Monday, 10 April 2023

अयोध्याकाण्ड

प्रभु प्रसाद सुचि सुभाग सुबासा। सादर जासु रहा नित नासा।। तुम्हहि निवेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।_अर्थ_जिसकी नासिका प्रभु ( आप ) के पवित्र और सुगंधित ( पुष्पादि ) सुन्दर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती ( सूंघती ) हैं, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसाद रूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं;





सीस नवहिं गुर द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनती बिसेषी।। कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदय नहिं दूजा।।_अर्थ_जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर बड़ी नम्रता के साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी ( आपके ) चरणों की पूजा करते हैं, और जिनके हृदय श्रीरामचन्द्रजी 
( आप ) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं;





चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तिन्हहिं सहित परिवारा।।_अर्थ_तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) के तीर्थों में चलकर आते हैं; हे रामजी ! आप उनके मन में निवास कीजिये। जो नित्य आपके ( रामनामरूप ) मंत्रराज को जपते हैं और परिवार ( परिकर ) सहित आपकी पूजा करते हैं।




तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवांइ देहिं बहुत दाना।। तुम्ह तें अधिक गुरहि जियं जानी। सकल भायं सेवहिं सनमानी।।_अर्थ_जो अनेकों प्रकार से तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर बहुत दान देते हैं; तथा जो गुरु को हृदय में आपसे भी अधिक ( बड़ा ) जानकर सर्वभाव से सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं;




सब कर मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह के मन मंदिर बसहु सिर रघुनंदन दोउ।।_अर्थ_और ये सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल मांगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारी प्रीति हो; उन लोगों के मनरूपी मंदिरों में सीताजी और रघुकुल को आनंदित करनेवाले आप दोनों बसिये।




काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।_अर्थ_ जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; और न कपट, धम्म र माया ही है_हे रघुराज ! आप उनके हृदय में निवास कीजिये।




सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत  सरन तुम्हारी।।_अर्थ_जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दु:ख और सुख तथा प्रशंसा ( बड़ाई ) और गाली ( निंदा ) समान हैं, जो विचार कर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते_सोते आपकी ही शरण हैं,




तुम्हहिं छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।_अर्थ_और आपको छोड़कर जिनके दूसरी कोई गति ( आश्रय ) नहीं है, हे रामजी ! आप उनके मन में बसिये। जो पराई स्त्री को जन्म देनेवाली माता के समान जानते हैं, और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है;





जे हरषहिं पर संपत्ति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।। जिन्हहिं राम तुम प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।_अर्थ_जो दूसरे की संपत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दु:खी होते हैं, और से रामजी ! जिन्हें आप प्राणों से प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं।




स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह के बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।_अर्थ_हे तात ! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं उनके मन रुपी मन्दिर में आप दोनों भाई निवास कीजिये।






अवगुन तजि सब के गुन गहहिं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।। नीति निपुण जिन्ह की जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।_अर्थ_जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौ के लिये संकट सहते हैं, नीति निपुणता में जिनकी जगत् में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर हैं।




गुन तुम्हार समुझई निज दोसा। जेहिं सब भांति तुम्हार भरोसा।। राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।_अर्थ_ जो गुणों को आपका और दोषों को अपना समझता है, जिसे सब प्रकार से आपका ही भरोसा है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदय में आप सीता सहित निवास कीजिये।



Tuesday, 28 March 2023

अयोध्याकाण्ड

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।। मंगल मूल बिप्र परितोषू। देही कोटि कुल भूसुर रोषू।।_अर्थ_क्योंकि जिससे मुनि और तपस्वी दु:ख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही ( अपने दुष्ट कर्मों से ही ) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मंगलों की जड़ है और भूदेव ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म कर देता है।





अस जिअं जानि कहिअ सोई ठाऊं। सिय सौमित्रि सहित जहं जाऊं।। तहं रचि रुचिर परन तृनसाला। बासु करौं कछु काल कृपाला।।_अर्थ_ऐसा हृदय में समझकर_वह स्थान बतला आते जहां मैं लक्ष्मण और सीता सहित जाऊं। और वहां सुन्दर पत्तों और घास की कुटी बनाकर, से दयालु ! कुछ समय निवास करूं।





सरल सहज सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ज्ञानी।। कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संयत श्रुति सेतू।।_अर्थ_श्रीरामजी की सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले_'धन्य ! धन्य ! हे रघुकुल ध्वजा स्वरूप ! आप ऐसा क्यों न कहेंगे ? आप सदैव वेद की मर्यादा का पालन करते हैं।






श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाई कृपानिधान की।। जो सहस सीसु अहीसु महीधरु लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी।।_अर्थ_हे राम ! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकी जी ( आपकी स्वरूप भूता ) माया हैं, जो कृपा के भण्डार आपकी रुख पाकर जगत् का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार मस्तक वाले सर्पों के स्वामी और पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करने वाले हैं, वहीं चराचर के स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं। देवताओं के कार्य के लिये आप राज का शरीरक्ष धारण करके दुष्ट राक्षसों की सेना का नाश करने के लिये चले हैं।




राम स्वरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह।_अर्थ_हे राम !आपका स्वरूप वाणी के अगोचरी, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद निरंतर उसका 'नेति नेति कहकर वर्णन करते हैं।






जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।। तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहिं को जाननिहारा।।_अर्थ_ हे राम ! जगत् दृश्य है, आप उसके देखने वाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को भी नचानेवाले हैं। जब भी वे आपके मर्म को नहीं जानते, तब और कौन आपको जानने वाला है।







सोई जानइ जेहिं देहु जनाई। जानत तुम्हहिं तुम्हइ होइ जाई।। तुम्हरिहि कृपाल तुम्हहिं रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।।_अर्थ_वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन ! हे भक्तों के हृदय को शीतल करनेवाले चन्दन ! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।







चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।। नर तनु धरेहु संत सुर काजा। करहु करहु जस प्राकृत राजा।।_अर्थ_आपकी देह चिदानंदमय है ( यह प्रकृति जन्म पंचमहाभूतों की बनी हुई कर्मबंधनयुक्त त्रिदेहविशिष्ठ माणिक नहीं है ) और ( उत्पत्ति_नाश, वृद्धि_क्षय आदि ) सब विकारों से रहित है; इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतों के कार्य के लिये ( दिव्य ) नरशरीर धारण किया है और प्राकृत ( प्रकृति के तत्वों से निर्मित देह वाले, साधारण ) राजाओं की तरह से कहते और करते हैं।





राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।। तुम्ह जो कहहु करहु सबु सांचा। तस काछिअ जस चाहिअ नाचा।।_अर्थ_ हे राम ! आपके चरित्रों को देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोह को प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य ( उचित ) ही है; क्योंकि जैसा स्वांग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिये ( इस समय आप मनुष्य रूप में हैं, अतः मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है )।



पूछेहुं मोहि कि रहौं कहं मैं पूंछत सकुचाउं। जहं न होहु तहं देहु कहुं तुम्हहिं देखावौं ठाउं।।_अर्थ_आपने पूछा कि मैं कहां रहूं ? परंतु मैं यह पूछते सकुचा था हूं कि जहां आप न हों, वह स्थान बता दीजिये। तब मैं आपके रहने के लिये स्थान दिखाऊं ।





सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुं मुसुकाने।। बाल्मीकि हंसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।_अर्थ_मुनि के प्रेमरस से सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ( रहस्य खुल जाने के डर से ) सकुचाकर मन में मुस्कराये। वाल्मीकिजी हंसकर फिर अमृत_रस में डुबोती हुई मीठी वाणी बोले_






सुनहु राम अब कहुं निकेता। जहां बसहु सिय लखन समेता।। जिन्ह के श्रवण समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।_अर्थ_हे रामजी ! सुनिये, अब मैं वे स्थान बताता जहां आप सीताजी और लक्ष्मण जी समेत निवास करिये। जिसके कान समुद्र की भांति आपकी कथा रूपी अनेकों सुंदर नदियों से_







भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हित तुम्ह कहुं गृह रूरे।। लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधार अभिलाषे।।_अर्थ_निरंतर भरते रहते हैं, परंतु कभी कभी पूरे ( तृप्त ) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिखे सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघ के लिये सदा लालायित रहते हैं।






निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।। तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक।। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।_अर्थ_तथा जो भारी_भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौंदर्य ( रूपी मेघ ) के एक बूंद जल से सुखी हो जाते हैं ( अर्थात् आपके दिव्य सच्चिदानंद मय स्वरूप के किसी एक अंग की जरा_सी भी झांकी समाने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत् के, अर्थात् पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सौन्दर्य का तिरस्कार करते हैं ), हे रघुनाथ जी ! उनलोगों के हृदय रूपी सुखदायी भवनों में आप भाई लक्ष्मण और श्रीसीताजीसहित निवास कीजिये।





जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुक्ताहार गुन गन चुनइ राम बसहु हियं तासु।। _अर्थ_आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवर में जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुणसमूहरूपी मोतियों को चुगती रहती है, हे रामजी ! आप उसके हृदय में बसिये।





Monday, 13 March 2023

अयोध्याकाण्ड

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।। सीय राम पद अंक बराएं। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएं।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के ( जमीन पर अंकित होनेवाले दोनों ) चरणचिन्हों के बीच_बीच में पैर रखती हुई सीताजी ( कहीं भगवान् के चरणचिन्हों पर पैर न टिक जाय इस बात से ) डरती हुई मार्ग में चल रही हैं, और लक्ष्मण जी  और लक्ष्मणजी ( मर्यादा की रक्षा के लिये ) सीताजी और श्रीरामचन्द्र जी दोनों के चरणचिन्हों को बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं।





राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।। खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।_अर्थ_श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी की सुन्दर प्रीति वाणी का विषय नहीं है ( अर्थात् अनिवर्चनीय है ), अतः: वह कैसे कहीं जा सकती है ? पक्षी और पशु भी उस छवि को देखकर ( प्रेमानंद में मग्न हो जाते हैं। पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजी ने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं।




जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।_अर्थ_प्यारे पथिक सीताजी सहित दोनों भाइयों को जिन जिन लोगों ने देखा, उन्होंने भव का अगम मार्ग ( जन्म_मृत्युरूपी संसार में भटकनेवाला भयानक मार्ग ) बिना ही परिश्रम आनंद के साथ तै कर लिया ( अर्थात् वे आवागमन के चक्र से सहज ही छूटकर मुक्त हो गये ।




अजहुं जासु उर सपनेहुं काऊ। बसहुं लखनु सिय रामु बटाऊ।। राम नाम पर पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुंक मुनि कोई।।_अर्थ_आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसे तो भी वह श्रीरामजी के परमधाम के उस मार्ग को पा जायगा जिस मार्ग को कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं ।





तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।। तहं बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाई चले रघुराई।।_अर्थ_तब श्रीरामचन्द्र जी सीताजी को थकी हुई जानकर और समीप ही एक बड़ का वृक्ष देखकर उस दिन वहीं ठहर गये। कन्द मूल फल खाकर ( रातभर वहां रहकर ) प्रात:काल स्नान करके श्री रघुनाथ जी आगे चले।




देखत बन सर सैल सुहाए। बाल्मीकि आश्रम प्रभु आए।। राम दीख मुनि बास सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।_अर्थ_सुंदर वन, पर्वत और तालाब देखते हुए रामु श्रीरामचन्द्रजी अअ सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।। खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।_अर्थ_सरोवरों में कमल और वनों में वृक्ष फूल रहे हैं। बहुत से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और रहित होकर प्रसन्न मन से विचर रहे हैं।




सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।। खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।_अर्थ_सरोवरों में कमल और वनों में वृक्ष फूल रहे हैं। बहुत से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और वैर से रहित होकर प्रसन्न मन से बिचर रहे हैं।





सुचि सुंदर आश्रम निरखि हरसे राजीवनैन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।_पवित्र और सुंदर आश्रम को देखकर कमलनयन श्रीरमचन्द्रजी हर्षित हुए। रघुश्रेष्ठ श्रीरामजी का आगमन सुनकर मुनि वाल्मीकि जी उन्हें लेने के लिये आगे आये।





मुनि कहुं राम दंडवत् कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।। देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि को दण्डवत् किया। विप्र श्रेष्ठ मुनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गये। सम्मान पूर्वक मुनि उन्हें अपने आश्रम में ले आये







मुनि बर अतिथि प्राणप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।। सिर सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।।_अर्थ_श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकि जी ने प्राणप्रिय अतिथियों को पाकर उनके लिखे मधुर कन्द, मूल, फल मंगवाते। श्रीसीताजी, लक्ष्मण जी और रामचन्द्रजी ने फलों को खाया। तब मुनि ने उनको ( विश्राम करने के लिये ) सुन्दर स्थान बतला दिये।




बाल्मीकि मन आनंदु भारी। मंगल मूर्ति नयन निहारी।। तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।_अर्थ_( मुनि श्रीरामजी के पास बैठे हैं और उनकी ) मंगल_मूर्ति को नेत्रों से देखकर बाल्मीकि जी के मन में बड़ा भारी आनंद हो रहा है। तब श्री रघुनाथ जी कमल सदृश हाथों को जोड़कर, कानों को सुख देने वाले मधुर वचन बोले_





तुम्ह त्रिकालदर्शी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।। अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहिं जेहि भांति दीन्ह बनु रानी।।_अर्थ_हे मुनिनाथ ! आप त्रिकालदर्शी हैं। संपूर्ण विश्व आपके लिए हथेली पर रखे हुए बेर के समान है। प्रभु श्रीरामचन्रजी ने ऐसा कहकर फिर जिस जिस प्रकार से रानी कैकेयी ने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तार से सुनायी।




तात बचन पुनि मातु हित भाई भरत अस राउ। मो कहुं दरस तुम्हार प्रभु सबुत मम पुन्य प्रभाउ।।_अर्थ_(और कहा__) से प्रभु ! पिता की आज्ञा ( का पालन ), माता का हित और भरत जैसे ( स्नेही एवं धर्मात्मा ) भाई का राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे पुन्यों का प्रभाव है।




देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।। अब जहं राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।।_अर्थ_हे मुनिराज ! आपके चरणों का दर्शन करने से आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये ( हमें सारे पुत्रों का फल मिल गया )। अब जहां आपकी आज्ञा हो और जहां कोई भी मुनि उद्वेग को न प्राप्त हो_


Sunday, 26 February 2023

अयोध्याकाण्ड

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।। एक कहहिं ए सहज सुहाए। अपुन प्रगट भए बिधि न बनाएं ।।_अर्थ_जों ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत् में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं_ये स्वभाव से ही सुंदर हैं ( इनका सौन्दर्य_माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है )। ये अपने_आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा के बनाये नहीं।




जहं लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मनु गोचर बरनी।। देखहु खोजि भुवन दस चारी। कहु अस पुरुष कहां असि नारी।।_अर्थ_हमारे कानों, नेत्रों और मन के द्वारा अनुभव में आनेवाली विधाता की करनी को जहां तक वेदों ने वर्णन करके कहा है, वहां तक चौदहों लोकों में ढ़ूंढ़ देखो, ऐसा पुरुष और ऐसी स्त्री कहां हैं ? ( कहीं भी नहीं है, इसी से सिद्ध है कि ये विधाता के चौदहों लोकों से अलग है और अपनी महिमा से अपने आप निर्मित हुए हैं।





इन्हहिं देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।। कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। जेहिं इरिषा बन अनि दुराए।।_अर्थ_इन्हें देखकर विधाता का मन अनुरक्त ( मुग्ध ) हो गया, तब वह भी इन्हीं की उपमा के योग्य दूसरे स्त्री_पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, किन्तु कोई उसकी अटकल में ही नहीं आये ( पूरे नहीं उतरे )। इसी ईर्ष्या के मारे उसने इनको जंगल में लाकर छिपा दिया है।





एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।। ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।_अर्थ_कोई एक कहते हैं_हम बहुत अधिक नहीं जानते। हां, अपने को परम धन्य अवश्य समझते हैं ( जो इनके दर्शन कर रहे हैं ) और हमारी समझ में वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इन्हें देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे।







एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहिहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।_अर्थ_इस प्रकार प्रिय वचन कह_कहकर सब नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीर वाले दुर्गम ( कठिन ) मार्ग में कैसे चलेगें।




नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकईं सांझ समय जनु सोहीं।। मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयं कहहिं बर बानी।।_अर्थ_स्त्रियां स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो संध्या के समय चकवी ( भावी वियोग की पीड़ा से ) सोह रही हों ( दुखी हो रही हों )। इनके चरणकमलों को कोमल तथा मार्ग को कठोर जानकर वे व्यथित हृदय से उत्तम वाणी कहती हैं।




परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचित महि जिमि हृदय हमारे।। जौं जगदीस इन्हहिं बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।_अर्थ_इनके कोमल और लाल_लाल चरणों ( तलवों ) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वर ने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्ते को पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया?




जौं मांगा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आंखिन्ह माहीं।। जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय राम न देखन पाए।।_अर्थ_यदि ब्रह्मा से मांगे तो हे सखि ! ( हम तो उनसे मांगकर ) इन्हें अपनी आंखों में ही रखें ! जो स्त्री_पुरुष इस अवसर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजी को नहीं देख सके।






सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहां लगि भाई।। समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।_अर्थ_उनके सौन्दर्य को सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई ! अबतक वे कहां तक गये होंगे ? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्म का फल पाकर, विशेष आनंदित होकर लौटते हैं। 





गांव गांव अब होई अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।। जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।।_अर्थ_सूर्यकुलरूपी कुमुदिनी के प्रफुल्लित करने वाले चन्द्रमा स्वरूप श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कर गांव_गांव में ऐसा ही आनंद हो रहा है। जो लोग ( वनवास दिये जाने का ) कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राज_रानी ( दशरथ_कैकेयी ) को दोष लगाते हैं।




कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जेहि लोचन लाहू।। कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाई।।_अर्थ_कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रों का लाभ दिया। स्त्री _पुरुष सभी आपस में सीधी, स्नेह भरी सुन्दर बातें कर रहे हैं।




ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहां तें आए।। धन्य सो देसु सैलु बन गाऊं। जहं जहं  जाहिं धन्य सोइ ठाऊं।।_अर्थ_( कहते हैं _ ) वे माता_पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। वह नगर धन्य हैं जहां से ये आते हैं। वह देश, पर्वत, वन और गांव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहां जहां ये जाते हैं।




सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहिं के सब भांति सनेही।। राम लखन पथ कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।_अर्थ_ब्रह्मा ने उसी को रचकर सुख पाया है जिसके ये  ( श्रीरामचन्द्र जी ) सब प्रकार से स्नेही हैं। पथिकरूप श्रीराम_लक्ष्मण की सुन्दर कथा सारे रास्ते  जंगल में जा गयी है।




एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।_रघुकुलरुपी कमल के खिलानेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मण जी सहित वन को देखते हुए चले जा रहे हैं। 




आगें राम लखनु बनु पाछें। तापस बेस बिराजत काछें।। उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें।।_अर्थ_आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मण जी सुशोभित हैं। तपस्वियों  के वेष बनाये दोनों बड़ी शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच में सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया।





बहुरि कहउं छबि जब मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।। उपमा बहुरि कहउं जियं जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।_अर्थ_फिर जैसी छबि मेरे मन में बस रही है, उसको कहता हूं_ मानो बसंत ऋतु और कामदेव के बीच में रति ( कामदेव की स्त्री ) शोभित हो। फिर अपने हृदय में खोजकर उपमा कहता हूं कि मानो बुध ( चन्द्रमा के पुत्र ) और चन्द्रमा के बीच में रोहिणी ( चन्द्रमा की स्त्री ) सोह रही हो।

Thursday, 9 February 2023

अयोध्या काण्ड

मिटा मोद मन भए मलीने। बिधि निधि दीन्ह लेइ जनु छीने।। समुझि करम गति धीरजु कीन्हा। सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा।।_अर्थ_उनका आनन्द मिट गया और मन ऐसे उदास हो गये मानो विधाता दी हुई सम्पत्ति छीने लेता हो। कर्म की गति समझकर उन्होंने धैर्य धारण किया और अच्छी तरह निर्णय करके सुगम मार्ग बतला दिया।




लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ। फेरे सब प्रिय बचन अहि लिये लाइ मन साथ।।_अर्थ_तब लक्ष्मण जी और जानकी जी सहित श्री रघुनाथ जी ने गमन किया और सब लोगों को प्रिय वचन कहकर लौटाया, किन्तु उसके मनों को अपने साथ ही लगा लिया।



फिरत नारि नर अति पछिताहीं। दैअहिं दोषु देहिं मन माहीं।। सहित बिषाद परस्पर कहहीं। बिधि करतब उल्टे सब अहहीं।।_अर्थ_लौटते हुए वे स्त्री_पुरुष बहुत ही पछताते हैं और मन_ही_मन दैव को दोष देते हैं। परस्पर बड़े ही विषाद के साथ कहते हैं कि विधाता के सभी काम उल्टे हैं।





निपट निरंकुस निष्ठुर निसंकू। जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू।। रूख कल्पतरु सागरु खारा। जेहिं पड़े बन राजकुमारा।।_अर्थ_वह विधाता बिलकुल निरंकुश ( स्वतंत्र ) निर्दय और निडर है, जिसने चन्द्रमा को रोगी ( घटने_बढ़नेवाला ) और कलंकी बनाया, कल्पवृक्ष को पेड़ और समुद्र को खारा बनाया। उसी ने इन राजकुमारों को वन में भेजा है। 




जौं पै इन्हहिं दीन्ह बनवासू। कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू।। ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना। रचे बादि बिधि बाहन नाना।।_अर्थ_जब विधाता ने इनको वनवास दिया है, तब उसने भोग_विलास व्यर्थ ही बनाये। जब ये बिना जूते के ( नंगे ही पैरों ) रास्ते में चल रहे हैं, तब विधाता अनेकों वाहन ( सवारियां ) व्यर्थ ही रचे।





ए महि परहिं डासि कुस पाता। सुभग सेज कत सृजत बिधाता।। तरुबर बास इन्हहिं बिधि दीन्हा। धवल नाम रचि रचि श्रमु कीन्हा।।_अर्थ_जब ये कुश और पत्ते बिछाकर जमीन पर ही पड़े रहते हैं, तब विधाता सुंदर सेज ( पलंग और बिछौने ) किसलिए बनाता है ? विधाता ने जब इनको बड़े _बड़े पेड़ों ( के नीचे ) का निवास दिया, तब उज्जवल महलों को बना_बनाकर उसने व्यर्थ ही परिश्रम किया।




जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार। बिबिध भांति भूषन बसन बादि किए करतार।।_अर्थ_जो ये सुंदर और अत्यंत सुकुमार होकर मुनियों के ( वल्कल ) वस्त्र पहनते और जटा धारण करते हैं, तो फिर करतार ( विधाता ) ने भांति_भांति के गहने और कपड़े वृथा ही बनाये।

Thursday, 2 February 2023

अयोध्याकाण्ड

जटा मुकुट सीसनि सुभाग उर भुज नयन बिसाल। सरद परब बिधु बदन बर वसंत स्वेद कन जाल।।_अर्थ_उनके सिरों पर सुन्दर जटाओं के मुकुट हैं; वक्ष:स्थल, भुजा और नेत्र विशाल हैं और शरत्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान सुन्दर मुखों पर पसीने की बूंदों का समूह शोभित हो रहा है।




बरनि न जाइ मनोहर जोरी। सोभा बहुत थोरि मति मोरी।। राम लखन सिय सुन्दरताई। सब चितवहिं चित मन मति लाई।।_अर्थ_उस मनोहर जोड़ी का वर्णन नहीं किया जा सकता; क्योंकि शोभा बहुत अधिक है, और मेरी बुद्धि थोड़ी है। श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी की सुन्दरता को सब लोग मन, चित्त और बुद्धि तीनों को लगाकर देख रहे हैं। 





थके नारि नर प्रेम पिआसे। मनहुं मृगी मृग देखि दिया से।। सीय समीप ग्रामतिय जाहीं। पूछत अति सनेह सकुचाहीं।।_अर्थ_प्रेम के प्यासे ( वे गांवों के ) स्त्री_पुरुष ( इनके सौन्दर्य_माधुर्य की छटा देखकर ) ऐसे थकित रह गये जैसे दीपक को देखकर हिरणी और हिरण ( निस्तब्ध रह जाते हैं ) ! गांवों की स्त्रियां सीताजी के पास जाती हैं; परन्तु अत्यंत स्नेह के कारण पूछते हुए सकुचाती हैं।






बार बार सब लागहिं पाएं। कहहिं बचन मृदु सरल सुनाएं।। राजकुमारी बिनय हम करहीं। तिय सुभायं कछु पूछत डरहीं।।_अर्थ_बार_बार सब उनके पांव रखतीं और सहज ही सीधे _सादे कोमल बचना कहती हैं_हे राजकुमारी! हम विनती करती ( कुछ निवेदन करना चाहती ) हैं, परन्तु स्त्री स्वभाव के कारण पूछते हुए डरती हैं।






स्वामिनि अबिनय छबि हमारी। बिलगु न मानब जानि गवांरी।। राजकुमारी दोउ सहज सलोने। इन्ह की लहीं दुति मरकत सोने।।_अर्थ_हे स्वामिनि ! हमारी ढिठाई क्षमा कीजियेगा और हमको गवांरी जानकर बुरा न मानियेगा। ये दोनों राजकुमार स्वभाव से ही लावण्यमय ( परम सुन्दर ) हैं। मरकतमनि ( पन्ने ) और सुवर्ण ने कान्ति इन्हीं से पायी है ( अर्थात् मरकतमनि और सुवर्ण में जो हरित और स्वर्ण वर्ण की आभा है वह इनकी हरिताभनील और स्वर्णकान्ति के एक कण के बराबर भी नहीं है।






स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन। सरद सर्बरी नाथ मुखु सरद सरोरुह नैन।।_अर्थ_श्याम और गौर वर्ण है; दोनों ही परम सुन्दर और शोभा के नाम हैं। शरद्पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान इनके मुख शरद् ऋतु के कमल के समान इनके नेत्र हैं।




कोटि मनोज लजावनिहारे। सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे।। सुनि सनेहमय मंजुल बानी। सकुची सिय मन महुं मुसुकानी।।_अर्थ_हे सुमुखि ! कहो तो अपनी सुन्दरता से करोड़ों कामदेवों को लजानेवाले ये तुम्हारे कौन हैं ? उनको ऐसी प्रेममयी सुन्दर वाणी सीताजी सकुचा गयीं और मन_ही_मन मुस्करायीं।






तिन्हहिं बिलोकि बिलोकति धरनीं। दुहुं संकोच सकुचति बरबरनी।। सकुचि सप्रेम बाल मृगनयनी। बोली मधुर बचन पिकबयनी।।_अर्थ_उत्तम ( गौर ) वर्णवाली सीताजी उनको देखकर ( संकोचवश ) पृथ्वी की ओर उन्हें देखती हैं। वे दोनों ओर के संकोच से सकुचा रही हैं ( अर्थात् न बताने में ग्राम की स्त्रियों को दु:ख होने का संकोच है और बताने में लज्जारूप संकोच )। हिरण के बच्चे के सदृश नेत्र वाली और कोकिल की_सी वाणी वाली सीताजी सकुचाकर प्रेमसहित मधुर वचन बोलीं_





सहज सुभाय सुभाग तनु गोरे। नाम लखन लघु देवर मोरे।। बहुरि बदन बिधु अंचल ढ़ांकी। पिय तन चितइ भौंह करि बांकी।।_अर्थ_ये जो सहज स्वभाव, सुंदर और गोरे शरीर के हैं, उनका नाम लक्ष्मण है; ये मेरे छोटे देवर हैं। फिर सीताजी ने ( लज्जावाश ) अपने चन्द्रमुख को आंचल से ढ़ककर और प्रियतम ( श्रीरामजी ) की ओर निहारकर भौंहें टेढ़ी करके,_





खंजन मंजु तिरीछे नयननि। निज पति कहेउ तिन्हहिं सिय सयननि।। भईं मुदित सब ग्राम बधूटी। रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं।।_अर्थ_खंजन पक्षी के_से सुंदर नेत्रों को तिरछा करके सीताजी ने इशारे से उन्हें कहा कि ये ( श्रीरामचन्द्रजी ) मेरे पति हैं। यह जानकर गांव की सब युवती स्त्रियां इस प्रकार आनन्दित  हुईं मानो कंगालों ने धन की राशियां लूट ली हों।




अति सप्रेम सिय पायं परि बहुविधि देहिं असीस। सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस।।_अर्थ_वे अत्यंत सप्रेम से सीताजी के पैरों पड़कर बहुत प्रकार से आशिष देती हैं ( शुभकामना करती हैं ) कि जबतक शेषजी के सिर पर पृथ्वी रहे, जबतक तुम सदा सुहागिनि बनी रहो,






पार्बती सम पति प्रिय होहू। देबि न हमपर छाड़ब छोहू।। पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी। जौं एहि मार्ग फिरिअ बहोरी।।_अर्थ_और पार्वती जी के समान अपने अपने पति की प्यारी होओ। हे देवी ! हमपर कृपा न छोड़ना ( बनाते रखना ) । हम बार_बार हाथ जोड़कर विनती करती हैं जिसमें आप फिर इसी रास्ते लौटें, ।





दरसनु देब जानि निज दासी। लगीं सीय सब प्रेम पियासी।। मधुर बचन कहि कहि परितोषीं। जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं।।_अर्थ_और हमें अपनी दासी जानकर दर्शन दें। सीताजी ने उन सबको प्रेम की प्यासी देखा, और मधुर वचन कह_कहकर उनका भलीभांति संतोष किया। मानो चांदनी ने कुमुदिनियों को खिलाकर पुष्ट कर दिया हो।




तबहिं लखन रघुबर रुख जानी। पूंछेउ मगु लोगन्ह मृदु बानी।। सुनत नारि नर भए दुखारी। पुलकित गात बिलोचन बारी।।_अर्थ_उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख जानकर लक्ष्मण जी ने कोमल वाणी से लोगों से रास्ता पूछा। यह सुनते ही स्त्री_पुरुष दु:खी हो गये। उनके शरीर पुलकित हो गये और नेत्रों में ( वियोग की सम्भावना से प्रेम का ) जल भर आया।

Friday, 20 January 2023

अयोध्याकाण्ड

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी। बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी।। भरद्वाज आश्रम सब आए। देखन दसरथ सुअन सुहाए।।_अर्थ_यह ( श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी के आने की ) खबर पाकर प्रयागनिवासी  ब्रह्मचारी, मुनि, तपस्वी, सिद्ध और उदासी सब श्रीदशरथजी के सुंदर पुत्रों को देखने के लिये भरद्वाजजी के आश्रम पर आये।



राम प्रणाम कीन्ह सब काहू। मुदित भए भरि लोयन लाहू।। देहिं असीस परम सुखु  फिरे। सबहिं सराहत सुंदरता हिये।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। नेत्रों का लाभ पाकर सब आनंदित हो गये और परम सुख पाकर आशीर्वाद देने लगे। श्रीरामजी के सौंदर्य की सराहना करते हुए वे लौटे।





राम कीन्ह विश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ। चले सहित सिय लखन जन मुदित मुनिहि सिरु नाइ।।_अर्थ_श्रीरामजी ने रात को वहीं विश्राम किया और प्रातःकाल प्रयागराज का स्नान करके वे प्रसन्नता के साथ मुनि को सिर नवाकर श्रीसीताजी, लक्ष्मणजी और सेवक गुह के साथ वे चले।





राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं। नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं।। मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं। सुगम सकल मग तुम्ह कहुं अहहिं।।_अर्थ_( चलते समय ) बड़े प्रेम से श्रीरामजी ने मुनि से कहा_हे नाथ ! बताइए हम किस मार्ग से जायं। मुनि मन में हंसकर श्रीरामजी से कहते हैं कि आपके लिये सभी मार्ग सुगम हैं।






साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए। सुनि मन मुदित पचासक आए।।  सबन्हि राम पर प्रेम अपारा। सकल कहहिं मगु दीख हमारा।।_अर्थ_फिर उनके साथ लिये मुनियों ने शिष्यों को बुलाया। ( साथ ही जाने की बात ) सुनते ही चित्त में हर्षित हो कोई पचास शिष्य आ गये। सभी पर श्रीरामजी का अपार प्रेम है। सभी कहते हैं कि हमारा मार्ग देखा हुआ है।





मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे। जिन्ह बहुत जनम सुकृत सब कीन्हे।। करि प्रनामु रिषि आयसु पाई। प्रमुदित हृदय चले रघुराई।।_अर्थ_ तब मुनि ने ( चुनकर ) चार ब्रह्मचारियों को साथ कर दिया, जिन्होंने बहुत जन्मों तक सब सुकृति ( पुण्य ) किये थे। श्रीरघुनाथजी प्रणाम कर और ऋषि की आज्ञा पाकर हृदय में बड़े ही आनंदित होकर चले।





ग्राम निकट सब निकसहिं जाई। देखहिं दरसु नारि नर धाई।। होहिं सनाथ जनमु फलु पाई। फिरहिं दुखित मन संग पठाई।।_अर्थ_जब वे किसी गांव के पास होकर निकलते हैं। जन्म का फल पाकर वे ( सदा के अनाथ ) साथ हो जाते हैं और मन को नाथ के साथ भेजकर ( शरीर से साथ न रहने के कारण ) दु:खी होकर लौट आते हैं।






बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाई मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।_अर्थ_ तदनन्तर श्रीरामजी ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया; वे मनचाही वस्तु ( अनन्य भक्ति ) पाकर लौटे। यमुनाजी के पार उतरकर सबने यमुनाजी के जल में स्नान किया, जो श्रीरामचन्द्र जी के शरीर के समान ही श्याम रंग का था।







बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाई मन काम। उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम।।_अर्थ_ तदनन्तर श्रीरामजी ने विनती करके चारों ब्रह्मचारियों को विदा किया; वे मनचाही वस्तु ( अनन्य भक्ति ) पाकर लौटे। यमुनाजी के पार उतरकर सबने यमुनाजी के जल में स्नान, जो श्रीरामचन्द्र जी के शरीर के समान ही श्याम रंग का था।







सुनत तीरबासी नर नारी। धाए निज निज काज बिसारी।। लखन राम सिय सुन्दरताई। देखि  करहिं निज भाग्य बड़ाई ।।_अर्थ_यमुनाजी के किनारे पर रहनेवाले स्त्री_पुरुष ( यह सुनकर कि निषाद के साथ दो परम सुन्दर सुन्दर नवयुवक और एक परम सुन्दरी स्त्री आ रही है ) सब अपना_अपना काम भूलकर दौड़े और लक्ष्मणजी, श्रीरामजी और सीताजी का सौन्दर्य देखकर अपने भाग्य की बड़ाई करने लगे।





अति लालसा बसहिं मन माहीं। नाउं गाउं बूझत सकुचाहीं।। जे तिन्ह महं बयबिरिध सयाने। तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने।।_अर्थ_उनके मन में ( परिचय जानने की ) बहुत _सी लालसाएं भरी हैं। उन लोगों में जो बयोवृद्ध और चतुर थे; उन्होंने युक्ति से श्रीरामचन्द्र जी को पहचान लिया।




सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई। बनहि चले पितु आयसु पाई।। सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं। रानी राय न कीन्ह भल नाहीं।।_अर्थ_उन्होंने सब कथा सब लोगों सुनायी कि पिता की आज्ञा पाकर ये वन को चले हैं। यह सुनकर सब लोग दु:खित हो पछता रहे हैं कि रानी और राजा ने अच्छा नहीं नहीं किया।




तेहि अवसर एक तापसु आवा। तेज पुंज लघु बयस सुहावा। करि अलखित गति बेषु बिरागी। मन क्रम बचन राम अनुरागी।।_अर्थ_उसी अवसर पर वहां एक तपस्वी आया, जो तेज का पुंज, छोटी अवस्था का और सुन्दर था। उसकी गति कवि नहीं जानते ( अथवा वह कवि था जो अपना परिचय नहीं देना चाहता  )। वह वैरागी के वेष में था और मन, वचन तथा कर्म से श्रीरामचन्द्र जी का प्रेमी था। ( इस तेजपुंज तापस के प्रसंग को कुछ टीकाकार क्षेपक मानते हैं कि कुछ लोगों के देखने में यह अप्रसांगिक और ऊपर_से जोड़ा हुआ साक्षजान भी पड़ता है, परन्तु यह सभी प्राचीन प्रतियों में है। गुसाईं जी अलौकिक अनुभवी पुरुष थे। पता नहीं,  यहां इस प्रसंग के रखने में क्या रहस्य है; परन्तु यह क्षेपक तो नहीं है। इस तापस को जब ‘कबि अलखित गति’ कहते हैं, तब निश्चय पूर्वक कौन कह सकता है। हमारी समझ से ये तापस या तो श्री हनुमानजी थे अथवा ध्यानस्थ तुलसीदास जी।




सजल नयन तन पुलकित निज इष्टदेव पहिचानि। परेउ दंड जिमि धरनि तल दसा न जाइ बखानि।।_अर्थ_अपने इष्टदेव को पहचानकर उसके नेत्रों में जल भर आया और शरीर पुलकित हो गया। वह दण्ड की भांति पृथ्वी पर गिर पड़ा, उसकी ( प्रेमविह्वल ) दशा का वर्णन नहीं किया जा सकता।




राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा।। मनहुं प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरें तन कह सब कोऊ।।_अर्थ_श्रीरामजी ने प्रेमपूर्वक  पुलकित होकर उसको हृदय से लगा लिया। ( उसे इतना आनन्द हुआ ) मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो। सब कोई (देखनेवाले ) कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ ( परम तत्व ) दोनों शरीर धारण किये मिल रहे हैं।






बहुरि लखन पायन्ह सोई धावा। लीन्ह उठाई उमगि अनुरागा।। पुनि सिर चरन धूलि धरि सीसा। जननि जानि सिसु दीन्ह असीसा।।_अर्थ_फिर वह लक्ष्मणजी के चरणों लगा। फिर उसने सीताजी की चरणधूलि को अपने सिर पर धारण किया। माता सीताजी ने भी उसको अपना छोटा बच्चा जानकर आशीर्वाद दिया।




कीन्ह  निषाद दंडवत तेंही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।। पिता नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाई जिमि भूखा।।_अर्थ_फिर निषादराज ने उसको दण्डवत् किया। श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी जानकर वह ( उस निषाद से ) आनंदित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्र रूपी दोनों से श्रीरामजी की सौन्दर्य सुधा का पान करने लगा और ऐसा आनंदित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनंदित होता है।




कीन्ह  निषाद दंडवत तेंही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही।। पिता नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाई जिमि भूखा।।_अर्थ_फिर निषादराज ने उसको दण्डवत् किया। श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी जानकर वह ( उस निषाद से ) आनंदित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्र रूपी दोनों से श्रीरामजी की सौन्दर्य सुधा का पान करने लगा और ऐसा आनंदित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी सुन्दर भोजन पाकर आनंदित होता है।





तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह। राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेइं कीन्ह।।_अर्थ_तब श्रीरामचन्द्रजी ने सखा गुह को अनेकों तरह से ( घर लौट जाने के लिये ) समझाया। श्रीरामचन्द्रजी  की आज्ञा को सिर चढ़ाकर उसने अपने घर को गमन किया।



पुनि सियं राम लखन कर जोरी। जमुनहि कीन्ह प्रणाम बहोरी।। चले संसीय मुदित दोउ भाई। रबितनुजा कि करत बड़ाई।।_अर्थ_फिर सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मणजी ने हाथ जोड़कर यमुनाजी को पुनः प्रणाम किया और सूर्य कन्या यमुनाजी की बड़ाई करते हुए सीताजी सहित दोनों भाई प्रसन्नतापूर्वक आगे चले।





मार्ग चलहु पयादेहि पाएं। ज्योतिषु झूठ हमारे भाएं।। कांटक पंथ गिरि कानन भारी। तेहि महं साथ नारि सुकुमारी।।_अर्थ_(ऐसे राजचिह्नों के होते हुए भी ) तुमलोग रास्ते में पैदल ही चल रहे हो, इससे हमारी समझ में आता है कि ज्योतिषशास्त्र झूठा ही है। भारी जंगल और बड़े_बड़े पहाड़ों का दुर्गम रास्ता है। तिस पर तुम्हारे साथ सुकुमारी स्त्री है।




करि केहरि बन जाइ न कोई। हम संग चलहु जो आयसु होई।। जाब जहां लगि तहां पहुंचाई। फिरब बहोरि तुम्हहिं सिरु नाई।।_अर्थ_हाथी और सिंहों से भरा यह भयानक वन देखा तक नहीं जाता। यदि आज्ञा हो तो हम साथ चलें। आप जहां तक जायेंगे वहां तक पहुंचाकर, फिर आपको प्रणाम करके हम लौट आयेंगे।




एहि बिधि पूछहिं प्रेमबस पुलक गात जल नैन। कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहिं कहि बिनीत मृदु बैन।।_अर्थ_इस प्रकार वे यात्री प्रेमधन पुलकित शरीर हो और नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओंका ) जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनय युक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।




एहि बिधि पूछहिं प्रेमबस पुलक गात जल नैन। कृपासिंधु फेरहिं तिन्हहिं कहि बिनीत मृदु बैन।।_अर्थ_इस प्रकार वे यात्री प्रेमधन पुलकित शरीर हो और नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओंका ) जल भरकर पूछते हैं। किन्तु कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी कोमल विनय युक्त वचन कहकर उन्हें लौटा देते हैं।




जे पुर गांव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।। केहि सुकृति केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।_अर्थ_ जो गांव और पुरवे रास्ते में बसे हैं, नागों और देवताओं के नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान् ने किस शुभघड़ी में इनको बसाया था जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुंदर हो रहे हैं।




जे पुर गांव बसहिं मग माहीं। तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं।। केहि सुकृति केहि घरीं बसाए। धन्य पुन्यमय परम सुहाए।।_अर्थ_ जो गांव और पुरवे रास्ते में बसे हैं, नागों और देवताओं के नगर उनको देखकर प्रशंसापूर्वक ईर्ष्या करते और ललचाते हुए कहते हैं कि किस पुण्यवान् ने किस शुभघड़ी में इनको बसाया था जो आज ये इतने धन्य और पुण्यमय तथा परम सुंदर हो रहे हैं।


जहां जहां राम चरन चलि जाहीं। तिन्ह समान अमरावती नाहीं।। पुण्यपुंज मग निकट निवासी। तिन्हहिं सराहहिं सुरपुर बासी।।_अर्थ_जहां_जहां श्रीरामचन्द्रजी के चरण चले जाते हैं, उनके समान इन्द्र की पुरी अमरावती भी नहीं है। रास्ते के समीप बसने वाले भी बड़े पुण्यात्मा हैं_स्वर्ग में रहनेवाले देवता भी उनकी सराहना करते हैं।




जे भरी नयन बिलोकहिं रामहिं। सीता लखन सहित घनस्यामहिं।। जे सर सरित राम अवगाहहिं। तिन्हहिं देवसरि सरिस सराहहिं।।_अर्थ_ जो नेत्र भरकर सीताजी और लक्ष्मणजीसहित घनश्याम श्रीरामजी के दर्शन करते हैं, जिन तालाबों और नदियों में श्रीरामचन्द्र जी स्नान कर लेते हैं, देवसरोवर और देवनदियां भी उनकी बड़ाई करती हैं।




जेहिं तरु तर प्रभु बैठहिं जाई। करहिं कल्पतरु तासु बड़ाई।। परसि राम पद पदुम परागा।। मानति भूमि भूरि निज भागा।_अर्थ_जिस वृक्ष के नीचे प्रमु जा बैठते हैं, कल्पवृक्ष भी उसकी बड़ाई करते हैं। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों का रज स्पर्श करके पृथ्वी अपना बड़ा सौभाग्य मानती है।



छांह करहिं घन बिबुधगन बरसहिं सुमन सिहाहिं। देखत गिरि बन बिहग मृग राम चले मग जाहिं।।_अर्थ_रास्ते में बादल छाया करते हैं और देवता फूल बरसाते और सिहाते हैं। पर्वत, वन और पशु_पक्षियों को देखते हुए श्रीरामजी रास्तेमें चले जा रहे हैं।





सीता लखन सहित रघुराई। गांव निकट सब निकसहिं जाई।। सुनि सब बालबृद्ध नर नारी। चलहिं तुरंत गृह काज बिसारी।।_अर्थ_सीताजी और लक्ष्मण जी सहित श्री रघुनाथ जी जब किसी गांव के पास से जा निकलते हैं तब उनका आना सुनते ही बालक, बूढ़े, स्त्री_पुरुष अपने घर का काम काज भूलकर तुरंत उन्हें देखने के लिये चल देते हैं।




बरनि न जाइ दशा तिन्ह केरी। लहि जनु रंकहि सुरमनि ढ़ेरी।। एकन्ह एक बोलि सिख देहीं । लोचन राहु लेहु छन एही।।_अर्थ_उनकी दशा वर्णन नहीं की जाती। मानो दरिद्र ने चिंतामणि की ढेरी पा ली हो।




रामहिं देखि एक अनुरागे। चित्त चले जाहि संग लागे।। एक नयन मगन छबि उर आनी। होहिं सिरिल तन मन बर बानी।।_अर्थ_कोई श्रीरामचन्द्रजी को देखकर ऐसे अनुराग में भर गये हैं कि उन्हें देखते हुए उनके साथ लगे चले जा रहे हैं। कोई नेत्रमार्ग से उनकी छबि को हृदय में लाकर शरीर, मन और श्रेष्ठ वाणी  से शिथिल हो जाते हैं ( अर्थात् उनके शरीर मन और वाणी का व्यवहार बन्द हो जाता है।




एक देखि बंट छांह भलि डासि मृदुल तृन पात। कहइ गवांइअ छिनुकु श्रमु गवनब कबहिं कि प्रात।।_अर्थ_कोई बड़े की सुन्दर छाया देखकर, वहां नरम घास और पत्ते बिछाकर कहते हैं कि क्षणभर यहां बैठकर थकावट मिटा लीजिए। फिर चाहे अभी चले जाइयेगा चाहे सबेरे।




एक कलस भरि आनहिं पानी। अंचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी।। सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी। राम कृपाल सुसील बिसेषी।।_अर्थ_कोई घड़ा भरकर पानी ले आते हैं और कोमल बाणी से कहते हैं_नाथ ! आचमन तो कर लीजिये। उनके प्यारे वचन सुनकर और उनका अत्यंत प्रेम देखकर दयालु और परम सुशील श्रीरामचन्द्रजी ने_





जानि श्रमित सीय मन माहीं। घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं।। मुदित नारि नर देखहिं सोभा। रूप अनूप नयन मनु लोभा।।_अर्थ_मन में सीताजी को थकी हुई जानकर घड़ी भर बड़े की छाया में विश्राम किया। स्त्री_पुरुष आनन्दित होकर शोभा देखते हैं। अनुपम रूप ने उनके नेत्र और मनों को लुभा लिया है।



एकटक सब सोहहिं चहुं ओरा। रामचंद्र मुख चंद चकोरा।। तरुन तमाल बरन तनु सोहा।। देखत कोटि मदन मनु मोहा।।_अर्थ_सबलोग टकटकी लगाते श्रीरामचन्द्रजी के मुखचन्द्र को चकोर की तरह ( तन्मय होकर ) देखते हुए चारों ओर सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी के नवीन तमाल वृक्ष के रंग का ( श्याम ) शरीर अत्यंत शोभा दे रहा है, जिसे देखते ही करोड़ों कामदेव के मन मोहित हो जाते हैं।



दामिनि बरन लखन सुठि नीके।  नख सिख सुभग भावते जी के।। मुनिपट कटिन्ह कसे तूनीरा। सोहहिं कर कमलनि धनुष तीरा।।_अर्थ_बिजली के_से रंग के लक्ष्मण जी बहुत ही भले मालूम होते हैं। वे नख से शिखा तक सुन्दर हैं, और मन को बहुत भाते हैं। दोनों मुनियों के ( वल्कल आदि ) वस्त्र पहने हैं और कमर में तरकस कसे हुए हैं। कमल के समान हाथों में धनुष _बाण शोभित हो रहे हैं।