Wednesday, 16 August 2023

अयोध्याकाण्ड

धीरजु धरिअ तो पाइअ पारू। नहीं तो बूड़िहिं सभी परिवारू।। जौं जियं धरिअ बिनय प्रिय मोरी। रामु लखनऊ सिय मिलहिं बहोरी।।_अर्थ_आप धीरज धरियेगा, तो सब पार पहुंच जायेंगे। नहिं तो सारा परिवार डूब जायगा। हे प्रिय स्वामी! यदि मेरी विनती हृदय में धारण कीजियेगा तो श्रीराम, लक्ष्मण, सीता फिर आ मिलेंगे।





प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आंखि उघारि।  तलफत मीन मलीन जनु सींचती सीतल बारि।।_अर्थ_प्रिय पत्नी कौशल्या के कोमल वचन सुनते हुए राजा ने आंखें खोलकर देखा। मानो तड़पती हुई दिन मछली पर कोई शीतल जल छिड़क रहा हो।







धरि धीरजु उठि बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहं राम कृपालू।। कहां लखनु कहं राम सनेही। कहं प्रिय पुत्रवधू बैदेही।।_अर्थ_धीरज धरकर राजा उठ बैठे और बोले_सुमंत्र ! कहो, कृपालु राम कहां हैं ? लक्ष्मण कहां हैं ? स्नेही राम कहां हैं ? और मेरी प्यारी बहू जानकी कहां है ?







बिलपत राउ बिकल बहुत भांती। भइ जुग सरिस सिरात न राती।। तापस अंध साप सुनि आई। कौसल्यहिं सब कथा सुनाई।।_अर्थ_राजा व्याकुल होकर बहुत प्रकार से विलाप कर रहे हैं। वह रात युग के समान बड़ी हो गयी, बीतती ही नहीं। राजा को अंधे तपस्वी ( श्रवणकुमार के पिता ) के शाप की याद आ गयी। उन्होंने सब कथा कौसल्या को कह सुनायी। 







भयऊ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।। सो तनु राखि करब मैं काहा। जेहि न प्रेमु पन मोर निबाहा।।_अर्थ_उस इतिहास का वर्णन करते_करते राजा व्याकुल हो गये और कहने लगे कि श्रीराम के बिना जीने की आशा को धिक्कार है। मैं उस शरीर को रखकर क्या करूंगा जिसने मेरा प्रेम का पन नहीं निबाहा।









हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।। हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।।_अर्थ_हा रघुकुल को आनंद देनेवाले मेरे प्राण प्यारे राम ! तुम्हारे बिना जीते हुए मुझे बहुत दिन बीत गये। हा जानकी, लक्ष्मण! हा रघुबर ! हा पिता के चित्तरूपी चातक के हित करनेवाले मेघ !







राम राम कहि राम कहां राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहं राउ गयी सुरधाम।।_अर्थ_राम_राम कहकर और फिर राम कहकर राजा श्रीराम के विरह में शरीर त्यागकर सुरलोक को सिधार गये।






जिअन मरन फल दशरथ पावा। अंड अनेक अमल जस छावा।। जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु संवारा।।_अर्थ_जीने और मरने का फल तो दशरथजी ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डों में छा गया। जीते_जी तो श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमा के समान मुख को देखा और श्रीराम के विरह को निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया।

Sunday, 6 August 2023

अयोध्याकाण्ड

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।। धीरजु धरहीं बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।_अर्थ_मूर्खलोग सुख में हर्षित होते हैं और दु:ख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। हे सबके हितकारी ( रक्षक ) ! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोक का परित्याग कीजिये।








प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरी तीर। न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ वीर।।_अर्थ_ श्रीरामजी का पहला निवास ( मुकाम ) तमसा के तट पर हुआ, दूसरा गंगातीर पर। सीताजी सहित दोनों भाई उस दिन स्नान करके जल पीकर ही रहे।








केवट कीन्ह बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवांई।। होत प्रात बट छीर मंगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।।_अर्थ_ केवट ( निषादराज ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर ( श्रृंगवेरपुर ) मं ही बितायी। दूसरे दिन सवेरा होते ही बड़ का दूध मंगवाया और उससे श्रीराम_लक्ष्मण ने अपने सिरों पर जटाओं के मुकुट बनाये।








रामसखा तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाई चले रघुराई।। लखन बान धनु धरे बनाई। आप चढ़े प्रभु आयसु पाई।।_अर्थ_ तब श्रीरामचन्द्रजी के सखा निषादराज ने नाव मंगवायी। पहले प्रिया सीताजी को उसपर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजी ने धनुष _बाण सजाकर रखें और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े।









बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।। तात प्रनामु तात सन कहेहू। बार बार पद पंकज गहेहू।।_अर्थ_ मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी धीरज धरकर मधुर वचन बोले_ हे तात ! पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और मेरी और से बार_बार उनके चरण_कमल पकड़ना।।









करबि पायं परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।। बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।_अर्थ_फिर पांव पकड़कर विनती करना कि हे पिताजी ! आप मेरी चिंता न कीजिये। आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्य से वन में और मार्ग में हमारी कुशल मंगल होगा।










तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरिंं आइहौं।। जननीं सकल परितोषि परि परि पायं करी बिनती घनी। तुलसी करहु सोई जतन जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी।।_अर्थ_हे पिताजी ! आपके अनुग्रह से मैं वन जाते हुए सब प्रकार का सुख पाऊंगा। आज्ञा का भलीभांति पालन करके चरणों का दर्शन करने कुशलपूर्वक फिर आऊंगा। सब माताओं के पैरों पड़ _पड़कर उनका समाधान करके और उनसे बहुत विनती करके_तुलसीदास कहते हैं _तुम वहीं प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी प्रसन्न रहें।









गुर सन कहब संदेसु बार बार पद पदुम गहि। करब सोई उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति।।_अर्थ_बार_बार चरणकमलों को पकड़कर गुरु वसिष्ठजी से मेरा संदेसा कहना कि ये वही उपदेश दें जिससे अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें।








पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।। सोई सब भांति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।।_अर्थ_हे तात ! सब प्रवासियों और कुटुम्बियों से निहोरा ( अनुरोध ) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा सब प्रकार से हितकारी है जिसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।








कहब संदेसु भरत के आएं। नीति न तजिअ राजपदु पाएं।। पालेहु प्रजहि कर्म मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।।_अर्थ_भरत के आने पर उनको मेरा संदेसा कहना कि राजा का पद पा जाने पर नीति न छोड़ देना; कर्म, वचन और मन से प्रजा का पालन करना और सब माताओं को समान जानकर उनकी सेवा करना।








ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।। तात भांति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करें न काऊ।।_अर्थ_और हे भाई ! पिता, माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपने को अन्त तक निबाहना। हे तात ! राजा ( पिताजी ) को उसी प्रकार से रखना जिससे वे कभी ( किसी तरह भी ) मेरा सोच न करें।








लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।। बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।_अर्थ_लक्ष्मणने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामजी ने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार_बार अपनी सौगंध दिलायी ( और कहा_ ) से तात ! लक्ष्मण का लड़कपन वहां न कहना।








कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह। थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।_अर्थ_प्रणाम कर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, किन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं।  उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रों में जल भर आया और शरीर रोमांच से व्याप्त हो गया।






  

तेहि अवसर रघुबर रुख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।। रघुकुलतिलक चले एहि भांती। देखउं ठाढ़ कुलिस धरि छाती।।_अर्थ_उसी समय श्रीरामचन्द्रजी का रुख पाकर केवट ने पार जाने के लिये नाव चला दी। इस प्रकार रघुवंशतिलक श्रीरामचन्द्रजी चल दिये और मैं छाती पर वज्र रखकर खड़ा_खड़ा देखता रहा।









मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरौ लेइ राम संदेसू।। अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि ग्लानि सोच बस भयऊ।।_अर्थ_मैं अपने क्लेश को कैसे कहूं, जो श्रीरामजी का यह संदेसा  लेकर जीता ही लौट आया ! ऐसा कहकर मंत्री की वाणी रुक गयी ( वे चुप हो गये ) और वे हानि की ग्लानि और सोचवश हो गये।








सूत बचन सुनहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।। तलफत बिषय मोह मन मापा। माजा मनहुं मीन कर ब्यापा।।_अर्थ_सारथि सुमंत्र के वचन सुनते ही राजा पृथ्वी पर गिर पड़े, उनके हृदय में भयानक जलन होने लगी। वे तड़पने लगे, उनका मन भीषण मोह से व्याकुल हो गया। मानो मछली को मांजा व्याप गया हो ( पहली वर्षा का जल लग गया हो )।








करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।। सुनि बिलाप दुखहू दुखी  लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।_अर्थ_सब रानियां विलाप करके रो रही हैं। उस महान विपत्ति का कैसे वर्णन किया जाय ? उस समय के विलाप को सुनकर दु:ख को भी दु:ख लगा और धीरज का भी धीरज भाग गया।








भयउ कोलाहल अवध अति सुनि नृप राउर सोरु। बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुं कुलिस कठोर।।_अर्थ_ राजा के रावले ( रनिवास ) में रोने का शोर सुनकर अयोध्या में बड़ा भारी कुहराम मच गया। ( ऐसा जान पड़ता था ) मानो पक्षियों के विशाल वन में आ रात के समय कठोर वज्र गिरा हो।







प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि विहीन जनु व्याकुल ब्यालू।। इंद्रीं सकल बिकल भईं भारी। जनु सर सरसिज बनी बिनु बारी।।_अर्थ_राजा के प्राण कंठ में आ गये। मानो मणि के बिना सांप व्याकुल ( मरणासन्न ) हो गया हो। इन्द्रियां सभी बहुत ही विकल हो गयीं, मानो बिना जल के तालाब में कमलों का वन मुरझा गया है।







कौसल्या नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबी अंथयउ जाय जाना।। उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।।_अर्थ_ कौसल्याजी ने राजा को बहुत दुखी देखकर अपने हृदय में जान लिया कि अब सूर्यकुल का सूर्य अस्त हो चला !  तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्या हृदय में धीरज धरकर समय के अनुकूल वचन बोलीं_







नाथ समुझि मन करिअ विचारू। राम वियोग पयोधि अपारू।। करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक ममाजू।।_अर्थ_हे नाथ ! आप मन में समझकर विचार कीजिये कि श्रीरामचन्द्र का वियोग अपार समुद्र है और आप उसके कर्णधार ( खेनेवाले ) हैं। सब प्रियजन ( कुटुम्बी और प्रजा ) ही यात्रियों का समाज है, जो इस जहाज पर चढ़ा हुआ है।

Sunday, 16 July 2023

अयोध्याकाण्ड

बचन न आव हृदयं पछिताई। अवध काह मैं देखब जाइ।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।_अर्थ_मुंह से वचन नहीं निकलते। हृदय में पछताते हैं कि मैं अयोध्या में जाकर क्या देखूंगा ? श्रीरामचन्द्रजी से शून्य रथ को जो भी देखेगा, वहीं मुझे देखने में संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुंह नहीं देखना चाहेगा )।





धाइ पूछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नारि। उतरु देब मैं सबहि तब हृदयं बज्रु बैठारि।।_अर्थ_नगर के सब व्याकुल स्त्री_पुरुष जब दौड़कर मुझसे पूछेंगे, तब मैं हृदय पर वज्र रखकर सबको उत्तर दूंगा।    







पूछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहिं बिधाता।। पूछिहहिं जबहिं लखन महतारी। कहिहउं कवन संदेस सुखारी।।_अर्थ_जब दीन_दु_खी सब माताएं पूछेंगी, तब से विधाता ! मैं उन्हें क्या कहूंगा ? जब लक्ष्मणजी की माता मुझसे पूछेंगी, तब मैं उनसे कौन_सा सुखदायी संदेशा कहूंगा।







 राम जननी जब आइहि धाइ। सुमिरि बच्छ जिमि धेनु लवाई।। पूछत उतरु देब मैं तेही। गए बनु राम लखनु बैदेही।।_अर्थ_श्रीरामजी की माता जब इस प्रकार दौड़ी आवेंगी जैसे श्री ब्यायी हुई गौ बछड़े को याद करके दौड़ी आती है, तब उसके पूछने पर मैं उन्हें यह उत्तर दूंगा कि श्रीराम, लक्ष्मण, सीता वन को चले गये।






जोइ पूछिहिं तेहि उतरु देबा। जाइ अवध अब यह सुख लेबा।। पूछिहिं जबहिं राऊ दुख दीना। जीवनी जासु रघुनाथ अधीना।।_अर्थ_ जो भी पूछेगा उसे यही उत्तर देना पड़ेगा ! हाय ! अयोध्या जाकर मुझे अब यही सुख लेना है ! जब दु:ख से दीन महाराज, जिनका जीवन रघुनाथजी के ( दर्शनके ) ही अधीन है, मुझसे पूछेंगे,।






देहंउ उतरु कोनु मुहु लाई। आयउं कुसल कुअंर पहुंचाई।। सुनत लखन सीय राम संदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।_अर्थ_प्रियतम ( श्रीरामजी) रूपी जल के बिछुड़ते मेरा हृदय कीचड़ की तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूं कि विधाता ने मुझे यह 'यातनाशरीर' ही दिया है ( जो पापी जीवों को नरक भोगने के लिये मिलता है )







हृदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु। जानत हों मोहि दीन्हा बिधि यही जितना सरीरु।।_अर्थ_प्रियतम ( श्रीरामजी ) रूपी जल के बिछुड़ते ही मेरा हृदय कीचड़ के तरह फट नहीं गया, इससे मैं जानता हूं कि विधाता ने मुझे यह 'यातनाशरीर' ही दिया है ( जो पापी जीवों को नरक भोगने के लिये मिलता है)








एहि बिधि करत पंथ पछितावा।  तमसा तीर तुरंत रथु आवा।। बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरेउ पायं परि बिकल बिषादा।।_अर्थ_सुमंत्र मार्ग में इस प्रकार पछतावा कर रहे थे, इतने में रथ तुरत तमसा नदी के तट पर आ पहुंचा। मंत्री ने विनय करके चारों निषादों को विदा किया। वे विषाद से व्याकुल होते हुए सुमंत्र के पैरों पड़कर लौटे।







पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बांभन गाई।। बैठि बिटप तरु दिवसु गवांवा। सांझ समय तब अवसरु पावा।।_अर्थ_ नगर में प्रवेश करते समय मंत्री ( ग्लानि के कारण ) ऐसे सकुचाते हैं, मानो गुरु, ब्राह्मण या गौ को मारकर आये हों। सारा दिन एक पेड़ के नीचे बैठकर बिताया। जब सन्ध्या हुई तब मौका मिला।






अवध प्रबेसु कीन्ह अंधियारे। पैठ भवन रथ राखी दुआरें।।  जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथ देखन आए।।_अर्थ_अंधेरा होने पर उन्होंने अयोध्या में प्रवेश किया और रथ को दरवाजे पर खड़ा करके वे ( चुपके से ) महल में घुसे। जिन जिन लोगों ने यह समाचार सुन पाया, वे सभी रथ को देखने राजद्वार पर आये।








रथु पहचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।। नगर नारि नर व्याकुल कैसें। निघटत नीर मीनगन जैसें।।_अर्थ_रथ को पहचानकर और घोड़ों को व्याकुल देखकर शरीर ऐसे गले जा रहे हैं ( क्षीण हो रहे हैं ) जैसे घाम में ओले ! नगर के स्त्री_पुरुष कैसे व्याकुल हैं जैसे जल के घटने पर मछलियां ( व्याकुल होती हैं)।









सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु। भवनु भयंकर लाग तेहि मानहुं प्रेत निवासु।।_अर्थ_मंत्री का ( अकेले ही ) आना सुनकर सारा रनिवास व्याकुल हो गया। राजमहल उनको ऐसा भयानक लगा मानो प्रेतों का निवासस्थान ( श्मशान ) हो।








अति आरती सब पूछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।। सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहां नृपु तेहि तेहि बूझा।।_अर्थ_अत्यंत आर्त होकर जब रानियां पूछती हैं; पर सुमंत्र को कुछ उत्तर नहीं आता, उनकी वाणी विकल हो गयी ( रुक गयी ) है। न कानों से सुनायी पड़ता है और न आंखों से कुछ सूझता है। वे जो भी सामने आता है उस_उससे पूछते हैं_कहो, राजा कहां है ?









दासिन्ह दिख सचिव बिकलाई। कौशल्या गृह गईं लवाई।। जाइ सुमंत्र दिख कस राजा। अमिय रहित जनु चंदु बिराजा।।_अर्थ_दासियां मंत्री को व्याकुल देखकर उन्हें कौशल्याजी के महल में लगवा गयीं। सुमंत्र ने वहां जाकर राजा को कैसा ( बैठे ) देखा मानो अमृत का चन्द्रमा हो।








आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।। लेइ उसासु सोच एहि भांति। सुरपुर में जनु खंसेउ जजाती।।_अर्थ_राजा आसन, शय्या और आभूषणों से रहित बिलकुल मलिन ( उदास ) पृथ्वी पर पड़े हुए हैं। वे लेकर इस प्रकार सोच करते रहे हैं मानो राजा ययाति स्वर्ग से गिरकर सोच कर रहे हों।







लेत सोच भरी छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।। राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।_ अर्थ_ राजा क्षण_क्षण में सोच से छाती भर लेते हैं। ऐसी विकल दशा है मानो ( गीधराज जटायु का भाई ) संपाती पंखों के जल जाने के बाद गिर पड़ा हो। राजा ( बार _बार ) 'राम', 'हा स्नेही  ( प्यारे ) राम !' कहते हैं, फिर 'हा राम, हां लक्ष्मण, हां जानकी' ऐसा कहने लगते हैं। 







देखि सचिवं जयजीव कहि किन्हेंउ दंड प्रनामु।। सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहं राम ।।_अर्थ_मंत्री ने देखकर 'जयजीव' कहकर दण्डवत् प्रणाम किया। सुनते ही राजा व्याकुल होकर उठे और बोले_सुमन्त्र ! कहो, राम कहां हैं ?








भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।। सहित सनेह निकट बैठारी। पूछत राउ नयन भरी बारी।।_अर्थ_राजा ने सुमंत्र को हृदय से लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमी को कुछ सहारा मिल गया हो। मंत्री को स्नेह के साथ बैठाकर नेत्रों में जल भरकर राजा पूछने लगे_








राम कुसल कहीं सखा सनेही। कहां रघुनाथु लखनु बैदेही।। आनेहु फेरि कि बनहिं सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।।_अर्थ_हे मेरे प्रेमी सखा ! श्रीरामजी की कुशल कहो। बताओ, श्रीराम, लक्ष्मण और जानकी कहां हैं ? उनको लौटा लाए हो कि वे वन को चले गये ? यह सुनते ही मंत्री के नेत्रों में जल भर आया।









सोक बिकल पुनि पूंछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।। राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।।_अर्थ_शोक से व्याकुल होकर राजा फिर पूछने लगे_सीता, राम और लक्ष्मण का संदेसा तो कहो। श्रीरामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को याद कर_करके राजा हृदय में सोच करते हैं।










राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरहुं हरांसू।। सो सुत बिछुड़त गए न प्राना। को पापी बड़े मोहि समाना।।_अर्थ_( और कहते हैं _) मैंने राजा होने की बात सुनकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिस ( राम ) के मन में हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्र के बिछड़ने पर भी मेरे प्राण नहीं गये, तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा ?









सखा रामु सिय लखनु जहं तहां मोहि पहुंचाव। नाही त चाहत चलन अब प्रान कहउं सतिभाउ।।_अर्थ_हे सखा ! श्रीराम, जानकी और लखन जहां हैं, मुझे भी वहीं पहुंचा दो। नहिं तो मैं सत्यभाव से कहता हूं कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं।








पुनि पुनि पूंछत मंत्रिहिं राऊ। प्रियतम सुअन संदेस सुनाऊ।। करहि सखा सोई बेगि उपाऊ। राम लखन सीय नयन देखाऊ।।_अर्थ_राजा बार_बार मंत्री से पूछते हैं _मेरे प्रियतम पुत्रों का संदेसा सुनाओ। हे सखा ! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को मुझे आंखों दिखा दो।









सचिव धीर धरि कह मृदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।। बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।।_अर्थ_ मंत्री धीरज धरकर कोमल वाणी बोले_महाराज ! आप पण्डित और ज्ञानी हैं। हे देव ! आप शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान् पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। आपने सदा साधुओं के समाज का सेवन किया है।








जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।। काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।।_अर्थ_जन्म_मरण, दु:ख_सुख के भोग, हानि_लाभ, प्यारों का मिलना_बिछुड़ना, ये सब से स्वामी ! काल और कर्म के अधीन रात और दिन की तरह बरबस होते रहते हैं।







Thursday, 22 June 2023

अयोध्याकाण्ड

सुमिरत राम तजहिं जन तृन सम विषय बिलासु। राम प्रिया जगजननी सिय कछु न आचरजु तासु।।_अर्थ_जिन श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करने से ही भक्तजन तमाम भोग_विलास को तिनके के समान त्याग देते हैं, उन श्रीरामचन्द्रजी की प्रिय पत्नी और जगत् की माता सीताजी के लिये यह ( भोग विलास का त्याग ) कुछ भी आश्चर्य नहीं है।





सिय लखन जेहिं बिधि सुखु लहहीं। सोई रघुनाथ करहिं सोई कहहीं।। कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी।।_अर्थ_सीताजी और लक्ष्मणजी जिस प्रकार सुख मानकर सुख मिले, श्रीरघुनाथजी वहीं करते और वही करते हैं। भगवान् प्राचीन कथाएं और कहानियां कहते हैं और लक्ष्मणजी तथा अत्यंत सुख मानकर सुन रहे हैं।





जब जब राम अवध सुधि करहीं। तब तब बारिश बिलोचन भरहीं। सुमिरत मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।।_अर्थ_जब जब श्रीरामचन्द्रजी अयोध्या की याद करते हैं, तब तब उनके नेत्रों में जल भर आता है। माता_पिता, कुटुम्बियों और भाइयों तथा भरत के प्रेम, शील और सेवाभाव को याद करके_






कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहीं कुसमी बिचारी।। लगा सिय लखनु बिकल होई जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसार परिछाहीं।।_अर्थ_कृपा के समुद्र प्रभु श्रीरामचन्द्रजी दु:खी हो जाते हैं, परन्तु फिर कुसमय समझकर धीरज धारण कर लेते हैं। श्रीरामचन्द्रजी को दु:खी देखकर सीताजी और लक्ष्मणजी भी व्याकुल हो जाते हैं, जैसे किसी मनुष्य की परछाईं उस मनुष्य के समान ही चेष्टा करती है ।





प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।। लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहीं लखनु अरु सीता।।_अर्थ_ तब धीर, कृपालु और भक्तों के हृदयों को शीतल करने के लिये चन्दनरूप रघुकुल को आनंदित करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी प्यारी पत्नी और भाई लक्ष्मण की दशा देखकर कुछ पवित्र कथाएं कहने लगते हैं, जिन्हें सुनकर लक्ष्मणजी और सीताजी सुख प्राप्त करते हैं।





राम लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।_अर्थ_लक्ष्मणजी और सीताजी सहित श्रीरामचन्द्रजी पर्णकुटी में ऐसे सुशोभित हैं जैसे अमरावती में इन्द्र अपनी पत्नी श्री और पुत्र जयंत सहित बसता है।





जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।। सेवहिं लखन सीय रघुबरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सीताजी और लक्ष्मणजी की कैसी संभाल रखते हैं, जैसे पलकें नेत्रों के गोलकों की। इधर लक्ष्मणजी श्रीसीताजी श्रीरामचन्द्रजी की ऐसी देखभाल करते हैं जैसे मूर्ख अपने शरीर का। ं






एहि बिधि प्रभु बन बसहीं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।। कहेउं राम बन गवन सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।।_अर्थ_पक्षी, पशु, देवता और तपस्वियों के हितकारी इस प्रकार सुखपूर्वक वन में निवास कर रहे हैं। तुलसीदास जी कहते हैं _ मैंने श्रीरामजी का सुन्दर वनगमन कहा। अब जिस तरह सुमंत्र अयोध्या में आये वह ( कथा ) सुनो।







फिरेउ निषादु प्रभुहिं पहुंचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।। मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को पहुंचाकर जब निषादराज लौटा, तब आकर उसने रथ को मंत्री ( सुमंत सहित ) देखा। मंत्री को व्याकुल देखकर निषाद को जैसा दु:ख हुआ, वह कहा नहीं जाता।






राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल व्याकुल भारी।। देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहंग अकुलाहीं।।_अर्थ_(निषाद को ऐसे आया देखकर ) सुमंत्र हा राम ! हा राम ! हा सीते, हा लक्ष्मण ! पुकारते हुए , बहुत व्याकुल होकर धरती पर गिर पड़े। ( रथ के ) घोड़े दक्षिण दिशा की ओर ( जिधर श्रीरामचन्द्रजी गये थे ( देख_देखकर हिनहिनाते हैं ) । मानो बिना पंख के पक्षी व्याकुल हो रहे हैं।








नहिं तृण चरहीं न पिअहिं जल मोचहिं लोचन बारि। व्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजी निहारि।।_अर्थ_वे न तो घास चलते हैं, न पानी पीते हैं। केवल आंखों से जल बहा रहे हैं। रामचन्द्रजी के घोड़ों को इस दशा में देखकर सब निषाद व्याकुल हो गये।







धरि धीरजु तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहू बिषादू।। तुम्ह पंडित परमारथ ज्ञाता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता।।_अर्थ_तब धीरज धरकर निषादराज कहने लगा_हे सुमंत्र जी ! अब विषाद को छोड़िये। आप पंडित और परमार्थ को जाननेवाले हैं। विधाता को प्रतिकूल जानकर धैर्य धारण कीजिये।





 कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।। सोक सिथिल रथ सकइ न हांकी। रघुबर बिरह पीर उर बांकी।।_कोमल बाणी से भांति भांति कथाएं कह_कहकर निषाद ने जबरदस्ती लाकर सुमंत्र को रथ पर बैठाया। परंतु शोक के मारे वे इतने शिथिल हो गये कि रथ को हांक नहीं सकते। उनके हृदय में श्रीरामचन्द्रजी के विरह की बड़ी तीव्र वेदना है।






चरफराहिं मग चरहीं न घोड़े। बन मृग मनहुं आनि रथ जोरे।। अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।।_अर्थ_ घोड़े तड़फड़ाते हैं और ( ठीक ) रास्ते पर नहीं चलते। मानो जंगली पशु लाकर रथ में जोत दिये गये हैं। वे श्रीरामचन्द्रजी के वियोगी घोड़े भी कभी ठोकर खाकर गिर पड़ते हैं, कभी घूमकर पीछे की ओर देखने लगते हैं। वे तीक्ष्ण दु:ख से व्याकुल हैं।





जो कह राम लखन बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेहीं।। बाजी बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहिं भांती।।_अर्थ_जो कोई राम, लक्ष्मण या जानकी का नाम ले लेता है, घोड़े हिकर हिकर उसकी ओर प्यार से देखने लगते हैं। घोड़ों की विरहदशा कैसे कही जा सकती है ? वे ऐसे व्याकुल हैं जैसे मणि के बिना सांप व्याकुल होता है।





भयउ निषादु  विषाद बस देखत सचिव तुरंग। बोली सुसेवक चारि तब दिए सारथि संग।।_अर्थ_मंत्री और घोड़ों की यह दशा देखकर निषादराज विषाद के वश हो गया। तब उसने अपने चार उत्तम सेवक बुलाकर सारथि के साथ कर दिये।






गुह सारथि ही फिरेउ पहुंचाई। बिरहु बिसाल बरनि नहीं जाई।। चले अवध लेइ रथहीन निषादा। होहिं छनहिं छन मगन बिषादा।।_अर्थ_निषादराज गुहा सारथि ( सुमंत्र जी ) को पहुंचाकर ( विदा करके ) लौटा। उसके विरह और दु:ख का वर्णन नहीं किया जा सकता। वे चारों निषाद रथ लेकर अवध को चले। ( सुमंत्र और घोड़ों को देख_देखकर )  वे भी क्षण_क्षणभर विषाद में डूबे जाते थे।








सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।। रहिहि न अंतहुं अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।।_अर्थ_व्याकुल और दु:ख से दीन हुए सुमंत्र जी सोचते हैं कि श्रीरघुवीर के बिना जीने को धिक्कार है। आखिर यह अधम शरीर रहेगा तो है ही नहीं। अभी श्रीरामचन्द्रजी के बिछुड़ते ही छूटकर इसने यश ( क्यों ) नहीं ले लिया ।






भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहीं करत पयाना।। अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुं न हृदय होत दुइ टूका।_अर्थ_ये प्राण अपयश और पाप के भांड़े हो गये। अब ये किस कारण कूच नहीं करते ( निकलते नहीं ) ? हाय ! नीचे मन ( बड़ा अच्छा ) मौका चूक गया। अब भी तो हृदय के दो टुकड़े नहीं है जाते!







मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहुं कृपन धन राशि गवांई।। बिरिद बांधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।_अर्थ_सुमंत्र हाथ मल_मलकर और सिर पीट-पीटकर पछताते हैं। मानो कोई कंजूस धन का खजाना को बैठा हो। वे इस प्रकार चले मानो कोई बड़ा योद्धा वीर का बाना पहनकर और उत्तम शूरवीर कहलाकर युद्ध से भाग चला हो।






बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भांति।।_अर्थ_जैसे कोई विवेकशील, वेद का ज्ञाता, साधु सम्मत आचरणों वाला और उत्तम जाति का ( कुलीन ) ब्राह्मण धोखे से मदिरा पी लें और पीछे पछतावे, उसी प्रकार मंत्री सुमंत्र सोच कर रहे ( पछता रहे ) हैं।






जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।। रहै करमबस परिहरि नाहू। सचिव हृदय तिमि दारुण दाहू।।_अर्थ_जैसे किसी उत्तम कुलवाली, साधु स्वभाव की, समझदार और मन, वचन और कर्म से पति को देवता माननेवाली पतिव्रता स्त्री को भाग्यवश पति को छोड़कर ( पति से अलग ) रहना पड़े, उस समय उसके हृदय में जो भयानक संताप होता है, वैसे ही मंत्री के हृदय में हो रहा है।







लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।। सूखइ अधर लागि मुहं लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।।_अर्थ_नेत्रों में जल भरा है, दृष्टि मंद हो गयी है। कानों को सुनाई नहीं पड़ता, व्याकुल हुईं बुद्धि बएठइकआनए हो रही है। ओठ सूख रहे हैं, मुंह में लाटी लग गयी है। किन्तु ( ये सब मृत्यु के लक्षण होने पर भी ) प्राण नहीं निकलते; क्योंकि हृदय में अवधइरूपई किवाड़ लगे हैं ( अर्थात् चौदह वर्ष बीत जाने पर भगवान् फिर मिलेंगे, यही आशा रुकावट डाल रहीं हैं )।




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बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुं पिता महतारी।। हानि ग्लानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।।_अर्थ_सुमंत
जी के मुख का रंग बदल गया है, जो देखा नहीं जाता। ऐसा मालूम होता है जैसे इन्होंने माता_पिता को मार डाला हो। उनके मन में रामवियोगरूपी हानि की महान् ग्लानि ( पीड़ा ) छा रही है, जैसे कोई पापी मनुष्य नरक को जाता हुआ रास्ते में सोच कर रहा हो।






बचन न आव हृदयं पछिताई। अवध काह मैं देखब जाइ।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।_अर्थ_मुंह से वचन नहीं निकलते। हृदय में पछताते हैं कि मैं अयोध्या में जाकर क्या देखूंगा ? श्रीरामचन्द्रजी से शून्य रथ को जो भी देखेगा, वहीं मुझे देखने में संकोच करेगा ( अर्थात् मेरा मुंह नहीं देखना चाहेगा )।

Sunday, 28 May 2023

अयोध्याकाण्ड

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहं तहं नाथ पाउ तुम्ह धारा।। धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहिं निहारी।।_अर्थ_हे नाथ ! जहां _जहां आपने चरण रखें हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वन में विचरनेवाले पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफल जन्म हो गये।





हम सब धन्य सहित परिवारा। सुखी दरस भरी नयन तुम्हारा।। कीन्ह बास भल ठाउं बिचारी। इहां सकल रितु रहब सुखारी।।_अर्थ_ हम सब भी अपने परिवार सहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया। आपने बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है। यहां सभी ऋतुओं में आप सुखी रहियेगा।




हम सब भांति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई।। बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा।।_अर्थ_हमलोग सब प्रकार से हाथी, सिंह, सर्प और बाघों से बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभो ! यहां के बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएं और खोह ( दर्रे ) सब पग_पग हमारे देखे हुए हैं।





तहं तहं तुम्हहिं अहेर खेलाउब। सर निर्झर जलठाउं देखउब।। हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता।।_अर्थ_हम वहां _वहां ( उन_उन स्थानों में ) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि जलाशयों को दिखावेंगे। हम कुटुम्बसमेत आपके सेवक हैं। हे नाथ ! इसलिये हमें आज्ञा देने में संकोच न कीजियेगा।





बेद बचन मुनि मन अगम सुनि प्रभु करुना ऐन। बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन।।_अर्थ_जो वेदों के वचन और मुनियों के मन को भी अगम हैं, वे करुणा के नाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलों के वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकों के वचन सुनता है।





रामहिं केवल प्रेम पिआरा। जानि लेई जो जाननिहारा।। राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी को के वल प्रेम प्यारा है; जो जाननेवाला हो ( जानना चाहता हो ), वह जान ले। तब श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम से परिपुष्ट हुए ( प्रेमपूर्ण) कोमल वचन कहकर उन सब वन में विचरण करने वाले लोगों को संतुष्ट किया।







बिदा किए सिर नाई सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए। एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहीं बिपिन सुर मुनि सुखदाई।।_अर्थ_फिर उनको विदा किया। वे सिर नवाकर चले और प्रभु के गुण कहते सुनते घर आये। और इस तरह देवता और मुनि को सुख देने वाले श्रीरामजी वन में रहने लगे।





जब तें आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु।। फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना। मंजु फलित बर बेल बिताना।।_अर्थ_जबसे श्रीरघुनाथजी वन में आकर रहे तबसे वन मंगलदायक हो गया। अनेकों प्रकार के वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलों के मण्डप तने हैं।








सुरतरु सरिस सुभायं सुहाए। मनहुं बिबुध बन परिहरि आए।। गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिधि बयारि बही सुख देनी।।_अर्थ_वे कल्पवृक्ष के समान स्वाभाविक ही सुंदर हैं। मानो वे देवताओं के वन ( नन्दन वन ) को छोड़कर चले आये हैं। भौरों की पंक्तियां बहुत ही सुन्दर गुंजार करती हैं और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है।





 नीलकंठ कलकंठ सुख चातक चक्क चकोर। भांति भांति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चितचोर।।_अर्थ_नीलकंठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर आदि पक्षी कानों को सुख देनेवाली और चित्त को चुरानेवाली तरह_तरह की बोलियां बोलते हैं।





करि केहरि कपि कोल कुरंगा। बिगतबैर बिचरहिं सब संगा। फिरत अहेर राम छबि देखी। होहिं मुदित मृग बृंद बिसेषी।।_अर्थ_हाथी, सिंह, बंदर, सूअर और हिरन, ये सब वैर छोड़कर साथ_साथ  विचरते हैं। शिकार के लिये फिरते हुए श्रीरामचन्द्रजी छवि को देखकर पशुओं के समूह विशेष आनन्दित होते हैं।







बिबुध बिपिन जहं लगि जग माहीं। देखि रामबनु सकल सिहाहीं।। सुरसुरी सरसइ दिनकर कन्या। मेकलसुता गोदावरी धन्या।।_अर्थ_जगत् में जहां तक ( जितने ) देवताओं के वन हैं, सब श्रीरामजी के वन को देखकर सइहआतए हैं। गंगा, सरस्वती, सूर्य कुमारी यमुना, नर्मदा, गोदावरी आदि धन्य ( पुण्यमयी ) नदियां,।






सब सर सिंधु नदी नद नाना। मंदाकिनी कर करहिं बखाना।। उदय अस्त गिरि अरु कैलासू। मंदर मेरु सकल सुरबासू।।_अर्थ_सारे तालाब, समुद्र, नदी और अनेकों नद सब मंदाकिनी की बड़ाई करते हैं। उदयाचल, अस्ताचल, कैलास मन्दरआचल और सुमेरु आदि सब, जो देवताओं के रहने के स्थान हैं,।





सैल हिमाचल आदिक जेते। चित्रकूट जसु गावहिं तेते।। बिंधि मुदित मन सुखु न समाई। श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई।।_अर्थ_और हिमालय आदि जितने पर्वत हैं, सभी चित्रकूट का यश गाते हैं। विंध्याचल बड़ा आनन्दित है, उसके मन में सुख समाता नहीं; क्योंकि उसने बिना परिश्रम ही बहुत बड़ी बड़ाई पा ली है।






चित्रकूट के बिहंग मृग बेलि बिटप तृन जाति। पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति।।_अर्थ_चित्रकूट के पक्षी, पशु, बेल, वृक्ष, तृण_अंकुरादि की सभी जातियां पुण्य की राशि हैं और धन्य हैं_देवता दिन_रात ऐसा कहते हैं।





नयनवंत रघुबरहिं बिलोकी। पाई जन्म फल होहिं बिसोकी।। परसि चरन रज अचर सुखारी। भए परम पद के अधिकारी।।_अर्थ_आंखोंवाले जीव श्रीरामचन्द्रजी को देखकर जन्म का फल पाकर शोकरहित हो जाते हैं और अचर ( पर्वत, वृक्ष, भूमि, नदी आदि ) भगवान् की चरण_रज का स्पर्श पाकर सुखी होते हैं। यों सभी परमपद ( मोक्ष ) के अधिकारी हो गये।





सो बनु सैलु सुभायं सुहावन। मंगलमय अति पावन पावन।। महिमा अधिक पवन बिधि तासू। सुख सागर जहं कीन्ह निवासू।।_अर्थ_वह वन और पर्वत स्वाभाविक सुन्दर, मंगलमय और अत्यन्त पवित्र करनेवाला है। उसकी महिमा किस प्रकार कभी रात, जहां सुख के समुद्र श्रीरामजी ने निवास किया है।






पय पयोधि तजि अवध बिहाई। जहं सिय लखनु रामु रहे आई।। कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन। जौं सत सहस होहिं सहसानन।।_अर्थ_क्षीरसागर को त्यागकर और अयोध्या को छोड़कर जहां सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी आकर रहें, उस वन की जैसी परम शोभा है, उसको हजार मउखवआलए जो लाख शएषजई हैं, तो भी वे नहीं कह सकते।





सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं। डाबर कमठ कि मंदर लेहीं।। सेवहिं लखनु करम मन बानी। जाइ न सीलु सनेहु बखानी।।_अर्थ_उसे भला, मैं किस प्रकार से वर्णन करके कह सकता हूं। कहीं पोखरे का ( क्षुद्र ) कछुआ भी मन्दराचल उठा सकता है? लक्ष्मणजी मन, वचन और कर्म से श्रीरामचन्द्रजी की सेवा करते हैं। उनके शील और स्नेह का वर्णन नहीं किया जा सकता है।





छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु। करत न सपनेहुं लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु।।_अर्थ_क्षण_क्षणपर श्रीसीतारामजी के चरणों को देखकर और अपने ऊपर उनका स्नेह जानकर लक्ष्मणजी स्वप्न में भी भाइयों, माता_पिता और घर की याद नहीं करते ।





राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।। छिनी छिनु फिर सिंधु बदलनी निहारी। प्रमुदित मनहुं चकोर कुमारी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के साथ सीताजी अयोध्यापुरी, कुटुम्ब के लोग और घर की याद भूलकर बहुत सुखी रहती है। क्षण क्षण पर पति श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमा के समान मुख को देखकर वे वैसे ही परम प्रसन्न रहती हैं जैसे चकोर कुमारी ( चकोरी ) चन्द्रमा को देखकर!





नाह नेह नित बढ़त बिलोकी। हर्षित रहत दिवस जिमि कोकी।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।।_अर्थ_स्वामि का प्रेम अपने प्रति नित्य बढ़ता हुआ देखकर सीताजी ऐसी हर्षित रहती है जैसे दिन में चकवी ! सीताजी का मन श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में अनुरक्त है इससे उनको वन हजारों अवध के समान प्रिय लगता है।





परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।। सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिय सम कंद मूल फर।।_अर्थ_प्रियतम ( श्रीरामचन्द्रजी ) के साथ पर्णकुटी प्यारी लगती है। मृग और पक्षी प्यारे कुटुम्बियों के समान लगते हैं। मुनियों की स्त्रियां सास के समान, श्रेष्ठ मुनि ससुर के समान और कन्द_मूल फलों का आहार उनको अमृत के समान लगता है।





नाथ साथ सांथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।। लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।_अर्थ_स्वामि के साथ सुन्दर साथरी ( कुश और पत्तों की सेज ) सैकड़ों कामदेव की सेजों के समान सुख देनेवाली है। जिनके ( कृपापूर्वक ) देखनेमात्र से जीव लोकपाल हो जाते हैं, उनको कहीं भोग_विलास मोहित कर सकते हैं !

Wednesday, 3 May 2023

अयोध्याकाण्ड

जाति पांति धनु धरमु बड़ाई। प्रिय परिवार सदन सुखदाई।। सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई। तेहि के हृदयं रहहु रघुराई।।_अर्थ_ जाति, पांति, धन धर्म, बड़ाई, प्यारा परिवार और सुख देनेवाला घर_सब छोड़कर जो केवल आपको ही हृदय में धारण किये रहता है, हे रघुनाथजी ! आप उनके हृदय में रहिये।





सरगु नरकु अपबरगु समाना। जहं तहं देह धरें धनु बाना।। कर्म बचन मन राउर चेरा। राम करहु तिन्ह के उर डेरा।।_अर्थ_स्वर्ग, नरक और मोक्ष जिसकी दृष्टि में समान है, क्योंकि वह जहां_तहां ( सब जगह ) केवल धनुष_बाण धारण किये आपको ही देखता है; और जो कर्म से, वचन से और मन से आपका दास है, हे रामजी ! आप उसके हृदय में डेरा कीजिये।






जाहि न चाहिअ कबहुं कछु तुम्ह सन सहज सनेहु। बहुत निरंतर तासु मन होहु राउर निज गेहु।।_अर्थ_ जिसको कभी कुछ नहीं चाहिये और जिसका आपसे स्वाभाविक प्रेम है, आप उसके मन में निरंतर निवास कीजिये; वह आपका अपना घर है।





एहि बिधि मुनि बर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए।। कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहुं समय सुखदायक।।_अर्थ_इस प्रकार मुनिश्रेष्ठ बाल्मीकि जी ने श्रीरामचन्द्रजी को घर दिखाये। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्रीरामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा_हे सूर्य कुल के स्वामी ! सुनि ये, अब मैं इस समय के दायरे सुखदायक आश्रम कहता हूं ( निवास स्थान बतलाता हूं )।







चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहं तुम्हार सब भांति सुपासू।। सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहंग बिहारू।।_अर्थ_आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिये, वहां आपके लिये सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों का विहार स्थल है।






नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रि प्रिया निज तप बल आनी।। सुरसुरी धार नाउं मंदाकिनी। जो सब पातक पोतक डाकिनि।।_अर्थ_वहां पवित्र नदी है, जिसकी पुरानों ने प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूया जी अपने तपोबल से लायी थीं। वह गंगाजी की धारा है, उसका मंदाकिनी नाम है। वह सब पापरूपी बालकों को खा डालने के लिये डाकिनी ( डाइन ) रूप है।







अत्रि आदि मुनि बर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं ।। चलहु सफल श्रम सब करहू।। राम देहु गौरव गिरिबरहु।।_अर्थ_अत्रि आदि बहुत_से श्रेष्ठ मुनि वहां निवास करते हैं जो जोग, जप और तप करते हुए शरीर को कसते हैं। हे रामजी ! चलिये, सबके परिश्रम को सफल कीजिये और पर्वत श्रेष्ठ चित्रकूट को भी गौरव दीजिये।






चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ। आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ।।_अर्थ_महामुनि बाल्मीकि जी ने चित्रकूट की अपरिमित महिमा बखानकर कही। तब सीताजी सहित दोनों भाइयों ने आकर श्रेष्ठ नदी मंदाकिनी में स्नान किया।






रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुं अब ठाहर ठाटू।। लखन दीख पय उतर करारा। चहुं दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने कहा_लक्ष्मण ! बड़ा अच्छा घाट है। अब यहीं कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मण जी ने पयस्विनि नदी के उत्तर के ऊंचे किनारे को देखा ( और कहा कि_) इसके चारों ओर धनुष के जैसा एक नाला फिरा हुआ है।







नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना।। चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी।।_अर्थ_नदी ( मन्दाकिनी) उस धनुष की प्रत्यंचा ( डोरी ) है और शम, दम, दान बाण हैं। कलियुग के समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु ( रूप निशाने ) हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चूकता नहीं, और जो सामने से मारता है।







अस कहि लखन ठाउं देखरावा। जलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा।। रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना।।_अर्थ_ऐसा कहकर लक्ष्मण जी ने स्थान दिखलाया। स्थान को देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने सुख पाया। जब देवताओं ने जाना कि श्रीरामचन्द्रजी का मन यहां रम गया तब वे देवताओं के प्रधान थवई ( मकान बनानेवाले) विश्वकर्मा को साथ लेकर चले।






कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए।। बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला।।_अर्थ_सब देवता कोल भील के वेष में आए और उन्होंने ( दिव्य ) पत्तों और घासों के सुंदर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटिया बनती जिसका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी_सी थी और दूसरी बड़ी थी।







लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत। सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ।।_अर्थ_लक्ष्मणजी और जानकी जी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास पत्तों के घर में शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनि का वेष धारण करके पत्नी रति और वसन्त ऋतु के साथ सुशोभित हो।





अमर नाग किन्नर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला।। राम प्रणामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू।।_अर्थ_उस समय देवता, नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूट में आये और श्रीरामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। देवता नेत्रों का लाभ पाकर आनन्दित हुए।





बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू।। करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हर्षित निज निज सदन सिधाए।।_अर्थ_फूलों की वर्षा करके देव-समाज ने कहा_हे नाथ ! आज ( आपका दर्शन पाकर ) हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने दु:सह दुख सुनाये और (दु:खों के नाश का आश्वासन पाकर ) हर्षित होकर अपने_अपने स्थानों को चले गये।






चित्रकूट रघुनंदनु छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए।। आवत देखि मुदित मुनिवृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी चित्रकूट में आ बसे हैं, यह समाचार सुन_सुनकर बहुत _से मुनि आए। रघुकुल के चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी ने मुदित हुई मुनिमंडली को आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया।







मुनि रघुबरहिं लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं।। सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं।।_अर्थ_मुनिगण श्रीरामजी को हृदय से लगा लेते हैं और सफल होने के लिये आशीर्वाद देते हैं। वे सीताजी, लक्ष्मण जी और श्रीरामचन्द्रजी की छबि देखते हैं और अपने सारे साधनों को सफल हुआ समझते हैं।






जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिवृंद। करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद।।_अर्थ_प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने जथायोग्य सम्मान करके मुनिमंडली को विदा किया। ( श्रीरामचन्द्रजी के आ जाने से ) वे सब अपने_अपने आश्रमों में अब स्वतंत्रता के साथ जाग, यज्ञ और तप करने लगे।





यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई।। कंद मूल फल भरी भरी दोना। चले रंक जनु लूटन सोना।।_अर्थ_यह ( श्रीरामजी के आगमन का ) समाचार जब कोल_भीलों ने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियां उनके घर ही पर आ गयी हैं। वे दोनों में कन्द, मूल, फल भर_भरकर चले। मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों।






तिन्ह महं जिन्ह देखे दोउ भ्राता। अपर तिन्हहिं पूछहिं मगु जाता।। कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हिं देखें रघुराई।।_अर्थ_ उनमें से जो दोनों भाइयों को ( पहले ) देख चुके थे, उनसे दूसरे लोग रास्ते में जाते हुए पूछते हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दरता कहते_सुनते सबने आकर रघुनाथजी ने दर्शन किये।







करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहिं बिलोकहिं अति अनुरागे।। चित्र लिखे जनु जहं तहं ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े।।_अर्थ_भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुराग के साथ प्रभु को देखते हैं। वे मुग्ध हुए जहां_के_तहां मानो चित्रलिखे_से खड़े हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रों में प्रेमाश्रुओं के जल की बाढ़ आ रही है।






राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने।। प्रभुहिं जोहारि बहोरि बहोरी। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी।।_अर्थ_श्रीरामजी ने उन सबको प्रेम में मग्न जाना, और प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार_बार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को जोहार करते हुए हाथ जोड़कर विनती वचन कहते हैं_






अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय। भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय।।_अर्थ_हे नाथ ! प्रभु ( आप ) के चरणों का दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गये। हे कोसलराय ! हमारे ही भाग्य से आपका यहां शुभागमन हुआ है।

Monday, 10 April 2023

अयोध्याकाण्ड

प्रभु प्रसाद सुचि सुभाग सुबासा। सादर जासु रहा नित नासा।। तुम्हहि निवेदित भोजन करहीं। प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं।।_अर्थ_जिसकी नासिका प्रभु ( आप ) के पवित्र और सुगंधित ( पुष्पादि ) सुन्दर प्रसाद को नित्य आदर के साथ ग्रहण करती ( सूंघती ) हैं, और जो आपको अर्पण करके भोजन करते हैं और आपके प्रसाद रूप ही वस्त्राभूषण धारण करते हैं;





सीस नवहिं गुर द्विज देखी। प्रीति सहित करि बिनती बिसेषी।। कर नित करहिं राम पद पूजा। राम भरोस हृदय नहिं दूजा।।_अर्थ_जिनके मस्तक देवता, गुरु और ब्राह्मणों को देखकर बड़ी नम्रता के साथ प्रेमसहित झुक जाते हैं; जिनके हाथ नित्य श्रीरामचन्द्रजी ( आपके ) चरणों की पूजा करते हैं, और जिनके हृदय श्रीरामचन्द्रजी 
( आप ) का ही भरोसा है, दूसरा नहीं;





चरन राम तीरथ चलि जाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा। पूजहिं तिन्हहिं सहित परिवारा।।_अर्थ_तथा जिनके चरण श्रीरामचन्द्रजी ( आप ) के तीर्थों में चलकर आते हैं; हे रामजी ! आप उनके मन में निवास कीजिये। जो नित्य आपके ( रामनामरूप ) मंत्रराज को जपते हैं और परिवार ( परिकर ) सहित आपकी पूजा करते हैं।




तरपन होम करहिं बिधि नाना। बिप्र जेवांइ देहिं बहुत दाना।। तुम्ह तें अधिक गुरहि जियं जानी। सकल भायं सेवहिं सनमानी।।_अर्थ_जो अनेकों प्रकार से तर्पण और हवन करते हैं, तथा ब्राह्मणों को भोजन कराकर बहुत दान देते हैं; तथा जो गुरु को हृदय में आपसे भी अधिक ( बड़ा ) जानकर सर्वभाव से सम्मान करके उनकी सेवा करते हैं;




सब कर मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ। तिन्ह के मन मंदिर बसहु सिर रघुनंदन दोउ।।_अर्थ_और ये सब कर्म करके सबका एकमात्र यही फल मांगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारी प्रीति हो; उन लोगों के मनरूपी मंदिरों में सीताजी और रघुकुल को आनंदित करनेवाले आप दोनों बसिये।




काम कोह मद मान न मोहा। लोभ न छोभ न राग न द्रोहा।। जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया। तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया।।_अर्थ_ जिनके न तो काम, क्रोध, मद, अभिमान और मोह है; न लोभ है, न क्षोभ है; और न कपट, धम्म र माया ही है_हे रघुराज ! आप उनके हृदय में निवास कीजिये।




सब के प्रिय सब के हितकारी। दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी।। कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी। जागत सोवत  सरन तुम्हारी।।_अर्थ_जो सबके प्रिय और सबका हित करने वाले हैं, जिन्हें दु:ख और सुख तथा प्रशंसा ( बड़ाई ) और गाली ( निंदा ) समान हैं, जो विचार कर सत्य और प्रिय वचन बोलते हैं तथा जो जागते_सोते आपकी ही शरण हैं,




तुम्हहिं छाड़ि गति दूसरि नाहीं। राम बसहु तिन्ह के मन माहीं।। जननी सम जानहिं परनारी। धनु पराव बिष तें बिष भारी।।_अर्थ_और आपको छोड़कर जिनके दूसरी कोई गति ( आश्रय ) नहीं है, हे रामजी ! आप उनके मन में बसिये। जो पराई स्त्री को जन्म देनेवाली माता के समान जानते हैं, और पराया धन जिन्हें विष से भी भारी विष है;





जे हरषहिं पर संपत्ति देखी। दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी।। जिन्हहिं राम तुम प्रान पिआरे। तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे।।_अर्थ_जो दूसरे की संपत्ति देखकर हर्षित होते हैं और दूसरे की विपत्ति देखकर विशेष रूप से दु:खी होते हैं, और से रामजी ! जिन्हें आप प्राणों से प्यारे हैं, उनके मन आपके रहने योग्य शुभ भवन हैं।




स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात। मन मंदिर तिन्ह के बसहु सीय सहित दोउ भ्रात।।_अर्थ_हे तात ! जिनके स्वामी, सखा, पिता, माता और गुरु सब कुछ आप ही हैं उनके मन रुपी मन्दिर में आप दोनों भाई निवास कीजिये।






अवगुन तजि सब के गुन गहहिं। बिप्र धेनु हित संकट सहहीं।। नीति निपुण जिन्ह की जग लीका। घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका।।_अर्थ_जो अवगुणों को छोड़कर सबके गुणों को ग्रहण करते हैं, ब्राह्मण और गौ के लिये संकट सहते हैं, नीति निपुणता में जिनकी जगत् में मर्यादा है, उनका सुन्दर मन आपका घर हैं।




गुन तुम्हार समुझई निज दोसा। जेहिं सब भांति तुम्हार भरोसा।। राम भगत प्रिय लागहिं जेही। तेहि उर बसहु सहित बैदेही।।_अर्थ_ जो गुणों को आपका और दोषों को अपना समझता है, जिसे सब प्रकार से आपका ही भरोसा है, और रामभक्त जिसे प्यारे लगते हैं, उसके हृदय में आप सीता सहित निवास कीजिये।