Monday, 28 February 2022

अयोध्याकाण्ड

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।। निज प्रतिबिंबु बरकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।_अर्थ_कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से पकड़ में न आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ आ जाय, पर भाई ! स्त्रियों की गति ( चाल ) नहीं जानी जाती।





काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।_अर्थ_आग क्या नहीं जला सकती ! समुद्र में क्या नहीं समा सकता ! अबला कहलाने वाली प्रबल स्त्री ( जाति ) क्या नहीं कर सकती ! और जगत् में काल किसको नहीं खाता !





का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।। एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।_अर्थ_ विधाता ने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब क्या दिखाना चाहता है ! एक कहते हैं कि राजा ने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयी को विचार कर वर नहीं दिया।





जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गाजनु।। एक धर्म परमिति पहिचाने। नृपहिं  दोषु  देहिं सयाने।।_अर्थ_जो हठ करके ( कैकेयी की बात को पूरा करने में अड़े रहकर ) स्वयं सब दु:खों के पात्र हो गये। स्त्री के विशेष वश होने के कारण मानो उनका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक ( दूसरे ) जो धर्म की मर्यादा को जानते हैं  और सयाने हैं, वे राजा को दोष नहीं देते।





सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।। एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भांय सुनि रहहीं।।_अर्थ_वे शिबि, दधीचि और हरिश्चन्द्र की कहानी एक_दूसरे से बखान कर कहते हैं। कोई एक सुनकर उदासी न भाव से रह जाते हैं ( कुछ बोलते नहीं ) ।





कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।। सुकृति जाहि अस कहत तुम्हारे। राम भरत कहुं प्रानपिआरे।।_अर्थ_ कोई हाथों से कान मूंदकर और जीभ को दांतों तले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहने से तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जायेंगे। भरत जी को तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणों के समान प्यारे हैं।






चन्दु चवै बरु अनल कन सुधा होई बिषतूल। सपनेहुं कबहुं न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।_अर्थ_चन्द्रमा चाहे ( शीतल किरणों की जगह ) आग की चिंगारियां बरसाने लगे और अमृत चाहे विष के समान हो जाय, परन्तु भरत स्वप्न में भी श्रीरामचन्द्रजी के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे।






एक बिधातहिं दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिनु जेहीं। खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह राहु उर मिटा उछाहू।।_अर्थ_कोई एक विधाता को दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर भर में खलबली मच गयी, सब किसी को सोच हो गया। हृदय में दु:सह जलन है  आनन्द_उत्साह मिट गया।





बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई कैकेई केरी।। लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।।_अर्थ_ब्राह्मणों की स्त्रियां, कुल की माननीय बड़ी_बूढ़ी और जो कैकेयी की परम_प्रिय थीं, वे उसके शील की सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाण के समान लगते हैं।





भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।। करहु राम पर सहज सनेहू। केहि अपराध आजु बनु देहू।।_अर्थ_( वे कहती हैं_ ) तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्र के समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं; इस बात को सारा जगत् जानता है। श्रीरामचन्द्रजी पर भी तो तुम स्वाभाविक ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराध से उन्हें वन देती हो?





कबहुं न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।। कौसल्या अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर जारा।।_अर्थ_तुमने कभी सौतिया डाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वास को जानता है। अब कौशल्या ने तुम्हारा कौन_सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगर पर वज्र गिरा दिया।





सीय कि पिय संग परिहरहिं लखनु कि रहिहहिं धाम। राज कि भूंजब भरत पुर नृपु कि रहिहहिं बिनु राम।।_अर्थ_क्या सीताजी अपने पति ( श्रीरामचन्द्रजी ) का साथ छोड़ देंगी ?  क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजी के बिना घर रह सकेंगे ? क्या भरत श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्यापुरी का राज्य भोग सकेंगे ? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजी के बिना जीवित रह सकेंगे ? ( अर्थात् न सीताजी यहां रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे न भर्ती राज करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा। 






अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।। भरतहिं अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।।_अर्थ_हृदय में ऐसा विचार कर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलंक की कोठी मत बनो। भरत को अवश्य युवराज पद दो, पर श्रीरामचन्द्रजी का वन में क्या काम है !





नाहिंन राम राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।। गुर गृह बसहुं रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी राज के भूखे नहीं हैं। वे धर्म की दूरी को धारण करनेवाले विषय रस से रूखे हैं ( अर्थात् उनमें विषयाशक्ति है ही नहीं। ( इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्री रामजी वन न गये तो भरत के राज्य में विघ्न करेंगे; इतने पर भी मन न माने तो ) तुम राजा से दूसरा ऐसा ( यह ) वर ले लो श्रीराम घर छोड़कर गुरु के घर रहें।





जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लगिहि कछु हाथ तुम्हारे।। जौं परिहास कीन्हि कछु होई। जौं कहि प्रगट जनावहु सोई।।_अर्थ_जो तुम हमारे कहने पर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी नहीं लगेगा। यदि तुमने कुछ हंसी की हो तो उसे प्रगट में कहकर जना दो ( कि मैंने दिल्लगी की है )।





राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहहिं सुनि तुम्ह कहुं लोगू।। उठहु बेगि सोई करहु उपाई। जेहिं बिधि सोकु कलंकु नसाई।।_अर्थ_राम_सरीखा पुत्र क्या वन के योग्य है ? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे ! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपाय से इस शोक और कलंक का नाश हो। 





जेहिं भांति सोकु कलंकु जाय उपाय करि कुल पालहि। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसर चालहि।। जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चन्द बिनु जिमि जामिनी। जिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जिमि भामिनी।।_अर्थ_जिस तरह ( नगरभर का ) शोक और तुम्हारा कलंक मिटे, वहीं उपाय करके कुल की रक्षा कर। वन जाते हुए श्रीरामजी को हठ करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं_जैसे सूर्य के बिना दिन, प्राण के बिना शरीर और चन्द्रमा के बिना रात ( निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाते हैं ) वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्या हो जायेगी; हे भामिनि ! तू अपने हृदय में इस बात को समझ ( विचारकर देख ) तो सही। 




सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित। तेईं कछु कान न दीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी।।_अर्थ_इस प्रकार सखियों ने ऐसी सीख दी जो सुनने में मीठी और परिणाम में हितकारी थी। पर कुटिला कुबरी की सिखाती पढ़ाई हुई कैकेयी ने इसपर जरा भी कान नहीं दिया।





उतरु न देई दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।। ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी।  कहत मतिमन्द अभागी।।_अर्थ_कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दु:सह क्रोध के मारे रूखी हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाघिन हरिनियों को देख रही हो। तब सखियों ने रोग को असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मन्दबुद्धि अभागिनि कहती हुई चल दीं।





राजु करत यह दैअं बिगोई। कीन्हेसि अस जस करई न कोई।। एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारी। जेहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।_अर्थ_राज्य करते हुए इस कैकेई को दैव ने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा। नगर के सब स्त्री_पुरुष ऐसा विलाप कर रहे हैं और उस कुमारी कैकेयी को करोड़ों गालियां दे रहे हैं।





जरहिं बिषम जल लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।। बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। तनु जलचर गन सूखत पानी।।_अर्थ_लोग विषमज्वर ( भयानक दु:ख की आग ) से जल रहे हैं। लंबी सांसें लेते हुए वे कहते कि श्रीरामचन्द्रजी के बिना जीने की कौन आशा है। महान् वियोग ( की आशंका ) से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखने के समय जलचर जीवों का समुदाय व्याकुल हो।





अति बिषाद बस लोग लोगाईं। गए मातु पहिं रामु गोसाईं।। मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।_अर्थ_सभी पुरुष और स्त्रियां अत्यन्त विषाद के वश हो रहे हैं। स्वामि श्रीरामचन्द्रजी माता कौशल्या के पास गये। उनका मुख प्रसन्न हैं और चित्त में चौगुना चाव ( उत्साह ) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें। ( श्रीरामजी को राजतिलक की बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयों को छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयी की आज्ञा और पिता की मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।)





नव गयंदु रघुबीर मनु राजु मलान समान। छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का मन  पकड़े हुए हाथी के समान और राजतिलक उस हाथी के बांधने की कांटेदार लोहे की बेरी के समान है। ‘वन जाना है’ यह सुनकर अपने को बंधन से छूटा जानकर, उनके हृदय में आनन्द बढ़ गया है।




रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।। दीन्ह असीस लाइ उर लीन्हे। भूषण बसन निछावरि कीन्हे।।_अर्थ_ रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी ने दोनों हाथ जोड़कर आनंद के साथ माता के चरणों में सिर नवाया। माता ने आशीर्वाद दिया, अपने हृदय से लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये।





बार बार मुख चुंबति माता नयन नेह जलु पुलकित गाता।। गोद राखि पुनि हृदय लगाए। स्रवत प्रेमरस पयद सुहाए।।_अर्थ_माता बार_बार श्रीरामचन्द्रजी का मुख चूम रही है। नेत्रों में प्रेम का जल भर आया है और सब अंग पुलकित हो गये हैं। श्रीराम को अपनी गोद में बैठाकर  फिर हृदय से लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये।





प्रेम प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।। सादर सुन्दर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।_अर्थ_उनका प्रेम और आनंद कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगाल ने कुबेर का पद पा लिया हो। बड़े आदर के साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं_

Sunday, 30 January 2022

अयोध्याकाण्ड

लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहं गयादिक तीरथ जैसे।। रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।_अर्थ_कैकेयी के बुरे मुख से ये सुंदर वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देश में गया आदि तीर्थ ! श्रीरामचन्द्र जी को माता कैकेयी के सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गंगाजी में जाकर ( अच्छे_बुरे सभी प्रकार के ) जल शुभ, सुंदर हो जाते हैं। 





गई मुर्छा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह। सचिव आगमन कहि तब बिनय समय सम कीन्ह।।_अर्थ_इतने में राजा की मूर्छा दूर हुई, उन्होंने राम का स्मरण करके ( ‘राम_राम’ कहकर ) फिरकर करवट ली। मंत्री ने श्रीरामचन्द्र जी का आना कहकर समयानुकूल विनती की।





अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।। सचिवं संभालि राउ बैठारे। चरन परत नृप राम निहारे।।_अर्थ_ जब राजा ने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मंत्री ने संभालकर राजा को बैठाया। राजा ने श्रीरामचन्द्र जी को अपने चरणों में पड़ते ( प्रणाम करते ) देखा।





लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुं फनिक फिरि आई।। रामहिं चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।_अर्थ_स्नेह से बिकल राजा ने रामजी को हृदय से लगा लिया। मानो सांप ने अपनी खोयी हुई मनि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी रामजी को देखते रह गये। उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बह चली।





सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयं लगावत बारहिं बारा।। बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।_अर्थ_शोक के विशेष वश होने के कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार_बार श्रीरामचन्द्रजी को हृदय से लगाते हैं और मन में ब्रह्माजी को मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी वन को न जायं।





सुमिरि महेसहिं कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदाशिव मोरी।। आसुतोष तुम्ह अवढ़र दानी। आरति हरहुं दीन जनु जानी।।_अर्थ_फिर महादेवजी का स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं_हे सदाशिव ! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष ( शीघ्र प्रसन्न होनेवाले ) और अवढ़रदानी ( मुंहमांगा दे डालने वाले ) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दु:ख को दूर कीजिये।





तुम्ह प्रेरक सबके हृदयं सोइ मति रामहि देहु। बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु।।_अर्थ_आप प्रेरक रूप से सबके हृदय में हैं। आप श्रीरामचन्द्र को ऐसी बुद्धि दीजिए जिससे वे मेरे वचन को त्यागकर और शील सनेह को छोड़कर घर ही में रह जायं।





अजसु होउ जग सुजस नसाऊ। नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ।। सब दुख दुसह सहाहहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होहीं।।_अर्थ_जगत् में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे ( नया पाप होने से ) मैं नरक में गिरूं, अथवा स्वर्ग चला जाय ( पूर्व पुण्यों के फलस्वरूप मिलने वाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले )। और भी सब प्रकार के दु:सह दुख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आंखों की ओट न हों।





सब मन गुनइ राउ नहीं बोला। पीपल पात सरिस मनु डोला।  रघुपति पितहि प्रेम बस जानी। पुनि कछु कहिहहिं मातु अनुमानी।।_अर्थ_राजा मन_ही_मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपल के पत्ते की तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजी ने पिता को प्रेमधन जानकर और यह अनुमान कर कि माता फिर कुछ कहेगी ( तो पिताजी को दुःख होगा )_





देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।। तात कहउं कछु करउं ढिठाई। अनुचित छमब जानि लरिकाई।।_अर्थ_ देश, काल और अवसर के अनुकूल विचार कर विनीत वचन कहे_ हे तात ! मैं कुछ कहता हूं, यह ढ़िठाई करता हूं। इस अनौचित्य को मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजिएगा।





अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुं न मोहि कहि प्रथम जनावा।। देखि गोसाइंहि पूछिउं माता। सुनि प्रसंगु भै सीतल गाता।।_अर्थ_ इस अत्यन्त तुच्छ बात के लिये आपने इतना दु:ख पाया। मुझे किसी ने पहले कहकर यह बात नहीं जतायी। स्वामी ( आप ) को इस दशा में देखकर मैंने माता से पूछा। उन्हें सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये ( मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई।





मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरषि हियं कहि पुलके प्रभु गात।।_अर्थ_हे पिताजी ! इस मंगल के समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिये और हृदय में प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिये। यह कहते हुए प्रभु श्रीरामजी सर्वांग पुलकित हो गये।





धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।। चारि पदार्थ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।_अर्थ_( उन्होंने फिर कहा_) इस पृथ्वी तल पर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिता को परम आनन्द हो। जिसको माता_पिता प्राणों के समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ) उसके करतलगत ( मुट्ठी में ) रहते हैं।





आयसु पालि जनमु फलु पाई। एहउं बेगिहिं होउ रजाई।। विदा मातु सन आवउं मांगी। चलिहउं बनहि बहुरि पद लागी।।_अर्थ_आपकी आज्ञा पालन करके और जन्म का फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊंगा, अत: कृपया आज्ञा दीजिये।
 माता से विदा मांग आता हूं। फिर आपके पैर रखकर ( प्रणाम करके ) वन को चलूंगा।





अस कहि राम गवनु तब कीन्हां। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा।। नगर ब्यापि गई बात सुतीछी। छुअत चढ़ी तनु सब तन बीछी।।_अर्थ_ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहां से चल दिये। राजा ने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी ( अप्रिय ) बात नगर भर में इतनी जल्दी फैल गरी मानो डंक मारते ही बिच्छू का विष सारे शरीर में चढ़ गया हो।





सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।। जो जहं सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।_अर्थ_इस बात को सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल (  वन में आग लगी ) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहां सुनता है वहीं सिर धुनने ( पीटने ) लगता है ! बड़ा विषाद है, किसी को धीरज नहीं बंधता।





मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयं समाइ। मनहुं करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।_अर्थ_सबके मुख सूखे जाते हैं, शोक हृदय में नहीं समाता। मानो करुणारस की सेना अवध पर डंका बजाकर उतर आयी हो।





भलेहि  बिधि बात बेगारी। जहं तहं जेहिं कैकइहि गारी।। एहि पापिनिहि सूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावक धरेऊ।। सब मेल मिल गये थे ( सब संजोग ठीक हो गये थे ), इतने में ही विधाता ने बात बिगाड़ दी ! जहां तहां लोग कैकेयी को गाली दे रहे हैं ! इस पापिन को क्या सूझा पड़ा जो इसने छाये घर पर आग लगा दी।





निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। बादि सुधा बिष चाहत चीखा।। कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।_अर्थ_ यह अपने हाथ से अपने आंखों को निकालकर ( आंखों के बिना ही ) देखना चाहती है, और अमृत फेंक कर विष चखना चाहती है ! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेई रघुवंश रूपी बांस वन के लिये अग्नि हो गयी।





पालव बैठि पेड़ एहिं काटा। सुख महुं सोक ठाटु धरि ठाटा। सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।_अर्थ_पत्ते पर बैठकर इसने पेड़ को काट डाला। सुख में शोक का ठाट डटकर रख दिया। श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणों के समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण उसने यह कुटिलता ठानी।




Wednesday, 12 January 2022

अयोध्याकाण्ड

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु। सहमि परेउ लघु सिंघिनिहीं मनहुं बृद्ध गजराजु।।_अर्थ_रघुबंसमनि श्रीरामचन्द्रजी ने जाकर देखा कि राजा अत्यंत ही बुरे हालत में पड़े हैं। मानो सिंहनि को देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो।





सूखहिं अधर जरइ सब अंगू। मनहुं दीन मनिहीन भुअंगू।। सरुष समीप देखि कैकेई। मानहुं मीचु घरी गनि लेई।।_अर्थ_राजा के ओंठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणि के बिना सांप दुखी हो रहा है। पास ही क्रोध में भरी कैकेयी को देखा, मानो साक्षात् मृत्यु ही बैठी राजा के जीवन की अन्तिम घड़ियां गिन रही हों।





करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुख सुना न काऊ।। तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूछीं मधुर बचन महतारी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने ( अपने जीवन में ) पहली बार यह दु:ख देखा; इससे पहले कभी दु:ख सुना भी न था। तो भी समय का विचार कर हृदय में धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनों से माता कैकेयी से पूछा_





मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होई निवारन।। सुनहु राम सब कारन एहू। राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू।।_अर्थ_हे माता ! मुझे पिताजी के दु:ख का कारण कहो ताकि उससे उसका निवारण हो ( दु:ख दूर हो ) वह यत्न किया जाय। ( कैकेयी ने कहा_) हे राम ! सुनो, सारा कारण यही है कि राजा का तुम पर बहुत स्नेह है।





देन कहेन्हि मोहि दुआ बरदाना। मांगें जो कछु मोहि सोहाना।। सो सुनि भयउ भूप उर सोचूं। छाड़िअ न सकहिं तुम्हार संकोचू।।_अर्थ_इन्होंने मुझे दो वरदान देने को कहा । मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वहीं मैंने मांगा। उसे सुनकर राजा के ह्रदय में सोच हो गया।; क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते।





सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। कहुं तो आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।_अर्थ_इधर तो पुत्र का स्नेह है और उधर वचन ( प्रतिज्ञा ); राजा इसी धर्मसंकट में पड़ गये हैं। यदि तुम कर सकते हो, तो राजा की आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेश को मिटाओ।





निधरक बैठि कहा कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।। जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुं महीप मृदु लच्छ समाना।।_अर्थ_कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी बाणी कह रही है जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यंत व्याकुल हो उठी। जीभ धनुष है, वचन बहुत_से तीर हैं और राजा ही कोमल निशाने के समान है।





जनु कठोरपन धरे सरीरू। सिखइ धनुष विद्या बर बीरू।। सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुं तनु धरि निठुराई।।_अर्थ_(इस सारे साज_समान के साथ ) मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीर का शरीर धारण करके धनुष विद्या सीख रहा है। श्री रघुनाथजी को सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो।





मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू।। बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।_अर्थ_सूर्यकुल के सूर्य, स्वाभाविक ही आनंदनिधान श्रीरामजी मन में मुस्कराकर सब दूषनों से रहित ऐसे कोमल और सुंदर वचन बोले जो मानो वाणी के भूषण ही थे_





सुनु जननी सोई सुत बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।। तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननी सकल संसारा।।_अर्थ_हे माता ! सुनो, वहीं पुत्र बड़भागी है, जो पिता_माता के वचनों का अनुरागी ( पालन करनेवाला ) है। ( आज्ञा पालन के द्वारा ) माता_पिता को संतुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी ! सारे संसार में दुर्लभ है।





मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहिं भांति हित मोर। तेहि महं पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।_अर्थ_वन में विशेष रूप से मुनियों का मिलाप होगा, जिसमें मेरा  सभी प्रकार से कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजी की आज्ञा और हे जननी ! तुम्हारी सम्मति है।





भरत प्राणप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सम्मुख आजू।। जौं न जाऊं बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।_अर्थ_और प्राणप्रिय भरत राय पालेंगे। ( इन सभी बातों को देखकर यह प्रतीत होता है कि ) आज विधाता सब प्रकार से मेरे सम्मुख हैं ( मेरे अनुकूल हैं )। यदि ऐसे काम के लिये भी मैं वन को न जाऊं तो मूर्खों के समाज में सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये। 





सेवहिं अरंडु कल्पतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं
बिष मांगी।। तेहि न पाई अब समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।_अर्थ_ जो कल्पवृक्ष को छोड़कर रेंड की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष मांग लेते हैं, हे माता ! तुम मन में विचार कर देखो, वे ( महामूर्ख ) भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे।





अंब एक दुख मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।। थोरिहिं बात पितहिं दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।।_अर्थ_ हे माता ! मुझे एक ही दुख विशेष रूप से हो रहा है, वह महाराज को अत्यंत व्याकुल देखकर। इस थोड़ी_सी बात के लिये ही पिताजी को इतना भारी दुख हो, हे माता मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होता।





राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू।। जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ मोहि कहुं सतिभाऊ।।_अर्थ_क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणों के अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगंध है, माता ! तुम सच_सच कहो।





सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।_अर्थ_रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी के स्वभाव से ही सीधे वचनों को दुर्बुद्धि कैकेई टेढ़ा ही करके जान रही है; जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें टेढ़ी चाल से ही चलती हैं।





रहसि रानी राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।। सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मैं कछु जाना।।_अर्थ_रानी कैकेयी श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर हर्षित हो गयी और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली_तुम्हारी शपथ और भरत की सौगंध है, मुझे राजा के दुख का दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है।





तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।। राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।_अर्थ_हे तात ! तुम अपराध के योग्य नहीं हो ( तुमसे माता पिता का अपराध बन पड़े, यह संभव नहीं ) । तुम तो माता_पिता और भाइयों को सुख देने वाले हो। हे राम ! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता_माता के वचनों ( के पालन ) में तत्पर हो।





पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेपन जेहिं अजसु न होई।। तुम्ह सम सुअन सुकृति जेहिं दीन्हे। उचित न ताहु निरादरु कीन्हे।।_अर्थ_मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूं, तुम पिता को समझा कर वहीं बात कहो जिससे चौथेपन ( बुढ़ापे ) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्य ने इनको तुम जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं।

Friday, 24 December 2021

अयोध्याकाण्ड

प्रिया प्राण सुत सरबसु मोरें। परिजन प्रजा सकल बस तोरें।। जौं कछु कहौं कपटु करि तोही। भामिनि राम सपथ सत मोही।।_अर्थ_हे प्रिये ! मेरी प्रजा, कुटुम्बी, सर्वस्व ( सम्पत्ति ), पुत्र, यहां तक कि मेरे प्राण भी, ये सब तेरे वश में ( अधीन ) हैं। यदि मैं तुमसे कुछ कपट करके कहता होऊं तो हे भामिनि ! मुझे सौ बार राम की सौगंध है।





बिहसि मागु मनभावति बाता। भूषन सजहि मनोहर गाता।। घरी कुघरी समुझि जियं देखू। बेगि प्रिया परिहरइ कुबेषू।।_अर्थ_तू हंसकर ( प्रसन्नतापूर्वक ) अपनी मनचाही बात मांग ले और अपने मनोहर अंगों को आभूषणों से सजा। मौका_बेमौका तो मन में विचारकर देख। हे प्रिय ! जल्दी इस बुरे वेष को त्याग दे।





यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद। भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुं किरातिनि फंद।।_अर्थ_यह सुनकर और मन में रामजी की बड़ी सौगंध विचारकर मंदबुद्धि कैकेयी हंसते हुए उठी और गहने पहनने लगी; मानो कोई भीलनी मृग को देखकर फंदा तैयार कर रही हो।





पुनि कह राउ सुहृद जियं जानी। प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी।। भामिनि भयउ तोर मन भावा। घर घर नगर अनंद बधावा।।_अर्थ_अपने जी में कैकेयी को सुहृद जानकर राजा दशरथजी प्रेम से पुलकित होकर कोमल और सुन्दर वाणी से फिर बोले_हे भामिनी ! तेरा मनचीता हो गया। नगर में घर_घर आनन्द के बधावे बज रहे हैं।





रामहि देउं कालि जुबराजू। सजहि सुलोचनि मंगल साजू।। दलकि उठेउ सुनि हृदय कठोरू। तनु छुइ गयउ पाक बरतोरू।।_अर्थ_मैं कल ही राम को युवराज पद दे रहा हूं। इसलिए हे सुनयनी ! तू मंगल साज सज। यह सुनते ही उसका कठोर हृदय झलक उठा ( फटने लगा )। मानो पका हुआ फोड़ा छू गया हो।





ऐसिउ पीर बिहसि जेहिं गोई। चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई।। लखहि न भूप कपट चतुराई। कोटि कुटिल मनि गुरु पढ़ाई।।_अर्थ_ऐसी भारी पीड़ा को भी उसने हंसकर छिपा लिया, जैसे चोर की स्त्री प्रकट होकर नहीं रोती ( जिसमें उसका भेद न खुल जाय )। राजा उसकी कपट चतुराई को नहीं लग रहे हैं। क्योंकि वह करोड़ों कुटिलों की शिरोमणि गुरु मंथरा की पढ़ाई हुई है।





जद्यपि नीति निपुन नरनाहू। नारिचरित जलनिधि अवगाहू।। कपट सनेहु बढ़ाई बहोरी। बोली बिहसि नयन मुहु मोरी।।_अर्थ_यद्यपि राजा नीति में निपुण हैं; परन्तु त्रियाचरित्र अथाह समुद्र है। फिर वह कपटपूर्ण प्रेम बढ़ाकर ( ऊपर से प्रेम दिखाकर ) नेत्र और मुंह मोड़ती हुई बोली_





मागु मागु पै कहहु पिय कबहुं न दे हुए न लेहु। देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु।।_अर्थ_हे प्रियतम ! आप मांग_मांग तो कहा करते हैं,  पर देते_लेते कभी कुछ भी नहीं। आपने दो वरदान देने को कहा था, उनके भी मिलने में संदेह है ।






जानेउं मरमु राउ हंसि कहई। तुम्हहिं कोहाब परम प्रिय अहई।।_अर्थ_राजा ने हंसकर कहा कि अब मैं तुम्हारा मर्म ( मतलब ) समझा। मानो करना तुम्हें परम प्रिय है। तुमने उन वरों को थाती रखकर धरोहर ) रखकर फिर कभी मांगा ही नहीं और मेरा भूलने का स्वभाव होने से मुझे भी वह प्रसंग याद न रहा।





झूठेहुं हमहि दोषु जनि देहू। दुइ कै चारि मागि मकु लेहू।। रघुकुल रीति सदा चलि आई। प्रान जाइ बरु बचनु न जाई।।_अर्थ_मुझे झूठ_मूठ दोष मत दो। चाहे दो के बदले चार मांग लो। रघुकुल में सदा से यही रीति चली आयी है कि प्राण भले ही चले जायं, पर वचन नहीं जाता।





नहिं असत्य सम पातक पुंजा। गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा।। सत्यमूल सब सुकृत सुहाए। बेद पुरान बिदित मनु गाए।।_अर्थ_असत्य के समान पापों का समूह भी नहीं है। क्या करोड़ों घुंघचियां मिलकर भी कहीं पहाड़ के समान हो सकती हैं। ‘सत्य’ ही समस्त उत्तम सुकृतों ( पुण्यों ) की जड़ है। यह बात वेद_पुराणों में प्रसिद्ध है और मधुजी ने भी यही कहा  है।





तेहि पर राम सपथ करि आई। सुकृति सनेह अवधि रघुराई।। बात दृढ़ाइ कुमति हंसि बोली। कुमति कुबिहग कुलह जनु खोली।।_अर्थ_उसपर मेरे द्वारा श्रीराम जी का शपथ करने में आ गयी ( मुंह से निकल पड़ी )। श्री रघुनाथजी मेरे सुकृत ( पुण्य ) और स्नेह की सीमा हैं। इस प्रकार बात पक्की कराके दुर्बुद्धि कैकेयी हंसकर बोली, मानो उसने कुमत ( बुरे विचार ) रूपी दुष्ट पक्षी ( बाज ) ( को छोड़ने के लिये उस ) की कुलही ( आंखों पर टोपी ) खोल दी।





भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु । भिल्लिनि जिमि छाडन चहति बचनु भयंकरु बाजु।_अर्थ_राजा का मनोरथ सुन्दर वन है, सुख सुन्दर पक्षियों का समुदाय है। उसपर भीलनी की तरह कैकेयी अपना वचन रूपी भयंकर बाज छोड़ना चाहती है। 





सुनहु प्राणप्रिय भावतजी का। देहु एक बर भरतहि टीका।। मांगउं दूसर बर कर जोरी। पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी।।_अर्थ_( वह बोली_) हे प्राणप्यारे ! सुनिये, मेरे मन को भानेवाला एक वर तो दीजिये, भरत को राजतिलक; और हे नाथ ! दूसरा वर भी मैं हाथ जोड़कर मांगती हूं, मेरा मनोरथ पूरा कीजिये।





तापस बेस बिषेसि उदासी। चौदह बरिस रामु बनवासी।। सुनि मृदु बचन भूप हियं सोकू। ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू।।_अर्थ_तपस्वियों के वेष में विशेष उदासीन भाव से ( राज्य और कुटुम्बियों की ओर भली-भांति उदासीन होकर विरक्त मुनियों की भांति ) राम चौदह वर्ष तक वन में निवास करें। कैकेयी के कोमल ( विनययुक्त ) वचन सुनकर राजा के हृदय में ऐसा शोक हुआ जैसे चन्द्रमा की किरणों के स्पर्श से चकवा विकल हो जाता है।





गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा। जनु सचान बन झपटेउ लावा।। बिबरन भयउ निपट नरपालू। दामिनि हनेउ मनहुं मनहुं तरु तालू।।_अर्थ_ राजा सहम गये, उनसे कुछ कहते न बना, मानो बाज बन में बटेर पर झपटा हो। राजा का रंग बिलकुल उड़ गया, मानो तार के पेड़ को बिजली ने मारा हो ( जैसे तार के पेड़ पर बिजली गिरने से वह बदरंगा हो जाता है, वहीं हाल राजा का हुआ।)





माथे हाथ मूदि दोउ लोचन। तनु धरि सोचु में लाग जनु सोचन।। मोर मनोरथु सुरतरु फूला। परत करिनि जिमि हतेउ समूला।।_अर्थ_माथे पर हाथ रखकर, दोनों नेत्र बन्द कर राजा ऐसे सोच करने लगे, मानो साक्षात् सोच ही शरीर धारण कर सोच कर रहा हो। ( वे सोचते हैं_हाय ! ) मेरा मनोरथ रूपी कल्पवृक्ष फूल चुका था, परन्तु फलते समय कैकेयी ने हथिनी की तरह उसे जड़ समेत उसे उठाकर नष्ट कर डाला।





अवध उजारि कीन्ह कैकेईं। दीन्हसि अचल विपत्ति कै नेईं।।_अर्थ_कैकेयी ने अयोध्या को उजाड़ कर दिया और विपत्ति की अचल ( सुदृढ़ ) नींव डाल दी।





कवनें अवसर का भयउ गयऊं नारि बिस्वास। जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अविद्या नास।।_अर्थ_किस अवसर पर क्या हो गया ! स्त्री का विश्वास करके मैं वैसे ही मारा गया, जैसे योग की सिद्धिरूपी फल मिलने के समय योगी को अविद्या नष्ट कर देती है।





नहिं बिधि राउ मनहिं मन झांका। देखि कुभांति कुमति मन माखा।। भरत कि राउर पूत न होहीं। आनेहु मोल बेसाहि कि मोही।।_अर्थ_इस प्रकार राजा मन_ही_मन झींक रहे हैं। राजा का ऐसा बुरा हाल देखकर दुर्बुद्धि कैकेयी मन में बुरी तरह से क्रोधित हुई। ( और बोली_) क्या भरत आपके पुत्र नहीं हैं ? क्या मुझे आप दाम देकर खरीद लाते हैं ? ( क्या मैं आपकी विवाहिता पत्नी नहीं हूं ?)





जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें। काहे न बोलहु बचन संभारे।। देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं। सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं।।_अर्थ_जो मेरा वचन सुनते ही आपको बाण_सा लगा तो आप सोच_समझकर बात क्यों नहीं कहते ? उत्तर दीजिये, नहीं तो शाहीन कर दीजिये। आप रघुवंश में सत्य प्रतिज्ञा वाले ( प्रसिद्ध ) हैं।





देन कहेहु अब जनि बर देहू। तजहू सत्य जग अपजसु लेहू।। सत्य सराहि कहेउ बरु देना। जानेहु लेइहि मागि चबेना।।_अर्थ_आपने ही वर देने को कहा था, अब भले ही न दीजिये। सत्य को छोड़ दीजिये और जगत् में अपयश लीजिये। सत्य की बड़ी सराहना करके वर देने को कहा था। समझा था कि यह चबेना ही मांग लेगी।





सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा। तनु धनु तजेउ बचनु पनु राखा।। अति कटु बचन कहति कैकेई। मानहु लोन जरे पर देई।।_अर्थ_राजा शिबि, दधीचि और बलि ने जो कुछ कहा, शरीर और धन त्यागकर भी उन्होंने अपने वचन की प्रतिज्ञा को निबाहा। कैकेयी बहुत ही कडवे वचन कहे रही है, मानो जले पर नमक छिड़क रही हो।





धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायं। सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायं।।_अर्थ_धर्म की धुरि धारण करनेवाले राजा दशरथ ने धीरज धरकर नेत्र खोले और सिर धुनकर तथा लम्बी सांस लेकर इस प्रकार कहा कि कि मुझे बड़े कुठौर मारा ( ऐसी कठिन परिस्थिति उत्पन्न कर दी, जिससे बच निकलना कठिन हो गया।





आगें दीख जरत रिस भारी। मनहुं रोष तरवारि उघारी।। मूठि कुबुद्धि धार निठुराई। धरी कूबरीं सान बनाई।।_अर्थ_प्रचंड क्रोध से जलती हुई कैकेई सामने इस प्रकार दिखायी पड़ी, मानो क्रोधरूपी तलवार म्यान से बाहर खड़ी हो। कुबुद्धि उस तलवार की मूठ है, निष्ठुरता धार है और वह कुबरी ( मन्थरा ) रूपी सान पर धरकर तेज की हुई है।





लखी महीप कराल कठोरा। सत्य कि जीवन लेइहि मोरा।। बोले राउ कठिन करि छाती। बानी सबिनय तासु सोहाती।।_अर्थ_राजा ने देखा कि यह ( तलवार ) बड़ी ही भयानक और कठोर हैं ( और सोचा_) क्या सत्य ही यह मेरा जीवन लेगी ? राजा अपनी छाती कड़ी करके, बहुत ही नम्रता के साथ उसे ( कैकेयी को ) प्रिय लगने वाली वाणी बोले_





प्रिया बचन कह कहति कुभांती। भीर प्रतीति प्रीति करि हांती।। मोरें भरत राम दुइ आंखी। सत्य कहउं करि संकरु साखी।।_अर्थ_हे प्रिय ! हे भीरु ! विश्वास और प्रेम को नष्ट करके ऐसे बुरी तरह के वचन कैसे कह रही हो। मेरे तो भरत और रामचन्द्र दो आंखें ( अर्थात् एक_से ) हैं; यह मैं शंकरजी की साक्षी देकर सत्य कहता हूं।






अवसि दूत मैं पठइब प्राता। ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता।। सुदिनु सोधि सब साज सजाई। दें भरत कहुं राजु बजाई।।_अर्थ_मैं अवश्य सवेरे ही दूत भेजूंगा। दोनों भाई  ( भरत_शत्रुध्न ) सुनते ही तुरंत आ जायेंगे। अच्छा दिन ( शुभ_मुहूर्त ) शोधवाकर, सब तैयारी करके डंका बजाकर मैं भरत को राज्य दे दूंगा।






लोभ न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति। मैं बड़ छोटे बिचारि जियं करत रहेउं नृपनीति।।_अर्थ_राम को राज्य का लोभ नहीं है और भरत पर उनका बड़ा ही प्रेम है। मैं ही अपने मन में बड़े_छोटे का विचार करके राजनीति का पालन कर रहा था ( बड़े को राजतिलक देने जा रहा था ) ।





राम सपथ सत कहउं सुभाऊ। राममातु कछु कहेउ न काऊ।। मैं सब कहउं तोहि  बिनु पूछें। तेहि ते परेउ मनोरथ छूछें।। _अर्थ_राम की सौ बार सौगंध खाकर मैं स्वभाव से ही कहता हूं कि राम की माता ( कौशल्या ) ने ( इस विषय में ) मुझसे कभी कुछ नहीं कहा। अवश्य ही मैंने तुमसे बिना पूछे यह सब किया। इसी से मेरा मनोरथ खाली गया।





रिस परिहरि अब मंगल साजू। कछु दिन गएं भरत जुबराजू।। एकहि बात मोर दुखु लागा। बर दूसर असमंजस मागा।।_अर्थ_अब क्रोध छोड़ दें और मंगल साज सज। कुछ ही दिनों बाद भरत युवराज हो जायेंगे। एक ही बात का मुझे दुख लगा कि तुमने दूसरा वरदान बड़ी अड़चन का मांगा।






अजहूं हृदउ जरत तेहि आंचा। रिस परिहास  सांचहु सांचा।। कहु तजि रोषु राम अपराधू। सब कोउ कहइ रामु सुठि साधू।।_अर्थ_उसकी आंच से अब भी मेरा हृदय जल रहा है। यह दिल्लगी में, क्रोध में अथवा सचमुच ही ( वास्तव में ) सच्चा है ? क्रोध को त्यागकर राम का अपराध तो बता। सब कोई तो कहते हैं कि राम बड़े ही साधु हैं।






तुहूं सराहसि करसि सनेहू। अब सुनि मोहि भयउ संदेहू।। जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला। सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला।।_अर्थ_तू स्वयं भी राम की सराहना करती और उनपर स्नेह किया करती थी। अब यह बात सुनकर मुझे संदेह हो गया है ( कि तुम्हारी प्रशंसा और स्नेह कहीं  झूठे तो न थे ? )





 जिसका स्वभाव शत्रु को भी अनुकूल है, वह माता के प्रतिकूल आचरण क्यों कर करेगा ?
प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु। जेहिं देखि अब नयन भरि भरत राज अभिषेक।।_अर्थ_हे प्रिये ! हंसी और क्रोध छोड़ दें और विवेक ( उचित_अनुचित ) विचार कर वर मांग, जिससे अब मैं नेत्र भरकर भरत का राज्याभिषेक देख सकूं।





जिएं मीन बरु बारि बिहीना। मनि बिनु फनिकु जिएं दुख दीना।। कहउं सुभाउ न छलु मन माहीं। जीवनु मोर राम बिनु नाहीं।।_अर्थ_मछली चाहे बिना पानी के जीती रहे और सांप भी चाहे बिना मणि के दीन दु:की होकर जीता रहे। परन्तु मैं स्वभाव से ही कहता हूं, मन में ( जरा भी ) छल रखकर नहीं कि मेरा जीवन राम के बिना नहीं है।






समुझि देखु जियं प्रिया प्रबीना। जीवनु राम दरस अधीना।। सुनि मृदु बचन कुमति अति जरई। मनहुं अनल आहुति घृत परई।।_अर्थ_हे चतुर प्रिये ! जी मैं समझ देख, मेरा जीवन श्रीराम के दर्शन के अधीन है। राजा के कोमल वचन सुनकर दुर्बुद्धि अत्यन्त जल रही है। मानो अग्नि में घी की आहुतियां पड़ रही हैं।





कहइ करहु किन कोटि उपाया। इहां न लागिहि राउरि माया।। देहु कि लेहु अजसि करि नाहीं। मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं।।_अर्थ_( कैकेयी कहती है_) आप करोड़ों उपाय क्यों न करें, यहां आपकी माया ( चालबाजी ) नहीं चलेगी। या तो मैंने जो मांगा है सो दीजिये नहीं तो ‘नाहीं’ करके अपयश लीजिये। मुझे बहुत प्रपंच ( बखेड़े ) नहीं सुहाते।





रामु साधु तुम्ह साधु सयाने। राममातु भलि सब पहिचाने।। जस कौसिलां मोर भल ताका। तस बलु उन्हहिं देउं करि साका।।_अर्थ_राम साधु हैं, आप सयाने साधु हैं और राम की माता भी भली हैं; मैंने सबको पहचान लिया है। कौशल्या ने मेरा जैसा भला चाहा है, मैं भी साका करके ( याद रखने योग्य ) उन्हें वैसा ही फल दूंगी।






होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं। मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं।।_अर्थ_सवेरा होते ही मुनि का वेष धारण कर यदि राम वन को नहीं जाते, तो हे राजन् ! मन में ( निश्चय ) समझ लीजिये कि मेरा मरना होगा और आपका अपयश।





अस कहि कुटिल भइ उठि ठाढ़ी। मानहु रोष तरंगिनि बाढ़ी।। पाप प्रहार प्रगट भइ सोई। भरी क्रोध जल जाइ न जोई।।_अर्थ_ऐसा कहकर कुटिल कैकेयी उठ खड़ी हुई, मानो क्रोध की नदी उमड़ी हो। वह नदी पापरूपी पहाड़ से प्रकट हुई है और क्रोध रूपी जल से भरी है; ( ऐसी भयानक है कि ) देखी नहीं जाती।





दोउ बर कूल कठिन हठ धारा। भवंर कूबरी बचन प्रचारा।। ढ़ाहत भूपरूप तरुमूला। चली बिपति बारिधि अनुकूला।।_अर्थ_दोनों वरदान उस नदी के दो किनारे हैं, कैकेयी का कठिन हठ ही उसकी कठिन ( तीव्र ) धारा है और कुबरी ( मंथरा ) के वचनों की प्रेरणा ही भंवर है। ( वह क्रोध रूपी नदी ) राजा दशरथरूपी वृक्ष को जड़मूल से ढ़हाती हुई विपत्तिरूप समुद्र की ओर ( सीधी ) चली जाती है।





छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू। जनि अबला जिमि करुना करहू।। तनु तिय तनय धामु धनु धरनी। सत्यसंध कहुं तृन सम बरनी।।_अर्थ_या तो वचन ( प्रतिज्ञा ) ही छोड़ दीजिये या धैर्य धारण कीजिये। यों असहाय स्त्री के भांति रोइये_पीटिये नहीं। सत्यव्रती के लिये तो शरीर, स्त्री, पुत्र, घर, धन और पृथ्वी_सब तिनके के बराबर कहे गये हैं।





मरम बचन सुनि राउ कहु कछु दोष न तोर। लागेउ तोहि पिशाच जिमि कालु कहावत मोर।।_अर्थ_कैकेयी के मर्मभेदी वचन सुनकर राजा ने कहा कि तू जो चाहे कह, तेरा कुछ भी दोष नहीं है। मेरा काल तुझे मानो पिशाच होकर लग गया है, वहीं सब तुझसे यह सब कहला।





चहत न भरत भूपतहिं भोरें। बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें। सो सब मोर पाप परिनामू। भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू।।_अर्थ_भरत तो भूलकर भी राजपद नहीं चाहते। होनहारवश तेरे ही जी में कुमति आ बसी। यह सब मेरे पापों का परिणाम है, जिससे कुसमय में ( बेमौके ) विधाता विपरीत हो गया।





सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई। सब गुन धाम राम प्रभुताई।। करिहहिं भाइ सकल सेवकाई। होइहिं तिहुं पुर सम बड़ाई।।_अर्थ_( तेरी उजाड़ी हुई ) यह सुन्दर अयोध्या फिर भली_भांति बसेगी और समस्त गुणों के नाम श्रीराम की प्रभुता भी होगी। सब भाई उनकी सेवा करेंगे और तीनों लोकों में श्रीराम जी की बड़ाई होगी।





तोर कलंक मोर पछिताऊ। मुएहुं न मिटिहिं न जाइहिं काऊ।। अब तोहि नीक लाग करु सोई। लोचन ओट बैठु मुहु गोई।।_अर्थ_केवल तेरा कलंक और मेरा पछतावा मरने पर भी नहीं मिटेगा, यह किसी तरह नहीं जायगा। अब तुझे जो अच्छा लगे वहीं कर। मुंह छिपाकर मेरी आंखों की ओट जा बैठ ( अर्थात् मेरे सामने से हट जा, मुझे मुंह न दिखा।




जब लगि जियौं कहउं कर जोरी। तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी।। फिरि पछितैहसि अंत अभागी। मारसि गाइ निहारूं लागी।।_अर्थ_मैं हाथ जोड़कर कहता हूं कि जबतक मैं जीता रहूं, जबतक फिर कुछ न कहना ( अर्थात् मुझसे न बोलना )। अरी अभागिनी ! फिर तू अन्त में पछतायेगी जो तू नहारू ( तांत ) के लिये गाय को मार रही है।





परेउ  राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु। कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुं मसानु।।_अर्थ_राजा करोड़ों प्रकार से ( बहुत तरह से ) समझाकर ( और यह कहकर ) कि तू क्यों सर्वनाश कर रही है, पृथ्वी पर गिर पड़े। पर कपट करने में चतुर कैकेयी कुछ बोलती नहीं, ( मानो मौन होकर ) मसान जगा रही हो ( श्मशान में बैठकर प्रेतमंत्र सिद्ध कर रही हो।





राम राम रट बिकल भुआलू। जनु बिनु पंख बिहग बेहालू।। हृदयं मनाव भोरु जनि होई। रामहि जाइ कहै जनि कोई।।_अर्थ_राजा ‘राम_राम’ रट रहे हैं और ऐसे व्याकुल हैं, जैसे कोई पक्षी पंख के बिना बेहाल हो। वे अपने हृदय में मनाते हैं कि सबेरा न हो और राम को जाकर कोई न कहे। 




 
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर। अवध बिलोकि सूल होइहिं उर।। भूप प्रीति कैकेयी कठिनाई। उभय अवधि बिधि रची बनाई।।_अर्थ_हे रघुकुल के गुरु ( बड़ेरे मूलपुरुष ) सूर्यभगवान् ! आप अपना उदय न करें। अयोध्या को ( बेहाल ) देखकर आपके हृदय में बड़ी पीड़ा होगी। राजा की प्रीति और कैकेयी की निष्ठुरता दोनों को ब्रह्मा ने सीमा तक रचकर बनाया है ( अर्थात् राजा प्रेम की सीमा हैं और कैकेयी निष्ठुरता की । )





बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा। बीना बेनु संख धुनि द्वारा।। पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक। सुनत नृपहिं तनु लागहिं सायक।।_अर्थ_विलाप करते_करते ही राजा को सबेरा हो गया। राजद्वारे पर वीणा, बांसुरी और शंख की ध्वनि होने लगी। भाट लोग विरुदावली पढ़ रहे हैं और गवैये गुणों का गान पढ़ रहे हैं। सुनने पर राजा को वे बाण_जैसे लगते हैं।





मंगल सकल सोहाहिं न कैसें। सहगामिनिहिं बिभूषन जैसें।। तेहि निसि नींद पूरी नहिं काहू। राम दरस लालसा उछाहू।।_अर्थ_राज को ये सब मंगल_साज कैसे नहीं सुहा रहे हैं, जैसे पति के साथ सती होने वाली स्त्री को आभूषण ! श्रीरामचन्द्र जी के दर्शन की लालसा और उत्साह के कारण उस रात्रि में किसी को भी नींद नहीं आयी।





द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि। जागेउ अजहुं न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि।।_अर्थ_राजद्वार पर मंत्रियों और सेवकों की भीड़ लगी है। वे सब सूर्य को उदय हुआ देखकर कहते हैं कि ऐसा कौन सा विशेष कारण है कि अवधपति दशरथजी अभी तक नहीं जागे।





पछिले पहर भूपु नित जागा। आजु हमहि बड़ अचरजु लागा।। जाहु सुमंत्र जगावहु जाई। कीजिए काजु रजायसु पाई।।_अर्थ_राजा नित्य ही रात के पिछले पहर जाग जाता करते हैं, किन्तु आज हमें बड़ा आश्चर्य हो रहा है। हे सुमंत्र ! जाओ, जाकर राजा को जगाओ। उनकी आज्ञा पाकर हम सब काम करें।





गए सुमंत्रु तब राउर माहीं। देखि भयावन जात डेराहीं।। धाइ खाई जनु जाइ न हेरा। मानहुं बिपति बिषाद बसेरा।।_अर्थ_तब सुमंत्र रावले ( राजमहल ) में गये, पर महल को भयानक देखकर वे जाते हुए डर रहे हैं। ( ऐसा लगता है )  मानो दौडकर काट खायेगा, उसकी ओर देखा नहीं जाता। मानो विपत्ति और विषाद ने वहां डेरा डाल रखा हो। 





 पूछें कोई न उतरु देई। गए जेहिं भवन भूप कैकेई।। कहि जयजीव बैठ सिरु नाई। देखि भूप गति गयउ सुखाई।।_अर्थ_ पूछने पर कोई जवाब नहीं देता; वे उस महल में गये जहां राजा और कैकेयी थे। ‘जय_जीव’ कहकर सिर नवाकर ( वन्दना करके ) बैठे और राजा की दशा देखकर तो वे सूख ही गये।





सोच बिकल बिबरन महि परेऊ। मानहुं कमल मूलु परिहरेऊ।। सचिउ सभीत सकइ नहिं पूंछी। बोली असुभ भरी सुभ छूंछी।।_अर्थ_( देखा कि_) राजा सोच से व्याकुल हैं, चेहरे का रंग उड़ गया है। जमीन पर ऐसे पड़े हैं मानो कमल जड़ छोड़कर ( जड़ से  ) मुर्झाया पड़ा हो। मंत्री मारे डर के कुछ पूछ नहीं सकते। तब अशुभ से भरी हुई शुभ से विहीन कैकेयी बोली_





परी न राजहि नींद निसि हेतु जान जगदीसु। रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु।।_अर्थ_राजा को रातभर नींद नहीं आती, इसका कारण जगदीश्वर ही जानें। इन्होंने  रखकर सवेरा कर लिया, परन्तु इसका भेद राजा कुछ नहीं बतलाते।




आनहु रामहि बेगि बोलाई। समाचार तब पूंछेहु आई।। चलेउ सुमंत्रु राय रुख जानी। लखी कुचालि कीन्हिं कछु रानी।।_अर्थ_ तुम जल्दी राम को बुला लाओ। तब आकर समाचार पूछ्ना। राजा का रुख जानकर सुमंत्र जी चले, समझ गये कि रानी ने कुछ कुचाल की है।




सोच बिकल मग परइ न पाउ। रामहि बोलि कहिहि का राऊ।। उर धरि धीर गयऊ दुआरे। पूछहि सकल देखि मन मारे।।_अर्थ_सुमंत सोच से व्याकुल हैं कि राम को बुलाकर क्या कहेंगे। मन में धीरज धरकर  द्वार पर गये कि मन मारे देखकर लोग क्या पूछेंगे।




समाधान करि सो सबही का। गयउ जहां दिनकरकुल टीका। राम सुमंत्रहिं आवत देखा। आदर कीन्ह पिता सम लेखा।।_अर्थ_सबका समाधान करके सुमंत्र वहां गये जहां रघुकुलतिलक श्री राम थे। राम सुमंत्र को आते देखकर उनका पिता के समान आदर किया।




निरखहिं बदनु करि भूप रजाई। रघुकुलदीपहिं चलेगी लवाई।। रामु कुभांति सचिव संग जाहीं। देखि लोग जहं तहं बिलखाहीं।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के मुख को देखकर और राजा की आज्ञा सुनाकर वे रघुकुल के दीपक श्रीरामचन्द्रजी को अपने साथ लिवा चले। श्रीरामचन्द्र जी मंत्री के साथ बुरी तरह से ( बिना किसी लवाजमे के ) जा रहे हैं, यह देखकर लोग जहां_ यहां विषाद कर रहे हैं।

Thursday, 21 October 2021

अयोध्याकाण्ड

सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ। देखि दसा दुखु दारुन भयऊ।। भूमि सयन पट मोट पुराना। दिए डारि तन भूषन नाना।।_अर्थ_राजा डरते डरते अपनी प्यारी कैकेयी के पास गये। उसकी दशा देखकर उन्हें बड़ा ही दु:ख हुआ। कैकेयी जमीन पर पड़ी है। पुराना मोटा कपड़ा पहने हुए है। शरीर के नाना आभूषणों को उतारकर फेंक दिया है।   




कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी। अनअहिवातु सूच तनु भावी।। जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी। प्रान प्रिया केहि हेतु रिसानी।।_अर्थ_उस दुर्बुद्धि कैकेयी को यह कुबेषता ( बुरा वेष ) कैसी फब रही है, मानो भावी विधवापन की सूचना दे रही हों। राजा उसके पास जाकर कोमल वाणी से बोले, ' हे प्राणप्रिय ! किसलिए रूठी हो ?’




केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई। मानहुं सरोष भुअंग भामिनि बिषम भांति निहारई।। दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई। तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई।।_अर्थ_’ हे रानी ! किसलिये रूठी हो ?’ यह कहकर राजा उसे हाथ स्पर्श करते हैं तो वह उनके हाथ को ( झटककर ) हटा देती है और ऐसे देखती है मानो क्रोध में भरी हुई नागिन क्रूर दृष्टि से देख रही हो। दोनों ( वरदानों की ) वासनाएं उस नागिन की दो जीमें हैं और दोनों वरदान दांत हैं; वह काटने के लिये मर्म स्थान देख रही ‌है। तुलसीदास जी कहते हैं कि राजा दशरथ होनहार के वश में होकर इसे ( इस प्रकार हाथ झटकने और नागिन की भांति देखने को ) कामदेव की क्रीड़ा ही समझ रहे हैं।



बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचनि पिकबचनि। कारन मोहि  गजगामिनि निज कोप कर ।। _अर्थ_राजा बार बार कह रहे हैं_हे सुमुखी ! हे सुलोचनी ! हे कोकिलबयनी ! हे गजगामिनि ! मुझे अपने क्रोध का कारण तो सुना।




अनहित तोर प्रिया केइं कीन्हां। केहि दइ सिर केहि जमु चह लीन्हा ।। कहुं केहि रंकहि करौं नरेसू। कहु केहि नृपहि निकासौं देसू।।_अर्थ_ हे प्रिये ! किसने तेरा अनिष्ट किया ? किसके दो सिर हैं ? यमराज किसको लेना ( अपने लोक को ले जाना ) चाहते हैं ? कह, किस कंगाल को राजा कर दूं या किस राजा को देश से निकाल दूं।












Monday, 11 October 2021

अयोध्याकाण्ड

दीख मंथरा नगरु बनावा। मंजुल मंगल बाज बधावा।। पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू। राम तिलकु सुनि भा उर दाहू।।_अर्थ_मंथरा ने देखा कि नगर सजाया हुआ है। सुन्दर मंगलमय बधावे बज रहे हैं। उसने लोगों से पूछा कि कैसा उत्सव है ? ( उनसे ) श्रीरामचन्द्रजी के राजतिलक की बात सुनते ही उसका हृदय जल उठा।





करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती। होई अकाजु कवनि बिधि राती।। देखि लागि मधु कुटिल किराती। जिमि गवां तकइ केहि भांति।।_अर्थ_वह दुर्बुद्धि नीच जातिवाली दासी  विचार करने लगी किस प्रकार से यह काम रात_ही_रात में बिगड़ जाय, जैसे कोई कुटिल भीलनी शहद का छत्ता लगा देखकर घात लगाती है कि इसको किस तरह से उखाड़ लूं।





भरत मातु पहिं गई बिलखानी। का अनमनि हसि कह हंसी रानी।। ऊतरु देइ न लेइ उसासू। नारि चरित करि ढ़ारइ आंसू।।_अर्थ_वह उदास होकर भरतजी की माता कैकेई के पास गयी। रानी कैकेयी ने कहा_तू उदास क्यों है ? मंथरा कुछ उत्तर नहीं देती, केवल लंबी सांस ले रही है और त्रियाचरित्र करके आंसू ढ़रका रही है।





हंसि कह रानि गालु बड़ तोरे । दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें।। तबहुं न बोल चेरि बड़ि पापिनि। छाड़इ स्वास कालि जनु सांपिनि।।_अर्थ_रानी हंसकर कहने लगी कि तेरे बड़े गाल हैं ( तू बहुत बढ़_बढ़कर बोलने वाली है )। मेरा मन कहता है कि लक्ष्मण ने तुझे कुछ सीख दी है ( दण्ड दिया है ) । तब भी महापापिनी दासी कुछ नहीं बोलती। ऐसी लम्बी सांसे छोड़ रही है मानो काली नागिन ( फुफकार छोड़ रही ) हो।





सभय रानि कह कहसि किन कुसल रामु महिपाल। लखनु भरतु रिपुदमनु सुनि भा कुबरी उर सालु।।_अर्थ_तब रानी ने डरकर कहा_अरी ! कहती क्यों नहीं ? श्रीरामचन्द्र, राजा, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न कुशल से तो हैं ? यह सुनकर कुबरी मंथरा के हृदय में बड़ी ही पीड़ा हुई।






कत सिख देइ हमहि कोउ माई। गालु करब केहि कर बलु पाई।। रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू। जेहि जनेसु देइ जुबराजू।।_अर्थ_( वह कहने लगी_) हे माई ! हमें कोई क्यों सीख देगा और मैं किसका बल पाकर गाल करूंगी ( बढ़_बढ़कर बोलूंगी ) । रामचन्द्र को छोड़कर आज और किसकी कुशल है, जिन्हें राजा युवराज पद दे रहे हैं।





भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन। देखत गरब रहत उर नाहिन।। देखहु कस न जाइ सब सोभा। जो अवलोकि मोर मनु छोभा।।_अर्थ_आज कौशल्या को विधाता बहुत ही दाहिने ( अनुकूल ) हुए हैं; यह देखकर उनके हृदय में गर्व समाता नहीं। तुम स्वयं जाकर सब शोभा देख क्यों नहीं लेतीं, जिसे देखकर मेरे मन में क्षोभ हुआ है।





पूतु बिदेस न सोच तुम्हारें। जानति हहु बस नाहु हमारें।। नींद बहुत प्रिय सेज तुराई। लखहु न भूप कपट चतुराई।।_अर्थ_ तुम्हारा पुत्र परदेस में है, तुम्हें कुछ सोच नहीं। जानती हो कि स्वामी हमारे वश में हैं। तुम्हें तो तोशक_पलंग पर पड़े_पड़े नींद लेना ही बहुत प्यारा लगता है, राजा की कपटभरी चतुराई तुम नहीं देखती।





सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी। झुकी रानि अब रहुं अरगानी।। पुनि अस कबहुंक कहसि घरफोरी। तब धरि जीभ कढ़ावउं तोरी।।_अर्थ_मंथरा के प्रिय वचन सुनकर किन्तु उसको मन की मैली जानकर रानी झुककर ( डांटकर ) बोली_बस, अब चुप रह घरफोड़ी कहीं की ! जो फिर कभी ऐसा कहा तो तेरी जीभ पकड़कर निकलवा दूंगी।





काने खोरे कूबरे कुटिल कुचालि जानि। तिय बिसेषि पुनि चेरि कहि भरतमातु मुसुकानि।।_अर्थ_कानों, लंगड़ों और कुबड़ों को कुटिल और कुचाली जानना चाहिये। उनमें भी स्त्री और खासकर दासी ! इतना कहकर भरत की माता कैकेयीजी मुस्करा दीं।






प्रियबादिनि सिख दीन्हिउं तोही। सपनेहुं तो पर कोप न मोही।। सुदिनु सुमंगल दायकु सोई। तोर कहा फुर जेहि दिन होई।।_अर्थ_( और फिर बोलीं_) हे प्रिय वचन कहनेवाली मंथरा ! मैंने तुझको यह सीख दी है ( शिक्षा के लिये इतनी बात कही है )। मुझे तुझपर स्वप्न में भी क्रोध नहीं है। सुन्दर मंगलदायक शुभ दिन वही होगा जिस दिन तेरा कहना सत्य होगा ( अर्थात् श्रीराम का राज्यतिलक होगा )।





जेठ स्वामि सेवक लघु भाई। यह दिनकर कुल रीति सुहाई।। राम तिलक जौं सांचेहुं काली। देहु मागु मन भावत  आली।।_अर्थ_बड़ा भाई स्वामि और छोटा भाई सेवक होता है। यह सूर्यवंश की सुहावनी रीति ही है। यदि सचमुच कल ही श्रीराम का तिलक है, तो हे सखी ! तेरे मन को अच्छी लगे वहीं वस्तु मांग ले, मैं दूंगी।





कौशल्या सम सब महतारी। रामहिं सहज सुभाय पिआरी।। मो पर करहिं सनेहु बिसेषी। मैं करि प्रीति परीछा देखी।।_अर्थ_राम को सहज स्वभाव से सब माताएं कौशल्या के समान ही प्यारी हैं। मुझपर तो वे विशेष प्रेम करते हैं। मैंने उनकी प्रीति की परीक्षा करके देख ली है।





जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू। होहुं राम सिय पूत पुतोहू।। प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें। तिन्ह के तिलक छोभु कस तोरें।।_अर्थ_यदि विधाता कृपा करके जन्म दें तो ( यह भी दें कि ) श्रीरामचन्द्र पुत्र और सीता बहू हों। श्रीराम मुझे प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। उनके तिलक से ( उनके तिलक की बात सुनकर ) तुझे क्षोभ कैसा ?





भरत सपथ तोहि सत्य कहु परिहरि कपट दुराउ। हरष समय बिसमउ करसि कारन मोहि सुनाउ।।_अर्थ_तुझे भरत की सौगंध है, छल_कपट छोड़कर सच_सच कह। तू हर्ष के समय विषाद कर रही है, इसका कारण सुना।





एकहिं बार आस सब पूजी। अब कछु कहब जीभ करि दूजी।। फोरै जोगु कपारु अभागा। भलेउ कहत दुख रौरेहु लागा।।_अर्थ_( मन्थरा ने कहा_) सारी आशाएं तो एक ही बार कहने में पूरी हो गयी। अब तो दूसरी जीभ लगाकर कुछ कहूंगी। मेरा अभागा कपाल तो फोड़ने के ही योग्य है, जो अच्छी बात कहने पर भी आपको दु:ख होता है।





कहहिं झूठि फुरि बात बनाई। ये तुम्हहि करुइ मैं माई।। हमहुं कहबि अब ठकुरसोहाती। नाहिं त मौन रहब दिन राती।।_अर्थ_जो झूठी सच्ची बातें बनाकर कहते हैं, हे माई ! वे ही तुम्हें प्रिय हैं और और मैं कड़वी लगती हूं ! अब मैं भी ठकुरसुहाती ( मुंहदेखी ) कहा करूंगी। नहीं तो दिन रात चुप रहूंगी।





करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा। बवा सो लुनि लहिअ जो दीन्हा।। कोऊ नृप होउ हमहि का हानी। चेरि छाड़ि अब होब कि रानी।।_अर्थ_विधाता ने कुरूप बनाकर मुझे परबस कर दिया ! ( दूसरे को क्या दोष ) जो बोया सो काटती हूं, दिया सो पाती हूं। कोई भी राजा हो, हमारी क्या हानि है ? दासी छोड़कर क्या अब मैं रानी होउंगी ! ( अर्थात् रानी तो होने से रही )।





जारै जोगु सुभाउ हमारा। अनभल देखि न जाइ तुम्हारा।। तातें कछुक बात अनुसारी। छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी।।_अर्थ_हमारा स्वभाव तो जलाने ही योग्य है। क्योंकि तुम्हारा अहित मुझसे देखा नहीं जाता। इसीलिये कुछ बात चलायी थी। किन्तु हे देवी ! हमारी बड़ी भूल हुई, क्षमा करो।





गूढ़ कपट प्रिय बचन सुनि तीय अधरबुधि रानी। सुरमायाबस बैरिनिहि सुहृद जानि पतिआनि।।_अर्थ_आधाररहित ( अस्थिर ) बुद्धि की स्त्री और देवताओं की माया के वश में होने के कारण रहस्ययुक्त कपटभरे प्रियभरे वचनों को सुनकर रानी कैकेयी ने दासी मंथरा को अपनी सुहृद ( अहैतुक हित करनेवाली ) जानकर उसका विश्वास कर लिया।





सादर पुनि पुनि पूंछति ओही। सबरी गान मृगी जनु मोही।। तसि मति फिरि अहइ जब भाबी। रहसि चेरि घात जनु फाबी।।_अर्थ_बार_बार रानी उससे आदर के साथ पूछ रही है, मानो भीलनी के गान से हिरनी मोहित हो गयी हो। जैसी भावी ( होनहार ) है, वैसी ही बुद्धि भी फिर गयी। दासी अपना दांव लगा जानकर हर्षित हुई।





तुम्ह पूछहु मैं कहत डेराउं। धरेहु मोर घरफोरी नाउं।। सजि प्रतीति बहुविधि गढ़ि छोली। अवध साढ़साती तब बोली।।_अर्थ_तुम पूछती हो, किन्तु मैं कहते डरती हूं।  तुमने पहले ही मेरा नाम घरफोरी रख दिया है। इस तरह बहुत छल से पूर्ण मनगढ़ंत बात कहकर रानी को अपने वश में करके अयोध्या की साढ़ेसाती बोली_






प्रिय सिय राम कहा तुम्ह रानी। रामहि तुम्ह सो फुरि बानी।। रहा प्रथम अब ये दिन बीते। समउ फिरें रिपु होहिं पिरीते।।_अर्थ_हे रानी ! तुमने जो कहा कि मुझे सीता_राम प्रिय हैं और राम को तुम प्रिय हो, सो यह बात सच्ची है। परन्तु यह बात पहले थी, वे दिन अब बीत गये। समय फिर जाने पर मित्र भी शत्रु हो जाते हैं।





भानु कमल कुल पोषनिहारा। बिनु जल जारि करइ सोइ छारा।। जरि तुम्हारि चह सवति उखारी। रूंधेहु करि उपाउ बर बारी।।_अर्थ_सूर्य कमल के कुल का पालन करनेवाला है, पर बिना जल के वहीं सूर्य उनको ( कमलों को ) जलाकर भस्म कर देता है। सौत कौसल्या तुम्हारी जड़ उखाड़ना चाहती है। अतः उपायरूपी श्रेष्ठ बाड़ ( घेरा ) लगाकर उसे रूंध दो ( सुरक्षित कर दो )।





तुम्हहि न सोच सोहाग बल निज बस जानहु राउ। मन मलीन मुंह मीठ नृपु राउर सरल सुभाउ।।_अर्थ_तुमको अपने सुहाग के ( झूठे ) विश्वास पर कुछ भी सोच नहीं है; राजा को अपने वश में जानती हो। किन्तु राजा मन के मैले और मुंह के मीठे हैं ! और आपका सीधा स्वभाव है।





चतुर गंभीर राम महतारी। बीचु पाई निज बात संवारी।। सौत तुम्हार कौसिलहिं माई। कपट चतुर नहिं होई जनाई।।_अर्थ_( कौसल्या समझती है कि ) और सब सौतें तो मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरत की मां पति के बल पर गर्वित रहती हैं ! इसी से हे माई ! कोसल्या को तुम बहुत साल ( खटक ) रही हो। किन्तु वह कपट करने में चतुर है; अतः उसका हृदय का भाव जानने में नहीं आता ( वह उसे चतुरता से छिपाये रखती है )।





सेवहिं सकल सवति मोहि नीके। गरबित भरत मातु बल पी कें।। सालु तुम्हार कौसिलहिं माई। कपट चतुर नहिं होई जनाई।।_अर्थ_(कौशल्या समझती है कि ) और सब सौतें मेरी अच्छी तरह सेवा करती हैं, एक भरत की मां पति के बल पर गर्वित रहती है ! इसी से हे माई ! कौशल्या को तुम बहुत ही साल ( खटक ) रही हो। किन्तु वह कपट करने में चतुर है; अतः उसके हृदय का भाव जानने में नहीं आता (वह उसे चतुरता से छिपाये रहती है।





राजहि तुम पर प्रेम बिसेषी। सवति सुभाय सकइ नहिं देखी।। रचि प्रपंच भूपहिं अपनाई। राम तिलक हित लगन धराई।।_अर्थ_राजा का तुम पर विशेष प्रेम है। कौशल्या सौत के स्वभाव से उसे देख नहीं सकती। इसीलिये उसने जाल रचकर राजा को अपने वश में करके, ( भरत की अनुपस्थिति में ) राम के राजतिलक के लग्न निश्चय करा लिया।





यह कुल उचित राम कहुं टीका। सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका।। आगिलि बात समुझि डरु मोही। देउ दैउ फिरि सो फलु ओही।।_अर्थ_राम को तिलक हो, यह कुल ( रघुकुल ) के उचित ही है और यह बात सभी को सुहाती है;  और मुझे तो बहुत ही अच्छी लगती है। परन्तु मुझे तो आगे की बात से डर लगता है। दैव उलटकर इसका फल उसी ( कौशल्या ) को दे।





रूचि पचि कोटि कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु। कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु।।_अर्थ_इस तरह करोड़ों कुटिलपन की बातें गढ़_छोलकर मंथरा ने कैकेयी को उल्टा_सीधा समझा दिया और सैकड़ों सौतों की कहानियां इस प्रकार ( बना_बनाकर ) कहीं जिस प्रकार विरोध बढे। 





भावी बस प्रतीति उर आई। पूंछ रानी पुनि सपथ देवाई।। का पूंछहु तुम्ह अबहूं न जाना। निज हित अनहित पसु पहिचाना।।_अर्थ_होनहारवश कैकेयी के मन में विश्वास हो गया। रानी फिर सौगंध दिलाकर पूछने लगी। ( मन्थरा बोली_) क्या पूछती हो ? अरे तुमने अब भी नहीं समझा ? अपने भले_बुरे को ( अथवा मित्र शत्रु को ) तो पशु भी पहचान लेते हैं।





भयउ पाखु दिन सजत समाजू। तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू।। खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारे। सत्य कहें नहिं दोषु हमारे।।_अर्थ_पूरा पखवाड़ा बीत गया सामान सजते और तुमने खबर पायी है आज मुझसे।  मैं तुम्हारे राज्य में खाती पहनती हूं, इसलिेए सच कहने में मुझे कोई दोष नहीं है।





जौं असत्य कछु कहब बनाई। तौं बिधि देइहि हमहि सजाई।। रामहिं तिलक कालि जौं भयऊ। तुम्ह कहुं बिपति बीजु बिधि बयऊ।।_अर्थ_यदि मैं कुछ बनाकर झूठ कहती होऊंगी तो विधाता मुझे दंड देगा। यदि कल राम को राजतिलक हो गया ( समझ रखना कि ) तुम्हारे लिये विधाता ने विपत्ति का बीज बो दिया।





रेख खंचाइ कहउं बलु भाषी। भामिनि भयहु दूध कई माखी।। जौं सुत सहित करहु सेवकाई। तौं घर रहहु न आन उपाई।।_अर्थ_मैं यह बात लकीर खींचकर बलपूर्वक कहती हूं, हे भामिनी ! तुम तो अब दूध की मक्खी हो गयी ! ( जैसे दूध में पड़ी हुई मक्खी को लोग निकालकर फेंक देते हैं, वैसे ही तुम्हें भी लोग घर से निकाल बाहर करेंगे ) यदि पुत्र सहित ( कौशल्या की ) चाकरी बजाओगी तो घर में रह सकोगी; ( अन्यथा घर में रहने का ) दूसरा उपाय नहीं।





कद्रूं बिनतहिं दीन्ह दुखु तुम्हहिं कौसिलां देब। भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब।।_अर्थ_कद्रू ने बिनता को दु:ख दिया था, तुम्हें कौशल्या देगी। भरत कारागार का सेवन करेंगे ( जेल की हवा खायेंगे ) और लक्ष्मण राम के नायाब ( सहकारी ) होंगे।





कैकयसुता सुनत कटु बानी। कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी।। तन पसेउ कदली जिमि कांपी। कुबरी दसन जीभ तब चांपी।।_अर्थ_कैकेयी मंथरा की कड़वी बाणी सुनते ही डरकर सूख गयी, कुछ बोल नहीं सकती। शरीर में पसीना हो आया और वह केले के तरह कांपने लगी। तब कुबरी ( मंथरा ) ने अपनी जीभ दांतों तले दबायी ( उसे भय कि कहीं भविष्य का अत्यन्त डरावना चित्र सुनकर कैकेयी की हृदय की गति न रुक जाय; जिससे उलटा सारा काम ही बिगड़ जाय )।






कहि कहि कोटि कपट कहानी। धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी।। फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली। बकिहि सराहइ मानि मराली।।_अर्थ_फिर कपट की करोड़ों कहानियां कह_कहकर उसने रानी को खूब समझाया कि धीरज रखो ! कैकेयी का भाग्य पलट गया, उसे कुचाल प्यारी लगी। वह बगुली को हंसिनी बनाकर ( वैरिन को हित मानकर ) उसकी सराहना करने लगी।





सुनु मंथरा बात फुरि तोरी। दाहिनि आंख नित फरकइ मोरी।। दिन प्रति देखउं राति कुसपने। कहउं न तोहि मोह बस अपने।।_अर्थ_कैकेयी ने कहा_मन्थरा सुन, तेरी बात सत्य है। मेरी दाहिनी आंख नित्य फड़का करती है। मैं प्रतिदिन रात को बुरे स्वप्न देखती हूं; किन्तु अपने अज्ञानवश तुझसे कहती नहीं।





काह करौं सखी सूध सुभाऊ। दाहिन बाम न जानउं काऊ।।_अर्थ_सखी ! क्या करूं, मेरा तो सीधा स्वभाव है। मैं दायां_बायां कुछ नहीं जानती।





अपनें चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह। केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअं दुसह दुखु दीन्ह।।_अर्थ_अपनी चलते ( जहां तक मेरा वश चला ) मैंने आज तक कभी किसी का बुरा नहीं किया। फिर न जाने किस पाप से दैव ने एक ही साथ मुझे दु:सह दु:ख दिया।





नैहर जनमु भरब बरु जाई। जिअत न करबि सवति सेवकाई।। अरि बस दैव जिआवत जाही। मरनु नीक तेहि जीवन चाही।।_अर्थ_मैं भले ही नैहर जाकर वहीं जीवन बिता दूंगी; पर जीते जी सौत की चाकरी नहीं करूंगी। दैव जिसको शत्रु के वश में रखकर जिलाता है, उसके लिये तो जीने के अपेक्षा मरना ही अच्छा है।





दीन बचन कह बहुबिधि रानी। सुनि कुबरीं तियमाया ठानी।। अब कस कहहु मानि मन ऊना। सुखु सोहागु तुम्ह कहुं दिन दूना।।_अर्थ_रानी ने बहुत प्रकार के दिन बचन कहे। उन्हें सुनकर कुबरी ने त्रियाचरित्र फैलाया। ( वह बोली_) तुम मन में ग्लानि मानकर ऐसा क्यों कह रही हो, तुम्हारा सुख_सुहाग दिन_दिन दूना होगा।





जेहिं राहुर अति अनभल ताका। सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका।। जब ते कुमत सुना मैं स्वामिनि। भूख न बासर नींद न जामिनि।।_अर्थ_जिसने तुम्हारी बुराई चाही है, वही परिणाम में यह ( बुराईरूप ) फल पायेगी। हे स्वामिनी ! मैंने जबसे यह कुमत सुना है, तबसे मुझे न तो दिन में भूख लगती है और न रात में नींद ही आती है।






पूंछेउं गुनिन्ह रेख तिन्ह खांची। भरत भुआल होहिं यह सांची।। भामिनि करहु तो कहौं उपाऊ। हैं तुम्हारी सेवा बस राऊ।।_अर्थ_मैंने ज्योतिषियों से पूछा, तो उन्होंने रेखा खींच कर ( गणित करके अथवा निश्चयपूर्वक )  कहा कि भरत राजा होंगे, यह सत्य बात है। सो हे भामिनि ! तुम करो, तो उपाय मैं बताऊं। राजा तुम्हारे सेवा के वश में हैं ही।





परउं कूप तुअ बचन पर सकउं पूत पति त्यागि। कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि।।_अर्थ_( कैकेयी ने कहा_)मैं तेरे कहने से कुएं में गिर सकती हूं, पुत्र और पति को भी छोड़ सकती हूं। जब तू मेरा बड़ा भारी दु:ख देखकर कुछ कहती हैं तो भला मैं अपने हित के लिये उसे क्यों न करूंगी ?





कुबरीं करि कबुली कैकेई। कपट छुरी उर पाहन टेई।। लखइ न रानि निकट दुखु कैसें। चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें।।_अर्थ_कुबरी ने कैकेयी को ( सब तरह से ) कबूल करवाकर ( अर्थात् बलिपशु बनाकर ) कपटरूप छुरी को अपने  ( कठोर ) हृदयरूपी पत्थर पर टेया ( उसकी धार को तेज किया )। रानी कैकेयी अपने निकट के ( शीघ्र आनेवाले ) दु:ख को कैसे नहीं देखती जैसे बलि का पशु हरी_हरी घास चलता है ( पर यह नहीं जानता कि मौत सिर पर नाच रही है।





सुनत बात मृदु अंत कठोरी। देखि मनहुं मधु माहुरी घोरी।। कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाहीं। स्वामिनी कहिहु कथा मोहि पाहीं।।_अर्थ_मन्थरा की बातें सुनने में तो कोमल हैं, पर परिणाम में कठोर ( भयानक ) हैं। मानो वह शहद में घोलकर जहर पिला रही हो। दासी कहती है_हे स्वामिनी ! तुमने मुझको एक कथा कही थी,  उसकी याद है कि नहीं ?






दुइ बरदान भूप सन थाती। मागहु आजु जुरावहु छाती।। सुतहि राजु रामहि बनवासू। देहु लेहु सब सवति हुलासू।_अर्थ_तुम्हारे दो वरदान राजा के पास धरोहर हैं। आज उन्हें राजा से मांगकर अपनी छाती ठंडी करो। पुत्र को राज्य और राम को वनवास दो और सौत का सारा आनन्द तुम ले लो।





भूपति राम सपथ जब करई। तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई।। होई अकाजु आजु निसि बीतें। बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें।।_अर्थ_जब राजा राम की सौगंध खा लें, तब वर मांगना, जिससे वचन न टलने पावे। आज की रात बीत गयी, तो काम बिगड़ जायगा। मेरी बात को हृदय से प्रिय ( प्राणों से भी प्यारी ) समझना।





बड़ कुघात करि पातकिनि कहेसि कोपगृह जाहु। काजु  संवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु।।_अर्थ_पापिनी मंथरा ने बड़ी बुरी घात लगाकर कहा_कोपभवन में जाओ। सब काम बड़ी सावधानी से बनाना, राजा पर सहसा विश्वास न कर लेना ( उनकी बातों में न आ जाना )।




कुबरिहि रानी प्राणप्रिय जानी। बार बार बड़ि बुद्धि बखानी।। तोहि सम हित न मोर संसारा। बहे जात कर भइसि अधारा।।_अर्थ_कुबरी को रानी प्राणों के समान प्रिय समझकर बार_बार उसकी बुद्धि का बखान किया और बोली_संसार में मेरा तेरे समान हितकारी और कोई नहीं है। तू मुझ बही जाती हुई के लिये सहारा हुई है।





जौं बिधि पुरब मनोरथ काली। करौं तोहि चख पुतरि आली।। बहुबिधि चेरिहि आदरु देई। कोपभवन गवनी कैकेई।।_अर्थ_यदि विधाता कल मेरा मनोरथ पूरा कर दें तो हे सखी ! मैं तुझे आंखों की पुतली बना लूं। इस प्रकार दासी को बहुत तरह से आदर देकर कैकेयी कोपभवन में चली गयी।





बिपति बीजु बरषा रितु चेरी। भुईं भई कुमति कैकेई केरी।। पाइ कपट जल अंकुर जामा। बर दोउ दल दुख फल परिनामा।।_अर्थ_विपत्ति ( कलह ) बीज है, दासी बर्षा_ऋतु है, कैकेयी की कुबुद्धि ( उस बीज के बोने के लिये ) जमीन हो गयी। उसमें कपटरूपी जल पाकर अंकुर फूट निकला। दोनों वरदान उस अंकुर के दो पत्ते हैं और अंत में इसके दुख रूपी फल होगा।





कोप समाजु साजि सबु सोई। राजु करत निज कुमति बिगोई।। राउर नगर कोलाहलु होई। यह कुचालि कछु जान न कोई।।_अर्थ_कैकेयी कोप का सब साज सजकर ( कोपभवन में जा सोयी। राज्य करती हुई वह अपनी दुष्ट बुद्धि से नष्ट हो गयी। राजमहल और नगर में धूमधाम मच रही है। इस कुचाल को कोई कुछ नहीं जानता।





प्रमुदित पुर नर नारि सब सजहिं मंगलचार। एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार।।_अर्थ_बड़े ही आनन्दित होकर नगर के सब स्त्री-पुरुष शुभ मंगलाचार के साज सज रहे हैं। कोई भीतर जाता है कोई बाहर निकलता है; राजद्वार में बड़ी भीड़ हो रही है।





बालसखा सुनि हिय हरषाहीं। मिलि दस पांच राम पहिं ‌जाहीं।। प्रभु आदरहिं प्रेम पहिचानी। पूछहिं कुसल खेम मृदु बानी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के बाल सखा राजतिलक का समाचार सुनकर हृदय में हर्षित होते हैं। वे दस पांच मिलकर श्रीरामचन्द्र जी के पास जाते हैं। प्रेम पहचानकर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी उनका आदर करते हैं और कोमल वाणी से कुशल_क्षेम पूछते हैं।





फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई। करत परस्पर राम बड़ाई।। को रघुबीर सरिस संसारा। सीलु सनेह निबाहनिहारा।।_अर्थ_अपने प्रिय सखा श्रीरामचन्द्र जी की आज्ञा पाकर वे आपस में एक_दूसरे से श्रीरामचन्द्र जी की बड़ाई करते हुए घर लौटते हैं और कहते हैं_संसार में श्रीरघुनाथजी के समान शील और स्नेह को निबाहनेवाला कौन है ? 





जेहिं जेहिं जोनि करम बस भ्रमहीं। तहं तहं ईसु देउ यह हमहीं।। सेवक हम स्वामी सियनाहू। होउ नात यह ओर निबाहू।।_अर्थ_भगवान् हमें यही दें कि हम अपने कर्मवश भ्रमते हुए जिस जिस योनि में जन्में वहां_वहां ( उस उस, योनि में ) हम तो सेवक हों और सीतापति श्रीरामचन्द्र जी हमारे स्वामी हों और यह नाता अंत तक निभ जाय।





अस अभिलाषु नगर सब काहू। कैकयसुता हृदयं अति दाहू।। को न कुसंगति पाइ नसाई। रहइ न नीच मतें चतुराई।।_अर्थ_नगर में सबकी ही ऐसी अभिलाषा है। परन्तु कैकेयी के हृदय में बड़ी जलन हो रही है। कुसंगति पाकर कौन नष्ट नहीं होता। नीच के मत के अनुसार चलने से चतुराई नहीं रह जाती।





सांझ समय सानंद नृपु गयी कैकेई गेहं। गवनु निठुरता निकट किय तनु धरि देह सनेहं।।_अर्थ_सन्ध्या के समय राजा दशरथ आनंद के साथ कैकेयी के महल में गये। मानो साक्षात् स्नेह ही शरीर धारण कर निष्ठुरता के पास गया हो।





कोपभवन सुनि सकुचेउ राऊ। भय बस अगहुड़ परन पाऊ।। सुरपति बसा बाहुबल जाकें। नरपति रहहिं सकल रुख ताकें।।_अर्थ_कोपभवन का नाम सुनकर राजा सहम गये। डर के मारे उनका पांव आगे को नहीं पड़ता। स्वयं देवराज इन्द्र जिनकी भुजाओं के बल पर ( राक्षसों से निर्भय होकर ) बसता है और संपूर्ण राजा लोग जिनका रुख देखते रहते हैं,





सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई। देखहु काम प्रताप बड़ाई।। सूल कुलिस अति अंगवनिहारे। ते रतिनाथ सुमन सर मारे।।_अर्थ_वही राजा दशरथ स्त्री का क्रोध सुनकर सूख गये। कामदेव का प्रताप और महिमा तो देखिये। जो त्रिशूल, वज्र और तलवार आदि का चोट अपने अंगों पर सहनेवाले हैं, वे रतिनाथ कामदेव के पुष्प बाण से मारे गये।

Thursday, 12 August 2021

अयोध्याकाण्ड

नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें। लोकप करहिं प्रीति रुख राखें।। त्रिभुवन तीनि काल जग माहीं। भूरिभाग दशरथ सब नाहीं।।_अर्थ_सब राजा उनकी कृपा चाहते हैं और लोकपालगण उनके रुख को रखते हुए ( अनुकूल होकर ) प्रीति करते हैं। ( पृथ्वी, आकाश और पाताल ) तीनों भुवनों में और ( भूत, भविष्य, वर्तमान ) तीनों कालों में दशरथजी के समान बड़भागी और कोई नहीं है।





मंगलमूल रामु सुत जासू। जो कछु कहिए थोर सबु तासू।। राय सुभायं मुकुरु कर लीन्हा। बदनु बिलोकि मुकुटु सम कीन्हा ।।_अर्थ_मंगलों के मूल श्रीरामचन्द्रजी जिनके पुत्र हैं, उनके लिये जो कुछ कहा जाय सब थोड़ा है। राजा ने  स्वाभाविक ही हाथ में दर्पण ले लिया और उसमें अपना मुंह देखकर मुकुट को सीधा किया।





श्रवन समीप भए सित केसा। मनहुं जरठपन अस उपदेसा।। नृप जुबराजु राम कहुं देहू। जीवन जनम लाहु किन लेहू।।_अर्थ_( देखा कि ) कानों के पास बाल सफेद हो गये हैं, मानो बुढ़ापा ऐसा उपदेश कर रहा है कि हे राजन् ! श्रीरामचन्द्रजी को युवराज_पद लेकर अपने जीवन और जन्म  का लाभ क्यों नहीं लेते।





यह बिचारि उर आनि नृप। सुदिनु सुअवसरु पाइ। प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ।।_अर्थ_हृदय में यह विचार लाकर ( युवराज पद देने का निश्चय कर ) राजा दशरथजी ने शुभ दिन और सुन्दर समय पाकर, प्रेम से पुलकित शरीर हो आनन्द मग्न मन से उसे गुरु वसिष्ठ जी को जा सुनाया।





कहइ भुआल सुनिअ मुनिनायक। भए राम सब बिधि सब लायक।। सेवक सचिव सकल पुरबासी। जे हमरे अरि मित्र उदासी।।_अर्थ_राजा ने कहा_ हे मुनिराज ! ( कृपया यह निवेदन ) सुनिये। श्रीरामचन्द्र अब सब प्रकार से योग्य हो और गये हैं। सेवक, मंत्री, सब नगरवासी और जो हमारे शत्रु, मित्र हैं__





सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही। प्रभु असीस तनु धनु धरि सोही।। बिप्र सहित परिवार गोसाईं। करहिं छोहु सब रौरिहि नाईं।।_अर्थ_सभी को श्रीरामचन्द्र वैसे ही प्रिय हैं जैसे वे मुझको हैं। ( उनके रूप में ) आपका आशीर्वाद ही मानो शरीर धारण करके शोभित हो रहा है। हे स्वामी ! सारे ब्राह्मण परिवार सहित आपके ही समान उनपर स्नेह करते हैं।





जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं। ते जनु सकल बिभव बस करहीं।। मोहि  यह अनुभयउ न दूजें। सबु पायउं रज पावनि पूजें।।_अर्थ_जो लोग गुरु के चरणों की रज को मस्तक पर धारण करते हैं, वे मानो समस्त ऐश्वर्य को अपने वश में कर लेते हैं। इसका अनुभव मेरे समान दूसरे किसी ने नहीं किया। आपकी पवित्र चरण रज की पूजा करके मैंने सबकुछ पा लिया।





अब अभिलाषु एकु मन मोरें। पूजिहि नाथ अनुग्रह तोरें।। मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू। कहेउ नरेस रजायसु देहू।।_अर्थ_अब मेरे मन में एक ही अभिलाषा है। हे नाथ ! वह भी आपके  अनुग्रह से पूरी होगी। राजा का सहज प्रेम देखकर मुनि ने प्रसन्न होकर कहा_नरेश ! आज्ञा दीजिये ( कहिये क्या अभिलाषा है ? )। 





राजन राउर नाम जसु सब अभिमत दातार। फल अनुगामी महीप मनि मन अभिलाषु तुम्हार।।_अर्थ_हे राजन् ! आपका नाम और यश ही संपूर्ण मनचाही वस्तुओं को देनेवाला है। हे राजाओं के मुकुटमणि ! आपके मन की अभिलाषा फल का अनुगमन करती है ( अर्थात् आपकी इच्छा करने के पहले ही फल उत्पन्न हो जाता है।





अब बिधि गुरु प्रसन्न जिय जानी। बोलेउ राउ रहंसि मृदु बानी।। नाथ राम करिअहिं जुबराजू। कहिए कृपा करि करिय समाजू।।_अर्थ_गुरु को प्रसन्न देखकर राजा ने मीठी वाणी से कहा कि वे श्रीरामचन्द्र जी को युवराज बनाना चाहते हैं।





मोहि अछत यह होहु उछाहू। लहहिं लोग सब लोचन लाहू।। प्रभु प्रसाद सिव सबहिं निबाहीं। यह लालसा एक मन माहीं।।_अर्थ_मेरे जीते_जी यह आनन्द उत्सव हो जाय, ( जिससे ) सब लोग अपने नेत्रों का लाभ प्राप्त करें। प्रभु ( आप )_के प्रसाद से शिवजी ने सबकुछ निबाह दिया ( सब इच्छाएं पूर्ण कर दीं ), केवल यही एक लालसा मनमें रह गयीं हैं।





पुनि न सोच तन रहउ कि जाऊ। जेहि न होई पाछे पछिताऊ।। सुनि मुनि दशरथ बचन सुहाए। मंगल मोद मूल मन भाए।।_अर्थ_इस ( लालसा के पूर्ण हो जाने पर ) फिर सोच नहीं, शरीर रहे या चला जाय, जिससे मुझे पीछे पछतावा न हो। दशरथजी के मंगल और आनंद के मूल सुन्दर वचन सुनकर मुनि मन में बहुत प्रसन्न हुए।





सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं। जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं।। भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी। रामु पुनीत प्रेम अनुगामी।।_अर्थ_( बसिष्ठजी ने कहा_ ) हे राजन् ! सुनिये, जिनसे बिमुख होकर लोग पछताते हैं और जिनके भजन बिना जी की जलन नहीं जाती, वहीं स्वामी ( सर्वलोकमहेश्वर ) श्रीरामजी आपके पुत्र हुए हैं, जो पवित्र प्रेम के अनुगामी हैं। ( श्रीरामजी पवित्र प्रेम के पीछे_पीछे चलनेवाले हैं।





बेगि बिलंबु न करिअ नृप  साजिय सबुइ समाजु। सुदिन सुमंगल तबहिं जब राम होहिं जुबराजु।।_अर्थ_हे राजन् ! अब देर न कीजिये, शीघ्र सब सामान सजाइये। शुभ दिन और सुन्दर मंगल तभी है जब श्रीरामचन्द्र जी युवराज हो  ( अर्थात् उनके अभिषेक के लिये शुभ और मंगलमय है।





मुदित महीपति मंदिर आए। सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए। कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए। भूप सुमंगल बचन सुनाए।।_अर्थ_राजा आनन्दित होकर महल में आये और उन्होंने सेवकों तथा मंत्री सुमंत्र को बुलवाया। उन लोगों ने ' जय जीव’ कहकर सिर नवाये। तब राजा ने सुन्दर मंगलमय वचन ( श्रीरामजी को युवराज पद देने का प्रस्ताव ) सुनाये।





जौं पाचहुं मत लागै नीका। करहुं हरषि हियं रामहि टीका।।_अर्थ_( और कहा_ ) यदि पंचों को ( आप सबको ) यह मत अच्छा लगे, तो हृदय में हर्षित होकर आपलोग श्रीरामचन्द्र का राजतिलक कीजिये।





मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी। अभिमत बिरवं परेउ जनु पानी।। बिनती सचिव करहिं कर जोरी। जिअहु जगतपति सरिस करोरी।।_अर्थ_इस प्रिय वाणी को सुनते मंत्री ऐसे आनंदित हुए मानो उनके मनोरथरूपी पौधे पर पानी पड़ गया हो। मंत्री हाथ जोड़कर विनती करते हैं कि हे जगत्पति ! आप करोड़ों वर्ष जियें।





जग मंगल भव काजु बिचारा। बेगि नाथ न लाइअ बारा।। नृपहिं मोदु सुनि सचिव सुभाषा। बढ़त बौंड़ तनु लही सुसाखा।।_अर्थ_आपने जगत् भर का मंगल करने वाला भला काम सोचा है। हे नाथ ! शीघ्रता कीजिये, देर नहीं लगाइये। मंत्रियों की सुन्दर वाणी सुनकर राजा को ऐसा आनंद हुआ मानो बढ़ती हुई बेल सुन्दर डाली का सहारा पा गयी हो ।





कहेउ भूप मुनि राज कर जोइ जोइ आयसु होई। राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ।।_अर्थ_राजा ने कहा_श्रीरामचन्द्र के राज्याभिषेक के लिये मुनिराज वशिष्ठ जी की जो_जो आज्ञा हो, आपलोग वहीं सब तुरंत करें।





हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी। आनहु सकल सुतीरथ पानी।। औषध मूल फूल फल पाना। कहे नाम गनि मंगल नाना।।_अर्थ_मुनिराज ने हर तीर्थ का पानी, फल, मूल, फूल और अनगिनत प्रकार के मंगल सामग्री एकत्रित करने कहा।





चामर चरम बसन बहु भांति। रोम पाट पट अगनित जाती।। मनि गन मंगल बस्तु समेता। जो जग जोगु भूप अभिषेका।।_अर्थ_चंवर, मृगचर्म, बहुत प्रकार के वस्त्र, असंख्यों जातियों के ऊनी और रेशमी कपड़े, ( नाना प्रकार की ) मणियां ( रत्न ) तथा और भी बहुत_सी मंगल वस्तुएं, जो जगत् में राज्याभिषेक  योग्य होती हैं ( सबको मंगाने की उन्होंने आज्ञा दी।





बेद बिदित कहि सकल बिधाना। कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना।। सफल रसाल पूगफल केरा। रोपहु बीथिन्ह पुर चहुं फेरा।।_अर्थ_मुनि ने वेदों में कहा हुआ सब विधान बताकर कहा_नगर में बहुत_से मण्डप (चंदोवे ) सजाओ। फलों समेत आम, सुपारी और केले के वृक्ष नगर की गलियों में चारों ओर रोप दो।





रचहु मंजु मनि चौकें चारू। कहहु बनावन बेगि बजारू।। पूजहु गनपति गुर कुलदेवा। सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा।।_अर्थ_सुन्दर मणि के मनोहर चौकें पुरवाओ और बाजार को तुरन्त सजाने के लिये कह दो। श्रीगणेशजी, गुरु और कुलदेवता की पूजा करो और भूदेव ब्राह्मणों की सब प्रकार से सेवा करो।





ध्वज पताक तोरन कलश सजहु तुरग रथ नाग। सिर धरि  गुर बचन सब निज निज काजहिं लाग।।_अर्थ_ध्वजा, पताका, तोरण, कलश, घोड़े, हाथी और रथ सबको सजाओ। मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी के वचनों को शिरोधार्य करके सबलोग अपने अपने काम में लग गये।





जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा। सो तेहि काजु प्रथम जनु कीन्हा।। बिप्र साधु सुर पूजत राजा। करन राम हित मंगल काजा।‌_अर्थ_मुनीश्वर ने जिसको जिस काम के लिये आज्ञा दी, उसने वह काम ( इतनी शीघ्रता से कर डाला कि ) मानो पहले से ही कर रखा था। राजा ब्राह्मण, साधु और देवताओं को पूज रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी के लिये सब मंगलकार्य कर रहे हैं।





सुनत राम अभिषेक सुहावा। बाज गहागह अवध बधावा ।। राम सीय तन सगुन जनाए। फरकहिं मंगल अंग सुहाए।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के शरीर में शुभ शकुन सूचित हुए। उनके सुन्दर मंगल अंग फड़कने लगे।





पुलकि सप्रेम परस्पर कहहीं।  भरत आगमनु सूचक अहहीं ।। भए बहुत दिन अति अवसेरी। सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी।।_ अर्थ_पुलकित होकर वे दोनों प्रेमसहित एक_दूसरे को कहते हैं कि ये सब शकुन भरत के आने की सूचना देने वाले हैं। ( उनको मामा के घर गये बहुत दिन हो गये; बहुत ही अवसेर आ रही है ( बार बार उनसे मिलने की मन में आती है ) शकुनों से प्रिय ( भरत )_के मिलने का विश्वास होता है।





भरत सरिस प्रिय को जग माहीं। इहइ सगुन फल दूसर नाहीं।। रामहि बंधु सोच दिन राती। अंडन्हि कमठ हृदउ जेहि भांति।।_अर्थ_और भरत के समान जगत् में ( हमें ) कौन प्यारा है ! शकुन का बस यही फल है, दूसरा नहीं। श्रीरामचन्द्रजी को ( अपने ) भाई भरत का दिन_रात ऐसा सोच रहता है जैसा कछुए का हृदय अंडों में रहता है।





एहि अवसर मंगलु परम सुनि रहंसेउ रनिवासु। सोभत लखि बिनु बढ़त जनु बारिधि बीचि बिलासु।।_अर्थ_इसी समय यह परम मंगल समाचार सुनकर सारा रनिवास हर्षित हो उठा। जैसे चन्द्रमा को बढ़ते देखकर समुद्र में लहरों का विलास ( आनंद ) सुशोभित होता है।





प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए। भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए।। प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं।। मंगल कलस सजन सब लागीं।।_अर्थ_सबसे पहले ( रनिवास में ) जाकर जिन्होंने ये वचन ( समाचार ) सुनाये, उन्होंने बहुत से आभूषण और वस्त्र पाये। रानियों का शरीर प्रेम से पुलकित हो उठा और मन प्रेम में मग्न हो गया। वे सब मंगलकलश सजाने लगीं।





चौकें चारु सुमित्रां पूरी। मनिमय बिबिध भांति अति रूरी।। आनंद मगन राम महतारी। दिए दान बहु बिप्र हंकारी।।_अर्थ_सुमित्राजी ने मणियों ( रत्नों ) के बहुत प्रकार के अत्यन्त सुन्दर और मनोहर चौक पूरे। आनन्द में मगन हुई श्रीरामचन्द्रजी की माता कौशल्याजी ने ब्राह्मणों को बुलाकर बहुत दान दिए।





पूजीं ग्रामदेवी सुर नागा। कहेउ बहोरि देहु बलिभागा।। जेहि बिधि होइ राम कल्यानू। देहु दया करि सो बरदानू।।_अर्थ_उन्होंने ग्रामदेवी, देवताओं और नागों की पूजा की और फिर बलि भेंट देने को कहा ( अर्थात् कार्य सिद्ध होने पर फिर पूजा करने की मनौती मानी ); और प्रार्थना की कि जिस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी का कल्याण हो, दया करके वहीं वरदान दो।





गावहिं मंगल कोकिलबयनीं। बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं।।_अर्थ_ कोमल की_सी मीठी वाणी वाली और हिरण के बच्चे के से नेत्रोंवाली स्त्रियां मंगलगान करने लगीं।





राम राज अभिषेक सुनि हियं हरसे नर नारि। लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का राज्याभिषेक सुनकर सभी स्त्री_पुरुष हृदय में हर्षित हो उठे और विधाता को अपने अनुकूल समझकर सब सुन्दर मंगल साजा सजाने लगे।





तब नरनाहं बसिष्ठु बोलाए। रामधाम सिख देन पठाए।। गुर आगमनु सुनत रघुनाथा। द्वार आई पद नायउ माथा।।_अर्थ_तब राजा ने बसिष्ठजी को बुलाया और शिक्षा ( समयोचित उपदेश ) देने के लिये श्रीरामचन्द्र जी के महल में भेजा। गुरु का आगमन सुनते ही श्रीरघुनाथजी ने दरवाजे पर आकर उनके चरणों में मस्तक नवाया।





सादर अरघ देइ घर आने। सोलह भांति पूजि सनमाने।। गहे चरन सिय सहित बहोरी। बोले रामु कमल कर जोरी।।_अर्थ_आदरपूरवक अर्ध्य देकर उन्हें घर में लाते और षोडशोपचार से पूजा करके उनका सम्मान किया। फिर सीताजीसहित उनके चरण स्पर्श किये और कमल के समान दोनों हाथों को जोड़कर श्रीरामजी बोले_‌





सेवक सदन स्वामि आगमनू। मंगल मूल अमंगल दमनू।। तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती।। पठइय काज नाथ असि नीती।।_अर्थ_ यद्यपि सेवक के घर स्वामि का पधारना मंगलों का मूल और अमंगलों का नाश करनेवाला होता है, तथापि से नाथ, उचित तो यही था कि प्रेम पूर्वक दास को ही कार्य के लिये बुला भेजते; ऐसी ही नीति है।





प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू। भयउ पुनीत आजु यह गेहू।। आयसु होई हो करौं गोसाईं। सेवकु रही स्वामि सेवकाई।।_अर्थ_परन्तु प्रभु ( आप )_ने प्रभुता छोड़ कर स्वयं यहां पधारकर जो स्नेह किया, उससे आज यह घर पवित्र हो गया। हे गोसाईं ! ( अब ) जो आज्ञा हो, मैं वहीं करूं। स्वामी की सेवा में ही सेवक का लाभ है।





सुनि स्नेह साने बचन मुनि रघुबरहि प्रसंस। राम कह न तुम कहहु अस हंस बंस अवतंस।।_अर्थ_( श्रीरामचन्द्रजी ) प्रेम में सने हुए बचनों को सुनकर मुनि बसिष्ठजी ने श्री रघुनाथ जी की प्रशंसा करते हुए कहा कि हे राम ! भला, आप ऐसा क्यों न कहें। आप सूर्यवंश के भूषण जो हैं। 






बरनि राम गुन सील सुभाऊ। बोले प्रेम पुलकित मुनिराऊ।। भूप सजेउ अभिषेक समाजू। चाहत देन तुम्हहिं जुबराजू।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के गुण, शील और स्वभाव का बखान कर, मुनिराज प्रेम से पुलकित होकर बोले_( हे श्रीरामचन्द्रजी ! ) राजा ( दशरथजी )_ ने राज्याभिषेक की तैयारी की है। वे आपको युवराज_पद देना चाहते हैं।





राम करहु सब संजम आजू। जौं बिधि कुसल निबाहै काजू।। गुरु सिख देइ राय पहिं गयऊ। राम हृदयं अस बिसमउ भयऊ।।_अर्थ_( इसलिेये ) हे रामजी ! आज आप ( उपवास, हवन आदि विधिपूर्वक ) सब संयम कीजिये, जिससे विधाता कुशलपूर्वक इस काम को निबाह दें ( सफल कर दें ) । गुरुजी शिक्षा देकर दशरथजी के पास चले गये। श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में ( यह सुनकर ) इस बात का खेल हुआ कि_





जन्मे एक संग सब भाई। भोजन सयन केलि लरिकाई।। करनबेध उपबीत बिआहा। संग संग सब भए उछाहा।।_अर्थ_हम सब भाई एक ही साथ जन्मे; खाना, सोना, लड़कपन के खेलकूद, कनछेदन यज्ञोपवीत और विवाह आदि उत्सव सब साथ_साथ ही हुए।





बिमल बंस यह अनुचित एकू। बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू।। प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई। हरेउ भगत मन कै कुटिलाई।।_अर्थ_पर इस निर्मल वंश में यही एक अनुचित बात हो रही है कि और सब भाइयों को छोड़कर राज्याभिषेक एक बड़े का ही ( मेरा ही ) होता है। ( तुलसीदास जी कहते हैं कि ) प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का यह सुन्दर प्रेमपूर्ण पछतावा भक्तों के मन की कुटिलता को हरण करे।





तेहि अवसर आए लखन मगन प्रेम आनंद। सनमाने प्रिय बचन कहि रघुकुल कैरव चन्द।।_अर्थ_उसी समय प्रेम और आनन्द में मग्न लक्ष्मण जी आये। रघुकुलरूपी कुमुद के खिलानेवाले चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी ने प्रिय वचन कहकर उनका सम्मान किया।





बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना। पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना।। भरत आगमनु सकल मनावहिं। आवहुं बेगि नयन फलु  पावहिं।।_अर्थ_बहुत प्रकार के बाजे बज रहे हैं। नगर के अतिशय आनंद का वर्णन नहीं हो सकता। सबलोग भरत का आगमन मना रहे हैं और कह रहे हैं कि वे भी शीघ्र आवें और ( राज्याभिषेक का उत्सव  देखकर ) नयनों का फल प्राप्त करें।





हाट बाट घर गली अथाईं। कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। कालि लगन भलि केतिक बारा। पूजिहिं सिद्धि अभिलाषु हमारा।।_अर्थ_बाजार, रास्ते, घर, गली और चबूतरों पर ( जहां_तहां ) स्त्री और पुरुष आपस में यही कहते हैं कि कल वह शुभ लग्न ( मुहूर्त ) कितने समय है जब विधाता हमारी अभिलाषा पूरी करेंगे।





कनक सिंहासन सीय समेता। बैठहिं राम होइ चित चेता।। सकल कहहिं कब होइहिं काली। बिघन मनावहिं देव कुचाली।।_अर्थ_जब सीताजी सहित श्रीरामचन्द्र जी सुवर्ण के सिंहासन पर विराजेंगे और हमारा मनचीता होगा ( मन:कामना पूरी होगी )। इधर तो सब कह रहे हैं कि कल कब होगा, उधर कुचक्री देवता विध्न मना रहे हैं।





तिन्हहिं सोहाइ न अवध बधावा। चोरहिं चांदिनी रात न भावा।। सादर बोलि बिनती सुर कहीं। बारहिं बार पाय लै परहीं।।_अर्थ_उन्हें ( देवताओं को ) अवध के बधावे नहीं सुहाते, जैसे चोर को चांदनी रात नहीं भाती। सरस्वती जी को बुलाकर देवता विनय कर रहे हैं और बार_बार उनके पैरों को पकड़कर उनपर गिरते हैं।





बिपति हमारि बिलोकि बड़ि मातु करिअ सोई आजु। रामु जाहिं बन राज तजि होई सकल सुरकाजु।।_अर्थ_ ( वे कहते हैं_) हे माता ! हमारी बड़ी विपत्ति को देखकर आज वही कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्र जी राज त्यागकर वन को चले जायं और देवताओं का सब कार्य सिद्ध हो।
सुनि सुर बिनय खाड़ी पछिताती। भयउं सरोज बिपिन हिमराती।। देखि देव पुनि कहहिं निहोरी। मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी।।_अर्थ_देवताओं की विनती सुनकर सरस्वतजी खड़ी_खड़ी  पछता रही हैं कि ( हाय ! ) मैं कमलवन के लिये हेमन्त_ऋतु की रात हुई। उन्हें इस प्रकार पछताते देखकर देवता फिर विनय करके कहने लगे_हे माता ! इसमें आपको जरा भी दोष न लगेगा।





बिसमय हरष रहित रघुराऊ। तुम्ह जानहु सब नाम प्रभाऊ।। जीव करम बस सुख दुख भागी। जाइअ अवध देशहित लागी।।_अर्थ_ श्रीरघुनाथजी विषाद और हर्ष से रहित हैं। आप तो श्रीरामजी के सब प्रभाव को जानती ही हैं। जीव अपने कर्मवश ही सुख_दु:ख का भागी होता है। अतः देवताओं के हित के लिये आप अयोध्या जाइये।





बार बार गहि चरन संकोची। चली बिचारि बिबुधमति पोची।। ऊंच निवासु नीति करतूती। देखि न सकहिं पराइ बिभूती।।_अर्थ_बार_बार चरण पकड़कर देवताओं ने सरस्वती को संकोच में डाल दिया। तब वह यह विचार कर चली कि देवताओं की बुद्धि ओछी है। इनका निवास तो ऊंचा है, पर इनकी करनी नीची है। ये दूसरे का ऐश्वर्य नहीं देख सकते।





आगिल काजु बिचारि बहोरी। करिहहिं चाह कुसल कबि मोरी।। हरषि हृदयं दसरथ पुर आई। जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई।।_अर्थ_परन्तु आगे के काम का विचार करके ( श्रीरामजी के वन जाने से राक्षसों का वध  होगा, जिससे सारा जगत् सुखी हो जायगा ) चतुर कवि ( श्रीरामजी के वनवास के चरित्रों का वर्णन करने के लिये ) मेरी चाह ( कामना ) करेंगे। ऐसा विचार कर सरस्वतजी हृदय में हर्षित होकर दशरथजी की पुरी अयोध्या में आतीं मानो दु:सह दु:ख देनेवाली कोई ग्रहदशा आयी हो।





नामु मंथरा मंदमति चेरी कैकइ केरि। अजस पेटारी ताहि करि गई गिरा मति फेरि ।।_अर्थ_मंथरा नाम की कैकयी की एक मंदबुद्धि दासी थी, उसे अपयश की पिटारी बनाकर सरस्वती उसकी बुद्धि को फेरकर चली गईं।