणों में पानी की ( बिना हुए भी ) प्रतीति होती है। यद्यपि यह प्रतीति तीनों कालों में झूठ है, तथापि इस भ्रम को कोई हटा नहीं सकता।

एहि बिधि जग हरि आश्रित रहई। जदपि असत्य देत दुख अहई।। जौं सपने सिर काटै कोई। बिनु जागे न दूरि दुःख होई।।___अर्थ___इसी तरह यह संसार भगवान् के आश्रित रहता है। यद्यपि यह असत्य है, तो भी दुःख तो देता ही है; जिस तरह कोई स्वप्न में सिर काट ले तो बिना जागे वह दुःख दूर नहीं होता।

तासु कृपाँ अस भ्रम मिटि जाई। गिरिजा सोई कृपाल रघुराई। आदि अंत कोउ तासु न पावा। मति अनुमानि निगम अस गावा।।___अर्थ___हे पार्वती ! जिनकी कृपा से इस प्रकार का भ्रम मिट जाता है, वही कृपालु श्रीरघुनाथजी हैं। जिनका आदि और अन्त किसी ने नहीं ( जान ) पाया। वेदों ने अपनी बुद्धि से अनुमान करके इस प्रकार गाया है___

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना।। आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बर जोगी।।___वह ( ब्रह्म ) बिना पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह ( जिह्वा ) के सारे ( छहों ) रसों का आनन्द लेता है और बिना ही वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।

तन बिनु परस नयन बिनु देखा। ग्रहण घ्रान बिना बाय असेषा।। असि सब भाँति अलौकिक करनी महिमा जासु जाइ नहिं बरनी।।___अर्थ___वह बिना ही शरीर ( त्वचा ) के स्पर्श करता है, बिना ही आँखों के देखता है और बिना ही नाक के सब गंधों को ग्रहण करता है ( सूँघता ) है। उस ब्रह्म की करनी सभी प्रकार से ऐसी अलौकिक है कि जिसकी महिमा कही नहीं जा सकती।

जेहि इमि गावहिं बेद बुध जाहि धरहिं मुनि ध्यान। सोई दसरथ सुर भगत हित कोसलपति भगवान।।___अर्थ___जिसका वेद और पण्डित इस प्रकार वर्णन करते हैं और मुनि जिसका ध्यान करते हैं, वही दशरथनन्दन भक्तों के हितकारी, अयोध्या के स्वामी भगवान् श्रीरामचन्द्रजी हैं।

कासीं मरत जंतु अवलोकी। जासु नाम बल करउँ बिसोकी।। सोई प्रभु मोर चराचर स्वामी। परिहार सब उर्दू अंतरजामी।।___अर्थ___ ( हे पार्वती ! ) जिनके नाम के बल से काशी में मरते हुए प्राणी को देखकर मैं उसे [ राममंत्र देकर ] शोकरहित कर देता हूँ ( मुक्त कर देता हूँ ), वही मेरे प्रभु रघुश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी जड़_चेतन के स्वामी और सबके हृदय के भीतर की जाननेवाले हैं।

बिबसहुँ जासु नाम नर कहहीं। जनम अनेक रचित अघ दहहीं।। सादर सुमिरन जे नर करहीं। भव बारिधि गोपद इव तरहीं।।___अर्थ___विवश होकर ( बिना इच्छा के ) भी जिसका नाम लेने से मनुष्यों के अनेक जन्मों में किये हुए पाप जल जाते हैं। फिर जो मनुष्य आदरपूर्वक उनका स्मरण करते हैं, वे तो संसाररूपी [ दुस्तर ]  समुद्र को गाय के खुराना से बने हुए गड्ढे के समान ( अर्थात् बिना किसी परिश्रम के ) पार कर जाते हैं।