Thursday, 22 June 2017

बालकाण्ड

सुनि बोली मुलाकाइ भवानी। उचित कहेहु मुनिबर विज्ञानी।। तुम्हारें जान कामु अब जारा। अब लगी संभव रहे सबिकारा।___यह सुनकर पार्वतीजी मुस्कराकर बोलीं___ हे विज्ञानी मुनिवरों ! आपने उचित ही कहा। आपकी समझ में शिवजी ने कामदेव को अब जलाया है, अबतक तो वे विकारयुक्त ही रहे।


हमरे जान सदा सिव जोगी। अजय अनवद्य अकाम अभोगी।। जौं मैं सिव सेये अस जानी। प्रीति समेत कर्म मन बानी।।___अर्थ___किन्तु हमारी समझ से तो शिवजी सदा से ही योगी, अजन्मा, अनिन्द्य, कामरहित,  और भोगहीन हैं और यदि मैने शिवजी को ऐसा समझकर ही मन, वचन और कर्म से प्रेमसहित उनकी सेवा की है__


तौं हमार पन सुनहु मुनीसा। करिहहिं सत्य कृपानिधि ईसा।। तुम्ह जो कहा हर जारेउ मारा। सोई अति बर अबिबेकु तुम्हारा।।___अर्थ___तो हे मुनिवरों ! सुनिये, वे कृपानिधान भगवान् मेरी प्रतिज्ञा को सत्य करेंगे। आपने जो यह कहा कि शिवजी ने कामदेव को भष्म कर दिया, यही आपका बड़ा भारी अविवेक है।


तात अनल कर सहज सुभाऊ। हिम ते निकट जाइ नहिं काऊ।। गएँ समीप सो अवसि नसाई। असि मन्मथ महेस की नाई।।___अर्थ___हे तात ! अग्नि का तो यह सहज स्वभाव ही है कि पाला उसके करीब कभी जा ही नहीं सकता और जाने पर वह अवश्य नष्ट हो जायगा। महादेवजी और कामदेव के सम्बन्ध में भी यही बात समझना चाहिये।


हियँ हरषे मुनि बचन सुनि देखि प्रीति बिस्वास। चले भवानिहि नाइ सिर गए हिमाचल पास।।___अर्थ___पार्वती के वचन सुनकर और उनका प्रेम तथा विश्वास देखकर मुनि हृदय में बड़े प्रसन्न हुए। वे भवानी को सिर नवाकर चल दिये और हिमाचल के पास पहुँचे।


सबु प्रसंगु गिरिपतिहि सुनाना। मदन दहन सुनि अति दुखु पावा।। बहुरि कहेउ रति कर बरदाना। सुनि हिमवंत बहुत सुखु माना।।___अर्थ___उन्होंने पर्वतराज हिमाचल को सब हाल सुनाया। कामदेव का भष्म होना सुनकर हिमाचल बहुत दुःखी हुए। फिर मुनियों ने रति के वरदान की बात कही, उसे सुनकर हिमवान् को बड़ी खुशी हुई।



हृदय बिचारि संभु प्रभुताई। सादर मुनिबर लिये बोलाई।। सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई। बेगि बेदबिधि लगन धराई।।___अर्थ___शिवजी के प्रभाव को मन में विचारकर हिमाचल ने श्रेष्ठ मुनियों को आदरपूर्वक बुला लिया और उनसे शुभ दिन, शुभ नक्षत्र और शुभ घड़ी निकलवाकर वेद की विधि के अनुसार शीघ्र ही लग्न निश्चय कराकर लिखवा लिया।


पत्री सप्तरिषिन्ह सोई दीन्ही। गहि पद विनय हिमाचल कीन्ही।। जाइ बिधिहि तिन्ह दीन्हि सो पाती। बाचत प्रीति न हृदयँ समाती।।___अर्थ___ फिर हिमाचल ने लग्नपत्रिका सप्तरिषियों को दे दी और चरण पकड़कर उनकी विनती की। उन्होंने जाकर वह लग्नपत्रिका ब्रह्माजी को दी। उसको पढ़ते समय उनके हृदय में प्रेम समाता न था।


लगन बाचि अज सबहिं सुनाई। हरषे मुनि सब सुर समुदाई।। सुमन बृष्टि नभ बाजन बाजे। मंगल कलस दसहुँ दिसि साजे।।___अर्थ___ब्रह्माजी ने लग्न पढ़कर सबको सुनाया, उसे सुनकर सब मुनि और देवताओं का सारा समाज हर्षित हो गया। आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी,  बाजे बजने लगे और दसों दिशाओं में मंगल कलश सजा दिये गये।


लगे सँवारन सकल सुर बाहन बबिबिध बिमान। होहिं सगुन मंगल सुभद करहिं अपछरा गान।।___अर्थ___सब देवता  भाँति_भाँति के बाहन और विमान सजाने लगे, कल्याणप्रद मंगल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं।


सिवहिं संभु गन करहिं सिंगारा। जटा मुकुट अहि मौरु सँवारा।। कुंडल कंकन पहिरे ब्याला। तन बिभूति पट केहरि छाला।।___अर्थ___ शिवजी के गण शिवजी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं का मुकुट बनाकर उसपर साँपों का मौर सजाया. गया। शिवजी ने साँपों के ही कुण्डल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया।


ससि ललाट सुंदर सिर गंगा। नयन तीनि उपबीत भुजंगा।। गरल कंठ उर नर सिर माला। असिव बेष सिवधाम कृपाला।।___अर्थ___शिवजी के सुन्दर मस्तक पर चन्द्रमा, सिर पर गंगाजी, तीन नेत्र, साँपो का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी। इस प्रकार उनका वेष अशुभ होने पर भी वे कल्याण के धाम और कृपालु हैं।


कर त्रिसूूल अरु डमरू बिराजा। चले बसहँ चढ़ि बाजहिं बाजा। देखि सिवहि सुरत्रिय मुसुकाहीं। बर लायक दुलहिनी जग नाहीं।।___अर्थ___एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित है। शिवजी बैल पर चढ़कर चले। बाजे बज रहे हैं। शिवजी को देखकर देवांगनाएँ मुसकरा रही हैं ( और कहती हैं कि ) इस वर के योग्य दुलहिन संसार में नहीं मिलेगी।


बिष्णु बिरंचि आदि सुरब्राता। चढ़ि_चढि बाहन चले बराता।। सुर समाज सब भाँति अनूपा। नहिं बरात दूलह अनुरूपा।।___ अर्थ___विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने_ अपने वाहनों ( सवारियों ) पर चढ़कर बरात में चले। देवताओं का समाज सब प्रकार से अनुपम ( परम सुन्दर ) था, पर दूल्हे के योग्य बरात न थी।

बिष्णु कहा अस बिहसि तब बोलि सकल दिसिराज। बिलग बिलग होई चलहु सब निज निज सहित समाज।।___तब विष्णु भगवान् ने सब देवताओं को बुलाकर हँसकर ऐसा कहा__सब लोग अपने_अपने दल समेत अलग_अलग होकर चलो।


बर अनुहारि बरात न भाई। हँसी करैहहु पर पुर जाई।। बिष्णु बचन सुनि सुर मुसुकाने। निज निज सेन सहित बिलगाने।।___अर्थ___हे भाई ! हमलोगों की यह बरात वर के योग्य नहीं है। क्या पराये नगर में जाकर हँसी कराओगे ? विष्णु भगवान् की बात सुनकर देवता मुसकराये और अपनी_अपनी सेना सहित अलग हो गये।

मनहिं मन महेसु मुसुकाहीं। हरि के बिंग्य बचन नहिं जाहीं।। अति प्रिय बचन सुनत प्रिय केरे। भृंगिहि प्रेरि सकल गन टेरे।।___अर्थ___ महादेवजी ( यह देखकर ) मन_ही_मन मुस्कराते हैं कि विष्णु भगवान् के व्यंग्य वचन ( दिल्लगी ) नहीं छूटते। अपने प्यारे ( विष्णुभगवान् ) के इन अति प्रिय वचनों को सुनकर शिवजी ने भी भृंगी को भेजकर अपने सब गणों को बुलवा लिया।


सिव अनुसासन सुनि सब आए। प्रभु पद जलज सीस तिन्ह नाए।। नाना बाहन नाना बेषा। बिहसे सिव समाज निज देखा।।___अर्थ___शिवजी की आज्ञा सुनते ही सब चले आये और उन्होंने स्वामी के चरणकमलों में सिर नवाया। तरह_तरह की सवारियों और तरह_तरह के वेषवाले अपने समाज को देखकर शिवजी हँसे।

कोउ मुखहीन बिपुल मुख काहू। बिनु पद कर कोउ बहु पद बाहू।। बिपुल नयन कोउ नयन बिहीना। रिष्टपुष्ट कोई अति तनखीना।।___अर्थ___कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत से मुख हैं, कोई बिना हाथ_पैर का है तो किसी के कई हाथ_पैर हैं। किसी के बहुत आँखें हैं तो किसी के एक भी आँख नहीं हैं। कोई बहुत मोटा_ताजा है तो कोई बहुत ही दुबला_पतला है।


तनखीन कोउ अति पीन पावन कोउ अपावन गति धरें। भूषन कराल कपाल कर सब सद्य सोनित तन भरें।। खर स्वान सुअर सृकाल मुख गन बेष  अगनित को गनै। बहु जिनस प्रेत पिसाच जोगि जमात बरनत नहिं बनै।।___अर्थ___कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किये हुए है। भयंकर गहने पहने, हाथ में कपाल लिये है और सब_के_सब शरीर में ताजा खून लपेटे हुए हैं। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार के_से उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने ? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच  और योगिनियों की जमातें हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता।


नाचहिं गावहिं गीत परम तरंगी भूत सब। देखत अति बिपरीत बोलहिं बचन बिचित्र बिधि।।___अर्थ___भूत_प्रेत नाचते और गाते हैं, वे सब बड़े मौजी हैं। देखने में बहुत ही बेढंगे जान पड़ते हैं और बड़े ही विचित्र ढंग से बोलते हैं।

जस दूलहु तसि बनी बराता। कौतुक बिबिध होहिं मग जाता।। इहाँ हिमाचल रचेउ बिताना। अति बिचित्र नहिं जाइ बखाना।।___अर्थ___जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बरात बन गयी है। मार्ग में चलते हुए भाँति_भाँति के कौतुक ( तमाशे ) होते जाते हैं। इधर हिमाचल ने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता।

सैल सकल जहँ लगि जग माहीं। लघु बिसाल नहिं बरनि सिराहीं।। बन सागर सब नदीं तलावा। हिमगिरि सब कहुँ नेवत पठावा।।___अर्थ___जगत् में जितने छोटे_बड़े पर्वत थे, जिनका वर्णन नहीं किया जा सकता तथा जितने वन, समुद्र, नदियाँ और तलाब थे, हिमाचल ने सबको नेवता भेजा।


कामरूप सुन्दर तन धारी। सहित समाज सहित बर नारी।। गए सकल तुहिनाचल गेहा। गावहिं मंगल सहित सनेहा।।___अर्थ___वे सब अपने इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले सुन्दर शरीर धारण कर सुन्दरी स्त्रियों और समाजों के साथ हिमाचल के घर गये। सभी स्नेहसहित मंगल गीत गाते हैं।


प्रथमहिं गिरि बहु गृह सँवराए। जथाजोगु तहँ तहँ सब छाए।। पुर सोभा अवलोकि सुहाई। लागइ लघु बिरंचि निपुनाई।।___अर्थ___ हिमाचल ने पहले ही से बहुत से घर सजवा रखे थे। यथायोग्य उन_उन स्थानों में सब लोग उतर गये। नगर की सुन्दर शोभा देखकर ब्रह्मा की रचना चातुरी भी तुच्छ लगती थी।


लघु लाग बिधि की निपुनता अवलोकि पुर सोभा सही। बन बाग कूप तड़ाग सुभग सब सक को कही।। मंगल बिपुल तोरन पताका केतु गृह गृह सोहहीं। बनिता पुरुष सुंदर चतुर छबि देखि मुनि मन  मोहहीं।।___अर्थ____ नगर की शोभा देखकर ब्रह्मा की निपुणता सचमुच तुच्छ लगती है। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ सभी सुन्दर हैं; उनका वर्णन कौन कर सकता है ? घर_घर बहुत से मंगलसूचक तोरण और ध्वजा_पताकाएँ सुशोभित हो रही हैं। वहाँ के सुन्दर और चतुर स्त्री_पुरुषों की छबि देखकर मुनियों के भी मन मोहित हो जाते हैं।


जगदंबा जहँ अवतरी सो पुरु बरनि कि जाइ। रिद्धि सिद्धि संपत्ति सुख नित नूतन अधिकाइ।।___अर्थ___ जिस नगर में स्वयं जगदम्बा ने अवतार लिया, क्या उसका वर्णन हो सकता है ? जहाँ रिद्धि, सिद्धि, सम्पत्ति और सुख नित_नये बढ़ते जाते हैं।


नगर निकट बरात सुनि आई। पुर खरभरु सोभा अधिकाई।। करि बनाव सजि बाहन नाना। चले लेन सादर अगवाना।।___अर्थ___बरात को नगर के निकट आयी सुनकर नगर में चहल_पहल मच गयी। अगवानी करनेवाले लोग बनाव_श्रृंगार करके तथा नाना प्रकार की सवारियों को सजाकर आदरसहित बरात को लेने चले।


हियँ हरषे सुर सेन निहारी। हरिहिं देखि अति भए सुखारी।। सिव समाज जब देखने लागे। बिडरि चले बाहन सब भागे।।___अर्थ___देवताओं के समाज को देखकर सब मन में प्रसन्न हुए और विष्णु भगवान् को देखकर तो बहुत ही सुखी हुए। किन्तु जब शिवजी के दल को देखने लगे तब तो उनके सब वाहन ( सवारियों के हाथी, घोड़े, रथ के बैल आदि ) डरकर भाग चले।


धरि, धीरजु तहँ रहे सयाने बालक सब लै जीव पराने।। गएँ भवन पूछहिं पितु माता। कहहिं बचन भय कंपित गाता।।___अर्थ___कुछ बड़ी उम्र के समझदार लोग धीरज धरकर वहाँ डटे रहे। लड़के तो सब अपने प्राण लेकर भागे। घर पहुँचने पर जब माता_पिता पूछते हैं, तब वे भय से काँपते हुए शरीर से ऐसा वचन कहते हैं___

कहिअ काह कहि जाइ न बाता। जम कर धार किधौं बरिआता।। बरु बौराह बसहँ असवारा। ब्याल कपाल बिभूषन छारा।।___अर्थ___क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती। यह बारात है या यमराज की सेना ? दूल्हा पागल है और बैल पर सवार है। साँप, कपाल और राख ही उसके गहने हैं।_

तन छार ब्याल कपाल भूषन नगन जटिल भयंकरा। संग भूत प्रेत पिसाच जोगिनी विकट मुख रजनीचरा।। जो जियत रहिहि बरात देखत पुन्य बड़ तेहि कर सही। देखहि सो उमा बिबाहु घर घर बात असि लरिकन्ह कही।।___अर्थ___दूल्हे के शरीर पर राख लगी है, साँप और कपाल के गहने हैं; वह नंगा, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं। जो बरात को देखकर जीता बचेगा, सचमुच उसके बड़े पुण्य हैं, और वही पार्वती का विवाह देखेगा। लड़कों ने घर_घर यह बात कह दी।

समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहीं। बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं।।___अर्थ___महेश्वर ( शिवजी ) का समाज समझकर सब लडकों के माता_पिता मुस्कराते हैं। उन्होंने बहुत तरह से लड़कों को समझाया कि निडर हो जाओ, डर की कोई बात नहीं है।

बालकांड

हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी।। समुझि कामसुख सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी।।___अर्थ___जगत् में बड़ा हाहाकार मच गया। देवता डर गये, दैत्य सुखी हुए। भोगी लोग कामसुख तो याद करके चिंता करने लगे और साधक जोगी निष्कंटक हो गये।

जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरछित भई। रोदति बदति बहु भाँति करुणा करति संकर पहिं गई।। अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही।।___अर्थ___योगी निष्कंटक हो गये, कामदेव की स्त्री रति अपने पति की यह दशा सुनते ही मूर्छित हो गयी। रोती_चिल्लाती और बार_बार करुणा करती हुई वह शिवजी के पास गयी। अत्यन्त प्रेम के साथ अनेकों प्रकार से विनती करके हाथ जोड़कर सामने खड़ी हो गयी। शीघ्र प्रसन्न होने वाले कृपालु शिवजी अबला ( असहाय स्त्री ) को देखकर सुन्दर ( उसको शान्त्वना देनेवाले ) वचन बोले__

अब ते रति तव नाथ कर होइहिं नाम अनंगु। बिनु हरि व्यापिहिं सबहिं पुनि सुनु निज मिलन प्रसंगु।।___ अर्थ___हे रति ! अब से तेरे स्वामी का नाम अनंग होगा। वह बिना ही शरीर के सबको व्यापेगा। अब तू अपने पति से मिलने की बात सुन।

जब जदुबंस कृष्ण अवतारा।होइहिं हरन महा महिभारा।। कृष्ण तनय होइहिं पति तोरा। बचनु अन्यथा होइ न मोरा।।___अर्थ___जब पृथ्वी के बड़े भारी भार को उतारने के लिये यदुबंस में कृष्ण का अवतार होगा, तब तेरा पति उनके पुत्र ( प्रद्युम्न ) के रूप में उत्पन्न होगा। मेरा यह वचन पूरा होगा।

रति गवनि सुना संकर बानी। कथा अपर अब कहउँ बखानी।। देवन्ह समाचार सब पाए। ब्रह्मादिक बैकुण्ठ सिधाए।।___अर्थ___शिवजी के वचन सुनकर रति चली गयी। अब दूसरी कथा विस्तार से कहता हूँ।ब्रह्मादि देवता सब समाचार सुनकर बैकुण्ठ चले।

सब सुर विष्णु बिरंचि समेता। गए जहाँ सिव कृपानिकेता।। पृथक_पृथक तिन्ह कीन्ही प्रशंसा। भए प्रसन्न चंद्र अवतंसा।।___अर्थ___ फिर वहाँ से विष्णु और ब्रह्मा सहित सब देवता वहाँ गये जहाँ कृपा के धाम शिवजी थे। उन सबने शिवजी की अलग_अलग स्तुति की, तब शशिभूषण शिवजी प्रसन्न हो गये।

सकल सुरन्ह के हृदय अस संकर परम उछाहु। निज नयनन्हि देखा चहहिं नाथ तुम्हार बिबाहु।।___अर्थ___हे शंकर ! सब देवताओं के मन में ऐसा परम उत्साह है कि हे नाथ ! वे अपनी आँखों से आपका विवाह देखना चाहते हैं।

यह उत्सव देखिअ भरि लोचन। सोई कछु करहु मदन मन मोचन।।काम जारि रति कहुँ बरु दीन्हा। कृपासिंधु यह अति भल कीन्हा।।___अर्थ___हे कामदेव का नाश करनेवाले ( शिव ) ! आपके विवाह का उत्सव हम आँख भरकर देखना चाहते हैं। आपने कामदेव को जलाकर रति को वरदान दिया। हे कृपा के सागर ! आपने यह बहुत अच्छा किया।

सासति करि पुनि करहिं पसाऊ। नाथ प्रभुन्ह कर सहज सुभाऊ।। पारबतीं तप कीन्ह अपारा। करहु तासु अब अंगीकारा।।___अर्थ___हे नाथ ! श्रेष्ठ स्वामियों का यह सहज स्वभाव ही है वे पहले दण्ड देकर फिर कृपा किया करते हैं। पार्वती ने अपार तप किया है अब उन्हें साकार कीजिये।

सुनि बिधि बिनय समुझि प्रभु बानी। ऐसेइ होइ कहा सुखु मानी।। तब देवन्ह दुंदुभीं बजाईं। बरषि सुमन जय जय सुर साईं।।___ अर्थ___ब्रह्माजी की प्रार्थना सुनकर और प्रभु श्रीरामजी के वचनों को याद करके शिवजी ने प्रसन्नतापूर्वक कहा___’ऐसा ही हो'। तब देवताओं ने नगाड़े बजाये और फूलों की वर्षा करके ‘जय हो’ ! देवताओं के स्वामी की जय हो !’ ऐसा कहने लगे।

अवसरु जानी सप्तरिषि आए। तुरतहिं बिधि गिरिभवन पठाए।। प्रथम गए जहाँ रही भवानी। बोले मधुर बचन छल सानी।।___अर्थ___उचित अवसर पर सप्तरिषि आये और ब्रह्माजी ने तुरंत ही उन्हें हिमाचल के घर भेज दिया। वे पहले वहाँ गये जहाँ पार्वतीजी थीं और उनसे छल से भरे मीठे ( विनोदयुक्त, आनन्द पहुँचानेवाले ) वचन बोले___

कहा हमार न सुनेहु तब नारद कें उपदेस। अब भा झूठ तुम्हार पन जारेउ काम महेस।।___अर्थ___नारदजी के उपदेश से तुमने उस समय हमारी बात नहीं सुनी। अब तो तुम्हारा प्रण झूठा हो गया, क्योंकि महादेवजी ने काम को ही भष्म कर डाला।

बालकांड

पठवहु  काम जाइ सिव पाहीं। करै छोभु संकर मन माहीं।। तब हम जाइ सिवहिं सिर नाई। करवाउब बिवाह बरिआई।।___अर्थ_तुम जाकर कामदेव को शिवजी के पास भेजो, वह शिवजी की समाधि भंग करे। तब हम जाकर शिवजी के चरणों में सिर रख देंगे और जबर्दस्ती ( उन्हें राजी करके ) विवाह करा देंगे।

एहि बिधि भलेहिं देवहित होई। मत अति नीक कहइ बसु कोई।। अस्तुति सुरन्ह कीन्ह अति हेतू। प्रगटेउ बिषमबाण झषकेतू।।__अर्थ___इस प्रकार भले ही देवताओं का हित हो ( और तो कोई उपाय नहीं है ) सबने कहा__यह सम्मति बहुत अच्छी है। फिर देवताओंं ने बड़े प्रेम से स्तुति की, तब विषम ( पाँच ) बाण कारण करनेवाला और मछली के चिह्नयुक्त ध्वजावाला कामदेव प्रकट हुआ।

सुरन्ह कही निज विपति सब सुनि मन कीन्ह विचार। संभु विरोध न कुशल कुशल मोहन, बिहसि कहें अस मार।।___अर्थ___देवताओं ने कामदेव से सारी विपत्ति कही। सुनकर कामदेव ने मन में विचार किया और हँसकर देवताओं से यों कहा कि शिवजी के साथ विरोध करने में मेरी कुशल नहीं है।

यदपि करीब मैं काजू तुम्हारा। श्रुति कह परम श्रम उपकारा।। पर हित लागि तजइ जो देही। संतत संत प्रसंसहिं रोगी।।___अर्थ___तथापि मैं तुम्हारा काम तो करूँगा, क्योंकि वेद दूसरे के उपकार को परम धर्म कहते हैं। जो दूसरे के हित के लिये अपना शरीर त्याग देता है, संत सदा उसकी बड़ाई करते हैं।

अस कहि चलेउ सबहिं सिरु नाईं। सुमन मधुर कर सहित सहाई।। चलत मार अस हृदय बिचारा। सिव बिरोध ध्रुव मरनु हमारा।।__अर्थ__यों कह और सबको सिर नवाकर कामदेव अपने पुष्प के धनुष को हाथ में लेकर ( वसन्तादि ) सहायकों के साथ चला। चलते समय कामदेव ने ऐसा हृदय में विचार किया कि शिवजी के साथ विरोध करने से मेरा मरण निश्चित है।

तब आपन प्रभाउ बिस्तारा। निज बस कीन्ह सकल संसारा।। कोपेउ जबहिं बारिचर केतू। छन महुँ मिटे सकल श्रुति सेतू।।__अर्थ__तब उसने अपना प्रभाव फैलाया और समस्त संसार को अपने वश में कर लिया। जिस समय उस मछली के चिह्न की ध्वजा वाले कामदेव ने कोप किया, उस समय क्षणभर में ही वेदों की सारी मर्यादा मिट गयी।

ब्रह्मचर्य व्रत संजम नाना। धीरज धरम ग्यान बिग्याना।। सदाचार जप जोग बिरागा। सभय बिबेक कटकु सब भागा।।__अर्थ__ब्रह्मचर्य, नियम, नाना प्रकार के संयम, धीरज, धर्म, ज्ञान, विज्ञान, सदाचार, जप, योग, वैराग्य आदि विवेक की सारी सेना डरकर भाग गयी।

भागेउ बिबेकु सहाय सहित सो सपाट संजुग महि मुरे। सदग्रन्थ पर्बत कन्दरन्हि महुँ जाइ जेहि अवसर दुरे।। होनिहार का कराकर को कथानक जग खरभरु परा। दुइ माथ केहि रतिनाथ जेहि कहुँ कोपिकर धनु सरु धरा।।___अर्थ___जब कामदेव की सेना के योद्धा रणभूमि की ओर झुके तब ज्ञान अपने साथियों के संग भाग चला। वे उस समय धर्मग्रन्थ रूपी पर्वत की मुद्राओं में जा छिपे। हे विधाता ! क्या होनहार है ? कौन रक्षा करेगा ? संसार में यह खलबली पड़ गई। ऐसा दो सिरवाला कौन है जिसके लिये कामदेव ने क्रोध करके धनुष_बाण उठाया है ?

जे सजीव जग अचर चर, नारि पुरुष अस नाम। तो निज निज मरजाद तजि, भए सकल बस काम।।___अर्थ___संसार में स्त्री_पुरुष  नामवाले जितने चर_अचर प्राणी थे, सब अपनी मर्यादा को छोड़कर कामदेव के वश में हो गए।

सबके हृदय मदन अभिलाषा। लता निहारि नवहिं तरु साखा।। नहीं उन कि अंकुरित कहँ धाईं। संगम करहिं तलाश चलाईं।।___अर्थ___सबके हृदय में काम की इच्छा हो गयी। कलाओं ( बेलों ) को देखकर वृक्षों की डालियाँ झुकने लगीं। नदियाँ उमड़_उमड़ कर समुद्र की ओर दौडी और ताल_ तलैया  भी आपस में संगम करने लगीं।

जहँ असि दास जड़न्ह कै बरनी। को कहा सके सचेतन करनी।। पसु पच्छी नभ जल थल चारी। भए काम बस समय बिसारी।।___जब जड़ ( वृक्ष, नदी आदि ) की यह दशा कही गयी, तब चेतन जीवों की करनी कौन कह सकता है ? आकाश, जल और पृथ्वी पर विचरनेवाले सारे पशु_पक्षी ( अपने संयोग का ) समय भुलाकर काम के वश हो गये।

मदन अंध व्याकुल सब लोका। निसि दिनी नहीं अवलोकहिं कोका।। देव अनुज नर किन्नर व्याला। प्रेत पिसाच भूत बेताला।।___अर्थ__सब लोग कामान्ध होकर व्याकुल हो गये। चकवा_चकवी रात दिन नहीं देखते। देव, मनुष्य, किन्नर, सर्प, प्रेत, पिशाच, भूत, बेताल___

इन्ह कै दशा न कहेउँ बखानी। सदा काम के चेरे जानी।। सिद्ध विरक्त महामुनि जोगी। तेपि कामबस भए बियोगी।।___अर्थ___ये तो सदा ही काम के गुलाम हैं, यह समझकर मैंने इनकी दशा का वर्णन नहीं किया। सिद्ध, बिरक्त, महामुनि और महान् योगी भी काम के वश होकर योगरहित या स्त्री के विरही हो गये।

भए कामबस जोगीस तापस पाँवरन्हि की को कहै। देखहिं चराचर नारिमय जे ब्रह्ममय देकर रहे।। अबला बिलोकहिं पुरुषमय जगु पुरुष सब अबलामयं। दुइ दंड भरी ब्रह्मांड भीतर कामकृत कौतुक अयं।।___अर्थ__जब योगीश्वर और तपस्वी भी काम के वश हो गये, तब पामर मनुष्यों की कौन कहे ? जो समस्त चराचर जगत् को ब्रह्ममय देखते थे, वे अब उसे स्त्रीमय देखने लगे। स्त्रियाँ सारे संसार को पुरुषमय देखने लगीं और पुरुष उसे स्त्रीमय देखने लगे। दो घड़ी तक सारे ब्रह्माण्ड के अन्दर कामदेव का रचा हुआ यह कौतुक ( तमाशा ) रहा।

धरी न काहूँ धीर सब के मन मनसिज हरे। जे राखे रघुवीर रे उबरे तेहि काल महुँ।।___अर्थ___किसी ने भी हृदय में धैर्य नहीं धारण किया, कामदेव ने सबके मन हर लिये। श्रीरघुनाथजी ने जिनकी रक्षा की, केवल वे ही उस समय बचे रहे।

उभय घड़ी यह कौतुक भयऊ। जौं लगि काम संभव पहिं गयऊ।। सिवहि बिलोकि असंतोष मारू। भयउ जथाथिति सबु संसारू।।___अर्थ___दो घड़ी तक ऐसा तमाशा हुआ, जब तक कामदेव शिवजी के पास पहुँच गया। शिवजी को देखकर कामदेव डर गया, तब सारा संसार फिर जैसा_का_तैसा स्थिर हो गया।

भए तुरत सब जीव सुखारे। जिमि मद उतरि गएँ मतवारे।। रुद्रहि देखि मदन भय माना। दुराधरष दुर्गम भगवाना।।___अर्थ___तुरंत ही सब जीव वैसे ही सुखी हो गये जैसे मतवाले ( नशा पिये हुए ) लोग मद ( नशा ) उतर जाने पर सुखी होते हैं। दुराधर्ष ( जिसको पराजित करना अत्यन्त ही कठिन है ) और दुर्गम ( जिनका पार पाना कठिन है ) भगवान् ( संपूर्ण ऐश्वर्य, धर्म, यश, श्री, ग्राम और वैराग्यरूप छ: ईश्वरीय गुणों से युक्त ) रुद्र ( महाभयंकर ) शिवजी को देखकर कामदेव भयभीत हो गया।

फिरत लाज कछु करि नहिं जाई। मरन ठानि मन परसि उपाई।। प्रगटेसि तुरत रुचिर रितुराजा। कुसुमित नव तरु राजि बिराजा।।___लौट जाने में लज्जा मालूम होती है और करते कुछ बनता नहीं। आखिर मन में मरने का निश्चय करके उसने उपाय रचा। तुरंत ही सुन्दर रितुराज वसन्त को प्रगट किया। फूले हुए नये_नये वृक्षों की कतारें सुशोभित हो गयीं।

बन उपबन बापिका तड़ागा। परम सुभग सब दिसा बिभागा।। जहँ तहँ जनु उमगत अनुरागा। देखा मुएहुँ मन मनसिज जागा।।___अर्थ___वन_उपवन, बावली_तालाब और सब दिशाओं के विभाग परम सुन्दर हो गये। जहाँ_तहाँ मानो प्रेम उमड़ रहा है, जिसे देखकर मरे मनों में भी कामदेव जाग उठा।

जागई मनोभव मुएहुँ मन बन सुभगता न परै कहि। सीतल सुगंध सुमंद मारुत मदन अनल सखा सही।। बिकसे सरन्हि बहु कंज सुंदर पुंज मंजुल मधुकरा। कलहंस पिक सुक सरस रव करि गान नाचहिं अपछरा।।___अर्थ___ मरे हुए मन में भी कामदेव जागने लगा, वन की सुन्दरता कही नहीं जा सकती। कामरूपी अग्नि का सच्चा मित्र शीतल_मन्द_सुगंधित पवन चलने लगा। सरोवरों में सुन्दर_सुन्दर फूल खिल गये और सभी पक्षी कलरव करने लगे।

सकल कला करि कोटि बिधि। हारेउ सेन समेत।। टली न अचल समाधि सिव। कोपेउ हृदय निकेत।।___अर्थ___कामदेव ने हर तरह की कला से शिव की समाधि भंग करने का प्रयत्न किया, लेकिन शिवजी की अचल समाधि नहीं टूटी। तब कामदेव को गुस्सा आ गया।

देखि रसाल विटप पर साखा। तेहि पर चढ़ेउ मदन मन माखा।। सुमन चाप निज सर संधाने। अति रिस ताकि श्रवण लगि ताने।।___अर्थ___कामदेव ने एक बड़ा आम का पेड़ देखकर उसके बड़े डाल पर मन में अभिमान लिये चढ़ गये। अपने फूल के धनुष पर बाण चढ़ाकर गुस्से में उसे कान तक खींचा।

छाड़े विषम विसिख उर लागे। छूटि समाधि संभु तब जागे।। भयऊ ईस मन छोभ विसेषी।। नयन उघारि सकल दिसि देखी।।___अर्थ___कामदेव ने वाण चलाया जो शिवजी की छाती में लगा। तब शिवजी का समाधि टूटा। भगवान् शिव नयन खोलकर सभी दिशाओं में देखने लगे।

सौरभ पल्लव मदन बिलोका। भयउ कोप कंपेउ त्रयलोका।। तब सिव तीसर नयन उघारा। चितवत काम भयउ जरि छारा।।___अर्थ___शिवजी ने आम के पल्लव के बीच कामदेव को देखा। उन्हें क्रोध हो गया जिससे तीनों लोक काँपने लगे। तब शिवजी ने अपनी तीसरी आँख खोली और देखते ही कामदेव जलकर राख हो गया।