Sunday, 26 February 2023

अयोध्याकाण्ड

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।। एक कहहिं ए सहज सुहाए। अपुन प्रगट भए बिधि न बनाएं ।।_अर्थ_जों ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत् में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं_ये स्वभाव से ही सुंदर हैं ( इनका सौन्दर्य_माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है )। ये अपने_आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा के बनाये नहीं।




जहं लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मनु गोचर बरनी।। देखहु खोजि भुवन दस चारी। कहु अस पुरुष कहां असि नारी।।_अर्थ_हमारे कानों, नेत्रों और मन के द्वारा अनुभव में आनेवाली विधाता की करनी को जहां तक वेदों ने वर्णन करके कहा है, वहां तक चौदहों लोकों में ढ़ूंढ़ देखो, ऐसा पुरुष और ऐसी स्त्री कहां हैं ? ( कहीं भी नहीं है, इसी से सिद्ध है कि ये विधाता के चौदहों लोकों से अलग है और अपनी महिमा से अपने आप निर्मित हुए हैं।





इन्हहिं देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।। कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। जेहिं इरिषा बन अनि दुराए।।_अर्थ_इन्हें देखकर विधाता का मन अनुरक्त ( मुग्ध ) हो गया, तब वह भी इन्हीं की उपमा के योग्य दूसरे स्त्री_पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, किन्तु कोई उसकी अटकल में ही नहीं आये ( पूरे नहीं उतरे )। इसी ईर्ष्या के मारे उसने इनको जंगल में लाकर छिपा दिया है।





एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।। ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।_अर्थ_कोई एक कहते हैं_हम बहुत अधिक नहीं जानते। हां, अपने को परम धन्य अवश्य समझते हैं ( जो इनके दर्शन कर रहे हैं ) और हमारी समझ में वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इन्हें देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे।







एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहिहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।_अर्थ_इस प्रकार प्रिय वचन कह_कहकर सब नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीर वाले दुर्गम ( कठिन ) मार्ग में कैसे चलेगें।




नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकईं सांझ समय जनु सोहीं।। मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयं कहहिं बर बानी।।_अर्थ_स्त्रियां स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो संध्या के समय चकवी ( भावी वियोग की पीड़ा से ) सोह रही हों ( दुखी हो रही हों )। इनके चरणकमलों को कोमल तथा मार्ग को कठोर जानकर वे व्यथित हृदय से उत्तम वाणी कहती हैं।




परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचित महि जिमि हृदय हमारे।। जौं जगदीस इन्हहिं बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।_अर्थ_इनके कोमल और लाल_लाल चरणों ( तलवों ) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वर ने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्ते को पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया?




जौं मांगा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आंखिन्ह माहीं।। जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय राम न देखन पाए।।_अर्थ_यदि ब्रह्मा से मांगे तो हे सखि ! ( हम तो उनसे मांगकर ) इन्हें अपनी आंखों में ही रखें ! जो स्त्री_पुरुष इस अवसर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजी को नहीं देख सके।






सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहां लगि भाई।। समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।_अर्थ_उनके सौन्दर्य को सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई ! अबतक वे कहां तक गये होंगे ? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्म का फल पाकर, विशेष आनंदित होकर लौटते हैं। 





गांव गांव अब होई अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।। जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।।_अर्थ_सूर्यकुलरूपी कुमुदिनी के प्रफुल्लित करने वाले चन्द्रमा स्वरूप श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कर गांव_गांव में ऐसा ही आनंद हो रहा है। जो लोग ( वनवास दिये जाने का ) कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राज_रानी ( दशरथ_कैकेयी ) को दोष लगाते हैं।




कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जेहि लोचन लाहू।। कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाई।।_अर्थ_कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रों का लाभ दिया। स्त्री _पुरुष सभी आपस में सीधी, स्नेह भरी सुन्दर बातें कर रहे हैं।




ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहां तें आए।। धन्य सो देसु सैलु बन गाऊं। जहं जहं  जाहिं धन्य सोइ ठाऊं।।_अर्थ_( कहते हैं _ ) वे माता_पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। वह नगर धन्य हैं जहां से ये आते हैं। वह देश, पर्वत, वन और गांव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहां जहां ये जाते हैं।




सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहिं के सब भांति सनेही।। राम लखन पथ कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।_अर्थ_ब्रह्मा ने उसी को रचकर सुख पाया है जिसके ये  ( श्रीरामचन्द्र जी ) सब प्रकार से स्नेही हैं। पथिकरूप श्रीराम_लक्ष्मण की सुन्दर कथा सारे रास्ते  जंगल में जा गयी है।




एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।_रघुकुलरुपी कमल के खिलानेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मण जी सहित वन को देखते हुए चले जा रहे हैं। 




आगें राम लखनु बनु पाछें। तापस बेस बिराजत काछें।। उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें।।_अर्थ_आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मण जी सुशोभित हैं। तपस्वियों  के वेष बनाये दोनों बड़ी शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच में सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया।





बहुरि कहउं छबि जब मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।। उपमा बहुरि कहउं जियं जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।_अर्थ_फिर जैसी छबि मेरे मन में बस रही है, उसको कहता हूं_ मानो बसंत ऋतु और कामदेव के बीच में रति ( कामदेव की स्त्री ) शोभित हो। फिर अपने हृदय में खोजकर उपमा कहता हूं कि मानो बुध ( चन्द्रमा के पुत्र ) और चन्द्रमा के बीच में रोहिणी ( चन्द्रमा की स्त्री ) सोह रही हो।

Thursday, 9 February 2023

अयोध्या काण्ड

मिटा मोद मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेइ जनु छीने।। समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।_अर्थ_उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो। कर्म की गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया।




लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ। फेरे सब प्रिय बचन अहि लिये लाइ मन साथ।।_अर्थ_तब लक्ष्मण जी और जानकी जी सहित श्री रघुनाथ जी ने गमन किया और सब लोगों को प्रिय वचन कहकर लौटाया, किन्तु उसके मनों को अपने साथ ही लगा लिया।



फिरत नारि नर अति पछिताहीं। दैअहिं दोषु देहिं मन माहीं।। सहित बिषाद परस्पर कहहीं। बिधि करतब उल्टे सब अहहीं।।_अर्थ_लौटते हुए वे स्त्री_पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन_ही_मन दैव को दोष देते हैं। परस्पर बड़े ही विषाद के साथ कहते हैं कि विधाता के सभी काम उल्टे हैं।





निपट निरंकुस निष्ठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।। रूख कल्पतरु सागरु खारा। जेहिं पड़े बन राजकुमारा।।_अर्थ_वह विधाता बिलकुल निरंकुश ( स्वतंत्र ) निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमा को रोगी ( घटने_बढ़नेवाला ) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्ष को पेड़ और समुद्र को खारा बनाया। उसी ने इन राजकुमारों को वन में भेजा है। 




जौं पै इन्हहिं दीन्ह बनवासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।। ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।।_अर्थ_जब विधाता ने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग_विलास व्यर्थ ही बनाये। जब ये बिना जूते के ( नंगे ही पैरों ) रास्ते में चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन ( सवारियां ) व्यर्थ ही रचे।





ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।। तरुबर बास इन्हहिं बिधि दीन्हा। धवल नाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।_अर्थ_जब ये कुश और पत्ते बिछाकर जमीन पर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुंदर सेज ( पलंग और बिछौने ) किसलिए बनाता है ? विधाता ने जब इनको बड़े _बड़े पेड़ों ( के नीचे ) का निवास दिया, तब उज्जवल महलों को बना_बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया।




जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भांति भूषन बसन बादि किए करतार।।_अर्थ_जो ये सुंदर और अत्यंत सुकुमार होकर मुनियों के ( वल्कल ) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार ( विधाता ) ने भांति_भांति के गहने और कपड़े वृथा ही बनाये।

Thursday, 2 February 2023

अयोध्याकाण्ड

जटा मुकुट सीसनि सुभाग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर वसंत स्वेद कन जाल।।_अर्थ_उनके सिरों पर सुन्दर जटाओं के मुकुट हैं; वक्ष:स्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखों पर पसीने की बूंदों का समूह शोभित हो रहा है।




बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।। राम लखन सिय सुन्दरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।।_अर्थ_उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी की सुन्दरता को सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनों को लगाकर देख रहे हैं। 





थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुं मृगी मृग देखि दिया से।। सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूछत अति सनेह सकुचाहीं।।_अर्थ_प्रेम के प्यासे ( वे गांवों के ) स्त्री_पुरुष ( इनके सौन्दर्य_माधुर्य की छटा देखकर ) ऐसे थकित रह गये जैसे दीपक को देखकर हिरणी और हिरण ( निस्तब्ध रह जाते हैं ) ! गांवों की स्त्रियां सीताजी के पास जाती हैं; परन्तु अत्यंत स्नेह के कारण पूछते हुए सकुचाती हैं।






बार बार सब लागहिं पाएं। कहहिं बचन मृदु सरल सुनाएं।। राजकुमारी बिनय हम करहीं। तिय सुभायं कछु पूछत डरहीं।।_अर्थ_बार_बार सब उनके पांव रखतीं और सहज ही सीधे _सादे कोमल बचना कहती हैं_हे राजकुमारी! हम विनती करती ( कुछ निवेदन करना चाहती ) हैं, परन्तु स्त्री स्वभाव के कारण पूछते हुए डरती हैं।






स्वामिनि अबिनय छबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवांरी।। राजकुमारी दोउ सहज सलोने। इन्ह की लहीं दुति मरकत सोने।।_अर्थ_हे स्वामिनि ! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गवांरी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही लावण्यमय ( परम सुन्दर ) हैं। मरकतमनि ( पन्ने ) और सुवर्ण ने कान्ति इन्हीं से पायी है ( अर्थात् मरकतमनि और सुवर्ण में जो हरित और स्वर्ण वर्ण की आभा है वह इनकी हरिताभनील और स्वर्णकान्ति के एक कण के बराबर भी नहीं है।






स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरी नाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।_अर्थ_श्याम और गौर वर्ण है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभा के नाम हैं। शरद्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान इनके मुख शरद् ऋतु के कमल के समान इनके नेत्र हैं।




कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।। सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुं मुसुकानी।।_अर्थ_हे सुमुखि ! कहो तो अपनी सुन्दरता से करोड़ों कामदेवों को लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं ? उनको ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सीताजी सकुचा गयीं और मन_ही_मन मुस्करायीं।






तिन्हहिं बिलोकि बिलोकति धरनीं। दुहुं संकोच सकुचति बरबरनी।। सकुचि सप्रेम बाल मृगनयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।_अर्थ_उत्तम ( गौर ) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर ( संकोचवश ) पृथ्वी की ओर उन्हें देखती हैं। वे दोनों ओर के संकोच से सकुचा रही हैं ( अर्थात् न बताने में ग्राम की स्त्रियों को दु:ख होने का संकोच है और बताने में लज्जारूप संकोच )। हिरण के बच्चे के सदृश नेत्र वाली और कोकिल की_सी वाणी वाली सीताजी सकुचाकर प्रेमसहित मधुर वचन बोलीं_





सहज सुभाय सुभाग तनु गोरे। नाम लखन लघु देवर मोरे।। बहुरि बदन बिधु अंचल ढ़ांकी। पिय तन चितइ भौंह करि बांकी।।_अर्थ_ये जो सहज स्वभाव, सुंदर और गोरे शरीर के हैं, उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजी ने ( लज्जावाश ) अपने चन्द्रमुख को आंचल से ढ़ककर और प्रियतम ( श्रीरामजी ) की ओर निहारकर भौंहें टेढ़ी करके,_





खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहिं सिय सयननि।। भईं मुदित सब ग्राम बधूटी। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।_अर्थ_खंजन पक्षी के_से सुंदर नेत्रों को तिरछा करके सीताजी ने इशारे से उन्हें कहा कि ये ( श्रीरामचन्द्रजी ) मेरे पति हैं। यह जानकर गांव की सब युवती स्त्रियां इस प्रकार आनन्दित  हुईं मानो कंगालों ने धन की राशियां लूट ली हों।




अति सप्रेम सिय पायं परि बहुविधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।_अर्थ_वे अत्यंत सप्रेम से सीताजी के पैरों पड़कर बहुत प्रकार से आशिष देती हैं ( शुभकामना करती हैं ) कि जबतक शेषजी के सिर पर पृथ्वी रहे, जबतक तुम सदा सुहागिनि बनी रहो,






पार्बती सम पति प्रिय होहू। देबि न हमपर छाड़ब छोहू।। पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मार्ग फिरिअ बहोरी।।_अर्थ_और पार्वती जी के समान अपने अपने पति की प्यारी होओ। हे देवी ! हमपर कृपा न छोड़ना ( बनाते रखना ) । हम बार_बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं जिसमें आप फिर इसी रास्ते लौटें, ।





दरसनु देब जानि निज दासी। लगीं सीय सब प्रेम पियासी।। मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।।_अर्थ_और हमें अपनी दासी जानकर दर्शन दें। सीताजी ने उन सबको प्रेम की प्यासी देखा, और मधुर वचन कह_कहकर उनका भलीभांति संतोष किया। मानो चांदनी ने कुमुदिनियों को खिलाकर पुष्ट कर दिया हो।




तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूंछेउ मगु लोगन्ह मृदु बानी।। सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।।_अर्थ_उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख जानकर लक्ष्मण जी ने कोमल वाणी से लोगों से रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री_पुरुष दु:खी हो गये। उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रों में ( वियोग की सम्भावना से प्रेम का ) जल भर आया।

Friday, 20 January 2023

अयोध्याकाण्ड

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।। भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।_अर्थ_यह ( श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी के आने की ) खबर पाकर प्रयागनिवासी  ब्रह्मचारी, मुनि, तपस्वी, सिद्ध और उदासी सब श्रीदशरथजी के सुंदर पुत्रों को देखने के लिये भरद्वाजजी के आश्रम पर आये।



राम प्रणाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए भरि लोयन लाहू।। देहिं असीस परम सुखु  फिरे। सबहिं सराहत सुंदरता हिये।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। नेत्रों का लाभ पाकर सब आनंदित हो गये और परम सुख पाकर आशीर्वाद देने लगे। श्रीरामजी के सौंदर्य की सराहना करते हुए वे लौटे।





राम कीन्ह विश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ।।_अर्थ_श्रीरामजी ने रात को वहीं विश्राम किया और प्रातःकाल प्रयागराज का स्नान करके वे प्रसन्नता के साथ मुनि को सिर नवाकर श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुह के साथ वे चले।





राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।। मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुं अहहिं।।_अर्थ_( चलते समय ) बड़े प्रेम से श्रीरामजी ने मुनि से कहा_हे नाथ ! बताइए हम किस मार्ग से जायं। मुनि मन में हंसकर श्रीरामजी से कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं।






साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।।  सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहिं मगु दीख हमारा।।_अर्थ_फिर उनके साथ लिये मुनियों ने शिष्यों को बुलाया। ( साथ ही जाने की बात ) सुनते ही चित्त में हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गये। सभी पर श्रीरामजी का अपार प्रेम है। सभी कहते हैं कि हमारा मार्ग देखा हुआ है।





मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहुत जनम सुकृत सब कीन्हे।। करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदय चले रघुराई।।_अर्थ_ तब मुनि ने ( चुनकर ) चार ब्रह्मचारियों को साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मों तक सब सुकृति ( पुण्य ) किये थे। श्रीरघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषि की आज्ञा पाकर हृदय में बड़े ही आनंदित होकर चले।





ग्राम निकट सब निकसहिं जाई। देखहिं दरसु नारि नर धाई।। होहिं सनाथ जनमु फलु पाई। फिरहिं दुखित मन संग पठाई।।_अर्थ_जब वे किसी गांव के पास होकर निकलते हैं। जन्म का फल पाकर वे ( सदा के अनाथ ) साथ हो जाते हैं और मन को नाथ के साथ भेजकर ( शरीर से साथ न रहने के कारण ) दु:खी होकर लौट आते हैं।






बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाई मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।_अर्थ_ तदनन्तर श्रीरामजी ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया; वे मनचाही वस्तु ( अनन्य भक्ति ) पाकर लौटे। यमुनाजी के पार उतरकर सबने यमुनाजी के जल में स्नान किया, जो श्रीरामचन्द्र जी के शरीर के समान ही श्याम रंग का था।







बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाई मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।_अर्थ_ तदनन्तर श्रीरामजी ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया; वे मनचाही वस्तु ( अनन्य भक्ति ) पाकर लौटे। यमुनाजी के पार उतरकर सबने यमुनाजी के जल में स्नान, जो श्रीरामचन्द्र जी के शरीर के समान ही श्याम रंग का था।







सुनत तीरबासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।। लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि  करहिं निज भाग्य बड़ाई ।।_अर्थ_यमुनाजी के किनारे पर रहनेवाले स्त्री_पुरुष ( यह सुनकर कि निषाद के साथ दो परम सुन्दर सुन्दर नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है ) सब अपना_अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी का सौन्दर्य देखकर अपने भाग्य की बड़ाई करने लगे।





अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउं गाउं बूझत सकुचाहीं।। जे तिन्ह महं बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।।_अर्थ_उनके मन में ( परिचय जानने की ) बहुत _सी लालसाएं भरी हैं। उन लोगों में जो बयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्ति से श्रीरामचन्द्र जी को पहचान लिया।




सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।। सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी राय न कीन्ह भल नाहीं।।_अर्थ_उन्होंने सब कथा सब लोगों सुनायी कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन को चले हैं। यह सुनकर सब लोग दु:खित हो पछता रहे हैं कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं नहीं किया।




तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेज पुंज लघु बयस सुहावा। करि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।_अर्थ_उसी अवसर पर वहां एक तपस्वी आया, जो तेज का पुंज, छोटी अवस्था का और सुन्दर था। उसकी गति कवि नहीं जानते ( अथवा वह कवि था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता  )। वह वैरागी के वेष में था और मन, वचन तथा कर्म से श्रीरामचन्द्र जी का प्रेमी था। ( इस तेजपुंज तापस के प्रसंग को कुछ टीकाकार क्षेपक मानते हैं कि कुछ लोगों के देखने में यह अप्रसांगिक और ऊपर_से जोड़ा हुआ साक्षजान भी पड़ता है, परन्तु यह सभी प्राचीन प्रतियों में है। गुसाईं जी अलौकिक अनुभवी पुरुष थे। पता नहीं,  यहां इस प्रसंग के रखने में क्या रहस्य है; परन्तु यह क्षेपक तो नहीं है। इस तापस को जब ‘कबि अलखित गति’ कहते हैं, तब निश्चय पूर्वक कौन कह सकता है। हमारी समझ से ये तापस या तो श्री हनुमानजी थे अथवा ध्यानस्थ तुलसीदास जी।




सजल नयन तन पुलकित निज इष्टदेव पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनि तल दसा न जाइ बखानि।।_अर्थ_अपने इष्टदेव को पहचानकर उसके नेत्रों में जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया। वह दण्ड की भांति पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसकी ( प्रेमविह्वल ) दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।




राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।। मनहुं प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरें तन कह सब कोऊ।।_अर्थ_श्रीरामजी ने प्रेमपूर्वक  पुलकित होकर उसको हृदय से लगा लिया। ( उसे इतना आनन्द हुआ ) मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो। सब कोई (देखनेवाले ) कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ ( परम तत्व ) दोनों शरीर धारण किये मिल रहे हैं।






बहुरि लखन पायन्ह सोई धावा। लीन्ह उठाई उमगि अनुरागा।। पुनि सिर चरन धूलि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्ह असीसा।।_अर्थ_फिर वह लक्ष्मणजी के चरणों लगा। फिर उसने सीताजी की चरणधूलि को अपने सिर पर धारण किया। माता सीताजी ने भी उसको अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद दिया।




कीन्ह  निषाद दंडवत तेंही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।। पिता नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाई जिमि भूखा।।_अर्थ_फिर निषादराज ने उसको दण्डवत् किया। श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी जानकर वह ( उस निषाद से ) आनंदित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्र रूपी दोनों से श्रीरामजी की सौन्दर्य सुधा का पान करने लगा और ऐसा आनंदित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनंदित होता है।




कीन्ह  निषाद दंडवत तेंही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।। पिता नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाई जिमि भूखा।।_अर्थ_फिर निषादराज ने उसको दण्डवत् किया। श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी जानकर वह ( उस निषाद से ) आनंदित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्र रूपी दोनों से श्रीरामजी की सौन्दर्य सुधा का पान करने लगा और ऐसा आनंदित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनंदित होता है।





तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइं कीन्ह।।_अर्थ_तब श्रीरामचन्द्रजी ने सखा गुह को अनेकों तरह से ( घर लौट जाने के लिये ) समझाया। श्रीरामचन्द्रजी  की आज्ञा को सिर चढ़ाकर उसने अपने घर को गमन किया।



पुनि सियं राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रणाम बहोरी।। चले संसीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कि करत बड़ाई।।_अर्थ_फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजी ने हाथ जोड़कर यमुनाजी को पुनः प्रणाम किया और सूर्य कन्या यमुनाजी की बड़ाई करते हुए सीताजी सहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले।





मार्ग चलहु पयादेहि पाएं। ज्योतिषु झूठ हमारे भाएं।। कांटक पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महं साथ नारि सुकुमारी।।_अर्थ_(ऐसे राजचिह्नों के होते हुए भी ) तुमलोग रास्ते में पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझ में आता है कि ज्योतिषशास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े_बड़े पहाड़ों का दुर्गम रास्ता है। तिस पर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री है।




करि केहरि बन जाइ न कोई। हम संग चलहु जो आयसु होई।। जाब जहां लगि तहां पहुंचाई। फिरब बहोरि तुम्हहिं सिरु नाई।।_अर्थ_हाथी और सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहां तक जायेंगे वहां तक पहुंचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आयेंगे।




एहि बिधि पूछहिं प्रेमबस पुलक गात जल नैन। कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहिं कहि बिनीत मृदु बैन।।_अर्थ_इस प्रकार वे यात्री प्रेमधन पुलकित शरीर हो और नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओंका ) जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनय युक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।




एहि बिधि पूछहिं प्रेमबस पुलक गात जल नैन। कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहिं कहि बिनीत मृदु बैन।।_अर्थ_इस प्रकार वे यात्री प्रेमधन पुलकित शरीर हो और नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओंका ) जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनय युक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।




जे पुर गांव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।। केहि सुकृति केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।_अर्थ_ जो गांव और पुरवे रास्ते में बसे हैं, नागों और देवताओं के नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान् ने किस शुभघड़ी में इनको बसाया था जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुंदर हो रहे हैं।




जे पुर गांव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।। केहि सुकृति केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।_अर्थ_ जो गांव और पुरवे रास्ते में बसे हैं, नागों और देवताओं के नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान् ने किस शुभघड़ी में इनको बसाया था जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुंदर हो रहे हैं।


जहां जहां राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावती नाहीं।। पुण्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहिं सराहहिं सुरपुर बासी।।_अर्थ_जहां_जहां श्रीरामचन्द्रजी के चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्र की पुरी अमरावती भी नहीं है। रास्ते के समीप बसने वाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं_स्वर्ग में रहनेवाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं।




जे भरी नयन बिलोकहिं रामहिं। सीता लखन सहित घनस्यामहिं।। जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहिं देवसरि सरिस सराहहिं।।_अर्थ_ जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित घनश्याम श्रीरामजी के दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियों में श्रीरामचन्द्र जी स्नान कर लेते हैं, देवसरोवर और देवनदियां भी उनकी बड़ाई करती हैं।




जेहिं तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कल्पतरु तासु बड़ाई।। परसि राम पद पदुम परागा।। मानति भूमि भूरि निज भागा।_अर्थ_जिस वृक्ष के नीचे प्रमु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों का रज स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है।



छांह करहिं घन बिबुधगन बरसहिं सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग राम चले मग जाहिं।।_अर्थ_रास्ते में बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते और सिहाते हैं। पर्वत, वन और पशु_पक्षियों को देखते हुए श्रीरामजी रास्तेमें चले जा रहे हैं।





सीता लखन सहित रघुराई। गांव निकट सब निकसहिं जाई।। सुनि सब बालबृद्ध नर नारी। चलहिं तुरंत गृह काज बिसारी।।_अर्थ_सीताजी और लक्ष्मण जी सहित श्री रघुनाथ जी जब किसी गांव के पास से जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक, बूढ़े, स्त्री_पुरुष अपने घर का काम काज भूलकर तुरंत उन्हें देखने के लिये चल देते हैं।




बरनि न जाइ दशा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकहि सुरमनि ढ़ेरी।। एकन्ह एक बोलि सिख देहीं । लोचन राहु लेहु छन एही।।_अर्थ_उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती। मानो दरिद्र ने चिंतामणि की ढेरी पा ली हो।




रामहिं देखि एक अनुरागे। चित्त चले जाहि संग लागे।। एक नयन मगन छबि उर आनी। होहिं सिरिल तन मन बर बानी।।_अर्थ_कोई श्रीरामचन्द्रजी को देखकर ऐसे अनुराग में भर गये हैं कि उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्ग से उनकी छबि को हृदय में लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणी  से शिथिल हो जाते हैं ( अर्थात् उनके शरीर मन और वाणी का व्यवहार बन्द हो जाता है।




एक देखि बंट छांह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहइ गवांइअ छिनुकु श्रमु गवनब कबहिं कि प्रात।।_अर्थ_कोई बड़े की सुन्दर छाया देखकर, वहां नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर यहां बैठकर थकावट मिटा लीजिए। फिर चाहे अभी चले जाइयेगा चाहे सबेरे।




एक कलस भरि आनहिं पानी। अंचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।। सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।।_अर्थ_कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल बाणी से कहते हैं_नाथ ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यंत प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजी ने_





जानि श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।। मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।।_अर्थ_मन में सीताजी को थकी हुई जानकर घड़ी भर बड़े की छाया में विश्राम किया। स्त्री_पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूप ने उनके नेत्र और मनों को लुभा लिया है।



एकटक सब सोहहिं चहुं ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।। तरुन तमाल बरन तनु सोहा।। देखत कोटि मदन मनु मोहा।।_अर्थ_सबलोग टकटकी लगाते श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को चकोर की तरह ( तन्मय होकर ) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी के नवीन तमाल वृक्ष के रंग का ( श्याम ) शरीर अत्यंत शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेव के मन मोहित हो जाते हैं।



दामिनि बरन लखन सुठि नीके।  नख सिख सुभग भावते जी के।। मुनिपट कटिन्ह कसे तूनीरा। सोहहिं कर कमलनि धनुष तीरा।।_अर्थ_बिजली के_से रंग के लक्ष्मण जी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नख से शिखा तक सुन्दर हैं, और मन को बहुत भाते हैं। दोनों मुनियों के ( वल्कल आदि ) वस्त्र पहने हैं और कमर में तरकस कसे हुए हैं। कमल के समान हाथों में धनुष _बाण शोभित हो रहे हैं।

Thursday, 19 January 2023

अयोध्याकाण्ड

कहि सिय लखनहिं सखहिं सुनाई। श्रीमुख तीरथराज बड़ाई।। करि प्रणामु देखत बन बागा।  कहत महातम अति अनुरागा।।_अर्थ_उन्होंने अपने श्रीमुख से सीताजी, लक्ष्मण जी और सखा गुह को तीर्थराज की महिमा कहकर सुनायी। तदनन्तर प्रणाम करके, वन और बगीचों को देखते हुए और बड़े प्रेम से महात्म्य कहते हुए_


एहि बिधि आई बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।। मुदित नहाइ कीन्ह सिवा सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा।।_अर्थ_इस प्रकार श्रीराम ने आकर त्रिवेणी का दर्शन किया, जो स्मरण करने से ही सब सुन्दर मंडलों को देनेवाली है। फिर आनंदपूर्वक ( त्रिवेणी में ) स्नान करके शिवजी की सेवा ( पूजा ) की और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओं का पूजन किया।




एहि बिधि आई बिलोकी बेनी। सुमिरत सकल सुमंगल देनी।। मुदित नहाइ कीन्ह सिवा सेवा। पूजि जथाबिधि तीरथ देवा।।_अर्थ_इस प्रकार श्रीराम ने आकर त्रिवेणी का दर्शन किया, जो स्मरण करने से ही सब सुन्दर मंडलों को देनेवाली है। फिर आनंदपूर्वक ( त्रिवेणी में ) स्नान करके शिवजी की सेवा ( पूजा ) की और विधिपूर्वक तीर्थदेवताओं का पूजन किया।




तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए। करत दंडवत मुनि उर लाए।। मुनि मन मोद न कछु कहि जाई। ब्रह्मानन्द मनहुं तनु पाई।।_अर्थ_( स्नान, पूजन आदि सब करके ) तब प्रभु श्रीरामजी भरद्वाजजी के पास आये। उन्हें दण्डवत् करते हुए ही मुनि ने हृदय से लगा लिया। मुनि के मन का आनन्द कुछ कहा नहीं जाता। मानो उन्हें ब्रह्मानंद की राशि मिल गयी हो।




दीन्ह असीस मुनी उर अति अनंदु अस जानि। लोचन गोचर सुकृत फल मनहुं किए बिधि आनि।।_अर्थ_मुनीश्वर भरद्वाजजी ने आशीर्वाद दिया। उनके हृदय में ऐसा जानकर आनंद हुआ कि आज विधाता ने ( श्रीसीताजी और लक्ष्मणजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कराकर ) मानो हमारे संपूर्ण पुण्यों के फल लाकर आंखों के सामने कर दिया।




कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे। पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे।। कंद मूल फल अंकुर नीके। दिए अमित मुनि मनहुं अमीके।।_अर्थ_कुशल पूछकर मुनिराज ने उन्हें आसन दिये और प्रेमसहित पूजन करके उन्हें संतुष्ट कर दिया। फिर मानो अमृत के ही बने हों, ऐसे अच्छे _अच्छे कंद_मूल, फल और अंकुर लाकर दिये।




सीय लखन जन सहित सुहाए। अति रुचि राम मूल फल खाये।। भएं बिगतश्रम रामु सुखारे। भरद्वाज मृदु बचन उचारे।।_अर्थ_सीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुह सहित श्रीरामचन्द्र जी ने उन सुन्दर मूल_फलों को बड़ी रुचि के साथ खाया। थकावट दूर होने से श्रीरामचन्द्र जी सुखी हो गये। तब भरद्वाजजी ने उनसे कोमल वचन कहे_




आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू। आजु सुफल जप जोग बिरागू।। सफल सकल सुभ साधन साजू।। राम तुम्हहिं अवलोकत आजू।।_अर्थ_हे राम ! आपका दर्शन करते ही आज मेरा तप, तीर्थसेवन और त्याग सफल हो गया। आज मेरा तप, जोग और वैराग्य सफल हो गया और आज मेरे संपूर्ण शुभ साधनों का समुदाय भी सफल हो गया।




लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी। तुम्हरें दरस आस सब पूजी।। अब करि कृपा देहु बर एहू। निज पद सरसिज सहज सनेहू।।_अर्थ_लाभ अवधि सुख की सीमा ( प्रभु के दर्शन को छोड़कर ) दूसरी कुछ भी नहीं है। आपके दर्शन से मेरी सब आशाएं पूर्ण हो गयीं। अब कृपा करके यह वरदान दीजिये कि आपके चरणकमलों से मेरा स्वाभाविक प्रेम हो।


कर्म बचन मन छाड़ि जलु जब लगि जनु न तुम्हार। तब लगि सुखु सपनेहुं नहीं किएं कोटि उपचार।।_अर्थ_ जबतक कर्म, वचन और मन से चल छोड़कर मनुष्य आपका दास नहीं हो जाता तब तक करोड़ों उपाय करने से भी, स्वप्न में भी वह सुख नहीं पाता।



सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।। तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भांति कहि सबहिं सुनावा।।_अर्थ_मुनि के वचन सुनकर, उनकी भाव_भक्ति के कारण आनंद से तृप्त हुए भगवान श्रीरामचन्द्रजी ( लीला की दृष्टि से ) सकुचा गये। तब ( अपने ऐश्वर्य को छिपाते हुए ) श्रीरामचन्द्रजी ने भरद्वाज मुनि का सुन्दर सुयश करोड़ों ( अनेकों ) प्रकार से कहकर सबको सुनाया।



सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने। भाव भगति आनंद अघाने।। तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा। कोटि भांति कहि सबहिं सुनावा।।_अर्थ_मुनि के वचन सुनकर, उनकी भाव_भक्ति के कारण आनंद से तृप्त हुए भगवान श्रीरामचन्द्रजी ( लीला की दृष्टि से ) सकुचा गये। तब ( अपने ऐश्वर्य को छिपाते हुए ) श्रीरामचन्द्रजी ने भरद्वाज मुनि का सुन्दर सुयश करोड़ों ( अनेकों ) प्रकार से कहकर सबको सुनाया।


यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।। भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।_अर्थ_यह ( श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी के आने की ) खबर पाकर प्रयागनिवासी  ब्रह्मचारी, मुनि, तपस्वी, सिद्ध और उदासी सब श्रीदशरथजी के सुंदर पुत्रों को देखने के लिये भरद्वाजजी के आश्रम पर आये।


राम प्रणाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए भरि लोयन लाहू।। देहिं असीस परम सुखु  फिरे। सबहिं सराहत सुंदरता हिये।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। नेत्रों का लाभ पाकर सब आनंदित हो गये और परम सुख पाकर आशीर्वाद देने लगे। श्रीरामजी के सौंदर्य की सराहना करते हुए वे लौटे।


सो बड़ हो गुन गन गेहू। जेहिं मुनीस तुम्ह आदर देहू।। मुनि रघुबीर परस्पर नवहीं। बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं।।_अर्थ_( उन्होंने कहा_) हे मुनीश्वर ! जिसको आप आदर दें, वहीं बड़ा है और वही सब गुण समूहों का घर है। इस प्रकार श्रीरामजी और मुनि भारद्वाजजी दोनों परस्पर विनम्र हो रहे हैं और अनिवर्चनीय सुख का अनुभव कर रहे हैं।

Sunday, 27 November 2022

अयोध्याकाण्ड


पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनती करब कर जोरि। चिंता कवनिहुं बात कै तात करिअ जनि मोरि।।_अर्थ_आप जाकर पिताजी के चरण पकड़कर करोड़ों नमस्कार के साथ ही साथ जोड़कर विनती करियेगा कि हे तात ! आप मेरे किसी बात की चिंता न करें।





तुम्ह पुनि पितु हम अति हित मोरे। विनती करत तात कर जोरे।। सब बिधि सोई कर्तव्य तुम्हारें। दुख न पाव बिनु सोच हमारे।।_अर्थ_आप भी पिता के समान मेरे बड़े हितैषी हैं। हे तात ! मैं हाथ जोड़कर आपसे विनती करता हूं कि आपका भी सब प्रकार से वही कर्तव्य है जिसमें पिताजी हमलोगों के सोच में दुख न पावें।





सुनि रघुनाथ सचिव संबादू। भयउ सपरिजन बिखर निषादू।। पुनि कछु लखन कहि कटु बानी। प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी और सुमंत्र का यह संवाद सुनकर निषादराज कुटुम्बियों सहित व्याकुल हो गया। फिर लक्ष्मणजी ने कुछ कड़वी बात कही। प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने बहुत ही अनुचित जानकर उनको मना किया।





सकुचि राम निज सपथ देवाई। लखनु संदेस कहिअ जनि जाइ।। कह सुमंत्र पुनि भूप संदेसू। सहि न सकहिं सिय बिपिन कलेसू।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी सकुचाकर अपनी सौगंध दिलाकर सुमंत्र जी से कहा कि आप जाकर लक्ष्मण का यह संदेश न कहियेगा। सुमंत्र ने फिर राजा का संदेश कहा कि सीता वन के क्लेश न सह सकेंगी। 






जेहिं बिधि अवध आव फिरि सीया। सोई रघुबरहि तुम्हहि करनीया।। नतरु निपट अवलंब बिहीना। मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना।।_अर्थ_अतएव जिस तरह सीता अयोध्या को लौट आवें, तुमको और श्रीरामचन्द्र जी को वही उपाय करना चाहिये। नहीं तो मैं बिलकुल ही बिना सहारे का होकर वैसे ही नहीं जिऊंगा जैसे बिना जल के मछली नहीं जीती।





मइके ससुरे सकल सुख जबहिं जहां मनु भाव। तहं तब रहिहिं सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान।।_अर्थ_सीताजी के मायके ( पिता के घर ) और ससुराल में सब सुख है। जबतक यह विपत्ति दूर नहीं होती, जबतक वे जब जहां जी चाहे, वहीं सुख से रहेंगी।





विनती भूप कीन्ह जेहिं भांती। आरति प्रीति न सो कहि जाती।। पितु संदेसु सुनि कृपानिधाना। सियहि दीन्ह कोटि बिधि नाना।।_अर्थ_राजा ने जिस तरह ( जिस दीनता और प्रेम से ) विनती की है; वह दीनता और प्रेम कहा नहीं जा सकता। कृपानिधान श्रीरामचन्द्रजी ने पिता का संदेश सुनकर सीताजी को करोड़ों ( अनेकों ) प्रकार से सीख दी।





सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू। फिरहु त सब कर मिटै खभारू।। सुनि पति बचन कहति  बैदेही। सुनहु प्रानपति परम सनेही।।_अर्थ_( उन्होंने कहा_) जो तुम घर लौट जाओ, तो सास, ससुर, गुरु, प्रियजन एवं कुटुम्बी सबकी चिंता मिटी जाय। पति के वचन सुनकर जानकी जी कहती हैं_हे प्राणपति ! हे परम स्नेही ! सुनिये_






प्रभु करुनामय परम बिबेकी। तनु तजि रहति छांह किमि छेंकी।। प्रभा जाइ कहीं भानु बिहाई। कहां चन्द्रिका चन्दु तजि जाई।।_अर्थ_हे प्रभो ! आप करुणामय और परम ज्ञानी हैं। ( कृपा करके विचार तो कीजिये ) शरीर को छोड़कर छाया अलग कैसे रोकी रह सकती है ? सूर्य की प्रभा सूर्य को छोड़कर कहां जा सकती है ? और चांदनी चन्द्रमा को त्यागकर कहां जा सकती है ?





पतिहि प्रेममय विनय सुनाई। कहति सचिव सन गिरा सुहाई।। तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी। उतरु देंउं फिरि अनुचित भारी।।_अर्थ_इस प्रकार पति को प्रेममयी विनती सुनाकर सीताजी मंत्री से सुहावनी वाणी कहने लगीं_आप मेरे पिताजी और ससुरजी के समान मेरा हित करने वाले हैं। आपको मैं बदले में उत्तर देती हूं, यह बहुत ही अनुचित है।




आरति बस सनमुख भईं बिलगु न मानब तात। आरजसुत पद कमल बिनु बालि जहां लगि तात।।_अर्थ_किन्तु हे तात ! मैं आर्त होकर ही आपके सम्मुख हुई हूं, आप बुरा न मानियेगा। आर्यपुत्र ( स्वामी ) के चरण कमलों के बिना जगत् में जहां तक नाते हैं सभी मेरे लिखे व्यर्थ हैं।





पितु वैभव बिलास मैं डीठा। नृप मनि मुकुट मिलिअ पद पीठा। सुख निधान अस पितु गृह मोरें। फिरि विहीन मन भाव न भोरें।।_अर्थ_मैंने पिताजी के ऐश्वर्य की छटा देखी है, जिनके चरण रखने की चौकी से सर्वशिरोमणि राजाओं के मुकुट मिलते हैं ( अर्थात् बड़े_बड़े राजा जिनके चरणों को प्रणाम करते हैं ) ऐसे पिता का घर भी, जो सब प्रकार से सुखों का भण्डार है, पति के बिना मेरे मन को भूलकर भी नहीं भाता।





ससुर चक्कवइ कोसलराऊ। भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ।। आगे होई जेहि सुरपति लेई। अवध सिंघासन आसनु देई।।_अर्थ_मेरे ससुर कोसलराज चक्रवर्ती सम्राट हैं, जिनका प्रभाव चौदहों लोकों में प्रकट हैं; इन्द्र भी आगे होकर जिनका स्वागत करता है और अपने आधे सिंहासन पर बैठने के लिये स्थान देता है।





ससुर एतादृस अवध निवासू। प्रिय परिवारु मातु सम सासू।। बिनु रघुपति पद पदुम परागा। मोहि केउ सपनेहु सुखद न लागा।।_अर्थ_ऐसे ( ऐश्वर्य और प्रभावशाली ) ससुर; ( उनकी राजधानी )अयोध्या का निवास; प्रिय कुटुम्बी और माता के समान सासुएं_ये कोई भी श्रीरघुनाथजी के चरण कमलों की रज के बिना मुझे स्वप्न में भी सुखदायक नहीं लगते।





 अगम पंथ बनभूमि पहारा। करि केहरि सर सरित अपारा।। कोल किरात कुरंग बिहंगा। मोहि सब सुखद प्राणपति संगा।_अर्थ_दुर्गम रास्ते, जंगली धरती, पहाड़, हाथी, सिंह, अथाह तालाब एवं नदियां, कोल, भील, हिरण और पक्षी_( प्राणपति ) श्रीरघुनाथजी के साथ रहते ये सभी मुझे सुख देनेवाले होंगे। 





सासु ससुर सन मोरि हुंति बिनती करि परि पायं। मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायं।।_अर्थ_अत:सास और ससुर के पांव पड़कर, मेरी ओर से विनती कीजियेगा कि वे मेरा कुछ भी सोच न करें; मैं वन में स्वभाव से ही सुखी हूं।





 प्राणनाथ प्रिय देवर साथा। वीर धुरीन धरें धनु भाथा।। नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें। मोहि लगि सोच करिअ तनु भोरें।।_अर्थ_वीरों में अग्रगण्य तथा धनुष और ( बाणों से भरे ) तरकश धारण किये मेरे प्राणनाथ और प्यारे देवर साथ हैं। इससे न मुझे रास्ते की थकावट है, न भ्रम है और न मेरे मन में कोई दु:ख ही है। आप मेरे लिखे भूलकर भी सोच न करें।





 सुनि सुमंत्रु सिय सीतल बानी। भयउ बिकल तनु फनि मनि हानी।। नयन सूझ नहीं सुनई काना। कहि न सकई कछु अति अकुलाना।।_अर्थ_सुमंत्र सीताजी की शीतल वाणी सुनकर ऐसे व्याकुल हो गये जैसे सांप के मणि खो जाने पर। नेत्रों से कुछ सूझता नहीं, कानों से कुछ सुनाई नहीं देता। वे बहुत व्याकुल हो गये, कुछ कह नहीं सकते।





राम प्रबोध कीन्ह बहुत भांती। तथापि होति नहीं सीतल छाती।। जतन अनेक साथ हित कीन्हे। उचित उतर रघुनंदन दीन्हे।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने उनका बहुत प्रकार से समाधान किया। तो भी उनकी छाती ठंडी न हुई। साथ ही चलने के लिये मंत्री ने अनकों यत्न किये ( युक्तियां पेश कीं ), पर रघुनंदन श्रीरामजी ( उन सब युक्तियों का ) यथोचित उत्तर देते गये।





मेटि जाइ नहिं राम रजाई। कठिन कर्म गति कछु न बसाई।। राम लखन सिय पदु सिरु नाई। फिरेउ बनिक जिमि मूर गवांई।।_अर्थ_ श्रीरामजी की आज्ञा मेटि नहीं जा सकती। कर्म की गति कठिन है, उसपर कुछ भी वश नहीं चलता। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी के चरणों में सिर नवाकर सुमंत्र इस तरह लौटे जैसे कोई व्यापारी अपना मूलधन ( पूंजी ) गवांकर लौटे।





रथु हांकेउ हय राम तन  हेरि हेरि हिहिनाहिं। देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं।।_अर्थ_सुमंत्र ने रथ को हांका, घोड़े श्रीरामचन्द्रजी की ओर देख_देखकर हिनहिनाते हैं। यह देखकर निषाद लोग विषाद वश सिर धुन_धुनकर पछताते हैं।





जासु बियोग बिकल पसु ऐसें। प्रजा मातु_पितु जिइहहिं कैसें।। बरबस राम सुमंत्र पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आपु तबु आए।।_अर्थ_ जिनके वियोग में पशु इस प्रकार से व्याकुल हैं, उनके वियोग में प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे ? श्रीरामचन्द्र जी ने जबरदस्ती सुमंत्रजी को लौटाया। तब आप गंगाजी के तीर पर आये। 





मागी नाव न केवट आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना।। चरन कमल रज कहुं सब कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई।।_अर्थ_श्रीराम ने केवट से नाव मांगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा_मैंने तुम्हारा मर्म ( भेद ) जान लिया। तुम्हारे चरणकमलों की धूल के रिमेक सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है,





छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन में न काठ कठिनाई।। तरनिउ मुनि  घरिनी होई जाई। बाट परि मोरि नाव उड़ाई।।_अर्थ_जिसके छूते ही पत्थर की शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी ( मेरी नाव तो काट की है ) काट पत्थर से कठोर तो होता ही नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायेगी, मैं लुट जाऊंगा ( अथवा रास्ता रुक जायेगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जायगी ) मेरे कमाने खाने की राह मारी जायगी।






एहिं प्रतिपालउं सबु परिवारू। नहिं जानीं कछु अउर कबारू।। जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू।।_अर्थ_मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन_पोषण करता हूं। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु ! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे अपने चरण_कमल पखारने ( धो लेने ) के लिये कह दो।





पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं। मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब सांची कहौं।। बरु तीर मारहुं लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं।। तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं।।_अर्थ_हे नाथ ! मैं चरणकमल धोकर आपलोगों को नाव पर चढ़ा लूंगा; मैं आपसे कुछ उतराई नहीं चाहता। हे राम ! मुझे आपकी दुहाई और दशरथ जी की सौगंध है, मैं सच_सच कहता हूं। लक्ष्मण भले ही मुझे तीर मारे तो भी जबतक मैं पैर धो नहीं लूंगा तब तक पार नहीं उतारूंगा।





सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे। बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन।।_अर्थ_केवट के प्रेम लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्रीरामचन्द्रजी जानकी जी और लक्ष्मणजी की ओर देखकर हंसे।





कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोई करु जेहिं तव नाव न जाई।। बेगि अनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहु पारू।।_अर्थ_कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्र जी केवट से मुस्कराकर बोले_भाई ! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाय। जल्दी पानी ला और पैर धो लें। देर हो रही है पार उतार दे।





 
जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा।। सोई कृपाल केवटहिं निहोरा। जेहिं जग किय तिहु पगहु ते थोरा।।_अर्थ_एक बार जिनका नाम स्मरण करने से ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने ( वामनावतार में ) जगत् को तीन पग से भी छोटा कर दिया था ( दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था ), वही कृपालु श्रीरामचन्द्र जी ( गंगाजी से पार उतारने के लिये ) केवट का निहोरा कर रहे हैं।





पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोह मति करषी।  केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा।।_अर्थ_प्रभु के इन वचनों को सुनकर गंगाजी की बुद्धि मोह से खिंच गयी थी ( कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी पार उतारने के लिये केवट का निहोरा कैसे कर रहे हैं )। परन्तु ( समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान ) पदनखों को देखते ही ( उन्हें पहचानकर ) देवनदी गंगा जी हर्षित हो गयीं। ( वे समझ गयीं कि भगवान् नरलीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया; और इन चरणों का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होउंगी, यह विचार कर लें हर्षित हो गईं। ) केवट श्रीरामचन्द्र जी की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया।






पद पखारि जलपान करि आपु सहित परिवार। पितरु पार करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार।।_अर्थ_चरणों को धोकर और सारे परिवार सहित स्वयं उस जल ( चरणोदक ) को पीकर पहले ( उस महान पुण्य के द्वारा ) अपने पितरों को भवसागर से पार कर फिर आनन्द पूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्र जी को गंगा के पार ले गया।





उतरि ठाढ़ में सुरसरि रेता। सीय राम गुह लखन समेता। केवट उतरिए दंडवत कीन्हां। प्रभुहिं सकुच एहि नहिं  कछु दीन्हा।।_अर्थ_निषादराज और श्रीलक्ष्मणजीसहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्र जी ( नाव से ) उतरकर गंगाजी की रेत ( बालू ) में खड़े हो गये। तब केवट ने उतरकर दण्डवत् की। ( उसको दण्डवत् करते देखकर ) प्रभु को संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं।





फिर हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुंदरी मन मुदित उतारी।। कहेउ कृपाल लेहु उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई।।_अर्थ_पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनन्द से भरे मन से अपनी ( रत्नजड़ित ) ( ( अंगूठी से ) उतारी। कृपालु श्रीरामचन्द्र जी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिये।





नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा।। बहुत काल मैं कीन्ह मंजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनिक भलि भूरी।।_अर्थ_( उसने कहा_) हे नाथ ! आज मैंने क्या नहीं पाया। मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गयी है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी।





अब कछु नाथ न चाहिए मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें।। फिरती बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा।।_अर्थ_हे नाथ ! हे दीनदयाल ! आपकी कृपा से मुझे अब कुछ नहीं चाहिते। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूंगा।





बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियं नहिं कछु केवट लेइ। बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामजी, लक्ष्मण जी और सीताजी ने बहुत आग्रह ( या यत्न ) किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणा के धाम भगवान् श्रीरामचन्द्र जी ने निर्मल भक्ति का वरदान देकर उसे विदा किया।





तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पार्थिव नायउ माथा।। सिय सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी।।_अर्थ_फिर रघुकुल के स्वामी श्रीरामचन्द्र जी ने स्नान करके पार्थिवपूजा की और शिवजी को सिर नवाया। सीताजी ने हाथ जोड़कर गंगाजी से कहा_हे माता ! मेरा मनोरथ पूरा कीजियेगा। 





पति देवर संग कुसल बहोरी। आई करौं जेहिं पूजा तोरी। सुनि सिय बिनती प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी।।_अर्थ_जिससे मैं पति और देवर के साथ कुशलपूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूं। सीताजी की प्रेम रस में सनी हुई विनती सुनकर तब गंगाजी के निर्मल जल में से श्रेष्ठ वाणी हुई_





सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही।। लोकप होहिं बिलोकत तोरें। मोहि सेवहिं सब बिधि कर जोरे़।।_ हे रघुवीर की प्रिय जानकी ! सुनो ! तुम्हारा प्रभाव जगत् में किसे नहीं मालूम है ? तुम्हारे ( कृपादृष्टि ) देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियां हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं।





तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्ह मोहि दीन्ह बड़ाई।। तदपि देबि मैं देब असीसा। सफल होन हित निज बागीसा।।_अर्थ_तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनामी, यह तो मुजफर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवी ! मैं अपनी वाणी सफल होने के लिये तुम्हें आशीर्वाद दूंगी।





प्राणनाथ देवर सहित कुल कोअसला आइ। पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ।।_अर्थ_तुम अपने प्राणनाथ और देवर सहित कुशल पूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मनोकामनाएं पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत्भर में छा जायेगा।






गंग बचन सुनि मंगल मूला। मुदित सीय सुरसरि अनुकूला।। तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू। सुनत सूख मुख मा उर दाहू।।_अर्थ_मंगल के मूल गंगाजी के वचन सुनकर और देवनदी को अनुकूल देखकर सीताजी आनंदित हुईं। तब प्रभु श्रीरामचन्द्र जी ने निषादराज गुह से कहा कि भैया ! अब तुम घर जाओ ! यह सुनते ही उसका मुंह सूख गया और हृदय में दाह उत्पन्न हो गया।





दीन बचन गुह कह कर जोरी। बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी।। नाथ साथ रहि पंथु देखाई। रहि दिन चारि सिर्फ मैं आई।_अर्थ_ गुह हाथ जोड़कर दीन वचन बोला_ हे रघुकुलशिरोमणि ! मेरी विनती सुनिये मैं नाथ ( आपके) साथ रहकर, रास्ता दिखाकर, चार ( कुछ ) दिन चरणों की सेवा करके_





जेहिं बन जाइ रहब रघुराई। परनकुटी मैं करब सुहाई।। तब मोहि कह जसि देब रजाई। सोई करिहउं रघुबीर दोहाई।।_अर्थ_हे रघुराज ! जिस वन में आप जाकर रहेंगे, वहां मैं सुन्दर पर्णकुटी ( पत्तों की कुटिया ) बना दूंगा। तब मुझे आप जैसी आज्ञा देंगे, मुझे रघुवीर ( आप ) की दुहाई है, मैं वैसा ही करूंगा।





सहज सनेह राम लखि तासू। संग लीन्ह गुह हृदयं हुलासू।। पुनि गुह जाति बोलि सब लीन्हे। करि परितोषु बिदा तब कीन्हे।।_अर्थ_उसके स्वाभाविक प्रेम को देखकर श्रीरामचन्द्र जी ने उसको साथ ले लिया, इससे गुह के हृदय में बड़ा आनन्द हुआ। फिर गुह ( निषादराज ) ने अपनी जाति के लोगों को बुला लिया और उनका संतोष कराके तब उनको विदा किया।




तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाई सुरसरिहिं माथ। सखा अनुज सिय सहित बन गवनु कीन्ह रघुनाथ।।_अर्थ_तब प्रभु श्रीरघुनाथजी गणेशजी और शिवजी का स्मरण करके तथा गंगाजी को मस्तक नवाकर सखा निषादराज, छोटे भाई लक्ष्मण जी और सीताजी सहित वन को चले।





तेहिं दिन भयउ बिटप तर बासू। लखन सखां सब कीन्ह सुपासू।। प्रातः प्राकृत करि रघुराई। तीरथराजु दीख प्रभु आई, उस दिन पेड़ के नीचे निवास हुआ। लक्ष्मण जी और सखा गुह ने ( विश्राम की ) सब सुव्यवस्था कर दी। प्रभु श्रीरामचन्द्र जी ने सवेरे प्रातः काल की सब क्रियाएं करके जाकर तीर्थों के राजा प्रयाग के दर्शन किये।





सचिव सत्य श्रद्धा प्रिय नारी। माधव सरिस मीतु हितकारी।। चारि पदार्थ भरा भंडारू। पुन्य प्रदेष देस अति चारू।।_अर्थ_उस राजा का सत्य मंत्री है, श्रद्धा प्यारी स्त्री है और श्रीवेणीमाधव_सरीखे हितकारी मित्र हैं। चार पदार्थों ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष ) से भण्डार भरा है और वह पुण्यमय प्रान्त ही उस राजा का सुन्दर देश है।





छेत्रु अगम गढ़ु गाढ सुहावा। सपनेहुं नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा।। सेना सकल तीरथ बर बीरा। कलुष अनीक दलन रनधीरा।।_अर्थ_प्रयाग क्षेत्र ही दुर्गम, मजबूत और सुन्दर गढ़ ( किला ) है, जिसको स्वप्न में भी ( पापरूपी ) शत्रु नहीं पा सके हैं। संपूर्ण तीर्थ ही उसके श्रेष्ठ वीर सैनिक है, जो पाप की सेना को कुचल डालने वाले और बड़े रणधीर हैं।





संगमु सिंहासनु सुठि सोहा। छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा।। चवंर जमुन अरु गंग तरंगा। देखि होहिं दुख दारिद भंगा।।_अर्थ_( गंगा, यमुना और सरस्वती का ) संगम ही उसका अत्यंत सुशोभित सिंहासन है। अक्षय वट छत्र है, जो मुनियों के भी मन मोहित कर लेता है। यमुनाजी और गंगाजी की तरंगें उसके ( श्याम और श्वेत ) चंवर हैं, जिनको देखकर ही दु:ख और दरिद्रता नष्ट हो जाती है।





सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मन काम। बंदी बेद पुरान इव कहहिं बिमल गुन ग्राम।।_अर्थ_पुण्यात्मा, पवित्र साधु उसकी सेवा करते हैं और सब मनोरथ पाते हैं। वेद और पुराणों के समूह भाट हैं, और उसके निर्मल गुणियों का बखान करते हैं।





को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ। कलुष पुंज कुंजल मृगराऊ।। अस तीरथपति देखि सुहावा। सुख सागर रघुबर सुख पावा।।_अर्थ_पापों के समूह रूप हाथी को मारने के लिये सिंहरूप प्रयागराज का प्रभाव ( महत्व_महात्म्य ) कौन कह सकता है। ऐसे सुहावने तीर्थराज का दर्शन कर सुख के समूह रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामजी ने भी सुख पाया।





Tuesday, 4 October 2022

अयोध्याकाण्ड

निंदहिं आपु सराहहिं मीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।। जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा। तौं कस मरनु न मागे दीन्हा।।_अर्थ_वे लोग अपनी निंदा करते हैं और मछलियों की सराहना करते हैं। ( कहते हैं ) श्रीरामचन्द्रजी के बिना हमारे जीने को धिक्कार है। विधाता ने यदि प्यारे का वियोग ही रचा, तो फिर उसने मांगने पर मृत्यु क्यों नहीं दी !





एहि बिधि करहिं प्रलाप अलापा। आए अवध भरे परितापा।। बिषम बियोगु न जाइ बखाना। अवधि आस सब राखहिं प्राणा।।_अर्थ_इस प्रकार बहुत से प्रलाप करते हुए वे संताप से भरे हुए अयोध्याजी में आये। उन लोगों के विषय वियोग की दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता। ( चौदह साल की ) अवधि की आशा से ही वे प्राणों को रख रहे हैं।





राम दरस हित नेम ब्रत लगे करने नर नारि। मनहुं कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि।।_अर्थ_( सब ) स्त्री_पुरुष श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के लिये नियम और व्रत करने लगे और ऐसे दु:खी हुए जैसे चकवा, चकवी और कमल सूर्य के बिना दीन हो जाते है।





सीता सचिव सहित दोउ भाई। सृंगबेरपुर पहुंचे जाई।। उतरे राम देवसरि देखी। कीन्ह दण्डवत् हरषु बिसेषी।।_अर्थ_सीताजी और मन्त्रीसहित दोनों भाई श्रृंगवेरपुर जा पहुंचे। वहां गंगाजी को देखकर श्रीरामजी रथ से उतर पड़े और बड़े हर्ष के साथ उन्होंने दण्डवत् की।





लखन सचिवं सियं किए प्रणामा। सबहिं सहित सुख पायउ रामा।। गंग सकल मुद मंगल मूला। सब सुख करनि हरनि सब सूला।।_अर्थ_लक्ष्मणजी, सुमन्त्र और सीताजी ने भी प्रणाम किया। सबके साथ श्रीरामचन्द्रजी ने सुख पाया। गंगाजी समस्त आनन्द_मंगलों की मूल है़। वे सब सुखों को करनेवाली और पीड़ाओं को भरनेवाली है ।





कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा। रामु बिलोकहिं गंग तरंगा।। सचिवहिं अनुजहिं प्रियहिं सुनाई। बिबुध नदी महिमा अधिकाई।।_अर्थ_अनेक कथा प्रसंग कहते हुए श्रीरामजी गंगाजी की तरंगों को देख रहे हैं। उन्होंने मंत्री को, छोटे भाई लक्ष्मणजी को और प्रिया सीताजी को देवनदी गंगाजी की बड़ी महिमा सुनाई।





मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ। सुचि जलु पिअत मुदित मन भयउ।। सुमिरत जाहि मिटा श्रम भारू।  तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू।।_अर्थ_इसके बाद सबने स्नान किया, जिससे मार्ग का सारा श्रम ( थकावट ) दूर हो गया और पवित्र जल पीते ही मन प्रसन्न हो गया। जिनके स्मरण मात्र से ( बार_बार जन्मने और मरने का ) महान् श्रम मिट जाता है, उनको ‘श्रम’ होना_यह केवल लौकिक व्यवहार ( नरलीला ) है।





बुद्धि सच्चिदानंद मय कंद भानुकुल केतु। चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु।।_अर्थ_ शुद्ध ( प्रकृति जन्म त्रिगुणों से रहित, मायातीत दिव्य मंगलविग्रह ) सच्चिदानंकंदस्वरूप सूर्य कुल के ध्वजा रूप भगवान् श्रीरामचन्द्र जी मनुष्यों के सदृश ऐसे चरित्र करते हैं जो संसार रूपी समुद्र के पार उतारने के लिये पुल के समान है।





यह सुनि गुहं निषाद जब पाई। मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई।। लिए फल मूल भेंट भरि भारा। मिलन चलेउ हियं हरषु अपारा।।_अर्थ_जब निषादराज गुह ने यह खबर पायी, तब आनन्दित होकर उसने अपने प्रियजनों और भाई बंधुओं को बुला लिया और भेंट देने के लिये फल, मूल ( कन्द ) लेकर और उन्हें बालों ( बहंगियों ) में भरकर मिलने के लिये चला। उसके हृदय में हर्ष का पार नहीं था।





करि दंडवत भेंट धरि आगें। प्रभुहिं बिलोकत अति अनुरागे।। सहज सनेह बिबस रघुराई। पूछीं कुशल निकट बैठाई।।_अर्थ_दण्डवत् करके भेंट सामने रखकर वह अत्यंत प्रेम से प्रभु को देखने लगा। श्रीरघुनाथजी ने स्वाभाविक स्नेह के वश होकर उसे अपने साथ बैठाकर कुशल पूछी।





नाथ कुसल पद पंकज देखें। भयउं भागभाजन जन लेखें।। देव धरनि धनु नाम तुम्हारा। मैं जनु नीचु सहितपरिवारा।।_अर्थ_ निषादराज ने उत्तर दिया_हे नाथ ! आपके चरण_कमल के दर्शन से ही कुशल है ( आपके चरणारविन्दों के दर्शन कर ) आज मैं भाग्यवान पुरुषों की गिनती में आ गया। हे देव ! यह पृथ्वी, धन और घर सब आपका है। मैं तो परिवार सहित आपका नीच सेवक हूं।





कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ। थापिअ जनु सब लोगु सिहाऊ।। कहेत सत्य तुम सखा सुजाना। मोहि दीन्ह पितु आयसु आना।।_अर्थ_अब कृपा करके पुर ( श्रृंगवेरपुर ) में पधारिये और इस दास की प्रतिष्ठा बढ़ाइये, जिससे सब लोग मेरे भाग्य की बड़ाई करें। श्रीरामचन्द्र जी ने कहा_हे सुजान सखा ! तुमने जो कुछ कहा सब सत्य है। परन्तु पिताजी ने मुझको और ही आज्ञा दी है।





बरस चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु। ग्राम बासु नहीं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु।।_अर्थ_( उनके आज्ञानुसार ) मुझे चौदह वर्ष तक मुनियों का व्रत और वेष धारण कर और मुनियों के योग्य आहार करते हुए बन में ही बसना है, गांव के भीतर निवास करना उचित नहीं है। यह सुनकर गुह को बड़ा दु:ख हुआ।





राम लखन सिय रूप निहारी। कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी। ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे।।_अर्थ_श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी के रूप को गांव के स्त्री_पुरुष प्रेम के साथ चर्चा करते हैं। ( कोई कहती है_)  हे सखी ! कहो तो, वे माता_पिता कैसे हैं, जिन्होंने ऐसे ( सुंदर सुकुमार ) बालकों को वन में भेज दिया है।





एक कहहिं भल भूप न कीन्हा। लोचन लाभ हमहिं बिधि दीन्हा।। तब निषाद पति उर अनुमाना। तरु सिंसुपा मनोहर जाना।।_अर्थ_कोई एक कहते हैं_राजा ने अच्छा ही किया, इसी बहाने हमें भी ब्रह्मा ने नेत्रों का लाभ दिया। तब निषादराज ने हृदय में अनुमान किया, तो (अशोक के पेड़ को उनके ठहरने के लिये ) मनोहर समझा।





लै रघुनाथहिं ठाउं देखावा। कहेउ  राम सब भांति सुहावा।। पुरजन करि जोहारु घर आए। रघुबर संध्या करन सिधाए।।_अर्थ_उसने श्रीरघुनाथजी को ले जाकर वह स्थान दिखाया। श्रीरामचन्द्र जी ने ( देखकर ) कहा कि यह सब प्रकार से सुंदर है। पुरवासी लोग जोहार ( वंदना ) करके अपने_अपने घर लौटे और श्रीरामचन्द्र जी संध्या करने पधारे। 





गुहा संधारित सांथरी डसाई। कुस किसलयमय मृदुल सुहाई।। सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी।।_अर्थ_गुहने ( इसी बीच ) खुश और कोमल पत्तों की कोमल और सुन्दर साथरी सजाकर बिछा दी; और पवित्र, मीठे और कोमल देख_देखकर दोनों में भर_भरकर फल_मूल और पानी रख दिया ( अथवा अपने हाथ से फल_मूल दोनों में भर_भरकर रख दिये।





सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ। सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ।।_अर्थ_सीताजी, सुमंत्रजी और भाई लक्ष्मण सहित कन्द_मूल_फल खाकर रघुकुलमनि श्रीरामचन्द्र जी लेट गये। भाई लक्ष्मणजी उनके पैर दबाने लगे।





उठे लखन प्रभु सोवत जानी। कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी।। कछुक दूरि सजि बान सरासन। जागन लगे बैठि बीरासन।।_अर्थ_फिर प्रभु श्रीरामचन्द्र जी को सोते जानकर लक्ष्मणजी उठे और कोमल बाणी से मंत्री सुमन्त्रजी को सोने के लिये कहकर वहां से कुछ दूर पर धनुष_बाण से सजकर, वीरासन से बैठकर जागने ( पहरा देने ) लगे।





गुहं बोलाइ पाहरू प्रतीती। पावन पावन राखे अति प्रीती।। आपु लखन पहिं बैठेउ जाई। कटि भारी सर चाप चढ़ाई।।_अर्थ_गुह ने विश्वासपात्र पहरेदारों को बुलाकर अत्यंत प्रेम से जगह_जगह नियुक्त कर दिया। और आप कमर में तरकस बांधकर तथा तथा धनुष पर बाण चढ़ाकर लक्ष्मणजी के पास जा बैठा।





बोलत प्रभुहि निहारि निषादू। भयउ प्रेम बस हृदय बिषादू।। तनु पुलकित जल लोचन बहई। बचन सप्रेम लखन सन कहई ।।_अर्थ_प्रभु को जमीन पर सोते देखकर प्रेमबश निषादराज के हृदय में विषाद हो आया। उसका शरीर पुलकित हो गया और नेत्रों से ( प्रेमाश्रुओं का )  जल बहने लगा। वह प्रेम सहित लक्ष्मणजी से वचन कहने लगा_





भूपति भवन सुभायं सुहावा। सुरपति सदन न पटतर पावा।। मनिमय रचित चारु चौबारे। जनु रतिपति निज हाथ संवारे।।_अर्थ_महाराज दशरथ जी का महल तो स्वभाव से ही सुन्दर है, इन्द्रभवन भी जिसकी समानता नहीं पा सकता। उसमें सुन्दर मणियों के रचे चौबारे ( छत के ऊपर बंगले ) हैं, जिन्हें मानो रति के पति कामदेव ने अपने ही हाथों सजाकर बनाया है।





सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास। पलंग मंजु मनि दीप जहं सब बिधि सकल सुपास।।_अर्थ_जो पवित्र, बड़े ही विलक्षण, सुंदर भोग पदार्थों से पूर्ण और फूलों की सुगंध से सुवासित है; जहां सुन्दर पलंग और मणियों के दीपक हैं तथा सब प्रकार का पूरा आराम है।





बिबिध बसन उफ़ान तुराई। छीर फेन मृदु फयल सुहाई।। तहं सिय राम सयन नित करहीं। निज छबि रति मनोज मनु हरहीं।।_अर्थ_जहां ( ओढने_बिछाने के ) अनेकों वस्त्र, तकिये और गद्दे हैं, जो दूध के समान कोमल, निर्मल ( उज्जवल ) और सुन्दर हैं; वहां ( उन चौबारों में ) श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्र जी रात को सोया करते थे और अपनी शोभा से रति और कामदेव के गर्व को हरण करते थे।





ते सिय राम साथरीं सोए। श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए।। मातु पिता परिजन पुरबासी। सखा सुशील दास अरु दासी।।_अर्थ_वही श्रीसीता और श्रीरामजी आज घास_फूस की थके हुए बिना वस्त्र के ही होते हैं। ऐसी दशा में वे देखें नहीं जाते। माता_पिता, कुटुम्बी, पुरवासी ( प्रजा ), मित्र, अच्छे शील स्वभाव के दास और दासियां_





जोगवहिं जिन्हहिं प्राण की नाईं। महि बोलत तेहि राम गोसाईं।। पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ। ससुर सुरेस सखा रघुराऊ।।_अर्थ_सब जिनकी अपने प्राणों की तरह सार_संभार करते थे, वहीं प्रभु श्रीरामचन्द्र जी आज पृथ्वी पर सो रहे हैं। जिनके पिता जनकजी हैं, जिनका प्रभाव जगत् में प्रसिद्ध है; जिनके ससुर इन्द्र के मित्र रघुराज दशरथ जी हैं,





रामचंद पति सो बैदेही। सोवत महि बिधि बाम न केही।। सीय रघुबीर कि कानन जोगू। करम प्रधान सत्य कह एहू।।_अर्थ_रामचन्द्र जिसके पति हैं वो सीता जमीन पर सो रही, बिधाता किसके लिये बाम नहीं होता। सीताराम क्या वन के योग्य हैं ? सच कहते हैं कि कर्म ( भाग्य ही प्रधान है )।





कैकयनंदिनि मंदमति कठिन कुटिलपनु कीन्ह। जेहिं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह।।_अर्थ_ कैकयराज की लड़की नीचबुद्धि कैकेई ने बड़ी ही कुटिलता की, जिसने रघुनंदन श्रीरामजी को सुख के समय दु:ख दिया।





भई दिनकर कुल बंस कुठारी। कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी। भयउ बिषादु निषादहि भारी। राम सीय महि सयन निहारी।।_अर्थ_वह सूर्यकुलरूपी वृक्ष के लिये कुल्हाड़ी हो गयी। उस कुबुद्धि ने संपूर्ण विश्व को दु:खी कर दिया। श्री राम_सीता को जमीन पर सोते हुए देखकर निषाद को बड़ा दु:ख हुआ।





बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी।‌। काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता।।_अर्थ_तब लक्ष्मणजी ग्यान वैराग्य और भक्ति के रस से सनी हुई मीठी और कोमल वाणी बोले_हे भाई ! कोई किसी को सुख_दु:ख देने वाला नहीं है। सब अपने ही किये हुए कर्मों का फल भोगते हैं।





जोग बियोग भोग भल मंदा। हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा।। जनम मरन जहं लगि जग जालू। संपति, बिपति करमु अरु कालू।।_अर्थ_ संयोग ( मिलना ), बियोग ( बिछुड़ना ), भले_बुरे भोग, शत्रु_मित्र और उदासीन_ये सभी भ्रम के फंदे हैं। जन्म_मृत्यु, संपत्ति_विपत्ति, कर्म और काव जगत् के जंजाल है,





धरनि धामु धनु पुर परिवारू। सरगु नरकु जहं लगि ब्यवहारू।। देखिअ सुनिअ, गुनिअ मन माहीं। मोह मूल परमारथु नाहीं।।_अर्थ_धरती,, घर, धन, नगर, परिवार, स्वर्ग और नरक आदि जहां तक व्यवहार हैं जो देखने, सुनने और मन के अंदर विचारने में आते हैं, इन सबका मूल मोह ( अज्ञान ) ही है। परमार्थ: ये नहीं है।





सपने होई भिखारि नृपु रंक नाकपति होई। जागें लाभ न हानि कछु तिमिर प्रपंच जियो जोइ।।_अर्थ_जैसे स्वप्न में राजा भिखारी हो जाय या कंगाल स्वर्ग का स्वामि इन्द्र हो जाय, तो जागने पर लाभ या हानि कुछ भी नहीं है; वैसे ही इस दृश्य प्रपंच को हृदय से देखना चाहिए।




अस बिचारि नहिं कीजिए रोसू। काहुहिं ब्यर्थ न देइअ दोसू।। मोह निसा सब सोवनिहारा। देखिए सपन अनेक प्रकारा।।_अर्थ_ऐसा विचार कर अफसोस नहीं करना चाहिये और न किसी को व्यर्थ ही दोष देना चाहिये। सब लोग मोहरुपी रात्रि में सोनेवाले हैं और सोते हुए उन्हें अनेकों प्रकार के स्वप्न दिखाती देते हैं।





एहि जग जामिनि जागहिं जोगी। परमारथी प्रपंच बियोगी।। जानिअ तबहिं जीव जग जागा। जब सब बिषय बिलास बिरागा।।_अर्थ_संसार रूपी अन्धकार में योगी जगते हैं, जो परमार्थी हैं और  ( माणिक जगत् ) से छूटे हुए हैं। जगत् में जीव को जागा हुआ तभी जानना चाहिये, जब संपूर्ण भोग_विलास से वैराग्य हो जाय।





होई बिबेकु मोह भ्रम भागा। तब रघुनाथ चरन अनुरागा।। सखा परम परमारथु एहू। मन क्रम बचन राम पद नेहू।।_अर्थ_ विवेक होने पर मोहरूपी भ्रम भाग जाता है, ( तब अज्ञान का नाश होने पर ) श्रीरघुनाथजी के चरणों में प्रेम होता है। हे सखा ! मन, वचन और कर्म से श्री रघुनाथ जी के चरणों में प्रेम होना, यही सर्वश्रेष्ठ परमार्थ ( पुरुषार्थ ) है।





राम ब्रह्म परमार्थ रूपा। अभिगत अलख अनादि अनूपा।। सकल विकार रहित गतभेदा। कहि नित नेति निरूपहिं बेदा।।_अर्थ_ श्रीरामजी परमार्थस्वरूप ( परमवस्तु ) परमब्रह्म हैं। वे अधिगत ( जानने में न आनेवाले ) अलग ( स्थूल दृष्टि से देखने में न आनेवाले ) अनादि ( आदिरहित ) अनुपम ( उपमारहित ), सब विकारों से रहित और भेदशून्य है, वेद जिनका नित्य ‘नेति_नेति’ कहकर निरूपण करते हैं।





भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल। करहि चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहिं जग जाल।।_अर्थ_ वहीं कृपालु श्रीरामचन्द्र जी भक्त, भूमि, ब्राह्मण, गौ और देवताओं के हित के लिये मनुष्य शरीर धारण कर लीलाएं करते हैं, जिनके सुनने से जगत् के जंजाल मिट जाते हैं।





सखा समुझि अस परिहरि मोहू। सीय रघुबीर चरन रत होहू।। कहत राम गुन भा भिनुसारा। जागें जग मंगल सुखदारा।।_अर्थ_हे सखा ! ऐसा समझ, मोह को त्यागकर श्रीसीतारामजी के चरणों में प्रेम करो। इस प्रकार श्रीरामचन्द्र जी के गुण कहते_कहते सबेरा हो गया। तब जगत् का मंगल करनेवाले और उसे सुख देनेवाले श्रीरामजी जागे।





सकल सौच करि राम नहाना। सुचि सुजान बंट तीर मगावा।। अनुज सहित सिर जटा बनाए। देखि सुमंत्र नयन जल छाए।।_अर्थ_ शौच के सब कार्य करके ( नित्य ) पवित्र और सुजान श्रीरामचन्द्र जी ने स्नान किया। फिर बड़ का दूध मंगाया और छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित उस दूध से सिर पर जटाएं बनायीं। यह देखकर सुमंत्र जी के नेत्रों में जल आ गया।





हृदयं दाहु अति बदन मलीना। कह कर जोरि बचन अति दीना।। नाथ कहेउ अस कोसलनाथा। लै रथ जाहु राम के साथा।_अर्थ_उनका हृदय अत्यंत जलने लगा, मुंह मलिन ( उदास ) हो गया। वे हाथ जोड़कर अत्यंत दीन वचन बोले_हे नाथ ! मुझे कोसलनाथ दशरथ जी ने ऐसी आज्ञा दी थी कि तुम रथ लेकर श्रीरामजी के साथ जाओ।





बनु देखाई सुरसरि अन्हवाई। आनेहु फेरि बेगि  दोउ भाई।। लखनु रामु सिय आनेहु फेरी। संसृति सकल संकोच निबेरी।।_अर्थ_वन दिखाकर, गंगा स्नान कराकर दोनों भाइयों को तुरंत लौटा लाना। सब संशय और संकोच दूर करके लक्ष्मण, राम, सीता को फिरा लाना।





नृप अस कहेउ गोसाईं जस कहइ  बलि सोइ। करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ।।_अर्थ_ महाराज ने ऐसा कहा था, अब प्रभु जैसा कहें, मैं वहीं करूं; मैं आपकी बलिहारी हूं। इस प्रकार विनती करके वे श्रीरामचन्द्र जी के चरणों में गिर पड़े और उन्होंने बालक की तरह रो दिया।





तात कृपा करि कीजिए सोई। तातें अवध अनाथ न होई।। मंत्रिहि राम उठाई प्रबोधा। तात धर्म मर्म तुम्ह सब सोधा।।_अर्थ_( और कहा_) हे तात ! कृपा करके वहीं कीजिये जिससे अयोध्या अनाथ न हो। श्रीरामजी ने मंत्री को उठाकर श्रीरामजी ने मंत्री को उठाकर धैर्य बंधाते हुए समझाया कि हे तात ! आपने तो धर्म के सभी सिद्धांतों को छान डाला है।





सिबि दधिचि हरिचन्द नरेसा। सहेउ धर्म हित कोटि कलेसा। रंतिदेव भलि भूप सुजाना। धरमु धरेउ सहि संकट नाना।।_अर्थ_शिबि दधिचि और राजा हरिश्चन्द्र ने धर्म के लिये करोड़ों ( अनेकों ) कष्ट सहे । बुद्धिमान राजा रंतिदेव और बलि बहुत से कष्ट सहकर भी धर्म को पकड़े रहे ( उन्होंने धर्म का परित्याग कभी नहीं किया )।





धरमु न दूसर सत्य समाना। आगम निगम पुरान बखाना।। मैं सोई धरमु सुलभ करि पावा। तजें तिहूं पुर अपजसु जावा।।_अर्थ_वेद, शास्त्र, पुराणों में कहा गया है कि सत्य के समान दूसरा धर्म नहीं है। इस ( सत्य रूपी धर्म ) का त्याग करने से तीनों लोकों में अपयश छा जायगा।





संभावित कहुं अपजसु लाहू। मरन कोटि सम दारुन दाहू।। तुम्ह सन तात बहुत का कहउं। दिए उतरु फिरि पातकु लहऊं।।_अर्थ_प्रतिष्ठित पुरुष के लियेअपयश की प्राप्ति करोड़ों मृत्यु के समान भीषण संताप देनेवाली है। हे तात ! मैं आपसे अधिक क्या कहूं। लौटकर उत्तर देने में पाप का भागी होता हूं।