Thursday, 22 June 2023

अयोध्याकाण्ड

सुमिरत राम तजहिं जन तृन सम विषय बिलासु। राम प्रिया जगजननी सिय कछु न आचरजु तासु।।_अर्थ_जिन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करने से ही भक्तजन तमाम भोग_विलास को तिनके के समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजी की प्रिय पत्नी और जगत् की माता सीताजी के लिये यह ( भोग विलास का त्याग ) कुछ भी आश्चर्य नहीं है।





सिय लखन जेहिं बिधि सुखु लहहीं। सोई रघुनाथ करहिं सोई कहहीं।। कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।।_अर्थ_सीताजी और लक्ष्मणजी जिस प्रकार सुख मानकर सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वहीं करते और वही करते हैं। भगवान् प्राचीन कथाएं और कहानियां कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा अत्यंत सुख मानकर सुन रहे हैं।





जब जब राम अवध सुधि करहीं। तब तब बारिश बिलोचन भरहीं। सुमिरत मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।_अर्थ_जब जब श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या की याद करते हैं, तब तब उनके नेत्रों में जल भर आता है। माता_पिता, कुटुम्बियों और भाइयों तथा भरत के प्रेम, शील और सेवाभाव को याद करके_






कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहीं कुसमी बिचारी।। लगा सिय लखनु बिकल होई जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसार परिछाहीं।।_अर्थ_कृपा के समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दु:खी हो जाते हैं, परन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजी को दु:खी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्य की परछाईं उस मनुष्य के समान ही चेष्टा करती है ।





प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।। लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहीं लखनु अरु सीता।।_अर्थ_ तब धीर, कृपालु और भक्तों के हृदयों को शीतल करने के लिये चन्दनरूप रघुकुल को आनंदित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी प्यारी पत्नी और भाई लक्ष्मण की दशा देखकर कुछ पवित्र कथाएं कहने लगते हैं, जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्राप्त करते हैं।





राम लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।_अर्थ_लक्ष्मणजी और सीताजी सहित श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावती में इन्द्र अपनी पत्नी श्री और पुत्र जयंत सहित बसता है।





जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।। सेवहिं लखन सीय रघुबरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी की कैसी संभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी श्रीरामचन्द्रजी की ऐसी देखभाल करते हैं जैसे मूर्ख अपने शरीर का। ं






एहि बिधि प्रभु बन बसहीं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।। कहेउं राम बन गवन सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।_अर्थ_पक्षी, पशु, देवता और तपस्वियों के हितकारी इस प्रकार सुखपूर्वक वन में निवास कर रहे हैं। तुलसीदास जी कहते हैं _ मैंने श्रीरामजी का सुन्दर वनगमन कहा। अब जिस तरह सुमंत्र अयोध्या में आये वह ( कथा ) सुनो।







फिरेउ निषादु प्रभुहिं पहुंचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।। मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को पहुंचाकर जब निषादराज लौटा, तब आकर उसने रथ को मंत्री ( सुमंत सहित ) देखा। मंत्री को व्याकुल देखकर निषाद को जैसा दु:ख हुआ, वह कहा नहीं जाता।






राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल व्याकुल भारी।। देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहंग अकुलाहीं।।_अर्थ_(निषाद को ऐसे आया देखकर ) सुमंत्र हा राम ! हा राम ! हा सीते, हा लक्ष्मण ! पुकारते हुए , बहुत व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़े। ( रथ के ) घोड़े दक्षिण दिशा की ओर ( जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे ( देख_देखकर हिनहिनाते हैं ) । मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हैं।








नहिं तृण चरहीं न पिअहिं जल मोचहिं लोचन बारि। व्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजी निहारि।।_अर्थ_वे न तो घास चलते हैं, न पानी पीते हैं। केवल आंखों से जल बहा रहे हैं। रामचन्द्रजी के घोड़ों को इस दशा में देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये।







धरि धीरजु तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहू बिषादू।। तुम्ह पंडित परमारथ ज्ञाता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता।।_अर्थ_तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा_हे सुमंत्र जी ! अब विषाद को छोड़िये। आप पंडित और परमार्थ को जाननेवाले हैं। विधाता को प्रतिकूल जानकर धैर्य धारण कीजिये।





 कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।। सोक सिथिल रथ सकइ न हांकी। रघुबर बिरह पीर उर बांकी।।_कोमल बाणी से भांति भांति कथाएं कह_कहकर निषाद ने जबरदस्ती लाकर सुमंत्र को रथ पर बैठाया। परंतु शोक के मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथ को हांक नहीं सकते। उनके हृदय में श्रीरामचन्द्रजी के विरह की बड़ी तीव्र वेदना है।






चरफराहिं मग चरहीं न घोड़े। बन मृग मनहुं आनि रथ जोरे।। अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।_अर्थ_ घोड़े तड़फड़ाते हैं और ( ठीक ) रास्ते पर नहीं चलते। मानो जंगली पशु लाकर रथ में जोत दिये गये हैं। वे श्रीरामचन्द्रजी के वियोगी घोड़े भी कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कभी घूमकर पीछे की ओर देखने लगते हैं। वे तीक्ष्ण दु:ख से व्याकुल हैं।





जो कह राम लखन बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेहीं।। बाजी बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहिं भांती।।_अर्थ_जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकी का नाम ले लेता है, घोड़े हिकर हिकर उसकी ओर प्यार से देखने लगते हैं। घोड़ों की विरहदशा कैसे कही जा सकती है ? वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणि के बिना सांप व्याकुल होता है।





भयउ निषादु  विषाद बस देखत सचिव तुरंग। बोली सुसेवक चारि तब दिए सारथि संग।।_अर्थ_मंत्री और घोड़ों की यह दशा देखकर निषादराज विषाद के वश हो गया। तब उसने अपने चार उत्तम सेवक बुलाकर सारथि के साथ कर दिये।






गुह सारथि ही फिरेउ पहुंचाई। बिरहु बिसाल बरनि नहीं जाई।। चले अवध लेइ रथहीन निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा।।_अर्थ_निषादराज गुहा सारथि ( सुमंत्र जी ) को पहुंचाकर ( विदा करके ) लौटा। उसके विरह और दु:ख का वर्णन नहीं किया जा सकता। वे चारों निषाद रथ लेकर अवध को चले। ( सुमंत्र और घोड़ों को देख_देखकर )  वे भी क्षण_क्षणभर विषाद में डूबे जाते थे।








सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।। रहिहि न अंतहुं अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।_अर्थ_व्याकुल और दु:ख से दीन हुए सुमंत्र जी सोचते हैं कि श्रीरघुवीर के बिना जीने को धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है ही नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजी के बिछुड़ते ही छूटकर इसने यश ( क्यों ) नहीं ले लिया ।






भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहीं करत पयाना।। अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुं न हृदय होत दुइ टूका।_अर्थ_ये प्राण अपयश और पाप के भांड़े हो गये। अब ये किस कारण कूच नहीं करते ( निकलते नहीं ) ? हाय ! नीचे मन ( बड़ा अच्छा ) मौका चूक गया। अब भी तो हृदय के दो टुकड़े नहीं है जाते!







मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहुं कृपन धन राशि गवांई।। बिरिद बांधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।_अर्थ_सुमंत्र हाथ मल_मलकर और सिर पीट-पीटकर पछताते हैं। मानो कोई कंजूस धन का खजाना को बैठा हो। वे इस प्रकार चले मानो कोई बड़ा योद्धा वीर का बाना पहनकर और उत्तम शूरवीर कहलाकर युद्ध से भाग चला हो।






बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भांति।।_अर्थ_जैसे कोई विवेकशील, वेद का ज्ञाता, साधु सम्मत आचरणों वाला और उत्तम जाति का ( कुलीन ) ब्राह्मण धोखे से मदिरा पी लें और पीछे पछतावे, उसी प्रकार मंत्री सुमंत्र सोच कर रहे ( पछता रहे ) हैं।






जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।। रहै करमबस परिहरि नाहू। सचिव हृदय तिमि दारुण दाहू।।_अर्थ_जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधु स्वभाव की, समझदार और मन, वचन और कर्म से पति को देवता माननेवाली पतिव्रता स्त्री को भाग्यवश पति को छोड़कर ( पति से अलग ) रहना पड़े, उस समय उसके हृदय में जो भयानक संताप होता है, वैसे ही मंत्री के हृदय में हो रहा है।







लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।। सूखइ अधर लागि मुहं लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।_अर्थ_नेत्रों में जल भरा है, दृष्टि मंद हो गयी है। कानों को सुनाई नहीं पड़ता, व्याकुल हुईं बुद्धि बएठइकआनए हो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुंह में लाटी लग गयी है। किन्तु ( ये सब मृत्यु के लक्षण होने पर भी ) प्राण नहीं निकलते; क्योंकि हृदय में अवधइरूपई किवाड़ लगे हैं ( अर्थात् चौदह वर्ष बीत जाने पर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रहीं हैं )।




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बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुं पिता महतारी।। हानि ग्लानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।_अर्थ_सुमंत
जी के मुख का रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है जैसे इन्होंने माता_पिता को मार डाला हो। उनके मन में रामवियोगरूपी हानि की महान् ग्लानि ( पीड़ा ) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरक को जाता हुआ रास्ते में सोच कर रहा हो।






बचन न आव हृदयं पछिताई। अवध काह मैं देखब जाइ।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।_अर्थ_मुंह से वचन नहीं निकलते। हृदय में पछताते हैं कि मैं अयोध्या में जाकर क्या देखूंगा ? श्रीरामचन्द्रजी से शून्य रथ को जो भी देखेगा, वहीं मुझे देखने में संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुंह नहीं देखना चाहेगा )।

Sunday, 28 May 2023

अयोध्याकाण्ड

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहं तहं नाथ पाउ तुम्ह धारा।। धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहिं निहारी।।_अर्थ_हे नाथ ! जहां _जहां आपने चरण रखें हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वन में विचरनेवाले पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफल जन्म हो गये।





हम सब धन्य सहित परिवारा। सुखी दरस भरी नयन तुम्हारा।। कीन्ह बास भल ठाउं बिचारी। इहां सकल रितु रहब सुखारी।।_अर्थ_ हम सब भी अपने परिवार सहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया। आपने बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है। यहां सभी ऋतुओं में आप सुखी रहियेगा।




हम सब भांति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।। बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।_अर्थ_हमलोग सब प्रकार से हाथी, सिंह, सर्प और बाघों से बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभो ! यहां के बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएं और खोह ( दर्रे ) सब पग_पग हमारे देखे हुए हैं।





तहं तहं तुम्हहिं अहेर खेलाउब। सर निर्झर जलठाउं देखउब।। हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।_अर्थ_हम वहां _वहां ( उन_उन स्थानों में ) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि जलाशयों को दिखावेंगे। हम कुटुम्बसमेत आपके सेवक हैं। हे नाथ ! इसलिये हमें आज्ञा देने में संकोच न कीजियेगा।





बेद बचन मुनि मन अगम सुनि प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।_अर्थ_जो वेदों के वचन और मुनियों के मन को भी अगम हैं, वे करुणा के नाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलों के वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकों के वचन सुनता है।





रामहिं केवल प्रेम पिआरा। जानि लेई जो जाननिहारा।। राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी को के वल प्रेम प्यारा है; जो जाननेवाला हो ( जानना चाहता हो ), वह जान ले। तब श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम से परिपुष्ट हुए ( प्रेमपूर्ण) कोमल वचन कहकर उन सब वन में विचरण करने वाले लोगों को संतुष्ट किया।







बिदा किए सिर नाई सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए। एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहीं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।।_अर्थ_फिर उनको विदा किया। वे सिर नवाकर चले और प्रभु के गुण कहते सुनते घर आये। और इस तरह देवता और मुनि को सुख देने वाले श्रीरामजी वन में रहने लगे।





जब तें आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।। फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना। मंजु फलित बर बेल बिताना।।_अर्थ_जबसे श्रीरघुनाथजी वन में आकर रहे तबसे वन मंगलदायक हो गया। अनेकों प्रकार के वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलों के मण्डप तने हैं।








सुरतरु सरिस सुभायं सुहाए। मनहुं बिबुध बन परिहरि आए।। गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिधि बयारि बही सुख देनी।।_अर्थ_वे कल्पवृक्ष के समान स्वाभाविक ही सुंदर हैं। मानो वे देवताओं के वन ( नन्दन वन ) को छोड़कर चले आये हैं। भौरों की पंक्तियां बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है।





 नीलकंठ कलकंठ सुख चातक चक्क चकोर। भांति भांति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चितचोर।।_अर्थ_नीलकंठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर आदि पक्षी कानों को सुख देनेवाली और चित्त को चुरानेवाली तरह_तरह की बोलियां बोलते हैं।





करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा। फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृग बृंद बिसेषी।।_अर्थ_हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन, ये सब वैर छोड़कर साथ_साथ  विचरते हैं। शिकार के लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजी छवि को देखकर पशुओं के समूह विशेष आनन्दित होते हैं।







बिबुध बिपिन जहं लगि जग माहीं। देखि रामबनु सकल सिहाहीं।। सुरसुरी सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरी धन्या।।_अर्थ_जगत् में जहां तक ( जितने ) देवताओं के वन हैं, सब श्रीरामजी के वन को देखकर सइहआतए हैं। गंगा, सरस्वती, सूर्य कुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य ( पुण्यमयी ) नदियां,।






सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनी कर करहिं बखाना।। उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।।_अर्थ_सारे तालाब, समुद्र, नदी और अनेकों नद सब मंदाकिनी की बड़ाई करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास मन्दरआचल और सुमेरु आदि सब, जो देवताओं के रहने के स्थान हैं,।





सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।। बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।_अर्थ_और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूट का यश गाते हैं। विंध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मन में सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है।






चित्रकूट के बिहंग मृग बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।_अर्थ_चित्रकूट के पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण_अंकुरादि की सभी जातियां पुण्य की राशि हैं और धन्य हैं_देवता दिन_रात ऐसा कहते हैं।





नयनवंत रघुबरहिं बिलोकी। पाई जन्म फल होहिं बिसोकी।। परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।_अर्थ_आंखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजी को देखकर जन्म का फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं और अचर ( पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि ) भगवान् की चरण_रज का स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यों सभी परमपद ( मोक्ष ) के अधिकारी हो गये।





सो बनु सैलु सुभायं सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।। महिमा अधिक पवन बिधि तासू। सुख सागर जहं कीन्ह निवासू।।_अर्थ_वह वन और पर्वत स्वाभाविक सुन्दर, मंगलमय और अत्यन्त पवित्र करनेवाला है। उसकी महिमा किस प्रकार कभी रात, जहां सुख के समुद्र श्रीरामजी ने निवास किया है।






पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहं सिय लखनु रामु रहे आई।। कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन।।_अर्थ_क्षीरसागर को त्यागकर और अयोध्या को छोड़कर जहां सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी आकर रहें, उस वन की जैसी परम शोभा है, उसको हजार मउखवआलए जो लाख शएषजई हैं, तो भी वे नहीं कह सकते।





सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।। सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।_अर्थ_उसे भला, मैं किस प्रकार से वर्णन करके कह सकता हूं। कहीं पोखरे का ( क्षुद्र ) कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्म से श्रीरामचन्द्रजी की सेवा करते हैं। उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता है।





छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु। करत न सपनेहुं लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।_अर्थ_क्षण_क्षणपर श्रीसीतारामजी के चरणों को देखकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मणजी स्वप्न में भी भाइयों, माता_पिता और घर की याद नहीं करते ।





राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।। छिनी छिनु फिर सिंधु बदलनी निहारी। प्रमुदित मनहुं चकोर कुमारी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्ब के लोग और घर की याद भूलकर बहुत सुखी रहती है। क्षण क्षण पर पति श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमा के समान मुख को देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोर कुमारी ( चकोरी ) चन्द्रमा को देखकर!





नाह नेह नित बढ़त बिलोकी। हर्षित रहत दिवस जिमि कोकी।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।_अर्थ_स्वामि का प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती है जैसे दिन में चकवी ! सीताजी का मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त है इससे उनको वन हजारों अवध के समान प्रिय लगता है।





परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।। सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिय सम कंद मूल फर।।_अर्थ_प्रियतम ( श्रीरामचन्द्रजी ) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी प्यारे कुटुम्बियों के समान लगते हैं। मुनियों की स्त्रियां सास के समान, श्रेष्ठ मुनि ससुर के समान और कन्द_मूल फलों का आहार उनको अमृत के समान लगता है।





नाथ साथ सांथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।। लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।_अर्थ_स्वामि के साथ सुन्दर साथरी ( कुश और पत्तों की सेज ) सैकड़ों कामदेव की सेजों के समान सुख देनेवाली है। जिनके ( कृपापूर्वक ) देखनेमात्र से जीव लोकपाल हो जाते हैं, उनको कहीं भोग_विलास मोहित कर सकते हैं !

Wednesday, 3 May 2023

अयोध्याकाण्ड

जाति पांति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।। सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयं रहहु रघुराई।।_अर्थ_ जाति, पांति, धन धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर_सब छोड़कर जो केवल आपको ही हृदय में धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी ! आप उनके हृदय में रहिये।





सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहं तहं देह धरें धनु बाना।। कर्म बचन मन राउर चेरा। राम करहु तिन्ह के उर डेरा।।_अर्थ_स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टि में समान है, क्योंकि वह जहां_तहां ( सब जगह ) केवल धनुष_बाण धारण किये आपको ही देखता है; और जो कर्म से, वचन से और मन से आपका दास है, हे रामजी ! आप उसके हृदय में डेरा कीजिये।






जाहि न चाहिअ कबहुं कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बहुत निरंतर तासु मन होहु राउर निज गेहु।।_अर्थ_ जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है।





एहि बिधि मुनि बर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।। कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहुं समय सुखदायक।।_अर्थ_इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ बाल्मीकि जी ने श्रीरामचन्द्रजी को घर दिखाये। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्रीरामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा_हे सूर्य कुल के स्वामी ! सुनि ये, अब मैं इस समय के दायरे सुखदायक आश्रम कहता हूं ( निवास स्थान बतलाता हूं )।







चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहं तुम्हार सब भांति सुपासू।। सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहंग बिहारू।।_अर्थ_आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिये, वहां आपके लिये सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों का विहार स्थल है।






नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रि प्रिया निज तप बल आनी।। सुरसुरी धार नाउं मंदाकिनी। जो सब पातक पोतक डाकिनि।।_अर्थ_वहां पवित्र नदी है, जिसकी पुरानों ने प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया जी अपने तपोबल से लायी थीं। वह गंगाजी की धारा है, उसका मंदाकिनी नाम है। वह सब पापरूपी बालकों को खा डालने के लिये डाकिनी ( डाइन ) रूप है।







अत्रि आदि मुनि बर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं ।। चलहु सफल श्रम सब करहू।। राम देहु गौरव गिरिबरहु।।_अर्थ_अत्रि आदि बहुत_से श्रेष्ठ मुनि वहां निवास करते हैं जो जोग, जप और तप करते हुए शरीर को कसते हैं। हे रामजी ! चलिये, सबके परिश्रम को सफल कीजिये और पर्वत श्रेष्ठ चित्रकूट को भी गौरव दीजिये।






चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ। आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।_अर्थ_महामुनि बाल्मीकि जी ने चित्रकूट की अपरिमित महिमा बखानकर कही। तब सीताजी सहित दोनों भाइयों ने आकर श्रेष्ठ नदी मंदाकिनी में स्नान किया।






रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुं अब ठाहर ठाटू।। लखन दीख पय उतर करारा। चहुं दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने कहा_लक्ष्मण ! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मण जी ने पयस्विनि नदी के उत्तर के ऊंचे किनारे को देखा ( और कहा कि_) इसके चारों ओर धनुष के जैसा एक नाला फिरा हुआ है।







नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।। चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।।_अर्थ_नदी ( मन्दाकिनी) उस धनुष की प्रत्यंचा ( डोरी ) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुग के समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु ( रूप निशाने ) हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामने से मारता है।







अस कहि लखन ठाउं देखरावा। जलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।। रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।।_अर्थ_ऐसा कहकर लक्ष्मण जी ने स्थान दिखलाया। स्थान को देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने सुख पाया। जब देवताओं ने जाना कि श्रीरामचन्द्रजी का मन यहां रम गया तब वे देवताओं के प्रधान थवई ( मकान बनानेवाले) विश्वकर्मा को साथ लेकर चले।






कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।। बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।_अर्थ_सब देवता कोल भील के वेष में आए और उन्होंने ( दिव्य ) पत्तों और घासों के सुंदर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटिया बनती जिसका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी_सी थी और दूसरी बड़ी थी।







लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत। सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ।।_अर्थ_लक्ष्मणजी और जानकी जी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास पत्तों के घर में शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनि का वेष धारण करके पत्नी रति और वसन्त ऋतु के साथ सुशोभित हो।





अमर नाग किन्नर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।। राम प्रणामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।।_अर्थ_उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूट में आये और श्रीरामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। देवता नेत्रों का लाभ पाकर आनन्दित हुए।





बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।। करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हर्षित निज निज सदन सिधाए।।_अर्थ_फूलों की वर्षा करके देव-समाज ने कहा_हे नाथ ! आज ( आपका दर्शन पाकर ) हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने दु:सह दुख सुनाये और (दु:खों के नाश का आश्वासन पाकर ) हर्षित होकर अपने_अपने स्थानों को चले गये।






चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।। आवत देखि मुदित मुनिवृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी चित्रकूट में आ बसे हैं, यह समाचार सुन_सुनकर बहुत _से मुनि आए। रघुकुल के चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी ने मुदित हुई मुनिमंडली को आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया।







मुनि रघुबरहिं लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।। सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।।_अर्थ_मुनिगण श्रीरामजी को हृदय से लगा लेते हैं और सफल होने के लिये आशीर्वाद देते हैं। वे सीताजी, लक्ष्मण जी और श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखते हैं और अपने सारे साधनों को सफल हुआ समझते हैं।






जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिवृंद। करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने जथायोग्य सम्मान करके मुनिमंडली को विदा किया। ( श्रीरामचन्द्रजी के आ जाने से ) वे सब अपने_अपने आश्रमों में अब स्वतंत्रता के साथ जाग, यज्ञ और तप करने लगे।





यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।। कंद मूल फल भरी भरी दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।।_अर्थ_यह ( श्रीरामजी के आगमन का ) समाचार जब कोल_भीलों ने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियां उनके घर ही पर आ गयी हैं। वे दोनों में कन्द, मूल, फल भर_भरकर चले। मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों।






तिन्ह महं जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहिं पूछहिं मगु जाता।। कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हिं देखें रघुराई।।_अर्थ_ उनमें से जो दोनों भाइयों को ( पहले ) देख चुके थे, उनसे दूसरे लोग रास्ते में जाते हुए पूछते हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दरता कहते_सुनते सबने आकर रघुनाथजी ने दर्शन किये।







करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहिं बिलोकहिं अति अनुरागे।। चित्र लिखे जनु जहं तहं ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।_अर्थ_भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुराग के साथ प्रभु को देखते हैं। वे मुग्ध हुए जहां_के_तहां मानो चित्रलिखे_से खड़े हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रों में प्रेमाश्रुओं के जल की बाढ़ आ रही है।






राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।। प्रभुहिं जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।_अर्थ_श्रीरामजी ने उन सबको प्रेम में मग्न जाना, और प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार_बार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनती वचन कहते हैं_






अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय। भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय।।_अर्थ_हे नाथ ! प्रभु ( आप ) के चरणों का दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गये। हे कोसलराय ! हमारे ही भाग्य से आपका यहां शुभागमन हुआ है।

Monday, 10 April 2023

अयोध्याकाण्ड

प्रभु प्रसाद सुचि सुभाग सुबासा। सादर जासु रहा नित नासा।। तुम्हहि निवेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।_अर्थ_जिसकी नासिका प्रभु ( आप ) के पवित्र और सुगंधित ( पुष्पादि ) सुन्दर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती ( सूंघती ) हैं, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसाद रूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं;





सीस नवहिं गुर द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनती बिसेषी।। कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदय नहिं दूजा।।_अर्थ_जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर बड़ी नम्रता के साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी ( आपके ) चरणों की पूजा करते हैं, और जिनके हृदय श्रीरामचन्द्रजी 
( आप ) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं;





चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तिन्हहिं सहित परिवारा।।_अर्थ_तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) के तीर्थों में चलकर आते हैं; हे रामजी ! आप उनके मन में निवास कीजिये। जो नित्य आपके ( रामनामरूप ) मंत्रराज को जपते हैं और परिवार ( परिकर ) सहित आपकी पूजा करते हैं।




तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवांइ देहिं बहुत दाना।। तुम्ह तें अधिक गुरहि जियं जानी। सकल भायं सेवहिं सनमानी।।_अर्थ_जो अनेकों प्रकार से तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर बहुत दान देते हैं; तथा जो गुरु को हृदय में आपसे भी अधिक ( बड़ा ) जानकर सर्वभाव से सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं;




सब कर मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह के मन मंदिर बसहु सिर रघुनंदन दोउ।।_अर्थ_और ये सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल मांगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारी प्रीति हो; उन लोगों के मनरूपी मंदिरों में सीताजी और रघुकुल को आनंदित करनेवाले आप दोनों बसिये।




काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।_अर्थ_ जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; और न कपट, धम्म र माया ही है_हे रघुराज ! आप उनके हृदय में निवास कीजिये।




सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत  सरन तुम्हारी।।_अर्थ_जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दु:ख और सुख तथा प्रशंसा ( बड़ाई ) और गाली ( निंदा ) समान हैं, जो विचार कर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते_सोते आपकी ही शरण हैं,




तुम्हहिं छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।_अर्थ_और आपको छोड़कर जिनके दूसरी कोई गति ( आश्रय ) नहीं है, हे रामजी ! आप उनके मन में बसिये। जो पराई स्त्री को जन्म देनेवाली माता के समान जानते हैं, और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है;





जे हरषहिं पर संपत्ति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।। जिन्हहिं राम तुम प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।_अर्थ_जो दूसरे की संपत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दु:खी होते हैं, और से रामजी ! जिन्हें आप प्राणों से प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं।




स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह के बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।_अर्थ_हे तात ! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं उनके मन रुपी मन्दिर में आप दोनों भाई निवास कीजिये।






अवगुन तजि सब के गुन गहहिं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।। नीति निपुण जिन्ह की जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।_अर्थ_जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौ के लिये संकट सहते हैं, नीति निपुणता में जिनकी जगत् में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर हैं।




गुन तुम्हार समुझई निज दोसा। जेहिं सब भांति तुम्हार भरोसा।। राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।_अर्थ_ जो गुणों को आपका और दोषों को अपना समझता है, जिसे सब प्रकार से आपका ही भरोसा है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदय में आप सीता सहित निवास कीजिये।



Tuesday, 28 March 2023

अयोध्याकाण्ड

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं। ते नरेस बिनु पावक दहहीं।। मंगल मूल बिप्र परितोषू। देही कोटि कुल भूसुर रोषू।।_अर्थ_क्योंकि जिससे मुनि और तपस्वी दु:ख पाते हैं, वे राजा बिना अग्नि के ही ( अपने दुष्ट कर्मों से ही ) जलकर भस्म हो जाते हैं। ब्राह्मणों का संतोष सब मंगलों की जड़ है और भूदेव ब्राह्मणों का क्रोध करोड़ों कुलों को भस्म कर देता है।





अस जिअं जानि कहिअ सोई ठाऊं। सिय सौमित्रि सहित जहं जाऊं।। तहं रचि रुचिर परन तृनसाला। बासु करौं कछु काल कृपाला।।_अर्थ_ऐसा हृदय में समझकर_वह स्थान बतला आते जहां मैं लक्ष्मण और सीता सहित जाऊं। और वहां सुन्दर पत्तों और घास की कुटी बनाकर, से दयालु ! कुछ समय निवास करूं।





सरल सहज सुनि रघुबर बानी। साधु साधु बोले मुनि ज्ञानी।। कस न कहहु अस रघुकुलकेतू। तुम्ह पालक संयत श्रुति सेतू।।_अर्थ_श्रीरामजी की सहज ही सरल वाणी सुनकर ज्ञानी मुनि वाल्मीकि बोले_'धन्य ! धन्य ! हे रघुकुल ध्वजा स्वरूप ! आप ऐसा क्यों न कहेंगे ? आप सदैव वेद की मर्यादा का पालन करते हैं।






श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी। जो सृजति जगु पालति हरति रुख पाई कृपानिधान की।। जो सहस सीसु अहीसु महीधरु लखनु सचराचर धनी। सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी।।_अर्थ_हे राम ! आप वेद की मर्यादा के रक्षक जगदीश्वर हैं और जानकी जी ( आपकी स्वरूप भूता ) माया हैं, जो कृपा के भण्डार आपकी रुख पाकर जगत् का सृजन, पालन और संहार करती हैं। जो हजार मस्तक वाले सर्पों के स्वामी और पृथ्वी को अपने सिर पर धारण करने वाले हैं, वहीं चराचर के स्वामी शेषजी लक्ष्मण हैं। देवताओं के कार्य के लिये आप राज का शरीरक्ष धारण करके दुष्ट राक्षसों की सेना का नाश करने के लिये चले हैं।




राम स्वरूप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर। अबिगत अकथ अपार नेति नेति नित निगम कह।_अर्थ_हे राम !आपका स्वरूप वाणी के अगोचरी, बुद्धि से परे, अव्यक्त, अकथनीय और अपार है। वेद निरंतर उसका 'नेति नेति कहकर वर्णन करते हैं।






जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे। बिधि हरि संभु नचावनिहारे।। तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा। औरु तुम्हहिं को जाननिहारा।।_अर्थ_ हे राम ! जगत् दृश्य है, आप उसके देखने वाले हैं। आप ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को भी नचानेवाले हैं। जब भी वे आपके मर्म को नहीं जानते, तब और कौन आपको जानने वाला है।







सोई जानइ जेहिं देहु जनाई। जानत तुम्हहिं तुम्हइ होइ जाई।। तुम्हरिहि कृपाल तुम्हहिं रघुनंदन। जानहिं भगत भगत उर चंदन।।_अर्थ_वही आपको जानता है जिसे आप जना देते हैं और जानते ही वह आपका ही स्वरूप बन जाता है। हे रघुनंदन ! हे भक्तों के हृदय को शीतल करनेवाले चन्दन ! आपकी ही कृपा से भक्त आपको जान पाते हैं।







चिदानंदमय देह तुम्हारी। बिगत बिकार जान अधिकारी।। नर तनु धरेहु संत सुर काजा। करहु करहु जस प्राकृत राजा।।_अर्थ_आपकी देह चिदानंदमय है ( यह प्रकृति जन्म पंचमहाभूतों की बनी हुई कर्मबंधनयुक्त त्रिदेहविशिष्ठ माणिक नहीं है ) और ( उत्पत्ति_नाश, वृद्धि_क्षय आदि ) सब विकारों से रहित है; इस रहस्य को अधिकारी पुरुष ही जानते हैं। आपने देवता और संतों के कार्य के लिये ( दिव्य ) नरशरीर धारण किया है और प्राकृत ( प्रकृति के तत्वों से निर्मित देह वाले, साधारण ) राजाओं की तरह से कहते और करते हैं।





राम देखि सुनि चरित तुम्हारे। जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे।। तुम्ह जो कहहु करहु सबु सांचा। तस काछिअ जस चाहिअ नाचा।।_अर्थ_ हे राम ! आपके चरित्रों को देख और सुनकर मूर्ख लोग तो मोह को प्राप्त होते हैं और ज्ञानीजन सुखी होते हैं। आप जो कुछ कहते, करते हैं, वह सब सत्य ( उचित ) ही है; क्योंकि जैसा स्वांग भरे वैसा ही नाचना भी तो चाहिये ( इस समय आप मनुष्य रूप में हैं, अतः मनुष्योचित व्यवहार करना ठीक ही है )।



पूछेहुं मोहि कि रहौं कहं मैं पूंछत सकुचाउं। जहं न होहु तहं देहु कहुं तुम्हहिं देखावौं ठाउं।।_अर्थ_आपने पूछा कि मैं कहां रहूं ? परंतु मैं यह पूछते सकुचा था हूं कि जहां आप न हों, वह स्थान बता दीजिये। तब मैं आपके रहने के लिये स्थान दिखाऊं ।





सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने। सकुचि राम मन महुं मुसुकाने।। बाल्मीकि हंसि कहहिं बहोरी। बानी मधुर अमिअ रस बोरी।।_अर्थ_मुनि के प्रेमरस से सने हुए वचन सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ( रहस्य खुल जाने के डर से ) सकुचाकर मन में मुस्कराये। वाल्मीकिजी हंसकर फिर अमृत_रस में डुबोती हुई मीठी वाणी बोले_






सुनहु राम अब कहुं निकेता। जहां बसहु सिय लखन समेता।। जिन्ह के श्रवण समुद्र समाना। कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना।_अर्थ_हे रामजी ! सुनिये, अब मैं वे स्थान बताता जहां आप सीताजी और लक्ष्मण जी समेत निवास करिये। जिसके कान समुद्र की भांति आपकी कथा रूपी अनेकों सुंदर नदियों से_







भरहिं निरंतर होहिं न पूरे। तिन्ह के हित तुम्ह कहुं गृह रूरे।। लोचन चातक जिन्ह करि राखे। रहहिं दरस जलधार अभिलाषे।।_अर्थ_निरंतर भरते रहते हैं, परंतु कभी कभी पूरे ( तृप्त ) नहीं होते, उनके हृदय आपके लिखे सुन्दर घर हैं और जिन्होंने अपने नेत्रों को चातक बना रखा है, जो आपके दर्शनरूपी मेघ के लिये सदा लालायित रहते हैं।






निदरहिं सरित सिंधु सर भारी। रूप बिंदु जल होहिं सुखारी।। तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक।। बसहु बंधु सिय सह रघुनायक।।_अर्थ_तथा जो भारी_भारी नदियों, समुद्रों और झीलों का निरादर करते हैं और आपके सौंदर्य ( रूपी मेघ ) के एक बूंद जल से सुखी हो जाते हैं ( अर्थात् आपके दिव्य सच्चिदानंद मय स्वरूप के किसी एक अंग की जरा_सी भी झांकी समाने स्थूल, सूक्ष्म और कारण तीनों जगत् के, अर्थात् पृथ्वी, स्वर्ग और ब्रह्मलोक तक के सौन्दर्य का तिरस्कार करते हैं ), हे रघुनाथ जी ! उनलोगों के हृदय रूपी सुखदायी भवनों में आप भाई लक्ष्मण और श्रीसीताजीसहित निवास कीजिये।





जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु। मुक्ताहार गुन गन चुनइ राम बसहु हियं तासु।। _अर्थ_आपके यशरूपी निर्मल मानसरोवर में जिसकी जीभ हंसिनी बनी हुई आपके गुणसमूहरूपी मोतियों को चुगती रहती है, हे रामजी ! आप उसके हृदय में बसिये।





Monday, 13 March 2023

अयोध्याकाण्ड

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता। धरति चरन मग चलति सभीता।। सीय राम पद अंक बराएं। लखन चलहिं मगु दाहिन लाएं।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के ( जमीन पर अंकित होनेवाले दोनों ) चरणचिन्हों के बीच_बीच में पैर रखती हुई सीताजी ( कहीं भगवान् के चरणचिन्हों पर पैर न टिक जाय इस बात से ) डरती हुई मार्ग में चल रही हैं, और लक्ष्मण जी  और लक्ष्मणजी ( मर्यादा की रक्षा के लिये ) सीताजी और श्रीरामचन्द्र जी दोनों के चरणचिन्हों को बचाते हुए उन्हें दाहिने रखकर रास्ता चल रहे हैं।





राम लखन सिय प्रीति सुहाई। बचन अगोचर किमि कहि जाई।। खग मृग मगन देखि छबि होहीं। लिए चोरि चित राम बटोहीं।।_अर्थ_श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी की सुन्दर प्रीति वाणी का विषय नहीं है ( अर्थात् अनिवर्चनीय है ), अतः: वह कैसे कहीं जा सकती है ? पक्षी और पशु भी उस छवि को देखकर ( प्रेमानंद में मग्न हो जाते हैं। पथिकरूप श्रीरामचन्द्रजी ने उनके भी चित्त चुरा लिये हैं।




जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ। भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ।।_अर्थ_प्यारे पथिक सीताजी सहित दोनों भाइयों को जिन जिन लोगों ने देखा, उन्होंने भव का अगम मार्ग ( जन्म_मृत्युरूपी संसार में भटकनेवाला भयानक मार्ग ) बिना ही परिश्रम आनंद के साथ तै कर लिया ( अर्थात् वे आवागमन के चक्र से सहज ही छूटकर मुक्त हो गये ।




अजहुं जासु उर सपनेहुं काऊ। बसहुं लखनु सिय रामु बटाऊ।। राम नाम पर पाइहि सोई। जो पथ पाव कबहुंक मुनि कोई।।_अर्थ_आज भी जिसके हृदय में स्वप्न में भी कभी लक्ष्मण, सीता, राम तीनों बटोही आ बसे तो भी वह श्रीरामजी के परमधाम के उस मार्ग को पा जायगा जिस मार्ग को कभी कोई बिरले ही मुनि पाते हैं ।





तब रघुबीर श्रमित सिय जानी। देखि निकट बटु सीतल पानी।। तहं बसि कंद मूल फल खाई। प्रात नहाई चले रघुराई।।_अर्थ_तब श्रीरामचन्द्र जी सीताजी को थकी हुई जानकर और समीप ही एक बड़ का वृक्ष देखकर उस दिन वहीं ठहर गये। कन्द मूल फल खाकर ( रातभर वहां रहकर ) प्रात:काल स्नान करके श्री रघुनाथ जी आगे चले।




देखत बन सर सैल सुहाए। बाल्मीकि आश्रम प्रभु आए।। राम दीख मुनि बास सुहावन। सुंदर गिरि काननु जलु पावन।।_अर्थ_सुंदर वन, पर्वत और तालाब देखते हुए रामु श्रीरामचन्द्रजी अअ सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।। खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।_अर्थ_सरोवरों में कमल और वनों में वृक्ष फूल रहे हैं। बहुत से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और रहित होकर प्रसन्न मन से विचर रहे हैं।




सरनि सरोज बिटप बन फूले। गुंजत मंजु मधुप रस भूले।। खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं। बिरहित बैर मुदित मन चरहीं।।_अर्थ_सरोवरों में कमल और वनों में वृक्ष फूल रहे हैं। बहुत से पक्षी और पशु कोलाहल कर रहे हैं और वैर से रहित होकर प्रसन्न मन से बिचर रहे हैं।





सुचि सुंदर आश्रम निरखि हरसे राजीवनैन। सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन।।_पवित्र और सुंदर आश्रम को देखकर कमलनयन श्रीरमचन्द्रजी हर्षित हुए। रघुश्रेष्ठ श्रीरामजी का आगमन सुनकर मुनि वाल्मीकि जी उन्हें लेने के लिये आगे आये।





मुनि कहुं राम दंडवत् कीन्हा। आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा।। देखि राम छबि नयन जुड़ाने। करि सनमानु आश्रमहिं आने।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि को दण्डवत् किया। विप्र श्रेष्ठ मुनि ने उन्हें आशीर्वाद दिया। श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखकर मुनि के नेत्र शीतल हो गये। सम्मान पूर्वक मुनि उन्हें अपने आश्रम में ले आये







मुनि बर अतिथि प्राणप्रिय पाए। कंद मूल फल मधुर मगाए।। सिर सौमित्रि राम फल खाए। तब मुनि आश्रम दिए सुहाए।।_अर्थ_श्रेष्ठ मुनि वाल्मीकि जी ने प्राणप्रिय अतिथियों को पाकर उनके लिखे मधुर कन्द, मूल, फल मंगवाते। श्रीसीताजी, लक्ष्मण जी और रामचन्द्रजी ने फलों को खाया। तब मुनि ने उनको ( विश्राम करने के लिये ) सुन्दर स्थान बतला दिये।




बाल्मीकि मन आनंदु भारी। मंगल मूर्ति नयन निहारी।। तब कर कमल जोरि रघुराई। बोले बचन श्रवन सुखदाई।।_अर्थ_( मुनि श्रीरामजी के पास बैठे हैं और उनकी ) मंगल_मूर्ति को नेत्रों से देखकर बाल्मीकि जी के मन में बड़ा भारी आनंद हो रहा है। तब श्री रघुनाथ जी कमल सदृश हाथों को जोड़कर, कानों को सुख देने वाले मधुर वचन बोले_





तुम्ह त्रिकालदर्शी मुनिनाथा। बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा।। अस कहि प्रभु सब कथा बखानी। जेहिं जेहि भांति दीन्ह बनु रानी।।_अर्थ_हे मुनिनाथ ! आप त्रिकालदर्शी हैं। संपूर्ण विश्व आपके लिए हथेली पर रखे हुए बेर के समान है। प्रभु श्रीरामचन्रजी ने ऐसा कहकर फिर जिस जिस प्रकार से रानी कैकेयी ने वनवास दिया, वह सब कथा विस्तार से सुनायी।




तात बचन पुनि मातु हित भाई भरत अस राउ। मो कहुं दरस तुम्हार प्रभु सबुत मम पुन्य प्रभाउ।।_अर्थ_(और कहा__) से प्रभु ! पिता की आज्ञा ( का पालन ), माता का हित और भरत जैसे ( स्नेही एवं धर्मात्मा ) भाई का राजा होना और फिर मुझे आपके दर्शन होना, यह सब मेरे पुन्यों का प्रभाव है।




देखि पाय मुनिराय तुम्हारे। भए सुकृत सब सुफल हमारे।। अब जहं राउर आयसु होई। मुनि उदबेगु न पावै कोई।।_अर्थ_हे मुनिराज ! आपके चरणों का दर्शन करने से आज हमारे सब पुण्य सफल हो गये ( हमें सारे पुत्रों का फल मिल गया )। अब जहां आपकी आज्ञा हो और जहां कोई भी मुनि उद्वेग को न प्राप्त हो_


Sunday, 26 February 2023

अयोध्याकाण्ड

जौं ए कंद मूल फल खाहीं। बादि सुधादि असन जग माहीं।। एक कहहिं ए सहज सुहाए। अपुन प्रगट भए बिधि न बनाएं ।।_अर्थ_जों ये कन्द, मूल, फल खाते हैं तो जगत् में अमृत आदि भोजन व्यर्थ ही हैं। कोई एक कहते हैं_ये स्वभाव से ही सुंदर हैं ( इनका सौन्दर्य_माधुर्य नित्य और स्वाभाविक है )। ये अपने_आप प्रकट हुए हैं, ब्रह्मा के बनाये नहीं।




जहं लगि बेद कही बिधि करनी। श्रवन नयन मनु गोचर बरनी।। देखहु खोजि भुवन दस चारी। कहु अस पुरुष कहां असि नारी।।_अर्थ_हमारे कानों, नेत्रों और मन के द्वारा अनुभव में आनेवाली विधाता की करनी को जहां तक वेदों ने वर्णन करके कहा है, वहां तक चौदहों लोकों में ढ़ूंढ़ देखो, ऐसा पुरुष और ऐसी स्त्री कहां हैं ? ( कहीं भी नहीं है, इसी से सिद्ध है कि ये विधाता के चौदहों लोकों से अलग है और अपनी महिमा से अपने आप निर्मित हुए हैं।





इन्हहिं देखि बिधि मनु अनुरागा। पटतर जोग बनावै लागा।। कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए। जेहिं इरिषा बन अनि दुराए।।_अर्थ_इन्हें देखकर विधाता का मन अनुरक्त ( मुग्ध ) हो गया, तब वह भी इन्हीं की उपमा के योग्य दूसरे स्त्री_पुरुष बनाने लगा। उसने बहुत परिश्रम किया, किन्तु कोई उसकी अटकल में ही नहीं आये ( पूरे नहीं उतरे )। इसी ईर्ष्या के मारे उसने इनको जंगल में लाकर छिपा दिया है।





एक कहहिं हम बहुत न जानहिं। आपुहि परम धन्य करि मानहिं।। ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे। जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे।।_अर्थ_कोई एक कहते हैं_हम बहुत अधिक नहीं जानते। हां, अपने को परम धन्य अवश्य समझते हैं ( जो इनके दर्शन कर रहे हैं ) और हमारी समझ में वे भी बड़े पुण्यवान् हैं जिन्होंने इन्हें देखा है, जो देख रहे हैं और जो देखेंगे।







एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर। किमि चलिहिहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर।।_अर्थ_इस प्रकार प्रिय वचन कह_कहकर सब नेत्रों में ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर लेते हैं और कहते हैं कि ये अत्यन्त सुकुमार शरीर वाले दुर्गम ( कठिन ) मार्ग में कैसे चलेगें।




नारि सनेह बिकल बस होहीं। चकईं सांझ समय जनु सोहीं।। मृदु पद कमल कठिन मगु जानी। गहबरि हृदयं कहहिं बर बानी।।_अर्थ_स्त्रियां स्नेहवश विकल हो जाती हैं। मानो संध्या के समय चकवी ( भावी वियोग की पीड़ा से ) सोह रही हों ( दुखी हो रही हों )। इनके चरणकमलों को कोमल तथा मार्ग को कठोर जानकर वे व्यथित हृदय से उत्तम वाणी कहती हैं।




परसत मृदुल चरन अरुनारे। सकुचित महि जिमि हृदय हमारे।। जौं जगदीस इन्हहिं बनु दीन्हा। कस न सुमनमय मारगु कीन्हा।।_अर्थ_इनके कोमल और लाल_लाल चरणों ( तलवों ) को छूते ही पृथ्वी वैसे ही सकुचा जाती है जैसे हमारे हृदय सकुचा रहे हैं। जगदीश्वर ने यदि इन्हें वनवास ही दिया, तो सारे रास्ते को पुष्पमय क्यों नहीं बना दिया?




जौं मांगा पाइअ बिधि पाहीं। ए रखिअहिं सखि आंखिन्ह माहीं।। जे नर नारि न अवसर आए। तिन्ह सिय राम न देखन पाए।।_अर्थ_यदि ब्रह्मा से मांगे तो हे सखि ! ( हम तो उनसे मांगकर ) इन्हें अपनी आंखों में ही रखें ! जो स्त्री_पुरुष इस अवसर नहीं आये, वे श्रीसीतारामजी को नहीं देख सके।






सुनि सुरूपु बूझहिं अकुलाई। अब लगि गए कहां लगि भाई।। समरथ धाइ बिलोकहिं जाई। प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई।।_अर्थ_उनके सौन्दर्य को सुनकर वे व्याकुल होकर पूछते हैं कि भाई ! अबतक वे कहां तक गये होंगे ? और जो समर्थ हैं वे दौड़ते हुए जाकर उनके दर्शन कर लेते हैं और जन्म का फल पाकर, विशेष आनंदित होकर लौटते हैं। 





गांव गांव अब होई अनंदू। देखि भानुकुल कैरव चंदू।। जे कछु समाचार सुनि पावहिं। ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं।।_अर्थ_सूर्यकुलरूपी कुमुदिनी के प्रफुल्लित करने वाले चन्द्रमा स्वरूप श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन कर गांव_गांव में ऐसा ही आनंद हो रहा है। जो लोग ( वनवास दिये जाने का ) कुछ भी समाचार सुन पाते हैं, वे राज_रानी ( दशरथ_कैकेयी ) को दोष लगाते हैं।




कहहिं एक अति भल नरनाहू। दीन्ह हमहि जेहि लोचन लाहू।। कहहिं परस्पर लोग लोगाईं। बातें सरल सनेह सुहाई।।_अर्थ_कोई एक कहते हैं कि राजा बहुत ही अच्छे हैं, जिन्होंने हमें अपने नेत्रों का लाभ दिया। स्त्री _पुरुष सभी आपस में सीधी, स्नेह भरी सुन्दर बातें कर रहे हैं।




ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए। धन्य सो नगरु जहां तें आए।। धन्य सो देसु सैलु बन गाऊं। जहं जहं  जाहिं धन्य सोइ ठाऊं।।_अर्थ_( कहते हैं _ ) वे माता_पिता धन्य हैं जिन्होंने इन्हें जन्म दिया। वह नगर धन्य हैं जहां से ये आते हैं। वह देश, पर्वत, वन और गांव धन्य है, और वही स्थान धन्य है जहां जहां ये जाते हैं।




सुखु पायउ बिरंचि रचि तेही। ए जेहिं के सब भांति सनेही।। राम लखन पथ कथा सुहाई। रही सकल मग कानन छाई।।_अर्थ_ब्रह्मा ने उसी को रचकर सुख पाया है जिसके ये  ( श्रीरामचन्द्र जी ) सब प्रकार से स्नेही हैं। पथिकरूप श्रीराम_लक्ष्मण की सुन्दर कथा सारे रास्ते  जंगल में जा गयी है।




एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत। जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत।।_रघुकुलरुपी कमल के खिलानेवाले सूर्य श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकार मार्ग के लोगों को सुख देते हुए सीताजी और लक्ष्मण जी सहित वन को देखते हुए चले जा रहे हैं। 




आगें राम लखनु बनु पाछें। तापस बेस बिराजत काछें।। उभय बीच सिय सोहति कैसें। ब्रह्म जीव बिच माया जैसें।।_अर्थ_आगे श्रीरामजी हैं, पीछे लक्ष्मण जी सुशोभित हैं। तपस्वियों  के वेष बनाये दोनों बड़ी शोभा पा रहे हैं। दोनों के बीच में सीताजी कैसी सुशोभित हो रही हैं, जैसे ब्रह्म और जीव के बीच माया।





बहुरि कहउं छबि जब मन बसई। जनु मधु मदन मध्य रति लसई।। उपमा बहुरि कहउं जियं जोही। जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही।।_अर्थ_फिर जैसी छबि मेरे मन में बस रही है, उसको कहता हूं_ मानो बसंत ऋतु और कामदेव के बीच में रति ( कामदेव की स्त्री ) शोभित हो। फिर अपने हृदय में खोजकर उपमा कहता हूं कि मानो बुध ( चन्द्रमा के पुत्र ) और चन्द्रमा के बीच में रोहिणी ( चन्द्रमा की स्त्री ) सोह रही हो।