Wednesday, 1 May 2019

बालकाण्ड

गाधिसूनु सब कथा सुनाई। जेहि प्रकार सुरसरि महि आई।।___ अर्थ____विश्वामित्रजी ने सब कथा कह सुनाई जिस प्रकार गंगाजी पृथ्वी पर आईं थीं।

तब प्रभु रिषिन्ह समेत नहाए। बिबिध दान महिदेवन्ह पाए।। हरषि चले मुनिवृंद सहाया। बेगि बिदेह नगर नियराया।।___अर्थ____प्रभु ने ऋषियों सहित स्नान किया, अनेक प्रकार के दान ब्राह्मणों ने पाये। फिर प्रसन्न होकर वे मुनिगण के साथ चले और शीघ्र ही जनकपुरी के निकट पहुँचे।

पुर रम्यता राम जब देखी। हरषे अनुज समेत बिसेषी।। बापीं कूप सहित सर नाना। सलिल सुधा सम मनि सोपाना।।___अर्थ___श्रीरामचन्द्रजी ने जब नगर की शोभा देखी तब छोटे भाई सहित बहुत ही प्रसन्न हुए। अनेक बावली, कुएँ, नदी और तालाबों में अमृत के समान जल भरा है और मणियों की सीढ़ियाँ बनी हैं।

गुंजत मंजु मत्त रस भृंगा। कूजत कल बहुबरन बिहंगा।। बरन बरन बिकसे बन जाता। त्रिबिध समीर सदा सुखदाता।।___अर्थ___सुगंधित फूलों के रस में मतवाले सुन्दर भौंरे गूँज रहे हैं, बहुत रंग के पक्षी मनोहर बोली बोल रहे हैं। रंग रंग के कमल खिल रहे हैं, तीनों प्रकार की शीतल, मंद, सुगंधित वायु सबको सुख देनेवाली बह रही है।

सुमन बाटिका बाग बन, बिपुल बिहंग निवास। फूलत फलत सुपल्लवत, सोहत पुर चहुँ पास।।___अर्थ___फुलवारी, बाग और वन नगर को चारों ओर शोभा दे रहे हैं। उनमें भाँति_भाँति के पक्षी अपने घोंसले बनाकर वास कर रहे हैं, सुन्दर कोमल पत्ते निकल रहे हैं।

बनइ न बरनत नगर निकाई। जहाँ जाइ मन तहँइ लोभाई।। चारु बजारु बिचित्र अँबारी। मनिमय बिधि जनु स्वकर सँवारी।।___अर्थ___नगर की शोभा का वर्णन करते नहीं बनता, जहाँ मन जाता है, वहीं लुभा जाता है। बहुत सुंदर बाजार और बड़ी विचित्र मणियों से जड़ी अटारियाँ हैं मानो ब्रह्मा वो उन्हें अपने हाथों से बनाई हों।

धनिक बनिक बर धनद समाना। बैठे सकल बस्तु लै नाना।। चौहट सुन्दर गलीं सुहाई। सन्तत रहहिं सुगन्ध सिंचाई।।___अर्थ___ कुबेर के समान धनी व्यापारी सब प्रकार की वस्तुएँ लेकर बैठे हैं। चौक और सुहावनी गलियाँ सदा सुगन्धित रहती हैं।

मंगलमय मन्दिर सब केरे। चित्रित जनु रतिनाथ चितेरें।। पुर नर नारि सुभग सुचि संता। धरमसील ग्यानी गुनवंता।।___अर्थ___ सबके घर ऐसे विचित्र हैं मानो कामदेवरूपी चित्रकार ने चित्रित किया है। नगर के सब स्त्री_पुरुष सुन्दर, पवित्र, बड़े सज्जन, धर्मात्मा, ज्ञानवान और गुणवान् हैं।

अति अनूप जहँ जनक निवासू। बिथकहिं बिबुध बिलोकि निवासू।। होत चकित चित कोट बिलोकी। सकल भुवन शोभाजनु रोकी।।___अर्थ___ राजा जनक का जहाँ निवास_स्थान था वह बहुत ही अनुपम था, जिसके ऐश्वर्य तो देखकर देवता भी थक जाते थे। कोट को देखकर चित्त चकित हो जाता था, उसने मानो सब भुवनों की शोभा रोक रक्खी थी।

धवल धाम मनि पुरट पट, सुघटित नाना भाँति। सिय निवास सुंदर सदन, सोभा किमि कहि जाति।।___अर्थ____उज्ज्वल महलों में सुन्दर मणि जड़ित सोने के भाँति_भाँति के पर्दे लगे थे। सीताजी का निवास भवन तो बहुत ही सुहावना था, उसकी शोभा कैसे कही जा सकती है ?

सुभग द्वार सब कुलिस कपाटा। भूप भीर नट मागध भाटा।। बनी बिसाल बाजि गज साला। हय गय रथ संकुल सब काला।।___अर्थ___महलों के सब दरवाजे बहुत ही सुन्दर थे, उनमें हीरों से जड़े हुए किवाड़ लगे थे। वहाँ नट मागध और भाटों की बड़ी भीड़ लगी थी। बहुत ही बड़ी घुड़सालें और गजशालाएँ बनी हुईं थीं जिनमें सदैव घोड़े, हाथी, रथ भरे रहते थे।

सूर सचिव सेनप बहुतेरे। नृप गृह सरिस सदन सब केरे।। पुर बाहेर सर सरिस समीपा। उतरे जहँ तहँ बिपुल महीपा।।___ अर्थ___बहुत से शूरवीर, मंत्री और सेनापति थे। उन सबके महल भी राजमहल के समान ही थे। नगर के बाहर और नदियों के समीप जहाँ_तहाँ अनेक राजालोग उतरे हुए थे।

देखि अनूप एक अँवराई। सब सुपास सब भाँति सुहाई।। कौसिक कहेउ मोर मनु माना। इहाँ रहिअ रघुवीर सुजाना।।___अर्थ___एक सुन्दर सब भाँति की सुविधापूर्ण और सुहावने आम के बगीचे को देखकर विश्वामित्रजी ने कहा___हे सुजान रामचन्द्रजी ! मेरा मन कहता है कि यहीं ठहरा जाय।

भलेहिं नाथ कहि कृपानिकेता। उतरे तहँ मुनिवृंद समेता।। विश्वामित्र महामुनि आये। समाचार मिथिलापति पाये।।___अर्थ___बहुत अच्छा, स्वामिन् ! कहकर कृपानिधान रामचन्द्रजी मुनिगणों सहित वहीं उतरे। महामुनि विश्वामित्रजी आये हैं, यह राजा जनक ने सुना।

संग सचिव सुचि भूरि भट, भूसुर बर गुर ज्ञाति। चले मिलन मुनिनायकहिं, समुद्र राई एहि भाँति।।___अर्थ___साथ में निर्मल बुद्धिवाले मंत्री, अनेक योद्धा, उत्तम ब्राह्मण, गुरु तथा जाति के लोगों को लेकर विश्वामित्रजी से मिलने चले।

कीन्ह प्रणाम चरन करि माथा। दीन्ह असीस मुदित मुनिनाथा।। बिप्रवृंद सब आदर बन्दे। जानि भाग्य बड़ राउ अनंदे।।___अर्थ___राजा के चरणों पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। तब मुनिनाथ ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया। फिर राजा ने सब ब्राह्मणों को आदरपूर्वक प्रणाम किया और अपने भाग्य को बड़ा जानकर प्रसन्न हुए।

कुसल प्रश्न कहि बारहिं बारा। विश्वामित्र नृपहि बैठारा।। तेहि अवसर आये दोउ भाई। गये रहे देखन फुलवाई।।___अर्थ___विश्वामित्रजी ने बार_बार कुशल पूछकर राजा को बैठाया। उसी समय दोनों भाई भी आ गये जो फुलवारी देखने गये थे।

स्याम गौर मृदु बयस किसोरा। लोचन सुखद बिश्व चितचोरा।। उठे सकल जब रघुपति आये। बिश्वामित्र निकट बैठाये।।___ अर्थ___वे दोनों श्याम और गौर_वर्ण, कोमल अंग, किशोर अवस्थावाले, नेत्रों को सुख देनेवाले और संसार के चित्त को चुरानेवाले थे। जब राजकुमार आये तो सभी उठ खड़े हुए, मुनि ने उन्हें अपने पास बैठाया।

भये सब सुखी देखि दोउ भ्राता। बारि बिलोचन पुलकित गाता।। मूरति मधुर मनोहर देखी। भयउ बिदेहु बिदेहु बिसेषी।।___ अर्थ___दोनों भाइयों को देखकर सब सुखी हुए। नेत्रों में जल भर आया और शरीर पुलकायमान हो गया। मनोहर माधुरी मूर्ति का दर्शन करके विदेह जनक विशेष रूप से देह की सुध भूल गये।

प्रेम मगन मनु जानि नृप, करि बिबेकु धरि धीर।। बोले मुनि पद नाइ सिरु, गदगद गिरा गभीर।।___ अर्थ___अपने,मन को प्रेम में मगन जानकर ज्ञान का आश्रय लेकर राजा जनक मुनि को प्रणाम करके गद्गद् और गम्भीर बाणी में बोले___

कहहु नाथ सुन्दर दोउ बालक। मुनिकुल तिलक कि नृपकुल पालक।। ब्रह्म जो निगम नेति कहि गावा। उभय बेष धरि कि सोइ आवा।।___ अर्थ____हे नाथ ! कहिये, दोनों सुन्दर बालक मुनिकुल के आभूषण हैं या राजकुल पालक हैं ?  अथवा बेद जिस ब्रह्म को ‘नेति’ कहकर गाते हैं वही क्या दो स्वरूप धरकर आया है?

सहज बिरागरूप मन मोरा। थकित मोर जिमि चन्द्र चकोरा।। ताते प्रभु पूछेउँ सतिभाऊ। कहहु नाथ जनि करेहु दुराऊ।।___ अर्थ___मेरा मन जो स्वभाव से ही वैराग्यरूप है, वह इनके दर्शन से ऐसा मुग्ध हो रहा है जैसे चन्द्रमा को देखकर चकोर। इससे हे प्रभु ! मैं सच्चे भाव से पूछता हूँ, हे नाथ ! कहिये, छिपाव मत कीजिये।

इन्हहिं बिलोकत अति अनुरागा। बरबस ब्रह्म सुखहिं मन त्यागा।। कह मुनि बिहसि कहेहु नृप नीका। बचन तुम्हार न होइ अलीका।।___ अर्थ___इन्हें देखते ही मेरे मन ने प्रेम के कारण ब्रह्मानन्द को छोड़ दिया है। मुनि ने हँसकर कहा___ हे राजन् ! आपने ठीक कहा। आपका वचन मिथ्या नहीं हो सकता।

ये प्रिय सबहिं जहाँ लगि प्रानी। मनु मुसुकाहिं रामु सुनि बानी।। रघुकुलमनि दसरथ के जाए। मम हित लागि नरेस पठाए।।___अर्थ____संसार में जितने जीव हैं ये सभी को प्रिय हैं। यह सुनकर रामजी मन में मुसकराये। रघुवंशियों में श्रेष्ठ महाराज दशरथजी के राजकुमार हैं। मेरे हित के लिये राजा ने इन्हें मेरे साथ भेजा है।



रामु लखनु दोउ बन्धुबर, रूप सील बलधाम।। मख राखेउ सबु साखि जगु, जीति असुर संग्राम।।___ अर्थ____ये राम और लक्ष्मण दोनों श्रेष्ठ भाई रूप, शील और गुणों के स्थान हैं। सब जगत् इस बात का साक्षी है कि इन्होंने मेरे यज्ञ की रक्षा की और युद्ध_क्षेत्र में असुरों को जीता है।




मुनि तब तपन देखि कह राऊ। कही न सकऊँ निज पुण्य प्रभाऊ।। सुन्दर श्याम गौर कोई भ्राता। आनंदहूँ के आनंददाता।।___ अर्थ___ राजा ने कहा___हे मुनि ! आपके चरणों के दर्शन करके मैं अपने पुण्य का प्रभाव नहीं कह सकता। ये सुन्दर साँवरे और गोरे दोनों भाई आनन्द को भी आनन्द देनेवाले हैं।

Friday, 22 February 2019

बालकाण्ड

तासु तनय दिलीप नृप भयऊ। बन तप हेतु उतर दिसि गयऊ।। तहाँ अगम तप कीन्ह नृपाला। भये कालबस गये कछु काला।।___अर्थ___अंशुमान का पुत्र राजा दिलीप हुआ। तब अंशुमान भी उत्तर की ओर तप करने बन में चले गये। वहाँ उन्होंने कठिन तप किया और समय बीतने पर शरीर त्याग दिया।

कहहुँ कवन दिलीप प्रभुताई। सेवैं सकल नृपति जेहि आई। जुगवत जेहिं नित सुरपति रहहीं। महिमा तासु कौन कवि कहहीं।।___अर्थ___दिलीप की प्रभुता क्या वर्णन करूँ ? जिनकी सब राजा आकर सेवा करते थे, जिनका सुख स्वयं इन्द्र भी देखते थे, उनकी महिमा का वर्णन कवि कैसे कर सकता है।

भयो भगीरथ अस सुत जासू। पितु सम प्रीति अधिक उर तासू।। तिनहिं बोलि नृप दीन्हेउ राजू। आप चले उठि तप के काजू।।___अर्थ___दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए जिनके हृदय में पिता के समान अत्यन्त ही प्रेम था। राजा ने उनको बुलाकर राज्य दिया और आप उठकर तप के लिये वन को चल दिये।

मन महँ करत पंथ अनुमाना। सुरसरि आव तजउँ तनु प्राना।। पितु मन तन दीन्हेउ तिमि देऊँ। फिरि निज नगरक नाम न लेऊँ।।___अर्थ___वे मार्ग में अपने मन विचार करते हुए चले कि या तो गंगाजी को लाऊँगा या प्राण ही दे दूँगा, जैसे पिताजी ने तन मन दे दिया वैसे ही मैं दे दूँगा और लौटकर नगर का नाम भी नहीं लूँगा।

यहि बिधि करत बिचार, नृप कीन्हे अति प्रबल तप।। बीते कुछ एक काल, देह तजि कोउ प्रकट नहिं।।___अर्थ___ यह विचार करके तब राजा दिलीप ने प्रबल तप किये। अपार समय बीतने पर देह त्याग दिया परन्तु कोई देवता प्रगट न हुआ।

जेहि सुरसरि लगि तजि तनु भूपा। सो तजि मूढ पियहिं जलकूपा।। इहाँ भगीरथ अस मन भयऊ। पितु न आव बहु दिन चलि गयऊ।।___अर्थ___ जिन गंगाजी के निमित्त राजाओं ने शरीर त्याग दिये, उनको छोड़कर मूर्खलोग कुएँ का जल पीते हैं। यहाँ भगीरथ ने मन में विचार किया कि बहुत दिन बीत गये, पिताजी नहीं आए।

नाम कुकुत्स्थ तनय एक रहेऊ। दीन्हा राज नीति बहु कहेऊ।। कहि सब पूर्व कथा सुत पांहा। दीन्ह असीस चले नरनाहा।।___ अर्थ___काकुत्स्थ नामक भगीरथ के एक पुत्र था, उसे राज्य दिया और भगीरथ ने उसे अनेक राजनीति समझाई। पूर्व की कथा पुत्र से कही और आशीष देकर राजा चले गये।

निकसत नगर शकुन भल पाये। अति हिनि विड़वन जहँ नृप आये।। देखि भगीरथ वन सुख पावा। सुरसरि हित कहँ मन लावा।।___अर्थ___नगर से निकलते ही सुन्दर शकुन मिले और राजा अत्यन्त घने वन में आये।
भगीरथ ने वन को देखकर सुख पाया और गंगाजी को लाने के लिये तप में मन लगा दिया।

एक चरण दोउ भुजा उठाये। रवि सन्मुख चितवहिं मन लाये।। वर्ष सहस बीते अहि भाँती। जात न जाने दिन अरु रातीं।।___अर्थ____एक पैर और दोनों भुजाएँ उठाये हुए मन लगाकर सूर्य की ओर देखने लगे। इस तरह एक हजार वर्ष बात गये परन्तु उन्होंने दिन रात जाते हुए नहीं जाना।

देखि उग्र तप अज चलि आये। बोले बचन नृपहिं मन भाये।। चहहिं नृपति जो लै वरदाना। बोले नृप करि अजहिं प्रणामा।।___अर्थ___राजा का घोर तप देखकर ब्रह्माजी चले आये और राजा से मनोहर वचन बोले___हे राजन् ! जो चाहे सो वरदान लो। तब प्रणाम करके चतुर राजा बोले___

जो मागो सो जानत अहहू। सो मन माँगन प्रभु पुनि कहहू।।____अर्थ___हे प्रभु ! जो मैं माँगने चाहता हूँ सो आप जानते हैं। फिर मुझसे माँगने को क्यों कहते हैं।
तदपि कहौं प्रभु देहु वर, सब सन्तन कर वृद्धि। दूसर माँगहुँ जोरि कर, गंगा आवहिं सिद्धि।।___अर्थ___हे प्रभु ! तो भी मैं कहता हूँ कि यह वर दीजिये कि सब संतों की वृद्धि हो और दूसरा वर हाथ जोड़कर यह माँगता हूँ कि सिद्धि की दाता गंगाजी भूतल पर आवें।।

एवमस्तु कहि पुनि विधि कहहीं। सुरसरि देहुँ राखि को सकहीं।। छूट जाहि पुनि तुरत रसातल। फिरहिं न नृपति बहुरि सुनु भूतल।।___अर्थ___’ऐसा ही होगा’ यह कहकर ब्रह्माजी फिर बोले कि गंगाजी को तो ला दूँगा, पर उसे धारण कौन कर सकेगा ? छूटते ही वह तुरंत पाताल को चली जावेंगी और फिर पृथ्वी पर वापस न लौटेंगी।

तेहि ते कहौं एक तोहि पाहीं। अति दयालु शंकर जग माहीं।। सोई शंकर रखि सुरसरि आजू। उनहिं जपे तव होइहैं काजू।।___अर्थ____इस कारण एक बार आपसे कहता हूँ कि जगत् में शिवजी बड़े दयालु हैं। आज वे ही शिवजी गंगाजी को धारण कर सकते हैं। अतः उनका नाम जपने से ही आपका कार्य होगा।

अस कहा बिधि अंतरहित भये। बहुरि भगीरथ शिव पहिं गये।। बिबुध बर्ष अंगुष्ठ अधारा। बार बार शिव नाम उचारा।।___अर्थ____यह कहकर ब्रह्माजी अन्तर्धान हो गये और भगीरथ शिवजी के पास गये। वे देवताओं के वर्ष तक अंगूठे के आधार पर खड़े रहे और बारम्बार शिवजी का नाम उच्चारण किया।

शिव दयालु प्रगटे तब आई। हाथ जोरि नृप विनय सुनाई।। मैं राखी सुरसरि कह ईशा। बहुरि रमापति ध्यान करीशा।।___अर्थ___ तब दयालु शिवजी आकर प्रगट हो गए, तब राजा ने हाथ जोड़कर विनती की। शिवजी बोले कि मैं गंगाजी को धारण करूँगा। फिर वे भगवान का ध्यान करने लगे।

उहाँ देवसरि शिव वचन, सुनि मन कीन्ह विचार। जाउँ रसातल शिव सहित, जात न लावों बार।।___अर्थ___ब्रह्मलोक में गंगाजी ने शिवजी का वचन सुनकर मन में विचार किया कि मैं शिवजी सहित पाताल चली जाऊँगी, जाते देर नहीं लगाऊँगी।

अन्तर्यामी शिवहिं उपाई। निज सिर जटा सो अगम बनाई।। यहाँ भगीरथ अस्तुति कीन्हीं। सुनि मृदु गिरा छाँड़ि बिधि दीन्हीं।।___अर्थ___अन्तर्यामी शिवजी ने यह उपाय किया कि अपने सिर पर अगम जटा बनाई। इधर भगीरथ के स्तुति करने पर कोमल वाणी सुनकर ब्रह्माजी ने गंगाजी को छोड़ दिया।

छूटे शोर भयउ जग भारी। चकित देव अहि दिग्गज चारी।। सुरसरि पुनि हर जटा समानी। वर्ष एक तहँ रही भुलानी।।___अर्थ___गंगाजी के छूटने पर जगत् में भारी शोर हुआ, देवता, शेषजी और दिग्गज भी चकित हो गये। फिर गंगाजी शिवजी की जटाओं में समा गयीं और एक वर्ष तक ( जटाओं में ) भुला रहीं।

कौतुक देखि सकल सुर हरषे। कहि जय जयति सुमन बहु बरसे।। बहुरि भगीरथ सुमिरन कीन्हा। डारि जटा शिव बुन्दक दीन्हा।।___अर्थ___यह कौतुक देखकर सब देवता प्रसन्न हुए और ‘ जय_जय कहकर बहुत फूल बरसाये। फिर भागारथी ने शिवजी का स्मरण किया तो शिवजी ने एक बूँद छोड़ दी।

जेहि ते भईं तीनि पुनि धारा। एक गई नभ एक पतारा।। गगन भाँति भइ अघ नासिनि। देवन धरा नाम मंदाकिनी।।___अर्थ___उस बूँद से फिर तीन धारा प्रकट हुईं, एक आकाश और एक पाताल हो गई। पाप को नष्ट करनेवाली जो धारा आकाश को गई, उसका नाम देवताओं ने मंदाकिनी रखा।



दूसरि गईं पताल, नाम प्रभावति हरण दुख। तीसरि गंग विशाल, सब सन्तन को करन सुख।।___अर्थ___दूसरी धारा पाताल को गई, जिसका नाम ‘प्रभावती’ है और जो सब दुःखों को हरनेवाली है। तीसरी धारा गंगाजी हैं जो सब संतों को सुख देनेवाली हैं।




जल प्रवाह निकसत नृपति, उर अति भयो अनंद। जैसे उमरत सिंधु तब, पूर्ण कला लखि चन्द।।___अर्थ___ जल का प्रवाह देखकर राजा भगीरथ के हृदय में अत्यन्त आनन्द हुआ जैसे पूर्ण चन्द्रमा को देखकर समुद्र उमड़ पड़ता है।



आय भगीरथ पुनि सिर नाये। बोली सुरसरि बचन सुहाये।। वेगवन्त नृप रथ लै आनू। तुरग तुरग शुभ गति जिमि भानू।।___अर्थ___फिर भगीरथ ने आकर सिर नवाया। तब गंगाजी सुन्दर वचन बोलीं___ हे राजा, शीघ्रगामी रथ ले आओ जिसके घोड़ों की गति सूर्य के घोड़ों के समान श्रेष्ठ हो।



तेहि रथ चढ़ि नृप चले मम आगे। चलिहौं मैं तव पीछे लागे।। सुनि नृप दिव्य तुरग रथ आना। चले हृदय सुमिरत भगवाना।।___अर्थ___उस रथ पर चढ़कर हे राजन् ! आप मेरे आगे चलिये और मैं आपके पीछे चलूँगी। यह सुनकर राजा तुरंत सुन्दर घोड़ों से युक्त रथ ले आये और मन में भगवान का स्मरण करते हुए चले।



चली अग्र करि नृपहिं सुरसरी। देवन मुदित सुमन झरी करी।। चलत तेज कछु बरनि न जाई। टूटि गिरहिं तरु शैल सुहाई।।___अर्थ___राजा को आगे करके गंगाजी चलीं और देवताओं ने प्रसन्न होकर फूल बरसाये। चलने में उनके तेज की कुछ वर्णन नहीं किया जाता। पर्वत वृक्ष और छोटी शिलायें टूटती हैं।



करैं कुलाहल सब बहु भाँती। कमठ नक्र झषब्याल सोमाती।। मज्जन करहिं देव तहँ आई। मुनि गति सिद्ध रहे सब छाई।।___अर्थ___कछुए, मगर, मछली व सर्प मतवाले होकर अनेक शब्द करते हैं। देवता वहाँ आकर स्नान करते हैं। गंगाजी की ऐसी महिमा सुनकर सब सिद्धों ने उनके तट पर आश्रम बनाये।



तर्पण कर मन लाय, हर्ष हृदय नहिं जात कहि। दर्शन से अघ जाय, तरैं सकल मुनिजन कहै।।___अर्थ___मन लगाकर तर्पण करने से हृदय में अवर्णनीय आनन्द होता है। मुनिजन कहते हैं कि गंगाजी के दर्शन से ही पाप छूट जाते हैं और शीघ्र ही तर जाते हैं।



मज्जन कर हरषाय, सुर अजादि सनकादि ऋषि। पान करत अघ जाय, अस मत सब कोऊ कहैं।।___अर्थ___गंगाजी से स्नान करके देवता, ब्रह्माजी तथा सनकादिक ऋषि भी प्रसन्न होते हैं और पान करने से सब पाप दूर हो जाते हैं__ ऐसा मत सब कोई कहते हैं।



करै जे मज्जन तप मन लाई। तिनकी महिमा कहि न सिराई।। रथ पर जात सोह नृप कैसे। तेजवन्त रवि देखिय जैसे।।___अर्थ___जो मन लगाकर स्नान, जप करते हैं उनकी महिमा कही नहीं जाती। रथ पर जाते हुए राजा कैसे सुशोभित हैं जैसे तेजवन्त सूर्य दीख पड़ें।



लाँघे शैल सुहावने देसा। पाछे सुरसरि अग्र नरेसा।। हरिद्वार समीप जब आये। तीर्थ देखि सुरसरि मन भाए।।___अर्थ____पहाड़ और सुन्दर देश लाँघते हुए राजा और पीछे गंगाजी चले आते हैं। जब हरिद्वार के निकट आये तो तीर्थ देखकर गंगाजी का मन प्रसन्न हो गया।



तीर्थ निरखि मन भा सुख भारी। आदि प्रयाग पहुँचि अघहारी।। तहँ मज्जन कीन्हे अघ जाई। बहुरि देवसरि काशी आई।।___अर्थ___तीर्थ देखकर मन में बड़ी प्रसन्नता हुई। फिर पाप हरनेवाली गंगाजी आदि प्रयाग में पहुँची। वहाँ स्नान करने से सब दुःख छूट जाते हैं। फिर गंगाजी काशीजी में आईं।



सो शिवपुरी सहज सुखदाई। बरनि न जाई मनोहरताई।। औरौं तीर्थ विविध विधि जानी। गई तहाँ किमि कहौं बखानी।।___अर्थ___वह शिवजी की पुरी स्वाभाविक ही सुखदायिनी है जिसकी मनोहरता कही नहीं जाती और भी अनेक तीर्थ जानकर गंगाजी वहाँ गईं जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।



नगर लोगन कहँ करत सनाथा। जाइ चली इहि विधि रघुनाथा।।___अर्थ___ हे रामचन्द्रजी,  मार्ग के लोगों को सवार करती हुई इस प्रकार गंगाजी चली जाती है।


मिली जाई पुनि उदधि महँ, उदधि हृदय सुख मान।। लगे कहन भागीरथहिं, तुम सम धन्य न आन।।___अर्थ___इस प्रकार से वे समुद्र में जाकर मिलीं। तब समुद्र मन में प्रसन्न होकर भगीरथ की बड़ाई करने लगे कि आपके समान धन्य दूसरा कोई नहीं है।



कीन्हों अस जस करहि न कोई। तप महिमा बल कस न होई।। सगर तनय तारे ततकाला। हर्षवन्त तब भरे नृपाला।।___अर्थ___आपने ऐसा तप किया जैसा कोई नहीं करेगा। तप के बल की महिमा ऐसी क्यों न हो ? स्तर सके पुत्र तो उसी समय तर गये। तब राजा बड़ा प्रसन्न हुआ।



अबलौं रहे जो कुल महँ कोऊ। तिनके संग तरे अब सोऊ।। तुम समान नृप और न भयऊ। जग विख्यात अचल यश लयऊ।।___अर्थ___और जो अबतक कोई कुल में तरने से शेष रहे उनके साथ अब वे भी तर गए। आपके समान और कोई राजा नहीं हुआ, आपने जग विख्यात अचल यश प्राप्त किया है।



सकल सुरन्ह सँग तहाँ विधाता। नृप सन आय कही अस बाता।। धन्य भगीरथ जश यश लयऊ। तुम समान नृप अवर न भयऊ।।___अर्थ___वहाँ सब देवताओं को साथ लेकर ब्रह्माजी आये और राजा से यह बात कही_धन्य हो भगीरथ ! जगत् में आपने बड़ा यश पाया, आपके समान और कोई नृप नहीं हुआ।



आपनि सत्य प्रतिज्ञा कियऊ। सम्मत वेद जनत सुख दयऊ।। गंगासागर सब कोई कहहीं। अघ उलूक देखत रवि डरहीं।।___अर्थ___आपने प्रतिज्ञा सत्य की और संतजनों को सुख दिया। इस स्थान को सब कोई गंगासागर कहेंगे और पापरूपी उल्लू सूर्यरूपी गंगासागर से डरेंगे।

भागारथी नाम अरु कहहीं। सुनि सुर सिद्ध नाग यश लहहीं।। अस विधि कहि निज लोकहि आये। यहाँ भगीरथ अति सुख पाये।।___अर्थ___और गंगाजी को ‘भागारथी’ भी कहेंगे जिसे सुनकर देवता, सिद्ध और नाग यश लेंगे। ऐसा कहकर ब्रह्माजी अपने लोक को चले गये और भगीरथ ने बड़ा सुख पाया।



पायो अमितसुख बहुरि पूजेउ सुरसरिहीं मन लायकै। तब दीन्ह आशिष समुद्र गंगा नृप गयो सुख पाइकै।। इहि भाँति सुनि गंगा कथा तब राम ऋषि चरणन नये। कह दास तुलसी राम लखनहिं महामुनि आशिष दये।।___अर्थ___तब भगीरथ ने बड़ा सुख पाया और मन लगाकर गंगाजी की फिर पूजा की। तब गंगाजी ने प्रसन्न होकर आशीष दी और राजा सुख पाकर घर को गये। इस भाँति गंगाजी की कथा सुनकर श्रीरामजी मुनि विश्वामित्र के चरणों में प्रणाम किये। तब महामुनि ने श्रीराम लक्ष्मण को आशीर्वाद दिया।



कौसिक आशिष अमिय सम, पाय हरषि रघुनाथ। प्रभु संशय सब इमि गई, लवा निरखि जिमि बाज।।___अर्थ___ विश्वामित्रजी का अमृत के समान आशीर्वाद पाकर श्रीरामजी प्रसन्न हुए और उनके सब संदेह ऐसे जाते रहे जैसे बाज को देखकर बटेर उड़ जाते हैं।



आशिष सुधा समान सुनि, हर्ष श्रीरघुनाथ। अति सुख पाइ कहेउ पुनि, बेगि चलिय मुनिनाथ।।___अर्थ____ श्रीरामजी अमृत के समान आशिष सुनकर बड़े प्रसन्न हुए और फिर सुख पाकर बोले__ हे मुनिनाथ ! शीघ्र चलिये।