Thursday, 12 September 2019

बालकाण्ड

कटि पट पीत धर, सुषमा सील निधान। देखि भानुकुलभूषनहिं, बिसरा सखिन्ह अपान।।___अर्थ___ सिंह की_सी पतली कमर में पीताम्बर धारण किये, शोभा और शील के भूषण श्रीरामचन्द्रजी को देखकर सखियाँ अपने आप को भूल गईं।

धरि धीरजु एक आलि सयानी। सीता सन बोली गहि पानी।। बहुरि गौरि कर ध्यान करेहू। भूपकिसोर देखि किन लेहू।।___अर्थ____एक चतुर सखी धीरज धरकर और हाथ पकड़कर सीताजी से बोली___ पार्वतीजी का ध्यान फिर कर लेना राजकुमारों को क्यों नहीं देख लेतीं।

सकुचि सीयँ तब नयन उघारे। सन्मुख दोउ रघुसिंघ निहारे।। नख सिख देखि राम कै सोभा। सुमिरि पिता पनु मनु अति छोभा।।___अर्थ____ तब सीताजी ने सकुचाकर आँखें खोलीं और अपने सामने दोनों रघुवंशी सिंहों को देखा। नख से चोटी तक श्रीरामचन्द्रजी की शोभा देखकर और पिता का पन  स्मरण करके उनका मन बहुत घबराया।

पर बस सखीन्ह लखी जब सीता। भयउ गहरु सब कहहिं सभीता।। पुनि आउब एहि बेरिया काली। अस कहि मन बिहँसि एक आली।।___ अर्थ___ सखियों ने जब सीताजी को विवश देखा तब सब डरकर कहने लगीं___ बहुत देर हो गयी है। कल इसी समय फिर आवेंगी ऐसे कहकर एक सखी मन मेंहँसी।

गूढ़ गिरा सुनि सिय सकुचानी। भयऊ बिलम्बु मातु भय मानी।। धरि बड़ि धीर रामु उर आने। फिरि अपनपउ पितु बस जाने।।___ अर्थ___ सखी की गूढ़ बाणी सुनकर सीताजी लज्जित हुईं और बिलम्ब हुआ जानकर माता ने डर माना। फिर धीरज कर रामचन्द्रजी को हृदय में ले आईं और अपने को पिता के वश में जानकर लौटीं।

देखन मिस मृग बिहग तरु, फिरइ बहोरि बहोरि। निरखि निरखि रघुवीर छबि, बाढ़इ प्रीति न थोरि।।___ अर्थ___ पशु, पक्षी और वृक्षों को देखने के बहाने सीताजी बारम्बार लौटती हैं और रामचन्द्रजी की छबि को देखकर उनकी प्रीति बहुत बढ़ती जाती है।

जानि कठिन सिब चाप बिसूरति। चलि राखि उर स्यामल मूरति।। प्रभु जब जात जानकी जानी। सुख सनेह सोभा गुन खानी।।__ अर्थ___शिवजी के धनुष को कठोर जानकर सीताजी सुख पाती हुईं श्रीरामजी की साँवली मूर्ति हृदय में रखकर चलीं। प्रभु ने जब सुख, स्नेह, शोभा और गुण की खान जानकी को जाते हुए जाना।

परम प्रेममय मृदु मसि कीन्ही। चारु चित्त भीतीं लिखि लीन्ही।। गई भवानी भवन बहोरी। बन्दि चरन बोली कर जोरी।।___ अर्थ____ तब पूर्ण प्रेमरूपी उत्तम स्याही से अपने हृदय पट पर उनका स्वरूप चित्रित कर लिया। सीताजी फिर पार्वतीजी के मन्दिर में गईं और चरणों में प्रणाम कर हाथ जोड़कर बोलीं___

जयजयजय गिरिराजकिसोरी। जय महेस मुख चन्द्र चकोरी।। जय गजबदन षडानन माता। जगतजननि दामिनि दुति गाता।।___ अर्थ___हे गिरिराजकिशोरी पार्वती ! आपकी जय हो ! हे महादेवजी के मुखरूपी चन्द्रमा की चकोरी ! आपकी जय हो। हे हाथी के मुखवाले गणेशजी और छ: मुखवाले स्वामी कार्तिकेयजी की माता ! हे जगदम्बा ! हे बिजली के समान प्रकाशित शरीरवाली ! आपका जय हो।

नहिं तव आदि  मध्य अनुमाना। अमिति प्रभाउ बेदु नहिं जाना।। भव भव विभव पराभवकारिनि। बिश्वबिमोहनि स्वबस बिहारिनि।।___अर्थ___आपका आदि, मध्य और अन्त नहीं है, वेद भी आपकी महिमा को नहीं जानते। आप संसार को उत्पन्न, पालन और नाश करनेवाली ! आपकी जय हो।


पतिदेवता सुतीय महुँ, मातु प्रथम रन रेख। महिमा अमित न सकहि कहि, सहस सारदा सेष।।___ अर्थ____ हे माता ! पति को देवता माननेवाली श्रेष्ठ स्त्रियों में आपकी पहली गिनती है। हजारों सरस्वती और शेषजी भी आपकी अनंत महिमा का वर्णन नहीं कर सकते।

सेवत तोहि सुलभ फल चारी। बरदायनी पुरारि पियारी।। देबि पूजी पद कमल तुम्हारे। सुर नर मुनि सब होहिं सुखारे।।____अर्थ___ हे वर देनेवाली ! हे त्रिपुरारी शिवजी की प्रियतमा ! आपकी सेवा करने से चारों फल सुलभ हो जाते हैं। हे देवि ! आपके चरण_कमल पूजने से देवता, मनुष्य और मुनि सब सुखी होते हैं।


मोर मनोरथ जानहु नीके। बसहु सदा उरपुर सबही के।। कीन्हेहु प्रकट न कारन तेहीं। असि कहि चरण गहे बैदेही।।___ अर्थ___ मेरी मनोकामना आप भली_भाँति जानती हैं क्योंकि आप सदैव सबही के मन मन्दिर में वास करती हैं। इसी कारण मैंने उसको प्रकट नहीं किया। ऐसा कहकर सीता ने उमा के चरण पकड़ लिये।


बिनय प्रेम बस भई भवानी। खसी माल मूरति मुसुकानी।। सादर सियँ प्रसाद सिर धरेऊ। बोली गौरि हरषु हियँ भरेऊ।।___ अर्थ___ श्रीपार्वतीजी सीताजी की विनती और प्रेम के वश में हो गईं। उनकी माला खसक पड़ी और मूर्ति मुसकाई। उसको सीताजी ने आदरसहित सिर पर धारण किया। पार्वतीजी का हृदय आनन्द से भर गया और बोलीं__

सुनु सिय सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।। नारद बचन सदा सुचि साचा। सो वर मिलेउ जाहिं मनु राचा।।___ अर्थ____ हे सीता ! हमारी सच्ची असीस सुनो, तुम्हारी मनोकामना पूर्ण होगी। नारदजी का वचन पवित्र और सत्य है वही वर तुम्हें मिलेगा जिसमें तुम्हारा मन अनुरक्त हो गया है।

मनु जाहि राचेउ मिलिहि सो बरु सहज सुन्दर साँवरो। करुनानिधान सुजान सीलु सनेहु जानत रावरो।। एहि भाँति गौरि असीस सुनि सिय सहित हियँ हरषी अली। तुलसी भवानिहि पूजि पुनि पुनि मुदित मन मन्दिर चली।।___ अर्थ___ जिसमें तुम्हारा मन लगा है, वही स्वभाव से ही सुन्दर साँवला वर तुमको मिलेगा। वह करुणानिधान तथा सर्वज्ञ हैं, तुम्हारे सील और स्नेह को जानते हैं। इस भाँति पार्वतीजी की असीष सुनकर सीताजी हृदय में प्रसन्न होती हुईं भवानी को पूजकर अपने घर को चलीं।

जानि गौरि अनुकूल, सिय हरषु न जाइ कहि। मंजुल मंगल मूल, बाम अंग फरकन लगे।।___ अर्थ___ पार्वतीजी को अनुकूल जानकर सीताजी के हृदयँ में जो आनन्द हुआ वह कहा नहीं जा सकता। सुन्दर मंगलसूचक बायें अंग फरकने लगे।

हृदयँ सराहत सीय लोनाई। गुरु समीप गवने दोउ भाई।। राम कहा सब कौसिक पाहीं। सहज सुभाऊ न छल नाहीं।।___ अर्थ___ सीताजी की सुन्दरता को हृदय में सराहना करते हुए दोनों भाई गुरु के पास गये। रामचन्द्रजी ने सब बात विश्वामित्रजी से कह दिया, क्योंकि वे सरल स्वभाव के हैं, छल तो उन्हें छूता भी नहीं।

सुमन पाइ मुनि पूजा कीन्ही। पुनि असीस दुहु भाइन्हि दीन्ही। सुफल मनोरथ होहुँ तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।___ अर्थ___ फूल पाकर मुनि ने पूजा की। फिर दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिये कि तुम्हारे मनोरथ सफल हों। यह सुनकर श्रीराम_ लक्ष्मण सुखी हुए।

करि भोजनु मुनिबर विग्यानी। लगे कहन कछु कथा पुरानी।। बिगत दिवस गुरु आयसु पाई। सन्ध्या करन चले दोउ भाई।।___ अर्थ___भोजन करके ज्ञानी मुनि कुछ प्राचीन कथा कहने लगे। दिन बीत जाने पर मुनि की आज्ञा पाकर दोनों भाई सन्ध्या करने चले।

प्राची दिसि ससि उयउ सुहावा। सिय मुख सरिस देखि सुख पावा। बहुरि बिचारु कीन्ह मन माहीं। सीय बदन सम हिमकर नाहीं।।___ अर्थ____ पूर्व दिशा से सुन्दर चन्द्रमा उदय हुआ। श्रीरामजी ने उनको सीताजी के मुख के समान देखकर सुख पाया। फिर मन में विचार किया कि सीताजी के मुख के समान यह चन्द्रमा नहीं है।

जनमु सिंधु पुनि बन्धु बिशप, दीन मलीन सकलंक।। सिय सुख समता पाव किमि, चन्दु बापुरो रंक।।___ अर्थ___ जन्म खारे समुद्र से, फिर विष इसका भाई, दिन में तेजहीन, ऐसा बेचारा चन्द्रमा सीताजी के मुख की बराबरी कैसे पा सकता है।

घटइ बढ़इ बिरहिनि दुखदाई। ग्रसई राहु निज संधिहिं पाई।। कोक सोकप्रद पंकज द्रोही। अवगुन बहुत चन्द्रमा तोही।।___अर्थ___फिर यह नित्य घटता बढ़ता है, बिरही लोगों को दुःख देता है, राहु इसे अपनी संधि में पाकर ग्रस लेता है। यह चकवे को दुःख देनेवाला और कमल का बैरी है। हे चन्द्रमा ! तुझमें बहुत से अवगुण हैं।

बैदेही मुख पटतर दीन्हे। होहिं दोषु बर अनुचित कीन्हे।। सिय मुख छबि बिधु ब्याज बखानी। गुरु पहिं चले निसा बड़ि जानी।।___ अर्थ___ सीताजी के मुख की तुमसे उपमा देने में अनुचित कर्म का बड़ा भारी दोष होगा। इस प्रकार सीताजी के मुख की सोभा चन्द्रमा के बहाने से वर्णन कर, बहुत रात हो गई जानकर वे गुरु के पास चले।

करि मुनि चरन सरोज प्रणामा। आयसु पाइ कीन्ह विश्रामा। बिगत निसा रघुनायक जागे। बन्धु बिलोकि कहन अस लागे।।___ अर्थ___ मुनि के चरणकमलों में प्रणाम कर, आज्ञा पाकर उन्होंने विश्राम किया। रात हारने पर श्रीरामचन्द्रजी जागे और भाई को देखकर ऐसा कहने लगे___


उभय अरुन अवलोकहु ताता। पंकज कोक लोक सुखदाता।। बोले लखन जोरि जुग पानी। प्रभु प्रभाउ सूचक मृदु बानी।।___अर्थ____ हे तात ! देखो, अरुणोदय हो गया जो कमल, चकवा और संसार को सुख देनेवाला है। यह सुनकर लक्ष्मणजी हाथ जोड़कर प्रभु के प्रभाव को प्रकट करनेवाली मधुर वाणी बोले__

अरुणोदय सकुचे कुमुद, उडगन जोति मलीन। जिमि तुम्हार आगमन सुनि, भए नृपति बलहीन।।___ अर्थ___ जैसे अरुणोदय होने से कुमुदिनी सकुचा गई है और तारागणों की ज्योति मन्द पड़ गयी है, इसी प्रकार आपका आना सुनकर राजालोग निर्बल हो गये हैं।

नृप सब नखत करहिं उजियारी। टारि न सकहिं चापतम भारी।। कमल कोक मधुकर खगनाना। हरषे सकल निसा अवसाना।।___अर्थ___ सब राजालोग तारों के समान उजाला कर तो हैं परन्तु वे धनुषरूपी घोर अन्धकार को नहीं मिटा सकते। कमल, चकवा, भौंरे और अनेक पक्षी रात बीत जाने पर जैसे प्रसन्न हो गये हैं,

ऐसेहिं प्रभु सब भगत तुम्हारे। होइहहिं टूटे धनुष सुखारे।। उयउ भानु बिनु श्रम तम नासा। दुरे नखत जग तेजु प्रकासा।।___अर्थ____ इसी प्रकार हे स्वामी ! आपके सब भक्त धनुष टूटने पर सुखी होंगे। सूर्य के उदय होने से बिना परिश्रम अन्धकार का नाश हो गया, तारे छिप गए, संसार में तेज का प्रकाश फैल गया।

रवि निज उदय ब्याज रघुराया। प्रभु प्रतापु सब नृपन्ह दिखाया।। तव भुजबल महिमा उदघाटी। प्रगटी धनु बिघटन परिपाटी।।___ अर्थ____ हे रघुनाथजी ! सूर्य ने अपने उदय होने के बहाने से आपका प्रताप सब राजाओं को दिखलाया है। आपकी भुजाओं के बल को प्रकट करने के लिये ही धनुष तोड़ने की प्रथा चली है।

बन्धु बचन सुनि प्रभु मुसुकाने। होइ सुचि सहज पुनीत नहाने।। नित्यक्रिया करि गुरु पहिं आये। चरन सरोज सुभग सिर नाये।।___अर्थ___भाई के वचन सुनकर प्रभु मुसकाए। फिर शौच क्रिया से निवृत होकर स्वभाव से ही पवित्र रामजी ने स्नान किया।


सतानन्द तब जनक बोलाये। कौसिक मुनि पहिं तुरत पठाये।। जनक बिनय तिन्ह आइ सुनाई। हरषे बोलि लिये दोउ भाई।।___ अर्थ____ तब राजा जनकजी ने सतानन्दजी को बुलाया और तुरन्त विश्वामित्र मुनि के पास भेजा। उन्होंने आकर जनकजी की विनती सुनाई। विश्वामित्रजी ने प्रसन्न होकर दोनों भाइयों को बुलाया।

सतानन्द पद बन्दि प्रभु, बैठे गुरु पहिं जाइ। चलहु तात मुनि कहें तब, पठवा जनक बोलाइ।।___अर्थ___सतानन्दजी के चरणो में प्रणाम कर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी गुरु के पास जा बैठे। तब मुनि ने कहा___ हे तात ! चलो राजा जनकजी ने बुलावा भेजा है।

सीय स्वयंवर देखिय जाई। ईस काहि धौं देइ बड़ाई।। लखन कहा जग भाजनु सोई। नाथ कृपा तव जा पर होई।।___अर्थ___ अब सीताजी का स्वयंवर जाकर देखना चाहिये, ईश्वर किसको बड़ाई देते हैं। लक्ष्मणजी ने कहा___ हे नाथ ! वही यश का पात्र होगा जिस पर आपकी कृपा होगी।

हरषे मुनि सब सुनि बर बानी। दीन्ह असीस सबहिं सुखु मानी।। पुनि मुनिबृन्द समेत कृपाला। देखन चले धनुष मखसाला।।___अर्थ___सब मुनि सुन्दर वाणी सुनकर प्रसन्न हुए। सबने खुश होकर आशीर्वाद दिया। फिर मुनिमण्डली सहित कृपालु रामजी धनुष_यज्ञशाला देखने चले।

रंगभूमि आये दोउ भाई। असि सुधि सब पुरबासिन्ह पाई।। चले सकल गृह काज बिसारी। बाल जुबान जरठ नर नारी।।___अर्थ____रंगभूमि में दोनों भाई आये हैं, यह समाचार जब नगरवासियों ने पाया तो सब बालक, युवा, बूढ़े_नर, सभी घर का राम छोड़कर चले।

देखी जनक भीर भै भारी। सुचि सेवक सब लिये हँकारी।। तुरत सकल लोगन्ह पहिं जाहू। आसन उचित देहु सब काहू।।___ अर्थ____ जनकजी ने देखा कि बड़ी भीड़ हो गयी है, तब सब सेवकों को बुलाकर कहा___ तुम सब तुरन्त लोगों के पास जाओ और सबको यथायोग्य आसन दो।

कहि मृदु बचन बिनीत तिन्ह, बैठारे नर नारि। उत्तम मध्यम नीच लघु, निज निज थल अनुहारि।।___ अर्थ___उन्होंने विनयपूर्वक मधुर वचन कहकर उत्तम, मध्यम, नीच, लघु सब स्त्री_ पुरुषों को अपने_अपने योग्य स्थान पर बैठाया।

राजकुँवर तेहि अवसर आये। मनहुँ मनोहरता तन छाये।। गुन सागर नागर बर बीरा। सुन्दर स्यामल गौर सरीरा।।___ अर्थ___उसी समय राजकुमार आ पहुँचे। मानो मनोहरता उनके शरीरों पर छायी हो। वे गुणों के समूह, चतुर, शूरवीरों में श्रेष्ठ, सुन्दर साँवेर शरीरवाले हैं।

राज समाज विराजत रूरे। उडगन महुँ जनु जुग बिधु पूरे।। जिन्हकें रही भावना जैसी। प्रभु मूरति तिन्ह देखी तैसी।।___ अर्थ___ वे राजाओं के समाज में ऐसे सुशोभित हैं जैसे तारागणों में दो पूर्ण चन्द्रमा हों। जिनकी जैसी भावना थी, उन्होंने प्रभु की मूर्ति वैसी ही देखी।


देखहिं रूप महा रनधीरा। मनहुँ बीर रसु धरें सरीरा।। डरे कुटिल नृप प्रभुहिं निहारी। मनहुँ भयानक मूरति भारी।।___ अर्थ___बड़े रणधीर राजा प्रभु को ऐसा देख रहे हैं मानो वीर रस शरीर धारण किये हैं। कुटिल राजा प्रभु को देखकर डरे, मानो भयानक मूर्ति हो।

रहे असुर छल जो नृप वेषा। तिन्ह प्रभु प्रगट कालसम देखा।। पुरबासिन्ह देखे दोउ भाई। नरभूषण लोचन सुखदाई।।___अर्थ___ जो असुर छल से राजा के वेष में वहाँ बैठे थे, उन्होंने प्रभु को प्रत्यक्ष काल के समान देखा। पुरबासियों ने दोनों भाइयों को मनुष्यों में शिरोमणि और नयनों को सुख देनेवाला देखा।

नारि बिलोकहिं हरषि हियँ, निज निज रुचि अनुरूप। जनु सोहत सिंगार धरि, मूरति परम अनूप।।___ अर्थ____ स्त्रियाँ हृदय में प्रसन्न हो अपनी_ अपनी रुचि के अनुसार देख रही हैं। मानो श्रृंगाररस बहुत सुन्दर मूर्ति धारण किए शोभायमान हैं।

बिदुषन्ह प्रभु बिराटमय दीखा। बहु मुख पग लोचन सीसा।। जनक जाति अवलोकहिं कैसे। सजन लगे प्रिय लागहिं जैसे।___अर्थ___पण्डितों ने प्रभु को विराट रूप में देखा जिसके बहुत से मुख, चरण, हाथ नेत्र और सिर हैं। जनकजी के सजातियों ने अपने सगे प्रियजन के समान देखा।

सहित बिदेह बिलोकहिं रानी। सिसु सम प्रीति न जाति बखानी।। जोगिन्ह परम तत्वमय भाषा। सान्त सुद्ध सम सहज प्रकासा।।___अर्थ___ जनक सहित रानियाँ उनको पुत्र के समान देखने लगीं, उनकी प्रीति का वर्णन नहीं किया जा सकता। योगियों को वे शान्त, शुद्ध एकरस और स्वभाव से ही प्रकाशित परम तत्व को रूप में दिखे।

हरिभगतन्ह देखे दोउ भ्राता। इष्टदेव इव सब सुख दाता।। रामहिं चितव भाँय जेहि सीया। सो सनेहु सुखु नहीं कथनीया।।___अर्थ___ हरिभक्तों को दोनों भाई इष्टदेव के समान सब सुख देनेवाले जान पड़े। सीताजी श्रीरामचन्द्रजी को जिस भाव से देख रही थी, वह स्नेह और सुख तो कहा ही नहीं जाता।

उर अनुभवति न कहि सक सोऊ। कवन प्रकार कहै कबि कोऊ।। एहि बिधि रहा जाहि जिय भाऊ। तेहिं तस देखे कोसलराऊ।।___ अर्थ___वे उस स्नेह और सुख का हृदय में अनुभव तो करती हैं परन्तु उसे कह नहीं सकतीं। फिर कोई कवि किस प्रकार से उसको कहे ? जिसका जैसा भाव था उसने श्रीरामचन्द्रजी को वैसा ही देखा।

राजत राज समाज महुँ, कोसलराज किसोर। सुन्दर स्याम गौर तन, बिस्व बिलोचन चोर।।___ अर्थ___साँवले और गोरे शरीरवाले और संसार के नेत्रों को चुरानेवाले अयोध्यानरेश के कुमार राजसभा में सुशोभित हैं।

Wednesday, 21 August 2019

बालकाण्ड

उठे  लखन निसि बिगत सुनि, अरुनसिखा धुनि कान। गुरु तें पहिले जगतपति, जागे राम सुजान।।___ अर्थ___रात बीतने पर मुर्गों का शब्द कानों से सुनकर लक्ष्मणजी उठे। श्रीरामचन्द्रजी भी गुरु से पहले ही उठ गये।

सकल सैर करि जाइ नहाये। नित्य निबाहि मुनिहि सिर नाये। समय जानि गुर आयसु पाई। लेन प्रसून चले दोउ भाई।।___अर्थ___नित्यक्रिया से निवृत होकर स्नान किया, फिर मुनि को प्रणाम किया। गुरुजी की आज्ञा पाकर दोनों भाई फूल लेने चले।

भूप बागु बर देखेउ जाई। जहँ बसंत ऋतु रही लोभाई। लागे बिटप मनोहर नाना। बरन बरन बर बेलि बिताना।।___अर्थ___उन्होंने जाकर राजा का सुन्दर बाग देखा, जहाँ बसंत ऋृतु लुभा रही है। उसमें अनेक मनोहर वृक्ष लगे हैं। रंग_बिरंगी लताओं के मण्डप छाये हैं।

नव पल्लव फल सुमन सुहाए। निज संपति सर रूख लजाए।। चातक कोकिल कीर चकोरा। कूजत बिहग नटत कल मोरा।।___ अर्थ___वृक्षों में सुन्दर नये पत्ते और फूल लगे हैं जो अपनी संपत्ति से कल्पवृक्ष को भी लज्जित कर रहे हैं। पपीहा, कोयल, तोता, चकोर आदि पक्षी बोल रहे हैं और मोर भली भाँति से नाच रहे हैं।

मध्य बाग सरु सोह सुहावा। मनि सोपान बिचित्र बनावा। बिमल सलिलु सरसिज बहुरंगा। जल खग कूजत गुंजत भृंगा।___ अर्थ____बाग के बीच में मणि जड़ित विचित्र सीढ़ियों से युक्त सरोवर सुशोभित है। उसके निर्मल जल में अनेक रंग के कमल खिल रहे हैं, जल_पक्षी बोल रहे हैं और भौंरे गूँज रहे हैं।

बागु तड़ागु बिलोकि प्रभु, हरषे बन्धु समेत। परम रम्य आरामु यहु, जो रामहिं सुख देत।।___अर्थ___ बाग और सरोवर को देखकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मण सहित प्रसन्न हुए। यह बाग ( वास्तव में ) परम रमणीय है, जो रामचन्द्रजी को सुख दे रहा है।

चहुँ दिसि चितइ पूँछी मालीगन। लगे लेन दल फूल मुदित मन।। तेहि अवसर सीता तहँ आई। गिरिजा पूजन जननि पठाई।।___अर्थ___ चारों ओर देखकर, मालियों से पूछकर प्रसन्न मन से वे पत्र_पुष्प लेने लगे। उसी समय पार्वती का पूजन करने के लिये माता की भेजी हुई सीताजी वहाँ आईं।

संग सखीं सब सुभग सयानीं। गावहिं गीत मनोहर बानीं।। सर समीप गिरिजागृह सोहा। बरनि न जाई देखि मनु मोहा।।___अर्थ___सीताजी के साथ सब सुन्दर और चतुर सखियाँ मनोहर बाणी से गीत गा रही हैं। सरोवर के पास ही पार्वतीजी का मन्दिर सुशोभित है, जिस की शोभा कही नहीं जाती, देखकर मन मोहित हो जाता है।

मज्जनु करि सर लखन समेता। गई मुदित मन गौरि निकेता।। पूजा कीन्ह अधिक अनुरागा। निज अनुरुप सुभग बरु मागा।।___ अर्थ___जानकीजी सखियों सहित सरोवर में स्नान कर प्रसन्नमन से पार्वतीजी के मन्दिर में गईं। वहाँ बड़े स्नेह से पार्वतीजी की पूजा करके अपने योग्य सुन्दर वर माँगा।

एक सखी सिय संगु बिहाई। गई रही देखन फुलवाई।। तेहिं दोउ बन्धु बिलोके जाई। प्रेम बिबस सीता पहिं आई।।___ अर्थ____ एक सहेली सीताजी का संग छोड़कर फुलवाड़ी देखने गयी थी। उसने आकर दोनों भाइयों को देखा और प्रेम में मगन होती हुई सीताजी के पास आई।

तासु दसा देखीं सखिन्ह, पुलक गातु जल नैन। कहु कारनु निज हरष कर, पूछहिं सब मृदु बैन।।___अर्थ____उनकी दशा सखियों ने देखी कि शरीर पुलकित है और नेत्रों में जल भरा है। सब मधुर वाणी से पूछने लगीं कि अपने आनन्द का कारण बताओ।

देखन बागु कुअँर दुइ आये। बय किसोर सब भाँति सुहाये।। स्याम गौर किमि कहौं बखानी। गिरा अनयन नयन बिनु बानी।।___अर्थ___सखी ने कहा___दो राजकुमार बाग देखने आये हैं, किशोर अवस्था के हैं, सब प्रकार से सुन्दर हैं, श्याम_गौर वर्ण हैं, उनका बखान मैं कैसे करूँ ? वाणी के नयन नहीं हैं और नयन बिना वाणी के हैं।

सुनी हरषीं सब सखी सयानी। सिर हियँ अति उत्कंठा जानी।। एक कहइ नृपसुत तेइ आली। सुने जे मुनि सँग आए काली।।___ अर्थ___ यह सुनकर सीताजी के हृदय में उत्कंठा जानकर सब चतुर सखियाँ प्रसन्न हुईं। एक सखी कहने लगी__ हे सखी !  वे वही राजकुमार हैं जिनको सुना है कि कल मुनि के संग आये हैं।


जिन्ह निज रूप मोहनी डारी। कीन्हे स्वबस नगर नर नारी।। बरनत छबि जहँ तहँ सब लोगू। अवसि देखिअहिं देखन जोगू।।___अर्थ___ जिन्होंने रूप की मोहिनी डालकर जनकपुर में सब नर_नारियों को अपने वश में कर लिया है। उनकी छबि का जहाँ_तहाँ सब लोग वर्णन कर रहे हैं।उन्हें अवश्य देखिये, वे देखने योग्य हैं।

तासु बचन अति सियहिं सोहाने। दरस लागि लोचन अकुलाने।। चली अग्र करि प्रिय सखि सोई। प्रीति पुरातन लखइ न कोई।।___अर्थ___उनके वचन सीताजी को बहुत अच्छे लगे, दर्शन करने के लिये नेत्र बेचैन हुए। उसी समय सखी को आगे करके जानकीजी चलीं। पुरानी प्रीति को कोई जान नहीं सकता।

सुमिरि सिय नारद बचन, उपजी प्रीति पुनीत। चकित बिलोकत सकल दिसि, जनि सिसु मृगी सभीत।।___अर्थ___ नारदजी के वचनों को स्मरण करके सीताजी के हृदय में पवित्र प्रीति उत्पन्न हुई और चकित होकर चारों ओर ऐसे देखने लगी मानें मृगी डरकर इधर_उधर देख रही है।

कंकन किंकिनि नूपुर धुनि सुनी। कहत लखन सम राम हृदय गुनि।। मानहुँ मदन दुन्दुभी दीन्ही। मनसा विश्वविजय कहँ कीन्ही।।____अर्थ____ सीताजी के कंकण, करधनी और पायजेब की ध्वनि सुनकर रामचन्द्रजी हृदय में विचारकर लक्ष्मणजी से कहने लगे___ ऐसा लगता है मानो कामदेव ने संसार जीतने का डंका बजाया है।

अस कहि फिरि चितए तेहि ओरा। सिय मुख ससि भए नयन चकोरा।। भए बिलोचन चारु अचंचल। मनहुँ सकुचि निमि  तजे दिगंचल।।___ अर्थ____ऐसे कहकर फिर उस ओर देखा। सीताजी के मुख रुपी चन्द्रमा के लिये उनके नेत्र चकोर बन गये। सुन्दर नेत्र स्थिर रह गये मानो महाराजा निमि ने लजाकर उनके पलकों पर अपना निवास छोड़ दिया।

देखि सीय सोभा सुखु सोभा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा।। जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई।।____अर्थ____ सीताजी की शोभा देखकर रामजी ने सुख पाया। मन में उसकी बड़ाई करते हैं, पर मुख से कहते नहीं बनता। मानो ब्रह्मा ने अपनी सब चतुरता रचकर संसार में प्रत्यक्ष दिखाई हो।

सुन्दरता कहुँ सुन्दर करई। छबिगृहँ दीपसिखा जनु बरई।। सब उपमा कबि रहे जुठारी। केहिं पटतरौं बिदेहकुमारी।।___अर्थ___वह ( सीताजी की शोभा ) सुन्दरता को भी सुन्दर करती है। मानो कीर्ति रूपी भवन में दीपक की ज्योति हो रही हो। सब उपमाएँ तो कवियों ने झूठी कर डाली हैं, मैं सीताजी की उपमा किससे दूँ।

सिय शोभा हियँ बरनि प्रभु, आपनि दशा बिसारि। बोले सुचि मन अनुज सन, बचन समय अनुहारि।।___अर्थ___ प्रभु हृदय में सीताजी की शोभा का वर्णन कर अपनी दशा को विचारकर पवित्र मन से लक्ष्मणजी से समयानुकूल वचन बोले___।

रात जनकतनया यह सोई। धनुषजग्य जेहि कारन होई।। पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिरइ फुलवाईं।।___अर्थ___ हे भाई ! यह वही जानकी है जिसके कारण धनुष_यज्ञ हो रहा है। पार्वतीजी का पूजन करने के लिये सखियाँ इसे ले आई हैं। यह फुलवारी को प्रकाशित करती फिर रही है।

जासु बिलोकि अलौकिक सोभा। सहज पुनीत मोर मन छोभा।। सो सबु कारन जान बिधाता। फरकहिं सुभग अंग सुनु भ्राता।।___ अर्थ___जिसकी अलौकिक शोभा को देखकर स्वभाव से ही पवित्र मेरा मन क्षुब्ध हो गया है। इसका पूरा_पूरा कारण तो विधाता जानें परन्तु, हे भाई ! सुनो, मेरे दाहिने अंग फड़क रहे हैं।

रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ। मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ।। मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी। जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी।।___ अर्थ____ रघुबंशियों का तो यह सहज स्वभाव है कि वे मन से भी कभी बुरे मार्ग में पाँव नहीं धरते। मुझे तो अपने मन का भरोसा है कि जिसने स्वप्न में भी पराई स्त्री को नहीं ताका।



जिन्ह कै लहहिं न रिपु सन पीठी। नहिं पावहिं पर किस मन डीठी।। महाजन लहहिं न जिन्ह कै नाहीं। रे नरबर थोरे जग माहीं।।___ अर्थ___ जो शत्रु को रण में पीठ नहीं दिखाते, पराई स्त्री जिनके मन और दृष्टि को नहीं खींच पाती तथा माँगनेवाले जिनके यहाँ ‘नहीं’ पाते, ऐसे उत्तम पुरुष संसार में कम हैं।



करत बतकही अनुज सन, मन सिय रूप लोभान। मुख सरोज मकरंद छबि, करइ मधुप इव पान।। __ अर्थ___ रामचन्द्रजी बात तो लक्ष्मणजी से कर रहे थे पर मन सीताजी के रूप पर  लुभाया हुआ उनके मुख रूपी कमल के शोभारूपी रस को भौंरे के समान पान कर रहा था।



चितवत चकित चहूँ दिसि सीता। कहँ गए नृप किसोर मनु चिंता। जहँ बिलोकि मृग सावक नैनी। जनि तहँ बरिस कमल सित श्रेनी।।___अर्थ____ सीताजी चकित होकर चारों ओर देख रही हैं, मन में चिंता है कि राजकिशोर कहाँ गये। वह बाल मृगनयनी जिस ओर देखती हैं वहीं मानो सफेद पंक्तियों की वर्षा हो जाती है।



लता ओट तब सखिन्ह लखाये। स्याम गौर किसोर सुहाये।। देखि रूप लोचन ललचाने। हरषे जनु निज निधि पहिचाने।।___ अर्थ___ तब सखियों ने लता की आड़ में श्याम और गौर राजकुमार दिखाये। उनका रूप देख जानकीजी के नेत्र ललचा उठे मानो अपनी संपति को पाकर प्रसन्न हुए हों।



थके नयन रघुपति छबि देखे। पलकन्हिहूँ परिहरे निमेषें।। अधिक स्नेह देह भै भोरी। सरद ससिहि जनु चितव चकोरी।।___ अर्थ____ सीताजी के नेत्र रघुनाथजी की छबि देखकर चकित हो गये। पलकों ने भी गिरना छोड़ दिया। अधिक स्नेह के कारण देह बिह्वल हो गयी मानो चकोर शरदऋतु के चन्द्रमा को देख रही हो।



लोचन मग रामहि उर आनी। दीन्हे पलक कपाट सयानी।। जब सिय सखिन्ह प्रेमबस जानी। कहा न सकहिं कुछ मन सकुचानी।।___ अर्थ___ नेत्रों के मार्ग से श्रीरामजी को हृदय में लाकर सयानी सीताजी ने पलकरूपी किवाड़ बन्द कर दिये। जब सहेलियों ने जानकीजी को प्रेम के वश में जाना, तब ही वे मन में सकुचाई। कुछ कह न सकी।



लता भवन तें प्रगट भे, तेहि अवसर दोउ भाई। निकसे जनु जुग बिमल बिधु, जलद पटल बिलगाइ।।____अर्थ____उसी समय लताकुंज में से दोनों भाई प्रकट हुए मानो दो चन्द्रमा बादलरूपी पट को खोलकर निकल आये हों।



सोभा सीवँ सुभग दोउ वीरा। नील पीत जलजाभ शरीरा।। मोर पंख सिर सोहत नीके। गुच्छ बीच बिच कुसुम कलीके।।___ अर्थ___ दोनों सुन्दर भाई शोभा की सीमा हैं, नीले और पीले कमल के समान शरीर हैं। सिर पर मोरपंख सुशोभित हैं। उनके बीच_बीच में फूलों की कलियों के गुच्छे गुथे हुए हैं।



भाल तिलकश्रम बिन्दु सुहाये। श्रवन सुभग भूषण छबिछाये।। बिकट भृगुटि कर घूँघरवारे। नव सरोज लोचन रतनारे।।___अर्थ___ माथे पर तिलक एवं पसीने की बूँदें सुशोभित हैं, कानों,में आभूषण की छबि छा रही है। टेढ़ी भौंहे और घुँघराले बाल हैं, न ये कमल के समान अरुण नयन हैं।



चारु चिबुक नासिका कपोला। हास बिलास लेत मनु मोला।। मुख छबि कहि न जाइ मोहि पाहीं। जो बिलोकि बहु काम लजाहिं।।___ अर्थ____ सुन्दर ठोड़ी, नाक और गाल हैं। हँसी की शोभा उनको मोह लेती हैं। मुख की शोभा तो,मुझसे कही नहीं जाती, जिसे देखकर बहुत से कामदेव सजा जाते हैं।



उर मनि माल कंबु कल गीवा। काम कलभ कर भुज बल सींवा।। सुमन समेत बाम कर दोना। सावँर कुँवर सखी सुठि लोना।।___ अर्थ___ छाती पर मणियों की माला है, शंख के समान सुंदर गला है और कामदेव के हाथी के बच्चे के समान भुजायें हैं जो बल की सीमा हैं। जिसके बायें हाथ में फूलों से,भरा हुआ दोना है, हे सखी ! वह लाँवला कुँवर तो बहुत सुन्दर है।