Wednesday, 13 September 2023

अयोध्याकाण्ड

हंस-बंस दशरथु जनकु राम लखन से भाइ। जननी तूं जननी भी बिधि सन कछु न बसाइ।।_अर्थ_मुझे सूर्यवंश ( _सा वंश ), दशरथजी (_सरीखे ) पिता और राम_लक्ष्मण_से भाई मिले। पर हे जननी ! मुझे जन्म देनेवाली माता तू हुई ! ( क्या किया जाय ! ) विधाता से कुछ भी वश नहीं चलता।






जब तैं कुमति कुमत जियं ठयऊ। खंड खंड होइ हृदउ न गयउ।। बर मागत मन भइ नहीं पीड़ा। गरि न जीह मुंह परेउ न कीरा।।_अर्थ_अरी कुमति ! जब तूने हृदय में यह बुरा विचार ( निश्चय ) ठाना, उसी समय तेरे हृदय के टुकड़े _टुकड़े ( क्यों न ) हो गये ? वरदान मांगते समय तेरे मन में कुछ भी पीड़ा नहीं हुई ? तेरी जीभ गोल नहीं गयी ? तेरे मुंह में कीड़े नहीं पड़ गये ?






भूप प्रतीति तोरि किमि किन्हीं। मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही।। बिधिहुं न नारी हृदयं गति जानी। सकल कपट अघ अवगुन खानी।।_अर्थ_राजा ने तेरा विश्वास कैसे कर लिया ? ( जान पड़ता है ) विधाता ने मरने के समय उनकी बुद्धि हर ली थी। स्त्रियों के हृदय की गति ( चाल ) विधाता भी नहीं जान सके। वह संपूर्ण कपट, पाप और अवगुणों की खान है।







सरल सुसील धरम रत राऊ। सो किमि जानै तीय सुभाऊ।। अस को जीव जंतु जग माहीं। जेहिं रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं।।_अर्थ_फिर राजा तो सीधे, सुशील और धर्मपरायण थे। वे भला स्त्री_स्वभाव को कैसे जानते ? अरे, जगत् के जीव_जन्तुओं में ऐसा कौन है जिसे रघुनाथजी प्राणों के समान प्यारे नहीं हैं।






भे अति अहित रामु तेउ तोही। को तू अहसि सत्य कहु मोही।। जो हसि सो हसि मुंह मसि लाई। आंखि ओट उठि बैठहि जाई।।_अर्थ_वे श्रीरामजी भी तुझे अहित हो गये ( वैरी लगे ) ! तू कौन है ? मुझे सच_सच कह ! तू जो है, सो है, अब मुंह में स्याही पोतकर ( मुंह काला करके ) उठकर मेरी आंखों की ओट में जा बैठ।







राम बिलोनी हृदय में प्रगट कीन्ह बिधि मोहि। मैं समान को पातकी बादि कहीं कछु तोहि।।_अर्थ_विधाता ने मुझे श्रीरामजी से विरोध करनेवाले ( तेरे ) हृदय से उत्पन्न किया ( अथवा विधाता ने मुझे हृदय से राम का विरोधी जाहिर कर दिया ) । मेरे बराबर पापी दूसरा कौन है ? मैं व्यर्थ ही तुझे कुछ कहता हूं।







सुनि सत्रुधन मातु कुटलाई। जेहिं गाय रिस कछु न बसाई।। तेहि अवसर कुबरी तहं आती। बहन विभूषण बिबिध बनाई।।_अर्थ_माता की कुटिलता सुनकर शत्रुघ्नजी के सब अंग क्रोध से जल रहे हैं, पर कुछ वश नहीं चलता। उसी समय भांति_भांति के कपड़ों और गहनों से सजकर कुबरी ( मंथरा ) वहां आयी।







लखि रिस मर्जी लखन लघु भाई। भरत अनल घृत आहुति पाई।। हुमगि लात तकि कूबर मारा। परि मुह भर महि करत पुकारा।।_अर्थ_ उसे ( सजी ) देखकर लक्ष्मण के छोटे भाई शत्रुघ्नजी क्रोध में भर गये। मानो जलती हुई आग को घी की आहुति मिल गई हो। उन्होंने जोर से थककर कूबर पर एक रात जमा दी। वह चिल्लाती हुई मुंह के बल जमीन पर गिर पड़ी।







सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी। लगे घसीटना धरि धरि झोंटी।। भरत दयानिधि दीन्हा छड़ाई। कौसल्या पहिं गे दोउ भाई।।_अर्थ_उसकी यह बात सुनकर और उसे ना से सिखा तक दुष्ट जानकर शत्रुघ्नजी झोंटा पकड़_पकड़कर उसे घसीटने लगे। तब दयानिधि भरत ने उसे छुड़ा दिया और दोनों भाई ( तुरंत ) कौसल्याजी के पास गये।







मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुं हनी तुसार।।_अर्थ_कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरे का रंग बदला हुआ है, व्याकुल हो रही है, दु:ख के बोझ से शरीर सूख गया है। ऐसी दिख रही है मानो सोने की सुन्दर कल्पलतआ को वन में पाला मार गया हो।







भरतहिं देखि मातु उठि लाई। मुरछित अवधि पूरी झइं आई।। देखत भरतु बिकल भए भारी। परे चरन तन दसा बिसारी।।_अर्थ_भरत को देखते ही माता कौसल्या उठ दौड़ीं। पर चक्कर आ जाने से मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ीं। यह देखते ही भरतजी बड़े व्याकुल हो गये और शरीर की सुध भुलाकर चरणों में गिर पड़े।







मातु तात कहं देहिं देखी। कहं सिय राम लखन दोउ भाई।। केकई कत जनमी जग माझा। जौं जनमी तो भइ काहे न बांझा।।_अर्थ_( फिर बोले_) माता ! पिताजी कहां हैं ? उन्हें दिखा दे। सीताजी तथा मेरे दोनों भाई श्रीराम_लक्ष्मण कहां हैं ? ( उन्हें दिखा दे। ) कैकेई जगत् में क्यों जनमी ! और यदि जनमी तो फिर बांझ क्यों न हुई ?_






कुल कलंक जेहिं जनमेउ मोही।  अपजस भाजन प्रियजन द्रोही।। को त्रिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहिं लागी।।_अर्थ_जिसने कुल के कलंक, अपयश के मांड़े और प्रियजनों के द्रोही मुझ_जैसे पुत्र को उत्पन्न किया। तीनों लोकों में मेरे समान अभागा कौन है ? जिसके कारण हे माता ! तेरी यह दशा हुई।



Friday, 8 September 2023

अयोध्याकाण्ड

तात बात मैं सकल संवारी। मैं मंथरा सहाय बिचारी।। कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ। भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ।।_अर्थ_हे तात ! मैंने सारी बात बना ली थी। बेचारी मंथरा सहायक हुई। पर विधाता ने बीच में जरा_सा काम बिगाड़ दिया। वह यह कि राजा देवलोक को पधार गये।








सुनत भरत में बिबस बिषादा। जनु सहमएउ करि केहरि नादा।। तात तात हां तात पुकारी। परे भूमितल व्याकुल भारी।।_अर्थ_भरत यह सुनते ही विषाद के मारे विवश ( बेहाल ) हो गये। मानो सिंह की गर्जना सुनकर हाथी सहम गया है। वे 'तात ! तात! हा तात !' पुकारते हुए अत्यन्त व्याकुल होकर जमीन पर गिर पड़े।








चलत न देखन पायउं तोही। तात न रामहि सौंपेहु मोहि।। बहुरि धीर धरि उठे संभारी। कहु पितु मरन हेतु महतारी।।_अर्थ_( और विलाप करने लगे कि ) से तात !  मैं आपको ( स्वर्ग के लिये ) चलते समय देख भी न सका। ( हाय ! )  आप मुझे श्रीरामजी को सौंप भी नहीं गये। फिर धीरे धरकर वे संभलकर उठे और बोले_माता ! पिता के मरने का कारण तो बताओ ।








सुनि सुत बचन कहति कैकेई। मरमु पांछि जनु माहुरी देई।। आदिहुं तें सब अपनी करनी। कुटिल कठोर मुदित मन बरनी।।_अर्थ_पुत्र का वचन सुनकर कैकेयी कहने लगी। मानो मर्मस्थान को पाकर ( चाकू से चीरकर ) उसमें जहर भर रही हो। कुटिल और कठोर कैकेयी ने अपनी सब करनी शुरू से ( आखिर तक बड़े ) प्रसन्न मन से सुना दी।










भरतहिं बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु। हेतु अपनी जानि जियं थकित रहे धरि मौनु।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का वन जाना सुनकर भरतजी को पिता का मरण भूल गया और हृदय में इन सारे अनर्थ का कारण अपने को ही जानकर वे मौन होकर स्तम्भित रह गये ( अर्थात् उनकी बोली बन्द हो गयी और वे सन्न रह गये।









बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति। मनहुं जरे पर लोन लगावति।। तात राउ नहीं सोचो जोगू। बिढ़इ सुकृत ऐसी कीन्हेंउ भोगू।।_अर्थ_पुत्र को व्याकुल देखकर कैकेयी समझाने लगी। मानो जले पर नमक लगा रही है। ( वह बोली_) से तात ! राजा सोच करने योग्य नहीं हैं। उन्होंने पुण्य और यश कमाकर उसका पर्याप्त भोग किया।







जीवत सकल जनम फल पाए। अंत अमरपति सदन सिधाए।। अस अनुमानि सोच परिहरहू। सहित समाज राज पुर करहू।।_अर्थ_जीवनकाल में ही उन्होंने जन्म लेने के संपूर्ण फल पा लिये और अन्त में इन्द्रलोक को चले गये। ऐसा विचारकर सोच छोड़ दो और समाज सहित नगर का राज्य करो।








सुनि सुनि सहमेउ राजकुमारू। पाकें छत जनु लाग अंगारू।। धीरज धरि भरी लेहिं उसासा। पापिनि सबहि भांति कुल नासा।।_अर्थ_राजकुमार भरतजी यह सुनकर बहुत ही सहम गये। मानो पके घाव पर अंगार छू गया है। उन्होंने धीरज धरकर बड़ी लम्बी सांस लेते हुए कहा_पापिनी ! तूने सभी तरह से कुल का नाश कर दिया।








जौं पै कुरुचि रही अति तोही। जनमत काहे न मारे मोहि।। पेड़ काटि तैं पालउ सींचा। मीन जिअन निति बारि उलीचा।।_अर्थ_हाय ! यदि तेरी ऐसी ही अत्यन्त बुरी रुचि ( दुष्ट इच्छा ) थी, तो तूने जन्मते ही मुझे मार क्यों नहीं डाला ? तूने पेड़ को काटकर पत्ते को सींचा है और मछली के जीने के लिये पानी को उलीच डाला ! ( अर्थात् मेरा हित करने जाकर उल्टा तूने मेरा अहित कर डाला।

Saturday, 2 September 2023

अयोध्याकाण्ड

बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु  करहिं पुरबासी।। अंथयउ आजु भानुकुल भानू।‌ धरम अवधि गुन रूप निधानू।।_अर्थ_दास_दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरवासी घर_घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्म की सीमा, गुण और रूप के भण्डार सूर्यकुल के सूर्य अस्त हो गये।






गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहिं।। एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ज्ञानी।।_अर्थ_सब कैकेई को गालियां देते हैं, जिसने संसार भर को बिना नेत्र का ( अंधा ) कर दिया। इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रात:काल सब बड़े _बड़े ज्ञानी मुनि आये।








तब बसिष्ठ मुनि समय सम कही अनेक इतिहास। सोक निवारि सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।_अर्थ_तब वसिष्ठ मुनि ने समय के अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञान के प्रकाश से सबका शोक दूर किया।







तेल नावं भरी नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अब भाषा।। धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहूं कहहू जनि काहू।।_अर्थ_वसिष्ठजी ने नाव में तेल भरवाकर राजा के शरीर में उसको रखवा दिया। फिर दूतों को बुलवाकर उनसे ऐसा कहा_तुमलोग जल्दी दौड़कर भरत के पास जाओ। राजा की मृत्यु का समाचार कहीं किसी से कहो।








एतनइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई।। सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजी लजाए।।_अर्थ_जाकर भरत से इतना ही कहना कि दोनों भाइयों को गुरुजी ने बुलवा भेजा है। मुनि की आज्ञा सुनकर धावन ( दूत ) दौड़े। वे अपने वेग से उत्तम घोड़ों को भी लजाते हुए चले।










अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कउसगउन होहिं भरत कहीं तब तें।। देखहिं राति भयानक सपना। जागा करहिं कटु कोटि कलपना।।_अर्थ_ जबसे अयोध्या में अनर्थ प्रारंभ हुआ, तभी से भर्ती को अपशकुन होने लगे। वे रात को भयंकर स्वप्न देखते थे और जागने पर ( उन स्वप्नों के कारण ) करोड़ों ( अनेकों ) तरह की बुरी_बुरी कल्पनाएं किया करते थे।










बिप्र जेवांइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।। मागहिं हृदयं महेस मनाई। कुसल मातु_पितु परिजन भाई।।_अर्थ_( अनिष्टशान्ति के लिये) वे प्रतिदिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियों से रुद्राभिषेक करते थे। महादेवजी को हृदय में मनाकर उनसे माता_पिता, कुटुम्बी और भाइयों का कुशल_क्षेम मांगते थे।








एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुंचे आइ। गुर अनुशासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।_अर्थ_भरतजी इस प्रकार मन में चिंता कर रहे थे कि दूत आ पहुंचे। गुरु की आज्ञा कानों से सुनते ही वे गणेशजी को मनाकर चल पड़े।








चले समीर वेग हय हांके। नाघत सरित सैल बन बांके।। हृदयं सोची बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियं जाऊं उड़ाई।।_अर्थ_हवा के समान वेगवाले घोड़ों को हांकते हुए वे विकट नदी, पहाड़ तथा जंगलों को लांघते हुए चले। उनके हृदय में बड़ा सोच था, कुछ सुहाता न था। में ऐसा सोचते थे कि उड़कर पहुंच जाऊं।







एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।। असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभांति कुखेत करारा।।_अर्थ_एक_एक निमेष वर्ष के समान बीत रहा था। इस प्रकार भरतजी नगर के निकट पहुंचे। नगर में प्रवेश करते समय अपशगुन होने लगे। कौए बुरी जगह बैठकर बुरी तरह कांव_कांव कर रहे हैं।







खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।। श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा।।_अर्थ_गदहे और सिआर विपरीत बोल रहे हैं। यह सुन_सुनकर भरत के मन में बड़ी पीड़ा हो रही है। तालाब, नदी, वन, बगीचे सब शोभाहीन हो रहे हैं। नगर बहुत ही भयानक लग रहा है।







खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।। नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुं सबन्हिं सब संपति हारी।।_अर्थ_श्रीरामजी के वियोगरूपी बुरे लोग से बताये हुए पक्षी_पशु, घोड़े_हाथी ( ऐसे दु:खी हो रहे हैं कि ) देखें नहीं जाते। नगर के स्त्री_पुरुष अत्यंत दु:खी हो रहे हैं। मानो सब अपनी सारी संपत्ति हार गये हैं।








पुरजन मिलहिं न कहहिं कछु गवंहिं जोहारहिं जाहिं। भरत कुशल पूंछि न सकहिं भय बिषादा मन माहिं।।_अर्थ_नगर के लोग मिलते हैं, फिर कुछ कहते नहीं; गौं _से ( चुपके_से ) जोहार ( वन्दना ) करके चले जाते हैं। भरतजी भी किसी से कुशल नहीं पूछ सकते, क्योंकि उनके मन में भय और विषाद जा रहा है।










हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहन दिसा लागि दवारी।। आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल कैरव चंदिनि।।_अर्थ_बाजार और रास्ते देखे नहीं जाते। मानो नगर में दसों दिशाओं में दावाग्नि लगी है। पुत्र को आते सुनकर सूर्यकुलरूपी कमल के लिये चांदनी रूपी कैकेयी ( बड़ी ) हर्षित हुई।








सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारे हां भेंटा भवन लेइ आई।। भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुं तुहिन बनज बन मारा।।_अर्थ_वह आरती सजाकर आनंद में भरकर उठ दौड़ी और दरवाजे पर ही मिलकर भरत_शत्रुध्न को महल में ले आयी। भरत ने सारे परिवार को दु:खी देखा। मानो कमलों के वन को पाला मार गया हो।







कैकेई हरषित एहि भांती। मनहुं मुदित दव लाई किराती। सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूछति नैहर कुसल हमारें।।_अर्थ_एक कैकेयी ही इस तरह हर्षित दिखती है मानो भीलनी जंगल में आग लगाकर आनंद भर रही हो। पुत्र को सोचवश और मन मारे ( बहुत उदास ) देखकर वह पूछने लगी_हमारे नैहर में कुशल तो है?








सकल कुसल कहीं भरत सुनाई। पूंछी निज कुल कुसल भलाई।। कहीं कहं तात के कहां सब माता। कहं सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।_अर्थ_ भरतजी ने सब कुशल कह सुनायी। फिर अपने कुल की कुशल_क्षेम पूछी।  ( भरतजी ने कहा_) कहो, पिताजी कहां हैं ? मेरी सब माताएं कहां हैं ? सीताजी और मेरे प्यारे भाई राम_लक्ष्मण कहां हैं ?






सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरी नैन। भरत श्रवन मन सूल सम पानी बोली बैन।।_अर्थ_पुत्र के स्नेहमय वचन सुनकर नेत्रों में कपट का जल भरकर पानी कैकेयी भरत के कानों में शूल के समान चुभनेवाली वचन बोली_








Wednesday, 16 August 2023

अयोध्याकाण्ड

धीरजु धरिअ तो पाइअ पारू। नहीं तो बूड़िहिं सभी परिवारू।। जौं जियं धरिअ बिनय प्रिय मोरी। रामु लखनऊ सिय मिलहिं बहोरी।।_अर्थ_आप धीरज धरियेगा, तो सब पार पहुंच जायेंगे। नहिं तो सारा परिवार डूब जायगा। हे प्रिय स्वामी! यदि मेरी विनती हृदय में धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे।





प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आंखि उघारि।  तलफत मीन मलीन जनु सींचती सीतल बारि।।_अर्थ_प्रिय पत्नी कौशल्या के कोमल वचन सुनते हुए राजा ने आंखें खोलकर देखा। मानो तड़पती हुई दिन मछली पर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो।







धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहं राम कृपालू।। कहां लखनु कहं राम सनेही। कहं प्रिय पुत्रवधू बैदेही।।_अर्थ_धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले_सुमंत्र ! कहो, कृपालु राम कहां हैं ? लक्ष्मण कहां हैं ? स्नेही राम कहां हैं ? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहां है ?







बिलपत राउ बिकल बहुत भांती। भइ जुग सरिस सिरात न राती।। तापस अंध साप सुनि आई। कौसल्यहिं सब कथा सुनाई।।_अर्थ_राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकार से विलाप कर रहे हैं। वह रात युग के समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजा को अंधे तपस्वी ( श्रवणकुमार के पिता ) के शाप की याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्या को कह सुनायी। 







भयऊ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।। सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहि न प्रेमु पन मोर निबाहा।।_अर्थ_उस इतिहास का वर्णन करते_करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीराम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है। मैं उस शरीर को रखकर क्या करूंगा जिसने मेरा प्रेम का पन नहीं निबाहा।









हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।। हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।।_अर्थ_हा रघुकुल को आनंद देनेवाले मेरे प्राण प्यारे राम ! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुबर ! हा पिता के चित्तरूपी चातक के हित करनेवाले मेघ !







राम राम कहि राम कहां राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहं राउ गयी सुरधाम।।_अर्थ_राम_राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीराम के विरह में शरीर त्यागकर सुरलोक को सिधार गये।






जिअन मरन फल दशरथ पावा। अंड अनेक अमल जस छावा।। जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु संवारा।।_अर्थ_जीने और मरने का फल तो दशरथजी ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डों में छा गया। जीते_जी तो श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमा के समान मुख को देखा और श्रीराम के विरह को निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया।

Sunday, 6 August 2023

अयोध्याकाण्ड

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।। धीरजु धरहीं बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।_अर्थ_मूर्खलोग सुख में हर्षित होते हैं और दु:ख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। हे सबके हितकारी ( रक्षक ) ! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोक का परित्याग कीजिये।








प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरी तीर। न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ वीर।।_अर्थ_ श्रीरामजी का पहला निवास ( मुकाम ) तमसा के तट पर हुआ, दूसरा गंगातीर पर। सीताजी सहित दोनों भाई उस दिन स्नान करके जल पीकर ही रहे।








केवट कीन्ह बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवांई।। होत प्रात बट छीर मंगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।।_अर्थ_ केवट ( निषादराज ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर ( श्रृंगवेरपुर ) मं ही बितायी। दूसरे दिन सवेरा होते ही बड़ का दूध मंगवाया और उससे श्रीराम_लक्ष्मण ने अपने सिरों पर जटाओं के मुकुट बनाये।








रामसखा तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाई चले रघुराई।। लखन बान धनु धरे बनाई। आप चढ़े प्रभु आयसु पाई।।_अर्थ_ तब श्रीरामचन्द्रजी के सखा निषादराज ने नाव मंगवायी। पहले प्रिया सीताजी को उसपर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजी ने धनुष _बाण सजाकर रखें और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े।









बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।। तात प्रनामु तात सन कहेहू। बार बार पद पंकज गहेहू।।_अर्थ_ मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले_ हे तात ! पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और मेरी और से बार_बार उनके चरण_कमल पकड़ना।।









करबि पायं परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।। बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।_अर्थ_फिर पांव पकड़कर विनती करना कि हे पिताजी ! आप मेरी चिंता न कीजिये। आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्य से वन में और मार्ग में हमारी कुशल मंगल होगा।










तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरिंं आइहौं।। जननीं सकल परितोषि परि परि पायं करी बिनती घनी। तुलसी करहु सोई जतन जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी।।_अर्थ_हे पिताजी ! आपके अनुग्रह से मैं वन जाते हुए सब प्रकार का सुख पाऊंगा। आज्ञा का भलीभांति पालन करके चरणों का दर्शन करने कुशलपूर्वक फिर आऊंगा। सब माताओं के पैरों पड़ _पड़कर उनका समाधान करके और उनसे बहुत विनती करके_तुलसीदास कहते हैं _तुम वहीं प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी प्रसन्न रहें।









गुर सन कहब संदेसु बार बार पद पदुम गहि। करब सोई उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति।।_अर्थ_बार_बार चरणकमलों को पकड़कर गुरु वसिष्ठजी से मेरा संदेसा कहना कि ये वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें।








पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।। सोई सब भांति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।।_अर्थ_हे तात ! सब प्रवासियों और कुटुम्बियों से निहोरा ( अनुरोध ) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकार से हितकारी है जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।








कहब संदेसु भरत के आएं। नीति न तजिअ राजपदु पाएं।। पालेहु प्रजहि कर्म मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।।_अर्थ_भरत के आने पर उनको मेरा संदेसा कहना कि राजा का पद पा जाने पर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मन से प्रजा का पालन करना और सब माताओं को समान जानकर उनकी सेवा करना।








ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।। तात भांति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करें न काऊ।।_अर्थ_और हे भाई ! पिता, माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपने को अन्त तक निबाहना। हे तात ! राजा ( पिताजी ) को उसी प्रकार से रखना जिससे वे कभी ( किसी तरह भी ) मेरा सोच न करें।








लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।। बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।_अर्थ_लक्ष्मणने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजी ने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार_बार अपनी सौगंध दिलायी ( और कहा_ ) से तात ! लक्ष्मण का लड़कपन वहां न कहना।








कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह। थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।_अर्थ_प्रणाम कर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, किन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं।  उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रों में जल भर आया और शरीर रोमांच से व्याप्त हो गया।






  

तेहि अवसर रघुबर रुख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।। रघुकुलतिलक चले एहि भांती। देखउं ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।_अर्थ_उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर केवट ने पार जाने के लिये नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छाती पर वज्र रखकर खड़ा_खड़ा देखता रहा।









मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरौ लेइ राम संदेसू।। अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि ग्लानि सोच बस भयऊ।।_अर्थ_मैं अपने क्लेश को कैसे कहूं, जो श्रीरामजी का यह संदेसा  लेकर जीता ही लौट आया ! ऐसा कहकर मंत्री की वाणी रुक गयी ( वे चुप हो गये ) और वे हानि की ग्लानि और सोचवश हो गये।








सूत बचन सुनहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।। तलफत बिषय मोह मन मापा। माजा मनहुं मीन कर ब्यापा।।_अर्थ_सारथि सुमंत्र के वचन सुनते ही राजा पृथ्वी पर गिर पड़े, उनके हृदय में भयानक जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोह से व्याकुल हो गया। मानो मछली को मांजा व्याप गया हो ( पहली वर्षा का जल लग गया हो )।








करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।। सुनि बिलाप दुखहू दुखी  लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।_अर्थ_सब रानियां विलाप करके रो रही हैं। उस महान विपत्ति का कैसे वर्णन किया जाय ? उस समय के विलाप को सुनकर दु:ख को भी दु:ख लगा और धीरज का भी धीरज भाग गया।








भयउ कोलाहल अवध अति सुनि नृप राउर सोरु। बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुं कुलिस कठोर।।_अर्थ_ राजा के रावले ( रनिवास ) में रोने का शोर सुनकर अयोध्या में बड़ा भारी कुहराम मच गया। ( ऐसा जान पड़ता था ) मानो पक्षियों के विशाल वन में आ रात के समय कठोर वज्र गिरा हो।







प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि विहीन जनु व्याकुल ब्यालू।। इंद्रीं सकल बिकल भईं भारी। जनु सर सरसिज बनी बिनु बारी।।_अर्थ_राजा के प्राण कंठ में आ गये। मानो मणि के बिना सांप व्याकुल ( मरणासन्न ) हो गया हो। इन्द्रियां सभी बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जल के तालाब में कमलों का वन मुरझा गया है।







कौसल्या नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबी अंथयउ जाय जाना।। उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।।_अर्थ_ कौसल्याजी ने राजा को बहुत दुखी देखकर अपने हृदय में जान लिया कि अब सूर्यकुल का सूर्य अस्त हो चला !  तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्या हृदय में धीरज धरकर समय के अनुकूल वचन बोलीं_







नाथ समुझि मन करिअ विचारू। राम वियोग पयोधि अपारू।। करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक ममाजू।।_अर्थ_हे नाथ ! आप मन में समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्र का वियोग अपार समुद्र है और आप उसके कर्णधार ( खेनेवाले ) हैं। सब प्रियजन ( कुटुम्बी और प्रजा ) ही यात्रियों का समाज है, जो इस जहाज पर चढ़ा हुआ है।

Sunday, 16 July 2023

अयोध्याकाण्ड

बचन न आव हृदयं पछिताई। अवध काह मैं देखब जाइ।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।_अर्थ_मुंह से वचन नहीं निकलते। हृदय में पछताते हैं कि मैं अयोध्या में जाकर क्या देखूंगा ? श्रीरामचन्द्रजी से शून्य रथ को जो भी देखेगा, वहीं मुझे देखने में संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुंह नहीं देखना चाहेगा )।





धाइ पूछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नारि। उतरु देब मैं सबहि तब हृदयं बज्रु बैठारि।।_अर्थ_नगर के सब व्याकुल स्त्री_पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदय पर वज्र रखकर सबको उत्तर दूंगा।    







पूछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहिं बिधाता।। पूछिहहिं जबहिं लखन महतारी। कहिहउं कवन संदेस सुखारी।।_अर्थ_जब दीन_दु_खी सब माताएं पूछेंगी, तब से विधाता ! मैं उन्हें क्या कहूंगा ? जब लक्ष्मणजी की माता मुझसे पूछेंगी, तब मैं उनसे कौन_सा सुखदायी संदेशा कहूंगा।







 राम जननी जब आइहि धाइ। सुमिरि बच्छ जिमि धेनु लवाई।। पूछत उतरु देब मैं तेही। गए बनु राम लखनु बैदेही।।_अर्थ_श्रीरामजी की माता जब इस प्रकार दौड़ी आवेंगी जैसे श्री ब्यायी हुई गौ बछड़े को याद करके दौड़ी आती है, तब उसके पूछने पर मैं उन्हें यह उत्तर दूंगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, सीता वन को चले गये।






जोइ पूछिहिं तेहि उतरु देबा। जाइ अवध अब यह सुख लेबा।। पूछिहिं जबहिं राऊ दुख दीना। जीवनी जासु रघुनाथ अधीना।।_अर्थ_ जो भी पूछेगा उसे यही उत्तर देना पड़ेगा ! हाय ! अयोध्या जाकर मुझे अब यही सुख लेना है ! जब दु:ख से दीन महाराज, जिनका जीवन रघुनाथजी के ( दर्शनके ) ही अधीन है, मुझसे पूछेंगे,।






देहंउ उतरु कोनु मुहु लाई। आयउं कुसल कुअंर पहुंचाई।। सुनत लखन सीय राम संदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।_अर्थ_प्रियतम ( श्रीरामजी) रूपी जल के बिछुड़ते मेरा हृदय कीचड़ की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूं कि विधाता ने मुझे यह 'यातनाशरीर' ही दिया है ( जो पापी जीवों को नरक भोगने के लिये मिलता है )







हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु। जानत हों मोहि दीन्हा बिधि यही जितना सरीरु।।_अर्थ_प्रियतम ( श्रीरामजी ) रूपी जल के बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़ के तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूं कि विधाता ने मुझे यह 'यातनाशरीर' ही दिया है ( जो पापी जीवों को नरक भोगने के लिये मिलता है)








एहि बिधि करत पंथ पछितावा।  तमसा तीर तुरंत रथु आवा।। बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरेउ पायं परि बिकल बिषादा।।_अर्थ_सुमंत्र मार्ग में इस प्रकार पछतावा कर रहे थे, इतने में रथ तुरत तमसा नदी के तट पर आ पहुंचा। मंत्री ने विनय करके चारों निषादों को विदा किया। वे विषाद से व्याकुल होते हुए सुमंत्र के पैरों पड़कर लौटे।







पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बांभन गाई।। बैठि बिटप तरु दिवसु गवांवा। सांझ समय तब अवसरु पावा।।_अर्थ_ नगर में प्रवेश करते समय मंत्री ( ग्लानि के कारण ) ऐसे सकुचाते हैं, मानो गुरु, ब्राह्मण या गौ को मारकर आये हों। सारा दिन एक पेड़ के नीचे बैठकर बिताया। जब सन्ध्या हुई तब मौका मिला।






अवध प्रबेसु कीन्ह अंधियारे। पैठ भवन रथ राखी दुआरें।।  जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथ देखन आए।।_अर्थ_अंधेरा होने पर उन्होंने अयोध्या में प्रवेश किया और रथ को दरवाजे पर खड़ा करके वे ( चुपके से ) महल में घुसे। जिन जिन लोगों ने यह समाचार सुन पाया, वे सभी रथ को देखने राजद्वार पर आये।








रथु पहचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।। नगर नारि नर व्याकुल कैसें। निघटत नीर मीनगन जैसें।।_अर्थ_रथ को पहचानकर और घोड़ों को व्याकुल देखकर शरीर ऐसे गले जा रहे हैं ( क्षीण हो रहे हैं ) जैसे घाम में ओले ! नगर के स्त्री_पुरुष कैसे व्याकुल हैं जैसे जल के घटने पर मछलियां ( व्याकुल होती हैं)।









सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु। भवनु भयंकर लाग तेहि मानहुं प्रेत निवासु।।_अर्थ_मंत्री का ( अकेले ही ) आना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो गया। राजमहल उनको ऐसा भयानक लगा मानो प्रेतों का निवासस्थान ( श्मशान ) हो।








अति आरती सब पूछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।। सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहां नृपु तेहि तेहि बूझा।।_अर्थ_अत्यंत आर्त होकर जब रानियां पूछती हैं; पर सुमंत्र को कुछ उत्तर नहीं आता, उनकी वाणी विकल हो गयी ( रुक गयी ) है। न कानों से सुनायी पड़ता है और न आंखों से कुछ सूझता है। वे जो भी सामने आता है उस_उससे पूछते हैं_कहो, राजा कहां है ?









दासिन्ह दिख सचिव बिकलाई। कौशल्या गृह गईं लवाई।। जाइ सुमंत्र दिख कस राजा। अमिय रहित जनु चंदु बिराजा।।_अर्थ_दासियां मंत्री को व्याकुल देखकर उन्हें कौशल्याजी के महल में लगवा गयीं। सुमंत्र ने वहां जाकर राजा को कैसा ( बैठे ) देखा मानो अमृत का चन्द्रमा हो।








आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।। लेइ उसासु सोच एहि भांति। सुरपुर में जनु खंसेउ जजाती।।_अर्थ_राजा आसन, शय्या और आभूषणों से रहित बिलकुल मलिन ( उदास ) पृथ्वी पर पड़े हुए हैं। वे लेकर इस प्रकार सोच करते रहे हैं मानो राजा ययाति स्वर्ग से गिरकर सोच कर रहे हों।







लेत सोच भरी छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।। राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।_ अर्थ_ राजा क्षण_क्षण में सोच से छाती भर लेते हैं। ऐसी विकल दशा है मानो ( गीधराज जटायु का भाई ) संपाती पंखों के जल जाने के बाद गिर पड़ा हो। राजा ( बार _बार ) 'राम', 'हा स्नेही  ( प्यारे ) राम !' कहते हैं, फिर 'हा राम, हां लक्ष्मण, हां जानकी' ऐसा कहने लगते हैं। 







देखि सचिवं जयजीव कहि किन्हेंउ दंड प्रनामु।। सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहं राम ।।_अर्थ_मंत्री ने देखकर 'जयजीव' कहकर दण्डवत् प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले_सुमन्त्र ! कहो, राम कहां हैं ?








भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।। सहित सनेह निकट बैठारी। पूछत राउ नयन भरी बारी।।_अर्थ_राजा ने सुमंत्र को हृदय से लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमी को कुछ सहारा मिल गया हो। मंत्री को स्नेह के साथ बैठाकर नेत्रों में जल भरकर राजा पूछने लगे_








राम कुसल कहीं सखा सनेही। कहां रघुनाथु लखनु बैदेही।। आनेहु फेरि कि बनहिं सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।।_अर्थ_हे मेरे प्रेमी सखा ! श्रीरामजी की कुशल कहो। बताओ, श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी कहां हैं ? उनको लौटा लाए हो कि वे वन को चले गये ? यह सुनते ही मंत्री के नेत्रों में जल भर आया।









सोक बिकल पुनि पूंछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।। राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।।_अर्थ_शोक से व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे_सीता, राम और लक्ष्मण का संदेसा तो कहो। श्रीरामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को याद कर_करके राजा हृदय में सोच करते हैं।










राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरहुं हरांसू।। सो सुत बिछुड़त गए न प्राना। को पापी बड़े मोहि समाना।।_अर्थ_( और कहते हैं _) मैंने राजा होने की बात सुनकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिस ( राम ) के मन में हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्र के बिछड़ने पर भी मेरे प्राण नहीं गये, तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा ?









सखा रामु सिय लखनु जहं तहां मोहि पहुंचाव। नाही त चाहत चलन अब प्रान कहउं सतिभाउ।।_अर्थ_हे सखा ! श्रीराम, जानकी और लखन जहां हैं, मुझे भी वहीं पहुंचा दो। नहिं तो मैं सत्यभाव से कहता हूं कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं।








पुनि पुनि पूंछत मंत्रिहिं राऊ। प्रियतम सुअन संदेस सुनाऊ।। करहि सखा सोई बेगि उपाऊ। राम लखन सीय नयन देखाऊ।।_अर्थ_राजा बार_बार मंत्री से पूछते हैं _मेरे प्रियतम पुत्रों का संदेसा सुनाओ। हे सखा ! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को मुझे आंखों दिखा दो।









सचिव धीर धरि कह मृदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।। बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।_अर्थ_ मंत्री धीरज धरकर कोमल वाणी बोले_महाराज ! आप पण्डित और ज्ञानी हैं। हे देव ! आप शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान् पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। आपने सदा साधुओं के समाज का सेवन किया है।








जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।। काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।।_अर्थ_जन्म_मरण, दु:ख_सुख के भोग, हानि_लाभ, प्यारों का मिलना_बिछुड़ना, ये सब से स्वामी ! काल और कर्म के अधीन रात और दिन की तरह बरबस होते रहते हैं।







Thursday, 22 June 2023

अयोध्याकाण्ड

सुमिरत राम तजहिं जन तृन सम विषय बिलासु। राम प्रिया जगजननी सिय कछु न आचरजु तासु।।_अर्थ_जिन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करने से ही भक्तजन तमाम भोग_विलास को तिनके के समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजी की प्रिय पत्नी और जगत् की माता सीताजी के लिये यह ( भोग विलास का त्याग ) कुछ भी आश्चर्य नहीं है।





सिय लखन जेहिं बिधि सुखु लहहीं। सोई रघुनाथ करहिं सोई कहहीं।। कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।।_अर्थ_सीताजी और लक्ष्मणजी जिस प्रकार सुख मानकर सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वहीं करते और वही करते हैं। भगवान् प्राचीन कथाएं और कहानियां कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा अत्यंत सुख मानकर सुन रहे हैं।





जब जब राम अवध सुधि करहीं। तब तब बारिश बिलोचन भरहीं। सुमिरत मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।_अर्थ_जब जब श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या की याद करते हैं, तब तब उनके नेत्रों में जल भर आता है। माता_पिता, कुटुम्बियों और भाइयों तथा भरत के प्रेम, शील और सेवाभाव को याद करके_






कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहीं कुसमी बिचारी।। लगा सिय लखनु बिकल होई जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसार परिछाहीं।।_अर्थ_कृपा के समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दु:खी हो जाते हैं, परन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजी को दु:खी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्य की परछाईं उस मनुष्य के समान ही चेष्टा करती है ।





प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।। लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहीं लखनु अरु सीता।।_अर्थ_ तब धीर, कृपालु और भक्तों के हृदयों को शीतल करने के लिये चन्दनरूप रघुकुल को आनंदित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी प्यारी पत्नी और भाई लक्ष्मण की दशा देखकर कुछ पवित्र कथाएं कहने लगते हैं, जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्राप्त करते हैं।





राम लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।_अर्थ_लक्ष्मणजी और सीताजी सहित श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावती में इन्द्र अपनी पत्नी श्री और पुत्र जयंत सहित बसता है।





जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।। सेवहिं लखन सीय रघुबरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी की कैसी संभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी श्रीरामचन्द्रजी की ऐसी देखभाल करते हैं जैसे मूर्ख अपने शरीर का। ं






एहि बिधि प्रभु बन बसहीं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।। कहेउं राम बन गवन सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।_अर्थ_पक्षी, पशु, देवता और तपस्वियों के हितकारी इस प्रकार सुखपूर्वक वन में निवास कर रहे हैं। तुलसीदास जी कहते हैं _ मैंने श्रीरामजी का सुन्दर वनगमन कहा। अब जिस तरह सुमंत्र अयोध्या में आये वह ( कथा ) सुनो।







फिरेउ निषादु प्रभुहिं पहुंचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।। मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को पहुंचाकर जब निषादराज लौटा, तब आकर उसने रथ को मंत्री ( सुमंत सहित ) देखा। मंत्री को व्याकुल देखकर निषाद को जैसा दु:ख हुआ, वह कहा नहीं जाता।






राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल व्याकुल भारी।। देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहंग अकुलाहीं।।_अर्थ_(निषाद को ऐसे आया देखकर ) सुमंत्र हा राम ! हा राम ! हा सीते, हा लक्ष्मण ! पुकारते हुए , बहुत व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़े। ( रथ के ) घोड़े दक्षिण दिशा की ओर ( जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे ( देख_देखकर हिनहिनाते हैं ) । मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हैं।








नहिं तृण चरहीं न पिअहिं जल मोचहिं लोचन बारि। व्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजी निहारि।।_अर्थ_वे न तो घास चलते हैं, न पानी पीते हैं। केवल आंखों से जल बहा रहे हैं। रामचन्द्रजी के घोड़ों को इस दशा में देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये।







धरि धीरजु तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहू बिषादू।। तुम्ह पंडित परमारथ ज्ञाता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता।।_अर्थ_तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा_हे सुमंत्र जी ! अब विषाद को छोड़िये। आप पंडित और परमार्थ को जाननेवाले हैं। विधाता को प्रतिकूल जानकर धैर्य धारण कीजिये।





 कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।। सोक सिथिल रथ सकइ न हांकी। रघुबर बिरह पीर उर बांकी।।_कोमल बाणी से भांति भांति कथाएं कह_कहकर निषाद ने जबरदस्ती लाकर सुमंत्र को रथ पर बैठाया। परंतु शोक के मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथ को हांक नहीं सकते। उनके हृदय में श्रीरामचन्द्रजी के विरह की बड़ी तीव्र वेदना है।






चरफराहिं मग चरहीं न घोड़े। बन मृग मनहुं आनि रथ जोरे।। अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।_अर्थ_ घोड़े तड़फड़ाते हैं और ( ठीक ) रास्ते पर नहीं चलते। मानो जंगली पशु लाकर रथ में जोत दिये गये हैं। वे श्रीरामचन्द्रजी के वियोगी घोड़े भी कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कभी घूमकर पीछे की ओर देखने लगते हैं। वे तीक्ष्ण दु:ख से व्याकुल हैं।





जो कह राम लखन बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेहीं।। बाजी बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहिं भांती।।_अर्थ_जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकी का नाम ले लेता है, घोड़े हिकर हिकर उसकी ओर प्यार से देखने लगते हैं। घोड़ों की विरहदशा कैसे कही जा सकती है ? वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणि के बिना सांप व्याकुल होता है।





भयउ निषादु  विषाद बस देखत सचिव तुरंग। बोली सुसेवक चारि तब दिए सारथि संग।।_अर्थ_मंत्री और घोड़ों की यह दशा देखकर निषादराज विषाद के वश हो गया। तब उसने अपने चार उत्तम सेवक बुलाकर सारथि के साथ कर दिये।






गुह सारथि ही फिरेउ पहुंचाई। बिरहु बिसाल बरनि नहीं जाई।। चले अवध लेइ रथहीन निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा।।_अर्थ_निषादराज गुहा सारथि ( सुमंत्र जी ) को पहुंचाकर ( विदा करके ) लौटा। उसके विरह और दु:ख का वर्णन नहीं किया जा सकता। वे चारों निषाद रथ लेकर अवध को चले। ( सुमंत्र और घोड़ों को देख_देखकर )  वे भी क्षण_क्षणभर विषाद में डूबे जाते थे।








सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।। रहिहि न अंतहुं अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।_अर्थ_व्याकुल और दु:ख से दीन हुए सुमंत्र जी सोचते हैं कि श्रीरघुवीर के बिना जीने को धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है ही नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजी के बिछुड़ते ही छूटकर इसने यश ( क्यों ) नहीं ले लिया ।






भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहीं करत पयाना।। अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुं न हृदय होत दुइ टूका।_अर्थ_ये प्राण अपयश और पाप के भांड़े हो गये। अब ये किस कारण कूच नहीं करते ( निकलते नहीं ) ? हाय ! नीचे मन ( बड़ा अच्छा ) मौका चूक गया। अब भी तो हृदय के दो टुकड़े नहीं है जाते!







मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहुं कृपन धन राशि गवांई।। बिरिद बांधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।_अर्थ_सुमंत्र हाथ मल_मलकर और सिर पीट-पीटकर पछताते हैं। मानो कोई कंजूस धन का खजाना को बैठा हो। वे इस प्रकार चले मानो कोई बड़ा योद्धा वीर का बाना पहनकर और उत्तम शूरवीर कहलाकर युद्ध से भाग चला हो।






बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भांति।।_अर्थ_जैसे कोई विवेकशील, वेद का ज्ञाता, साधु सम्मत आचरणों वाला और उत्तम जाति का ( कुलीन ) ब्राह्मण धोखे से मदिरा पी लें और पीछे पछतावे, उसी प्रकार मंत्री सुमंत्र सोच कर रहे ( पछता रहे ) हैं।






जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।। रहै करमबस परिहरि नाहू। सचिव हृदय तिमि दारुण दाहू।।_अर्थ_जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधु स्वभाव की, समझदार और मन, वचन और कर्म से पति को देवता माननेवाली पतिव्रता स्त्री को भाग्यवश पति को छोड़कर ( पति से अलग ) रहना पड़े, उस समय उसके हृदय में जो भयानक संताप होता है, वैसे ही मंत्री के हृदय में हो रहा है।







लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।। सूखइ अधर लागि मुहं लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।_अर्थ_नेत्रों में जल भरा है, दृष्टि मंद हो गयी है। कानों को सुनाई नहीं पड़ता, व्याकुल हुईं बुद्धि बएठइकआनए हो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुंह में लाटी लग गयी है। किन्तु ( ये सब मृत्यु के लक्षण होने पर भी ) प्राण नहीं निकलते; क्योंकि हृदय में अवधइरूपई किवाड़ लगे हैं ( अर्थात् चौदह वर्ष बीत जाने पर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रहीं हैं )।




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बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुं पिता महतारी।। हानि ग्लानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।_अर्थ_सुमंत
जी के मुख का रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है जैसे इन्होंने माता_पिता को मार डाला हो। उनके मन में रामवियोगरूपी हानि की महान् ग्लानि ( पीड़ा ) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरक को जाता हुआ रास्ते में सोच कर रहा हो।






बचन न आव हृदयं पछिताई। अवध काह मैं देखब जाइ।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।_अर्थ_मुंह से वचन नहीं निकलते। हृदय में पछताते हैं कि मैं अयोध्या में जाकर क्या देखूंगा ? श्रीरामचन्द्रजी से शून्य रथ को जो भी देखेगा, वहीं मुझे देखने में संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुंह नहीं देखना चाहेगा )।