Wednesday, 30 January 2019

बालकाण्ड

आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जन्तु तहँ नाहीं।। पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कही बिसेषी।।___ अर्थ___मार्ग में एक आश्रम दीख पड़ा। वहाँ पशु_पक्षी कोई जीव_जन्तु नहीं थे। प्रभु ने एक शिला देखकर मुनि से पूछा। तब मुनि ने विस्तार सहित सब कथा कह सुनाई।

गौतम नारि श्राप बस, उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति, कृपा करहु रघुबीर।।___ अर्थ___ गौतम मुनि की स्त्री शापवश शिला हो गयी है। वह धीरज धरे आपके चरणों की धूलि चाहती है। हे रघुवीर ! आप कृपा कीजिये।

परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तप पुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही।। अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवत बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।।___ अर्थ____श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र और दुखहारी चरणों का स्पर्श होते ही वह तपोमूर्ति अहल्या सचमुच प्रकट हो गयी। अत्यन्त प्रेम से अधीर हो रोमांचित हो गयी। मुँह से बोली नहीं आया तब अत्यन्त  बड़भागिनी अहिल्या प्रभु के चरणों में पड़ गई। उसके दोनों नेत्रों से अश्रु बहने लगे।

धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपा भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ज्ञानगम्य जय रघुराई। मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।।___ अर्थ___धीरज धरकर उसने प्रभु को पहचाना तथा रघुनाथजी की कृपा से भक्ति पाई। तब बहुत ही निर्मल बाणी से स्तुति करने लगी__ हे ज्ञान से जानने योग्य श्रीरामजी ! आपकी जय हो ! मैं अपवित्र स्त्री हूँ और आप जगत् को पवित्र करने वाले रावण के शत्रु और अपने भक्तों को सुख देनेवाले हैं। हे कमल_नयन ! हे संसार के भय को दूर करनेवाले ! मैं आपकी शरण हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।

मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरिलोचन हरि भवनोचन इहइ लाभ संकर जाना।। विनती प्रभु मोरी मैं अति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।।___ अर्थ___मुनि ने जो श्राप दिया सो बहुत भला किया। मैंने उसे बड़ी कृपा समझी, क्योंकि संसार से छुड़ानेवाले श्रीहरि को नेत्र भरकर मैंने देखा। इसी को शिवजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभु ! मैं बुद्धि की भोली हूँ। हे नाथ ! मैं वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि आपके चरणों की रज के रस से मेरा मन भौंरे के समान प्रेम से पान किया करे।

जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भईं सिव सीस धरि। सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।। एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गइ पतिलोक अनंद भरी।।___ अर्थ___ जिन चरणों से परम पवित्र श्रीगंगाजी उत्पन्न हुईं जिन्हें शिवजी ने अपने सिर पर धारण किया है, जो चरण ब्रह्माजी पूजते हैं, हे कृपालु ! वे चरण आपने मेरे सिर पर रखे। इस भाँति स्तुति करके गौतम पत्नी अहल्या बार_बार प्रभु के चरणों पर गिरकर, मनोवांछित वरदान पाकर आनन्द से भरी परलोक को चली गई।

अस प्रभु दीनबन्धु हरि, कारन रहित दयाल। तुलसीदास सठ ताहि भजु, छाँडि कपट जंजाल।।___ अर्थ___दीनदयालु भगवान बिना कारण ही सब पर कृपा करते हैं, ऐसे प्रभु भगवान को, हे मूर्ख तुलसीदास ! कपट जंजाल को छोड़कर भज।

चले राम लछिमन मुनि संगा। गये जहाँ जगपावनि गंगा।।___ अर्थ____मुनि के साथ श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी चले। वे वहाँ गये जहाँ संसार को पवित्र करनेवाली श्रीगंगाजी थीं।

पुनि सुरसरि उत्पत्ति रघुराई। कौसिक सन पूछी सिर नाई। कह मुनि प्रभु तव कुल एक राजा। नाम सगर तिहुँ लोक बिराजा।।___अर्थ___फिर गंगाजी की उत्पत्ति का कथा श्रीरामजी ने विश्वामित्रजी से सिर नवाकर पूछी। मुनि ने कहा हे रामजी ! आपके ही कुल में एक राजा हुए हैं जिनका नाम ‘सागर’ जगत् में विख्यात है।

जेहि के युग भामिनि सुकुमारी। नाम केशिनी सुमति पिआरी। सब प्रकार संपति सुख भ्राजा। सुर बिहीन मन विस्मय राजा।।___ अर्थ___उनके सुकुमारी और अत्यन्त प्रिय रानियाँ केशिनी और सुमति नाम की थीं। राजा के सर्व सुख और सम्पत्ति थी परन्तु पुत्र न होने से राजा दुखी थे।

एक समय भामिनि दोउ साथा। गए वन तनय हेतु रघुनाथा। सघन सफल तरु सुन्दर नाना। तहँ भृगु मुनि तप तेज निधाना।।___अर्थ___ हे रघुनाथजी ! एक समय पुत्र के हेतु राजा दोनों रानियों के साथ वन को गए। जहाँ अनेक फलों से युक्त सघन वृक्ष थे वहाँ तेजनिधान भृगु मुनि का आश्रम था।

सहित नारि नृप मुदित मन, रहे वर्ष शत एक। कीन्हे तपबल देखि भृगु, अस्तुति कीन्ह अनेक।।___ अर्थ___रानियों के साथ राजा ने प्रसन्न मन से सौ वर्ष तक रहकर तप किया और भृगु मुनि के दर्शन होने पर अनेक स्तुति की।

कहि निज दुख प्रणाम नृप कीन्हा। दै असीस तब मुनि वर दीन्हा। नृप रानी सन मुनि अस भाषा। लेहु सो वर जो जेहि अभिलाषा।।___अर्थ___राजा ने अपना दुख कहकर प्रणाम किया। तब मुनि ने आशीर्वाद देकर वर दिया। रानियों ने मुनि से यह कहा___ तुममें से जिसकी इच्छा हो सो वर ले लो।

सुनि मुनि वचन सीस तिन नावा। देहु नाथ जो अति मन भावा।। एक ही कह्यो एक सुत होना। दूसर साठि सहस गुणलोना।।___ अर्थ___मुनि के वचन सुनकर उन्होंने सिर नवाया और कहा___ हे नाथ ! मन_भावना वर दीजिये। एक ( केशिनी ) ने एक पुत्र होने का वर और दूसरी ( सुमति ) ने साठ हजार पुत्रों का वर माँगा।

हर्षित भयो सुभग वर पाई। पाणि जोरि चरणन सिर नाई। सहित भामिनी अवधहिं आये। हर्ष सहित कछु दिवस गँवाये।।___अर्थ___राजा सुन्दर वर पाकर प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर मुनि के चरणों में सिर नवाया। वे स्त्रियों के साथ अयोध्या आये और प्रसन्नता से कुछ दिन बिताये।

जानि सुघरि सुन्दरि सुखदाई। नाम केशि असमंजस जाई।। सुमति प्रसव इक तुम्बरि सोइ। भये सुत प्रकट कहे मुनि जोई।।___ अर्थ___सुन्दर सुखदायनी घड़ी में केशिनी ने असमंजस नाम का पुत्र प्रसव किया और सुमति से एक तूँबी हुई जिसमें मुनि के कथनानुसार साठ हजार पुत्र थे।

निरखे सुत हर्षित सब होई। मंगलाचार किये सब कोई।। हर्ष सहित दिये दान नरेसू। पूजि विप्र गुर गौरि गणेशू।।__अर्थ___पुत्रों को देखकर सब बड़े प्रसन्न हुए और सबने मंगलाचार किये। राजा ने ब्राह्मण, गुरु, पार्वतीजी और गणेशजी की पूजा करके हर्षसहित दान दिये।
घृतघट सुन्दर बिबिध मँगाये। ते सब सुत नृप तिन महँ नाये।।___अर्थ___ राजा ने घृत के अनेक घड़े मँगाये और सब पुत्रों को उनमें रखा।

एहि बिधि भयउ सकल सुत, पूजे सब मन काम। जाइ दिवस निसि हर्ष वश, सुनहु राम घनश्याम।।___ अर्थ___हे घनश्याम रामजी ! सुनिये, इस प्रकार सब पुत्र और मन की सब अभिलाषा पूरी हुई। रात दिन आनन्दपूर्वक बीतने लगे।

पुरजन सब घर घरनि नरेसू। अति आनन्द रवि तजा कलेसू।। बालकेलि कर भये कुमारा। लीला करत अगम संसारा।।___ अर्थ___सब पुरवासी घर_घर में और राजा अति आनन्दित हुए, शरीर का क्लेश मिट गया। बाललीला करते जब वे कुमार हुए तो संसार में अनेक खेल करने लगे।

होइँ सो काज सकल मन चीते। यहि सुख बसत बहुत दिन बीते।। सरयू नदी अवध जो अहई। विमल सलिल उत्तरतट बहई।।___अर्थ__उस शुभकार्य से सबके मन की अभिलाषा पूरी हुई और आनन्द से रहते हुए बहुत दिन बीत गये। निर्मल जल वाली सरयू नदी जो अयोध्या में है, उत्तर की ओर बहती है।

प्रजा लोक के बालक नाना। नित उठि तहाँ करें अस्नाना।। असमंजस तहँ तरणी आना। तिनहि चढ़ाई बोरि निज पानी।।___ प्रजा के अनेक बालक नित्य उठकर वहाँ स्नान करते हैं, असमंजस वहाँ नाव लाया और उन्हें चढ़ाकर उसने अपने हाथ से नाव डुबा दी।

भये प्रजा सब परम दुखारी। बालक वध सुनि सुनहु खरारी।। सकल गये जहँ बैठ नृपाला। बोले बचन नाइ पद भाला।।___अर्थ___हे श्रीरामचन्द्रजी ! सुनिये, बालकों का वध सुनकर प्रजाजन बड़े दुःखी हुए और वहाँ गये जहाँ राजा बैठे थे और चरणों में सिर नवाकर बोले___

तुम नृप चहहु प्रजा प्रतिपाला। सुत तुम्हार भा सबकर काला।। तजब देश सब सुनहु नरेशू। बिना तजे नहिं मिटै कलेशू ।।___अर्थ___हे राजन् ! आप तो प्रजा का पालन चाहते हैं परन्तु पुत्र का काल हो गया है। हे राजन् ! सुनिये, हम देश त्याग देंगे क्योंकि बिना त्यागे क्लेश नहीं मिटेंगे।

सब सुत कीन्हे पाप बहु, मारे बालकवृन्द। तुम कहँ प्राण समान यह, सकल प्रजन कहँ मन्द।।___अर्थ___आपके पुत्र ने बहुत पाप किये हैं, सारे बालक मार डाले। आपको तो यह प्राणप्रिय है परन्तु सारी प्रजा के लिये बड़ा दुष्ट है।

प्रजा गिरा सुनि धीरज दीन्हा। सुतहि देश ते बाहर कीन्हा।। तासु तनय जग विदित प्रभाऊ। गुणनिधि अंशुमान तेहि नाऊ।।___अर्थ___राजा ने प्रजा के वचन सुनकर उसको धीरज दिया और असमंजस को देश से निकाल दिया। असमंजस के एक पुत्र, जिसका प्रभाव जगत् में प्रगट था, अंशुमान था।

बसत हृदय नृप से सो कैसे। अति प्रिय मीन सलिल रह जैसे।। गये प्रजा सब निज निज धामा। भै बिलोकि मन गुन विश्रामा।।___अर्थ___हे मुनि भरद्वाज ! वह राजा के हृदय में ऐसे वास करता था जैसे मछली के मन में जल। सब प्रजाजन अपने_अपने घर गये और राजा के गुण देखकर मन में विश्वास हुआ।

बहुरि  नृपति मन कीन्ह बिचारा। आइ गयो पन चौथ हमारा।। हित मन्त्री गुरु सुतहु बुलाये। हिमगिरि बिंध्य मध्य तब आये।।___ अर्थ___फिर राजा ने मन में विचार किया कि हमारा बुढ़ापा आ गया। उसने अपने हितैषी मंत्री, गुरु और पुत्र बुलाए। तब हिमालय और विन्ध्याचल के मध्यस्थान में सब आये।

रुचिर वेदिका एक बनाई। देखत बनै बरनि नहिं जाई।। मख अरम्भ छाँड़े तब तुरगा। वेगवन्त जिमि देखिय उरगा।।___अर्थ___ एक सुन्दर वेदी बनाई जो देखते ही बने और वर्णन नहीं की जाती। यज्ञ आरम्भ करके एक घोड़ा छोड़ा जो सूर्य के समान वेगवान दिखाई देता था।

सुरपति सुन भय दारुणहि, मन महँ करि अनुमान। आइ तुरग सब लीन्हेउ, मरम न काहू जान।।___ अर्थ___तब इन्द्र ने सुनते ही अत्यन्त भय मानकर मन में विचार कर घोड़ा आकर ले लिया और इस भेद को किसी ने नहीं जाना।

राखेउ आनि कपिल मुनि पाहीं। कोउ न जान काहुहिं गम नाहीं।। जुगवत रहे जे सुभट सयाने। लै तुरंग रहे किनहुँ न जाने।।___ अर्थ___वह घोड़ा कपिल मुनि के पास आकर रख दिया। वह किसी ने नहीं जाना, न किसी ने ले जाते देखा। जो वीर योद्धा रखवाली पर थे उन्होंने भी न जाना कि कौन ले गया।

तिन सब आय कही नृप पाहीं। महाराज हम कहत डराहीं।। लीन्ह तुरग कोइ जान न कोई। कहा करिय जो आयसु होई।।___ अर्थ___उन सबने आकर राजा से कहा___महाराज ! हम कहते हुए डरते हैं। घोड़ा कौन ले गया यह कोई नहीं जानता। आपकी जो आज्ञा हो सो करें।

सुनत वचन नृप विस्मय पाये। सकल सुभट कहँ तुरत बुलाये।। जाहु तुरग तुम हेरहु जाई। सकल चले चरणन सिर नाई।।___ अर्थ___ सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और सब पुत्रों को तुरन्त बुलाया और कहा___जाओ, तुम घोड़े को ढूँढो। सब चरणों में सिर नवाकर चले।

सुरपति सम देखिय सब वीरा। सकल धनुर्धर अति रणधीरा।। तिनहि चलत धरनि अगुवाई। बलि पशुजीव भये सब आई।।___अर्थ____वे सब इन्द्र के समान बड़े धनुर्धर और रण में धैर्यवान् दिखाई देते थे। उनके चलने से पृथ्वी व्याकुल हो गई और अनेक जीव बलि पशु बने।

सुमन बाटिका उपवन बागा। सरित रूप बापिका तरागा।। नगर गाँव मुनीस थल नाना। गिरिकन्दर कानन अस्थाना।।___अर्थ___फूल_बाटिका, उपवन, बाग, नदी, कुएँ, तालाब, नगर, गाँव, मुनियों के आश्रम, पहाड़ों की कन्दराएँ, वन और अनेक स्थान।

यहि बिधि खोजहु तुरंग तिन, आये भूपति पाहिं। चरणन माथहि नाइ कहि, खोज अश्विनी की नाहिं।।___ अर्थ___इस प्रकार उन्होंने घोड़ा ढूँढा और राजा के पास आए और चरणों में सिर नवाकर कहा___ हे महाराज ! घोड़े का कहीं पता नहीं है।

खोदहु महि सुत बहुरि पठाये। चले सकल पूरब दिसि आये।। तिनके कर जिमि कुलिस समाना। योजन भरि खोदहिं बलबाना।___ अर्थ____राजा ने कहा कि पृथ्वी को खोदो। तब वे चलकर पूर्व दिशा में आये। उनके हाथ वज्र के समान थे। वे बलवान एक योजन भर पृथ्वी खोदते थे।

देखि अतुल बल देव डराने। मरिहैं कहि बिरंचि सनमाने।। सोधत महि पताल सब आये। दिग्गज देखि एक सिर नाये।।___अर्थ___उनका अतुल_बल देखकर देवता डर गये। तब ब्रह्माजी ने समझाया कि यह सगर के पुत्र नष्ट होंगे। वे पृथ्वी में खोजते हुए पताल में आये और एक दिग्गज को देखकर सिर नवाया।


तिन पूछा सब कथा सुनायो। बहुरि सकल दक्षिण दिसि आयो।। इहि बिधि पुनि दूसर गज देखा। अति उतंग गज विमल विशेषा।।___ अर्थ___उसके पूछने पर सब कथा तह सुनाई और फिर दक्षिण दिशा में आये। इसी प्रकार फिर दूसरा हाथी देखा जो बहुत ऊँचा और अधिक उज्ज्वल था।


ताहू बहु प्रणाम तिन कीन्हे। चले सुनत पश्चिम चित दीन्हे।। तीसरे देखि प्रदक्षिण कीन्ही। पुनि उत्तर दिसि शोधहिं लीन्ही।।___ अर्थ____उसको भी प्रणाम किया और पश्चिम की ओर मन लगाकर चले। तीसरा हाथी देखकर उसकी परिक्रमा की और उत्तर दिशा में ढूंढने लगे।


दिग्गज श्वेत निरखि सुख पाये। सकल कपिल मुनि पहँ पुनि आये।। खोजत मही पार नहिं पावा। शोभा चहुँ दिसि जलधि सुहावा।।___अर्थ___वहाँ श्वेत दिग्गज को देखकर सुख पाया और सब कपिल मुनि के पास आये। पृथ्वी ढूँढने में पार नहीं पाया, चारों ओर सुन्दर सागर सुशोभित था।


देखिनि आइ तुरंग तब, बाँधा मुनिवर पास। बोले वचन सकोप करि, भा चह सब कर नास।।___अर्थ___तब उन्होंने आकर अपना घोड़ा देखा कि मुनि के पास बँधा है। तब वे सब क्रोध करके बोले___ क्योंकि सबका नाश होना चाहता था।


खोदी महि हम चारिउ क्रोधा। रेरे दुष्ट बहुत तोहिं सोधा।। कोई कह चोर देखि बहु होइ। यह सम छली और नहिं कोइ।।___अर्थ___हमने पृथ्वी चारों कोनों में खोद ढूँढी, अरे दुष्ट ! तुमको बहुत खोजते रहे। कोई बोला___ चोर तो बहुत देखे परन्तु इसके समान छली कोई नहीं है।


परधन लै पाताल पुनि आयो। तस्कर मुनिवर वेष बनायो। कोउ कह यह मुनिवर नाहीं। समुझि देखि लच्छन मन माहीं।।___अर्थ____पराया धन लेकर पाताल में आ बैठा है, इस चोर ने श्रेष्ठ मुनि का वेष बनाया है। किसी ने कहा यह मुनि नहीं है, इसके लक्षण देखकर मन में ही समझ लो।


कोउ कह बक तप कीन्ह अपारा। अहो दुष्ट लै तुरग हमारा।। सुनत बचन मुनि चितवा जबहिं। भए भस्म सब क्षण में तबहीं।।___अर्थ___किसी ने कहा___अरे दुष्ट ! हमारा घोड़ा लेकर तूने बगुले के समान बहुत तप कर लिया। यह वचन सुनकर मुनि ने ज्योंही उन्हें देखा कि वे सब एक क्षण में ही जलकर भष्म हो गये।


उमा वचन जेहि समुझि न बोला। सुधा होइ विष तिक्तम ओला।। पावक जानि धरहिं कर प्राणी। जरहिं काहि नहिं अति अभिमानी।।___अर्थ____हे उमा ! जो समझकर वचन नहीं बोलते उनको अमृत, विष और ऐसा कड़ुआ हो जाता है। जो प्राणी जानकर अग्नि को हाथ में धरेंगे, वे अतिशय अभिमानी क्यों न जलेंगे।


जानि गरल जे संग्रह करहीं। सुनहु राम ते काहे न मरहीं।। क्रोध करै बिन किये बिचारा। भये सकल तेहि रे जरि छारा।।___अर्थ___हे रामजी ! सुनिये, जो जानबूझकर विष भक्षण करें वे क्यों न मरेंगे ? उन्होंने बिना विचारे क्रोध किया था इसी से जलकर क्षार हो गये।


इहाँ नृपति अंशुमान बोलाये। नहिं आये सब तिनहिं पठाये।।___अर्थ____यहाँ राजा ने अंशुमान को बुलाकर कहा___वे सब पुत्र तो नहीं आये, तुम जाकर ढूँढो।


दीन्हा नृपति असीस तब, अति हित बारहिं बार। बेगि फिरहु लै तुरग सुत, मेरे प्राण आधार।।___अर्थ___तब राजा ने बड़े स्नेह से बार_बार आशीष दी और कहा___ हे मेरे प्राणाधार पुत्र ! तुम घोड़ा लेकर शीघ्र लौट आना।



चले नाइ पद शीश कुमारा। बिष्णु भक्त हित कुल उजियारा।। जहँ जहँ देखि मुनिन के धामा। पूँछि खबरि करि दण्ड प्रणामा।।___अर्थ____राजकुमार अंशुमान् चरणों में सिर नवाकर चले। वे विष्णु_भक्त और कुल के दीपक थे। जहाँ_जहाँ मुनियों के आश्रम देखे वहाँ_वहाँ दण्डवत् प्रणाम करके समाचार पूछे।


पुनि पुनि जन सन पाइ अशीशा। चहुँ दिग्गज कहँ नायउ सीसा।। यहि विधि सोधत मग महँ जाता। मिले गरुड़ सुमतीकर भ्राता।।___अर्थ___फिर मुनियों से आशीष पाकर चारों दिग्गजों को सिर नवाया। इस प्रकार मार्ग में ढूंढते चले। तब सुमति के भ्राता गरुड़जी ( उनका मामा ) मिले।


चरन परत तब आशिष दयऊ। जरे सकल जेहि विधि सोकयऊ।। सुनतहि वचन सोच भयो भारी। लिये खगेस दिखायल वारी।।___अर्थ___चरण स्पर्श करते ही उन्होंने आशीष दी और जिस प्रकार सब जले थे सो हाल सुनाया। सुनते अंशुमान को बड़ा सोच हुआ। तब गरुड़जी ने जलाशय दिखा लिया।


अंशुमान तहँ मज्जन कीन्हा। क्रम क्रम सबहिं जलांजली दीन्हा। बहुरि गरुड़ बोले सुनु ताता। मैं तोहि कहौं करिय इक बाता।।___अर्थ___अंशुमान ने वहाँ स्नान किया और क्रमानुसार सबको जलांजली दी। फिर गरुड़जी बोले___ हे तात ! सुनो, तुमसे एक बात कहता हूँ वही करो।


करु सुत सोइ उपाय, गंगा आवहिं अवहि महँ। दर्शन ते अघ जाय, मज्जन कीन्ह परम सुख।।___अर्थ____हे पुत्र वही उपाय करो जिससे गंगाजी पृथ्वी पर आ जायँ जिनके दर्शन से ही पाप छूट जाते हैं और स्नान करने से ही परम सुख प्राप्त हो जाता है।


पुष्टि सहस तरिहैं एहि विधि। गंगा पाय परम पावन निधि।। सुनि अस वचन हृदय मन भाये। सहित गरुड़ मुनिवर पहुँ आये।।___अर्थ___इस प्रकार पवित्र गंगाजी को प्राप्त होकर से साठों हजार तर जायेंगे। यह वचन सुनकर मन को भले लगे, तब अंशुमान गरुड़जी सहित कपिलदेव के निकट आये।



तब खगेश मुनि चरणन नायउ। पूरब कथा सकल मुनि गायउ।। आयसु देइ तुरग मुनि दीन्हा। हरषि हृदयँ निज अश्वहिं चीन्हा।।___अर्थ___तब गरुड़जी मुनि के चरणों में पड़े और पहले की सब कथा मुनि ने कही। आज्ञा देकर मुनि ने घोड़ा दे दिया। तब अंशुमान अपना घोड़ा पाकर मन में प्रसन्न हुए।


नगर समीप गरुड़ पहुँचाई। गये भवन निज तब रघुराई।। इहाँ तुरग लै नृप सिर नाई। षष्टि सहस मुनि कथा सुनाई।।___अर्थ___हे रामजी ! अंशुमान को नगर के समीप पहुँचाकर गरुड़जी अपने घर को चले गये। उन्होंने घोड़ा लेकर राजा के सामने सिर नवाया और फिर साठ हजार वीरों की तथा मुनियों का कथा सुनाई।।


विस्मय हर्ष विवश नृप भयऊ। कीन्हा यज्ञ दान बहु दयऊ।। बहुबिधि नृपति राज पुनि कीन्हा। प्रजालोग कहँ अति सुख दीन्हा।।___अर्थ___ तब राजा सगर हर्ष और दुःख के वश हुए और यज्ञ करके बहुत सा दान दिया। फिर राजा ने अनेक विधि से राज्य किया और प्रजा को अत्यन्त सुख दिया।



अंशुमान कहँ राज दै, निज मन हरि पद लाग। गयउ सगर तप काज वन, हृदय अधिक अनुराग।।___अर्थ___फिर राजा सगर अंशुमान को राज्य देकर भगवान के चरणों में मन लगाकर तप करने हेतु वन में चले गये। उनके हृदय में बड़ा प्रेम था।

Saturday, 22 December 2018

बालकाण्ड

यह सब चरित कहा मैं गाई। आगिलि कथा सुनहु मन लाई।। बिस्वामित्र महामुनि ग्यानी। बसहिं बिपिन शुभ आश्रम जानी।।____ अर्थ___ यह सब चरित्र मैंने गाकर ( बखानकर ) कहा। अब आगे की कथा मन लगाकर सुनो। ज्ञानी महामुनि विश्वामित्रजी वन में शुभ आश्रम ( पवित्र स्थान ) जानकर बसते थे।

जहँ जप जग्य जोग मुनि करहीं। अति मारीच सुबाहुहिं डरहीं।। देखत जग्य निसाचर धावहिं। करहिं उपद्रव मुनि दुख पावहिं।।___ अर्थ____ जहाँ वे मुनि जप, यज्ञ और योग करते थे। यज्ञ देखते ही राक्षस दौड़ पड़ते थे और उपद्रव मचाते थे, जिससे मुनि [ बहुत ] दुःख पाते थे।

गाधितनय मन चिंता ब्यापी। हरि बिनु मरहिं न निसिचर पापी।। तब मुनिबर मन कीन्ह बिचारा। प्रभु अवतरेउ हरन महि भारा।।___ अर्थ____गाधि के पुत्र विश्वामित्रजी के मन में चिंता छा गयी कि ये पापी राक्षस भगवान् के [ मारे ] बिना न मरेंगे। तब श्रेष्ठ मुनि ने मन में विचार किया कि प्रभु ने पृथ्वी का भार हरने के लिये अवतार लिया है।

एहूँ मिस देखौं पद जाई। करि बिनती आनौं दोउ भाई।। ग्यान बिराग सकल दिन अयना। सो प्रभु मैं देखब भरि नयना।।____ अर्थ____इसी बहाने जाकर मैं उनके चरणों का दर्शन करूँ और विनती करके दोनों भाइयों को ले,आऊँ। [ अहा ! ] जो ज्ञान, वैराग्य और सब गुणों के धाम हैं, उन प्रभु को मैं नेत्र भरकर देखूँगा।

बहुबिधि करत मनोरथ जात लाग नहिं बार। करि मज्जन सरऊ जल गए भूप दरबार।।____ अर्थ_____ बहुत प्रकार से मनोरथ करते हुए जाने में देर नहीं लगी। सरयूजी के जल में स्नान करके वे राजा के दरवाजे पर पहुँचे।

मुनि आगवन सुना जब राजा। मिलन गयउ लै बिप्र समाजा।। करि दण्डवत् मुनिहि सनमानी। निज आसन बैठारेन्हि आनी।।___ अर्थ___ जब राजा ने मुनि का आना सुना, तब वे ब्राह्मणमण्डली को संग लेकर मिलने गए। मुनि को दण्डवत् करके आदरपूर्वक उन्हें लाकर आसन पर बैठाया।

चरन पखारि कीन्हि अति पूजा। मो सम आजु धन्य नहि दूजा।। बिबिध भाँति भोजन करवावा। मुनिवर हृदयँ हरष अति पावा।।___ अर्थ____चरण धोकर भली_भाँति पूजा की और कहा___ आज मेरे समान धन्य दूसरा नहीं है। फिर अनेक प्रकार के भोजन करवाये। मुनिश्रेष्ठ ने मन में अत्यन्त आनन्द पाया।

पुनि चरननि मेले सुत चारी। राम देखि मुनि देह बिसारी।। भए मगन देखत मुख सोभा। जनु चकोर पूरन ससि लोभा।।___ अर्थ___ फिर राजा ने चारों पुत्रों को बुलाकर मुनि के चरणों में प्रणाम कराया। रामचन्द्रजी को देखकर मुनि बहुत सुखी हुए। मुख की शोभा देखकर ऐसे मग्न हुए जैसे चकोर पूर्ण चन्द्रमा को देखकर लुभाता है।

तब मन हरषि बचन तह राऊ। मुनि अस कृपा न कीन्हिहु काऊ।। केहि कारन आगमन तुम्हारा। कहहु सो करत न लावउँ बारा।।___ अर्थ___मन में प्रसन्न होकर राजा ने यह वचन कहा__हे मुनि ! मुझपर ऐसी कृपा पहले कभी नहीं की। आज किस कारण आपका आगमन हुआ सो कहिये ? उसे करने में देर नहीं लगाऊँगा।

असुर समूह सतावहिं मोही। मैं जाचन आयउँ नृप तोही।। अनुज समेत देहु रघुनाथा। निसिचर बध मैं होब सनाथा।।___ अर्थ___ विश्वामित्रजी बोले___हे राजन् ! राक्षस मुझको सताते हैं। इस कारण मैं तुमसे लक्ष्मणसहित रामचन्द्रजी को माँगने आया हूँ। निसाचरों के मारे जाने से मैं सनाथ हो जाऊँगा।

देहु भूप मन हर्षित, तजहु मोह अज्ञान। धरम सुजस प्रभु तुम्ह कौं, इन्ह कहँ अति कल्यान।।___ अर्थ___हे राजन् ! मन में प्रसन्न होकर मोह और अज्ञान को छोड़ दो। हे स्वामी ! तुम्हारा धर्म और यश बढ़ेगा और इनका भी अत्यन्त कल्याण होगा।

सुनि राजा अति अप्रिय बानी। हृदयँ कम्प मुख दुति कुम्हलानी।। चौथेपन पायऊँ सुत चारी। बिप्र वचन नहिं कहेहु बिचारी।।___ अर्थ ___बहुत अप्रिय वचन सुनकर राजा का हृदय काँपने लगा। उनके मुख का तेज फीका पड़ गया और वे बोले__चौथेपन में मैंने चार पुत्र पाये हैं, हे विप्र ! आपने विचारकर वचन नहीं कहा।

माँगहु भूमि धेनु धन कोषा। सर्बस देउँ आज सहरोषा।। देह प्रानते प्रिय कछु नाहीं। सोउ मुनि देउँ निमिष एक माहीं।।___ अर्थ___भूमि, गौ, खजाना माँगिये, आज सहर्ष सर्वस्व दे दूँगा। देह और प्राण से अधिक कुछ प्यारा नहीं है, हे मुनि ! वह भी एक पल में दे दूँगा।

सब सुत प्रिय मोहि प्रान की नाईं। राम देत नहिं बनई गोसाईं।। कहँ निसिचर अति घोर कठोरा। कहँ सुन्दर सुत परम किसोरा।।___ अर्थ___ सब पुत्र मुझे प्राणों के समान प्यारे हैं तथापि हे स्वामी ! राम को देते नहीं बनता। कहाँ बड़े भयंकर कठोर राक्षस और कहाँ मेरे बहुत सुकुमार बालक ?

सुनि नृप गिरा प्रेम रस सानी। हृदयँ हरष माना मुनि ज्ञानी।। तब बसिष्ठ बहुबिधि समझावा। नृप सन्देह नास कहँ पावा।।___ अर्थ___ राजा की प्रेम रस से भरी हुई बाणी को सुनकर ज्ञानी मुनि ने मन में बहुत आनन्द माना। तब बशिष्ठजी ने बहुत प्रकार से समझाया। तब राजा का संदेह दूर हो गया।

अति आदर दोउ तनय बोलाये। हृदयँ लाइ बहु भाँति सिखाये।। मेरे प्रान नाथ सुत दोऊ। तुम्ह पुनि पिता आन नहिं कोऊ।।___ अर्थ___ बड़े आदर से दोनों को बुलाया और छाती से लगाकर बहुत प्रकार से शिक्षा दी और कहा__ हे नाथ ! यह दोनों पुत्र मेरे प्राण हैं। हे मुनि ! अब आपही इनके पिता हैं दूसरा कोई नहीं।

सौंपे भूप रिषिहिं सुत। बहु बिधि देहिं असीस। जननी भवन गये प्रभु, चले नाइ पद सीस।।___अर्थ___राजा ने बहुत प्रकार से आशीर्वाद दे दोनों पुत्र ऋषि को सौंप दिये, तब प्रभु माता के महल में गए और उनके चरणों में सिर नवाकर चले।

पुरुषसिंह दोउ बीर, हरषि चले मुनि भय हरन। कृपासिंधु मतिधीर, अखिल बिस्व कारन करन।।___ अर्थ___पुरुषों में सिंहरूप दोनों वीर जो मुनियों के भय हरण करनेवाले, कृपा के समुद्र, धीरबुद्धि और सब जगत् के कारण के भी कर्ता हैं, प्रसन्न होकर चले।

अरुन नयन उर बाहु बिसाला। नील जलज तनु स्याम तमाला।। कटि पट पीत कसें बर भाथा। रुचिर चाप सायक दुहुँ हाथा।।___ अर्थ___श्रीरामजी के लाल_नेत्र, चौड़ी छाती, लम्बी भुजायें, नील_कमल और तमाल के समान सुन्दर श्याम शरीर है। कमर में पीताम्बर और सुन्दर तरकस कसे, दोनों हाथों में सुन्दर धनुष_बाण लिये हैं।

स्याम गौर सुन्दर दोउ भाई। बिस्वामित्र महानिधि पाई।। प्रभु ब्रह्मण्यदेव मैं जाना। मोहि हित पिता तजेउ भगवाना।।___ अर्थ___ श्याम और गौर_ वर्ण के दोनों सुन्दर भाई विश्वामित्रजी को महानिधि रूप प्राप्त हुए। वे विचार करने लगे___मैंने जान लिया कि प्रभु ब्रह्मण्यदेव हैं। भगवान ने मेरे लिये पिता को भी छोड़ दिया।

चले जात मुनि दीन्ही देखाई। सुनि ताड़का क्रोध करि धाई।। एकहिं बान प्राण हरि लीन्हा। दीन जानि तेहि निज पद दीन्हा।।___ अर्थ___मार्ग में जाते हुए मुनि ने ताड़का को दिखाया। शब्द सुनते ही वह क्रोध करके दौड़ी। रामचन्द्रजी ने एक ही बाण में उसके प्राणपन लिये और दीन जानकर अपना पद ( दिव्यलोक ) दिया।

तब मुनि निज नाथहिं जियँ चीन्ही। विद्यानिधि कहुँ विद्या दीन्ही।। जाते लाग न छुधा पिपासा। अतुलित बल तनु तेज प्रकासा।।___ अर्थ____तब मुनि ने अपने प्रभु को सब विद्याओं की खान समझकर भी ऐसी विद्या दी जिससे भूख प्यास न सतावे, शरीर में अतुलित बल और तेज का प्रकाश हो।

आयुध सर्ब समर्पि कै, प्रभु निज आश्रम आनि। कन्द मूल फल भोजन, दीन्ह भगति हित जानि।।___ अर्थ___फिर मुनि प्रभु को सब अस्त्र_ शस्त्र दे अपने आश्रम में ले आए और भक्त_हितकारी जानकर कन्द, मूल, फल भोजन के लिए दिये।

प्रात कहा मुनि सन रघुराई। निर्भय जज्ञ करहु तुम्ह जाई।। होम करन लागे मुनि झारी। आपु रहे मख की रखवारी।।___ अर्थ___ प्रातःकाल श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि से कहा__ आप जाकर मण्डप होकर यज्ञ कीजिये। तब मुनि होम करने लगे। आप यज्ञ की रक्षा करने लगे।

सुनि मारीच निसाचर कोही। लै सहाय भागा मुनि द्रोही।। बिनु फर बान राम तेहि मारा। सत जोजन गा सागर पारा।। ___ अर्थ___क्रोधी राक्षस मारीच ने सुना तो वह मुनिद्रोही अपने सहायकों को लेकर दौड़ा। रामचन्द्रजी ने बिना फर का बाण उसको मारा, जिससे वह सौ योजन पर समुद्र के पार जा गिरा।


पावक सर सुबाहु पुनि मारा। अनुज निसाचर कटकु सँघारा।। मारि असुर द्विज निर्भयकारी। अस्तुति करहिं देवमुनिझारी।।___ अर्थ___फिर अग्निबाण से सुबाहु को भस्म किया। लक्ष्मणजी ने राक्षसों की सेना का नाश किया। असुरों को मारनेवाले, ब्राह्मणों को निर्भय करनेवाले भगवान का सब देवता और मुनि स्तुति करने लगे।

तहँ पुनि कछुक दिवस रघुराया। रहे कीन्हि बिप्रन्ह पर दाया।। भगति हेतु कहि कथा पुराना। कहे बिप्र जद्यपि प्रभु जाना।।___ अर्थ___फिर श्रीरघुनाथजी ने कुछ दिन रहकर ब्राह्मणों पर दया की। भक्तिवश ब्राह्मण अनेकों कथा_पुराण सुनाते थे, यद्यपि प्रभु सब जानते थे।


तब मुनि सादर कहा बुझाई। चरित एक प्रभु देखिअ जाई।। धनुषजग्य सुनि रघुकुलनाथा। हरषि चले मुनिबर के साथा।।___ अर्थ___तदनन्तर मुनि ने आदर के साथ समझाकर कहा___ हे प्रभो ! अब चलकर एक चरित्र देखिये। धनुष_यज्ञ सुनकर श्रीरघुनाथजी प्रसन्न होकर मुनिवर के साथ चले।