Sunday, 19 April 2020

बालकाण्ड

 नाथ सम्भुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा।। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही।।___ अर्थ___ हे नाथ ! शिवजी का धनुष तोड़नेवाला कोई एक आपका ही दास होगा। क्या आज्ञा है सो मुझसे क्यों नहीं कहते ? मुनि गुस्साकर बोले___





 सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई।। सुनहु राम जेहि सिव धनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा।।___ अर्थ___ सेवक वह है जो सेवकाई करे। जो शत्रु का काम करे उससे तो लड़ाई ही करनी चाहिए। सुनो राम ! जिसने शिव_धनुष को तोड़ा है वह सहस्त्रबाहु के समान मेरा शत्रु है।




सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।। सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहिं अपमाने।।___ अर्थ____वह इस समाज से अलग निकल आवे नहीं तो सब राजा मारे जायेंगे। मुनि के वचन सुनकर लक्ष्मणजी मुसकाये और परशुरामजी का अपमान करते हुए बोले___





 बहु धनुहीं तोरी लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्ह गोसाईं।। एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाई कह भृगुकुलकेतू।।___ अर्थ____ लड़कपन में हमने बहुत सी धनुही तोड़ी, हे गोसाईं ! तब ऐसा गुस्सा आपने कभी नहीं किया। इसी धनुष पर ममता किस कारण है ? यह सुन परशुराम क्रोधित होकर कहने लगे___





रे नृप बालक कालबस, बोलत तोहि न संभार। धनुही सम त्रिपुरारि धनुष, विदित सकल संसार।।___ अर्थ___ हे राजपुत्र ! तू काल के अधीन होने से संभालकर नहीं बोलता। संसार_ प्रसिद्ध शिवधनुष क्या धनुही के समान है ?





 लखन कहा हँसि हमरे जाना। सुनहु देव सब धनुष समाना।। का छति लाभ जून धनु तोरे। देखा राम नयन के भोरें।।___ अर्थ____ लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा___ हे देव ! सुनिए हमारी समझ में सब धनुष बराबर है। पुराने धनुष का तोड़ना क्या हानि_लाभ है ? श्रीरामचन्द्रजी ने तो नवीन के धोखे से इसे देखा था।





छुअत टूट रघुपतिहिं न दोषू। मुनि बिनु काज करिअ कर रोषू।। बोले चितइ परसु की ओरा। रे सठ सुनेहि सुभाउ न मोरा।।___ अर्थ___ फिर वह छूते ही टूट गया, इसमें रामचन्द्रजी का दोष नहीं है ? हे मुनि ! बिना प्रयोजन क्यों क्रोध करते हो ? परशुरामजी अपने फरसे की ओर देखकर बोले___ हे शठ ! तूने मेरा स्वभाव नहीं सुना।





बालक बोलि बधउँ नहिं तोही। केवल मुनि जड़ जानिहि मोही।। बाल ब्रह्मचारी अति कोही। विश्वविदित छत्रिय कुल द्रोही।।___ अर्थ___ बालक जानकर मैं तुझे नहीं मारता हूँ। रे जड़ ! तूने मुझे केवल मुनि ही जाना है। मैं बाल ब्रह्मचारी बड़ा क्रोधी हूँ और जगत् में क्षत्रियवंश का प्रसिद्ध बैरी हूँ।





भुजबल भूमि भूप बिनु कीन्ही। विपुल बार महीदेवन्ह दीन्ही। सहसबाहु भुज छेदनिहारा। परसु बिलोकु महीपकुमारा।।___ अर्थ___ अपने भुजाओं के बल से पृथ्वी को बिना राजाओं के करके अनेक बार उसे ब्राह्मणों को दे दिया है। हे राजकुमार ! सहसबाहु की भुजाओं को काटनेवाले इस फरसे को तू देख।





मातु पितहिं जनि सोचबस करसि महीपकिसोर। गर्भहु के अर्भक दलन, परसु मोर अति घोर।।___ अर्थ___ हे राजकिशोर ! तू अपने माता_ पिता को सोच के वश मत कर। मेरा यह कुठार गर्भों के बालकों को मारनेवाला बड़ा भयंकर है।



 बिहसि लखन बोले मृदु बानी। अहो मुनीस महा भटमानी।। पुनि पुनि मोहि देखाव कुठारू। चहत उड़ावन फूँकि पहारू।।___ अर्थ___ लक्ष्मणजी हँसकर मधुर वाणी बोले___ अहो ! मुनिश्वर अपने को बड़ा शूरवीर मानते हैं। इसी से मुझे बारंबार कुठार दिखाते हैं। फूँककर पहाड़ उड़ाना चाहते हैं।



इहाँ कुम्हडबतिया कोऊ नाहीं। जे तरजनी देखि मरि जाहीं।। देखि कुठारु सरासन बाना। मैं कछु कहा सहित अभिमाना।।___ यहाँ कोई कुम्हडे का बतियाँ नहीं है जो तरजनी अँगुली देखते ही मुरझा जाती है। कुठार और धनुष_ बाण देखकर ही मैंने अभिमान के साथ कहा है।





भृगुसुत समुझि जनेऊ बिलोकी। जो कछु कहहु सहउँ किस रोकी।। सुर महीसुर हरिजन अरु गाई। हमरे कुल इन्ह पर न सुराई।___ अर्थ___भृगुवंशी ब्राह्मण समझकर और जनेऊ देखकर ही जो कुछ आपने कहा है वह मैंने क्रोध रोककर सहा है। देवता, ब्राह्मण, हरिभक्त और गाय, इन पर हमारे कुल में शूरता नही दिखायी जाती।




बधें पाप अपकीरति हारे। मारत हूँ पा परिअ तुम्हारे।। कोटि कुलिस सम बचन तुम्हारा। ब्यर्थ धरहु धनु बाण कुठारा।___ अर्थ___क्योंकि इन्हें मारने में पाप और इनसे हारने में अपयश है। आप मारें तो भी आपके पाँव ही पड़ना चाहिये। करोड़ों वज्रों के समान तो आपका वचन ही है। आप धनुष_बाण और कुठार तो व्यर्थ ही धारण किये हैं।





जो बिलोकि अनुचित कहेऊँ, छमहु महामुनि धीर। सुनि सरोष भृगुबंशमनि बोले गिरा गभीर।।___ अर्थ___ हे वीर महामुनि ! इन्हें देखकर मैंने जो कुछ अनुचित कहा हो, उसे क्षमा कीजिये। यह सुनकर भृगुवंशमणि परशुरामजी क्रोध के साथ गम्भीर वाणी बोले___



कौसिक सुनहु मंद यहु बालकु। कुटिल कालबस निज कुल घालकु।। भानु बंस राकेस कलंकु। निपट निरंकुस अबुध असंकू।।___ अर्थ___ हे विश्वामित्र !  सुनो, यह बालक बड़ा कुबुद्धि और कुटिल है, काल के वश होकर यह अपने कुल का घालक बन गया है। यह सूर्यवंशरूपी पूर्णचन्द्र का कलंक है। यह बिलकुल उद्गार, मूर्ख और निडर है।





काल कवलु होइहि छन माहीं। कहउँ पुकारि खोरि मोहि नाहीं।। तुम्ह हटकहु जौं चहहु उबारा। कहि प्रतापु बसु रोषु हमारा।।___ अर्थ____ अभी क्षण_भर में यह काल का ग्रास हो जायगा। मैं पुकारकर कहे देता हूँ, फिर मुझे दोष नहीं है। यदि तुम इसे बचाना चाहते हो, तो हमारा प्रताप, बल और क्रोध बतलाकर इसे मना कर दो।





लखन कहा मुनि सुजसु तुम्हारा। तुम्हहि अछत को बरनै पारा।। अपने मुँह तुम्ह आपनि करनी। बार अनेक भाँति बहु बरनी।।___ अर्थ___ लक्ष्मणजी ने कहा___ हे मुनि !  आपका सुयश आपके रहते दूसरा कौन वर्णन कर सकता है ? आपने अपने ही मुँह से अपनी करनी अनेकों बार बहुत प्रकार से वर्णन की है।





नहिं संतोष त पुनि कुछ कहहू। जनि किस रोकि दुःसह दुःख सहहू।। बीरब्रती तुम्ह धीर अछोभा। गारी देर न पावहु सोभा।।___ अर्थ___ इतने पर भी संतोष न हुआ हो तो फिर कुछ कह डालिये। क्रोध रोककर असह्य दुःख मत सहिये। आप वीरता का व्रत धारण करनेवाले, धैर्यवान् और क्षोभरहित हैं। गाली देते शोभा नहीं पाते।





सूर समर करनी करहिं कहा न जनावहिं आप। विद्यमान रन पाइ रिपु कायर कथहिं प्रताप।।___ अर्थ____ शूरवीर तो युद्ध में करनी ( शूरवीरता का कार्य) करते हैं, कहकर अपने को नहीं जनाते। शत्रु को युद्ध में उपस्थित पाकर कायर ही अपने प्रताप की डींग मारा करते हैं।




तुम्ह तौं कालु हाँक जनु लावा। बार बार मोहि लागि बोलावा।। सुनत लखन के बचन कठोरा। परसु सुधारि धरेउ कर घोरा।।___ अर्थ___आप तो मानो काल को हाँक लगाकर बार बार उसे मेरे लिये बुलाते हैं।
लक्ष्मणजी के कठोर वचन सुनते ही परशुरामजी ने अपने भयानक फरसे को सुधारकर हाथ में ले लिया।





अब जनि देइ दोसु मोहि लोगू। कटुबादी बालकु बधजोगू।। बाल बिलोकि बहुत मैं बाँचा। अब यहु मरनिहार भा साँचा।।___ अर्थ____और बोले___ अब लोग मुझे दोष न दें। यह कड़ुआ बोलनेवाला बालक मारे जाने के योग्य है। इसे बालक देखकर मैंने बहुत बचाया, पर अब यह सचमुच मरने को ही आ गया है।





कौसिक कहा छमिअ अपराधू। बाल दोष गुन गनहिं न साधू।। खर कुठार मैं अकरुन कोही। आगें अपराधी गुरुद्रोही।।___ अर्थ___ विश्वामित्रजी ने कहा___अपराध क्षमा कीजिये। बालकों के दोष और गुण को साधुलोग नहीं गिनते। परशुरामजी बोले____ तीखी धार का कुठार, मैं दयारहित और क्रोधी, और यह गुरुद्रोही और अपराधी मेरे सामने।





उतर देरइ छोडेउँ बिनु मारें। केवल कौसिक सील तुम्हारें।। न त एहि काटि कुठार कठोरें। गुरहिं उरिन होतेउँ श्रम थोरें।।____ अर्थ____उत्तर दे रहा है। इतने पर भी मैं इसे बिना मारे छोड़ रहा हूँ, सो हे विश्वामित्र! केवल तुम्हारे  शील ( प्रेम ) से। नहीं तो इसे इस कठोर कुठार से काटकर थोड़े ही परिश्रम से गुरु से उऋिण हो जाता।





 गाधिसूनु कह हृदयँ हँसि मुनिहि हरिअरइ सूझ। अयमय खाँड़ न ऊखमय अजहूँ न बूझ अबूझ।।____ अर्थ____ विश्वामित्रजी ने हृदय में हँसकर कहा___ मुनि को हरा_ही_हरा सूझ रहा है ( अर्थात् सर्वत्र विजयी होने के कारण ये श्रीराम_ लक्ष्मण को भी साधारण क्षत्रिय ही समझ रहे हैं)। किन्तु यह लोहमयी ( केवल फौलाद की बनी हुई ) खाँड़ ( खाँड़ा_ खड्ग ) है, भी बेसमझ बने हुए हैं; इनके प्रभाव को नहीं समझ रहे हैं।





कहेउ लखन मुनि सील तुम्हारा। को नहिं जान बिदित संसारा।। माता पितहि उरिन भए नीकें। गुरु रिनु रहा सोच बड़ जी कें।।___ अर्थ____ लक्ष्मणजी ने कहा___ हे मुनि ! आपके सील को कौन नहीं जानता ? वह संसारभर में प्रसिद्ध है। आप माता_पिता से अच्छी तरह उऋिण हो ही गये, अब गुरु का ऋण रहा, जिसका जी में बड़ा सोच लगा है।





सो जनु हमरेहि माथे काढ़ा। दिन चलि गए ब्याज बड़ बाढ़ा।। अब आनिअ ब्यवहरिआ बोली। तुरत देउँ मैं थैली खोली।।___अर्थ___ वह मानो हमारे ही मत्थे काढ़ा था। बहुत दिन बीत गये, इससे ब्याज भी बहुत बढ़ गया होगा। अब किसी हिसाब करनेवाले को बुला लाइये, तो मैं तुरंत थैली खोलकर दे दूँ।





सुनि कटु बचन कुठार सुधारा। हाय हाय सब सभा पुकारा।। भृगुबर परसु देखावहु मोही। बिप्र बिचारि बचउँ नृपद्रोही।।___ अर्थ____ लक्ष्मणजी के कड़वे वचन सुनकर परशुरामजी ने कुठार संभाला। सारी सभा हाय ! हाय ! करके पुकार उठी। [ लक्ष्मणजी ने कहा___] हे भृगुश्रेष्ठ ! आप मुझे फरसा दिखा रहे हैं ? पर हे राजाओं के शत्रु ! मैं ब्राह्मण समझकर बचा रहा हूँ।





मिले न कबहुँ वीर रन गाढ़े। द्विज देवता घरहिं के बाढ़े।। अनुचित कहि सब लोग पुकारे। रघुपति सयनहिं लखन नेवारे।।___ अर्थ___ आपको कभी रणधीर बलवान् वीर नहीं मिले। हे ब्राह्मण देवता !  आप घर ही में बड़े हैं। यह सुनकर ‘अनुचित है, अनुचित है' कहकर सब लोग पुकार उठे। तब श्रीरघुनाथजी ने इशारे से लक्ष्मणजी को रोक दिया।





लखन उतर आहुति सरिस भृगुबर कोप कृसानु। बढ़त देखि जल सम बचन बोले रघुकुलभानु।।___ अर्थ___ लक्ष्मणजी के उत्तर से, जो आहुति के समान थे, परशुरामजी के क्रोधरूपी अग्नि को बढ़ते देखकर रघुकुल के सूर्य श्रीरामचन्द्रजी जल के समान ( शान्त करनेवाले ) वचन बोले__





नाथ करहु बालक पर छोहू। सूध दूधमुख करिअ न कोहू।। जौं है प्रभु प्रभाउ कछु जाना। तौं कि बराबरि करत अयाना।।___ अर्थ___ हे नाथ ! बालक पर कृपा कीजिये। इस सीधे और दुधमुँहे बच्चे पर क्रोध न कीजिये। यदि यह प्रभु का ( आपका ) कुछ भी प्रभाव जानता, तो क्या यह बेसमझ आपकी बराबरी करता ?





 जौं लरिका कछु अचगरि करहीं। गुर पितु मातु मोद मन भरहीं।। करिअ कृपा सिसु सेवक जानी। तुम्ह सम सील कीर मुनि ग्यानी।।___ अर्थ____ बालक यदि कुछ चपलता भी करते हैं, तो गुरु, पिता और माता मन में आनन्द से भर जाते हैं। अतः इसे छोटा बच्चा और सेवक जानकर कृपा कीजिये। आप तो समदर्शी, सुशील, धीर और ग्यानी मुनि हैं।





राम बचन सुनि कछुक जुड़ाने। कहि कछु लखनु बहुरि मुसुकाने।। हँसत देखि नख सिख रिस व्यापी। राम तोर भ्राता बड़ पापी।।___ अर्थ____ श्रीरामचन्द्रजी के वचन सुनकर वे कुछ ठंडे पड़े। इतने में लक्ष्मणजी कुछ कहकर फिर मुस्करा दिये। उनको हँसते देखकर परशुरामजी के नख से शिखा तक ( सारे शरीर में ) क्रोध छा गया। उन्होंने कहा___ हे राम ! तेरा भाई बड़ा पापी है।





गौर सरीर स्याम मन माहीं। कालकूटमुख पयमुख नाहीं।। सहज टेढ़ अनुकरिय न तोही। नीचु मीचु सम देख न मोही।।___ अर्थ___ यह शरीर से गोरा, पर हृदय का बड़ा काला है। यह  विषमुख है, दुधमुँहा नहीं। स्वभाव से ही टेढ़ा है, तेरा अनुकरण नहीं करता ( तेरे जैसा शीलवान् नहीं है )। यह नीच मुझे काल के समान नहीं देखता।





लखन कहेउ हँसि सुनहु मुनि क्रोधु पाप कर मूल। जेहि बस जन अनुचित करहिं करहिं विस्व प्रतिकूल।।___ अर्थ___ लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा____ हे मुनि ! सुनिये, क्रोध पाप का मूल है, जिसके वश में होकर मनुष्य अनुचित कर्म कर बैठते हैं और विश्वभर के प्रतिकूल चलते ( सबका अहित करते ) हैं।





मैं तुम्हार अनुचर मुनिराया। परिहरि कोपु करिअ अब दाया।। टूट चाप नहिं जुरिहिं रिसाने। बैठिय होइहिं पाय पिराने।।___ अर्थ___ हो मुनिराज ! मैं आपका दास हूँ। अब क्रोध त्यागकर दया काजिये। टूटा हुआ धनुष क्रोध करने से जुड़ नहीं जायगा। खड़े_ खड़े पैर दुखने लगे होंगे, बैठ जाइये।





जौं अति प्रिय तौं करिअ उपाई। जोरिअ कोऊ बर गुनी बोलाई।। बोलत लखनहिं जनकु डेराहीं। मष्ट करहु अनुचित भर नाहीं।।___ अर्थ____ यदि धनुष अत्यन्त ही प्रिय हो, तो कोई उपाय किया जाय और किसी बड़े गुणी ( कारीगर ) को बुलाकर जुड़वा दिया जाय। लक्ष्मणजी के बोलने से जनकजी डर जाते हैं और कहते हैं___ बस, चुप रहिये, अनुचित बोलना अच्छा नहीं।





थर थर काँपहिं पुर नर नारी। छोट कुमार खोट बड़ भारी।। भृगुपति सुनि सुनि निरभय बानी।  रिस तन जरइ होइ बल हानी।।___ अर्थ___ जनकपुर के स्त्री_ पुरुष थर_थर काँप रहे हैं [ और मन_ही_मन कह रहे हैं कि ] छोटा कुमार बड़ा ही खोटा है। लक्ष्मणजी की निर्भय बाणी सुन_सुनकर परशुरामजी की शरीर क्रोध से जला जा रहा है और उनके बल की हानि हो रही है ( उनका बल घट रहा है )।





बोले रामहिं देइ निहोरा। बचउँ बिचारि बंधु लघु तोरा।। मनु मलीन तनु सुंदर कैसें। बिष रस भरा कनक घटु जैसें।।___ अर्थ___ तब श्रीरामचन्द्रजी पर एहसान जनाकर परशुरामजी बोले____ तेरा छोटा भाई समझकर मैं इसे बचा रहा हूँ। यह मन का मैला और शरीर की कैसा सुन्दर है, जैसे विष के रस से भरा हुआ सोने का घड़ा।





सुनि लछिमन बिहसे बहुरि नयन तरेरे राम। गुरु समीप गवने सकुचि परिहरि बानी बाम।।____ अर्थ____ यह सुनकर लक्ष्मणजी फिर हँसे। तब श्रीरामचन्द्रजी ने तिरछी नजर से उनकी ओर देखा, जिससे लक्ष्मणजी सकुचाकर, विपरीत बोलना छोड़कर, गुरुजी के पास चले गये।





अति विनीत मृदु सीतल बानी। बोले रामु जोरि जुग पानी।। सुनहु नाथ तुम्ह सहज सुजाना। बालक बचनु करिअ नहिं काना।।___ अर्थ____ श्रीरामचन्द्रजी दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त विनय के साथ कोमल और शीतल वाणी बोले___ हे नाथ ! सुनिये,  आप तो स्वभाव से ही समझदार हैं। आप बालक के वचन पर ध्यान न दीजिये ( उसे सुना_ अनसुना कर दीजिये )।


बररै बालकु एकु सुभाऊ। इन्हहिं न संत बिदूषहिं काऊ।। तेहिं नाहीं कछु काज बिगारा। अपराधी मैं नाथ तुम्हारा।।___ अर्थ____बरैं और बालक एक स्वभाव है। संतजन इन्हें कभी दोष नहीं लगाते। फिर उसने ( लक्ष्मणने ) तो कुछ काम भी नहीं बिगाड़ा है, हे नाथ ! आपका अपराधी तो मैं हूँ।





कृपा कोप बधु बँधब गोसाईं। मो पर करिअ दास की नाई।। कहिअ बेगि जेहि बिधि रिस जाई। मुनिनायक सोइ करौं उपाई।।___ अर्थ___अतः हे स्वामी ! कृपा, क्रोध, वध और बन्धन, जो कुछ करना हो, दास की तरह ( अर्थात दास समझकर ) मुझपर कीजिये। जिस प्रकार से शीघ्र आपका क्रोध दूर हो, हे मुनिराज ! बताइये, मैं वही उपाय करूँ।





कह मुनि राम जाइ रिस कैसें। अजहूँ अनुज तव चितव अनैसें।। एहि कें कंठ कुठारु न दीन्हा। तो मैं काह कोपु करि दीन्हा।।___ अर्थ___मुनि ने कहा___ हे राम ! क्रोध कैसे जाय; अब भी तेरा छोटा भाई टेढ़ा ही ताक रहा है। उसकी गर्दन पर मैंने कुठार न चलाया, तो क्रोध करके किया ही क्या ?





 गर्भ स्रवहिं अवनिप रवनि सुनि कुठार गति घोर । परसु अछत देखउँ जिअत बैरी भूपकिसोर।।___ अर्थ___मेरे जिस कुठार की घोर करनी सुनकर राजाओं की स्त्रियों के गर्भ गिर पड़ते हैं, उसी फरसे के रहते मैं इस शत्रु राजपुत्र को जीवित देख रहा हूँ।





बहइ न हाथु दहइ किस छाती। भा कुठारु कुंठित नृपघाती।। भयउ बाम बिधि फिरेउ सुभाऊ। मोरे हृदयँ कृपा कसि काऊ।।___अर्थ___हाथ चलता नहीं, क्रोध से छाती जली जाती है। [ हाय ! ] राजाओं का घातक यह कुठार भी कुंठित हो गया। विधाता विपरीत हो गया, इससे मेरा स्वभाव बदल गया, नहीं तो भला, मेरे हृदय में किसी समय भी कृपा कैसी ?








आजु दया दुखु दुसह सहावा। सुनि सौमित्रि बिहसि सिरु नावा।। बाउ कृपा मूरति अनुकूला। बोलत बचन. झरत जनु फूला।।___ अर्थ___ आज दया मुझे यह दुःसह दुःख सहा रही है। यह सुनकर लक्ष्मणजी ने मुस्कराकर सिर नवाया [ और कहा___ ] आपकी कृपारूपी वायु भी आपकी मूर्ति के अनुकूल ही है, वचन बोलते हैं मानो फूल झड़ रहे हैं ! 





जौं पैं कृपा जरिहिं मुनि गाता। क्रोध भएँ तनु  राख बिधाता।। देखु जनक हठि बालकु एहू। कीन्ह चहत जड़ जमपुर गेहू।।____ अर्थ___ हे मुनि ! यदि कृपा करने से आपका शरीर जला जाता है, तो क्रोध होने पर तो शरीर की रक्षा विधाता ही करेंगे। [ [परशुरामजी ने कहा___] हे जनक ! देख, यह मूर्ख बालक हठ करके यमपुरी में घर ( निवास ) करना चाहता है।





बेगि करहु किन आँखिन्ह ओटा। देखत छोट खोट नृपु ढोटा।। बिहसे लखनु कहा मन माहीं। मूँदे आँखि कतहुँ कोउ नाहीं।।___ अर्थ___इसको शीघ्र ही आँखों की ओट क्यों नहीं करते ? यह राजपुत्र देखने में छोटा है, पर है बड़ा खोटा। लक्ष्मणजी ने हँसकर मन_ही_मन कहा___ आँख मूँद लेने पर कहीं कोई नहीं है।





परसुराम तब राम प्रति बोले उर अति क्रोधु। संभु सरासनु तोरि सठ करसि हमारे प्रबोधु।।___ अर्थ___ तब परशुरामजी हृदय में अत्यन्त क्रोध भरकर श्रीरामजी से बोले___ अरे शठ ! तू शिवजी का धनुष तोड़कर उल्टा हमीं को ज्ञान सिखाता है !




बंधु कहइ कटु संमत तोंरें। तू छल बिनय करसि कर जोरें।। करु परितोषु मोर संग्रामा। नाहिं त छाड़ कहाउब रामा।।___अर्थ___ तेरा यह भाई तेरी ही सम्मति से कटु वचन बोलता है और तू छल से हाथ जोड़कर विनय करता है। या तो युद्ध में मेरा संतोष कर नहीं तो राम कहलाना छोड़ दे।





छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही। बंधु सहित न त मारउँ तोही।। भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ। मन मुसुकाहीं रामु सिर नाएँ।।___ अर्थ___अरे सिवद्रोही ! छल त्यागकर मुझसे युद्ध कर। नहीं तो भाईसहित तुझे मार डालूँगा। इस प्रकार परशुरामजी कुठार उठाये बकवास रहे हैं और श्रीरामचन्द्रजी सिर झुकाये मन_ही_मन मुस्करा रहे हैं।





गुनह लखन कर हम पर रोषू। कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू।। डेढ़ जानि सब बंदइ काहू। बक्र चन्द्रमहि ग्रसइ न राहू।।___ अर्थ____[ श्रीरामचन्द्रजी ने मन_ ही_मन कहा___] गुनाह ( दोष ) तो लक्ष्मण का और क्रोध मुझपर करते हैं। कहीं कहीं सीधेपन में भी बड़ा दोष होता है। टेढ़ा जानकर सबलोग किसी की भी वंदना करते हैं; टेढ़े चन्द्रमा को राहू  भी नहीं ग्रसता।





राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा। कर कुठारु आगें यह सीसा।। जेहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी। मोहि जानिअ आपन अनुगामी।।___ अर्थ___ श्रीरामचन्द्रजी ने [ प्रकट ] कहा___ हे मुनीश्वर ! क्रोध छोड़िये। आपके हाथ में कुठार है और मेरा यह सिर आगे है। जिस प्रकार आपका क्रोध जाय, हे स्वामी ! वही कीजिये। मुझे अपना अनुचर ( दास ) जानिये।




प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रवर रोसु। बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु।।____ अर्थ___स्वामी और सेवक में युद्ध कैसा ? हे ब्राह्मणश्रेष्ठ ! क्रोध का त्याग कीजिये। आपका [ वीरों_ का_सा ] वेष देखकर ही बालक ने कुछ कह डाला था; वास्तव में उसका भी कोई दोष नहीं है।





देखि कुठार बान धनु धारी। भै लरिकहि रिस बीरु बिचारी।। नामु जान पै तुम्हहिं न चीन्हा। बंस सुभायँ उतरु तेहिं दीन्हा।।___अर्थ___आपको कुठार, बाण और धनुष धारण किये देखकर और वीर समझकर बालक को क्रोध आ गया। वह आपका नाम तो जानता था, पर उसने आपको पहचाना नहीं। अपने वंश ( रघुवंश ) के स्वभाव के अनुसार उसने उत्तर दिया।





जौं तुम्ह औतेहु मुनि की नाईं। पद रज सिर सिसु धरत गोसाईं।। छमहु चूक अनजानत केरी। चहिअ बिप्र उर कृपा घनेरी।।___ अर्थ___ यदि आप मुनि की तरह आते तो हे स्वामी ! बालक आपके चरणों की धूलि सिर पर रखता। अनजाने की भूल को क्षमा कर दीजिये। ब्राह्मणों के हृदय में बहुत अधिक दया होनी चाहिये।





हमहि तुम्हहि सरिबरि कसि नाथा। कहहु न कहाँ चरन कहँ माथा।। राम मात्र लघु नाम हमारा। परसु सहित बड़ नाम तोहारा।।___ अर्थ___ हे नाथ ! हमारी और आपकी बराबरी कैसी ? कहिये न, कहाँ चरण और कहाँ मस्तक ! कहाँ मेरा राममात्र छोटा_सा नाम और कहाँ आपका परशु सहित बड़ा नाम।





देव एकु गुनु धनुष हमारें। नव गुन परम पुनीत तुम्हारे।। सब प्रकार हम तुम्ह सन हारे। छमहु बिप्र अपराध हमारे।।___ अर्थ___ हे देव ! हमारे तो एक ही गुण धनुष है और आपके पास परम पवित्र [ शम, दम, तप, शौच, क्षमा, सरलता, ज्ञान, विज्ञान और आस्तिकता___ ये ] नौ गुण हैं। हम तो सब प्रकार से आपसे हारे हैं। हे विप्र ! हमारे अपराधों को क्षमा कीजिये।





बार बार मुनि बिप्रबर कहा राम सन राम। बोले भृगुपति सरुष हसि तहूँ बंधु सम बाम।।___ अर्थ____ श्रीरामचन्द्रजी ने परशुराम को बार_बार ‘मुनि’ और ‘विप्रवर’ कहा। तब भृगुपति ( परशुरामजी ) कुपित होकर [ अथवा क्रोध की हँसी_ हँसकर ] बोले___ तू भी अपने भाई के समान ही टेढ़ा है।





 निपटहिं द्विज करि जानहि मोही। मैं जस बिप्र सुनावउँ तोही।। चाप स्रुवा सर आहुति जानू। कोपु मोर अति घोर कृसानू।।___ अर्थ___ तू मुझे निरा ब्राह्मण ही समझता है ? मैं जैसा विप्र हूँ, तुझे सुनाता हूँ। धनुष को स्रुवा, बाण को आहुति और मेरे क्रोध को अत्यन्त भयंकर अग्नि जान।





समिधि सेन चतुरंग सुहाई। महा महीप भए पसु आई।। मैं एहि परसु काटि बलि दीन्हे। समर जग्य जप कोटिन्ह कीन्हे।।___अर्थ___ चतुरंगिणी सेना सुन्दर समिधाएँ ( यज्ञ में जलाई जानेवाली लड़कियाँ ) हैं। बड़े_ बड़े राजा उसमें आकर बलि के पशु हुए हैं, जिनको मैंने इसी फरसे से काटकर बलि दिया है। ऐसे करोड़ों जपयुक्त रणयज्ञ मैंने किये हैं ( अर्थात् जैसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक ‘स्वाहा’ शब्द के साथ आहुति दी जाती है, उसी प्रकार मैंने पुकार_पुकारकर राजाओं की बलि दी है। )।





मोर प्रभाउ विदित नहिं तोरें। बोलसि निदरि बिप्र के भोरें।। भंजेउ चापु दापु बड़ बाढ़ा। अहमिति मनहुँ जीति जगु ठाढ़ा।।___ अर्थ___मेरा प्रभाव तुझे मालूम नहीं है, इसी से तू ब्राह्मण के धोखे से मेरा निरादर करके बोल रहा है। धनुष तोड़ डाला, इससे तेरा घमण्ड बहुत बढ़ गया है। ऐसा अहंकार है, मानो संसार को जीतकर खड़ा है।





राम कहा मुनि कहहु बिचारी। रिस अति बड़ि लघु चूक हमारी।। छुअतहिं टूट पिनाक पुराना। मैं केहि हेतु करौं अपमाना।।____ अर्थ____ श्रीरामचन्द्रजी ने कहा______ हे मुनि ! विचारकर बोलिये। आपका क्रोध बहुत बड़ा है। और मेरी भूल बहुत छोटी है। पुराना धनुष था, छूते ही टूट गया। मैं किस कारण अभिमान करूँ ? 





जौं हम निदरहिं बिप्र बदि सत्य सुनहु भृगुनाथ। तो अस को जग सुभटु जेहि भय बस नावहिं माथ।।____ अर्थ____ हे भृगुनाथ ! यदि हम सचमुच ब्राह्मण कहकर निरादर करते हैं, तो यह सत्य सुनिये, फिर संसार में ऐसा कौन योद्धा है जिसे हम डरके मारे माथा नवायें ?





 देव दनुज भूपति भट नाना। समबल अधिक होउ बलवाना।। जौ रन हमहि पचारै कोऊ। लरहिं सुखेन कालु किन होऊ।।___ अर्थ____ देवता, दैत्य, राजा या बहुत_से योद्धा, वे चाहे बल में हमारे बराबर हों चाहे अधिक बलवान् हों, यदि हमें रण में कोई भी ललकारे तो हम उससे सुखपूर्वक लड़ेंगे, चाहे काल ही क्यों न हो ?





छत्रिय रवि धरि समर सकाना। कुल कलंकु तेहिं पावँर आना।। कहउँ सुभाउ न कुलहिं प्रसंसी। कालहुँ डरहिं न रन रघुबंसी।।____ अर्थ___क्षत्रिय का शरीर धर कर जो युद्ध में डर गया, उस नीच ने अपने कुल पर कलंक लगा लिया। मैं स्वभाव से ही कहता हूँ, कुल की प्रशंसा करके नहीं, कि रघुवंशी रण में काल से भी नहीं डरते।





बिप्रबंस कै असि प्रभुताई। अभय होइ जो तुम्हहिं डेराई।। सुनि मृदु गूढ़ बचन रघुपति के। उघरे पटल परसुधरमति के।।___ अर्थ___ ब्राह्मणवंश की ऐसी ही प्रभुता ( महिमा ) है कि जो आपसे डरता है, वह सबसे निर्भय हो जाता है [ अथवा जो भयरहित होता है वह भी आपसे डरता है ]। श्रीरघुनाथजी के कोमल और रहस्यपूर्ण वचन सुनकर परशुरामजी का बुद्धि के परदे खुल गये।





राम रमापति कर धनु लेहू। खैंचहु मिटै मोर संदेहू।। देत चापु आपुहिं चलि गयऊ। परसुराम मन बिसमय भयऊ।।___ अर्थ___[ परशुरामजी ने कहा___] हे राम ! हे लक्ष्मीपति ! धनुष को हाथ में [ अथवा अथवा लक्ष्मीपति विष्णु का धनुष ] लीजिये और इसे खींचिये, जिससे मेरा संदेह मिट जाय। परशुरामजी धनुष लेने लगे, तब वह आप ही चला गया। तब परशुरामजी के मन में बड़ा आश्चर्य हुआ।





जाना राम प्रभाउ तब पुलक प्रफुल्लित गात। जोरि पानि बोले बचन हृदयँ न प्रेम अमात।।___ अर्थ___ तब उन्होंने श्रीरामजी का प्रभाव जाना, [ जिसके कारण ] उसका शरीर पुलकित और प्रफुल्लित हो गया। वे हाथ जोड़कर वचन बोले___ प्रेम उनके हृदय में नही समाता था।





जय रघुबंस बनज बन भानू। गहन दनुज कुल दहन कृसानू।। जय सुर बिप्र धेनु हितकारी। जय मद मोह कोह भ्रम हारी।।___ अर्थ____ हे रघुकुलरूपी कमलवन के सूर्य ! हे राक्षसों के कुलरूपी घने जंगल को जलानेवाले अग्नि ! आपकी जय हो ! हे देवता, ब्राह्मण और गौ का हित करनेवाले ! आपकी जय हो !  हे मद, मोह, क्रोध और भ्रम के हरनेवाले ! आपकी की जय हो।





बिनय सील  करुना गुन सागर। जयति बचन रचना अति नागर।। सेवक सुखद सुभग सब अंगा।। जय सरीर छबि कोटि अनंगा।।___ हे विनय, शील, कृपा आदि गुणों के समुद्र और वचनों की रचना में अत्यन्त चतुर ! आपकी जय हो। हे सेवकों के सुख देनेवाले, सब अंगों से सुन्दर और शरीर में करोड़ों कामदेव की छबि धारण करनेवाले ! आपकी जय हो !





 करौं काह मुख एक प्रसंसा। जय महेस मन मानस हंसा।। अनुचित बहुत कहेउँ अग्याता। छमहु छमामन्दिर दोष भ्राता।।____ अर्थ___ मैं एक मुख से आपकी क्या प्रशंसा करूँ ? हे महादेवजी के मनरूपी मानसरोवर के हंस ! आपकी जय हो ! मैंने अनजान आपको बहुत_से अनुचित वचन कहे। हे क्षमा के मन्दिर दोनों भाई ! मुझे क्षमा के मन्दिर दोनों भाई ! मुझे क्षमा कीजिये।





 कहि जय जय जय रघुकुलकेतू। भृगुपति गए बनहि तप हेतू।। अपभयँ कुटिल महीप डेराने। जहँ तहँ कायर गवँहि पराने।।___ अर्थ____ हे रघुकुल के पताकास्वरूप श्रीरामचन्द्रजी ! आपकी जय हो, जय हो, जय हो। ऐसा कहकर परशुरामजी वन में तप को चले गये। [ यह देखकर ] दुष्ट राजालोग बिना ही कारण के ( मनःकल्पित ) डर से ( रामचन्द्रजी से तो परशुरामजी भी हार गये, हमने इनका अपमान किया था, अब कहीं ये उसका बदला न लें, इस व्यर्थ के डर से ) डर गये, वे कायर चुपके से जहाँ_तहाँ भाग गये।





देवन्ह दीन्हीं  दुंदुभीं प्रभु पर बरसहिं फूल। हरषे सुर नर नारि सब मिटी मोहमय सूल।।___ अर्थ___ देवताओं ने नगाड़े बजाये, वे प्रभु के ऊपर फूल बरसाने लगे। जनकपुर के स्त्री_पुरुष सब हर्षित हो गये। उनका मोहमय ( अज्ञान से उत्पन्न ) शूल मिट गया।










Wednesday, 15 January 2020

बालकाण्ड

मनहिं   मन मानव अकुलानी। होहु प्रसन्न महेस भवानी।। करहु सफल आपनि सेवकाई। करि हितु हरहु चाप गरुआई।।___ अर्थ___ वे व्याकुल होकर मन_ही_मन कह रही हैं___ हे शिव_पार्वती मुझपर प्रसन्न होइए। मैंने आपकी जो सेवा की है, उसे सफल करिए और हित करके धनुष का भारीपन हर लीजिए।

गननायक बरदायक देवा। आजु लगें कीन्हिउ तुअ सेवा।। बार बार बिनती सुनि मोरी। करहु चाप गुरुता अति थोरी।।___ अर्थ____ हे वर देनेवाले देवता गणेशजी ! आजतक मैंने इसी हेतु आपकी सेवा की थी। बारम्बार मेरी विनती सुनकर धनुष का भारीपन कम कर दीजिए।

देखि देखि रघुवीर तन, सुर मनाव धरि धीर। भरे बिलोचन प्रेम जल, पुलकावली शरीर।।___ अर्थ___ वे रामजी को देखकर, धीरज धरकर देवताओं को मनाने लगीं। उनके नेत्रों में प्रेमजल भर आया और शरीर रोमांचित हो गया।

नीकें निरखि नयन भरि सोभा। पितु पनु सुमिरि बहुरि मनु छोभा।। अहह तात दारुनि हठ ठानी। समुझत नहिं कछु लाभु न हानी।।___ अर्थ___भली_ भाँति नेत्र भरकर रामजी की शोभा को देखकर पिता के प्रण को स्मरण करके उनका मन क्षुब्ध हो गया। अहो ! पिताजी ने कठिन हठ ठानी है, वे कुछ लाभ और हानि नहीं समझते।



सचिव सभय सिख देइ न कोई। बुध समाज बड़  अनुचित होई।। कहँ धनु कुलिसहु चाहि कठोरा। कहँ स्यामल मृदुगात किसोरा।।___ अर्थ___मन्त्री भी डर के मारे कोई सीख नहीं देते, बुधजनों की सभा में यह बड़ा अनुचित हो रहा है। कहाँ तो यह बज्र से भी अधिक कठोर धनुष और कहाँ यह श्यामसुन्दर कोमल अंग के किशोर।



बिधि केहि भाँति धरौं उर धीरा। सिरस सुमन कन बेधिअ हीरा।। सकल सभा कै मति भई भोरी। अब मोहि सम्भु चाप गति तोरी।।___ अर्थ____ हे विधाता ! मैं किस प्रकार मन में धीरज धरूँ, सिरस के फूल से हीरा कैसे बेधा जायगा ? सारी सभा की बुद्धि भूल गयी है। अत: हे शिव_धनुष ! अब मैं तेरी ही शरण हूँ।




निज जड़ता लोगन्ह पर डारी। होहि हरुअ रघुपतिहि निहारी।। अति परिताप सीय मन माहीं। लव निमेष जुग सम जाहीं।।___ अर्थ___अपनी कठोरता लोगों पर डालकर, श्रीरामचन्द्रजी को देखकर हल्के हो जाओ। इस प्रकार सीताजी के मन में बहुत दुःख हुआ, लव निमेष मात्र भी युग के समान हारने लगा।



प्रभुहि चितइ पुनि चितव महि, राजत लोचन लोल। खेलत मनसिज मीन जुग, जनु बिधु मंडल डोल।।___ अर्थ___प्रभु रामजी की ओर देख फिर पृथ्वी की ओर देखती हुई श्रीजानकीजी के चंचल नेत्र ऐसे शोभायमान हो रहे हैं मानो चन्द्रमण्डल रूपी डोल में कामदेव की दो मछलियाँ खेल रही हों।



गिरा अलिनि मुख पंकज रोकी। प्रगट न लाज निसा अवलोकी।। लोचनु जलु रह लोचन कोना। जैसें परम कृपन कर सोना।।___ अर्थ____सीताजी के मुखरूपी कमल ने लाजरूपी रात्रि को देखकर वाणरूपी भ्रमर को रोक लिया है। नेत्रों का जल नेत्रों के कोने में ही रह गया है जैसे किसी कंजूस का सोना कोने में ही गढ़ा रह जाता है।



सकुची व्याकुलता बड़ि जानी। धरि धीरजु प्रतीति उर आनी।। तन मन बचन मोर पनु साचा। रघुपति पग  सरोज चितु राचा।।___ अर्थ___सीताजी अपनी घबराहट जानकर सकुचाईं फिर मन में धीरज कर विश्वास ले आईं कि यदि तन, मन और वचन से मेरा प्रण सच्चा है और रघुनाथजी के चरणारविन्दों में मेरा मन वास्तव में लगा है।



तौं भगवानु सकल उर बासी। करिहि मोहि रघुबर की दासी।। जेहि कें जेहि पर सत्य सनेहू। सो तेहि मिलइ न कुछ संदेहू।।____ अर्थ___तो सबके हृदय में बास करनेवाले भगवान मुझे रघुनाथजी की दासी बनायेंगे जिसका जिस पर सच्चा स्नेह होता है, वह उसको मिलता ही है, इसमें कुछ संदेह नहीं।



प्रभु तन चितइ प्रेम तन ठाना। कृपानिधान रामु सब जाना।। सियहि बिलोकि तकेउ धनु कैसें। चितव गरुड़ लघु ब्यालहिं जैसें।।___ अर्थ____सीताजी ने प्रभु रामचन्द्रजी की ओर देखकर प्रेम का पन ठान लिया। कृपानिधान रामचन्द्रजी ने सब जान लिया और सीताजी को देखकर धनुष को ऐसे देखा जैसे गरुड़ छोटे साँप को देखता है।




लखन लखेउ रघुबंसमनि, ताकेउ हर कोदण्डु।। पुलकि गति बोले बचन, चरन चापि ब्रह्मण्डु।।____ अर्थ___लक्ष्मणजी ने देखा कि श्रीरामचन्द्रजी ने शिवजी के धनुष की ओर ताका है, तब पुलकित हो पृथ्वी को चरणों से दबाकर यह बोले___



दिसिकुंजरहु कमठ अहि कोला। धरहु धरनि धरि धीर न डोला।। रामु चहहिं संकर धनु तोरा। होहु सजग सुनि आयसु मोरा।।___ अर्थ___ हे दिग्गजों ! हे कच्छप ! हे शेषनाग ! हे बराह ! तुम सब धीरज कर कर पृथ्वी को धारण किये रहो, यह डोलने न पावे। श्रीरामजी धनुष तोड़ना चाहते हैं। मेरी आज्ञा सुन तुम सब सावधान हो जाओ।



चाप समीप रामु जब आए। नर नारिन्ह सुर सुकृत मनाए।। सब कर संसउ अरु अज्ञानू। मन्द महीपन्ह कर अभिमानू।।___अर्थ____ धनुष के पास जब रामचन्द्रजी आए तब सब स्त्री_पुरुषों का संदेह और अज्ञान, मूर्ख राजाओं का अभिमान।



भृगुपति केरि गरब गरुआई। सुर मुनिबरन्ह केरि कदराई।। सिय कर सोचु जनक पछितावा। रानिन्ह कर दारुन दुख दावा।।___ अर्थ____ परशुरामजी के अहंकार की गुरुता, देवताओं और मुनिश्वरों की घबराहट, सीताजी का सोच, जनक का पछतावा और रानियों की कठिन दुखरूपी दावानल।




सम्भुचाप बड़ बोहितु पाई। चढ़े जाइ सब संगु बनाई।। राम बाहुबल सिंधु अपारू। चहत पारु नहिं कोउ कड़हारू।।___ अर्थ___ यह सब शिवजी के धनुषरूपी बड़े जहाज को पाकर एक साथ उसपर जा चढ़े। वे रामचन्द्रजी के भुजाओं के बलरूपी अपार समुद्र के पार जाना चाहते हैं, पर कोई मल्लाह नहीं है।



राम बिलोके लोग सब, चित्र लिखे से देखि। चितई सीय कृपायतन, जानी बिकल बिसेषि।।___ अर्थ___श्रीरामजी ने सब लोगों को देखा तो उन्हें चित्रलिखे से देखकर कृपानिधान ने सीताजी की ओर देखा तो उन्हें बहुत ही बेचैन जाना।



देखी बिपुल बिकल बैदेही। निमिष बिहात कलप सम तेही।। तृषित बारि बिनु जो तनु त्यागा। मुएँ करइ का सुधा तड़ागा।।___ अर्थ___ उन्होंने सीताजी को बहुत ही विकल देखा। उनका एक_एक क्षण कल्प के समान बीत रहा था। प्यासे ने यदि बिना जल पिये ही शरीर छोड़ दिया हो तो मर जाने पर अमृत की तालाब भी क्या करेगा?



का बरषा जब कृषी सुखानें। समय चुकें पुनि का पछितानें।। अस जियँ जानि जानकी देखी। प्रभु पुलके लखि प्रीति बिसेषी।।___ अर्थ___ जब खेती सूख जाय तब वर्षा से क्या लाभ ? ऐसा जी में जानकर  धनुष को देख, उनकी अधिक प्रीति समझ प्रभु रामचन्द्रजी पुलकायमान हुए।



गुरहि प्रणाम मनहिं मन कीन्हा। अति लाघवँ उठाइ धनु लीन्हा। दमके दामिनि जिमि जब लयऊ। पुनि नभ धनुमंडल सम भयऊ।।___ अर्थ___ गुरु को मन_ही_मन प्रणाम किया और बहुत फुर्ती से धनुष को उठा लिया। जब उसे हाथ में लिया तो वह बिजली के समान चमका, फिर धनुष आकाश में मण्डलाकार हो गया।



लेत चढ़ावत खैंचत गाढ़ें। काहुँ न लखा देखि सब ठाढ़ें। तेहि छन मध्य राम धनु तोरा। भरे भुवन धुनि घोर कठोरा।।___ अर्थ___ धनुष को लेते, चढ़ाते और दृढ़ता से खींचते हुए किसी ने नहीं देखा, सबने रामजी को खड़े ही देखा, उसी क्षण रामचन्द्रजी ने धनुष को तोड़ दिया। उसकी घोर ध्वनि संसार में भर गई।



भरे भुवन घोर कठोर रव रबि बाजि तजि मारगु चले। चिक्करहिं दिग्गज डोल महि अहि कोल कूरुम कलमले।। सुर असुर मुनि कर कान दीन्हें सकल बिकल बिचारहिं। कोदण्ड खण्डेउ राम तुलसी जयती बचन उचारहिं।।____ अर्थ___ संसार में घोर शब्द भर गया, सूर्य के,घोड़े मार्ग छोड़कर चलने लगे, दिग्गज चिघ्घाड़ने व पृथ्वी जिसने लगी, शेष, कच्छप और बराह कलमलाने लगे। देवता, असुर, मुनिजन सब कानों पर हाथ दे बेचैन होकर बिचारने लगे। तुलसीदासजी कहते हैं कि जब प्रभु ने धनुष तोड़ डाला तो सब जयजयकार करने लगे।



संकर चापु जहाजु, सागरु रघुबर बाहुबल। बूड़ सो सकल समाजु, चढ़ा जो प्रथमहिं मोहबस।।___ अर्थ____शिवजी का धनुष जहाज है और रामचन्द्रजी की भुजाओं राजा बल समुद्र है। धनुष टूटने से वह सब समाज डूब गया जो मोहवश पहले इस जहाज पर चढ़ा था।



प्रभु दोउ चापखंड महि डारे। देखि लोग सब भए सुखारे।। कौसिक रूप पयोनिधि पावन। प्रेम बारि अवगाहु सुहावन।।___ अर्थ____प्रभु ने दोनों खण्ड पृथ्वी पर फेंक दिये। यह देखकर सब लोग सुखी हुए। विश्वामित्ररूपी पवित्र समुद्र में प्रेमरूपी जल भरा है।



रामरूप राकेसु निहारी। बढ़त बीचि पुलकावलि भारी।। बाजे नभ गहगहे निसाना। देवबधू नाचहिं करि गाना।।___ अर्थ___ रामरूपी चन्द्रमा को निहारकर पुलकावली रूपी ऊँची तरंगें बढ़ने लगीं। आकाश में आनन्द के नगाड़े बजने लगे। देवांगनाएँ गीत गा_गाकर नाचने लगीं।



ब्रह्मादिक मुनि सिद्ध मुनीसा। प्रभुहिं प्रसंसहिं देहिं असीसा।। बरिसहिं सुमन रंग बहु माला। गावहिं किन्नर गीत रसाला।।____ अर्थ____ ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और मुनीश्वर प्रभु की बड़ाई करने लगे,और आशीर्वाद देने लगे और अनेक रंग की पुष्प मालाएँ बरसाने लगे, किन्नर गण रसीले गीत गाने लगे।



रही भुवन भरि जय जय बानी। धनुष भंग धुनि जात न जानी।। मुदित कहहिं जहँ तहँ नर नारी। भंजेउ राम सम्भु धनु भारी।।___ अर्थ____ संसार में जयजयकार की ध्वनि छा गयी। जिससे धनुषभंग की ध्वनि नहीं जानी जाती। आनंदित होकर जहाँ_ तहाँ स्त्री_पुरुष कहने लगे कि रामचन्द्रजी ने भारी शिवधनुष तोड़ दिया।



बन्दी मागध सूतगन, बिरुद बदहिं मतिधीर। करहिं निछावरि लोग सब, हय गय मनि चीर।।___ अर्थ____ चतुर भाट, मागध और सूत कीर्ति बखानने लगे और सब लोग घोड़ा, हाथी, मनि धन और वस्त्र निछावर करने लगे।



झाँझि मृदंग संख सहनाई। भेरि ढोल दुन्दुभी सुहाई।। बाजहिं बहु बाजने सुहाये। जहँ तहँ जुबतिन्ह मंगल गाये।।___ अर्थ___झाँझ, मृदंग, शंख, नफिरी, तुरही, ढोल, नगाड़े आदि सुन्दर बाजे बजने लगे और जहाँ_ तहाँ युवतियों ने मंगल गीत गाये।



सखिन्ह सहित हरषी अति रानी। सूखत धान परा जनु पानी।। जनक लहेउ सुखु सोचु बिहाई। पैरत थके थाह जनु पाई।।____ अर्थ____ सखियों सहित रानी प्रसन्न हुईं मानो सूखते हुए धान पर पानी पड़ गया हो। राजा जनक ने शोक छोड़कर ऐसा सुख पाया माने थके हुए तैरनेवाले मे थाह पा ली हो।



श्री हत भए भूप धनु टूटे। जैसें दिवस दीप छबि छूटे।। सीय सुखहि बरनिअ केहि भाँती।। जनु चातकी पाइ जनु स्वाती।।___ अर्थ___धनुष टूटने पर राजा लोग ऐसे कांतिहीन हुए जैसे दिन में दीपक की शोभा जाती रहती है। सीताजी का सुख किस भाँति वर्णन किया जाय ?  जैसे चातकी स्वाति का जल पी गई हो।



रामहि लखन बिलोकत कैसें। ससिहि चकोर किसोरकु जैसें।। सतानन्द तब आयसु दीन्हा। सीताँ गमनु राम पहिं कीन्हा।।___अर्थ____ रामचन्द्रजी को लक्ष्मणजी ऐसे देखने लगे जैसे चन्द्रमा को चकोर का बच्चा देखता है। सतानंदजी ने आज्ञा दी तो सीताजी रामचन्द्रजी के पास चलीं।



संग सखीं सुन्दर चतुर, गावहिं मंगलचार। गवनी बाल मरालगति, सुषमा अंग अपार।।___ अर्थ____साथ में सुन्दर चतुर सखियाँ मंगल गीत गाती हुई जा रहीं हैं, सीताजी बाल_ राजहंसिनी की चाल चलीं, उनके अंगों में अपार शोभा थी।



सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसें। छबिगन मध्य महाछबि जैसें।। कर सरोज जयमाल सुहाई। विश्वविजय शोभा जनु पाई।।____ अर्थ___सखियों के बीच में सीताजी ऐसे सुशोभित हो रही थीं जैसे सुन्दरताओं के बीच महा सुन्दरता हो। कर_ कमलों में सुन्दर जयमाल थीं, जिसमें संसार विजय की शोभा छा रही थी।



तन सकोच मन परम उछाहू। गूढ़ प्रेम लखि परइ न काहू।। जाइ समीप राम छबि देखी। रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी।।___ अर्थ___शरीर में लाज तथा बहुत उमंग थी, यह गुप्त प्रेम किसी को जान नहीं पड़ता। निकट जानकर रामचन्द्रजी की शोभा देखकर राजकुमारी जानकीजी चित्र में लिखी सी रह गईं।



चतुर सखीं लखि कहा बुझाई। पहिरावहु जयमाल सुहाई।। सुनत जुगल कर माल उठाई। प्रेम बिबस पहिराइ न जाइ।।___ अर्थ____ यह दशा देखकर चतुर सखी ने समझाकर कहा__सुन्दर जयमाला पहना दो। सुनते ही दोनों हाथों से माला उठाई पर प्रेम के वश पहनाई नहीं जाती।



सोहत जनु जुग जल जल नाला। ससिहि सभीत देत जयमाला।। गावहिं छबि अवलोकि सहेली। सियँ जयमाल राम उर मेली।।___ अर्थ___ऐसी शोभा हुई मानो डंडियों सहित दो कमल संकुचित होकर चन्द्रमा को जयमाला दे रहे हों। ऐसी शोभा देख सखियाँ जाने लगीं। तब सीताजी ने जयमाला श्रीरामचन्द्रजी के गले में पहना दी।



रघुबर उर जयमाल, देखि देव बरसहिं सुमन। सकुचे सकल भुआल, जनु बिलोकि रबि कुमुदगन।।___ अर्थ___ रामचन्द्रजीकेे हृदय पर जयमाला देखकर देवता पुष्प बरसाने लगे और राजालोग ऐसे सकुचाये जैसे सूर्य को देखकर नलिनियों का समूह मुरझा जाता है।



पुर अरु ब्योम बाजने बाजे। खल भए मलिन साधु सब राजे।। सुर किन्नर नर नाग मुनीसा। जय जय जय कहि देहिं असीसा।।___ अर्थ___नगर और आकाश में बाजे बजने लगे, दुष्ट उदास और सब सज्जन प्रसन्न हुए। देवता, किन्नर, मनुष्य, नाग और मुनीश्वर जय_जयकार कर आशीर्वाद देने लगे।



नाचहिं गावहिं बिबुध बधूटीं। बार बार कुसुमांजलि छूटीं।। जहँ बिप्र बेद धुनि करहीं। बन्दी बिरिदावली उच्चरहीं।। अर्थ___ देवताओं की स्त्रियाँ नाचने लगीं और बारम्बार पुष्पों की वर्षा करने लगीं। जहाँ_ तहाँ ब्राह्मण वेद ध्वनि करने लगे, भाट वंश का गान करने लगे।



महि पाताल नाल जसु ब्यापा। राम बरी सिय भंजेउ चापा।। करहिं आरति पुर नर नारी। देहिं निछावरि बित्त बिसारी।।___ अर्थ___ भूमि, पाताल, स्वर्ग में यश छा गया कि रामचन्द्रजी ने धनुष को तोड़ा है और सीताजी को वर लिया। नगर के स्त्री_ पुरुष से अधिक न्यौछावर देने लगे।



सोहति सीय राम कै जोरी। छबि सिंगारु मनहुँ एक ठोरी।। सखी कहहिं प्रभु पद गहु सीता। कर तिन चरन परस अति भीता।।___ अर्थ___ श्रीसीतारामजी की जोड़ी ऐसे सोहती थी मानो शोभा और श्रृंगार एकत्र हुए हों। सखियों ने कहा___ सीता ! प्रभु के चरण छुओ। परन्तु सीताजी बहुत डरकर चरण नहीं छूतीं।



गौतम नारि गति सुरति करि, नहिं परसति पग पानि। मन बिहसे रघुबंसमनि, प्रीति अलौकिक जानि।।___ अर्थ___  गौतम ऋषि की स्त्री अहल्या की गति की स्मरण करके वे रामचन्द्रजी के चरणों को हाथ से नहीं छूती, इस अनोखी प्रीति को जानकर रघुवंशमनि श्रीरामचन्द्रजी मन में हँसे।



तब समय देखि भूप अभिलाषे। कूर कपूत मूढ़ मन माखे।। उठि उठि पहिरि सनाह अभागे। जहँ तहँ गाल बजावन लागे।।___ अर्थ___ उस समय सीताजी को देख कुछ राजा ललचा उठे। वे दुष्ट, कपूत और मूर्ख मन में डाह करने लगे। वे अभागे उठ_उठकर कवच आदि टजहाँ_तहाँ गाल बजाने लगे।



लेहु छड़ाइ सीय कह कोऊ। धरि बाँधहु नृप बालक दोऊ।। तोरें धनुषु चाह नहिं सरई। जीवत हमहिं कुअँरि को बरई।।___ अर्थ___कोई बोले_सीताजी को छीन लो और दोनों राजकुमारों को पकड़कर बाँध लो। धनुष तोड़ डालने से ही इच्छा पूरी नहीं होगी, हमारे जीते_ जी कौन राजकुमारी को ब्याह सकता है ?



जौं बिदेहु कछु करै सहाई। जीतहु समर सहित दोउ भाई।। साधु भूप बोले सुनि बानी। राजसमाजहिं लाज लजानी।।___ अर्थ___ यदि राजा जनक कुछ सहायता करें तो दोनों भाइयों सहित युद्ध में उन्हें जीत लो। यह बात सुनकर साधु राजा बोले___ इस राजसभा में को लाज भी लजा गई है।



बलु प्रतापु, वीरता बड़ाई। नाक पिनाकहिं संग सिधाई।। सोइ सूरता कि अब कहुँ पाई। असि बुधि तौ बिधि मुँह मसि लाई।।___ अर्थ___बल, प्रताप, वीरता, बड़ाई और मर्यादा ये सब धनुष के साथ ही चले गए। वही शूरता थी या अब कहीं से पागए ? ऐसी दुष्ट बुद्धि है तभी तो ब्रह्मा ने तुम्हारे मुख पर स्याही लगा दी।



देखहु रामहि नयन भरि, तजि रिष मदु कोहु। लखन रोष पावक प्रबल, जानि सलभ जनि होहु।।___ अर्थ___ बार घमण्ड और क्रोध छोड़कर नेत्र भर रामचन्द्रजी को देख लो। लक्ष्मणजी के क्रोध को,प्रचंड अग्नि जानकर पतंगे मत बनो।



बैनतेय बलि जिमि चह कागू। जिमि ससु चहै नागअरि भागू।। जिमि चह कुसल अकारन कोही। सब संपदा चहै सिवद्रोही।।___ अर्थ__ जैसे गरुड़ का भाग कौआ चाहे, बिना कारण क्रोध करनेवाला कुशलता चाहे और शिवजी का बैरी सुख_दुःखादि संपदा चाहे।



लोभी लोलुप कल कीरति चहई। अकलंकता की कामी लहई।। हरि पद बिमुख परम गति चाहा। बस तुम्हार लालच नरनाहा।।___ अर्थ___ लोभी_ लालची सुन्दर कीर्ति चाहे, कामी पुरुष क्या निष्कलंकता पा सकता है ? श्रीहरि के चरणों से विमुख मुक्ति चाहे, हे राजाओं ! वैसे ही तुम्हारा लालच व्यर्थ है।



कोलाहलु सुनि सीय सकानी। सखी लबाई गईं जहँ रानी।। रामु सुभायँ चले गुरु पाहीं। सिय सनेह बरनत मन माहीं।।___ अर्थ___राजाओं का हल्ला सुनकर सीताजी डर गयीं। सब सखियाँ वहाँ लिवा ले गईं जहाँ रानी थीं। रामजी सीधे स्वभाव से सीताजी की मन में बड़ाई करते हुए गुरुजी के पास चले।



रानिन्ह सहित सोच बस सीया। अबधौं बिधिहि काह करनीया।। भूप बचन सुनि इतने उर तकहिं। लषनु राम डर बोलि न सकहीं।।___ _ अर्थ____ रानियों सहित सीताजी सोचविचार में पड़ गईं कि न जाने विधाता को और क्या करना है ? राजाओं की बातचीत सुनकर लक्ष्मणजी इधर_ उधर देखने लगे, पर रामजी के डर से कुछ नहीं कह सकते।



अरुन नयन भृकुटी कुटिल, चितवत नृपन्ह सकोप। मनहुँ मत्त गजगन निरखि, सिंघ किसोरहिं चोप।।___ अर्थ____उनके नेत्र लाल और भौंहें टेढ़ी हो गईं और वे राजाओं को क्रोध से देखने लगे, रामजी के डर से कुछ कह नहीं सकते।



खरभरु देखि बिकल पुर नारीं। सब मिलि देहिं महीपन्ह गारीं।। तेहि अवसर सुनि सिव धनु भंगा। आयऊ भृगुकुल कमल पतंगा।।___ अर्थ___ हलचल देखकर नगर की स्त्रियाँ बेचैन हो गईं और वे राजाओं को गालियाँ देने लगीं। उसी समय शिव_ धनुष का टूटना सुनकर भृगुकुलरूपी कमल के सूर्य परशुरामजी आए।



देखि मुनिहि सकल सकुचाने। बाज झपट जनु लवा लुकाने।। गौरि सरीर भूति भल भ्राजा। भाल बिसाल त्रिपुण्ड बिराजा।।___ अर्थ___उन्हें देखकर राजालोग सकुचा गये जैसे बाज की झपट से बटेर छिप जाते हैं। गोरे शरीर में सुन्दर विभूति शोभायमान है और चौड़े मस्तक पर त्रिपुण्ड विराजमान है।



सीस जटा ससि बदनु सुहावा। रिस बस कछुक अरुन होइ आवा।। भृकुटी कुटिल नयन रिस राते। सहजहुँ चितवत मनहुँ रिसाते।।___ अर्थ____ सिर पर जटाजूट है और मुखचन्द्र क्रोध से कुछ लाल हो गया है। भौंहें टेढ़ी और नेत्र क्रोध से लाल हो रहे हैं। सहज ही देखते हैं तो भी ऐसा जान पड़ता है कि मानो क्रोध से भरे हैं।



बृषभ कन्ध उर बाहु बिसाला। चारु जनेउ माल मृगछाला।। कटि मुनिबसन तून दुई बाँधे। धनु सर कर कुठार कल काँधे।।___ अर्थ___बृषभ_के से ऊँचे कंधे, चौड़ी छाती, लम्बी भुजाएँ, सुन्दर जनेऊ और माला पहने हैं तथा मृगछाला लिये हैं। कमर में मुनिवस्त्र पहने, दो तर्कस बाँधे, धनुषबाण हाथ में लिये सुन्दर फरसा कंधे पर है।



सांत बेषु करनी कठिन, बरनि न जाइ सरूप। धरि मुनि तनु जनु बार रसु, आयउ जहँ सब भूप।।___अर्थ___शान्त बेष है, पर करनी कठिन है, स्वरूप का वर्णन नहीं किया जा सकता। जहाँ सब राजा थे वहाँ मानो वीररस ही मुनि_ शरीर धारण करके आया है।



देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।। पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दण्ड प्रणामा।।___ अर्थ____ परशुरामजी का भयानक रूप देखकर सब राजा घबरा उठे और पिता समेत अपना_ अपना नाम कह_कहकर सब दण्डवत् प्रणाम करने लगे।



जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खटानी।। जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बुलाइ प्रनामु करावा।।___ अर्थ___जिसे हितू जानकर भी साधारण दृष्टि से देखते, वह जानता कि मेरी आयु बीत गई। फिर जनकजी ने आकर सिर नवाया और सीताजी को बुलाकर प्रणाम कराया।



आसिष दीन्हि सखी हरषानी। निज समाज लै गईं सयानी।। बिश्वामित्र मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।।___ अर्थ___ परशुरामजी ने आशीर्वाद दिया। चतुर सखी प्रसन्न हुईं और अपने साथ जानकीजी को ले गईं। फिर विश्वामित्रजी आकर मिले और दोनों भाइयों से मुनि के चरण कमलों को प्रणाम कराया।



रामु लखन दशरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।। रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।___ अर्थ____ ये राम_ लक्ष्मण महाराज दशरथ के पुत्र हैं। उनकी सुन्दर जोड़ी देखकर आशीर्वाद दिया। कामदेव के अभिमान को दूर करनेवाले रामचन्द्रजी के रूप को नेत्रों से देख स्तंभित रह गये।



बहुरि बिलोकि बिदेह सन, कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि, व्यापेउ कोपु सरीर।।___ अर्थ____फिर राजा जनक की ओर देखकर बोले___ कहो ! यह भीड़ क्यों है। जानकर भी अज्ञानी की तरह पूछते हुए शरीर में क्रोध भर आया।



समाचार कहि जनक सुनाये। जेहि कारन महीप सब आये।। सुनत बचन फिरि अनंत निहारे। देखे चापखण्ड मही डारे।।___ अर्थ___ तब राजा जनक ने सब हाल कह सुनाया कि जिस कारण सब राजा इकट्ठे हुए थे। उनके बचन सुनकर फिर दूसरी ओर देखा तो धनुष के दो खण्ड पृथ्वी पर पड़े हुए देखे।



अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहँ लहि तब राजू।।___ अर्थ____बड़े क्रोध से कठोर बचन बोले____रे मूर्ख जनक ! कह धनुष किसने तोड़ा है ? रे मूढ़ ! उसे जल्दी दिखा, नहीं तो आज ही जहाँ तक तेरा राज्य है वहाँ तक की पृथ्वी को उलट दूँगा।



अति डरु उतरु देत नृप नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।। सुर मुनि नाग नगर मर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी।।___ अर्थ___बड़े डर से राजा जनक उत्तर नहीं देते। यह देख कुटिल राजा अपने मन में प्रसन्न हुए और देवता, मुनि, नाग, नगर के स्त्री पुरुष सब अपने_ अपने मन में डरकर काँपने लगे।



मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी।। भृगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।।___ अर्थ___ सीताजी की माता मन में कहने लगीं कि ब्रह्मा ने बनी बनाई बात बिगाड़ दी।परशुरामजी का स्वभाव सुनकर सीताजी को आधा क्षण भी कल्प के बराबर लगा।



सभय बिलोके लोग सब, जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरष विषादु कछु, बोले श्रीरघुबीर।।___ अर्थ____ सब लोगों को डरे हुए देख और सीताजी को बेचैन जानकर, जिसके मन में हर्ष_विषाद कुछ भी नहीं है, ऐसे श्रीरामचन्द्रजी बोले__