Monday, 24 March 2025

अयोध्याकाण्ड

मिटिहहि पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।_अर्थ_हे भरत ! तुम्हारा नाम_स्मरण करते ही सब पाप, प्रपंच ( अज्ञान ) और समस्त अमंगलों के समूह मिट जायेंगे तथा इस लोक में सुन्दर यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा।

कहुं सुभाऊ सत्य सिवा साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतर्क करहु जनि जाएं। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएं।।_अर्थ_हे भरत ! मैं स्वभाव से ही सत्य कहता हूं, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है‌ । हे तात ! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। वैर और प्रेम छिपाने नहीं छिपते।

मुनिगन निकट बिहंग मृग जाहीं। बाधक बधिक बिलोकि पराहीं।। हित अनहित पसु पच्छिउ जाना। मानुष तनु गुन ग्यान निधाना।।_अर्थ_पशु और पक्षी मुनियों के पास ( बेधड़क ) चले जाते हैं, पर हिंसा करनेवाले बधइकओं को देखते ही भाग जाते हैं। मित्र और शत्रु को पशु_पक्षी भी पहचानते हैं। फिर मनुष्य शरीर तो गुण और ज्ञान का भण्डार ही है।

तात तुम्हहिं हम जानउं नीकें। करौं काह असमंजस जी के।।  राखेउ रायन सत्य मोहि त्यागी। तनु परिहरेउ पेम पन लागी।।_अर्थ_ हे तात ! मैं तुम्हें अच्छी तरह से जानता हूं। क्या करूं ? जीने में बड़ा असमंजस ( दुविधा) है। राजा ने मुझे त्यागकर सत्य को रखा और प्रेम_प्रण के लिये शरीर छोड़ दिया।

तासु बचन मएटत मन सोचू। तेहि ते अधिक तुम्हार संकोचू।। ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा। अवसि जो कहहु चहुं सोइ कीन्हा।।_अर्थ_उनके वचन को मेटते मन में सोच होता है। उससे भी बढ़कर तुम्हारा संकोच है। उसपर भी गुरुजी ने मुझे आज्ञा दी है। इसलिये अब तुम जो कुछ कहो, अवश्य ही मैं वहीं करना चाहता हूं।

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु। सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु।।_अर्थ_ तुम मन को प्रसन्न कर और संकोच को त्यागकर जो कुछ कहो, मैं आज वही करूं। सत्यप्रतिज्ञ रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजी का यह वचन सुनकर सारा समाज सुखी हो गया।

सुरगन सहित सभय सुरराजू। सोचहिं चाहत होन अकाजू।। बनत उपाऊ करत कछु नाहीं। राम सरन सब गे मन माहीं।।_अर्थ_ देवगणों सहित देवराज इन्द्र भयभीत होकर सोचने लगे कि अब बना_बनाया काम बिगड़ना चाहता है। कुछ उपाय करते नहीं बनता। तब वे सब मन_ही_मन श्रीरामजी की शरण गये।

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं। रघुपति भगति भगति बस कहहीं।। सुधि करि अंबरीष दुरबासा। भए सुर सुरपति निपट निरासा।।_अर्थ_ फिर वे विचार करके आपस में कहने लगे कि श्रीरघुनाथजी तो भक्त की भक्ति के वश हैं। अम्बरीष और दुर्वासा की ( घटना ) याद करके तो देवता और इन्द्र बिलकुल ही निराश हो गये।

सहे सुरन्ह बहुत काल बिषादा। नरहरि किए प्रगट प्रहलादा।। लगा लगा कान कहहिं धुनि माथा। अब सुर काज भरत के हाथा।।_अर्थ_पहले देवताओं ने बहुत समय तक दु:ख सहने। तब भक्त प्रह्लाद ने ही नृसिंह भगवान् को प्रकट किया था। सब देवता परस्पर कानों से लग_लगकर और सिर धुनकर कहते हैं कि अब ( इस बार ) देवताओं का काम भरतजी के हाथ है।

आन उपाऊ न देखिअ देवा। मानता राम सुसेवक सेवा।। हियं सपेम सउमइरहउ सब भरतहिं। निज गुन सील राम बस करतहिं।।_अर्थ_हे देवताओं! और कोई उपाय नहीं दिखाई देता। श्रीरामजी अपने श्रेष्ठ सेवकों की सेवा मानते हैं ( अर्थात् उनके भक्त की कोई सेवा करता है तो उसपर बहुत प्रसन्न होते हैं)। अतएव अपने गुण और शील से श्रीरामजी को वश में करनेवाले भरतजी का ही सब लोग अपने-अपने हृदय में प्रेम सहित स्मरण करो।

सुनि सुरमत सुरगुरु कहेउ भल तुम्हार बड़ु भाग। सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु।।_अर्थ_देवताओं का मत सुनकर देवगुरु बृहस्पति जी ने कहा_अच्छा विचार किया, तुम्हारे बड़े भाग्य हैं। भरतजी के चरणों का प्रेम जगत् में समस्त शुभ मंगलों का मूल है।

सीतापति सेवक सेवकाई। कामधेनु समय सरिस सुहाई।। भरत भगति तुम्हें मन आई। तजहु सोच बिधि बात बनाई।।_अर्थ_सीतानाथ श्रीरामजी के सेवक की सेवा सैकड़ों कामधेनुओं के समान सुंदर है। तुम्हारे मन में भरतजी की भक्ति आई है, तो अब सोच छोड़ दो। विधाता ने बात बना दी।

देखु देवपति भरत प्रभाऊ। सहज सुभायं बिबस रघुराऊ।। मन थिर करहु देव डरु नाहीं। भरतहिं जानि राम परिछाहीं।।_अर्थ_हे देवराज ! भरतजी का प्रभाव तो देखो। श्रीरघुनाथजी सहज स्वभाव से ही उनके पूर्ण रूप से वश में हैं। हे देवताओं ! भरतजी को श्रीरामचन्द्रजी की परछाईं ( परछाईं की भांति उनका अनुसरण करनेवाला ) जानकर मन स्थिर करो, डर की बात नहीं है।

सुनि सुरगुर सुर संमत सोचू। अंतरजामी प्रभुहिं संकोचू।। निज सिर भारी भरत जियं जाना। करत कोटि बिधि उर अनुमान।।_अर्थ_ देवगुरु बृहस्पतिजी और देवताओं की सम्मति ( आपस का विचार ) और उनका सोच सुनकर अन्तर्यामी प्रभु श्रीरामजी को संकोच हुआ। भरतजी ने अपने सब बोझा अपने ही सिर पर जाना और हृदय में करोड़ों ( अनेकों ) प्रकार के अनुमान ( विचार ) करने लगे।

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका। राम रजायस आपन नीका।। निज पन तजि राखेउ पन मोरा। छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा।।_अर्थ_सब तरह से विचार करके अन्त में उन्होंने मन में यही निश्चय किया कि श्रीरामजी की आज्ञा में ही अपना कल्याण है। उन्होंने अपना प्रण छोड़कर मेरा प्रण रखा। यह कुछ कम कृपा और स्नेह नहीं किया ( अर्थात् अत्यन्त ही अनुग्रह और स्नेह किया ) ।

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ। करि प्रनामु बोले भरत जोरी जलज जुग हाथ।।_अर्थ_श्रीजानकीनाथ ने सब प्रकार से मुझपर अत्यन्त अपार अनुग्रह किया। तदनन्तर भरतजी दोनों करकमलों को जोड़कर प्रणाम करके बोले_

कहौं कहावौं का अब स्वामी। कृपा अंबुनिधि अंतरजामी।। गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला। मिटी मलिन मन कलपित सूला।।_अर्थ_हे स्वामी ! हे कृपा के समुद्र ! हे अन्तर्यामी ! अब मैं ( अधिक ) क्या कहूं और क्या कहां ? गुरु महाराज को प्रसन्न और स्वामी को अनुकूल जानकर मेरे मलिन मन की कल्पित पीड़ा मिट गयी।

अपडर डरेउं न सोच समूलें। रबिहिं न दोसु देव दिसि भूलें।। मोर अभागा मातु कुटिलाईं। बिधि गति विषम काल कठिनाई।।_अर्थ_मैं मिथ्या डर से ही डर गया था। मेरे सोच की जड़ ही न थी। दिशा भूल जाने पर हे देव ! सूर्य का दोष नहीं है। मेरा दुर्भाग्य, माता की कुटिलता, विधाता की टेढ़ी चाल और काल की कठिनता,

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला। प्रनतपाल पन आपन पाला।। यह नि रीति न राउरि होई। लोकहुं बेद बिदित नहिं गोई।।_अर्थ_इन सबने मिलकर पैर रोपकर ( प्रण करके ) मुझे नष्ट कर दिया था। परन्तु शरणागत के रक्षक आपने अपना ( शरणागत की रक्षा का ) प्रण निबाहा ( मुझे बचा लिया )। यह आपकी कोई अनोखी रीति नहीं है। यह लोक और वेदों में प्रकट है, छिपी नहीं है।

जगु अनुभव भल एकउ गोसाईं। कहिअ होइ भल कासु भलाई।। देउ देवतरु सरिस सुभाऊ। सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ।।_अर्थ_सारा जगत् बुरा ( करनेवाला ) हो, किन्तु हे स्वामी ! केवल एक आप ही भले ( अनुकूल ) हों, तो फिर कहिये, किसकी भलाई से भला हो सकता है ? हे देव ! आपका स्वभाव कल्पवृक्ष के समान है; वह भी कभी किसी के सम्मुख ( अनुकूल ) है, न विमुख ( प्रतिकूल )।

Thursday, 6 March 2025

अयोध्याकाण्ड

सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किया मुदित फुर भाषे।। प्रथम जो आयसु मो कहुं होई। मारें माना करउं सिख सोई।।_अर्थ_आपका रुख रखने में और आपकी आज्ञा को सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करने में ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षा को माथे पर चढ़ाकर करूं।

पुनि जेहिं कहं जस कहब गोसाईं। सो सब भांति घटिहिं सेवकाई।। कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहं बिचारु न राखा।।_अर्थ_फिर हे गोसाईं ! आप जिसको जैसा कहेंगे वह सब तरह से सेवा में लग जायगा ( आज्ञापालन करेगा )। मुनि वशिष्ठजी कहने लगे_हे राम ! तुमने सच कहा पर भरत के प्रेम ने विचार को नहीं रहने दिया।

तेहि ते कहंउ बहोरी बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।। मोरें जान भरत रुचि राखी। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।_अर्थ_इसलिये मैं बार_बार अहंता हूं, मेरी बुद्धि भरत की भक्ति के वश हो गयी है। मेरी समझ में तो भरत की रुचि रखकर जो कुछ किया जायगा, शिवजी साक्षी हैं, वह सब शुभ ही होगा।

भरत विनय सादर सुनिअ करिअ विचारी बहोरि। करीब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।_अर्थ_पहले भरत की विनती आदरपूर्वक सुन लीजिये, फिर उसपर विचार कीजिये। तब साधुमत, लोकमत, राजनीति और वेदों का निचोड़ ( सार ) निकालकर वैसा ही ( उसी के अनुसार) कीजिये।

गुर अनुरागु भरत पर देखी। राम हृदय आनंदु बिसेषी।। भरतहिं धर्म धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।।_अर्थ_भरतजी पर गुरुजी का स्नेह देखकर श्रीरामचन्द्रजी के हृदय में विशेष आनंद हुआ। भरतजी को धर्मधुरंधर और तन, मन, वचन से अपना सेवक जानकर_

बोले गुर आयसु अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगल मूला।। नाथ साथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी गुरु की आज्ञा के अनुकूल मनोहर, कोमल और कल्याण के मूल वचन बोले_हे नाथ! आपकी सौगन्ध और पिताजी के चरणों की दुहाई है ( मैं सत्य कहता हूं कि ) विश्वभर में भरत के समान भाई कोई हुआ ही नहीं।

जे गुर पद अंबुज अनुरागी। तें लोकहुं बेद हुं बड़भागी।। राउर जा पर अस अनुरागू। को कहा सकइ भरत कर भागू।।_अर्थ_जो लोग गुरु के चरणकमलों के अनुरागी हैं, वे लोक में ( लौकिक दृष्टि से ) और वेद में ( पारमार्थिक दृष्टि से ) भी बड़भागी होते हैं ! ( फिर ) जिसपर आप ( गुरु ) का ऐसा स्नेह है, उस भरत के भाग्य को कौन कह सकता है ?

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।। भरतउज्ञकहहइं सोइ किएं भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।_अर्थ_छोटा भाई जानकर भरत के मुंह पर उसकी बड़ाई करने में मेरी बुद्धि सकुचाती है। ( फिर भी मैं तो यही कहूंगा कि ) भरत जो कुछ कहें, वहीं करने में भलाई है। ऐसा कहकर श्रीरामचन्द्रजी चुप हो रहे।

तब मुनि बोले भरत सन सब संकोचु तजि तात। कृपा सिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय के बात।।_अर्थ_तब मुनि भरतजी से बोले_हे तात ! सब संकोच त्यागकर कृपा के समुद्र अपने प्यारे भाई से अपने हृदय की बात कहो।

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई। गुरु साहिब अनुकूल अघाई।। लखि अपने सिर सबु छरु भारू। कहि न सकहीं कछु करहिं बिचारू।।_अर्थ_ मुनि के वचन सुनकर और श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर_गुरु तथा स्वामी को अपने अनुकूल जानकर_सारा बोझ अपने ही ऊपर समझकर भरतजी कुछ कह नहीं सकते। वे विचार करने लगे।

पुलकि सरीर सभां में ठाढ़े। नीरज नयन नेह जल बाढ़े।। कहब मोर मुनिनाथ निबाहा। एहि तें अधिक कहौं मैं काहा।।_अर्थ_शरीर से पुलकित होकर वे सभा में खड़े हो गये। कमल के समान नेत्रों में प्रेमाश्रुओं  की बाढ़ आ गयी। ( वे बोले _) मेरा कहना तो मुनिनाथ ने ही निबाह दिया ( जो कुछ मैं कह सकता था वह उन्होंने ही कह दिया )। इससे अधिक मैं क्या कहूं ?

मैं जानउं निज नाथ सुभाऊ। अपराधिहु पर कोह न काऊ।। मो पर कृपा सनेहु बिसेषी। खेलत खुनिस न कबहूं देखी।।_अर्थ_अपने स्वामी का स्वभाव मैं जानता हूं। वे अपराधी पर भी कभी क्रोध नहीं करते। मुझपर तो उनकी विशेष कृपा और स्नेह है। मैंने खेल में भी कभी उनकी रिस ( अप्रसन्नता) नहीं देखी।

सिसुपन तें परिहरेउं न संगू। कबहुंक न कीन्ह मोर मन भंगू।।  मैं प्रभु कृपा रीति जियं जोही। हारेहुं खेल जितावहिं मोहीं।।_अर्थ_बचपन से ही मैंने उनका साथ नहीं छोड़ा और उन्होंने भी मेरे मन को कभी नहीं तोड़ा ( मेरे मन के प्रतिकूल कोई काम नहीं किया )। मैंने प्रभु की कृपा की रीति को हृदय में भली-भांति देखा (अनुभव किया है )। मेरे हारने पर भी खेल_खेल में मुझे जिता देते रहे हैं।

महूं सनेह संकोच बस सनमुख कहीं न बैन। दरसनु तृपित न आजु लगि पेम पियासे नैन।।_अर्थ_मैंने भी प्रेम और संकोचवश कभी सामने मुंह नहीं खोला। प्रेम के प्यासे मेरे नेत्र प्रभु के दर्शन से तृप्त नहीं हुए।

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा। नीच बीचु जननी मिस पारा।। यहु कहते मोहि आजु न सोभा। अपनी समुझि साधु सुचि को भा।।_अर्थ_परन्तु विधाता मेरा दुलार न सह सका। उसने नीच माता के बहाने ( मेरे और स्वामी के बीच ) अन्तर डाल दिया। यह भी कहना मुझे आज शोभा नहीं देता। क्योंकि अपनी समझ से कौन साधु और और पवित्र हुआ है ? ( जिसको दूसरे साधु और पवित्र माने वही साधु है )।

मातु मंदि मैं साधु सुचाली। उर अस आनत कोटि कुचाली।। फरइ कि कोदव बालि सुसाली। मुकुता प्रसव कि संबुक काली।।_अर्थ_माता नीच है और मैं सदाचारी और साधु हूं, ऐसा हृदय में लाना ही करोड़ दुराचार के समान है। क्या कोदो की बाली उत्तम धान फल सकती है ? क्या काली घोंघी मोती उत्पन्न कर सकती है ?

सपनेहुं दोसक लेसु न काहू। मोर अभागा उदधि अवगाहू।। बिनु समझें निज अघ परिपाकू। जारिउं जायं जननि कहि काकू।।_अर्थ_स्वप्न में भी किसी को दोषी का वेष भी नहीं है। मेरा अभाग्य ही अथाह समुद्र है। मैंने अपने पापों का परिणाम समझे बिना ही माता को कटु वचन कहकर व्यर्थ ही जलाया।

हृदयं हेरि हारेहुं सब ओरा। एकहि भांति भलेहिं भल मोरा।। गुर गोसाईं साहिब सिय रामू। लागत मोहि नीक परिनामू।।_अर्थ_मैं अपने हृदय में सब ओर खोजकर हार गया ( मेरी भलाई का कोई साधन नहीं सूझता )। एक ही प्रकार भले ही ( निश्चय ही ) मेरा भला है। वह यह है कि गुरु महाराज सर्वसमर्थ हैं और श्रीसीतारामजी मेरे स्वामी हैं। इसी से परिणाम मुझे अच्छा जान पड़ता है।

साधु सभां गुर प्रभु निकट कहुं सुथल सतिभाउ। प्रेम प्रपंच कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ।।_अर्थ_ साधुओं की सभा में गुरुजी और स्वामी के समीप इस पवित्र तीर्थ_स्थान में मैं सत्यभाव से कहता हूं। यह प्रेम या प्रपंच ( छल_कपट ) झूठ है या सच ? इसे ( सर्वज्ञ ) मुनि वशिष्ठजी और ( अन्तर्यामी ) श्रीरघुनाथजी जानते हैं।

भूपति मरन पेम पनु राखी। जननी कुमति जगती सबु साखी।। देखि न जाहिं बिकल महतारीं। जेहिं दुसह जर पुर नर नारीं।।_अर्थ_ प्रेम के प्रण को निबाहकर महाराज ( पिताजी)_का मरना और माता की कुबुद्धि, दोनों का सारा संसार साक्षी है। माताएं व्याकुल हैं, वे देखी नहीं जातीं। अवधपुरी के नर नारी दु:सह ताप से जल रहे हैं।

महीं सकल अनरथ कर मूला। सो सुनि समुझि सहिउं सब सूला।। सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा। करि मुनि बेस लखन सिय साथा।। बिनु पानहिन्ह पयादेहिं पाएं। संकरु साखी रहेंउं एहि घाएं।। बहुरि निहारि निषाद सनेहू। कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू।।_अर्थ_मैं ही इन सारे अनर्थों का मूल हूं, यह सुन और समझकश्र मैंने दु:ख सहा है। श्रीरघुनाथजी लक्ष्मण और सीताजी के साथ मुनियों का_सा वेष धारण कर बिना जूते पहने पांव_प्यादे ( पैदल ) ही वन को चले गये, यह सुनकर शंकरजी भी साक्षी हैं, इस घाव से मैं जीता रहा गया ( यह सुनते ही मेरे प्राण नहीं निकल गये ! फिर निषादराज का प्रेम देखकर भी इस वज्र से भी कठोर हृदय में छेद नहीं हुआ ( यह फटा नहीं)।

अब सबु आंखिन्ह देखेउं आई। जिअत जीव जड़ सबइ सहाई।। जिन्हहि निरखि मग सांपिनि बीती। तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी।।_अर्थ_अब यहां आकर सब आंखों देखा लिया। यह जड़ जीव जीता रहकर सभी सहावेगा। जिनको देखकर रास्ते की सांपिनि और बीती भी अपने भयानक विष और तीव्र क्रोध को त्याग देती है_।

तेहि रघुनंदन लखनु सिय अनहित लागे जाहि। जासु तनय तजि दुसह दुख दैव सहावइ काहि।।_अर्थ_ वे ही श्रीरघुनंदन, लक्ष्मण और सीता जिसको शत्रु जान पड़े, उस कैकेयी के पुत्र मुझको छोड़कर दैव दु:सह दुख और किसे सहावेगा ?

सुनि अति बिकल भरत बर बानी। आरती प्रीति विनय नय सानी।। सोक मगन सब सभा कहां खभारू। मनहुं कमल बन प्रेम तुषारू।।_अर्थ_ अत्यन्त व्याकुल तथा दु:ख, प्रेम, विनय और नीति में सनी हुई भरतजी की श्रेष्ठ वाणी सुनकर सब लोग शोक में मग्न हो गये, सारी सभा में विषाद छा गया। मानो कमर के वन पर पाला पड़ गया हो।

कहि अनेक विधि कथा पुरानी। भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ज्ञानी।। बोले उचित बचन रघुनंदू। दिनकर कुल कैरव बन चंदू।।_अर्थ_तब ज्ञानी मुनि वशिष्ठजी ने अनेक प्रकार की पुरानी ( ऐतिहासिक ) कथाएं कहकर भरतजी का समाधान किया। फिर सूर्यकुल रूपी कुमुद वन के प्रफुल्लित करनेवाले चन्द्रमा श्रीरघुनन्दन उचित वचन बोले_।

तात जायं जियं करहु गलानी। इस अधीन जीव गति जानी।। तीनों काल तिभुअन मत मोरें। पुन्यसिलोक तात तर तोरें।।_अर्थ_हे तात ! तुम अपने हृदय में व्यर्थ ही ग्लानि करते हो। जीव की गति को इश्वर के अधीन जानो। मेरे मत में ( भूत, भविष्य, वर्तमान ) तीनों कालों और ( स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल ) तीनों लोकों के सब पुण्यात्मा पुरुष तुमसे नीचे हैं।

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाईं। जाइ लोक परलोकु नसाई।। दोसु देहिं जननिहिं जड़ तेई। जिन्ह गुर साधु सभां नहिं सेई।।_अर्थ_हृदय में तुमपर भी कुटिलता का आरोप करने से यह लोक ( यहां के सुख_यश आदि ) बिगड़ जाता है और परलोक भी नष्ट हो जाता है ( मरने के बाद भी अच्छी गति नहीं मिलती )। माता कैकेयी को तो वे ही मूर्ख दोष देते हैं जिन्होंने गुरु और साधुओं की सभा का सेवन नहीं किया है।

मिटिहहि पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार। लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार।।_अर्थ_हे भरत ! तुम्हारा नाम_स्मरण करते ही सब पाप, प्रपंच ( अज्ञान ) और समस्त अमंगलों के समूह मिट जायेंगे तथा इस लोक में सुन्दर यश और परलोक में सुख प्राप्त होगा।

कहुं सुभाऊ सत्य सिवा साखी। भरत भूमि रह राउरि राखी।। तात कुतर्क करहु जनि जाएं। बैर पेम नहिं दुरइ दुराएं।।_अर्थ_हे भरत ! मैं स्वभाव से ही सत्य कहता हूं, शिवजी साक्षी हैं, यह पृथ्वी तुम्हारी ही रखी रह रही है‌ । हे तात ! तुम व्यर्थ कुतर्क न करो। वैर और प्रेम छिपाने नहीं छिपते।

Wednesday, 5 February 2025

अयोध्याकाण्ड

निसि न नींद नहीं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मईनहइं सरल संकोच।।_अर्थ_भरतजी को न तो रात में नींद आती है, न दिन में भूख ही लगती है। वे पवित्र सोच में ऐसे विकल हैं, जैसे नीचे ( तल )_के कीचड़ में डूबीं हुई मछली को जल की कमी से व्याकुलता होती है।

कीन्ह मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।। केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाऊ न एकू।।_अर्थ_( भरतजी सोचते हैं कि ) माता के बहाने से काल ने कुचाल की है। जैसे धान के पकते समय ईति का भय आ उपस्थित हो। अब श्रीरामचन्द्रजी का राज्याभिषेक किस प्रकार हो, मुझे तो एक भी उपाय नहीं सूझता।

 अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।। मातु कहेहुं बहुरहिं रघुराऊ। राम जननी हठ करि कि काऊ।।_अर्थ_गुरुजी की आज्ञा मानकर तो श्रीरामजी अवश्य ही अयोध्या लौट चलेंगे। परन्तु मुनि वशिष्ठजी तो श्रीरामचन्द्रजी की रुचि जानकर ही कुछ कहेंगे ( अर्थात् वे श्रीरामजी की रुचि देखें बिना जाने को नहीं कहेंगे )। माता कौसल्याजी के कहने से भी श्रीरघुनाथजी लौट सकते हैं; पर भला, श्रीरामजी को जन्म देनेवाली माता क्या कभी हठ करेगी ?

मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महं कुसुम बाम बिधाता।। जौं हठ करउं तो निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।।_अर्थ_मुझ सेवक की बात ही कितनी है ? उसमें भी समय खराब है ( मेरे दिन अच्छे नहीं है ) और विधाता प्रतिकूल है। यदि मैं हठ करता हूं तो यह घोर कुकर्म ( अधर्म) होगा, क्योंकि सेवक का धर्म शिवजी के पर्वत कैलाश से भी भारी ( निबाहने में कठिन ) है ।

एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचता भरतहिं रैन बिहानी।। प्रात नहाइ प्रभुहिं सिर नाई। बैठत पठए रिषय बोलाई।।_अर्थ_एक भी युक्ति भरतजी के मन में न ठहरी। सोचते_ही_सोचते रात बीत गयी। श्रीरामचन्द्रजी को सिर नवाकर बैठे ही थे कि ऋषि वशिष्ठजी ने उनको बुलवा भेजा।

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ। बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।_अर्थ_भरतजी गुरु के चरणकमलों में प्रणाम करके आज्ञा पाकर बैठ गये। उसी समय ब्राह्मण, महाजन, मंत्री आदि सभी सभासद आकर जुट गये।

बोले मुनिबर समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।। धर्म धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।।_अर्थ_ श्रेठ मुनि वशिष्ठजी समयोचित वचन बोले_हे सभासदों ! हे सुजान भरत ! सुनो। सूर्यकुल के सूर्य महाराज श्रीरामचन्द्र धर्मधुरंधर और स्वतंत्र भगवान हैं।

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।। गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलउ दलन देव हितकारी।।_अर्थ_ वे सत्यप्रतिज्ञ हैं और वेद के मर्यादा के रक्षक हैं। श्रीरामजी का अवतार ही जगत् के कल्याण के लिये हुआ है। वे गुरु, पिता और माता के वचनों के अनुसार चलने वाले हैं। दुष्टों के दल का नाश करनेवाले और देवताओं के हितकारी हैं।

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।। बिधि हरिहरु ससि रबि दिसिपाला।।_अर्थ_ नीति, प्रेम, परमार्थ और स्वार्थ को श्रीरामजी के समान यथार्थ ( तत्वसे ) कोई नहीं जानता। ब्रह्मा, विष्णु, महादेव, चन्द्र, सूर्य, दिक्पाल, माया, जीव, सभी कर्म और काल।

अहिप महिप जहं लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।। करि बिचारी जियं देखहु नीके। राम रजाइ सीस सबहिं के।।_अर्थ_शेषजी और ( पृथ्वी और पाताल के अन्यान्य ) राजा आदि जहां तक प्रभुता है, और योग की सिद्धियां, जो वेद और शास्त्रों मे गाइ गयी हैं, हृदय में अच्छी तरह विचार कर देखो, ( तो यह स्पष्ट दिखाई देगा कि ) श्रीरामजी की आज्ञा इन सभी के सिर पर है ( अर्थात् श्रीरामजी ही सके एकमात्र महान् महेश्वर हैं )।

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होई। समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।_अर्थ_अतएव श्रीरामजी की आज्ञा और रुख रखने में ही हम सब का हित होगा। ( इस तत्व और रहस्य को समझकर ) अब तुम सयाने लोग जो सबको सम्मत हो, वहीं मिलकर करो।

सब कहुं सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।। केहि बिधि अवध चरहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करि उपाऊ।।_अर्थ_श्रीरामजी का राज्याभिषेक सबके लिये सुखदायक है। मंगल और आनंद का मूल यही एक मार्गं है। ( अब ) श्रीरामजी अयोध्या किस प्रकार चलें ? विचारकर कहो, वहीं उपाय किया जाय।

सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमार्थ स्वारथ सानी।। उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाई भरत कर जोरे।।_अर्थ_ मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी की नीति, परमार्थ और स्वार्थ ( लौकिक हित )_में सनी हुई वानी सबने आदरपूर्वक सुनी। पर किसी को कोई उत्तर नहीं आता।, सब लोग भोले ( विचारशक्ति से रहित ) हो गये। तब भरतजी ने सिर नवाकर हाथ जोड़े।


भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।। जनम हेतु सब कहं पितु माता। कर्म सुभासुभ देखि विधाता।।_( और कहा_) सूर्यवंश मेनमें एक_से_एक राजा हो गये हैं। सभी के जन्म के कारण पिता_माता होते हैं और शुभ_अशुभ कर्मों को ( कर्मों का फल ) विधाता देते हैं।

दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जग जाना।। सो गोसाईं बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।।_अर्थ_आपकी आशिष ही एक ऐसी है जो दु:खों का दमन करके, समस्त कल्याणों को सज देती है; यह जगत् जानता है। हे स्वामी ! आप वही हैं जिन्होंने विधाता की गति ( विधान )_को भी रोक दिया। आपने जो टेक टेक दी ( जो निश्चय कर दिया ) उसे कौन टाल सकता है ?

बूझिअ मोहि उपाऊ अब सो सब मोर अभागु। सुनि स्नेहमय बचन गुर उर उमड़ा अनुरागु।_अर्थ_अब आप मुझसे उपाय पूछते हैं, यह सब मेरा अभाग्य है। भरतजी के प्रेममय वचनों को सुनकर गुरुजी के हृदय में प्रेम उमड़ आया।

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुं नाहीं।। सकुचउं तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।।_अर्थ_( वे बोले _ ) हे तात ! बात सत्य है, पर है रामजी की कृपा से ही। राम विमुख को तो स्वप्न में भी सिद्धि नहीं मिलती। हे तात ! मैं एक बात कहने में सकुचाता हूं। बुद्धिमान लोग सर्वस्व जाता देखकर ( आधे की रक्षा के लिये ) आधा छोड़ दिया करते हैं।

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहि लखन सीय रघुराई।। सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भए प्रमोद परिपूरन गाता।।_अर्थ_अत: तुम दोनों भाई ( भरत_शत्रुध्न) वन को जाओ और लक्ष्मण, सीता और श्रीरामचन्द्र को लौटा दिया जाय। ये सुन्दर वचन सुनकर दोनों भाई हर्षित हो गये। उनके सारे अंग परमानंद से परिपूर्ण हो गये।

मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जियं राउ राम भए राजा।। बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।।_अर्थ_उनके मन प्रसन्न हो गये। शरीर में तेज सुशोभित हो गया। मानो राजा दशरथ जी उठे हों और श्रीरामचन्द्रजी राजा हो गये हों! अन्य लोगों को तो इसमें लाभ अधिक और हानि कम प्रतीत हुई। परन्तु रानियों के दु:ख_सुख समान ही थे ( राम_लक्ष्मण वन में रहें या भरत_शत्रुध्न, दो पुत्रों का वियोग तो रहेगा ही, यह समझकर वे सब रोने लगीं।

कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन अभिमत दीन्हे।। कानन करउं जन्म भरि बाहू। एहि तें अधिक न मोर सुपासू।।_अर्थ_भरतजी कहने लगे_मुनि ने जो कहा वह करने से जगत् भर के जीवों को उनकी इच्छित वस्तु देने का फल होगा। ( चौदह वर्ष की कोई अवधि नहीं, ) मैं जन्मभर वन में वास करूंगा।। मेरे लिये इससे बढ़कर और कोई सुख नहीं है।

अंतरजामी रामु सिय तुम्ह सर्बज्ञ सुजान। जौं फुर कहहु तो नाथ निज कीजिअ बचन प्रवान।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी हृदय के जाननेवाले हैं और आप सर्वज्ञ तथा सुजान हैं। यदि आप यह सत्य कह रहे हैं तो हे नाथ  ! अपने वचनों का प्रमाण कीजिये। ( उसके अनुसार व्यवस्था कीजिये।

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि में बिदेहू।। भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढी तीर अबला सी।।_अर्थ_भरतजी के वचन सुनकर और उनका प्रेम देखकर सारी सभा सहित मुनि वशिष्ठजी विदेह हो गये ( किसी को अपने देह की सुधि नहीं रही )। भरतजी की महान् महिमा समुद्र है, मुनि की बुद्धि उसके तट पर अबला स्त्री के समान खड़ी है।

गा चह पार जितनी हियं हेरा। पावती नाव न बोहितु बेरा।। औरत करिहिं को भरत बड़ाई। सरसरी सीपि कि सिंधु समाई।।_अर्थ_वह ( उस समुद्र के ) पार जाना चाहती है, इसके लिये उसने हृदय में उपाय भी ढ़ूंढ़कर ! पर ( उसे पार करने का साधन ) नाव, जहाज या बेड़ा कुछ भी नहीं पाती। भरतजी की बड़ाई और कौन करेगा ? तलैया की सीपी में भी कहीं समुद्र समान सकता है ?

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए।। प्रभु प्रणामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।।_अर्थ_मुनि वशिष्ठजी के अन्तरात्मा को भरतजी बहुत अच्छे लगे और वे समाजसहित श्रीरामजी के पास आये। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने प्रणाम कर उत्तम आसन दिया। सबलोग मुनि की आज्ञा सुनकर बैठ गये।

बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।। सुनहु राम सर्बग्य सुजाना। धर्म नीति गुन ज्ञान निधाना।।_अर्थ_श्रेष्ठ मुनि देश, काल और अवसर के अनुसार विचार करके वचन बोले_हे सर्वज्ञ ! हे सुजान! हे धरम, नीति, गुण और ज्ञान के भण्डार राम ! सुनिये_

सब के उर अंतर बहुत जानहु भाउ कुमाउ। पुरजन जननी भरत हित होई सो कहिअ उपाउ।।_अर्थ_आप सबके भीतर बसते हैं और सबके भले_बुरे भाव को जानते हैं। जिसमें पुरवासियों का, माताओं का और भरत का हित हो, वहीं उपाय बतलाइये।

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जुआरिहि आपन दाऊ।। सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारे ही हाथ उपाऊ।।_अर्थ_ आर्त ( दु:खी ) लोग कभी विचारकर नहीं कहते। जुआरी को अपना ही दांव सूझता है। मुनि के वचन सुनकर श्रीरघुनाथजी कहने लगे_हे नाथ ! उपाय तो आपही के हाथ है।

सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएं मुदित फुर भायें।। प्रथम जो आयसु मो कहुं होई। मारें माना क्यों सिख सोई।।_अर्थ_आपका रुख रखने में और आपकी आज्ञा को सत्य कहकर प्रसन्नतापूर्वक पालन करने में ही सबका हित है। पहले तो मुझे जो आज्ञा हो, मैं उसी शिक्षा को माथे पर चढ़ाकर करूं।

Thursday, 9 January 2025

अयोध्याकाण्ड

कोल किरात भिल्ल बनवासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।। भरि भरि परन पूटीं रचि रूरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।।_अर्थ_कोल, किरात और भील आदि वन के रहनेवाले लोग पवित्र, सुंदर और अमृत के समान स्वादिष्ट मधु ( शहद ) को सुंदर दोने बनाकर और उनमें भर_भरकर कंद_मूल, फल और अंकुर आदि की चूड़ियों आंटियों _को।

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानता साधु पेम पहिचानी।। तुम्ह सुकृति हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।_अर्थ_सबको विनय और प्रणाम करके उन चीजों के अलग_अलग स्वाद, भेद ( प्रकार), गुण और नाम बता_बताकर देते हैं। लोग उनका बहुत दाम दूतए हैं, पर वे नहीं लेते और लौटा लेने में श्रीरामजी की दुहाई देते हैं।

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानता साधु पेम पहिचानी।। तुम्ह सुकृति हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।।_अर्थ_प्रेम में मग्न हुए वे कोमल वाणी से कहते हैं कि साधु लोग प्रेम को पहचानकर उसका सम्मान करते हैं ( अर्थात्, आप साधु हैं, आप हमारे प्रेम को देखिये, दाम देकर या वस्तुएं लौटाकर हमारे प्रेम का तिरस्कार न कीजिये )। आप तो पुण्यात्मा हैं, हम नीच निषाद हैं। श्रीरामजी की कृपा से ही हमने आपलोगों के दर्शन पाये हैं।

हमहिं अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरना देवधुनि धारा।। राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रभु चहइअ जस राजा।।_अर्थ_हमलोगों को आपके दर्शन बड़े ही दुर्लभ हैं, जैसे मरुभूमि के लिये गंगाजी की धारा दुर्लभ है। ( देखिये, ) कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने निषाद पर जैसी कृपा की है। जैसा राजा हैं वैसा ही उनके परिवार और प्रजा को भी होना चाहिए।

यह जियं जानि संकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु। हमहिं कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।_अर्थ_हृदय में ऐसा जानकर संकोच छोड़कर और हमारा प्रेम देखकर कृपा कीजिये और हमको कृतार्थ करने के लिये ही फल, तृण और अंकुर लीजिये।

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।। देब काह हम तुम्हहिं गोसाईं। ईंधनु पात किरात मिताई।।_अर्थ_आप प्रिय पाहुने वन में पधारे हैं। आपकी सेवा करने के योग्य हमारे भाग्य नहीं है। हे स्वामी ! हम आपको क्या देंगे ? भीलों की मित्रता तो बस, ईंधन ( लकड़ी ) और पत्तों तक ही है।

यह हमारी अति बड़ि सेवकाईं। लेहिं न बासन बसन चोराई।। हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाति।_अर्थ_हमारी तो यही बहुत भारी सेवा है कि हम आपके कपड़े और बर्तन चुरा लेते। हमलोग जड़ जीव हैं, जीवों को हिंसा करनेवाले हैं, कुटिल, कुचाली, कुबुद्धि और कुजाति हैं।

पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहिं पेट अघाहीं।। सपनेहुं धरमबुद्वि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाउ।।_अर्थ_हमारे दिन रात पाप करते ही बीतते हैं। तो भी न तो हमारे कमरे में कपड़ा है और न पेट ही भरते हैं हममें स्वप्न में भी धरमबुद्वि कैसी ? यह सब तो श्रीरघुनाथजी के दर्शन का प्रभाव है।

जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।। बचन सुनि पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।_अर्थ_जब से प्रभु के चरणकमल देखे, तबसे हमारे दु:सह दु:ख और दोषों मिट गये। वनवासियों के वचन सुनकर अयोध्या के लोग प्रेम में भर गये और उनके भाग्य की सराहना करने लगे।

लागे सराहन भाग सब अनुराग सुनावहीं। बोलनि मिलनि सीय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं।। नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा।।_अर्थ_सब उनके भाग्य की सराहना करने लगे और प्रेम के वचन सुनाने लगे। उन लोगों के बोलने और मिलने का ढंग तथा श्रीसीतारामजी के चरणों में उनका प्रेम देखकर सब सुख पा रहे हैं। उन कोल_भीलों की बातें सुनकर सभी नर_नारी अपने प्रेम का निरादर करते हैं ( उसे धिक्कार देते हैं )। तुलसीदासजी कहते हैं कि यह रघुवंशमणि श्रीरामचन्द्रजी की कृपा है कि लोहा नौका को अपने ऊपर लेकर तैर गया।


बिसारहि बन चहुं ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए  पीन पावस प्रथम।।_अर्थ_सब लोग दिनों-दिन परम आनन्दित होते हुए वन में चारों ओर विचरते हैं। जैसे पहली वर्षा के जल से मेढ़क और मोर मोटे हो जाते हैं ( प्रसन्न होकर नाचते_कूदते हैं ) ।

पुरजन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं कल्प सम बीती।। सिय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करि सरिस सेवकाई।।_अर्थ_अयोध्यापुरी के पुरुष और स्त्री सभी प्रेम में अत्यन्त मगन हो रहे हैं। उनके दिन पल के समान बीत जाते हैं। जितनी सासुओं थीं, उतने ही वेष ( रूप ) बनाकर सीताजी सब सासुओं की आदरपूर्वक एक_सी सेवा करती है।

लखा न मरमु राम बिनु काहूं। माया सब सिय माया माहूं।। सीयं सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह रहा सुख सिख आसिफ दीन्हीं।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के सिवा इस भेद को और किसी ने नहीं जाना। सब माताएं ( पराशक्ति महामाया ) श्रीसीताजी की माया में ही है। सीताजी ने सासुओं को सेवा से वश में कर लिया। उन्होंने सुख पाकर सीख और आशीर्वाद दिये।

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानी पछितानी अघाई।। अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।।_अर्थ_सीताजी समेत दोनो भाईयों ( श्रीराम _लक्ष्मण )_का सरल स्वभाव देखकर कुटिल रानी कैकेयी भरपेट पछताई ‌। वह पृथ्वी तथा यमराज से याचना करती है कि, धरती बीच ( फटकर समा जाने के लिये रास्ता ) नहीं देती और विधाता मौत नहीं देता।

लोकहुं बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख जलु नरक न लहहीं।। यहु हंसी सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।_अर्थ_ लोक और वेद में प्रसिद्ध है और कवि ( ज्ञानी ) भी कहते हैं कि जो श्रीरामजी से बिमुख हैं इन्हें नरक में भी ठौर नहीं मिलती। सबके मन में यह संदेह हो रहा था कि हे विधाता ! श्रीरामचन्द्रजी का अयोध्या जाना होगा या नहीं ।

Wednesday, 25 December 2024

अयोध्याकाण्ड

सीय आइ मुनिबर पग लागी। उचित असीस रही मन मागी।। गुरुपतिनिहि मुनितियन्ह समेता। मिली पेमु कहि जाइ न जेता।।_अर्थ_सीताजी आकर मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी के चरणों लगीं और उन्होंने मनमांगी उचित आशीष पायीं। फिर मुनियों की स्त्रियों सहित गुरुपत्नी अरुंधतिजी से मिलीं। उनका जितना प्रेम था, वह कहा नहीं जाता।

बंदि बंदि पग सिय सबही के। आसिरबचन लहे प्रिय जी के।। सासु सकल जब सीयं निहारीं। मूंदे नयन सहमि सुकुमारी।।_अर्थ_सीताजी ने सभी के चरणों को अलग_अलग वन्दना करके अपने हृदय को प्रिय ( अनुकूल ) लगनेवाले आशीर्वाद पाये। जब सुकुमारी सीताजी ने सब सासुओं को देखा, तब उन्होंने सहमकर अपनी आंखें बन्द कर लीं।

परीं बधिक बस मनहुं मरालीं। काह कीन्ह करतार कुचाली।। तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा। सो सब सहिअ जो दैव सहावा।।_अर्थ_( सासुओं की बुरी दशा देखकर ) उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ मानो राजहंसिनियां बधिक के वश में पड़ गयी हों। ( मन में सोचने लगीं कि ) कुचाली विधाता ने क्या कर डाला ? उन्होंने भी सीताजी को देखकर बड़ा दु:ख पाया। ( सोचा ) जो कुछ दैव सहावें, वो सब सहना ही पड़ता है।

जनक सुता तब उर धरि धीरा। नील नलिन लोयन भरि नीरा‌। मिलि सकल सासुन्ह सिय जाई। तेहि अवसर करुणा महि छाई।।_अर्थ_ तब जानकी जी हृदय में धीरज धरकर, नील कमल समान नेत्रों में जल भरकर, सब सासुओं से जाकर मिलीं। उस समय पृथ्वी कर करुणा ( करुण_रस ) छा गयी।

लागी लागी पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग। हृदय असीसहिं पेम बस रहइअहउ भरी सोहाग।_अर्थ_ सीताजी सबके पैरों लग_लगकर प्रेम से मिले रही हैं, और सब सासुओं प्रेमवश हृदय से आशीर्वाद दे रही हैं कि तुम सुहाग से भरी रहो ( सदा सौभाग्यवती रहो ) ।

बिकल सनेह सीय सब रानीं। बैठन सबहिं कहेउ गुर ग्यानीं।। कहि जग मायिक मुनिनाथा। कहे कछउक परमार्थ गाथा।।_अर्थ_ सीताजी और सब रानियां स्नेह के मारे व्याकुल हैं। तब ग्यानी गुरु ने सबको बैठ जाने के लिये कहा। फिर मुनिनाथ बसिष्ठजी ने जगत् की गति को मायिक कहकर ( अर्थात् जगत् माया का है, इसमें कुछ भी नित्य नहीं है, ऐसा कहकर ) कुछ परमार्थ की कथाएं ( बातें ) कहीं।

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा। सुनि रघुनाथ दुसह  दुखु पावा।। मरन हेतु निज नेहरु बिचारी। भए अति बिकल धीर धुर धारी।।_अर्थ_तदनन्तर वशिष्ठजी ने राजा दशरथ जी के स्वर्ग गमन की बात सुनायी, जिसे सुनकर रघुनाथजी ने दु:सह दु:ख पाया।  और अपने प्रति उनके स्नेह को उनके मरने का कारण विचारकर धईरधउरन्धर श्रीरामचन्द्रजी अत्यन्त व्याकुल हो गये।

कुलिस कठोर सुनत कटु बानी। बिलपत लखन सीता सब रानी।। सोक बिकल अति सकल समाजू। मानहु राजु अकाजेउ राजू।।_अर्थ_ वज्र के समान कड़वी बाणी सुनकर लक्ष्मणजी, सीताजी और सब रानियां विलाप करने लगीं। सारा समाज शोक से अत्यंत व्याकुल हो गया। मानो राजा आज ही मरे हों।

मुनिबर बहुरि राम समझाए। सहित समाज सुसरित नहाए।। ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा। मुनिहुं कहे जल काहु न लीन्हा।।_अर्थ_फिर मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठजी ने श्रीराम को समझाया। तब उन्होंने समाजसहित श्रेष्ठ मन्दाकिनीजी में स्नान किया। उस दिन प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने निर्जल व्रत किया। मुनि वशिष्ठजी के कहने पर भी किसी ने जल ग्रहण नहीं किया।

भोरु भएं रघुनंदनहिं जो मुनि आयसु दीन्ह। श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सब सादरु कीन्ह।।_अर्थ_दूसरे दिन सवेरा होने पर मुनि वशिष्ठजी ने श्रीरघुनाथजी को जो_जो आज्ञा दी वह सब कार्य प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने श्रद्धा_भक्तिसहित आदर के साथ किया।

करि पितु क्रिया बेद जिस बरनी। भए पुनीत पातक तम तरनी।। जासु नाम पावक अघ तूला।_अर्थ_वेदों में जैसा कहा गया है, उसी के अनुसार पिता की क्रिया करके, पापरुपी अन्धकार के नष्ट करनेवाले शुद्धरूप श्रीरामचन्द्रजी शुद्ध हुए ! जिनका नाम पापरुपी रूई के ( तुरंत जला डालने के ) लिये अग्नि है; और जिनका स्मरण मात्र समस्त शुभ मंगलों का मूल है।

सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस। तीरथ आवाहन सुरसरि जस।। सुद्ध भए दुइ बासर बीते। बोले गुर सन राम पिरीते।।_अर्थ_वे ( नित्य शुद्ध_बुध ) भगवान् श्रीरामजी शुद्ध हुए। साधुओं की ऐसी सम्मति है कि उनका शुद्ध होना वैसे ही है जैसा तीर्थों के आवाह्न से गंगाजी शुद्ध होती हैं। ( गंगाजी तो स्वभाव से ही शुद्ध हैं, उनमें जिन तीर्थों का आवाहन किया जाता है उल्टे वे ही गंगाजी के संपर्क में आने से शुद्ध हो जाते हैं। इसी प्रकार सच्चिदानन्द रूप श्रीराम तो नित्य शुद्ध हैं, उनके संपर्क से कर्म ही शुद।ध हो गये।) जब शुद्ध हुए दो दिन बीत गये तब श्रीरामचन्द्रजी प्रीति के साथ गुजजी से बोले_)

नाथ लोग सब निपट दुखारी। कंद मूल फल अंबु अहारी।। सानुज भरतु सचिव सब माता। देखि मोहि पल जिमि जुग जाता।।_अर्थ_हे नाथ ! सब लोग यहां अत्यन्त दुःखी हो रहे हैं। कन्द, मूल, फल और जल का ही आहार करते हैं। भाई भरत  को, मंत्रियों को और सब माताओं को देखकर मुझे एक_एक पल युग के समान बीत रहा है।

सब समेत पुर धारिअ पाऊ। आपु यहां अमरावती राऊ।। बहुत कहुं सब किअउं ढ़िठाई।
उचित होइ तस करिअ गोसाईं।।_अर्थ_अत:सबके साथ आप अयोध्यावासी को पधारिये ( लौट जाइये )। आप यहां हैं और राजा  अमरावती ( स्वर्ग)_मे़ हैं ( अयोध्यापुरी सूनी है) ! मैंने बहुत कह डाला, यह सब बड़ी ढ़िठाई की है। है गोसाईं ! जैसा उचित हो वैसा ही कीजिये।

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम। लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुं विश्राम।।_अर्थ_( वशिष्ठजी ने कहा_) हे राम ! तुम धर्म के सेतु और दया के धाम हो, तुम भला ऐसा क्यों न कहो ? लोग दु:खी हैं। दो दिन तुम्हारा दर्शन कर शान्ति लाभ कर लें।

राम बचन सुनि सभय समाजू। जनु जलनिधि महुं बिकल जहाजू।। सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला। भयउ मनहुं मारुत अनुकूला।।_अर्थ_श्रीरामजी के वचन सुनकर सारा समाज भयभीत हो गया। मानो बीच समुद्र में जहाज डगमगा गया हो। परन्तु जब उन्होंने गुरु वशिष्ठजी की श्रेष्ठ कल्याणमूलक वाणी सुनी तो उस जहाज के लिये मानो हवा अनुकूल हो गयी हो।

पावन पयं तिहुं काल नहाहीं।  जो बिलोकि अघ ओघ नसाहीं।। मंगल मूरति लोचन भरि भरि। निरखहिं हर्षित दण्डित करि करि।।_अर्थ_सब लोग पवित्र पयस्वनि नदी में ( अथवा पयस्वनि नदी के पवित्र जल में ) तीनों समय ( सबेरे, दोपहर और सायंकाल ) स्नान करते हैं, जिसके दर्शन से ही पापों के समूह नष्ट हो जाते हैं और मंगलमूर्ति श्रीरामचन्द्रजी को दण्डवत् प्रणाम कर_करके उन्हें नेत्र भर_भरकर देखते हैं।

राम सैल बन देखने जाहीं। जहं सुख सकल सकल दुख नाहीं।। झरना झरहिं सउधआसम बारी। त्रिबिधि तापहर त्रिबिधि बयारी।।_अर्थ_ सब श्रीरामचन्द्रजी के पर्वत ( कामदगिरि ) और वन को देखने जाते हैं, जहां सभी सुख हैं और सभी दु:खों का अभाव है। झरने अमृत के समान जल झरते हैं और तीन प्रकार की ( शीतल, मंद, सुगंध ) हवा तीनों प्रकार के ( आध्यात्मिक, अधिभौतिक, आधिदैविक ) तापों को हर लेती है।

बिटप बेलि तृन अगनित जाती। फल प्रसून पल्लव बहुत भांति।। सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं। जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं।।_अर्थ_असंख्य जाति के वृक्ष, लताएं और तृण हैं, तथा बहुत तरह के फल, फूल और पत्ते हैं। सुन्दर शिलाएं हैं। वृक्षों की छाया सुख देनेवाली है। वन की शोभा किस्से वर्णन की जा सकती है ? सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजित भृंग। बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहु रंग।।_अर्थ_तालाबों में कमल खिल रहे हैं, जल के पक्षी कूजत रहे हैं, भौंरे गुंजार कर रहे हैं और बहुत रंगों के पक्षी और पशु वन में वऐररहइत होकर विहार कर रहे हैं।


Tuesday, 3 December 2024

अयोध्याकाण्ड

मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम। भूरि भायं भेंटे भरत लछिमन करत प्रणाम।।_अर्थ_फिर श्रीरामजी प्रेम के साथ शत्रुध्न से मिलकर तब केवट ( निषादराज) से मिले। प्रणाम करते हुए लक्ष्मणजी से भरतजी बड़े प्रेम से मिले।

भेंटेउ भरत ललकि लघु भाई। बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई‌‌।_अर्थ_ तब लक्ष्मणजी ललककर ( बड़ी उमंग के साथ ) छोटे भाई शत्रुध्न से मिले। फिर उन्होंने निषादराज को हृदय से लगा लिया। फिर भरत_शत्रुध्न दोनों भाइयों ने ( उपस्थित) मुनियों को प्रणाम किया और इच्छित आशीर्वाद पाकर वे आनन्दित हुए।

सानुज भरत उमगि अनुरागा। धरि सिर सिय पद पदुम परागा।। पुनि पुनि करत प्रनामु उठाए। सिर कर कमल परसि बैठाए।।_अर्थ_छोटे भाई शत्रुध्न सहित भरतजी प्रेम में उमंगकर सीताजी के चरणकमलों की रज सिर पर धारण कर बार_बार प्रणाम करने लगे। सीताजी ने उन्हें उठाकर उनके सिर को अपने करकमल से स्पर्श 
कर ( सिर पर हाथ फेरकर ) उन दोनों को बैठाया

सीयं असीस दीन्ह मन माहीं। मगन सनेहं देह सुधि नाहीं।। सब बिधि सानुकूल लखि सीता। भे निसोच उर अपडर बीता।।_अर्थ_सीताजी ने मन_ही_मन आशीर्वाद दिया; क्योंकि वे स्नेह में मग्न हैं, उन्हें देह की सुध_बुध नहीं है। सीताजी को सब प्रकार से अपने अनुकूल देखकर भरतजी सोचरहित हो गये और उनके मन का कल्पित भय जाता रहा।

कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूंछा। प्रेम भरा मन निज गति छूंछा।।तेहि अवसर केवटु धीरज धरि। जोरी पानि बिनवत प्रनामु करि।।_अर्थ_उस समय न तो कोई कुछ कहता है और न कोई कुछ पूछता है। मन प्रेम से परिपूर्ण है, वह अपनी गति से खाली है ( अथवा संकल्प_विकल्प और चआंचल्य से शून्य है )। उस अवसर पर केवट ( निषादराज ) धीरज धर और हाथ जोड़कर प्रणाम करके विनती करने लगा_

नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग। सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग।।_अर्थ_हे नाथ ! मुनिनाथ वशिष्ठ जी के साथ सब माताएं, नगरवासी, सेवक, सेनापति, मंत्री_आपके वियोग से व्याकुल होकर आये हैं।

सील सिंधु सुनि गुर आगवनू । सिय समीप राखे रिपुदवनू।। चले सवेग राम तेहि काला। धीर धर्म धुर दीनदयाला।।_अर्थ_ गुरु का आगमन सुनकर 
सील सिंधु श्रीरामचन्द्रजी ने सीता के पास शत्रुध्न को रख दिया और वे परम वीर, धर्मधुरंधर दीनदयालु श्रीरामचन्द्रजी उसी समय वेग के साथ चल पड़े।

गुरहिं देखि सादर अनुरागे। दंड प्रणाम करने प्रभु लागे।। मुनिबर धाई लिए उर लाई। प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई।।_अर्थ_ गुरुजी के दर्शन करके लकक्ष्मणसहित श्रीरामचन्द्रजी प्रेम में भर गये और दण्डवत् प्रणाम करने लगे। मुनिश्रेष्ठ वशिष्ठ जी ने दौड़कर उन्हें हृदय से लगा लिया और प्रेम में उमंगकर वे दोनों भाइयों से मिले।

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरी तें दण्ड प्रनामू।। रामसखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुफ्त सनेह समेटा।।_अर्थ_फिर प्रेम से पुलकित होकर केवट ( निषादराज )_ने अपना नाम लेकर दूर से ही वशिष्ठजी को दण्ड प्रणाम किया। ऋषि वशिष्ठजी ने रामसखा जानकर उसको जबरदस्ती हृदय से लगा लिया। मानो जमीन पर लोटते हुए प्रेम को समेट लिया हो।

रघुपति भगति सुमंगल मूला। नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला।। एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं । बड़ बसइष्ठ सम को जग माहीं।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी की भक्ति सुन्दर मंगलों का मूल है, इस प्रकार कहकर सराहना करते हुए देवता आकाश से फूल बरसाने लगे। वे कहने लगे_जगत् में इसके समान सर्वथा नीच कोई नहीं और वशिष्ठजी के समान बड़ा कौन है ?


जेहिं लखि लखनहुं तें अधिक मिले मुदित मुनाराउ। सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ।।_अर्थ_जिस_( निषाद ) को देखकर मुनिराज वशिष्ठजी लक्ष्मणजी से भी अधिक उससे आनन्दित होकर मिले। यह सब सीतापति श्रीरामचन्द्रजी के भजन का प्रत्यक्ष प्रताप और प्रभाव है।

आरत लोग राम सबु जाना। करुनाकर सुजान भगवाना।। जो जेहिं भायं रहा अभिलाषी। तेहि तेहि को तसि तसि रुख राखी।।_अर्थ_ दया की खान, सुजान भगवान् श्रीरामजी ने सब लोगों को दु:खी ( मिलने के लिये व्याकुल ) जाना। तब जो जिस भाव से मिलने का अभिलाषी था, उस उस का उस उस प्रकार से रुख रखते हुए ( उसकी रुचि के अनुसार )

सानुज मिलि पल महुं सब काहू। कीन्ह दूरि दुख दारुने दाहू।। यह बड़ि बात राम कै नाहीं। जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं।।_अर्थ_उन्होंने लक्ष्मणजी सहित पलभर में सब किसी से मिलकर उनके दु:ख और कठिन संताप को दूर कर दिया। श्रीरामचन्द्रजी के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है। जैसे करोड़ों घड़ों में एक ही सूर्य की ( पृथक्_पृथक् ) छाया ( प्रतिबिम्ब ) एक साथ ही दिखती है।

मिलि केवटहि उमगि अनुरागा। पुरजन सकल सराहहिं भागा।। देखीं राम दुखित महतारी। जनु सुबेलि अवलि हिम माहीं।।_अर्थ_समस्त पुरवासी प्रेम में उमंगकर केवट से मिलकर ( उसके भाग्य )की सराहना करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी ने सब माताओं को दु:खी देखा। मानो सुंदर लताओं की पंक्तियों को पाला मार गया हो।

प्रथम राम भेंटी कैकेई। सरल सुभायं भगति मति भेईं।। पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी। काल कर्मी बिधि सिर धरि जोरी।।_अर्थ_ सबसे पहले रामजी कैकेयी से मिले और अपने सरल स्वभाव तथा भक्ति से उसकी बुद्धि को तर कर दिया। फिर चरणों में गिरकर काल, कर्म और विधाता के सिर दोष मढ़कर, श्रीरामजी ने उनको शान्त्वना दी।

भेंटी रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु। अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु।।_अर्थ_फिर श्रीरघुनाथजी सब माताओं से मिले। उन्होंने सबको समझा_बुझाकर संतोष कराया कि हे माता ! जगत् ईश्वर के अधीन है। किसी को भी दोष नहीं देना चाहिए।

गुर तिय पद बंदे दुहु भाईं। सहित बिप्रतिय जे संग आईं।। गंग गौरी सम सब सनमानीं। देहिं असीसा मुदित मृदु बानी।।_अर्थ_फिर दोनों भाइयों ने ब्राह्मण की स्त्रियों के सहित_जो भरतजी के साथ आयीं थीं, गुरुजी की पत्नी अरुंधति के चरणों की वन्दना की और उन सबका गंगाजी तथा गौरीजी के समान सम्मान किया। वे सब आनंदित होकर कोमल वाणी से आशीर्वाद देने लगीं।


गहि पद लगे सुमित्रा अंका। जनु भेंटी संपति अति रंका।। पुनि जननी चरननइ दोउ भ्राता। परे पेम व्याकुल सब गाता।।_अर्थ_तब दोनों भाई पैर पकड़कर सुमित्राजी की गोद में जा चिपटे। मानो किसी अत्यंत दरिद्र से संपत्ति की भेंट हो गयी हो। फिर दोनों भाई माता कौसल्याजी के चरणों में गिर पड़े। प्रेम के मारे उनके सारे अंग शिथिल हैं।






Friday, 15 November 2024

अयोध्याकाण्ड

राम बास बन संपति भ्राजा। सुखी प्रजा जनु पाई सुराजा।। सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू। बिपिन सुहावन पावन देसू।।_ अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी के निवास से वन की संपत्ति ऐसे सुशोभित है मानो अच्छे राजा को पाकर प्रजा सुखी हो। सुहावना वन ही पवित्र देश है। विवेक उसका राजा है और वैराग्य मंत्री हैं।

भट जम नियम सैल रजधानी। सांति सुमति सुचि सुंदर रानी।। सकल अंग सम्पन्न सुराऊ। राम चरन आश्रित चित चाऊ।।_अर्थ_यम ( अहिंसा,, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह ) तथा नियम ( शौच, सन्तोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर प्राणिधान) योद्दा हैं। पर्वत राजधानी है, शान्ति तथा सुबुद्धि दो सुन्दर पवित्र रानियां हैं। वह श्रेष्ठ राजा राज्य के सब अंगों से पूर्ण है और श्रीरामचन्द्रजी के चरणों के आश्रित रहने से उसके चित्त में चाव ) आनन्द या उत्साह है।
( स्वामी, अमात्य, सुहृद्, कोष, राष्ट्र, दुर्ग और सेना _ राज्य के सात अंग हैं । )

जीति मोह महिपाल दल सहित बिबेक भुआलु।
करत अकंटक राजु पुरं सुख संपदा सुकालु।।_अर्थ_मोहरूपी राजा को सेनासहित जीतकर विवेक रूपी राजा निष्कंटक राज कर रहा है। उसके नगर में सुख, संपति और सुकाल वर्तमान हैं।

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे। जनु पुर नगर गाउं गन खेरे।। बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना। प्रजा समाजु न जाइ बखाना।।_अर्थ_ वनरूपई प्रान्तों में जो बहुत _से मुनियों के निवास_स्थान हैं वहीं मानो शहरों, नगरों, गांवों और खेड़ों का समूह है। बहुत _से विचित्र पक्षी और अनेकों पशु ही मानो प्रथाओं का समाज है, जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता।

खगहा करि हरि बाघ बराहा। देखि महिष बऋष साजि सराहा।। बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा। जहं तहं मनहुं सेन चतुरंगा।।_अर्थ_ गैंडा, हाथी, सिंह, बाघ, सूअर,भैंस और बैलों को देखकर राजा के साज को सराहते ही बनता है। ये सब आपस का वैर छोड़कर जहां _तहां एक साथ विचरते हैं। यही मानो चतुरंगिणी सेना है।

झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं। मनहुं निसान बिबिध बिधि बाजहिं।। चक चकोर चातक सुक पिक गन। कूजत मंजु मराल मुदित मन।।_अर्थ_पानी के झरने झड़ रहे हैं और मत्त हाथी चिग्घाड़ रहे हैं। वे ही मानो वहां अनेक प्रकार के नगाड़े बज रहे हैं। चकवा, चकोर, पपीहा, तोता तथा कोयलों के समूह और सुंदर हंस प्रसन्न मन से कूजत रहे हैं।

आलिगन गावत नाचत मोरा। जनु सुराज मंगल चहुं ओरा।। बेलि बिटप तृन सफल सफूला। सब समाजु मुद मंगल मूला।।_अर्थ_भौंरों के समूह गुंजार कर रहे हैं और मोर नाच रहे हैं। मानो उस अच्छे राज्य में चारों ओर मंगल हो रहा है। बेल, वृक्ष, तृण सब फल और फूलों से युक्त हैं। सारा समाज आनंद और मंगल का मूल बन रहा है।

राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयं अति पेमु। तापस फल जनु पाई जिमि सुखी सिराने नेमु।।_अर्थ_श्रीरामजी के पर्वत की शोभा देखकर भरतजी के हृदय में अत्यंत प्रेम हुआ। जैसे तपस्वी नियम का समाप्ति होने पर तपस्या का फल पाकर खुश होता है।

तब केवट ऊंचे चढ़ि धाई। कहेउ भरत सन भुजा उठाई।। नाथ देखिअहिं बिटप बिहाला। पाकरि जंबु रसाल तमाला।।_अर्थ_ तब केवट दौड़कर ऊपर चढ़ गया और भुजा उठाकर भरतजी से कहने लगा_हे नाथ ! ये जो पाकर, जामुन, आम और तमिल के विशाल वृक्ष दिखाई देते हैं,।

जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा। मंजु बिसार देखि मनु मोहा।। नील सघन पल्लव फल लाला। अबिरल छांह सुखद सब काला।।_अर्थ_जिन श्रेष्ठ वृक्षों के बीच में एक सुन्दर विशाल वट का वृक्ष सुशोभित है, जिसको देखकर सब मोहित हो जाता है, उसके पत्ते नीले और सघन हैं और उसमें लाल फल लगे हैं। उसकी घनी छाया सब ऋतुओं को सुख देनेवाली है।

मनहु तिमिर अरुनमय रासी। बिरचि बिधि संकेलि सुषमा सी।। ए तरु सरित समीप गोसाईं। रघुबर परनकुटी जहं छाई।।_अर्थ_मानो ब्रह्माजी ने परम शोभा को एकत्र करके अन्धकार और लालिमामयी राशि_सी रच दी है। हे गोसाईं ! ये वृक्ष नदी के समीप है जहां श्रीराम की पर्णकुटी छाई है।

तुलसी तरुवर बिबिध सुहाए। कहुं कहुं सियं कहुं लखन लगाए।। बट छायां वेदिका बनाई। सिय निज पानि सरोज सुहाई।।_अर्थ_वहां तुलसी जी के बहुत _से सुन्दर वृक्ष सुशोभित हैं, जो कहीं_कहीं सीताजी और कहीं लक्ष्मणजी ने लगाये हैं। इसी बड़ की छाया में सीताजी ने अपने कर कमलों से सुन्दर वेदी बनायी है।

जहां बैठि मुनिगण सहित नित सिय रामु सुजान। सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान।।_अर्थ_जहां सुजान श्रीसीतारामजी मुनियों के वृंद समेत बैठकर नित्य  शास्त्र, वेद और पुराणों के सब कथा इतिहास सुनते हैं।

सखा बचन सुनि बिटप निहारी। उमगें भरत बिलोचन बारी।। करत प्रणाम चले दोउ भाई। कहत प्रीति सारद सकुचाई।।_अर्थ_सखा के वचन सुनकर वृक्षों को देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ गया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले। उनके प्रेम का वर्णन करने में सरस्वती जी भी सकुचाती है।

हरषहिं निरखि राम पद अंका। मानहु पारसु पायउ रंका।। रज सिर धरि हियं नयनन्हि लावहिं। रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी के चरण चिन्ह देखकर भरतजी के नेत्रों में जल उमड़ आया। दोनों भाई प्रणाम करते हुए चले।

देखि भरत गति अकथ अतीवा। प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा।। सबहिं सनेह बिबस मग भूला। कहि सउपंथ सुर बरिसहिं फूला।।_अर्थ_भरतजी की अत्यन्त अनिवर्चनीय दशा देखकर वन के पशु, पक्षी और जड़ ( वृक्षादि ) जीव प्रेम में मग्न हो गये। प्रेम के विशेष वश होने से सखा निषादराज को भी रास्ता भूल गया। तब देवता सुन्दर रास्ता बतलाकर फूल बरसाने लगे।

निरखि सिद्ध साधक अनुरागे। सहज सनेहु सराहन लागे।। होता न भूतल भाई भरत को। अचरज सचर चर अचर करत को।।_अर्थ_भरत के प्रेम की इस स्थिति को देखकर सिद।ध और साधक लोग भी अनुराग से भर गये और उनके स्वाभाविक प्रेम की प्रशंसा करने लगे कि इस पृथ्वीतल पर भरत का जन्म ( अथवा प्रेम ) न होता, तो जड़ को चेतन और चेतन को जड़ कौन करता ?

पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गंभीर। मति प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर।।_अर्थ_प्रेम अमृत है, बिरह मन्दरआचल पर्वत है, भरतजी गहरे समुद्र हैं। कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने देवता और साधुओं के हित के लिये स्वयं ( इस भरत रूपी गहरे समुद्र को अपने विरहरूपी मन्दराचल से ) मथकर यह प्रेमरूपी अमृत प्रकट किया है।

सखा समेत मनोहर जोटा। लखेउ न लखन सघन बन ओटा।। भरत दीख प्रभु आश्रम पावन। सकल सुमंगल सदनु सुहावन।।_अर्थ _सखा निषादराज सहित इस मनोहर जोड़ी को इस सघन वन की आड़ के कारण ढनलक्ष्मणजी नहीं देख पाये। भरतजी ने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के समस्त सुमंगला के धाम और सुन्दर पवित्र आश्रम को देखा।

करत प्रबेस मिटे दुख दावा। जनु जोगीं परमारथु पावा।। देखें भरत लखन प्रभु आगे। पूछें बचन कहत अनुरागे।।_अर्थ_आश्रम में प्रवेश करते ही भरतजी का दु:ख और दाह ( जलन ) मिट गया, मानो जोगी को परमार्थ ( परम तत्व ) की प्राप्ति हो गयी। भरतजी ने देखा कि लक्ष्मणजी प्रभु के आगे खड़े हैं और पूछे हुए वचन प्रेमपूर्वक कह रहे हैं ( पूछी हुई बात का प्रेमपूर्वक उत्तर दे रहे हैं )।

सीस जटा कटि मुनि पट बांधे। तूने कसें कर सर्च धनु कांधे।। बेदी पर मुनि साधु समाजू। सीय सहित राज्य रघुराजू।।_अर्थ_ सिर पर जटा है। कमर में मुनियों का ( वल्कल ) वस्त्र बांधें हैं और उसी में तरकस कसे हैं। हाथ में बाण तथा कंधे पर धनुष है। वेदी पर मुनि तथा साधुओं का समुदाय बैठा है और सीताजी सहित श्रीरघुनाथजी विराजमान हैं।

बलकल बसन जटिल तनु स्यामा। जनु मुनिवेष कीन्ह रति कामा।। कर कमलनि धनु सायकु फेरत। जिय की जरनि भरत हंसी हेरत।।_अर्थ_श्रीरामजी के वलकल वस्त्र हैं, जटा धारण किये हैं, श्याम शरीर है। ( सीतारामजी ऐसे लगते हैं ) मानो रति और कामदेव ने मुनि का वेश धारण किया हो। श्रीरामजी अपने कर_कमलों से धनुष _बाण फेर रहे हैं, और हंसकर देखते ही जी का जलन हर लेते हैं ( अर्थात् जिसकी ओर भी एकबार हंसकर देख लेते हैं, उसी को परम आनन्द और शान्ति मिल जाती है। )

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचन्दु। ग्यान
सभां जनु तनु धरें गति सच्चिदानंदु।।_अर्थ_सुन्दर मुनि मंडली के बीच में सीताजी और रघुकुलचंद श्रीरामचन्द्रजी ऐसे सुशोभित हो रहे हैं मानो ज्ञान की सभा में साक्षात् भक्ति और सच्चिदानंद शरीर धारण करके विराजमान हैं।

सानुज सखा समेत मगन मन। बिसरे हरष सोक सुख दुख गन।। पाहि नाथ कहि पाहि गोसाईं। भूतल परे लकुट की नाईं।।_अर्थ_ छोटे भाई शत्रुध्न और सखा निषादराज समेत भरतजी का मन ( प्रेम में ) मग्न हो रहा है। हर्ष_शोक, सुख_दुख आदि सब भूल गये हैं। 'हे नाथ ! रक्षा कीजिये, हे गोसाईं ! रक्षा कीजिये, ऐसा कहकर वे पृथ्वी पर दण्ड की तरह गिर पड़े।

बचन सप्रेम लखन पहिचाने। करत प्रनामु भरत जियं जाने।। बंधु सनेह सरस एहि ओरा। उत साहिब सेवा बस जोरा।।_अर्थ_प्रेमभरे वचनों से लक्ष्मणजी ने पहचान लिया और मन में जान लिया कि भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। ( वे श्रीरामजी की ओर मुंह किये हुए खड़े थे, भरतजी पीठ_पीछे थे; इससे उन्होंने देखा नहीं।) अब इस ओर तो भाई भरतजी का सरस प्रेम और उधर स्वामी श्रीरामचन्द्रजी की सेवा की प्रबल परवशता।

मिलि न जाई नहिं गुदरत बनई। सुकबि लखन मन की गति भनई।। रहे राखि सेवा पर भालू चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू।।_अर्थ_न तो ( क्षणभर के लिये भी सेवा से पृथक् होकर ) मिलते ही बनता है और न ( प्रेमवश ) छोड़ते ( उपेक्षा करते ) ही। कोई श्रेष्ठ कवि ही लक्ष्मणजी के चित्त की इस गति ( दुविधा)_का वर्णन कर सकता है। वे सेवा पर भार रखकर रह गये ( सेवा को ही विशेष महत्वपूर्ण समझकर उसी में लगे रहे ) मानो चढ़ी हुई पतंग को खिलाड़ी ( पतंग उड़ानेवाला ) खींच रहा हो।

कहत सप्रेम नाइ महि माथा। भरत प्रनामु करत रघुनाथा।। उठे राम सुनि प्रेम अधीरा। कहुं पट कहुं निषंग धनु तीरा।। लक्ष्मणजी ने प्रेम सहित पृथ्वी पर मस्तक नवाकर कहा_हे रघुनाथजी! भरतजी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्रीरघुनाथजी प्रेम में अधीर होकर उठे। कहीं वस्त्र गिरा, कहीं तरकस, कहीं धनुष और कहीं बाण ।

बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान। भरत राम की मिलनि लखि बिसरू सबहिं अपान।।_अर्थ_ कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने उनको जबरदस्ती उठाकर हृदय से लगा लिया। भरतजी और श्रीरामजी के मिलने की रीति को देखकर सबको अपनी सुध भूल गयी।

मिलनि प्रीति किमी जाइ बखानी। कबिकुल अगम करम मन बानी।। परम प्रेम पूरन दोउ भाई। मन बुधि चित अस्मिता बिसराई।।_अर्थ_ मिलन की प्रीति कैसे बखानी जाय ? वह तो कबिकुल के लिये कर्म, मन, वाणी तीनों से अगम है। दोनों भाई ( भरतजी और श्रीरामजी) मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार को भुलाकर परम प्रेम से पूर्ण हो रहे हैं।

कहहु सुपेम प्रगट को करई। केहि छाया कबि मति अनुसरई।। कबिहि अरथ आखर बलु सांचा। अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा।।_अर्थ_कहिये, उस श्रेष्ठ प्रेम को कौन प्रगट करें ? कवि की बुद्धि किसकी छाया का अनुसरण करें ? कवि को तो अक्षर और अर्थ का ही सच्चा बल है। नट ताल की गति के अनुसार ही नाचता है।

अगम सनेह भरत रघुबर को।  जहं न जाइ मनु बिधि हरि हर को।। सो मैं कुमति कहुं केहि भांती। बाज सुराग कि गांडर तांती।।_अर्थ_भरतजी और श्रीरघुनाथजी का प्रेम अगम्य है, जहां ब्रह्मा, विष्णु और महादेव का भी मन नहीं जा सकता। उस प्रेम को मैं कुबुद्धि किस प्रकार कहूं ! भला गांडर की तांत से भी कहीं सुन्दर राग बज सकता है ? ( तालाबों और झीलों में एक तरह की घास होती है, उसे गांडर कहते हैं।

मिलनि बिलोके भरत रघुबर की। सुरगन सभय धकधकी धरकी।। समुझाए सुरगुरु जग जागे। बरषि प्रसून प्रसंसन लागे।।_अर्थ_भरतजी और श्रीरामजी के मिलने का ढ़ंग देखकर देवता भयभीत हो गये, उनकी धुकधुकी धड़कने लगी। देवगुरु बृहस्पतिजी ने समझाया, तब कहीं वे मूर्ख चेते और फूल बरसाकर प्रशंसा करने लगे।