Sunday, 17 March 2024

अयोध्याकाण्ड

होहु संजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल
मरै कर ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊं। जिअत न सुरसरि उतरन देऊं।।_अर्थ_सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने का साज सजा लो ( अर्थात् भरत से युद्ध में मरने के लिये तैयार हो जाओ )। मैं भरत से सामने ( मैदान में ) लोहा लूंगा (: मुठभेड़ करूंगा) और जीते_जी उन्हें गंगापार उतरने न दूंगा।





होहु संजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊं। जिअत न सुरसरि उतरन देऊं।।_अर्थ_सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने के साथ सजा लो ( अर्थात् भरत से युद्ध में लड़ने के लिये तैयार हो जाओ )। मैं भरत से सामने ( मैदान में ) लोहा लूंगा ( मुठभेड़ करूंगा ) और जीते_जी उन्हें गंगापार उतरने न दूंगा।






समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।। भरत भाई नृपु मैं जन नीचू। बड़ें भाग अहि पाइअ मीचू।।_अर्थ_युद्ध में मरण, फिर गंगाजी का तट, श्रीरामजी का काम और क्षणभंगुर शरीर ( जो चाहे जब नाश हो जाय )। भरत श्रीरामजी के भाई और राजा ( उनके हाथ से मरना ) और मैं नीचे सेवक_बड़े भाग से ऐसी मृत्यु मिलती है।






स्वामि काज करिहउं रन रारी। जब धवलिहउं भुवनु दस चारी।। तजउं प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूं हाथ मुद मोदक मोरें।।_अर्थ_मैं स्वामी के काम के लिये रण मेंश लड़ाई करूंगा और चौदहों लोकों को अपने यश से उज्जवल कर दूंगा। श्रीरघुनाथजी के निमित्त प्राण त्याग दूंगा। मेरे तो दोनों ही हाथों में आनन्द के लड्डू हैं ( अर्थात् जीत गया तो रामसेवक का यश प्राप्त करूंगा और मारा गया तो श्रीरामजी की नित्य सेवा प्राप्त करूंगा )।





साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुं जासु न रेखा।। जायं जिअत जग सो महिभारू। जननी जीवन विटप कुठारू।_अर्थ_साधुऔं के समाज में जिनकी गिनती नहीं और श्रीराम जी के भक्तों में जिसका स्थान नहीं वह जगत् में पृथ्वी का भार होकर व्यर्थ हो जाता है। वह माता के जीवन रूपी वृक्ष के काटने के लिये कुल्हाड़ामात्र है।






बिगत बिषाद निषाद पति सबहिं बढ़ाई उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।_अर्थ_(इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के लिये प्राण समर्पण का निश्चय करके) निषादराज विषाद से रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच मांगा।






चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।। सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। माथीं बांधि चढ़ाइन्हि धनहीं।_अर्थ_ निषादराज को जोहार कर_करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राम में लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों की जूतियों का स्मरण करके उन्होंने भांजियां ( छोटे_छोटे तरकस ) बांधकर धनुहियों ( छोटे_छोटे धनुषों )_पर प्रत्यंचा चढ़ायीं।







अंगरी पहिरि कूड़ि सिर धरहीं। फरसा बांस सेल समय करहीं।। एक कुशल अति ओड़न खांड़ें। कूदहिं गगन मनहुं छिति छांड़े।।_अर्थ_ कवच पहनकर लोहे का टोप सिर पर रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछों को सीधा कर रहे हैं ( सुधार रहे हैं)। कोई तलवार वार रोकने में अत्यंत ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंग में भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद ( उछल ) रहे हों।





निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहइ जोहारे जाई।। देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।_अर्थ_अपना_अपना साज समाज ( लड़ाई का सामान और दल ) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुह को जोहार की। निषादराज ने सुंदर योद्धाओं को देखकर सबको सुयोग्य जाना और नाम ले_लेकय सबका सम्मान किया।






भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।_अर्थ_( उसने कहा_)हे भाइयों ! धोखा न लाना ( अर्थात् मरने से न घबराना), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोश सेके साथ बोल उठे_हे वीर ! अधीर मत हो।






राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।। जीवत पाउ न पाएं धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनी करहीं।।_अर्थ_हे नाथ ! श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से और आपके बल से हमलोग भरत की सेना को बिना वीर और और बिना घोड़े के ही कर देंगे ( एक_एक वीर और एक_एक घोड़े को मार डालेंगे )। जीते_जी पीछे पांव न रखेंगे। पृथ्वी को रुण्ड_मुण्डमयी कर देंगे ( सिरों और धरों से छा देंगें )।





दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढ़ोलू।। एतना कहते छींक भइ बांए।। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।_अर्थ_निषादराज ने वीरों का बढ़िया दल देखकर कहा_जुझाऊ ( लड़ाई का ) ढ़ोल बजाओ। इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई। शकुन विचारने वालों ने कहा कि खेत सुन्दर है ( जीत होगी )।





बूढ़ु एक कह सगुन बिचारी। भरतहिं मिलइ न होइहि रारी।। रामहिं भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रह नाहीं।।_अर्थ_एक बूढ़े ने शकुन विचारकर कहा_ भरत से मिलना होगा, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजी को मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है।





सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझे। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।_अर्थ_यह सुनकर निषादराज गुह ने कहा_बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दी में ( बिना विचारे ) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजी का शील_स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करने में हित नहीं है।






सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझे। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।_अर्थ_यह सुनकर निषादराज गुह ने कहा_बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दी में ( बिना विचारे ) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजी का शील_स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करने में हित नहीं है।





गहहु घाट भट समिति सब लेउं मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउं आइ।।_अर्थ_अतएव हे वीरों ! तुमलोग इकट्ठे होकर सब घाटों को रोक लो, मैं जाकर भरतजी से मिलकर उनका भेद लेता हूं। उनका भाव मित्र का है या शत्रु का या उदासीन का, यह जानकर तब आकर वैसा ( उसी के अनुसार ) प्रबन्ध करूंगा।






लखि सनेहु सुभायं सुहाएं। बैरु प्रीति नहिं दुरइं दुराएं।। अस कहि भेंट संजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।_अर्थ_उनके सुंदर स्वभाव से मैं उनके स्नेह को पहचान लूंगा। वैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंट का सामान सजाने लगा। उसने कंद, मूल, फल, पक्षी और हिरन मंगवाये।








मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।। मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।_अर्थ_कहारलोग पुराने और मोटी पहिना नामक मछलियों के भार भर_भरकर लाये। भेंट का सामान सजाकर मिलने के लिये चले तो मंगलदायक शुभ शकुन मिले।

Wednesday, 28 February 2024

अयोध्याकाण्ड

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहिं लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।_अर्थ_भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया ; और जो जिस योग्य था उसे उसी काम पर नियुक्त किया। सब व्यवस्था करके, रक्षकों को रखकर भरतजी राजमाता कौसल्याजी के पास गये।







आरती जननी जानि सब भरत सनेह सुजान। कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।_अर्थ_स्नेह के सुजान ( प्रेम के तत्व को जाननेवाले ) भरतजी ने सब माताओं को आर्त ( दु:खी ) जानकर उनके लिये पालकियां तैयार करने और सुखासन यान ( सुखपाल सजाने के लिये कहा।







चक्क चक्की जिमि पुर नर नारी। चाहत प्रात उर आरत भारी।। जागते सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाएं सचिव सुजाना।।_अर्थ_नगर के नर_नारी चकवे_चकवी की भांति हृदय में अत्यन्त आर्त होकर प्रातःकाल का होना चाहते हैं। सारी रात जागते_जागते सवेरा हो गया। तब भरतजी ने चतुर मंत्रियों को बुलाया।








कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।। बेगि चलिहउं सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग संवारे।।_अर्थ_और कहा_तिल का सब सामान ले चलो। वन में ही मुनि वसिष्ठ जी श्रीरामचन्द्रजी को राज्य दे देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मंत्रियों ने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये।









अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ। बिप्र बृंद चढ़ि वाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।।_अर्थ_सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठ जी अरुंधति और अग्निहोत्र की सब सामग्री सहित रथ पर सवार होकर चले। फिर ब्राह्मणों के समूह, जो सब_के_सब तपस्या और तेज के भण्डार थे, अनेकों सवारियों पर चढ़कर चले।







नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहं कीन्ह पयाना।। सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भईं सब रानी।।_नगर के सब लोग रथों को सजा_सजाकर चित्रकूट को चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी पालकियों पर चढ़_चढ़कर सब रानियां चलीं।







सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।_अर्थ_विश्वासपात्र सेवकों को नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजी के चरणों को स्मरण करके दोनों भाई चले।





राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।। बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के वश में हुए ( दर्शन की अनन्य लालसा से ) सब नर नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी_हथिनी जल को तककर ( बड़ी तेजी से बावले हुए ) जा रहे हों। श्रीसीतारामजी ( सब सुखों को छोड़कर ) वन में हैं, मन में ऐसा विचारके छोटे भाई शत्रुध्नजीसहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं।








देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरा चले हम गया रथ त्यागे।। जाइ समीप राखि निज डोली। रामु मातु मृदु बानी बोली।।_अर्थ_उनका स्नेह जानकर लोग प्रेम में मग्न हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथों को छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी भरतजी के पास जाकर अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणी से बोलीं__







तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।। तुम्हें चलत चलइहइ सबु लोगू। सकल सोक कृष नहिं मग जोगू।।_अर्थ_हे बेटा ! माता बलऐयआं लेती है, तुम रथ पर चढ़ जाओ, नहिं तो सारा प्यारा परिवार दु:खी हो जायगा। तुम्हारे पैदल चलने से सभी लोग पैदल चलेंगे। शोक के मारे सब दुबले हो रहे हैं पैदल रास्ते के ( पैदल चलने के ) योग्य नहीं है।






सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।। तमसा प्रथम दिवस करि बासू।। दूसर गोमति तीर निवासू।।_अर्थ_माता की आज्ञा सिर चढ़ाकर और उनके चरणों में सिर नवाकर दोनों भाई रथ पर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसा पर वास ( मुकाम ) करके दूसरा मुकाम गोमति के तीर पर किया।





पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग। करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।_अर्थ_कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रात को एक ही बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग_विलास को छोड़कर सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के लिये नियम और व्रत करते हैं।







सईं तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।। समाचार सब सुने निषादा। हृदयं बिचार करइ सबिषादा।।_अर्थ_रातभर सई नदी के तीर पर निवास करके सवेरे वहां से चल दिये और  सब श्रृंगवेरपुर के समीप जा पहुंचे । निषादराज ने सब समाचार सुने, तो वह दु:खी होकर हृदय में विचार करने लगा_








कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।। जौं पै जियं न होति कुटिलाईं। जौं कत लीन्ह संग कटकाई।।_अर्थ_क्या कारण है जो भरत वन को जा रहे हैं, मन में कुछ कपट भाव अवश्य है। यदि मन में कुटिलता न होती, तो साथ में सेना क्यों ले चले हैं।








जाहिं सानुज रामहिं मारी। करउं अकंटक राजु सुखारी।। भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।।_अर्थ_समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीरामजी को मारकर सुख से निष्कंटक राज्य करूंगा। भरत ने हृदय में राजनीति को स्थान नहीं दिया ( राजनीति का विचार नहीं किया )। तब ( पहले ) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवन से ही हाथ धोना पड़ेगा।








सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहिं समर न  जीतनिहारा।। का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।_अर्थ_संपूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जायें, तो भी श्रीरामजी को रण में जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है ? विष की बेलें अमृत फल कभी नहीं फलती।





अस बिचारि गुहं ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु। हथवांसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।_अर्थ_ऐसा विचाकर गुह  ( निषादराज) ने अपनी जाति वालों से कहा कि सबलोग सावधान हो जाओ। नावों को हाथ में ( कब्जे में ) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटों को रोक दो।






Saturday, 10 February 2024

अयोध्याकाण्ड

मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल स्नेहन बिकल में भारी।। भरतहिं कहहिं सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।।_अर्थ_माता, मंत्री, गुरु, नगर के स्त्री_पुरुष सभी स्नेह के कारण बहुत _ही व्याकुल हो गये। सब भरतजी को सराह_सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेम की साक्षात् मूर्ति ही है।



तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।। जो पावंरउ अपनी जड़तआई। तुम्हहीं सुगाइ मातु कुटिलाईं।।_अर्थ_हे तात भरत ! आप ऐसा क्यों न कहें।  श्रीरामजी को आप प्राणों के समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खता से आपकी माता कैकेई की कुटिलता को लेकर आपपर संदेह करेगा।




सो सब कोटिक पुरुष समेता। बसिहिं कलप षट नरक निकेता।। अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरई गरल दुख दारिद गहई।।_अर्थ_वह दुष्ट करोड़ों पुरखों सहित सौ कल्पों तक नरक के घर में निवास करेगा। सांप के पाप और अवगुण को मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विष को हर लेती है और दु:ख तथा दरिद्रता को भस्म कर देती है।




अवसि चलिअ बन रामु जहां भरत मंत्र भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलम्बन दीन्ह।।_अर्थ_हे भरतजी ! वन को अवश्य चलिये, जहां श्रीरामजी हैं। आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोक समुद्र में डूबते हुए सब लोगों को आपने बहुत ( बड़ा ) सहारा दे दिया।




भा सबके मन मोदु ने थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।। चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रान प्रिय भें सबही के।।_अर्थ_सबके मन में कम आनंद नहीं हुआ ( अर्थात् बहुत ही आनंद हुआ ) मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक आनंदित हो रहे हों। ( दूसरे दिन ) प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभी के प्राण प्रिय हो गये।




मुनिहिं बंदि भरतहिं सिरु नाई। चले सकल घर विदा कराई।। धन्य भरत जीवन जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाही।।_अर्थ_मुनि वसिष्ठ जी की वन्दना करके और भरतजी को सिर नवाकर सब लोग विदा लेकर अपने_अपने घर को चले। जगत् में भरतजी का जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील  स्नेह की सराहना करते जाते हैं।




कहहिं परस्पर भा बड़ काजू। सकल चले कर साजहिं साजू।। जेहिं राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।।_अर्थ_आपस में कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलने की तैयारी करने लगे। जिसको भी घर की रखवाली के लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वहीं समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी।




कोऊ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।_अर्थ_कोई कोई कहते हैं_रहने के लिये किसी को भी मत कहो, जगत् में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता ?




जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृदु मातु पितु भाई। सनमुख हो जो राम पद करै न सहस सहाई।।_अर्थ_यह संपति, घर, सुख, माता_पिता, भाई जल जाय जो श्रीमजी के चरणों के सम्मुख होने में हंसते हुए ( प्रसन्नतापूर्वक ) सहायता न करे।




घर घर साजहिं वाहन नाना। हरषु हृदय परभात पयाना।। भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजी गज भवन भंडारू।।_अर्थ_घर_घर लोग अनेकों प्रकार की सवारियां  सजा रहे हैं। हृदय में बड़ा हर्ष है कि सवेरे चलना है। भरतजी ने घर जाकर विचार किया कि नगर घोड़े _हाथी, नगर, खजाना आदि_





संपति सब रघुपति के आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही।। जौं परिणाम न मोहि भलाई। पाप सइरओमनइ साईं दोहाई।_अर्थ_सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी की है। यदि उसकी रक्षा की व्यवस्था किये बिना, उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूं, तो परिणाम में मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामी का द्रोह सब पापों का शिरोमणि है।





करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।। अस बिचारी सुचि सेवक बोले। जे सनेहु निज धरम न डोले।।_अर्थ_सेवक वहीं है जो स्वाऔऔमि का हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया जो कभी स्वप्न में भी अपने धर्म से नहीं डिगे थे।





कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहिं लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।_अर्थ_भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया ; और जो जिस योग्य था उसे उसी काम पर नियुक्त किया। सब व्यवस्था करके, रक्षकों को रखकर भरतजी राजमाता कौसल्याजी के पास गये।


Sunday, 28 January 2024

अयोध्याकाण्ड

कैकेई भव तनु अनुरागे। पावर प्रान अघाइ अभागे।। जौं प्रिय बिरहं प्राण प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।_अर्थ_कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट ( पूरी तरह से ) अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में भी प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे और भी कुछ देखूं_सुनुंगा।

राम लखन सिय कहुं बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।। लीन्ह विधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजा सोक संतापू।।_अर्थ_लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजी को वन दिया; स्वर्ग भेजकर पति का कल्याण किया; स्वयं विधवापन और अपयश लिया; प्रजा को शोक और संताप दिया।

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।। एहि तें मोर कहा अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।।_अर्थ_और मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया ! कैकेई ने सभी का काम बना दिया ! इससे अच्छा अब मेरे लिये क्या होगा ? उसपर भी आपलोग मुझे राजतिलक देने को कहते हैं !

कैकेइ जठर जन्मी जग माहीं। यह मोहि कहं कछु अनुचित नाहीं।। मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पांच कत करहु सहाई।।_अर्थ_कैकेयी के पेट से जगत् में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है। मेरी सब बात तो विधाता ने ही बना दी है। ( फिर )उसमें प्रजा और पंच ( आपलोग ) क्यों सहायता कर रहे हैं।

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।_अर्थ_जिसे कुग्रह लगे हों ( अथवा जो पिशाच ग्रस्त हो ), फिर जो वआयउरओग से पीड़ित हो और उसी को फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है !

कैकेइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।। दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्ह मोहि बिधि बादि बड़ाई।।_अर्थ_कैकेयी के लड़के के लिये संसार में जो कुछ योग्य था, चतुर विधाता ने मुझे वही दिया। पर 'दशरथजी के पुत्र' और 'राम का छोटा भाई' होने की बड़ाई विधाता ने मुझे व्यर्थ दी है।

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहं नीका।। उतरु दें केहि बिधि केहि केही।। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।।_अर्थ_आप सब लोग भी मुझे टीका कढाने के लिये कह रहे हैं। मैं किस_किस को किस प्रकार से उत्तर दूं ? जिसकी जैसी रुचि हो आपलोग सुखपूर्वक वही कहें।

मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।। मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहिं सिय राम प्रान प्रिय नाहीं।।_अर्थ_मेरी कुमाता कैकेयीसमेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा किया गया ? जड़ _चेतन  जगत् मेरे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणों के समान प्यारे न हों।

परम हानि सब कहं बड़ राहू। अदानी मोर नहिं दूषन काहू।। संजय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।_अर्थ_जो परम हानि है, उसी में सबका बड़ा लाभ दीख रहा है। मेरा बुरा दिन है किसी का दोष नहीं। आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है। क्योंकि आपलोग संशय, शील और प्रेम के वश में हैं।

राम मातु सुठि सरल चित। मो पर प्रेम बिसेषि। कहइ सुभायं सनेह बस मोरि दीनता देखि।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी की माता बहुत ही सरल हृदय हैं और मुझपर उनका विशेष प्रेम है। इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेह वश ही ऐसा कह रही हैं।

गुरु बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि विस्व कर बदर समाना।। मो कहं तिलक साज सज सोऊ। भएं बिधि बिमुख सबु कोऊ।।_अर्थ_गुरुजी ज्ञान के समुद्र हैं, इस बात को सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व हथेली पर रखे हुए बेर के समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलक का साज सज रहे हैं। सत्य है, विधाता के विपरीत होने पर सब कोई विपरीत हो जाते हैं।


परिहरि राम सिय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।। सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुं कीच तहां जहं पानी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी को छोड़कर जगत् में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थ में मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूंगा और सहूंगा। क्योंकि जहां पानी होता है, वहां अंत में कीचड़ होता ही है।

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।। एकहइं उर बस दउसह दुखारी। मोहि लगि में संघीय राम दुखारी।।_अर्थ_मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोक का ही सोच है। मेरे हृदय में तो बस, एक ही दु:सह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दु:खी हुए।

जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि रामु चरन मन लावा।। मोर जन्म रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउं अभागी।।_अर्थ_जीवन का उत्तम लाभ तो लक्ष्मण ने पाया, जिन्होंने सबकुछ तजकर श्रीरामजी के चरणों में मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजी के वनवास के लिये ही हुआ था। मैं अभागा झूठ_मूठ क्या पछताता हूं?

आपनी दारुन दीनता कहउं सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय के जरनि न जाइ।।_अर्थ_सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूं। श्री रघुनाथजी के चरणों के दर्शन किये बिना मेरे जी की जलन नहीं जायगी।

आन उपाय मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।। एकइं आंक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउं प्रभु पाहीं।।_अर्थ_मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्रीरामजी के बिना मेरे हृदय की बात कौन जान सकता है ? मन में एक ही आंक ( निश्चयपूर्वक) यही है कि प्रात:काल प्रभु श्रीरामजी के पास चल दूंगा।

यद्यपि मैं अनभल अपराधी। भैं मोहि कारन सकल उपाधी।। तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।।_अर्थ_यद्यपि मैं बुरा हूं और अपराधी हूं, और मेरे ही कारण यह सब उपद्रव हुआ है, तथापि श्रीरामजी मुझे शरण में सम्मुख आया हुआ देखकर सब अपराध क्षमा करके मुझपर विशेष कृपा करेंगे।

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।। अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक यद्यपि बामा।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और स्नेह के घर हैं। श्रीरामजी ने कभी शत्रु का भी अनिष्ट नहीं किया। मैं यद्यपि टेढ़ा हूं पर हूं तो उनका बच्चा और गुलाम ही।

तुम्ह पै पांच मोर भल जानी। आयसु आसिस देहु सुबानी।। जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि राम रजधानी।।_अर्थ_आप पंच ( सब ) लोग भी इसी में मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणी से आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानी को लौट आवें।

यद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपनी जानि न त्यआगइहहइं मोहि रघुबीर भरोस।।_अर्थ_यद्यपि मेरा जन्म कुमाता से हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषमुक्त भी हूं तो भी मुझे श्रीरामजी का भरोसा है कि मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।

भरत बचन सब कहं प्रिय लागे। राम स्नेह सुधा जनु पागे।। लोग वियोग बिषम विष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।।_अर्थ_भरतजी के वचन सबको प्यारे लगे मानो वे श्रीरामजी के प्रेमरूपी अमृत में पगे हुए थे। श्रीराम वियोग रूपी भीषण विष से सबलोग जले हुए थे। वे मानो बीज सहित मंत्र को सुनते ही जाग उठे।


Sunday, 7 January 2024

अयोध्याकाण्ड

राय राजपदु तुम्ह कहुं दीन्हा। पिता बचन फुर चाहिअ कीन्हा।। तजे राम जेहिं वचनहि लागी। तनु परिहरिउ राम बिरहागी।।_अर्थ_राजा ने राजपद तुमको दिया है। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझ कर सोच त्याग दो और राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो।





नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।। करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहीं सब भांति भलाई।।_अर्थ_राजा को वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात ! पिता पके वचनों का प्रमाण ( सत्य ) करो ! राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसी में सब तरह से भलाई है।






परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।। तनय जजआतइहइ यौवन दयऊ। पितु अग्यां अघ अजसु न भयऊ।।_अर्थ_परसुरामजी ने पिता की आज्ञा रखी और माता को मार डाला; सब लोक इस बात के साक्षी हैं। राजा ययाति के पुत्र ने पिता को अपनी जवानी दे दी। पिता की आज्ञा पालन करने से उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ।






अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। तें भाजन सुख सुजसु के बसहिं अमरपति ऐन।।_अर्थ_जो अनुचित और उचित का विचार छोड़कर पिता के वचनों का पालन करते हैं, वे ( यहां ) सुख और सुयश के पात्र होकर अन्त में इन्द्र पुरी ( स्वर्ग )_में निवास करते हैं।







अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।। सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुं सुकृतु सुजसु नहिं दोषू।।_अर्थ_राजा का वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजा का पालन करो। ऐसा करने से स्वर्ग में राजा संतोष पावेंगे और तुमको पुण्य और यश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा।






बेद बिदित संमत सब ही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।। करहु राज परिहरहु गलानी। मानहुं मोर बचन हित जानी।।_अर्थ_ यह वेद में प्रसिद्ध है और ( स्मृति _पुराणादि ) सभी शास्त्रों के द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानि का त्याग कर दो। मेरे वचन को हित समझकर मानो।







सुनि सुख लहब राम बैदेही। अनुचित कहा न पंडित केहीं।। कौसल्याजी सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।_अर्थ_इस बात को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकी जी सुख पावेंगे और कोई पंडित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएं भी प्रजा के सुख से सुखी रहेंगे।







परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह कहीं भल मानिहि।। सौंपेहु राजु राम के आएं। सेवा करेगी स्नेह सुहाएं।।_अर्थ_जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ सम्बंध को जान लेगा, वह सभी प्रकार से तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजी के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेह से उनकी सेवा करना।








कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएं उचित जस तस तब करब बहोरि।।_अर्थ_मंत्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं_गुरुजी की आज्ञा का अवश्य ही पालन कीजिये। श्री रघुनाथजी के लौट आने पर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा।









कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।। सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।।_अर्थ_कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं_हे पुत्र ! जो पिता की आज्ञा का पालन करता है वही पुत्र धन्य है। समय की गति को समझकर धीरज धरो।








बन रघुपति सुरपुर नरनाहू। तुम्ह एहि भांति तात कदराहू।। परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हीं सुत सब कहां अवलंबा।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी वन में हैं, महाराज स्वर्ग का राज करने चले गये। और हे तात ! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र! कुटुम्ब, प्रजा, मंत्री और सब माताओं के_सबके एक तुम ही सहारे हो।






लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।। सिर धरि गुरु आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।_अर्थ_विधाता को प्रतिकूल और काल को कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है। गुरु की आज्ञा का पालन कर कुटुम्बियों का दु:ख हरो।




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गुरु के बचन सचिव अभिनन्दनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।। सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी ।।_अर्थ_भरतजी ने गुरु के वचनों और मंत्रियों के अभिनंदन ( अनुमोदन )_को सुना जो उनके हृदय के लिये मानो चन्दन के समान शीतल था।





सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत व्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्रवत सींचती बिरह उर अंकुर नए। सो दशा देखत समय तेहि बिसरी सबही सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीव सहज सनेह की।।_अर्थ_सरलता के रस में सनी हुई माता की वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र_कमल जल ( आंसू ) बहाकर हृदय के विरह रूपी नवीन अंकुर को सींचने लगे। ( नेत्रों के आंसुओं ने उनके वियोग दु:ख को बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यंत व्याकुल कर दिया। ) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीर की सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं_ स्वाभाविक प्रेम की सीमा श्रीभरतजी की सबलोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे।





भरत कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअ जनु बोरि देते उचित उत्तर सबहि।।_अर्थ_धैर्य की धुरी धारण करनेवाले भरतजी धीरज धरकर, कमल के समान हाथों को जोड़कर, वचनों को मानो अमृत में डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे।






मोहि उपदेसु दीन्हा गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सब ही का।। मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउं कीन्हा।।_अर्थ_गुरुजी ने मुझे सुन्दर उपदेश दिया। ( फिर ) प्रजा, मंत्री आदि सभी को यही सम्मत है। माता ने उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा ही करना चाहता हूं।







गुरु पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।। उचित कि अनुचित करें बिचारू। धर्मु जाइ सिर पातक भारू।।_अर्थ_( क्योंकि ) गुरु, पिता, स्वामी और सुहृद मित्र_( मित्र )_ की वाणी सुनकर प्रसन्न मन से अच्छी समझकर मानना चाहिये। उचित_अनुचित का विचार करने से धर्म जाता है और सिर पर पाप का भार चढ़ाता है।







तुम्ह तो देहु सरल सिख सोई। जो आचरण मोर भल होई।। यद्यपि यह समझते हौं नीकें। तदपि होत परितोष न जी कें।।_अर्थ_आप तो मुझे वहीं सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करने में मेरा भला हो। यद्यपि इस बात को मैं भली_भांति समझता हूं, तथापि मेरे हृदय को संतोष नहीं होता।







अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।। उतरु देब छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।_अब आपलोग मेरी विनती सुन लीजिए और मेरी योग्यता के अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दे रहा हूं, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दु:खी मनुष्य के दोष गुणों को नहीं गिनते।





पितु सुरपुर सिय राम बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित को आपने बड़ काजु।।_अर्थ_पिताजी स्वर्ग में हैं, श्रीसीतारामजी वन में हैं और मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दे रहा हूं, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दु:खी मनुष्य के दोष_गुणों को नहीं गिनते।







पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहू मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित को आपने बड़ काजु।।_अर्थ_पिताजी स्वर्ग में हैं, श्रीसीतारामजी वन में हैं और मुझे आप राज्य करने के लिये कह रहे हैं। इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम ( होने की आशा रखते हैं ) ?







हित हमार सियपति सेवकाईं। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाईं।। मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपाय मोर हित नहीं।।_अर्थ_मेरा कल्याण तो सीता पति श्रीरामजी की चाकरी में हैं, सो उसे माता की कुटिलता ने छीन लिया। मैंने अपने मन में अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपाय से मेरा कल्याण नहीं है।







सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।। बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू।।_अर्थ_यह शोक का समुदाय राज्य  लक्ष्मण, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के चरणों को देखें बिना किस गिनती में है ( इसका क्या मूल्य है ) ? जैसे कपड़ों के बिना गहनों का बोझ व्यर्थ है। वैराग्य के बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है।








सरुज शरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरि भगति जायें जप जोगा।। जायं जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।।_अर्थ_रोगी शरीर के लिये नाना प्रकार के भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरि की भक्ति के बिना जप जप और जोग व्यर्थ है। वैसे ही श्री रघुनाथजी के बिना मेरा सबकुछ व्यर्थ है।







सरुज शरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरि भगति जायें जप जोगा।। जायं जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सब बिनु रघुराई।।_अर्थ_रोगी शरीर के लिये नाना प्रकार के भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरि की भक्ति के बिना जप और जोग व्यर्थ है। वैसे ही श्री रघुनाथ के बिना मेरा सबकुछ व्यर्थ है। 







जाउं राम नहिं आयसु देहू। एकहइं आंक मोर हित एहू।। मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोच सनेह जड़ता बस कहहू।।_अर्थ_मुझे आज्ञा दीजिये, मैं श्रीरामजी के पास जाऊं। एक ही आंक ( निश्चयपूर्वक ) मेरा हित इसी में हैं। और मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेह की जड़ता ( मोह ) के वश होकर ही कह रहे हैं।






कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोह बस मोहि से अधम कें राज।।_अर्थ_कैकेयी के पुत्र, कुटिलबुद्धि, राम विमुख  और निर्लज्ज मुझ से अधम के राज्य से आप मोह के वश होकर ही सुख चाहते हैं।







कहउं सांची सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू। मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।।_अर्थ_मैं सत्य कहता हूं, आप सब सुनकर कीन्हा विश्वास करें, धर्मशील को ही राजा होना चाहिये। आप मुझे हठ करके ज्योंहि राज देंगे त्योंहि पृथ्वी पाताल में धंस जायगी।







मोहि समान को पापनिवासू। जेहिं लगा सिय राम बनवासू।। रायन राम कहुं कानन दीन्हा। बिछुड़त गमन अमरपुर कीन्हा।।_अर्थ_मेरे समान पापों का घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्रीरामजी का बनवास हुआ ? राजा ने श्रीरामजी को वन दिया और उनके बिछड़ते ही स्वयं स्वर्ग को गमन किया।






मैं सठ सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउं सचेतू।। बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।।_अर्थ_और मैं दुष्ट,जो सारे अनर्थों का कारण हूं, होश_हवास में बैठा सब बातें सुन रहा हूं। श्री रघुनाथजी से रहित घर को देखकर और जगत् का उपहास संकर भी ये प्राण बने हुए हैं।







राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।। कहां लगी कहां हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसहु जेहिं लही बड़ाई।।_अर्थ_(इसका यही कारण है कि ये प्राण ) श्रीराम रूपी पवित्र विषय_रस में आसक्त नहीं है। ये लालची भूमि और भोगों के ही भूखे हैं। मैं अपने हृदय की कठोरता कहां तक कहूं ? जिसने वज्र का भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है।







कारन तें कारज कठिन होत दोस नहिं मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।_अर्थ_कारण से कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डी से वज्र और पत्थर से लोहा भयानक कठोर होता है।


Monday, 13 November 2023

अयोध्याकाण्ड

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा। परम बिचित्र बिमान बनावा।। गहि पद भरत मातु सब राखी। रहीं रानी दर्शन अभिलाषी।।_अर्थ_वेदों में बतायी हुई विधि से राजा की देह को स्नान कराया गया और परम बिचित्र विमान बनाया गया। भरतजी ने सब माताओं को चरण पकड़कर रखा ( अर्थात् प्रार्थना करके उनको सती होने से रोक लिया )। वे रानियां भी ( श्रीराम के ) दर्शन की अभिलाषा से रह गयीं।






चंदन अगर भार बहु आए। अमित अनेक सुगंध सुहाए।। सरजू तीर रचि चिता बनाई। जनु सुरपुर सोपान सुहाई।।_अर्थ_चंदन और अगर के तथा और भी अनेकों प्रकार के अपार ( कपूर, गुलगुल, केसर आदि ) सुगंध द्रव्यों के बहुत_से बोझ आये। सरयूजी के तट पर सुंदर चिंता रचकर बनायी गयी, ( जो ऐसी मालुम होती थी ) मानो स्वर्ग की सुंदर सीढ़ी हो।





एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही। बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही।। सोधि स्मृति सब बेद पुराना। कीन्ह भरत दसगात बिधाना।।_अर्थ_इस प्रकार सब दाहक्रिया की गयी और सबने बइधइपूर्वक स्नान करके तिलांजलि दी। फिर वेद, स्मृति और पुराण सबका मत निश्चय करके उसके अनुसार भरतजी ने पिता का दशगात्र_विधान ( दस दिनों के कृत्य ) किया।









जहं जस मुनिवर आयसु दीन्हा। तहं तस सहज भांति सबु कीन्हा।। भए बइसउद्ध दिए सब दाना। धेनु बाजी गज बाहन नाना।।_अर्थ_ मुनिश्रेष्ठ वसिष्ठ जी ने जहां जैसी आज्ञा दी, वहां भरतजी ने वैसा ही हजारों प्रकार से किया। शुद्ध हो जाने पर ( विधिपूर्वक ) सब दान दिये। गऔएं तथा घोड़े, हाथी आदि अनेक प्रकार की सवारियां,





सिंघासन भूषन बसन अन्न धरना धन धाम। दिए भरत रहि भूमइसउर में परिपूर्ण काम।।_अर्थ_सिंहासन, गहने, कपड़े, अन्न, पृथ्वी, धन और मकान भरतजी ने दिए; भूदेव ब्राह्मण दान पाकर परिपूर्ण काम हो गये ( अर्थात् उनकी सारी मनोकामनाएं अच्छी तरह से   पूरी हो गयीं )




पितु हित भरत कीन्ह जस करनी। सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी।। सुदिनु सोधि मुनिवर तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।।_अर्थ_पिता के लिये भरतजी ने जैसी करनी की वह लाखों मुखों से भी वर्णन नहीं की जा सकती। तब शुभ दिन शोधकर श्रेष्ठ मुनि वसिष्ठ जी आए और उन्होंने मंत्रियों तथा सब महाजनों को बुलाया।




बैठे राजसभां सब जाई। पड़े बोलि भरत दोउ भाई।। भरतु बसिष्ठ निकट बैठाले। नीति धरममय बचन उचारे।।_अर्थ_ सब लोग राजसभा में जाकर बैठ गये। तब मुनि ने भरतजी तथा शत्रुघ्नजी दोनों भाइयों को बुलवा भेजा। भरतजी को वसिष्ठ जी ने अपने पास बैठा लिया और नीति तथा धर्म से भरे हुए वचन कहे।






प्रथम कथा सब मुनिवर बरनी। कैकेई कुटिल कीन्ह जस करनी।। भूप धरमब्रतउ सत्य सराहा। जेहिं तनु परिहरि प्रेम निबाहा।।_अर्थ_पहले तो कैकेयी ने जैसी कुटिल करनी की थी, श्रेष्ठ मुनि ने वह सारी कथा कही। फिर राजा के धर्मव्रत और सत्य की सराहना की, जिन्होंने शरीर त्यागकर प्रेम को निबाहा।





कहत राम गुन सील सुभाऊ। सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ।। बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी। सोक सनेह मगन मुनि ज्ञानी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के गुण, शील और स्वभाव का वर्णन करते_करते तो मुनिराज के नेत्रों में जल भर आया और वे शरीर से पुलकित हो गये। फिर लक्ष्मण जी और सीताजी के प्रेम की बड़ाई करते हुए ज्ञानी मुनि शोक और स्नेह में मग्न हो गये।





सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ। हानि लाभ जीवनु मरने जस अपजसु बिधि हाथ।।_अर्थ_मुनिनाथ ने बिलखकर ( दु:खी होकर ) कहा_हे भरत ! सुनो, भावी ( होनहार) बड़ी बलवान् है। हानि_लाभ, जीवन_मरण और यश_अपयश, ये सब विधाता के हाथ हैं।






अस बिचारि केही देइअ दोसू। ब्यरथ काहि पर कीजिए रोसू।। तात बिचारी करहु मन माहीं। सोचु जोगु दशरथ नृप नाही।।_अर्थ_ऐसा विचारकर किसे दोष दिया जाय ?और व्यर्थ किसपर क्रोध किया जाय ? हे तात ! मन में विचार करो। राजा दशरथ सोच करने योग्य नहीं हैं।





सोचिअ बिप्र जो वेद बिहीना। तजि निज धर्मु बिषय लयलीना।। सोचिअ नृपति जो नीति न जाना। जेहि न प्रजा प्रिय प्राण समाना।।_अर्थ_सोच उस ब्राह्मण का करना चाहिये जो वेद नहीं जानता और जो अपना धर्म छोड़कर विषय भोगों में ही लीन रहना है। उस राजा का सोच करना चाहिये जो नीति नहीं जानता और जिसको प्रजा प्राणों के समान प्यारी नहीं है।






सोचिअ बयसु कृपन धनवानू। जो न अतिथि सिव भगति सुजानू।। सोचिअ सूद्रू बिप्र अवमानी। मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी।।_अर्थ_उस वैश्य का सोच करना चाहिये जो धनवान होकर भी कंजूस है, और जो अतिथि सत्कार तथा शिवजी की भक्ति करने में कुशल नहीं है। उस शूद्र का सोच करना चाहिये जो ब्राह्मणों का अपमान करनेवाला, बहुत बोलनेवाला, मान_बड़ाई चाहनेवाला और ज्ञान का घमंड रखनेवाला है।





सोचिअ पुनि पतिबंचक नारी। कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी।। सोचिअ बटु निज ब्रतउ परिहरई। जो नहिं गुर आयसु अनुहरई।।_अर्थ_पुन: उस स्त्री का सोच करना चाहिये जो पति को चलनेवाली, कुटिल, कलहप्रिय और स्वेच्छाचारिणी है। उस ब्रह्मचारी का सोच करना चाहिये जो अपने ब्रह्मचर्य व्रत को छोड़ देता है और गुरु की आज्ञा के अनुसार नहीं चलता।





सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग। सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग।।_अर्थ_उस गृहस्थ का सोच करना चाहिये जो मोह वश कर्ममार्ग का त्याग कर देता है; उस संन्यासी का सोच करना चाहिये जो दुनिया के प्रपंच में फंसा हुआ है और ज्ञान वैराग्य से हीन है।





बैखानस सोई सोचै जोखू। तप बिहाइ भोगू।। सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी। जननी जनक गुर बंधु बिरोधी।।_अर्थ_वानप्रस्थ वहीं सोच करने योग्य है जिसको तयस्यआ छोड़कर भोग अच्छे लगते हैं। सोच उसका करना चाहिये जो चुगलखोर है, बिना ही कारण क्रोध करनेवाला है तथा माता, पिता, गुरु एवं भाई बंधुओं का विरोध रखनेवाला है।






सब बिधि सोचिअ पर अपकारी। निज तनु पोषक निरदय भारी।। सोचनीय सबहीं बिधि सोई। जो न छाड़ि छलु हरि जन होई।।_अर्थ_सब प्रकार से उसका सोच करना चाहिये जो दूसरों का अनिष्ट करता है, अपने ही शरीर का पोषण करता है और बड़ा भारी निर्दयी है। और वह तो सभी प्रकार से सोच करने योग्य है जो छल छोड़कर हरि का भक्त नहीं होता।






सोचनीय नहिं कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।। भयउ न अहई न  अब होनिहारा। भूप भरत जस पिता तुम्हारा।।_अर्थ_कोसलराज दशरथजी सोच करने योग्य नहीं हैं जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट है। हे भरत ! तुम्हारे पिता_जैसा राजा न तो हुआ न है और न अब होने का ही है। 






बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा। बरनहि सब दशरथ गुन गाथा।।_अर्थ_ब्रह्मा, विष्णु, शिव, इन्द्र और दिक्पाल सभी दशरथजी के गुणों की कथाएं कहते रहते हैं।

कहहु तात केहि भांति कोई करिहिं बड़ाई तासु। राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु।।_अर्थ_हे तात ! कहो उनकी बड़ाई कोई किस प्रकार करेगा, जिनके राम, लक्ष्मण, तुम और शत्रुघ्न सरीखे पवित्र पुत्र हैं।






सब प्रकार भूपति बड़भागी। बादि बिषादु करिअ तेहि लागी।। यह सुनि समुझि सोचु परिहरहू। सिर धरि राज रजायसु करहू।।_अर्थ_राजा सब प्रकार से बड़भागी थे। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझकर सोच त्याग दो और राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो।

Saturday, 7 October 2023

अयोध्याकाण्ड

पितु सुरपुर बन रघुवर केतू। मैं केवल सब अनरथ हेतू।। धिग मोहि भयउं बेनु बन आगी। दुसह दाह दुख दूषन भागी।।_अर्थ_पिताजी स्वर्ग में हैं और श्रीरामजी वन में हैं। केतू के समान केवल मैं ही इन सब अनर्थों का कारण हूं। मुझे धिक्कार है ! मैं बांस के वन में आग उत्पन्न हुआ और कठिन दाह, दु:ख और दोषों का भागी बना।




मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी संभारि। लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि।।_अर्थ_भरतजी के कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर संभलकर उठीं। उन्होंने भरत को उठाकर छाती से लगा लिया और नेत्रों से आंसू बहाने लगीं।






सरल सुभाय मायं हियं लाए। अति हित मनहुं राम फिरि आए।। भेंटेउ बहुरि लखन लखन लघु भाई। सोकु सनेहु न हृदयं समाई।।_अर्थ_सरल स्वभाववाली माता ने बड़े प्रेम से भरतजी को छाती से लगा लिया; मानो श्रीरामजी ही लौटकर आ गये हों। फिर लक्ष्मण जी के छोटे भाई शत्रुघ्न को हृदय से लगा लिया। शोक और स्नेह हृदय में समाता ही नहीं है।







देखि सुभाउ कहत सबु कोई। राम मातु अस काहे न होई।। माता भरतु गोद बैठारे। आंसु पोंछि मृदु बचन उचारे।।_अर्थ_ कौसल्या का स्वभाव देखकर सब कोई कह रहे हैं_श्रीराम की माता का ऐसा स्वभाव क्यों न हो। माता ने भरतजी को गोद में बैठा लिया और उनके आंसू पोंछकर कोमल वचन बोलीं।







अजहुं बच्छ बलि धीरज धरहु। कुसमय समुझि सोक परिहरहू।। जनि मानहुं हइयं हानि गलानी। काल क्रम गति अघटित जानी।।_अर्थ_हे वत्स ! मैं बलैया लेती हूं। तुम अब भी धीरज धरो। बुरा समय जानकर शोक त्याग दो। काल और कर्म की गति अमिट जानकर हृदय में हानि और ग्लानि मत मानो।







काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता।। जो एतएहउं दुख मोहि जिआवा। अजहुं को जानि का तेहि भावा।।_अर्थ_ हे तात ! किसी को दोष मत दो। विधाता मुझको सब प्रकार से उल्टा हो गया है, जो इतने दु:ख पर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है ?







पितु आयसु भूषन बसन तात तजे रघुबीर। बिसमउ हरष न हृदयं कछु पहिरे बलकल चीर।।_अर्थ_ हे तात ! पिता की आज्ञा से श्रीरघुवीर ने भूषन_वस्त्र त्याग दिये और वल्कल _वस्त्र पहन लिये। उनके हृदय में न कुछ विषाद था न हर्ष।







मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू।। चले बिपिन सुनि सिय संग लागी। रहि न राम चरन अनुरागी।।_अर्थ_उनका मुख प्रसन्न था, मन में न आसक्ति थी, न राग ( द्वेष )। सबका सब तरह से संतोष कराकर वे वन को चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीराम के चरणों की अनुरागिणि वे किसी तरह न रहीं।








सुनहिं लखन चले उठि साथा।  रहहइं न जतन किए रघुनाथा।। तब रघुपति सबही सिरु नाई। चले संग सिय अरु लघु भाई।।_अर्थ_सुनते ही लक्ष्मण भी साथ ही उठ चले। श्रीरघुनाथ ने उन्हें रोकने के बहुत यत्न किये, पर वे न रहे। तब श्रीरघुनाथजी सबको सिर नवाकर सीता और छोटे भाई लक्ष्मण को साथ लेकर चले गये।







रामु लखनऊ सिय बनहइ सिधाए। गाउं न संग न प्रान पठाए।। यह सबु भा इन्ह आंखिन्ह आगें। तउ न तजा तनु जीव अभागे।।_अर्थ_श्रीराम, लक्ष्मण और सीता वन को चले गये। मैं न तो साथ ही गया और न मैंने अपने प्राण ही उनके साथ भेजे। यह सब इन्हीं आंखों के सामने हुआ। तो भी अभागे जीव ने शरीर नहीं छोड़ा।








मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी।। जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना।।_अर्थ_ अपने स्नेह की ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम सरीखे पुत्र की मैं माता ! जीना और मरना तो राजा ने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रों के समान कठोर है।







कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवासु। ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुं सोक नेवासु।।_अर्थ_कौसल्या के वचनों को सुनकर भरतसहित सारा रनिवास व्याकुल होकर विलाप करने लगा। राजमहल मानो शोक का निवास बन गया।







बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई। कौसल्या लिए हृदयं लगाई।। भांति अनेक भरत समुझाए। कहि बिबेकमय बचन सुनाए।।_अर्थ_भरत_शत्रुध्न दोनों भाई विकल होकर विलाप करने लगे। तब कौसल्याजी ने उनको हृदय से लगा लिया। अनेकों प्रकार से भरतजी को समझाया और बहुत _सी विवेकभरी बातें उन्हें कहकर सुनायीं।








भरतहउं मातु सकल समुझाईं। कहि पुराने श्रुति कथा सुहाई।। छल बिहीन सुचि सरल सुबानी।
बोले भरत जोरी जुग पानी।।_अर्थ_ भरतजी ने आक्षममपमपंभी सभी माताओं को पुराण और वेदों की सुन्दर कथाएं कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी जलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले__








जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महइसउर पुर जारें।। जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महिपति माहुर दीन्हें।।_अर्थ_जो पाप माता पिता को पुत्र के मारने से होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणों के नगर जलाने से होते हैं और जो मित्र और राजा को जहर देने से होते हैं__








जे पातक उपपातक अहहईं। कर्म बचन मन भव कबि कहहीं।। तें पातक मोहि होहुं बिधाता। जौं यही होइ मोर मत माता।।_अर्थ_कर्म वचन और मन से होनेवाले जितने पातक एवं उपपातक ( बड़े_छोटे पाप ) हैं, जिनको कवइलओग कहते हैं; हे विधाता ! यदि इस काम में मेरा मत हो, तो हे माता ! वे सब पाप मुझे लगें।







जे परिहरि हरि हर चरन भजहइं भूतगन घोर। तेहि कइ गति मोहि देहु बिधि जौं जननी मत मोर।।_अर्थ_जो लोग श्रीहरि और श्रीशंकरजी के चरणों को छोड़कर भयानक भूत_प्रेतों को भजते हैं, हैं माता ! यदि इसमें मेरा मत हो तो विधाता मुझे उनकी गति दे।








बेचहिं बेद धर्म दुधि लेहीं। पिसुन पराय पाप कहि देहिं।। कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी। बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी।।_अर्थ_जो लोग वेदों को बेचते हैं, धर्म को दुह लेते हैं, चुगलखोर हैं, दूसरे के पापों को कह देते हैं, जो कपटी, कुटिल, कलहप्रिय और क्रोधी हैं, तथा जो वेदों की निंदा करनेवाले और विश्वभर के विरोधी हैं;








लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधन परदारा।। पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा। जौं जननी यह संमत मोरा।।_अर्थ_ जो लोभी लंपट और लालचियों का आचरण करनेवाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्री की ताक में रहते हैं; हे जननी! यदि इस काम में मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गति को पाऊं।








जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमार्थ पथ बइमउख अभागे।। जे न भजहिं हरि नरतनु पाई। जिन्हें न हरिहर सुजसु सोहाई।।_अर्थ_जिनका सत्संग में प्रेम नहीं हैं; जो अभागे परमार्थ के मार्ग से विमुख हैं; जो मनुष्य शरीर पाकर क्षश्रीहरि का भजन नहीं करते; जिनको हरिहर ( भगवान् विष्णु और शंकरजी ) का सुयश नहीं सुहाता;








तजा श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बइरचइ बेषु जग छलहीं।। तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यही जानों भेऊ।।_अर्थ_जो वेदमार्ग को छोड़कर वाम ( वेदप्रतिकूल ) मार्ग पर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत् को छलते हैं; हैं माता ! मैं इस भेद को जानता भी होऊं तो शंकरजी मुझे उनलोगों की गति दें।








मातु भरत के वचन सुनि सांचे सरल सुभायं। कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा वचन मन कायं।।
_अर्थ_माता कौसल्याजी भरत के स्वाभाविक ही सच्चे और सरल वचनों को सुनकर कहने लगीं _हे तात ! तुम तो मन, वचन और शरीर से सदा ही श्रीरामचन्द्र के प्यारे हो।








राम प्रानहुं तें प्रान तुम्हारे। तुम्ह रघुपतिहि प्रानहुं तें प्यारे।। बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी। होइ बारिचर बारि बिरागी।।_अर्थ_श्रीराम तुम्हारे प्राणों से भी बढ़कर प्राण ( प्रिय ) हैं और तुम भी श्रीरघुनाथजी को प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। चन्द्रमा चाहे विष चुआने लगे और पाला आग बरसाने लगे; जलचर जीव जल से विरक्त हो जाय।








भएं ज्ञानु  बरु मिटै न मोहू।। तुम्ह रामहित प्रतिकूल न होहू।। मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुं सुख सुगति न लहहीं।।_अर्थ_और ज्ञान हो जाने पर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्र के प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत् में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्न में भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे।








अस कहि मातु भरतु हियं लाए। थन पय स्रवहिं नयन जल छाए।। करत बिलाप बहुत एहि भांती। बैठेहिं बीती गई सब राती।।_अर्थ_ऐसा कहकर माता कौसल्या ने भरतजी को हृदय से लगा लिया। उनके स्तनों से दूध बहने लगा और ने त्यों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल छा गया। इस प्रकार बहुत विलाप करते हुए सारी रात बैठे_ही_बैठे बीत गयी।








बामदेउ बसिष्ठ तब आए। सचिव महाजन सकल बोलाए।। मुनि बहु भांति भरत उपदेसे। कहि परमारथ बचन सुदेसे।।_अर्थ_तब वामदेवजी और वसिष्ठ जी आये। उन्होंने सब मंत्रियों तथा महाजनों को बुलवाया। फिर मुनि वसिष्ठ जी ने परमार्थ के सुन्दर समयआकूल वचन कहकर बहुत प्रकार से भरतजी को उपदेश दिया।







तात हृदयं धीरज धरहु करहु जो अवसर आजु। उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु।।
_अर्थ_( वसिष्ठ जी ने कहा_) हे तात ! हृदय में धीरज धरो और आज जिस कार्य करने का अवसर है, उसे करो। गुरुजी के वचन सुनकर भरतजी उठे और उन्होंने सब तैयारी करने के लिये कहा।