Friday, 22 February 2019

बालकाण्ड

तासु तनय दिलीप नृप भयऊ। बन तप हेतु उतर दिसि गयऊ।। तहाँ अगम तप कीन्ह नृपाला। भये कालबस गये कछु काला।।___अर्थ___अंशुमान का पुत्र राजा दिलीप हुआ। तब अंशुमान भी उत्तर की ओर तप करने बन में चले गये। वहाँ उन्होंने कठिन तप किया और समय बीतने पर शरीर त्याग दिया।

कहहुँ कवन दिलीप प्रभुताई। सेवैं सकल नृपति जेहि आई। जुगवत जेहिं नित सुरपति रहहीं। महिमा तासु कौन कवि कहहीं।।___अर्थ___दिलीप की प्रभुता क्या वर्णन करूँ ? जिनकी सब राजा आकर सेवा करते थे, जिनका सुख स्वयं इन्द्र भी देखते थे, उनकी महिमा का वर्णन कवि कैसे कर सकता है।

भयो भगीरथ अस सुत जासू। पितु सम प्रीति अधिक उर तासू।। तिनहिं बोलि नृप दीन्हेउ राजू। आप चले उठि तप के काजू।।___अर्थ___दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए जिनके हृदय में पिता के समान अत्यन्त ही प्रेम था। राजा ने उनको बुलाकर राज्य दिया और आप उठकर तप के लिये वन को चल दिये।

मन महँ करत पंथ अनुमाना। सुरसरि आव तजउँ तनु प्राना।। पितु मन तन दीन्हेउ तिमि देऊँ। फिरि निज नगरक नाम न लेऊँ।।___अर्थ___वे मार्ग में अपने मन विचार करते हुए चले कि या तो गंगाजी को लाऊँगा या प्राण ही दे दूँगा, जैसे पिताजी ने तन मन दे दिया वैसे ही मैं दे दूँगा और लौटकर नगर का नाम भी नहीं लूँगा।

यहि बिधि करत बिचार, नृप कीन्हे अति प्रबल तप।। बीते कुछ एक काल, देह तजि कोउ प्रकट नहिं।।___अर्थ___ यह विचार करके तब राजा दिलीप ने प्रबल तप किये। अपार समय बीतने पर देह त्याग दिया परन्तु कोई देवता प्रगट न हुआ।

जेहि सुरसरि लगि तजि तनु भूपा। सो तजि मूढ पियहिं जलकूपा।। इहाँ भगीरथ अस मन भयऊ। पितु न आव बहु दिन चलि गयऊ।।___अर्थ___ जिन गंगाजी के निमित्त राजाओं ने शरीर त्याग दिये, उनको छोड़कर मूर्खलोग कुएँ का जल पीते हैं। यहाँ भगीरथ ने मन में विचार किया कि बहुत दिन बीत गये, पिताजी नहीं आए।

नाम कुकुत्स्थ तनय एक रहेऊ। दीन्हा राज नीति बहु कहेऊ।। कहि सब पूर्व कथा सुत पांहा। दीन्ह असीस चले नरनाहा।।___ अर्थ___काकुत्स्थ नामक भगीरथ के एक पुत्र था, उसे राज्य दिया और भगीरथ ने उसे अनेक राजनीति समझाई। पूर्व की कथा पुत्र से कही और आशीष देकर राजा चले गये।

निकसत नगर शकुन भल पाये। अति हिनि विड़वन जहँ नृप आये।। देखि भगीरथ वन सुख पावा। सुरसरि हित कहँ मन लावा।।___अर्थ___नगर से निकलते ही सुन्दर शकुन मिले और राजा अत्यन्त घने वन में आये।
भगीरथ ने वन को देखकर सुख पाया और गंगाजी को लाने के लिये तप में मन लगा दिया।

एक चरण दोउ भुजा उठाये। रवि सन्मुख चितवहिं मन लाये।। वर्ष सहस बीते अहि भाँती। जात न जाने दिन अरु रातीं।।___अर्थ____एक पैर और दोनों भुजाएँ उठाये हुए मन लगाकर सूर्य की ओर देखने लगे। इस तरह एक हजार वर्ष बात गये परन्तु उन्होंने दिन रात जाते हुए नहीं जाना।

देखि उग्र तप अज चलि आये। बोले बचन नृपहिं मन भाये।। चहहिं नृपति जो लै वरदाना। बोले नृप करि अजहिं प्रणामा।।___अर्थ___राजा का घोर तप देखकर ब्रह्माजी चले आये और राजा से मनोहर वचन बोले___हे राजन् ! जो चाहे सो वरदान लो। तब प्रणाम करके चतुर राजा बोले___

जो मागो सो जानत अहहू। सो मन माँगन प्रभु पुनि कहहू।।____अर्थ___हे प्रभु ! जो मैं माँगने चाहता हूँ सो आप जानते हैं। फिर मुझसे माँगने को क्यों कहते हैं।
तदपि कहौं प्रभु देहु वर, सब सन्तन कर वृद्धि। दूसर माँगहुँ जोरि कर, गंगा आवहिं सिद्धि।।___अर्थ___हे प्रभु ! तो भी मैं कहता हूँ कि यह वर दीजिये कि सब संतों की वृद्धि हो और दूसरा वर हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि सिद्धि की दाता गंगाजी भूतल पर आवें।।

एवमस्तु कहि पुनि विधि कहहीं। सुरसरि देहुँ राखि को सकहीं।। छूट जाहि पुनि तुरत रसातल। फिरहिं न नृपति बहुरि सुनु भूतल।।___अर्थ___’ऐसा ही होगा’ यह कहकर ब्रह्माजी फिर बोले कि गंगाजी को तो ला दूँगा, पर उसे धारण कौन कर सकेगा ? छूटते ही वह तुरंत पाताल को चली जावेंगी और फिर पृथ्वी पर वापस न लौटेंगी।

तेहि ते कहौं एक तोहि पाहीं। अति दयालु शंकर जग माहीं।। सोई शंकर रखि सुरसरि आजू। उनहिं जपे तव होइहैं काजू।।___अर्थ____इस कारण एक बार आपसे कहता हूँ कि जगत् में शिवजी बड़े दयालु हैं। आज वे ही शिवजी गंगाजी को धारण कर सकते हैं। अतः उनका नाम जपने से ही आपका कार्य होगा।

अस कहा बिधि अंतरहित भये। बहुरि भगीरथ शिव पहिं गये।। बिबुध बर्ष अंगुष्ठ अधारा। बार बार शिव नाम उचारा।।___अर्थ____यह कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और भगीरथ शिवजी के पास गये। वे देवताओं के वर्ष तक अंगूठे के आधार पर खड़े रहे और बारम्बार शिवजी का नाम उच्चारण किया।

शिव दयालु प्रगटे तब आई। हाथ जोरि नृप विनय सुनाई।। मैं राखी सुरसरि कह ईशा। बहुरि रमापति ध्यान करीशा।।___अर्थ___ तब दयालु शिवजी आकर प्रगट हो गए, तब राजा ने हाथ जोड़कर विनती की। शिवजी बोले कि मैं गंगाजी को धारण करूँगा। फिर वे भगवान का ध्यान करने लगे।

उहाँ देवसरि शिव वचन, सुनि मन कीन्ह विचार। जाउँ रसातल शिव सहित, जात न लावों बार।।___अर्थ___ब्रह्मलोक में गंगाजी ने शिवजी का वचन सुनकर मन में विचार किया कि मैं शिवजी सहित पाताल चली जाऊँगी, जाते देर नहीं लगाऊँगी।

अन्तर्यामी शिवहिं उपाई। निज सिर जटा सो अगम बनाई।। यहाँ भगीरथ अस्तुति कीन्हीं। सुनि मृदु गिरा छाँड़ि बिधि दीन्हीं।।___अर्थ___अन्तर्यामी शिवजी ने यह उपाय किया कि अपने सिर पर अगम जटा बनाई। इधर भगीरथ के स्तुति करने पर कोमल वाणी सुनकर ब्रह्माजी ने गंगाजी को छोड़ दिया।

छूटे शोर भयउ जग भारी। चकित देव अहि दिग्गज चारी।। सुरसरि पुनि हर जटा समानी। वर्ष एक तहँ रही भुलानी।।___अर्थ___गंगाजी के छूटने पर जगत् में भारी शोर हुआ, देवता, शेषजी और दिग्गज भी चकित हो गये। फिर गंगाजी शिवजी की जटाओं में समा गयीं और एक वर्ष तक ( जटाओं में ) भुला रहीं।

कौतुक देखि सकल सुर हरषे। कहि जय जयति सुमन बहु बरसे।। बहुरि भगीरथ सुमिरन कीन्हा। डारि जटा शिव बुन्दक दीन्हा।।___अर्थ___यह कौतुक देखकर सब देवता प्रसन्न हुए और ‘ जय_जय कहकर बहुत फूल बरसाये। फिर भागारथी ने शिवजी का स्मरण किया तो शिवजी ने एक बूँद छोड़ दी।

जेहि ते भईं तीनि पुनि धारा। एक गई नभ एक पतारा।। गगन भाँति भइ अघ नासिनि। देवन धरा नाम मंदाकिनी।।___अर्थ___उस बूँद से फिर तीन धारा प्रकट हुईं, एक आकाश और एक पाताल हो गई। पाप को नष्ट करनेवाली जो धारा आकाश को गई, उसका नाम देवताओं ने मंदाकिनी रखा।



दूसरि गईं पताल, नाम प्रभावति हरण दुख। तीसरि गंग विशाल, सब सन्तन को करन सुख।।___अर्थ___दूसरी धारा पाताल को गई, जिसका नाम ‘प्रभावती’ है और जो सब दुःखों को हरनेवाली है। तीसरी धारा गंगाजी हैं जो सब संतों को सुख देनेवाली हैं।




जल प्रवाह निकसत नृपति, उर अति भयो अनंद। जैसे उमरत सिंधु तब, पूर्ण कला लखि चन्द।।___अर्थ___ जल का प्रवाह देखकर राजा भगीरथ के हृदय में अत्यन्त आनन्द हुआ जैसे पूर्ण चन्द्रमा को देखकर समुद्र उमड़ पड़ता है।



आय भगीरथ पुनि सिर नाये। बोली सुरसरि बचन सुहाये।। वेगवन्त नृप रथ लै आनू। तुरग तुरग शुभ गति जिमि भानू।।___अर्थ___फिर भगीरथ ने आकर सिर नवाया। तब गंगाजी सुन्दर वचन बोलीं___ हे राजा, शीघ्रगामी रथ ले आओ जिसके घोड़ों की गति सूर्य के घोड़ों के समान श्रेष्ठ हो।



तेहि रथ चढ़ि नृप चले मम आगे। चलिहौं मैं तव पीछे लागे।। सुनि नृप दिव्य तुरग रथ आना। चले हृदय सुमिरत भगवाना।।___अर्थ___उस रथ पर चढ़कर हे राजन् ! आप मेरे आगे चलिये और मैं आपके पीछे चलूँगी। यह सुनकर राजा तुरंत सुन्दर घोड़ों से युक्त रथ ले आये और मन में भगवान का स्मरण करते हुए चले।



चली अग्र करि नृपहिं सुरसरी। देवन मुदित सुमन झरी करी।। चलत तेज कछु बरनि न जाई। टूटि गिरहिं तरु शैल सुहाई।।___अर्थ___राजा को आगे करके गंगाजी चलीं और देवताओं ने प्रसन्न होकर फूल बरसाये। चलने में उनके तेज की कुछ वर्णन नहीं किया जाता। पर्वत वृक्ष और छोटी शिलायें टूटती हैं।



करैं कुलाहल सब बहु भाँती। कमठ नक्र झषब्याल सोमाती।। मज्जन करहिं देव तहँ आई। मुनि गति सिद्ध रहे सब छाई।।___अर्थ___कछुए, मगर, मछली व सर्प मतवाले होकर अनेक शब्द करते हैं। देवता वहाँ आकर स्नान करते हैं। गंगाजी की ऐसी महिमा सुनकर सब सिद्धों ने उनके तट पर आश्रम बनाये।



तर्पण कर मन लाय, हर्ष हृदय नहिं जात कहि। दर्शन से अघ जाय, तरैं सकल मुनिजन कहै।।___अर्थ___मन लगाकर तर्पण करने से हृदय में अवर्णनीय आनन्द होता है। मुनिजन कहते हैं कि गंगाजी के दर्शन से ही पाप छूट जाते हैं और शीघ्र ही तर जाते हैं।



मज्जन कर हरषाय, सुर अजादि सनकादि ऋषि। पान करत अघ जाय, अस मत सब कोऊ कहैं।।___अर्थ___गंगाजी से स्नान करके देवता, ब्रह्माजी तथा सनकादिक ऋषि भी प्रसन्न होते हैं और पान करने से सब पाप दूर हो जाते हैं__ ऐसा मत सब कोई कहते हैं।



करै जे मज्जन तप मन लाई। तिनकी महिमा कहि न सिराई।। रथ पर जात सोह नृप कैसे। तेजवन्त रवि देखिय जैसे।।___अर्थ___जो मन लगाकर स्नान, जप करते हैं उनकी महिमा कही नहीं जाती। रथ पर जाते हुए राजा कैसे सुशोभित हैं जैसे तेजवन्त सूर्य दीख पड़ें।



लाँघे शैल सुहावने देसा। पाछे सुरसरि अग्र नरेसा।। हरिद्वार समीप जब आये। तीर्थ देखि सुरसरि मन भाए।।___अर्थ____पहाड़ और सुन्दर देश लाँघते हुए राजा और पीछे गंगाजी चले आते हैं। जब हरिद्वार के निकट आये तो तीर्थ देखकर गंगाजी का मन प्रसन्न हो गया।



तीर्थ निरखि मन भा सुख भारी। आदि प्रयाग पहुँचि अघहारी।। तहँ मज्जन कीन्हे अघ जाई। बहुरि देवसरि काशी आई।।___अर्थ___तीर्थ देखकर मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर पाप हरनेवाली गंगाजी आदि प्रयाग में पहुँची। वहाँ स्नान करने से सब दुःख छूट जाते हैं। फिर गंगाजी काशीजी में आईं।



सो शिवपुरी सहज सुखदाई। बरनि न जाई मनोहरताई।। औरौं तीर्थ विविध विधि जानी। गई तहाँ किमि कहौं बखानी।।___अर्थ___वह शिवजी की पुरी स्वाभाविक ही सुखदायिनी है जिसकी मनोहरता कही नहीं जाती और भी अनेक तीर्थ जानकर गंगाजी वहाँ गईं जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।



नगर लोगन कहँ करत सनाथा। जाइ चली इहि विधि रघुनाथा।।___अर्थ___ हे रामचन्द्रजी,  मार्ग के लोगों को सवार करती हुई इस प्रकार गंगाजी चली जाती है।


मिली जाई पुनि उदधि महँ, उदधि हृदय सुख मान।। लगे कहन भागीरथहिं, तुम सम धन्य न आन।।___अर्थ___इस प्रकार से वे समुद्र में जाकर मिलीं। तब समुद्र मन में प्रसन्न होकर भगीरथ की बड़ाई करने लगे कि आपके समान धन्य दूसरा कोई नहीं है।



कीन्हों अस जस करहि न कोई। तप महिमा बल कस न होई।। सगर तनय तारे ततकाला। हर्षवन्त तब भरे नृपाला।।___अर्थ___आपने ऐसा तप किया जैसा कोई नहीं करेगा। तप के बल की महिमा ऐसी क्यों न हो ? स्तर सके पुत्र तो उसी समय तर गये। तब राजा बड़ा प्रसन्न हुआ।



अबलौं रहे जो कुल महँ कोऊ। तिनके संग तरे अब सोऊ।। तुम समान नृप और न भयऊ। जग विख्यात अचल यश लयऊ।।___अर्थ___और जो अबतक कोई कुल में तरने से शेष रहे उनके साथ अब वे भी तर गए। आपके समान और कोई राजा नहीं हुआ, आपने जग विख्यात अचल यश प्राप्त किया है।



सकल सुरन्ह सँग तहाँ विधाता। नृप सन आय कही अस बाता।। धन्य भगीरथ जश यश लयऊ। तुम समान नृप अवर न भयऊ।।___अर्थ___वहाँ सब देवताओं को साथ लेकर ब्रह्माजी आये और राजा से यह बात कही_धन्य हो भगीरथ ! जगत् में आपने बड़ा यश पाया, आपके समान और कोई नृप नहीं हुआ।



आपनि सत्य प्रतिज्ञा कियऊ। सम्मत वेद जनत सुख दयऊ।। गंगासागर सब कोई कहहीं। अघ उलूक देखत रवि डरहीं।।___अर्थ___आपने प्रतिज्ञा सत्य की और संतजनों को सुख दिया। इस स्थान को सब कोई गंगासागर कहेंगे और पापरूपी उल्लू सूर्यरूपी गंगासागर से डरेंगे।

भागारथी नाम अरु कहहीं। सुनि सुर सिद्ध नाग यश लहहीं।। अस विधि कहि निज लोकहि आये। यहाँ भगीरथ अति सुख पाये।।___अर्थ___और गंगाजी को ‘भागारथी’ भी कहेंगे जिसे सुनकर देवता, सिद्ध और नाग यश लेंगे। ऐसा कहकर ब्रह्माजी अपने लोक को चले गये और भगीरथ ने बड़ा सुख पाया।



पायो अमितसुख बहुरि पूजेउ सुरसरिहीं मन लायकै। तब दीन्ह आशिष समुद्र गंगा नृप गयो सुख पाइकै।। इहि भाँति सुनि गंगा कथा तब राम ऋषि चरणन नये। कह दास तुलसी राम लखनहिं महामुनि आशिष दये।।___अर्थ___तब भगीरथ ने बड़ा सुख पाया और मन लगाकर गंगाजी की फिर पूजा की। तब गंगाजी ने प्रसन्न होकर आशीष दी और राजा सुख पाकर घर को गये। इस भाँति गंगाजी की कथा सुनकर श्रीरामजी मुनि विश्वामित्र के चरणों में प्रणाम किये। तब महामुनि ने श्रीराम लक्ष्मण को आशीर्वाद दिया।



कौसिक आशिष अमिय सम, पाय हरषि रघुनाथ। प्रभु संशय सब इमि गई, लवा निरखि जिमि बाज।।___अर्थ___ विश्वामित्रजी का अमृत के समान आशीर्वाद पाकर श्रीरामजी प्रसन्न हुए और उनके सब संदेह ऐसे जाते रहे जैसे बाज को देखकर बटेर उड़ जाते हैं।



आशिष सुधा समान सुनि, हर्ष श्रीरघुनाथ। अति सुख पाइ कहेउ पुनि, बेगि चलिय मुनिनाथ।।___अर्थ____ श्रीरामजी अमृत के समान आशिष सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और फिर सुख पाकर बोले__ हे मुनिनाथ ! शीघ्र चलिये।

Wednesday, 30 January 2019

बालकाण्ड

आश्रम एक दीख मग माहीं। खग मृग जीव जन्तु तहँ नाहीं।। पूछा मुनिहि सिला प्रभु देखी। सकल कथा मुनि कही बिसेषी।।___ अर्थ___मार्ग में एक आश्रम दीख पड़ा। वहाँ पशु_पक्षी कोई जीव_जन्तु नहीं थे। प्रभु ने एक शिला देखकर मुनि से पूछा। तब मुनि ने विस्तार सहित सब कथा कह सुनाई।

गौतम नारि श्राप बस, उपल देह धरि धीर। चरन कमल रज चाहति, कृपा करहु रघुबीर।।___ अर्थ___ गौतम मुनि की स्त्री शापवश शिला हो गयी है। वह धीरज धरे आपके चरणों की धूलि चाहती है। हे रघुवीर ! आप कृपा कीजिये।

परसत पद पावन सोक नसावन प्रगट भई तप पुंज सही। देखत रघुनायक जन सुखदायक सनमुख होइ कर जोरि रही।। अति प्रेम अधीरा पुलक सरीरा मुख नहिं आवत बचन कही। अतिसय बड़भागी चरनन्हि लागी जुगल नयन जलधार बही।।___ अर्थ____श्रीरामचन्द्रजी के पवित्र और दुखहारी चरणों का स्पर्श होते ही वह तपोमूर्ति अहल्या सचमुच प्रकट हो गयी। अत्यन्त प्रेम से अधीर हो रोमांचित हो गयी। मुँह से बोली नहीं आया तब अत्यन्त  बड़भागिनी अहिल्या प्रभु के चरणों में पड़ गई। उसके दोनों नेत्रों से अश्रु बहने लगे।

धीरजु मन कीन्हा प्रभु कहुँ चीन्हा रघुपति कृपा भगति पाई। अति निर्मल बानी अस्तुति ठानी ज्ञानगम्य जय रघुराई। मैं नारि अपावन प्रभु जग पावन रावन रिपु जन सुखदाई। राजीव बिलोचन भव भय मोचन पाहि पाहि सरनहिं आई।।___ अर्थ___धीरज धरकर उसने प्रभु को पहचाना तथा रघुनाथजी की कृपा से भक्ति पाई। तब बहुत ही निर्मल बाणी से स्तुति करने लगी__ हे ज्ञान से जानने योग्य श्रीरामजी ! आपकी जय हो ! मैं अपवित्र स्त्री हूँ और आप जगत् को पवित्र करने वाले रावण के शत्रु और अपने भक्तों को सुख देनेवाले हैं। हे कमल_नयन ! हे संसार के भय को दूर करनेवाले ! मैं आपकी शरण हूँ, मेरी रक्षा कीजिये।

मुनि श्राप जो दीन्हा अति भल कीन्हा परम अनुग्रह मैं माना। देखेउँ भरिलोचन हरि भवनोचन इहइ लाभ संकर जाना।। विनती प्रभु मोरी मैं अति भोरी नाथ न मागउँ बर आना। पद कमल परागा रस अनुरागा मम मन मधुप करै पाना।।___ अर्थ___मुनि ने जो श्राप दिया सो बहुत भला किया। मैंने उसे बड़ी कृपा समझी, क्योंकि संसार से छुड़ानेवाले श्रीहरि को नेत्र भरकर मैंने देखा। इसी को शिवजी सबसे बड़ा लाभ समझते हैं। हे प्रभु ! मैं बुद्धि की भोली हूँ। हे नाथ ! मैं वर नहीं माँगती, केवल यही चाहती हूँ कि आपके चरणों की रज के रस से मेरा मन भौंरे के समान प्रेम से पान किया करे।

जेहिं पद सुरसरिता परम पुनीता प्रगट भईं सिव सीस धरि। सोइ पद पंकज जेहि पूजत अज मम सिर धरेउ कृपाल हरी।। एहि भाँति सिधारी गौतम नारी बार बार हरि चरन परी। जो अति मन भावा सो बरु पावा गइ पतिलोक अनंद भरी।।___ अर्थ___ जिन चरणों से परम पवित्र श्रीगंगाजी उत्पन्न हुईं जिन्हें शिवजी ने अपने सिर पर धारण किया है, जो चरण ब्रह्माजी पूजते हैं, हे कृपालु ! वे चरण आपने मेरे सिर पर रखे। इस भाँति स्तुति करके गौतम पत्नी अहल्या बार_बार प्रभु के चरणों पर गिरकर, मनोवांछित वरदान पाकर आनन्द से भरी परलोक को चली गई।

अस प्रभु दीनबन्धु हरि, कारन रहित दयाल। तुलसीदास सठ ताहि भजु, छाँडि कपट जंजाल।।___ अर्थ___दीनदयालु भगवान बिना कारण ही सब पर कृपा करते हैं, ऐसे प्रभु भगवान को, हे मूर्ख तुलसीदास ! कपट जंजाल को छोड़कर भज।

चले राम लछिमन मुनि संगा। गये जहाँ जगपावनि गंगा।।___ अर्थ____मुनि के साथ श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी चले। वे वहाँ गये जहाँ संसार को पवित्र करनेवाली श्रीगंगाजी थीं।

पुनि सुरसरि उत्पत्ति रघुराई। कौसिक सन पूछी सिर नाई। कह मुनि प्रभु तव कुल एक राजा। नाम सगर तिहुँ लोक बिराजा।।___अर्थ___फिर गंगाजी की उत्पत्ति का कथा श्रीरामजी ने विश्वामित्रजी से सिर नवाकर पूछी। मुनि ने कहा हे रामजी ! आपके ही कुल में एक राजा हुए हैं जिनका नाम ‘सागर’ जगत् में विख्यात है।

जेहि के युग भामिनि सुकुमारी। नाम केशिनी सुमति पिआरी। सब प्रकार संपति सुख भ्राजा। सुर बिहीन मन विस्मय राजा।।___ अर्थ___उनके सुकुमारी और अत्यन्त प्रिय रानियाँ केशिनी और सुमति नाम की थीं। राजा के सर्व सुख और सम्पत्ति थी परन्तु पुत्र न होने से राजा दुखी थे।

एक समय भामिनि दोउ साथा। गए वन तनय हेतु रघुनाथा। सघन सफल तरु सुन्दर नाना। तहँ भृगु मुनि तप तेज निधाना।।___अर्थ___ हे रघुनाथजी ! एक समय पुत्र के हेतु राजा दोनों रानियों के साथ वन को गए। जहाँ अनेक फलों से युक्त सघन वृक्ष थे वहाँ तेजनिधान भृगु मुनि का आश्रम था।

सहित नारि नृप मुदित मन, रहे वर्ष शत एक। कीन्हे तपबल देखि भृगु, अस्तुति कीन्ह अनेक।।___ अर्थ___रानियों के साथ राजा ने प्रसन्न मन से सौ वर्ष तक रहकर तप किया और भृगु मुनि के दर्शन होने पर अनेक स्तुति की।

कहि निज दुख प्रणाम नृप कीन्हा। दै असीस तब मुनि वर दीन्हा। नृप रानी सन मुनि अस भाषा। लेहु सो वर जो जेहि अभिलाषा।।___अर्थ___राजा ने अपना दुख कहकर प्रणाम किया। तब मुनि ने आशीर्वाद देकर वर दिया। रानियों ने मुनि से यह कहा___ तुममें से जिसकी इच्छा हो सो वर ले लो।

सुनि मुनि वचन सीस तिन नावा। देहु नाथ जो अति मन भावा।। एक ही कह्यो एक सुत होना। दूसर साठि सहस गुणलोना।।___ अर्थ___मुनि के वचन सुनकर उन्होंने सिर नवाया और कहा___ हे नाथ ! मन_भावना वर दीजिये। एक ( केशिनी ) ने एक पुत्र होने का वर और दूसरी ( सुमति ) ने साठ हजार पुत्रों का वर माँगा।

हर्षित भयो सुभग वर पाई। पाणि जोरि चरणन सिर नाई। सहित भामिनी अवधहिं आये। हर्ष सहित कछु दिवस गँवाये।।___अर्थ___राजा सुन्दर वर पाकर प्रसन्न हुए और हाथ जोड़कर मुनि के चरणों में सिर नवाया। वे स्त्रियों के साथ अयोध्या आये और प्रसन्नता से कुछ दिन बिताये।

जानि सुघरि सुन्दरि सुखदाई। नाम केशि असमंजस जाई।। सुमति प्रसव इक तुम्बरि सोइ। भये सुत प्रकट कहे मुनि जोई।।___ अर्थ___सुन्दर सुखदायनी घड़ी में केशिनी ने असमंजस नाम का पुत्र प्रसव किया और सुमति से एक तूँबी हुई जिसमें मुनि के कथनानुसार साठ हजार पुत्र थे।

निरखे सुत हर्षित सब होई। मंगलाचार किये सब कोई।। हर्ष सहित दिये दान नरेसू। पूजि विप्र गुर गौरि गणेशू।।__अर्थ___पुत्रों को देखकर सब बड़े प्रसन्न हुए और सबने मंगलाचार किये। राजा ने ब्राह्मण, गुरु, पार्वतीजी और गणेशजी की पूजा करके हर्षसहित दान दिये।
घृतघट सुन्दर बिबिध मँगाये। ते सब सुत नृप तिन महँ नाये।।___अर्थ___ राजा ने घृत के अनेक घड़े मँगाये और सब पुत्रों को उनमें रखा।

एहि बिधि भयउ सकल सुत, पूजे सब मन काम। जाइ दिवस निसि हर्ष वश, सुनहु राम घनश्याम।।___ अर्थ___हे घनश्याम रामजी ! सुनिये, इस प्रकार सब पुत्र और मन की सब अभिलाषा पूरी हुई। रात दिन आनन्दपूर्वक बीतने लगे।

पुरजन सब घर घरनि नरेसू। अति आनन्द रवि तजा कलेसू।। बालकेलि कर भये कुमारा। लीला करत अगम संसारा।।___ अर्थ___सब पुरवासी घर_घर में और राजा अति आनन्दित हुए, शरीर का क्लेश मिट गया। बाललीला करते जब वे कुमार हुए तो संसार में अनेक खेल करने लगे।

होइँ सो काज सकल मन चीते। यहि सुख बसत बहुत दिन बीते।। सरयू नदी अवध जो अहई। विमल सलिल उत्तरतट बहई।।___अर्थ__उस शुभकार्य से सबके मन की अभिलाषा पूरी हुई और आनन्द से रहते हुए बहुत दिन बीत गये। निर्मल जल वाली सरयू नदी जो अयोध्या में है, उत्तर की ओर बहती है।

प्रजा लोक के बालक नाना। नित उठि तहाँ करें अस्नाना।। असमंजस तहँ तरणी आना। तिनहि चढ़ाई बोरि निज पानी।।___ प्रजा के अनेक बालक नित्य उठकर वहाँ स्नान करते हैं, असमंजस वहाँ नाव लाया और उन्हें चढ़ाकर उसने अपने हाथ से नाव डुबा दी।

भये प्रजा सब परम दुखारी। बालक वध सुनि सुनहु खरारी।। सकल गये जहँ बैठ नृपाला। बोले बचन नाइ पद भाला।।___अर्थ___हे श्रीरामचन्द्रजी ! सुनिये, बालकों का वध सुनकर प्रजाजन बड़े दुःखी हुए और वहाँ गये जहाँ राजा बैठे थे और चरणों में सिर नवाकर बोले___

तुम नृप चहहु प्रजा प्रतिपाला। सुत तुम्हार भा सबकर काला।। तजब देश सब सुनहु नरेशू। बिना तजे नहिं मिटै कलेशू ।।___अर्थ___हे राजन् ! आप तो प्रजा का पालन चाहते हैं परन्तु पुत्र का काल हो गया है। हे राजन् ! सुनिये, हम देश त्याग देंगे क्योंकि बिना त्यागे क्लेश नहीं मिटेंगे।

सब सुत कीन्हे पाप बहु, मारे बालकवृन्द। तुम कहँ प्राण समान यह, सकल प्रजन कहँ मन्द।।___अर्थ___आपके पुत्र ने बहुत पाप किये हैं, सारे बालक मार डाले। आपको तो यह प्राणप्रिय है परन्तु सारी प्रजा के लिये बड़ा दुष्ट है।

प्रजा गिरा सुनि धीरज दीन्हा। सुतहि देश ते बाहर कीन्हा।। तासु तनय जग विदित प्रभाऊ। गुणनिधि अंशुमान तेहि नाऊ।।___अर्थ___राजा ने प्रजा के वचन सुनकर उसको धीरज दिया और असमंजस को देश से निकाल दिया। असमंजस के एक पुत्र, जिसका प्रभाव जगत् में प्रगट था, अंशुमान था।

बसत हृदय नृप से सो कैसे। अति प्रिय मीन सलिल रह जैसे।। गये प्रजा सब निज निज धामा। भै बिलोकि मन गुन विश्रामा।।___अर्थ___हे मुनि भरद्वाज ! वह राजा के हृदय में ऐसे वास करता था जैसे मछली के मन में जल। सब प्रजाजन अपने_अपने घर गये और राजा के गुण देखकर मन में विश्वास हुआ।

बहुरि  नृपति मन कीन्ह बिचारा। आइ गयो पन चौथ हमारा।। हित मन्त्री गुरु सुतहु बुलाये। हिमगिरि बिंध्य मध्य तब आये।।___ अर्थ___फिर राजा ने मन में विचार किया कि हमारा बुढ़ापा आ गया। उसने अपने हितैषी मंत्री, गुरु और पुत्र बुलाए। तब हिमालय और विन्ध्याचल के मध्यस्थान में सब आये।

रुचिर वेदिका एक बनाई। देखत बनै बरनि नहिं जाई।। मख अरम्भ छाँड़े तब तुरगा। वेगवन्त जिमि देखिय उरगा।।___अर्थ___ एक सुन्दर वेदी बनाई जो देखते ही बने और वर्णन नहीं की जाती। यज्ञ आरम्भ करके एक घोड़ा छोड़ा जो सूर्य के समान वेगवान दिखाई देता था।

सुरपति सुन भय दारुणहि, मन महँ करि अनुमान। आइ तुरग सब लीन्हेउ, मरम न काहू जान।।___ अर्थ___तब इन्द्र ने सुनते ही अत्यन्त भय मानकर मन में विचार कर घोड़ा आकर ले लिया और इस भेद को किसी ने नहीं जाना।

राखेउ आनि कपिल मुनि पाहीं। कोउ न जान काहुहिं गम नाहीं।। जुगवत रहे जे सुभट सयाने। लै तुरंग रहे किनहुँ न जाने।।___ अर्थ___वह घोड़ा कपिल मुनि के पास आकर रख दिया। वह किसी ने नहीं जाना, न किसी ने ले जाते देखा। जो वीर योद्धा रखवाली पर थे उन्होंने भी न जाना कि कौन ले गया।

तिन सब आय कही नृप पाहीं। महाराज हम कहत डराहीं।। लीन्ह तुरग कोइ जान न कोई। कहा करिय जो आयसु होई।।___ अर्थ___उन सबने आकर राजा से कहा___महाराज ! हम कहते हुए डरते हैं। घोड़ा कौन ले गया यह कोई नहीं जानता। आपकी जो आज्ञा हो सो करें।

सुनत वचन नृप विस्मय पाये। सकल सुभट कहँ तुरत बुलाये।। जाहु तुरग तुम हेरहु जाई। सकल चले चरणन सिर नाई।।___ अर्थ___ सुनकर राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ और सब पुत्रों को तुरन्त बुलाया और कहा___जाओ, तुम घोड़े को ढूँढो। सब चरणों में सिर नवाकर चले।

सुरपति सम देखिय सब वीरा। सकल धनुर्धर अति रणधीरा।। तिनहि चलत धरनि अगुवाई। बलि पशुजीव भये सब आई।।___अर्थ____वे सब इन्द्र के समान बड़े धनुर्धर और रण में धैर्यवान् दिखाई देते थे। उनके चलने से पृथ्वी व्याकुल हो गई और अनेक जीव बलि पशु बने।

सुमन बाटिका उपवन बागा। सरित रूप बापिका तरागा।। नगर गाँव मुनीस थल नाना। गिरिकन्दर कानन अस्थाना।।___अर्थ___फूल_बाटिका, उपवन, बाग, नदी, कुएँ, तालाब, नगर, गाँव, मुनियों के आश्रम, पहाड़ों की कन्दराएँ, वन और अनेक स्थान।

यहि बिधि खोजहु तुरंग तिन, आये भूपति पाहिं। चरणन माथहि नाइ कहि, खोज अश्विनी की नाहिं।।___ अर्थ___इस प्रकार उन्होंने घोड़ा ढूँढा और राजा के पास आए और चरणों में सिर नवाकर कहा___ हे महाराज ! घोड़े का कहीं पता नहीं है।

खोदहु महि सुत बहुरि पठाये। चले सकल पूरब दिसि आये।। तिनके कर जिमि कुलिस समाना। योजन भरि खोदहिं बलबाना।___ अर्थ____राजा ने कहा कि पृथ्वी को खोदो। तब वे चलकर पूर्व दिशा में आये। उनके हाथ वज्र के समान थे। वे बलवान एक योजन भर पृथ्वी खोदते थे।

देखि अतुल बल देव डराने। मरिहैं कहि बिरंचि सनमाने।। सोधत महि पताल सब आये। दिग्गज देखि एक सिर नाये।।___अर्थ___उनका अतुल_बल देखकर देवता डर गये। तब ब्रह्माजी ने समझाया कि यह सगर के पुत्र नष्ट होंगे। वे पृथ्वी में खोजते हुए पताल में आये और एक दिग्गज को देखकर सिर नवाया।


तिन पूछा सब कथा सुनायो। बहुरि सकल दक्षिण दिसि आयो।। इहि बिधि पुनि दूसर गज देखा। अति उतंग गज विमल विशेषा।।___ अर्थ___उसके पूछने पर सब कथा तह सुनाई और फिर दक्षिण दिशा में आये। इसी प्रकार फिर दूसरा हाथी देखा जो बहुत ऊँचा और अधिक उज्ज्वल था।


ताहू बहु प्रणाम तिन कीन्हे। चले सुनत पश्चिम चित दीन्हे।। तीसरे देखि प्रदक्षिण कीन्ही। पुनि उत्तर दिसि शोधहिं लीन्ही।।___ अर्थ____उसको भी प्रणाम किया और पश्चिम की ओर मन लगाकर चले। तीसरा हाथी देखकर उसकी परिक्रमा की और उत्तर दिशा में ढूंढने लगे।


दिग्गज श्वेत निरखि सुख पाये। सकल कपिल मुनि पहँ पुनि आये।। खोजत मही पार नहिं पावा। शोभा चहुँ दिसि जलधि सुहावा।।___अर्थ___वहाँ श्वेत दिग्गज को देखकर सुख पाया और सब कपिल मुनि के पास आये। पृथ्वी ढूँढने में पार नहीं पाया, चारों ओर सुन्दर सागर सुशोभित था।


देखिनि आइ तुरंग तब, बाँधा मुनिवर पास। बोले वचन सकोप करि, भा चह सब कर नास।।___अर्थ___तब उन्होंने आकर अपना घोड़ा देखा कि मुनि के पास बँधा है। तब वे सब क्रोध करके बोले___ क्योंकि सबका नाश होना चाहता था।


खोदी महि हम चारिउ क्रोधा। रेरे दुष्ट बहुत तोहिं सोधा।। कोई कह चोर देखि बहु होइ। यह सम छली और नहिं कोइ।।___अर्थ___हमने पृथ्वी चारों कोनों में खोद ढूँढी, अरे दुष्ट ! तुमको बहुत खोजते रहे। कोई बोला___ चोर तो बहुत देखे परन्तु इसके समान छली कोई नहीं है।


परधन लै पाताल पुनि आयो। तस्कर मुनिवर वेष बनायो। कोउ कह यह मुनिवर नाहीं। समुझि देखि लच्छन मन माहीं।।___अर्थ____पराया धन लेकर पाताल में आ बैठा है, इस चोर ने श्रेष्ठ मुनि का वेष बनाया है। किसी ने कहा यह मुनि नहीं है, इसके लक्षण देखकर मन में ही समझ लो।


कोउ कह बक तप कीन्ह अपारा। अहो दुष्ट लै तुरग हमारा।। सुनत बचन मुनि चितवा जबहिं। भए भस्म सब क्षण में तबहीं।।___अर्थ___किसी ने कहा___अरे दुष्ट ! हमारा घोड़ा लेकर तूने बगुले के समान बहुत तप कर लिया। यह वचन सुनकर मुनि ने ज्योंही उन्हें देखा कि वे सब एक क्षण में ही जलकर भष्म हो गये।


उमा वचन जेहि समुझि न बोला। सुधा होइ विष तिक्तम ओला।। पावक जानि धरहिं कर प्राणी। जरहिं काहि नहिं अति अभिमानी।।___अर्थ____हे उमा ! जो समझकर वचन नहीं बोलते उनको अमृत, विष और ऐसा कड़ुआ हो जाता है। जो प्राणी जानकर अग्नि को हाथ में धरेंगे, वे अतिशय अभिमानी क्यों न जलेंगे।


जानि गरल जे संग्रह करहीं। सुनहु राम ते काहे न मरहीं।। क्रोध करै बिन किये बिचारा। भये सकल तेहि रे जरि छारा।।___अर्थ___हे रामजी ! सुनिये, जो जानबूझकर विष भक्षण करें वे क्यों न मरेंगे ? उन्होंने बिना विचारे क्रोध किया था इसी से जलकर क्षार हो गये।


इहाँ नृपति अंशुमान बोलाये। नहिं आये सब तिनहिं पठाये।।___अर्थ____यहाँ राजा ने अंशुमान को बुलाकर कहा___वे सब पुत्र तो नहीं आये, तुम जाकर ढूँढो।


दीन्हा नृपति असीस तब, अति हित बारहिं बार। बेगि फिरहु लै तुरग सुत, मेरे प्राण आधार।।___अर्थ___तब राजा ने बड़े स्नेह से बार_बार आशीष दी और कहा___ हे मेरे प्राणाधार पुत्र ! तुम घोड़ा लेकर शीघ्र लौट आना।



चले नाइ पद शीश कुमारा। बिष्णु भक्त हित कुल उजियारा।। जहँ जहँ देखि मुनिन के धामा। पूँछि खबरि करि दण्ड प्रणामा।।___अर्थ____राजकुमार अंशुमान् चरणों में सिर नवाकर चले। वे विष्णु_भक्त और कुल के दीपक थे। जहाँ_जहाँ मुनियों के आश्रम देखे वहाँ_वहाँ दण्डवत् प्रणाम करके समाचार पूछे।


पुनि पुनि जन सन पाइ अशीशा। चहुँ दिग्गज कहँ नायउ सीसा।। यहि विधि सोधत मग महँ जाता। मिले गरुड़ सुमतीकर भ्राता।।___अर्थ___फिर मुनियों से आशीष पाकर चारों दिग्गजों को सिर नवाया। इस प्रकार मार्ग में ढूंढते चले। तब सुमति के भ्राता गरुड़जी ( उनका मामा ) मिले।


चरन परत तब आशिष दयऊ। जरे सकल जेहि विधि सोकयऊ।। सुनतहि वचन सोच भयो भारी। लिये खगेस दिखायल वारी।।___अर्थ___चरण स्पर्श करते ही उन्होंने आशीष दी और जिस प्रकार सब जले थे सो हाल सुनाया। सुनते अंशुमान को बड़ा सोच हुआ। तब गरुड़जी ने जलाशय दिखा लिया।


अंशुमान तहँ मज्जन कीन्हा। क्रम क्रम सबहिं जलांजली दीन्हा। बहुरि गरुड़ बोले सुनु ताता। मैं तोहि कहौं करिय इक बाता।।___अर्थ___अंशुमान ने वहाँ स्नान किया और क्रमानुसार सबको जलांजली दी। फिर गरुड़जी बोले___ हे तात ! सुनो, तुमसे एक बात कहता हूँ वही करो।


करु सुत सोइ उपाय, गंगा आवहिं अवहि महँ। दर्शन ते अघ जाय, मज्जन कीन्ह परम सुख।।___अर्थ____हे पुत्र वही उपाय करो जिससे गंगाजी पृथ्वी पर आ जायँ जिनके दर्शन से ही पाप छूट जाते हैं और स्नान करने से ही परम सुख प्राप्त हो जाता है।


पुष्टि सहस तरिहैं एहि विधि। गंगा पाय परम पावन निधि।। सुनि अस वचन हृदय मन भाये। सहित गरुड़ मुनिवर पहुँ आये।।___अर्थ___इस प्रकार पवित्र गंगाजी को प्राप्त होकर से साठों हजार तर जायेंगे। यह वचन सुनकर मन को भले लगे, तब अंशुमान गरुड़जी सहित कपिलदेव के निकट आये।



तब खगेश मुनि चरणन नायउ। पूरब कथा सकल मुनि गायउ।। आयसु देइ तुरग मुनि दीन्हा। हरषि हृदयँ निज अश्वहिं चीन्हा।।___अर्थ___तब गरुड़जी मुनि के चरणों में पड़े और पहले की सब कथा मुनि ने कही। आज्ञा देकर मुनि ने घोड़ा दे दिया। तब अंशुमान अपना घोड़ा पाकर मन में प्रसन्न हुए।


नगर समीप गरुड़ पहुँचाई। गये भवन निज तब रघुराई।। इहाँ तुरग लै नृप सिर नाई। षष्टि सहस मुनि कथा सुनाई।।___अर्थ___हे रामजी ! अंशुमान को नगर के समीप पहुँचाकर गरुड़जी अपने घर को चले गये। उन्होंने घोड़ा लेकर राजा के सामने सिर नवाया और फिर साठ हजार वीरों की तथा मुनियों का कथा सुनाई।।


विस्मय हर्ष विवश नृप भयऊ। कीन्हा यज्ञ दान बहु दयऊ।। बहुबिधि नृपति राज पुनि कीन्हा। प्रजालोग कहँ अति सुख दीन्हा।।___अर्थ___ तब राजा सगर हर्ष और दुःख के वश हुए और यज्ञ करके बहुत सा दान दिया। फिर राजा ने अनेक विधि से राज्य किया और प्रजा को अत्यन्त सुख दिया।



अंशुमान कहँ राज दै, निज मन हरि पद लाग। गयउ सगर तप काज वन, हृदय अधिक अनुराग।।___अर्थ___फिर राजा सगर अंशुमान को राज्य देकर भगवान के चरणों में मन लगाकर तप करने हेतु वन में चले गये। उनके हृदय में बड़ा प्रेम था।