Thursday, 18 August 2022

अयोध्याकाण्ड

सचिव नारि गुर नारि सयानी। सहित सनेह कहहिं मृदु बानी।। तुम्ह कहुं तौ न दीन्ह बनवासू। करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू।।_अर्थ_मंत्री सुमंत्रजी की पत्नी और गुरु वसिष्ठजी की पत्नी अरुंधतीजी तथा और भी चतुर स्त्रियां स्नेह के साथ कोमल वाणी से कहती हैं कि तुमको तो ( राजा ने ) वनवास दिया नहीं है। इसलिए जो ससुर, गुरु और सास कहें तुम वही करो।





सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि। सरद चंद चंदिनि लगत जनु चकइ अकुलानि।।_अर्थ_यह शीतल, हितकारी, मधुर और कोमल सीख सुनने पर सीताजी को अच्छी नहीं लगी। ( वे इस प्रकार व्याकुल हो गयीं ) मानो शरद् ऋतु के चन्द्रमा की चांदनी लगते ही चक‌‌ई व्याकुल हो उठी हो।





सीय सकुचबस उतरु न देई। सो सुनि तमकि उठी कैकेई।। मुनि पट भूषन भाजन आनी। आगे धरि बोली मृदु बानी।।_अर्थ_सीताजी संकोचवश उत्तर नहीं देतीं। इन बातों को सुनकर कैकेई तमककर उठी। उसने मुनियों के वस्त्र, आभूषण ( माला, मेखला आदि ) और बर्तन ( कमंडलु आदि ) लाकर श्री रामचन्द्रजी के सामने रख दिये और कोमल वाणी से कहा_





नृपहिं प्रानप्रिय तुम्ह रघुबीरा। सील सनेह न छाड़िहि भीरा।। सुकृतु सुजसु परलोक नसाऊ। तुम्हहिं जान बन कहिहिं न काऊ।।_अर्थ_हे रघुबीर ! राजा को तुम प्राणों के समान प्रिय हो। बीरु ( प्रेमवश दुर्बल हृदय के ) राजा शील और स्नेह नहीं छोड़ेंगे ! पुण्य, सुन्दर यश और परलोक चाहे नष्ट हो जाय, पर तुम्हें वन जाने को वे कभी न कहेंगे।





अस बिचारि सोई करहु जो भावा। राम जानि सिख सुनि सुख पावा ।। भूपहिं बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे।।_अर्थ_ ऐसा विचार कर जो तुम्हें अच्छा लगे वहीं करो। माता की सीख सुनकर श्रीरामचन्द्र जी ने ( बड़ा ) सुख पाया। परन्तु राजा को ये वचन बाण के समान लगे। ( वे सोचने लगे ) अब भी अभागे प्राण ( क्यों ) नहीं निकलते।





लोग बिकल मुरछित नरनाहू। काह करिय कछु सूझ न काहू।। रामु तुरत मुनि बेसु बनाई। चले जनक जननिहि सिरु नाई।।_अर्थ_राजा मूर्छित हो गये, लोग व्याकुल हैं। किसी को कुछ सूझ नहीं पड़ता कि क्या करें। श्रीरामचन्द्रजी स्त्री ( श्रीसीताजी ) और भाई ( लक्ष्मणजी ) सहित, ब्राह्मण और गुरु के चरणों की वन्दना करके सबको अचेत करके चले।




विकल बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े। देखे लोग बिरह दव दाढ़े।। कहि प्रिय बचन सकल समुझाए। बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए।।_अर्थ_राजमहल से निकलकर श्रीरामचन्द्रजी वसिष्ठ जी के दरवाजे पर जा खड़े हुए और देखा कि सब लोग बिरहा की अग्नि में जल रहे हैं। उन्होंने प्रिय वचन कहकर सबको समझाया। फिर श्रीरामचन्द्रजी ने ब्राह्मणों की मण्डली को बुलाया।





गुरु सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनयबस कीन्हे।। जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे।।_अर्थ_गुरुजी से कहकर उन सबको वर्षासन ( वर्षभर का भोजन ) दिये और आदर, दान तथा विनय से उन्हें वश में कर दिया। फिर याचकों को दान और मान देकर संतुष्ट किया तथा मित्रों को पवित्र प्रेम से प्रसन्न किया।





दासीं दास बोलाइ बहोरी। गुरहिं सौंपि बोले कर जोरी।। सब के साथ संभार गोसाईं। करहिं जनक जननी की नाई।।_अर्थ_फिर दास_दासियों को बुलाकर उन्हें गुरुजी को सौंपकर हाथ जोड़कर बोले_हे गोसाईं ! इन सबकी माता_पिता के समान सार_संभार ( देख_रेख ) करते रहियेगा।






बारहिं बार जोरि जुग पानी। कहत रामु सब सन मृदु बानी।। सोइ सब भांति मोर हितकारी। जेहिं में रहे भुआल सुखारी।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी बार_बार दोनों हाथ जोड़कर सबसे कोमल वाणी कहते हैं कि मेरा सब प्रकार से हितकारी मित्र वही होगा जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।





मातु सकल मोरे बिरहं जेहिं न होहिं दुख दीन। सोई उपाय तुम्ह  करेहु सब पुर जन परम प्रबीन।।_अर्थ_हे परम चतुर पुरबासी सज्जनों ! आपलोग सब वही उपाय करियेगा जिससे मेरी सब माताएं मेरे बिरह के दु:ख से दु:खी न हों।





एहि बिधि राम सबहिं समुझावा। गुर पद पदुम हरषि सिर नावा। गनपति गौरि गिरीसु मनाई। चले असीस पाई रघुराई।।_अर्थ_इस प्रकार श्रीरामजी ने सबको समझाया और हर्षित होकर गुरुजी के चरणकमलों में सिर नवाया। फिर गणेश जी, पार्वती जी और कैलाशपति महादेवजी को मनाकर तथा आशीर्वाद पाकर श्रीरघुनाथजी चले।





राम चलत अति भयउ बिषादू। सुनि न जाइ पुर आरत नादू ।। कुसगुन लंक अवध अति सोकू। हरष बिषाद बिबस सुरलोकू।।_अर्थ_श्रीरामजी के चलते ही बड़ा भारी विषाद छा गया। नगर का आर्तनाद ( हाहाकार ) सुना नहीं जाता। ल़ंका में बुरे शकुन होने लगे, अयोध्या में शोक छा गया और देवलोक में हर्ष तथा विषाद दोनों के वश में हो गये। ( हर्ष इस बात का था कि अब राक्षसों का नाश होगा और विषाद अयोध्यावासियों के शोक के कारण था )।




गई मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्र कहन अस लागे।। रामु चले वन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं।।_अर्थ_मूर्छा दूर हुई तब राजा जागे और सुमंत्र को बुलाकर ऐसा कहने लगे_श्रीराम वन को चले आते, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे हैं। न जाने किस सुख के लिए शरीर में टिक रहे हैं। 





एहि ते कवन व्यथा बलवाना। जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना।। पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू। लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू।।_अर्थ_इससे अधिक बलवती और कौन सी व्यथा होगी जिस दु:ख को पाकर प्राण शरीर को छोड़ेंगे। फिर धीरज धरकर राजा ने कहा_हे सखा ! तुम रथ लेकर श्रीरामजी के साथ जाओ।





सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि। रथ चढ़ाई देखराइ बनु फिरेहु गये दिन चारि।।।_अर्थ_अत्यन्त सुकुमार दोनों कुमारों को और सुकुमारी जानकी जी को रथ में चढ़ाकर, वन दिखलाकर चार दिन बाद लौट जाना।





जौं नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई। सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई।। तौं तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी। फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी।।_अर्थ_यदि धैर्यवान दोनों भाई न लौटें_क्योंकि श्रीरघुनाथजी प्रण के सच्चे और दृढ़ता से नियम का पालन करने वाले हैं_तो तुम हाथ जोड़कर विनती करना कि हे प्रभो ! जनककुमारी सीताजी को तो लौटा दीजिये।





जब सीय कानन देखि डेराई। कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई।। सासु ससुर अस कहेउ संदेसू। पुत्री फिरिअ बन बहुत कलेसू।।_अर्थ_जब सीता वन को देखकर डरें, तब मौका पाकर मेरी यह सीख उनसे कहना कि तुम्हारे सास और ससुर ने ऐसा संदेश कहा है कि पुत्री ! तुम लौट चलो, वन में बहुत क्लेश हैं। 





पितु गृह कबहुंक कबहुंक ससुरारी। रहेहु जहां रुचि होई तुम्हारी।। एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ तो होई प्राण अवलंबा।।_अर्थ_कभी पिता के घर, कभी ससुराल, जहां तुम्हारी इच्छा हो वहीं रहना। इस प्रकार तुम बहुत से उपाय करना। यदि सीताजी लौट आयीं तो मेरे प्राणों का सहारा हो जायगा।





नाहिंन तो मोर मरन परिनामा। कछु न बसाई भये बिधि बामा।। अस कहि मुरुछित परा महि राउ। राम लखन सीय आनि देखाऊ।।_अर्थ_नहिं तो अन्त में मेरा मरण ही होगा। विधाता के विपरीत होने पर कुछ वश नहीं चलता। हा ! राम, लक्ष्मण और सीता को लाकर दिखाओ। ऐसा कहकर राजा मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।





पाई रजायसु नाई सिरु रथु अति वेग बनाइ। गयी जहां बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ।।_अर्थ_सुमन्त्रजी राजा की आज्ञा पाकर, सिर नवाकर बहुत जल्दी रथ जुड़वाकर वहां गये जहां नगर के बाहर सीताजी सहित दोनों भाई थे। 





तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए। करि बिनती रथ रामु चढ़ाए।। चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई। चले हृदयं अवधहिं सिरु नाई।।_अर्थ_तब ( वहां पहुंचकर ) सुमंत्र ने राजा के वचन श्रीरामचन्द्रजी को सुनाए और विनती करके उनको रथ पर चढ़ाया। सीताजीसहित दोनों भाई रथ पर चढ़कर हृदय में अयोध्या को सिर नवाकर चले।





चलत राम लखि अवध अनाथा। विकल लोग सब लागे साथा।। कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं। फिरहिं प्रेमबस पुनि फिरि आवहीं।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी को जाते हुए और अयोध्या को अनाथ ( होते हुए ) देखकर सब लोग व्याकुल होकर उनके साथ हो लिये। कृपा के समुद्र श्रीरामजी उन्हें बहुत तरह से समझाते हैं, तो वे ( अयोध्या की ओर ) लौट जाते हैं; परन्तु प्रेमवश फिर लौट आते हैं।





लागति अवध भयावनि भारी। मानहुं कालरात्रि अंधियारी।। घोर जंतु सम पुर नर नारी। डरपहिं एकहि एक निहारी।।_अर्थ_अयोध्यापुरी बड़ी डरावनी लग रही है। मानो अंधकारमयी कालरात्रि ही हो। नगर के नर_नारी भयानक जन्तुओं के समान एक_दूसरे को देखकर डर रहे हैं।





घर मसान परिजन जनु भूता। सुत हित मीत मनहुं जमदूता।। बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं। हरित सरोबर देखि न जाहीं।।_अर्थ_घर श्मशान, कुटुम्बी भूत_प्रेत और पुत्र, हितैषी और मित्र मानो यमराज के दूत हैं। बगीचों में वृक्ष और बेलें कुम्हला रही हैं। नदी और तालाब ऐसे भयानक लगते हैं कि उनकी ओर देखा भी नहीं जाता।





हम गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिंक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर।।_अर्थ_करोड़ों घोड़े_हाथी, खेलने के लिये पाले हुए हिरन, नगर के ( गाय, बैल, बकरी आदि ) पशु, पपीहे, मोर, कोयल, चकवे, तोता, मैना, सारस, हंस और चकोर_





राम बियोग बिकल सब ठाढ़े। जहं तहं मनहुं चित्र लिखि काढ़े।। नगरु सफल बनु गहबर भारी। खग मृग बिपुल सकल नर नारी।।_अर्थ_श्रीरामजी के वियोग में सभी व्याकुल हुए जहां_तहां ( ऐसे चुपचाप स्थिर होकर ) खड़े हैं, मानो तस्वीरों में लिखकर बनाये हुए हैं। नगर मानो फलों से परिपूर्ण बड़ा भारी सघन वन था। नगर निवासी सब स्त्री_पुरुष बहुत से पशु_पक्षी थे। ( अर्थात् अवधपुरी अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों फलों को देनेवाली नगरी थी और सब स्त्री_पुरुष सुख से उन फलों को प्राप्त करते थे।)





बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही। जेहिं दव दुसह  दसहुं दिसि दीन्ही।। सहि न सके रघुबर बिरहागी। चले लोग सब व्याकुल भागी।।_अर्थ_विधाता ने कैकेयी को भीलनी बनाया, जिसने दसों दिशाओं में दु:सह दावाग्नि ( भयानक आग ) लगा दी। श्रीरामचन्द्र जी के विरह की इस अग्नि को लोग सह न सके। सब लोग व्याकुल होकर भाग चले।





सबहिं बिचारु कीन्ह मन माहीं। राम लखन सिय बिनु सुख नाहीं।। जहां रामु तहं सबुई समाजू। बिनु रघुबीर अवध नहीं काजू।।_अर्थ_सबने मन में विचार कर लिया कि श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी के बिना सुख नहीं है। जहां श्रीरामजी रहेंगे, वहीं सारा समाज रहेगा। श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्या में हमलोगों का कुछ काम नहीं है।






चले साथ अस मंत्र दृढ़ाई। सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई।। राम चरन पंकज प्रिय जिन्हहीं। बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हहीं।।_अर्थ_ऐसा विचार दृढ़ करके देवताओं को भी दुर्लभ सुखों से पूर्ण घरों को छोड़कर सब श्रीरामचन्द्र जी के साथ चल पड़े। जिनको श्रीरामचन्द्र जी के चरणकमल प्यारे हैं, उन्हें क्या अभी बिषयभोग वश में कर सकते हैं।





बालक बृद्ध बिहाई गृह लगे लोग सब साथ। तमसा तीर निवास किय प्रथम दिवस रघुनाथ।।_अर्थ_बच्चों और बूढ़ों को घरों में छोड़कर सब श्रीरामचन्द्रजी के साथ चल पड़े। पहले दिन श्रीरघुनाथजी ने तमसा के तट पर निवास किया।





रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी। सदय हृदयं दुखु भयउ बिसेषी।। करुनामय रघुनाथ गोसाईं। बेगि पाइहहिं पीर पराई।।_अर्थ_प्रजा को प्रेमवश देखकर श्रीरघुनाथजी के दयालु हृदय में बड़ा दु:ख हुआ। प्रभु श्रीरघुनाथजी करुणामय हैं। प्यारी पीड़ा को वे तुरंत पा जाते हैं ( अर्थात् दूसरे के दु:ख को देखकर वे तुरंत दु:की हो जाते हैं।





कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए। बहुबिधि राम लोग समुझाए।। किए धर्म उपदेस घनेरे। लोग प्रेमबस फिरहिं न फेरे।।_अर्थ_प्रेमयुक्त कोमल और सुन्दर वचन कहकर श्रीरामजी ने बहुत प्रकार से लोगों को समझाया और बहुतेरे धर्म संबंधी उपदेश दिये; परन्तु प्रेमवश लोग लौटाए नहीं लौटते।





धीरु सनेह छाड़ि नहीं जाई। असमंजस बस भे रघुराई।। लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछूक देवमाया मति गोई।।_अर्थ_शील और स्नेह छोड़ा नहीं जाता। श्री रघुनाथ जी असमंजस के अधीन हो गये ( दुविधा में पड़ गये )। शोक और परिश्रम ( थकावट ) के मारे लोग सो गये और कुछ देवताओं के माया से भी उनकी बुद्धि मोहित हो गयी।





जबहिं जाम जुग जामिनि बीती। राम सचिव सन कहेंगी सप्रीती।। खोज मारि रथ हांकहु ताता। आन उपाय बनिहि नहीं बाता।।_अर्थ_जब दो पहर रात बीत गयी, तब श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम पूर्वक मंत्री सुमंत्र से कहा_हे तात ! रथ को खोज मारकर ( अर्थात् पहियों के चिह्नो न से दिशा का पता न चले इस प्रकार ) रथ को हांकिये ! और किसी उपाय से बात नहीं बनेगी।





राम लखन सिय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ। सचिव चलायउ तुरत रथ इत उतर खोज दुराइ।।_अर्थ_शंकरजी के चरणों में सिर नवाकर श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी रथ पर सवार हुए। मंत्री ने तुरंत ही रथ को, इधर_उधर खोज छिपाकर चला दिया।





जागे सकल लोग भएं भोरू। गे रघुनाथ भयउ अति सोरू।। रथ कर खोज कतहुं नहिं पावहिं। राम राम कहि चहुं दिसि धावहिं।।_अर्थ_सवेरा होते ही सब लोग जागे, तो बड़ा शोर मचा कि श्रीरघुनाथजी चले आते । कहीं रथ का खोज नहीं पाते, सब ‘हा राम ! हा राम !’ पुकारते हुए चारों ओर दौड़ रहे हैं।





मनहुं बारिनिधि बूड़ जहाजू। भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू।। एकहिं एक देहिं उपदेसू। तजे राम हम जानि कलेसू।।_अर्थ_मानो समुद्र में जहाज डूब गया हो, जिससे व्यापारियों का समुदाय बहुत ही व्याकुल हो उठा हो। वे एक_दूसरे को उपदेश देते हैं कि श्रीरामचन्द्र जी ने, हमलोगों को क्लेश होगा, यह जानकर छोड़ दिया है।

Saturday, 9 July 2022

अयोध्याकाण्ड

तबहिं मोह जनि छाड़िअ छोहू। करम कठिन कछु दोसु न मोहू।। सुनि सीय बचन सासु अकुलानी। दसा कवनि बिधि कहौं बखानी।।_अर्थ_आप क्षोभ का त्याग कर दें, परंतु कृपा न छोड़ियेगा। करम की गति कठिन है, मुझे भी कुछ दोष नहीं है। सीताजी के वचन सुनकर सास व्याकुल हो गयीं। उनकी दशा को मैं किस प्रकार बखान कर कहूं !





बारहिं बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख असीस दीन्ही।। अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंगा जमुन जलधारा।।_अर्थ_उन्होंने सीताजी को बार_बार हृदय से लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जबतक गंगाजी और यमुनाजी में जल की धारा बहे, जबतक तुम्हारा सुहाग अचल रहे।





सीतहि सासु असीस सिख दीन्ह अनेक प्रकार। चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार।।_अर्थ_सीताजी को सास ने अनेकों प्रकार से आशीर्वाद और शिक्षाएं दीं और वे ( सीताजी ) बड़े ही प्रेम से बार_बार चरणकमलों में सिर नवाकर चलीं।





समाचार जब लछिमन पाए। व्याकुल बिलख बदन उठि धाए।। कंप पुलक तन नयन सनीरा। ग हे चरन अति प्रेम अधीरा।।_अर्थ_जब लक्ष्मण जी ने ये समाचार पाया, तब वे व्याकुल होकर उदास_मुंह उठ दौड़े। शरीर कांप रहा है, रोमांच हो रहा है, नेत्र आंसुओं से भरे हैं। प्रेम से अत्यंत अधीर होकर उन्होंने श्री रामजी के चरण पकड़ लिये।





कहि न सकत कछु चित्तवत ठाढ़े। मीनु दीन जनु जल ते काढ़े।। सोचु हृदय बिधि का होनिहारा। सबु सुखु सुकृतु सिरान हमारा।।_अर्थ_वे कुछ कह नहीं सकते, खड़े_खड़े देख रहे हैं। ( ऐसे दीन हो रहे हैं ) मानो जल से मछली निकाले जाने पर दीन हो रही हो। हृदय में यह सोच है कि हे विधाता ! क्या होनेवाला है ? क्या हमारा सब सुख और पुण्य पूरा हो गया ?





मो कहुं काह कहब रघुनाथा। रखिहहिं भवन कि लेइहहिं साथा।। राम बिलोकि बन्धु कर जोरें। देह गेह सब सन तृनु तोरें।।_अर्थ_मुझको श्रीरघुनाथजी क्या कहेंगे ?  घर पर रखेंगे या साथ ले चलेंगे ? श्रीरामचन्द्रजी ने भाई लक्ष्मण को हाथ जोड़े और शरीर तथा घर सभी से नाता तोड़े हुए खड़े देखा।





बोले बचनु राम नय नागर। सील सनेह सरल सुख सागर।।  तात प्रेम बस जनि कदराहू। समुझि हृदयं परिणाम उछाहू।।_अर्थ_तब नीति में निपुण और शील, स्नेह, सरलता और सुख के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी बचन बोले_ हे तात ! परिणाम में होनेवाले आनंद को हृदय में समझकर तुम प्रेमवश अधीर मत होओ।





मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायं। लहेउ लाभु तिन्ह जन्म कर नतरु जनम जग जायं।।_अर्थ_जो लोग माता, पिता, गुरु और स्वामी की शिक्षा को स्वाभाविक ही सिर चढ़ाकर उसका पालन करते हैं, उन्होंने ही जन्म लेने का लाभ पाया है; नहीं तो जगत् में जन्म ही व्यर्थ है।





अस जियं जानि सुनहु सिख भाई। करहु मातु पितु पद सेवकाई।। भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं। राउ बृद्ध मम दुख मन माहीं।।_अर्थ_हे भाई ! हृदय में ऐसा जानकर मेरी सिख सुनो और माता_पिता के चरणों की सेवा करो। भरत और शत्रुघ्न घर पर नहीं हैं, महाराज वृद्ध हैं और उनके मन में मेरा दु:ख है।





मैं बन जाउं तुम्हहिं लै साथा। होई सबहि बिधि अवध अनाथा।। गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू। सबु कहुं परइ दुसह दुख भारू।।_अर्थ_इस अवस्था में मैं तुमको साथ लेकर वन जाऊं तो अयोध्या सभी प्रकार से अनाथ हो जायगी। गुरु, पिता, माता और परिवार सभी पर दु:ख का दु:सह बार आ पड़ेगा।





रहहू करहू सब कर परितोषू। नतरु तात होइहीं बड़ दोषू।। जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। सो नृप अवसि नरक अधिकारी।।_अर्थ_ अत: तुम यहीं रहो और सबका संतोष करते रहो। नहीं तो हे तात ! बड़ा दोष होगा। जिसके राज्य में प्यारी प्रजा दु:की रहती है, वह राजा अवश्य ही नरक का अधिकारी होता है।





करहु तात असि नीति बिचारी। सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी।। सिअरें बचन सूखि गए कैसे। परसत तुहिन तामरसु जैसें।।_अर्थ_हे तात ! ऐसी नीति विचार कर तुम घर रह जाओ। यह सुनते ही लक्ष्मण जी बहुत ही व्याकुल हो गये ! इन शीतल वचनों से वे कैसे सूख गये, जैसे पाले के स्पर्श से कमल सूख जाता है।





उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ। नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु न काह बसाइ।।_अर्थ_प्रेमवश लक्ष्मणजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता । उन्होंने व्याकुल होकर श्रीरामजी के चरण पकड़ लिये और कहा_ हे नाथ ! मैं दास हूं और मैं स्वामी हैं; अतः आप मुझे छोड़ ही दें तो मेरा क्या वश है ?





दीन्ह मोहि सिख नीक गोसाईं। लागि अगम अपनी कदराई।। नरबर धीर धरम धुर धारी। निगम नीति कहुं ते अधिकारी।।_अर्थ_हे स्वामी ! आपने मुझे सीख तो बड़ी अच्छी दी है, पर मुझे अपनी कायरता से वह मेरे लिए अगम ( पहुंच के बाहर ) लगी। शास्त्र और नीति के तो वे ही श्रेष्ठ पुरुष अधिकारी हैं जो धीर हैं और धर्म की धूरी को धारण करनेवाले हैं। 





मैं सिसु प्रभु सनेह प्रतिपाला। मंदरु मेरु कि लेहिं मराला।। गुरु पितु मातु न जानउं काहू। कहउं सुभाउ नाथ पतिआहू।।_अर्थ_ मैं तो प्रभु ( आप ) के स्नेह में पला हुआ छोटा बच्चा हूं। कहीं हंस भी मंदरांचल या सुमेरु पर्वत को उठा सकते हैं। हे नाथ ! स्वभाव से ही कहता हूं, आप विश्वास करें, मैं आपको छोड़कर गुरु, माता, पिता किसी को भी नहीं जानता।





जहं लगि जगत सनेह सगाई। प्रीति प्रतीति निगम निज गाई।। मोरें सबई एक तुम्ह स्वामी। दीनबंधु उर अंतरजामी।।_अर्थ_जगत् में जहां तक स्नेह का संबंध, प्रेम और विश्वास है, जिनको स्वयं वेद ने गाया है_हे स्वामी ! हे दीनबंधु ! हे सबके हृदय की जाननेवाले ! मेरे तो सबकुछ केवल आप ही हैं।





धर्म नीति उपदेसिअ ताही। कीरति भूति सुगति प्रिय जाही।। मन क्रम बचन चरन रत होई। कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई।।_अर्थ_धर्म और नीति का उपदेश तो उसको करना चाहिए जिसे कीर्ति, विभूति ( ऐश्वर्य ) या सद्गति प्यारी हो ! किन्तु जो मन, वचन और कर्म से चरणों में ही प्रेम रखता हो, हे कृपासिंधु ! क्या वह भी त्यागने के योग्य है ?





करुनासिंधु सुबंधु के सुनि मृदु बचन बिनीत। समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहं सभीत।।_अर्थ_दया के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी ने भले भाई के कोमल और नम्रतायुक्त वचन सुनकर और उन्हें स्नेह के कारण डरे हुए जानकर, हृदय से लगाकर समझाया।





मागहु विदा मातु सन जाई। आवहु बेगि चलहु बन भाई।। मुदित भए सुनि रघुबीर बानी। भयउ लाभ बड़ गई बड़ि हानी।।_अर्थ_( और कहा_ ) हे भाई ! जाकर माता से विदा मांग आओ और जल्दी वन को चलो ! रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीरामजी की वाणी सुनकर लक्ष्मणजी आनंदित हो गये। बड़ी हानि दूर हो गयी और बड़ा लाभ हुआ।





हरषित हृदयं मातु पहिं आए। मनहुं अंध फिरि लोचन पाए।।  जाइ जननि पग नायउ माथा। मनु रघुनंदन जानकी साथा।।_अर्थ_वे हर्षित हृदय से माता सुमित्रा जी के पास आये, मानो अंधा फिर से नेत्र पा गया हो। उन्होंने जाकर माता के चरणों में मस्तक नवाया। किन्तु उनका मन रघुकुल को आनंद देनेवाले श्रीरामजी और जानकी जी के साथ था।





पूंछें मातु मलिन मन देखी। लखन कहीं सब कथा बिसेषी।। गई सहमि सुनि बचन कठोरा। मृगी देखि दव तनु चहुं ओरा।।_अर्थ_माता ने उदास मन देखकर उनसे ( कारण ) पूछा। लक्ष्मणजी ने सब कथा विस्तार से कह सुनायी। सुमित्राजी कठोर वचनों को सुनकर ऐसी सहम गयीं जैसे हिरणी चारों ओर वन में आग लगी देखकर सहम जाती है।






समुझि सुमित्रां राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ। नृप सनेह लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ।।_अर्थ_सुमित्राजी ने श्रीरामजी और श्रीसीताजी के रूप, सुन्दर शील और स्वभाव को समझकर और उनपर राजा का प्रेम देखकर अपना सिर धुना( पीटा ) और कहा कि पापिनि कैकेयी ने बुरी तरह घात लगाया।





धीरजु धरेउ कुअवसर जानी। सहज सुहृद बोली मृदु बानी।। तात तुम्हारी मातु बैदेही। पिता रामु सब भांति सनेही।।_अर्थ_परन्तु कुसमय जानकर धैर्य धारण किया और स्वभाव से ही हित चाहनेवाली सुमित्रा जी बोलीं_हे तात ! जानकी जी तुम्हारी माता हैं और सब प्रकार से स्नेह करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे पिता हैं।





अवध तहां जहां राम निवासू। तहां दिवस जहं भानु प्रकासू।। जौं पै सीय रामु बन जाहीं। अवध तुम्हार काजु कछु नाहीं।।_अर्थ_जहां श्रीरामजी का निवास  हो वही अयोध्या है। जहां सूर्य का प्रकाश हो वहीं दिन है। यदि निश्चय ही सीता_राम वन को जाते हैं तो अयोध्या में तुम्हारा कुछ भी काम नहीं है।





गुरु पितु मातु बंधु सुर साईं। सेइअहिं सकल प्रान की नाईं।। रामु प्रान प्रिय जीवन जी के। स्वारथ रहित सखा सबही के।।_अर्थ_गुरु, पिता, माता, भाई, देवता और स्वामी, इन सबकी सेवा प्राण के समान करनी चाहिये। फिर श्रीरामचन्द्रजी तो प्राणों के भी प्रिय हैं, हृदय के भी जीवन हैं और सभी के स्वार्थरहित सखा हैं।





पूजनीय प्रिय परम जहां ते। सब मानिअहिं राम के नाते।। अस जिअं जानि संग बन जाहू। लेहु तात जग जीवन लाहू।।_अर्थ_जगत् में जहां तक पूजनीय और परमप्रिय लोग हैं, वे सब रामजी के नाते से ही ( पूजनीय और परमप्रिय ) मानने योग्य हैं। हृदय में ऐसा जानकर हे तात ! उनके साथ वन जाओ और जगत् में जीने का लाभ उठाओ।





भूरि भाग भाजन भयहु मोहि समेत बलि जाउं। जौं तुम्हरें मन छाड़ि तरु कीन्ह राम पद ठाउं।।_अर्थ_मैं बलिहारी जाती हूं, ( हे पुत्र !) मेरे समेत तुम बड़े ही सौभाग्य के पात्र हुए, जो तुम्हारे चित्त ने जल छोड़कर श्रीरामजी के चरणों में स्थान प्राप्त किया है।





पुत्रवती जुवती जग सोई। रघुपति भगतु जासु सुत होई।। नतरु बांझ भलि बादि बिआनी। राम बिमुख सुत ते हित जानी।।_अर्थ_संसार में वही जुड़ती स्त्री पुत्रवती है जिसका पुत्र श्रीरघुनाथजी का भक्त हो। नहीं तो जो राम से बिमुख पुत्र से अपना हित जानती है, वह तो बांझ ही अच्छी। पशु की भांति उसका ब्याना ( पुत्र प्रसव करना ) व्यर्थ ही है।





तुम्हारे ही भाग राम बन जाहीं। दूसर हेतु तात कछु नाहीं।। सकल सुकृत कर बड़ फल एहू। राम सीय पद सहज सनेहू।।_अर्थ_तुम्हारे ही भाग्य से श्रीरामजी वन को जा रहे हैं। हे तात ! दूसरा कोई कारण नहीं है। संपूर्ण पुण्यों का सबसे बड़ा फल यही है कि श्रीसीतारामजी के चरणों में स्वाभाविक प्रेम हो।





रागु रोषु इरिषा मदु मोहू। जनि सपनेहु इन्ह के बस होहू।। सकल प्रकार बिकार बिहाई। मन क्रम बचन करेहु सेवकाई।।_अर्थ_राग, रोष, ईर्ष्या, मद और मोह_इनके वश स्वप्न में भी मत होना। सब प्रकार के विकारों का त्याग कर मन, वचन और कर्म से श्रीसीतारामजी की सेवा करना।





तुम्ह कहुं बन सब भांति सुपासू। संग पितु मातु राम सीय जासू।। जेहिं न राम बन लहहिं कलेसू। सुत सोइ करहु इहइ उपदेसू।।_अर्थ_तुमको वन में सब प्रकार से आराम है, जिसके साथ श्रीरामजी और सीताजी रूप माता_पिता हैं। हे पुत्र ! तुम वही करना जिससे श्रीरामचन्द्रजी वन में क्लेश न पालें, मेरा यही उपदेश है।





उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं। पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं।। तुलसी प्रभुहिं सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिस दई। रति होई अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई।।_अर्थ_ हे तात ! मेरा यही उपदेश है ( अर्थात् तुम वही करना ) जिससे वन में तुम्हारे कारण श्रीरामजी और सीताजी सुख पावें और माता, पिता प्रिय परिवार तथा नगर के सुखों की याद भूल जायं। तुलसीदास जी कहते हैं कि सुमित्राजी ने इस प्रकार हमारे प्रभु ( श्रीलक्ष्मणजी ) को शिक्षा देकर ( वन जाने की ) की आज्ञा दी और फिर यह आशीर्वाद दिया कि श्रीसीताजी और श्रीरघुवीरजी के चरणों में तुम्हारा निर्मल ( निष्काम और अनन्य ) एवं प्रगाढ़ प्रेम नित नित नया हो।





मातु चरण सिर नाई चले तुरंत संकित हृदयं। बागुर बिषम तोराइ मनहुं भाग मृगु भाग बस।।_अर्थ_माता के चरणों में सिर नवाकर हृदय में डरते हुए ( कि अब कोई बिघ्न न आ जाय ) लक्ष्मणजी तुरंत इस तरह चल दिये जैसे सौभाग्यवश कोई हिरण कठिन फंदे को तुड़ाकर भाग निकला हो।





गए लखन जहं जानकीनाथू। भें मन मुदित पाई प्रिय साथू।। बंदि राम सिय चरन सुहाए। चले संग नृप मंदिर आए।।_अर्थ_लक्ष्मणजी वहां गये जहां श्रीजानकीनाथजी थे, और प्रिय का साथ पाकर मन में बड़े ही प्रसन्न हुए। श्रीरामजी और सीताजी के सुन्दर चरणों की वन्दना करके वे उनके साथ चले और राजभवन में आये।





कहहिं परस्पर पुर नर नारी। भलि बनाई बिधि बात बिगारी।। तन कृस मन दुख बदन मलीने। बिकल मनहुं माखी मधु छीने।।_अर्थ_नगर के स्त्री_पुरुष आपस में कह रहे हैं कि विधाता ने खूब बनाकर बात बिगाड़ी। उनके शरीर दुबले, मन दु:खी और मुख उदास हो रहे हैं। वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे शहद छीन लिये जाने पर शहद की मक्खियां व्याकुल हों।





कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।। भइ बड़ि भीर भूप दरबारा। बरनि न जाइ बिषादु अपारा।।_अर्थ_सब हाथ मल रहे हैं और सिर धुनकर ( पीटकर ) पछता रहे हैं। मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हों। राजद्वारे पर बड़ी भीड़ हो रही है। अपार विषाद का वर्णन नहीं किया जा सकता।





सचिवं उठाई राउ बैठारे। कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे।। सिय समेत दोउ तनय निहारी। व्याकुल भयउ भूमिपति भारी।।_अर्थ_’श्रीरामचन्द्रजी पधारे हैं’ ये प्रिय वचन कहकर मंत्री ने राजा को उठाकर बैठाया। सीता सहित दोनों पुत्रों को ( वन के लिये तैयार ) देखकर राजा बहुत व्याकुल हुए।





सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ। बारहिं बार सनेहबस राउ लेइ उर लाइ।।_अर्थ_ सीता सहित दोनों सुन्दर पुत्रों को देखकर राजा अकुलाते हैं और स्नेहवश बारंबार उन्हें हृदय से लगा लेते हैं। 





सकी न बोलि बिकल नरनाहू। सोक जनित उर दारुन दाहू।। नाइ सीसु पद अति अनुरागा। उठि रघुबीर बिदा तब मागा।।_अर्थ_राजा व्याकुल हैं, बोल नहीं सकते। हृदय में शोक से उत्पन्न हुआ भयानक संताप है। तब रघुकुल के वीर श्रीरामचन्द्रजी ने अत्यन्त प्रेम से चरणों में सिर नवाकर उठकर विदा मांगी।





पितु असीस आयसु मोहि दीजै। हरष समय बिसमय कत कीजै।। तात किएं प्रिय प्रेम प्रमादू। जगु जसु जाइ होई अपबादू।।_अर्थ_ हे पिताजी ! मुझे आशीर्वाद और आज्ञा दीजिये। हर्ष के समय आप शोक क्यों कर रहे हैं ? हे तात ! प्रिय के प्रेमवश प्रमाद ( कर्तव्यकर्म में त्रुटि ) करने से जगत् में यश जाता रहेगा और निंदा होगी।





सुनि सनेह बस उठि नरनाहां। बैठारे रघुपति गहि बाहां।। सुनहु तात तुम्ह कहुं मुनि कहहीं। रामु चराचर नायक अहहीं।।_अर्थ_यह सुनकर स्नेहवश राजा ने उठकर श्रीरघुनाथजी की बांह पकड़कर उन्हें बैठा लिया और कहा_हे तात ! सुनो तुम्हारे लिये मुनि लोग कहते हैं के श्रीराम चराचर के स्वामी हैं।





सुभ और असुभ कर्म अनुहारी। ईसु देइ बलु हृदय बिचारी।। करइ जो कर्म पाव फल सोई। निगम नीति असि कह सबु कोई।।_अर्थ_शुभ और अशुभ कर्मों के अनुसार ईश्वर हृदय में विचार कर फल देता है। जो कर्म करता है वही फल पाता है। ऐसी वेद की नीति है, यह सब कोई कहते है।





औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु। अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु।।_अर्थ_( किन्तु इस अवसर पर तो इसके विपरीत हो रहा है ) अपराध तो कोई और ही करें और उसके फल का भोग को कोई और ही पावे। भगवान की लीला बड़ी ही विचित्र है, उसे जानने योग्य जगत् में कौन है ?





रांय राम राखन हित लागी। बहुत उपाय किए छलु त्यागी।। लखी राम रुख रहत न जाने। धर्म धुरंधर धीर सयाने।।_अर्थ_राजा ने इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी को रखने के रिमेक छल छोड़कर बहुत_से उपाय किये। पर जब उन्होंने धर्मधुरंधर, धीर और बुद्धिमान श्रीरामजी का रुख देख लिया और वे रहते हुए न जान पड़े।





तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही। अति हित बहुत भांति सिख दीन्ही।। कहि बन के दुख दुसह सुनाए। सासु ससुर पितु सुख समुझाए।।_अर्थ_तब राजा ने सीताजी को हृदय से लगा लिया और बड़े प्रेम से बहुत प्रकार की शिक्षा दी। वन के दु:सह दु:ख कहकर सुनाये। फिर सास, ससुर और पिता के ( पास रहने के ) सुखों को समझाया।

Monday, 23 May 2022

अयोध्याकाण्ड


 मासपारायण, चौदहवां विश्राम

मातु समीप कहत सकुचाहीं। बोले समउ समुझि मन माहीं।। राजकुमारि सिखावनु सुनहू। आन भांति जियं जनि कछु गुनहू।।_अर्थ_माता के सामने सीताजी से कुछ कहने में सकुचाते हैं। पर मन में यह समझकर कि यह समय ऐसा ही है, वे बोले_ हे राजकुमारी ! मेरी सिखावन सुनो। मन में कुछ दूसरी तरह न समझ लेना।





आपन मोर नीक जौं चहहू। बचनु हमार मानि गृह रहहू।। आयसु मोर सासु सेवकाई। सब बिधि भामिनि भवन भलाई।।_अर्थ_जो अपना और मेरा भला चाहती हो, तो मेरा वचन मानकर घर रहो। हे भामिनि ! मेरी आज्ञा का पालन होगा, सास की सेवा बन पड़ेगी। घर रहने में सभी प्रकार से भलाई है।





एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा। सादर सासु ससुर पद पूजा।। जब जब मातु करिहिं सुधि मोरी। होइहि प्रेम बिकल मति भोरी।।_अर्थ_आदरपूर्वक सास_ससुर के चरणों की पूजा ( सेवा ) करने से बढ़कर कोई धर्म नहीं है। जब_जब माता मुझे याद करेंगी और प्रेम से व्याकुल होने के कारण उनकी बुद्धि बोली हो जायगी ( वे अपने आप को भूल जायेंगी ),





तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी। सुंदरि समुझायहु मृदु बानी।। कहउं सुभायं सपथ सत मोही। सुमुखि मातु हित राखउं मोही।। _अर्थ_हे सुन्दरी ! तब_तब तुम कोमल बाणी से पुरानी कथाएं कह_कहकर इन्हें समझाना। हे सुमुखि ! मुझे सैकड़ों सौगंध है, मैं यह स्वभाव से ही कहता हूं कि मैं तुम्हें केवल माता के लिये ही घर पर रखता हूं।





गुर श्रुति संमत धरमु फलु पाइअ बिनहिं कलेस। हठ बस सब संकट सहे गालब नहुष नरेस।।_अर्थ_( मेरी आज्ञा मानकर घर पर रहने से ) गुरु और वेद के द्वारा सम्मत धर्म ( के आचरण ) का फल तुम्हें बिना ही क्लेश के मिल जाता है। किन्तु हठ के वश होकर गालव मुनि और राजा नहुष आदि सबने संकट ही सहे।






मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी। बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी। दिवस जात नहिं लागिहिं बारा। सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा।।_अर्थ_हे सुमुखि ! हे सयानी ! सुनो, मैं भी पिता के वचन को सत्य करके शीघ्र ही लौटूंगा। दिन जाते देर नहीं लगेगी। हे सुन्दरी ! हमारी यह सीख सुनो !





 जौं हठ करहु प्रेम बस बामा। तौ तुम्ह दुख पाउब परिनामा।। काननु कठिन भयंकर भारी। घोर घामु हिम बारि बयारी।।_अर्थ_हे वामा ! यदि प्रेमवश हठ करोगी, तो तुम परिणाम में दुख पाओगी। वन बड़ा कठिन ( क्लेशदायक ) और भयानक है। वहां की धूप, जाड़ा, वर्षा और हवा सभी बड़े भयानक हैं।






कुस कंटक मग कांकर नाना। चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना।। चरन कमल मृदु मंजु तुम्हारे। मारग अगम भूमिधर भारे।।_अर्थ_रास्ते में कुश, कांटे और बहुत_से कंकड़ हैं। उनपर बिना जूते के पैदल ही चलना होगा। तुम्हारे चरण कमल कोमल और सुंदर हैं और रास्ते में बड़े_बड़े दुर्गम पर्वत हैं।





कंदर खोह नदीं नद नारे। अगम अगाध न जाहिं निहारे।। भालु बाघ बृक केहरि नागा। करहिं नाद सुनि धीरजु भागा।।_अर्थ_पर्वतों की गुफाएं, खोह ( दर्रे ) नदियां, नद और नाले ऐसे अगम्य और गहरे हैं कि उनकी ओर देखा तक नहीं जाता।
 रीछ, बाघ, भेड़िये, सिंह और हाथी ऐसे ( भयानक ) शब्द करते हैं कि उन्हें सुनकर धीरज भाग जाता है।





भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल। ते कि सदा सब दिन मिलहिं सबुइ समय अनुकूल।।_अर्थ_जमीन पर सोना, पेड़ों की छाल के वस्त्र पहनना और कंद, मूल, फल का भोजन करना होगा। और वे भी क्या सदा सब दिन मिलेंगे ? सबकुछ अपने_अपने समय के अनुकूल ही मिल सकेगा।





नर आहार रजनीचर चरहीं। कपट बेस बिधि कोटिक करहीं।। लागी अति पहार कर पानी। बिपिन बिपति नहीं जाइ बखानी।।_अर्थ_मनुष्यों को खानेवाले निशाचर ( राक्षस ) फिरते रहते हैं। वे करोड़ों प्रकार के कपटरूप धारण करते हैं। पहाड़ का पानी बहुत ही लगता है। वन की विपत्ति बखानी नहीं जा सकती।





ब्याल कराल बिहग बन घोरा। निसिचर निकर नारि नर चोरा।। डरपहिं धीर गहन सुनि आएं। मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएं।।_अर्थ_वन में भीषण सर्प, भयानक पक्षी और स्त्री_पुरुषों को चुरानेवाले राक्षसों के झुंड_के_झुंड रहते हैं। वन की ( भयंकरता ) याद आने मात्र से धीर पुरुष भी डर जाते हैं। फिर  हे मृगलोचनि ! तुम तो स्वाभाव से ही डरपोक हो।





हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू। सुनि अपजसु मोहि देइहिं लोगू।। मानस सलिल सुधा प्रतिपाली। जिअइ कि लवन पयोधि मराली।।_अर्थ_हे हंसगमनि ! तुम वन के योग्य नहीं हो। तुम्हारे वन जाने की बात सुनकर लोग मुझे अपयश देंगे। मानसरोवर के अमृत के समान जल से पाली हुई हंसिनी कहीं खारे समुद्र में जी सकती है ?





नव रसाल बन बिहरनसीला। सोह कि कोकिल बिपिन करीला।। रहहु भवन अस हृदयं बिचारी। चंदबदनि दुखु कानन भारी।।_अर्थ_नवीन आम के वन में विहार करनेवाली कोयल क्या करील के जंगल में शोभा पाती है ? हे चन्द्रमुखी ! हृदय में ऐसा विचारकर तुम घर ही पर रहो। वन में बड़ा कष्ट है।





सहज सुहृद गुर स्वामि सिख जो न करिअ सिख मानि। होइ पछिताइ अघाई उर अवसि होई हित मानि।।_अर्थ_स्वाभाविक ही हित चाहनेवाले गुरु और स्वामी की सीख को जो सिर चढ़ाकर नहीं मानता, वह हृदय में भरपेट पछताता है और उसके हित की हानि अवश्य होती है।





सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के। लोचन ललित भरे जल सिय के।। सीतल सिख दाहक भइ कैसें। चकइहि सरद चंद हित जैसें।।_अर्थ_प्रियतम के कोमल तथा मनोहर वचन सुनकर सीताजी के सुंदर नेत्र जल से भर गये। श्रीरामजी की यह शीतल सीख उनको कैसी जलानेवाली हुई, जैसे चकवी को शरद्_ऋतु की चांदनी रात होती है।





उतरु न आव बिकल बैदेही। तजन चहत सुचि स्वामि सनेही।। बरबस रोकि बिलोचन बारी। धरि धीरजु उर अवनिकुमारी।।_अर्थ_जानकीजी से कुछ उत्तर देते नहीं बनता, वे यह सोचकर व्याकुल हो उठीं कि मेरे पवित्र और प्रेमी स्वामी मुझे छोड़ जाना चाहते हैं। नेत्रों के जल ( आंसुओं ) को जबरदस्ती रोककर वे पृथ्वी की कन्या सीताजी हृदय में धीरज धरकर,





लागि सासु पग कह कर जोरी। छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी।। दीन्हि प्राधपति मोहि सिख सोई। जेहिं बिधि मोर परम हित होई।।_अर्थ_ सास के पैर लगकर, हाथ जोड़कर कहने लगीं_हे देवी ! मेरी इस बड़ी भारी ढ़िठाई को क्षमा कीजिये। मुझे प्राणपति ने वही शिक्षा दी है जिससे मेरा परम हित हो।





मैं पुनि समुझि दीख मन माहीं। पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं।।_अर्थ_परन्तु मैंने मन में समझकर देख लिया कि पति के वियोग के समान जगत् में कोई दु:ख नहीं है।





प्राणनाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान। तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान।।_अर्थ_हे प्राणनाथ ! हे दया के नाम !  हे सुन्दर ! हे सुखों के देनेवाले ! हे सुजान ! हे रघुकुलरूपी कुमुद के खिलानेवाले चन्द्रमा ! आपके बिना स्वर्ग भी मेरे लिये नरक के समान है।





मातु पिता भगिनी प्रिय भाई। प्रिय परिवारु सुहृद समुदाई।। सासु ससुर गुर सजन सहाई। सुत सुंदर सुशील सुखदाई।।_अर्थ_माता, पिता, बहन, प्यारा भाई, प्यारा परिवार, मित्रों का समुदाय, सास, ससुर, गुरु, स्वजन ( बन्धु_बान्धव ) सहायक और सुन्दर सुशील और सुख देने वाला पुत्र_





जहं लगि नाथ नेह अरु नाते। पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते।। तनु धनु धाम धरनि पुर राजू। पिय बिहीन सबु सोक समाजू।।_अर्थ_हे नाथ ! जहां तक स्नेह और नाते हैं, पति के बिना स्त्री को सभी सूर्य से बढ़कर तपानेवाले हैं। शरीर, धन, घर, पृथ्वी, नगर और राज्य, पति के बिना स्त्री के लिये यह सब शोक का समाज है।





भोग रोगसम भूषण भालू। जम जातना सनरिस संसारू।। प्राणनाथ तुम्ह बिनु जग माहीं। मो कहुं सुखद कतहुं कछु नाहीं।।_अर्थ_भोग रोग के समान हैं, गहने भाररूप हैं और संसार यम_यातना ( नरक की पीड़ा ) के समान है। हे प्राणनाथ ! आपके बिना जगत् में मुझे कहीं कुछ भी सुखदायी नहीं है।





जिय बिनु देह नदी बिनु बारी। तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी।। नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें। सरल बिमल बिधु बदन निहारे।।_अर्थ_जैसे बिना जीव के देह और बिना जल के नदी, वैसे ही हे नाथ ! बिना पुरुष के स्त्री है। हे नाथ !  आपके साथ रहकर आपका शरद्_पूर्णिमा के निर्मल चन्द्रमा के समान मुख देखने से मुझे समस्त सुख प्राप्त होंगे।





खग मृग परिजन नगरु बंधु बलकल बिमल दुकूल। नाथ साथ सुरसदन सम सब प्रसाद सुखमूल।।_अर्थ_हे नाथ ! आपके साथ पक्षी और पशु ही मेरे कुटुम्बी होंगे, वन ही नगर और वृक्षों की छाल ही निर्मल वस्त्र होंगे और पर्णकुटी ( पत्तों की बनी झोपड़ी ) ही स्वर्ग के समान सुखों की मूल होगी।





बनदेबीं बनदेव उदारा। करिहहिं सासु ससुर सम सारा।। कुस किसलय साथरी सुहाई। प्रभु संग मंजु मनोज तुराई।।_अर्थ_उदार हृदय के वनदेवी और वनदेवता ही सास_ससुर के समान मेरी सार_संभार करेंगे,  और  कुशाल और पत्तों की सुन्दर साथरी ( बिछौना ) ही प्रभु के साथ कामदेव के मनोहर तोशक के समान होगी।





कंद मूल फल अधिक अहारू। अवध सौध सत सरिस पहारू।। बिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकी रहिहउं मुदित दिवस जिमि कोकी।।_अर्थ_कन्द, मूल और फल ही अमृत के समान आहार होंगे। क्षण_क्षण में प्रभु के चरणकमलों को देख_देखकर मैं ऐसी आनंदित रहूंगी जैसी दिन में चकवी रहती है।






बन दुख नाथ कहे बहुतेरे। भय विषाद परिताप घनेरे।। प्रभु बियोग लवलेस समाना। सब मिलि होहिं न कृपानिधाना।।_अर्थ_हे नाथ ! आपने वन के बहुत_से भय, विषाद और संताप कहे। परन्तु हे कृपानिधान! वे सब मिलकर भी प्रभु ( आप ) के वियोग ( से होनेवाले दु:ख ) के लवलेश के समान भी नहीं हो सकते।





अस जियो जानि सुजान सिरोमनि। लेइय संग मोहि छाड़िअ जनि।। बिनती बहुत करौं का स्वामी। करुनामय उर अंतरजामी।।_अर्थ_ऐसा जी में जानकर, हे सुजानशिरोमणि ! आप मुझे साथ ले लीजिये, यहां न छोड़िये। हे स्वामी ! मैं अधिक क्या विनती करूं ? आप करुणामय हैं और सबके हृदय के अंदर की जाननेवाले हैं।





राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान। दीनबंधु सुंदर सुखद सील सनेह निधान।।_अर्थ_हे दीनबंधु ! हे सुन्दर ! हे सुखदेनेवाले ! हे शील और प्रेम के भण्डार ! यदि अवधि ( चौदह वर्ष ) तक मुझे अयोध्या में रखते हैं तो जान लीजिये कि मेरे प्राण नहीं रहेंगे।





मोहि मग चलत न होइहि हारी। छिनु छिनु चरन सरोज निहारी।। सबहि भांति पिय सेवा करिहौं। मारग जनित सकल श्रम हरिहौं।_अर्थ_क्षण_क्षण में आपके चरणकमलों को देखते रहने से मुझे मार्ग चलने से होने वाली सारी थकावट को दूर कर दूंगी।





पाय पखारि बैठि तरु छाहीं। करिहउं बाई मुदित मन माहीं। श्रम कन सहित स्याह तनु देखें। कहीं दुख समउ प्राणपति देखे।।_अर्थ_आपके पैर धोकर, पेड़ों की छाया में बैठकर, मन में प्रसन्न होकर हवा करूंगी ( पंखा झलूंगी )। पसीने की बूंदों सहित स्याम शरीर देखकर_प्राणपति के दर्शन करते हुए दु:ख के लिये मुझे अवकाश ही कहां रहेगा ?





 को प्रभु संग मोहि चितवनिहारा। सिंघबधूहिं जिमि ससक सियारा।। मैं सुकुमारी नाथ बन जोगू। तुम्हहिं उचित तप मो कहुं भोगू।।_अर्थ_प्रभु के ( रहते ) मेरी ओर आंख उठाकर देखनेवाला कौन है ( अर्थात् कोई नहीं देख सकता )! जैसे सिंह की स्त्री सिंहनी को खरगोश और सियार नहीं देख सकते। मैं सुकुमारी हूं और नाथ वन के योग्य हैं ? आपको तो तपस्या उचित है और मुझको विषय भोग ?





ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न हृदय बिलगान। तौं प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पांवर प्रान।।_अर्थ_ऐसे कठोर वचन सुनकर भी जब मेरा हृदय नहीं फटा तो, हे प्रभु ! ( मालुम होता है ) ये पामर प्राण आपके वियोग का भीषण दुख सहेंगे।





अस कहि सीय बिकल भइ भारी। बचन बियोगु न सकी संभारी।। देखि दशा रघुपति जियं जाना।बचन राखें नहीं राखिहिं प्राना।।_अर्थ_ऐसा कहकर सीताजी बहुत ही व्याकुल हो गयीं। वे वचन के वियोग को भी न संभाल सकीं। ( अर्थात् शरीर से वियोग की बात तो अलग रही, वचन से भी वियोग की बात सुनकर वे अत्यन्त विकल हो गयीं ) उनकी यह दशा देखकर श्री रघुनाथजी ने अपने जी में जान लिया कि हठपूर्वक इन्हें यहां रखने से ये प्राणों को न रखेंगी।





कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा। परिहरि सोच चलहु बन साथा।। नहिं विषाद कर अवसर आजू। बेगि करहु बनगवन समाजू।।_अर्थ_तब कृपालु, सूर्यकुल के स्वामी श्रीरामचन्द्र जी ने कहा कि सोच छोड़कर मेरे साथ वन को चलो। आज विषाद करने का अवसर नहीं है। तुरंत वनगमन की तैयारी करो।





 कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई। लगे मातु पद आसिस पाई।। बेगि प्रजा दुख मेटब आई। जानि निठुर बिसरि जनि जाइ।।_अर्थ_श्रीरामचन्दजी ने प्रिय वचन कहकर प्रियतमा सीताजी को समझाया। फिर माता के पैरों लगकर आशीर्वाद प्राप्त किया। ( माता ने कहा_) बेटा ! जल्दी लौटकर प्रजा के दु:ख को मिटाना और यह निठुर माता तुम्हें भूल न जाय।





फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउं नयन मनोहर जोरी।। सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जियं बदनु बिनु जोइहि।।_अर्थ_हे विधाता ! क्या मेरी दशा फिर पलटेगी ? हे पुत्र ! यह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते_जी तुम्हारा चांद_सा मुखड़ा फिर देखेगी !





बहुरि बच्छ कहि लाल कहि रघुपति रघुबर तात। कबहिं बोलाइ लगाई हियं हरषि निरखिहउं गात।।_अर्थ_ हे तात ! ‘वत्स’ कहकर ‘लाल’ कहकर ‘रघुपति’ कहकर ‘रघुवर’ कहकर कब तुम्हें बुलाकर हृदय से लगाऊंगी और हर्षित होकर तुम्हारे अंगों को देखूंगी।





लखि सनेह कातर महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी।। राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेह न जाइ बखाना।।_अर्थ_यह देखकर कि माता स्नेह के मारे अधीर हो गई है और इतनी अधिक व्याकुल है कि मुंह से वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजी ने अनेक प्रकार से उन्हें समझाया। वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता।





तब जानकी सासु पद लागी। सुनिय माय मैं परम अभागी।। सेवा समय दैअं बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हां।।_अर्थ_तब जानकी जी सास के पांव लगीं और बोलीं_ हे माता ! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनि हूं। आपकी सेवा करने के समय दैव ने मुझे बनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया।

Wednesday, 13 April 2022

अयोध्याकाण्ड

कहहु तात जननी बलिहारी। कबहिं लगन मुद मंगलकारी।। सुकृति सील सुख सीवं सुहाई। जनम लाभ कइ  अवधि अघाई।।_अर्थ_हे तात ! माता बलिहारी जाती है, कहो, वह आनन्द_मंगलकारी लग्न कब है, जो मेरे पुण्य, शील और सुख की सुन्दर सीमा है और जन्म लेने के लाभ का पूर्णतम अवधि है;





जेहिं चाहत नर नारि सब अति आरती एहि भांति। जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति।।_अर्थ_तथा जिस ( लग्न ) को सभी स्त्री_पुरुष अत्यन्त व्याकुलता से इस प्रकार चाहते हैं जिस प्रकार प्यास से चातक और चातकी शरत्_ऋतु के स्वाति नक्षत्र की वर्षा को चाहते हैं।





तात जाऊं बलि बेगि नहाहू। जो मन भाव मधुर कछु खाहू।। पितु समीप तब जाएहु भैया। भइ बड़ि बार जाइ बलि मैया।।_अर्थ_हे तात ! मैं बलैया लेती हूं, तुम जल्दी नहा लो और जो मन भावे, कुछ मिठाई खा लो। भैया ! तब पिता के पास जाना। बहुत देर हो गयी है। माता बलिहारी जाती है।





मातु बचन सुनि अति अनुकूला। जनु सनेह सुरतरु के फूला।। सुख मकरंद भरे त्रियसूला। निरखि राम मनु भवंरु न भूला।।_अर्थ_माता के अत्यन्त अनुकूल वचन सुनकर_जो मानो स्नेहरूपी कल्पवृक्ष के फूल थे, जो सुखरूपी मकरन्द ( पुष्परस ) से भरे थे और श्री ( राजलक्ष्मी ) के मूल थे_ऐसे वचन रूपी फूलों को देखकर श्रीरामचन्द्रजी का मनरूपी भौंरा उनपर नहीं भूला।





धरम धुरीन धरम गति जानी। कहेउ मातु सन अति मृदु बानी।। पिता दीन्ह मोहि कानन राजू। जहं सब भांति मोर बड़ काजू।।_अर्थ_धर्म की धूरी धारण करने वाले श्रीरामचन्द्रजी माता से मीठे बचनों में बोले_ पिता ने मुझे कानन का राज दिया है जहां सब तरह से मेरा कल्याण है।





आयसु देहि मुदित मन माता। जेहिं मुद मंगल कानन जाता।। जनि सनेहबस डरपसि भोरे। आनंद अंब अनुग्रह तोरे।।_अर्थ_हे माता मुझे आज्ञा दो जिससे वन जाना मंगलमय हो। स्नेहवश होकर हे माता डरो नहीं,  तुम्हारे अनुग्रह से सब आनंद होगा।





बरस चारिदस बिपिन बहि करि पितु वचन प्रवान। आइ पार पुनि देखिहउं मन जनि करसि मलान।। चौदह वर्ष वन में रहकर पिता का वचन प्रमाणित कर मैं आकर तुम्हारे चरणों का दर्शन करूंगा। तू मन में दुख न कर।





बचन विनीत मधुर रघुबर के। सर सम लागे मातु उर करके।। सहज सूखि सुनि सीतल बानी। जिमि  जवास परे पावस पानी।।_अर्थ_रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी के ये मीठे और मधुर वचन माता के हृदय में बाण के समान लगे और कसकने लगे। माता का मन ऐसे सूख गया जैसे जवास पर बरसात का पानी पड़ गया हो।





कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू। मनहुं मृगी सुनि केहरि नादू।। नयन सजल तन थर थर कांपी। माजहि खाइ मीन जनु मापी।।_अर्थ_हृदय का विषाद कुछ कहा नहीं जाता। मानो सिंह की गर्जना सुनकर हिरनी विकल हो गयी हो। नेत्रों में जल भर आया, शरीर थर_थर कांपने लगा। मानो मछली मांजा ( पहली वर्षा का फेन ) खाकर बदहवास हो गयी हो !





धरि धीरज सुत बदनु निहारी। गदगद बचन कहति महतारी।। तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे। देखि मुदित नित चरित तुम्हारे।।_अर्थ_धीरज धरकर, पुत्र का मुख देखकर माता गद्गद् वचन कहने लगीं_हे तात ! तुम तो पिता को प्राणों के समान प्रिय हो। तुम्हारे चरित्रों को देखकर वे नित्य प्रसन्न होते थे।





राजु देन कहुं सुभ दिन साधा। कहेउ जान बन केहि अपराधा।। तात सुनावहु मोहि निदानू। को दिनकर कुल भयउ कृसानू।।_अर्थ_राज्य देने के लिये उन्होंने ही शुभ दिन सोधवाया था। फिर अब किस अपराध से वन जाने को कहा ? हे तात ! मुझे इसका कारण सुनाओ !  सूर्यवंश ( रूपी वन ) को जलाने के लिये अग्नि कौन हो गया ?
निरखहिं राम रुख सचिव सुत कारनु कहेउ बुझाई। सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाई।।_अर्थ_तब श्रीरामचन्द्रजी का रुख देखकर मंत्री के पुत्र ने सब कारण समझाकर कहा। उस प्रसंग को सुनकर वे गूंगी जैसी ( चुप ) रह गयीं, उनकी दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।





राखि न सकइ न कहि सक जाहू। दुहूं भांति उर दारुन दाहू।। लिखत सुधाकर गा लिखि राहू। बिधि गति जान सदा सब काहू।।_अर्थ_न रख सकती है, न यह कह सकती हैं कि वन चले जाओ। दोनों ही प्रकार से हृदय में बड़ा भारी संताप हो रहा है। ( मन में सोचती हैं कि देखो_) विधाता की चाल सदा सबके लिये टेढ़ी होती है। लिखने लगे चन्द्रमा और लिख गया राहू ! 





धर्म सनेह उभय मति घेरी। भइ गति सांप छुछुंदरि केरि।। राखउं सुतहि करउं अनुरोधू। धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू।।_अर्थ_धर्म और स्नेह दोनों ने कौसल्याजी की बुद्धि को घेर लिया। उनकी दशा सांप_छुछुंदरकी_सी हो गयी। वे सोचने लगीं कि मैं अनुरोध ( हठ ) करके पुत्र को रख लेती हूं तो धर्म जाता है और भाइयों में विरोध होता है।





कहउं जान बन तौ बड़ि हानी। संकट सोच बिबस भइ रानी।। बहुरि समुझि तिय धरम सयानी। रामु भरतु दोउ सुत सम जानी।।_अर्थ_और यदि वन जाने को कहती हूं तो बड़ी हानि होती है। इस प्रकार के धर्म_संकट में पड़कर रानी विशेष रूप से सोच के वश हो गयीं। फिर बुद्धिमति कौसल्याजी स्त्री_धर्म ( पतिव्रत_धर्म ) को समझकर और राम तथा भरत दोनों पुत्रों को समान जानकर_





सरल सुभायं राम महतारी। बोली बचन धीर धरि भारी।। तात जाऊं बलि कीन्हेसु नीका। पितु आयसु सब धर्मक टीका।।_अर्थ_सरल स्वभाववाली श्रीरामचन्द्रजी की माता बड़ा धीरज धरकर वचन बोलीं_हे तात ! मैं बलिहारी जाती हूं, तुमने अच्छा किया। पिता की आज्ञा का पालन करना ही सब धर्मों का शिरोमणि धर्म है।





राजु देन कहि दीन्हा बनु मोहि न सो दुख लेसु। तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु।।_अर्थ_राज्य देने को कहकर वन दे दिया, उसका मुझे लेशमात्र भी दु:ख नहीं है। ( दु:ख तो इस बात का है कि ) तुम्हारे बिना भरत को, महाराज को और प्रजा को बड़ा भारी क्लेश होगा।
जौं केवल पितु आयसु ताता। तौ जनि जासु जानि बड़ी माता। जौं पितु मातु कहेउ बन जाना। जौं कानन सत अवध समाना।।  _अर्थ_ हे तात ! यदि केवल पिताजी की ही आज्ञा हो तो माता को ( पिता से ) बड़ी जानकर वन को मत जाओ। किन्तु यदि पिता_माता दोनों ने वन जाने को कहा हो, तो वन तुम्हारे लिये सैकड़ों अयोध्या के समान है।





पितु बनदेव मातु बनदेवी। खग मृग चरन सरोरुह सेवी।। अंतहु उचित नृपहि बनवासू। बय बिलोकि हियं होई हरांसू।।_अर्थ_वन के देवता तुम्हारे पिता होंगे और वनदेवियां माता।  वहां के पशु_पक्षी तुम्हारे चरण_ कमलों के सेवक होंगे। राजा के लिये अन्त में तो वनवास करना उचित ही है। केवल तुम्हारी ( सुकुमार ) अवस्था देखकर हृदय में दु:ख होता है।





बड़भागी बनु अवध अभागी। जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी।। जौं सुत कहौं संग मोहि लेहू। तुम्हरे हृदयं होइ संदेहू।।_अर्थ_हे रघुवंश के तिलक ! वन बड़ा भाग्यवान हैं और यह अवध अभागी है, जिसे तुमने त्याग दिया। हे पुत्र ! यदि मैं कहूं कि मुझे भी साथ ले चलो तो तुम्हारे हृदय में संदेह होगा ( कि माता इसी बहाने मुझे रोकना चाहती हैं )।





पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के। प्रान प्रान के जीवन जी के। ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊं।। मैं सुनि बचन बैठी पछिताऊं।।_अर्थ_हे पुत्र ! तुम सभी के परम प्रिय हो। प्राणों के प्राण और हृदय के जीवन हो। वही ( प्राणाधार ) तुम कहते हो कि माता ! मैं वन को जाऊं और मैं तुम्हारे बचनों  सुनकर बैठी पछताती रहूं।





यह बिचारि नहिं करउं हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ। मानि मातु कर शांत बलि सुरति बिसरि जनि जाइ।।_अर्थ_यह सोचकर झूठा स्नेह बढ़ाकर मैं हठ नहीं करती। बेटा ! मैं बलैया लेती हूं, माता का नाता मानकर मेरी सुध भूल न जाना।





देव पितर सब तुम्हहिं गोसाईं। राखहुं पलक नयन की नाईं।। अवधि  प्रिय परिजन मीना। तुम्ह करुणाकर धर्म धुरीना।।_अर्थ_हे गोसाईं ! सब देव और पितर  तुम्हारी वैसे ही रक्षा करें, जैसे पलकें आंखों  रक्षा करती हैं। तुम्हारे वनवास की अवधि ( चौदह वर्ष ) जल है, प्रियजन और कुटुम्बी मछली हैं। तुम दया की खान और धर्म की धुरी को धारण करनेवाले हो।





अस बिचारि सोई करहु उपाई। सबहिं जियत जेहिं भेंटहु आई।। जाहु सुखेन बनहिं बलि जाऊं। करि अनाथ जन परिजन गाऊं।।_अर्थ_ऐसा विचार कर वही उपाय करना जिसमें सबके जीतेजी तुम आ मिलो। मैं बलिहारी जाती हूं, तुम सेवकों, परिवारवालों और नगरभर को अनाथ करके सुखपूर्वक वन को जाओ।





सब कर आजु सुकृति फल बीता। भयउ कराल कालु बिपरीता।। बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी। परम अभागिनि आपुहिं जानी।।_अर्मुथ_ सबके पुण्यों का फल पूरा हो गया। इस प्रकार बहुत विलाप करके और अपने को परम अभागिनि जानकर माता श्रीरामचन्द्र जी के चरणों में लिपट गयीं। 





दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा। बरनि न जाइ बिलाप कलापा।। राम उठाई मातु उर लाई। कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई।।_अर्थ_हृदय में भयानक दु:सह संताप छा गया। उस समय के बहुविधि विलाप का वर्णन नहीं किया जा सकता। श्रीरामचन्द्रजी ने माता को उठाकर हृदय से लगा लिया और फिर कोमल वचन कहकर उन्हें समझाया।





समाचार तेंही समय सुनि सीय उठी अकुलाइ। जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ।।_अर्थ_उसी समय यह समाचार सुनकर सीताजी अकुला उठीं और सास के पास जाकर उनके दोनों चरणकमलों की वन्दना कर सिर नीचा करके बैठ गयीं।





दीन्हि असीस सासु मृदु बानी। अति सुकुमारि देखि अकुलानी।। बैठि नमितमुख सोचति सीता। रूप यासिर पति प्रेम पुनीता।।_अर्थ_सास ने कोमल बाणी से आशीर्वाद दिया। वे सीताजी को अत्यन्त सुकुमारी देखकर व्याकुल हो उठीं। रूप की राशि और पति के साथ पवित्र प्रेम करने वाली सीताजी नीचा मुख किये बैठी सोच रही हैं।





चलन चाहत बन जीवननाथू। केहि सुकृती सन होइहि साथू।। की तनु प्रान कि केवल प्राना। बिधि करतबु कछु जाइ न जाना।।_अर्थ_जीवननाथ ( प्राणनाथ ) वन को चलना चाहते हैं। देखें किस पुण्यवान् से उनका साथ होगा_शरीर और प्राण दोनों साथ जायेंगे या केवल प्राणही से इनका साथ होगा ? विधाता की करनी कुछ जानी नहीं जाती।





चारु चरन नख लेखति धरनीं। नूपुर मुख्य मधुर कबि बरनी।। मनहुं प्रेम बस बिनती करहीं। हमहिं सीय पग जनि परिहरहीं।।_अर्थ_सीताजी अपने सुंदर चरन के नखों से धरती कुरेद रही हैं। ऐसा करते समय नूपुरों का जो मधुर शब्द हो रहा है, कवि उसका इस प्रकार वर्णन करते हैं कि मानो प्रेम के वश होकर नूपुर यह विनती कर रहे हैं कि सीताजी के चरण कभी हमारा त्याग न करें।





मंजु बिलोचन मोचति बारी। बोलि देखि राम महतारी।। तात सुनहु सीय अति सुकुमारी। सास ससुर परिजनहि पिआरी।।_अर्थ_सीताजी सुन्दर नेत्रों से जल बहा रही हैं। उनकी यह दशा देखकर श्रीरामजी की माता कोसल्याजी बोलीं_हे तात ! सीता अत्यंत ही सुकुमारी है तथा सास ससुर और कुटुम्बी सभी को प्यारी हैं।





पिता जनक भूपालमनि ससुर भानुकुल भानु। पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु।।_अर्थ_इनके पिता जनक जी राजाओं के शिरोमणि हैं; ससुर सूर्यकुल के सूर्य हैं और पति सूर्यकुलरूपी कुमुदवन को खिलानेवाले तथा गुण और रूप के भण्डार हैं।





ज्मैं पुनि पुत्रवधू प्रिय पाई। रूप रासि गुन सील सुहाई।। नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई। राखेउं प्रान जानकिहिं लाई।।_अर्थ_फिर मैंने रूप की राशि, सुदर गुण और शीलवती प्यारी पुत्रवधू पायी है। मैंने इन ( जानकी ) को आंखों की पुतली बनाकर इनसे प्रेम बढ़ाया है और अपने प्राण इनमें लगा रखे हैं।





कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली। सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली।। फूलत फलत भयउ बिधि बामा। जानि न जाइ काह परिनामा।।_अर्थ_इन्हें कल्पलता के समान मैंने बहुत तरह से बड़े लाड़_प्यार के साथ स्नेहरूपी जल से सींचकर पाला है। अब इस लता के फूलने फलने के समय विधाता बाम हो गये। कुछ जाना नहीं जाता कि इसका क्या परिणाम होगा।





पलंग पीठ तजि गोद हिंडोरा। सीय न दीन्ह पग अवधि कठोरा।। जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊं। दीपबाति नहिं टारन कहऊं।।_अर्थ_सीता ने पलंग के ऊपर, गोद और हिंडोले को छोड़कर कठोर पृथ्वी पर कभी पैर नहीं रखा। मैं सदा संजीवनी जड़ी के समान ( सावधानी से ) इनकी रखवाली करती रही हूं ! कभी दीपक की बत्ती हटाने को भी नहीं कहती।





सोई सीय चलन चहति बन साथा। आयसु काह होई रघुनाथा।। चंद किरन रस रसिक चकोरी। रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी।।_अर्थ_वही सीता अब तुम्हारे साथ वन चलना चाहती है। हे रघुनाथ ! उसे क्या आज्ञा होती है ? चन्द्रमा की किरणों का रस ( अमृत ) चाहनेवाली  चकोरी सूर्य की ओर आंख किस तरह मिला सकती है।






करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जन्तु बन भूरि। बिष बाटिकां कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि।।_अर्थ_हाथी, सिंह, राक्षस आदि अनेक दुष्ट जीव_जन्तु वन में विचरते रहते हैं। हे पुत्र ! क्या विष  वाटिका में सुन्दर संजीवनी बूटी शोभा पा सकती है ?





बन हित कोल किरात किसोरी। रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी।। पाहन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ। तिन्हहिं कलेसु न कानन काऊ।।_अर्थ_वन के लिये तो ब्रह्माजी ने विषयसुख को न जाननेवाली कोल और भीलों की लड़कियों को रचा है, जिनका पत्थर के कीड़े जैसा कठोर स्वभाव है। उन्हें वन में कभी क्लेश नहीं होता।





कै तापस तिय कानन जोगू। जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू।। सिय बन बसिहि तात केहि भांति। चित्रलिखित कपि देखि डेराती।।_अर्थ_अथवा तपस्वियों की स्त्रियां वन में रहने योग्य हैं, जिन्होंने तपस्या के लिये सब भोग त्याग दिये हैं। हे पुत्र ! जो तस्वीर के बन्दर को देखकर डर जाती हैं वे सीता वन में किस तरह रह सकेंगी ? 





सुरसरि सुभग बनज बन चारी। डाबर जोगु कि हंसकुमारी।। अस बिचारि जस आयसु होई। मैं सिख देउं जानकिहि सोई।।_अर्थ_देवसरोवर के कमलवन में विचरण करनेवाली हंसिनि क्या गरैयों ( तलैयों ) में रहने के योग्य है ? ऐसा विचार कर जैसी तुम्हारी आज्ञा हो, मैं जानकी को वैसी ही शिक्षा दूं ?





जौं सिय भवन रहै कह अंबा। मोहि कहं होई बहुत अवलंबा।। सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी। सील सनेह सुधां जनु सानी।।_अर्थ_माता कहती हैं_यदि सीता घर में रहें तो मुझे बहुत सहारा हो जाय। श्रीरामचन्द्र जी ने माता की प्रिय बाणी सुनकर, जो मानो शील और स्नेह रूपी अमृत से सनी हुई थी,





कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्ह मातु परितोष। लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष।।_अर्थ_विवेकमय प्रिय वचन कहकर माता को संतुष्ट किया। फिर वन के गुण_दोष प्रकट करके वे जानकीजी को समझाने लगे।

Monday, 28 February 2022

अयोध्याकाण्ड

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ।। निज प्रतिबिंबु बरकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई।।_अर्थ_कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से पकड़ में न आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाहीं भले ही पकड़ आ जाय, पर भाई ! स्त्रियों की गति ( चाल ) नहीं जानी जाती।





काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ। का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ।।_अर्थ_आग क्या नहीं जला सकती ! समुद्र में क्या नहीं समा सकता ! अबला कहलाने वाली प्रबल स्त्री ( जाति ) क्या नहीं कर सकती ! और जगत् में काल किसको नहीं खाता !





का सुनाइ बिधि काह सुनावा। का देखाइ चह काह देखावा।। एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा।।_अर्थ_ विधाता ने क्या सुनाकर क्या सुना दिया और क्या दिखाकर अब क्या दिखाना चाहता है ! एक कहते हैं कि राजा ने अच्छा नहीं किया, दुर्बुद्धि कैकेयी को विचार कर वर नहीं दिया।





जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु। अबला बिबस ग्यानु गुनु गाजनु।। एक धर्म परमिति पहिचाने। नृपहिं  दोषु  देहिं सयाने।।_अर्थ_जो हठ करके ( कैकेयी की बात को पूरा करने में अड़े रहकर ) स्वयं सब दु:खों के पात्र हो गये। स्त्री के विशेष वश होने के कारण मानो उनका ज्ञान और गुण जाता रहा। एक ( दूसरे ) जो धर्म की मर्यादा को जानते हैं  और सयाने हैं, वे राजा को दोष नहीं देते।





सिबि दधीचि हरिचंद कहानी। एक एक सन कहहिं बखानी।। एक भरत कर संमत कहहीं। एक उदास भांय सुनि रहहीं।।_अर्थ_वे शिबि, दधीचि और हरिश्चन्द्र की कहानी एक_दूसरे से बखान कर कहते हैं। कोई एक सुनकर उदासी न भाव से रह जाते हैं ( कुछ बोलते नहीं ) ।





कान मूदि कर रद गहि जीहा। एक कहहिं यह बात अलीहा।। सुकृति जाहि अस कहत तुम्हारे। राम भरत कहुं प्रानपिआरे।।_अर्थ_ कोई हाथों से कान मूंदकर और जीभ को दांतों तले दबाकर कहते हैं कि यह बात झूठ है, ऐसी बात कहने से तुम्हारे पुण्य नष्ट हो जायेंगे। भरत जी को तो श्रीरामचन्द्रजी प्राणों के समान प्यारे हैं।






चन्दु चवै बरु अनल कन सुधा होई बिषतूल। सपनेहुं कबहुं न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल।।_अर्थ_चन्द्रमा चाहे ( शीतल किरणों की जगह ) आग की चिंगारियां बरसाने लगे और अमृत चाहे विष के समान हो जाय, परन्तु भरत स्वप्न में भी श्रीरामचन्द्रजी के विरुद्ध कुछ नहीं करेंगे।






एक बिधातहिं दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिनु जेहीं। खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह राहु उर मिटा उछाहू।।_अर्थ_कोई एक विधाता को दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर भर में खलबली मच गयी, सब किसी को सोच हो गया। हृदय में दु:सह जलन है  आनन्द_उत्साह मिट गया।





बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी। जे प्रिय परम कैकेई कैकेई केरी।। लगीं देन सिख सीलु सराही। बचन बानसम लागहिं ताही।।_अर्थ_ब्राह्मणों की स्त्रियां, कुल की माननीय बड़ी_बूढ़ी और जो कैकेयी की परम_प्रिय थीं, वे उसके शील की सराहना करके उसे सीख देने लगीं। पर उसको उनके वचन बाण के समान लगते हैं।





भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना।। करहु राम पर सहज सनेहू। केहि अपराध आजु बनु देहू।।_अर्थ_( वे कहती हैं_ ) तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्र के समान मुझको भरत भी प्यारे नहीं हैं; इस बात को सारा जगत् जानता है। श्रीरामचन्द्रजी पर भी तो तुम स्वाभाविक ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराध से उन्हें वन देती हो?





कबहुं न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू।। कौसल्या अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर जारा।।_अर्थ_तुमने कभी सौतिया डाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वास को जानता है। अब कौशल्या ने तुम्हारा कौन_सा बिगाड़ कर दिया, जिसके कारण तुमने सारे नगर पर वज्र गिरा दिया।





सीय कि पिय संग परिहरहिं लखनु कि रहिहहिं धाम। राज कि भूंजब भरत पुर नृपु कि रहिहहिं बिनु राम।।_अर्थ_क्या सीताजी अपने पति ( श्रीरामचन्द्रजी ) का साथ छोड़ देंगी ?  क्या लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजी के बिना घर रह सकेंगे ? क्या भरत श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्यापुरी का राज्य भोग सकेंगे ? और क्या राजा श्रीरामचन्द्रजी के बिना जीवित रह सकेंगे ? ( अर्थात् न सीताजी यहां रहेंगी, न लक्ष्मणजी रहेंगे न भर्ती राज करेंगे और न राजा ही जीवित रहेंगे; सब उजाड़ हो जायगा। 






अस बिचारि उर छाड़हु कोहू। सोक कलंक कोठि जनि होहू।। भरतहिं अवसि देहु जुबराजू। कानन काह राम कर काजू।।_अर्थ_हृदय में ऐसा विचार कर क्रोध छोड़ दो, शोक और कलंक की कोठी मत बनो। भरत को अवश्य युवराज पद दो, पर श्रीरामचन्द्रजी का वन में क्या काम है !





नाहिंन राम राज के भूखे। धरम धुरीन बिषय रस रूखे।। गुर गृह बसहुं रामु तजि गेहू। नृप सन अस बरु दूसर लेहू।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी राज के भूखे नहीं हैं। वे धर्म की दूरी को धारण करनेवाले विषय रस से रूखे हैं ( अर्थात् उनमें विषयाशक्ति है ही नहीं। ( इसलिये तुम यह शंका न करो कि श्री रामजी वन न गये तो भरत के राज्य में विघ्न करेंगे; इतने पर भी मन न माने तो ) तुम राजा से दूसरा ऐसा ( यह ) वर ले लो श्रीराम घर छोड़कर गुरु के घर रहें।





जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे। नहिं लगिहि कछु हाथ तुम्हारे।। जौं परिहास कीन्हि कछु होई। जौं कहि प्रगट जनावहु सोई।।_अर्थ_जो तुम हमारे कहने पर न चलोगी तो तुम्हारे हाथ कुछ भी नहीं लगेगा। यदि तुमने कुछ हंसी की हो तो उसे प्रगट में कहकर जना दो ( कि मैंने दिल्लगी की है )।





राम सरिस सुत कानन जोगू। काह कहिहहिं सुनि तुम्ह कहुं लोगू।। उठहु बेगि सोई करहु उपाई। जेहिं बिधि सोकु कलंकु नसाई।।_अर्थ_राम_सरीखा पुत्र क्या वन के योग्य है ? यह सुनकर लोग तुम्हें क्या कहेंगे ! जल्दी उठो और वही उपाय करो जिस उपाय से इस शोक और कलंक का नाश हो। 





जेहिं भांति सोकु कलंकु जाय उपाय करि कुल पालहि। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसर चालहि।। जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चन्द बिनु जिमि जामिनी। जिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जिमि भामिनी।।_अर्थ_जिस तरह ( नगरभर का ) शोक और तुम्हारा कलंक मिटे, वहीं उपाय करके कुल की रक्षा कर। वन जाते हुए श्रीरामजी को हठ करके लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं_जैसे सूर्य के बिना दिन, प्राण के बिना शरीर और चन्द्रमा के बिना रात ( निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाते हैं ) वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्या हो जायेगी; हे भामिनि ! तू अपने हृदय में इस बात को समझ ( विचारकर देख ) तो सही। 




सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित। तेईं कछु कान न दीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी।।_अर्थ_इस प्रकार सखियों ने ऐसी सीख दी जो सुनने में मीठी और परिणाम में हितकारी थी। पर कुटिला कुबरी की सिखाती पढ़ाई हुई कैकेयी ने इसपर जरा भी कान नहीं दिया।





उतरु न देई दुसह रिस रूखी। मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी।। ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी।  कहत मतिमन्द अभागी।।_अर्थ_कैकेयी कोई उत्तर नहीं देती, वह दु:सह क्रोध के मारे रूखी हो रही है। ऐसे देखती है मानो भूखी बाघिन हरिनियों को देख रही हो। तब सखियों ने रोग को असाध्य समझकर उसे छोड़ दिया। सब उसको मन्दबुद्धि अभागिनि कहती हुई चल दीं।





राजु करत यह दैअं बिगोई। कीन्हेसि अस जस करई न कोई।। एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारी। जेहिं कुचालिहि कोटिक गारीं।।_अर्थ_राज्य करते हुए इस कैकेई को दैव ने नष्ट कर दिया। इसने जैसा कुछ किया, वैसा कोई भी न करेगा। नगर के सब स्त्री_पुरुष ऐसा विलाप कर रहे हैं और उस कुमारी कैकेयी को करोड़ों गालियां दे रहे हैं।





जरहिं बिषम जल लेहिं उसासा। कवनि राम बिनु जीवन आसा।। बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी। तनु जलचर गन सूखत पानी।।_अर्थ_लोग विषमज्वर ( भयानक दु:ख की आग ) से जल रहे हैं। लंबी सांसें लेते हुए वे कहते कि श्रीरामचन्द्रजी के बिना जीने की कौन आशा है। महान् वियोग ( की आशंका ) से प्रजा ऐसी व्याकुल हो गयी है मानो पानी सूखने के समय जलचर जीवों का समुदाय व्याकुल हो।





अति बिषाद बस लोग लोगाईं। गए मातु पहिं रामु गोसाईं।। मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ। मिटा सोचु जनि राखै राऊ।।_अर्थ_सभी पुरुष और स्त्रियां अत्यन्त विषाद के वश हो रहे हैं। स्वामि श्रीरामचन्द्रजी माता कौशल्या के पास गये। उनका मुख प्रसन्न हैं और चित्त में चौगुना चाव ( उत्साह ) है। यह सोच मिट गया है कि राजा कहीं रख न लें। ( श्रीरामजी को राजतिलक की बात सुनकर विषाद हुआ था कि सब भाइयों को छोड़कर बड़े भाई मुझको ही राजतिलक क्यों होता है। अब माता कैकेयी की आज्ञा और पिता की मौन सम्मति पाकर वह सोच मिट गया।)





नव गयंदु रघुबीर मनु राजु मलान समान। छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का मन  पकड़े हुए हाथी के समान और राजतिलक उस हाथी के बांधने की कांटेदार लोहे की बेरी के समान है। ‘वन जाना है’ यह सुनकर अपने को बंधन से छूटा जानकर, उनके हृदय में आनन्द बढ़ गया है।




रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा। मुदित मातु पद नायउ माथा।। दीन्ह असीस लाइ उर लीन्हे। भूषण बसन निछावरि कीन्हे।।_अर्थ_ रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी ने दोनों हाथ जोड़कर आनंद के साथ माता के चरणों में सिर नवाया। माता ने आशीर्वाद दिया, अपने हृदय से लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये।





बार बार मुख चुंबति माता नयन नेह जलु पुलकित गाता।। गोद राखि पुनि हृदय लगाए। स्रवत प्रेमरस पयद सुहाए।।_अर्थ_माता बार_बार श्रीरामचन्द्रजी का मुख चूम रही है। नेत्रों में प्रेम का जल भर आया है और सब अंग पुलकित हो गये हैं। श्रीराम को अपनी गोद में बैठाकर  फिर हृदय से लगा लिया और उनपर गहने तथा कपड़े न्यौछावर किये।





प्रेम प्रमोदु न कछु कहि जाई। रंक धनद पदबी जनु पाई।। सादर सुन्दर बदनु निहारी। बोली मधुर बचन महतारी।।_अर्थ_उनका प्रेम और आनंद कुछ कहा नहीं जाता। मानो कंगाल ने कुबेर का पद पा लिया हो। बड़े आदर के साथ सुन्दर मुख देखकर माता मधुर वचन बोलीं_

Sunday, 30 January 2022

अयोध्याकाण्ड

लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे। मगहं गयादिक तीरथ जैसे।। रामहि मातु बचन सब भाए। जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए।।_अर्थ_कैकेयी के बुरे मुख से ये सुंदर वचन कैसे लगते हैं जैसे मगध देश में गया आदि तीर्थ ! श्रीरामचन्द्र जी को माता कैकेयी के सब वचन ऐसे अच्छे लगे जैसे गंगाजी में जाकर ( अच्छे_बुरे सभी प्रकार के ) जल शुभ, सुंदर हो जाते हैं। 





गई मुर्छा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह। सचिव आगमन कहि तब बिनय समय सम कीन्ह।।_अर्थ_इतने में राजा की मूर्छा दूर हुई, उन्होंने राम का स्मरण करके ( ‘राम_राम’ कहकर ) फिरकर करवट ली। मंत्री ने श्रीरामचन्द्र जी का आना कहकर समयानुकूल विनती की।





अवनिप अकनि रामु पगु धारे। धरि धीरजु तब नयन उघारे।। सचिवं संभालि राउ बैठारे। चरन परत नृप राम निहारे।।_अर्थ_ जब राजा ने सुना कि श्रीरामचन्द्र पधारे हैं तो उन्होंने धीरज धरके नेत्र खोले। मंत्री ने संभालकर राजा को बैठाया। राजा ने श्रीरामचन्द्र जी को अपने चरणों में पड़ते ( प्रणाम करते ) देखा।





लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुं फनिक फिरि आई।। रामहिं चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू।।_अर्थ_स्नेह से बिकल राजा ने रामजी को हृदय से लगा लिया। मानो सांप ने अपनी खोयी हुई मनि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी रामजी को देखते रह गये। उनके नेत्रों से आंसुओं की धारा बह चली।





सोक बिबस कछु कहै न पारा। हृदयं लगावत बारहिं बारा।। बिधिहि मनाव राउ मन माहीं। जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं।।_अर्थ_शोक के विशेष वश होने के कारण राजा कुछ कह नहीं सकते। वे बार_बार श्रीरामचन्द्रजी को हृदय से लगाते हैं और मन में ब्रह्माजी को मनाते हैं कि जिससे श्रीरघुनाथजी वन को न जायं।





सुमिरि महेसहिं कहइ निहोरी। बिनती सुनहु सदाशिव मोरी।। आसुतोष तुम्ह अवढ़र दानी। आरति हरहुं दीन जनु जानी।।_अर्थ_फिर महादेवजी का स्मरण करके उनसे निहोरा करते हुए कहते हैं_हे सदाशिव ! आप मेरी विनती सुनिये। आप आशुतोष ( शीघ्र प्रसन्न होनेवाले ) और अवढ़रदानी ( मुंहमांगा दे डालने वाले ) हैं। अतः मुझे अपना दीन सेवक जानकर मेरे दु:ख को दूर कीजिये।





तुम्ह प्रेरक सबके हृदयं सोइ मति रामहि देहु। बचनु मोर तजि रहहिं घर परिहरि सीलु सनेहु।।_अर्थ_आप प्रेरक रूप से सबके हृदय में हैं। आप श्रीरामचन्द्र को ऐसी बुद्धि दीजिए जिससे वे मेरे वचन को त्यागकर और शील सनेह को छोड़कर घर ही में रह जायं।





अजसु होउ जग सुजस नसाऊ। नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ।। सब दुख दुसह सहाहहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होहीं।।_अर्थ_जगत् में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे ( नया पाप होने से ) मैं नरक में गिरूं, अथवा स्वर्ग चला जाय ( पूर्व पुण्यों के फलस्वरूप मिलने वाला स्वर्ग चाहे मुझे न मिले )। और भी सब प्रकार के दु:सह दुख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आंखों की ओट न हों।





सब मन गुनइ राउ नहीं बोला। पीपल पात सरिस मनु डोला।  रघुपति पितहि प्रेम बस जानी। पुनि कछु कहिहहिं मातु अनुमानी।।_अर्थ_राजा मन_ही_मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपल के पत्ते की तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजी ने पिता को प्रेमधन जानकर और यह अनुमान कर कि माता फिर कुछ कहेगी ( तो पिताजी को दुःख होगा )_





देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी।। तात कहउं कछु करउं ढिठाई। अनुचित छमब जानि लरिकाई।।_अर्थ_ देश, काल और अवसर के अनुकूल विचार कर विनीत वचन कहे_ हे तात ! मैं कुछ कहता हूं, यह ढ़िठाई करता हूं। इस अनौचित्य को मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजिएगा।





अति लघु बात लागि दुखु पावा। काहुं न मोहि कहि प्रथम जनावा।। देखि गोसाइंहि पूछिउं माता। सुनि प्रसंगु भै सीतल गाता।।_अर्थ_ इस अत्यन्त तुच्छ बात के लिये आपने इतना दु:ख पाया। मुझे किसी ने पहले कहकर यह बात नहीं जतायी। स्वामी ( आप ) को इस दशा में देखकर मैंने माता से पूछा। उन्हें सारा प्रसंग सुनकर मेरे सब अंग शीतल हो गये ( मुझे बड़ी प्रसन्नता हुई।





मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात। आयसु देइअ हरषि हियं कहि पुलके प्रभु गात।।_अर्थ_हे पिताजी ! इस मंगल के समय स्नेहवश होकर सोच करना छोड़ दीजिये और हृदय में प्रसन्न होकर मुझे आज्ञा दीजिये। यह कहते हुए प्रभु श्रीरामजी सर्वांग पुलकित हो गये।





धन्य जनमु जगतीतल तासू। पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू।। चारि पदार्थ करतल ताकें। प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें।।_अर्थ_( उन्होंने फिर कहा_) इस पृथ्वी तल पर उसका जन्म धन्य है जिसके चरित्र सुनकर पिता को परम आनन्द हो। जिसको माता_पिता प्राणों के समान प्रिय हैं, चारों पदार्थ ( अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष ) उसके करतलगत ( मुट्ठी में ) रहते हैं।





आयसु पालि जनमु फलु पाई। एहउं बेगिहिं होउ रजाई।। विदा मातु सन आवउं मांगी। चलिहउं बनहि बहुरि पद लागी।।_अर्थ_आपकी आज्ञा पालन करके और जन्म का फल पाकर मैं जल्दी ही लौट आऊंगा, अत: कृपया आज्ञा दीजिये।
 माता से विदा मांग आता हूं। फिर आपके पैर रखकर ( प्रणाम करके ) वन को चलूंगा।





अस कहि राम गवनु तब कीन्हां। भूप सोक बस उतरु न दीन्हा।। नगर ब्यापि गई बात सुतीछी। छुअत चढ़ी तनु सब तन बीछी।।_अर्थ_ऐसा कहकर तब श्रीरामचन्द्रजी वहां से चल दिये। राजा ने शोकवश कोई उत्तर नहीं दिया। वह बहुत ही तीखी ( अप्रिय ) बात नगर भर में इतनी जल्दी फैल गरी मानो डंक मारते ही बिच्छू का विष सारे शरीर में चढ़ गया हो।





सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी।। जो जहं सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई।।_अर्थ_इस बात को सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल (  वन में आग लगी ) देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहां सुनता है वहीं सिर धुनने ( पीटने ) लगता है ! बड़ा विषाद है, किसी को धीरज नहीं बंधता।





मुख सुखाहिं लोचन स्रवहिं सोकु न हृदयं समाइ। मनहुं करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ।।_अर्थ_सबके मुख सूखे जाते हैं, शोक हृदय में नहीं समाता। मानो करुणारस की सेना अवध पर डंका बजाकर उतर आयी हो।





भलेहि  बिधि बात बेगारी। जहं तहं जेहिं कैकइहि गारी।। एहि पापिनिहि सूझि का परेऊ। छाइ भवन पर पावक धरेऊ।। सब मेल मिल गये थे ( सब संजोग ठीक हो गये थे ), इतने में ही विधाता ने बात बिगाड़ दी ! जहां तहां लोग कैकेयी को गाली दे रहे हैं ! इस पापिन को क्या सूझा पड़ा जो इसने छाये घर पर आग लगा दी।





निज कर नयन काढ़ि चह दीखा। बादि सुधा बिष चाहत चीखा।। कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी। भइ रघुबंस बेनु बन आगी।।_अर्थ_ यह अपने हाथ से अपने आंखों को निकालकर ( आंखों के बिना ही ) देखना चाहती है, और अमृत फेंक कर विष चखना चाहती है ! यह कुटिल, कठोर, दुर्बुद्धि और अभागिनी कैकेई रघुवंश रूपी बांस वन के लिये अग्नि हो गयी।





पालव बैठि पेड़ एहिं काटा। सुख महुं सोक ठाटु धरि ठाटा। सदा रामु एहि प्रान समाना। कारन कवन कुटिलपनु ठाना।।_अर्थ_पत्ते पर बैठकर इसने पेड़ को काट डाला। सुख में शोक का ठाट डटकर रख दिया। श्रीरामचन्द्रजी इसे सदा प्राणों के समान प्रिय थे। फिर भी न जाने किस कारण उसने यह कुटिलता ठानी।




Wednesday, 12 January 2022

अयोध्याकाण्ड

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु। सहमि परेउ लघु सिंघिनिहीं मनहुं बृद्ध गजराजु।।_अर्थ_रघुबंसमनि श्रीरामचन्द्रजी ने जाकर देखा कि राजा अत्यंत ही बुरे हालत में पड़े हैं। मानो सिंहनि को देखकर कोई बूढ़ा गजराज सहमकर गिर पड़ा हो।





सूखहिं अधर जरइ सब अंगू। मनहुं दीन मनिहीन भुअंगू।। सरुष समीप देखि कैकेई। मानहुं मीचु घरी गनि लेई।।_अर्थ_राजा के ओंठ सूख रहे हैं और सारा शरीर जल रहा है, मानो मणि के बिना सांप दुखी हो रहा है। पास ही क्रोध में भरी कैकेयी को देखा, मानो साक्षात् मृत्यु ही बैठी राजा के जीवन की अन्तिम घड़ियां गिन रही हों।





करुनामय मृदु राम सुभाऊ। प्रथम दीख दुख सुना न काऊ।। तदपि धीर धरि समउ बिचारी। पूछीं मधुर बचन महतारी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी का स्वभाव कोमल और करुणामय है। उन्होंने ( अपने जीवन में ) पहली बार यह दु:ख देखा; इससे पहले कभी दु:ख सुना भी न था। तो भी समय का विचार कर हृदय में धीरज धरकर उन्होंने मीठे वचनों से माता कैकेयी से पूछा_





मोहि कहु मातु तात दुख कारन। करिअ जतन जेहिं होई निवारन।। सुनहु राम सब कारन एहू। राजहि तुम्ह पर बहुत सनेहू।।_अर्थ_हे माता ! मुझे पिताजी के दु:ख का कारण कहो ताकि उससे उसका निवारण हो ( दु:ख दूर हो ) वह यत्न किया जाय। ( कैकेयी ने कहा_) हे राम ! सुनो, सारा कारण यही है कि राजा का तुम पर बहुत स्नेह है।





देन कहेन्हि मोहि दुआ बरदाना। मांगें जो कछु मोहि सोहाना।। सो सुनि भयउ भूप उर सोचूं। छाड़िअ न सकहिं तुम्हार संकोचू।।_अर्थ_इन्होंने मुझे दो वरदान देने को कहा । मुझे जो कुछ अच्छा लगा, वहीं मैंने मांगा। उसे सुनकर राजा के ह्रदय में सोच हो गया।; क्योंकि ये तुम्हारा संकोच नहीं छोड़ सकते।





सुत सनेहु इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु। कहुं तो आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु।।_अर्थ_इधर तो पुत्र का स्नेह है और उधर वचन ( प्रतिज्ञा ); राजा इसी धर्मसंकट में पड़ गये हैं। यदि तुम कर सकते हो, तो राजा की आज्ञा शिरोधार्य करो और इनके कठिन क्लेश को मिटाओ।





निधरक बैठि कहा कटु बानी। सुनत कठिनता अति अकुलानी।। जीभ कमान बचन सर नाना। मनहुं महीप मृदु लच्छ समाना।।_अर्थ_कैकेयी बेधड़क बैठी ऐसी कड़वी बाणी कह रही है जिसे सुनकर स्वयं कठोरता भी अत्यंत व्याकुल हो उठी। जीभ धनुष है, वचन बहुत_से तीर हैं और राजा ही कोमल निशाने के समान है।





जनु कठोरपन धरे सरीरू। सिखइ धनुष विद्या बर बीरू।। सबु प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई। बैठि मनहुं तनु धरि निठुराई।।_अर्थ_(इस सारे साज_समान के साथ ) मानो स्वयं कठोरपन श्रेष्ठ वीर का शरीर धारण करके धनुष विद्या सीख रहा है। श्री रघुनाथजी को सब हाल सुनाकर वह ऐसे बैठी है मानो निष्ठुरता ही शरीर धारण किये हुए हो।





मन मुसुकाइ भानुकुल भानू। रामु सहज आनंद निधानू।। बोले बचन बिगत सब दूषन। मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन।।_अर्थ_सूर्यकुल के सूर्य, स्वाभाविक ही आनंदनिधान श्रीरामजी मन में मुस्कराकर सब दूषनों से रहित ऐसे कोमल और सुंदर वचन बोले जो मानो वाणी के भूषण ही थे_





सुनु जननी सोई सुत बड़भागी। जो पितु मातु बचन अनुरागी।। तनय मातु पितु तोषनिहारा। दुर्लभ जननी सकल संसारा।।_अर्थ_हे माता ! सुनो, वहीं पुत्र बड़भागी है, जो पिता_माता के वचनों का अनुरागी ( पालन करनेवाला ) है। ( आज्ञा पालन के द्वारा ) माता_पिता को संतुष्ट करनेवाला पुत्र, हे जननी ! सारे संसार में दुर्लभ है।





मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहिं भांति हित मोर। तेहि महं पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर।।_अर्थ_वन में विशेष रूप से मुनियों का मिलाप होगा, जिसमें मेरा  सभी प्रकार से कल्याण है। उसमें भी, फिर पिताजी की आज्ञा और हे जननी ! तुम्हारी सम्मति है।





भरत प्राणप्रिय पावहिं राजू। बिधि सब बिधि मोहि सम्मुख आजू।। जौं न जाऊं बन ऐसेहु काजा। प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा।।_अर्थ_और प्राणप्रिय भरत राय पालेंगे। ( इन सभी बातों को देखकर यह प्रतीत होता है कि ) आज विधाता सब प्रकार से मेरे सम्मुख हैं ( मेरे अनुकूल हैं )। यदि ऐसे काम के लिये भी मैं वन को न जाऊं तो मूर्खों के समाज में सबसे पहले मेरी गिनती करनी चाहिये। 





सेवहिं अरंडु कल्पतरु त्यागी। परिहरि अमृत लेहिं
बिष मांगी।। तेहि न पाई अब समउ चुकाहीं। देखु बिचारि मातु मन माहीं।।_अर्थ_ जो कल्पवृक्ष को छोड़कर रेंड की सेवा करते हैं और अमृत त्यागकर विष मांग लेते हैं, हे माता ! तुम मन में विचार कर देखो, वे ( महामूर्ख ) भी ऐसा मौका पाकर कभी न चूकेंगे।





अंब एक दुख मोहि बिसेषी। निपट बिकल नरनायकु देखी।। थोरिहिं बात पितहिं दुख भारी। होति प्रतीति न मोहि महतारी।।_अर्थ_ हे माता ! मुझे एक ही दुख विशेष रूप से हो रहा है, वह महाराज को अत्यंत व्याकुल देखकर। इस थोड़ी_सी बात के लिये ही पिताजी को इतना भारी दुख हो, हे माता मुझे इस बात पर विश्वास नहीं होता।





राउ धीर गुन उदधि अगाधू। भा मोहि तें कछु बड़ अपराधू।। जातें मोहि न कहत कछु राऊ। मोरि सपथ मोहि कहुं सतिभाऊ।।_अर्थ_क्योंकि महाराज तो बड़े ही धीर और गुणों के अथाह समुद्र हैं। अवश्य ही मुझसे कोई बड़ा अपराध हो गया है, जिसके कारण महाराज मुझसे कुछ नहीं कहते। तुम्हें मेरी सौगंध है, माता ! तुम सच_सच कहो।





सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान। चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान।।_अर्थ_रघुकुल में श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी के स्वभाव से ही सीधे वचनों को दुर्बुद्धि कैकेई टेढ़ा ही करके जान रही है; जैसे यद्यपि जल समान ही होता है, परन्तु जोंक उसमें टेढ़ी चाल से ही चलती हैं।





रहसि रानी राम रुख पाई। बोली कपट सनेहु जनाई।। सपथ तुम्हार भरत कै आना। हेतु न दूसर मैं कछु जाना।।_अर्थ_रानी कैकेयी श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर हर्षित हो गयी और कपटपूर्ण स्नेह दिखाकर बोली_तुम्हारी शपथ और भरत की सौगंध है, मुझे राजा के दुख का दूसरा कुछ भी कारण विदित नहीं है।





तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता। जननी जनक बंधु सुखदाता।। राम सत्य सबु जो कछु कहहू। तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू।।_अर्थ_हे तात ! तुम अपराध के योग्य नहीं हो ( तुमसे माता पिता का अपराध बन पड़े, यह संभव नहीं ) । तुम तो माता_पिता और भाइयों को सुख देने वाले हो। हे राम ! तुम जो कुछ कह रहे हो, सब सत्य है। तुम पिता_माता के वचनों ( के पालन ) में तत्पर हो।





पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई। चौथेपन जेहिं अजसु न होई।। तुम्ह सम सुअन सुकृति जेहिं दीन्हे। उचित न ताहु निरादरु कीन्हे।।_अर्थ_मैं तुम्हारी बलिहारी जाती हूं, तुम पिता को समझा कर वहीं बात कहो जिससे चौथेपन ( बुढ़ापे ) में इनका अपयश न हो। जिस पुण्य ने इनको तुम जैसे पुत्र दिये हैं उसका निरादर करना उचित नहीं।