Wednesday, 24 April 2024

अयोध्याकाण्ड


देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरी भरत लघु भाई।। कहि निषाद निज नाम सुबानीं।
सादर सकल जोहारीं रानी।।_अर्थ_ निषादराज की प्रीति को देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजी के छोटे भाई शत्रुध्नजी उससे मिले। फिर निषाद ने अपना नाम ले_लेकर सुन्दर ( नम्र और मधुर ) वाणी से सब रानियों को आदरपूर्वक जोहार की।





जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।। निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।।_अर्थ_रानियां उसे लक्ष्मण जी के समान समझकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम सौ लाख वर्षों तक सुखपूर्वक जिओ। नगर के स्त्री-पुरुष निषाद को देखकर ऐसे सुखी हुए मानो लक्ष्मण जी को देख रहे हों। 






कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।। सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।_अर्थ_ सब कहते हैं कि जीवन का लाभ तो इसी ने पाया है, जिसे कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजी ने भुजाओं में बांधकर गले लगाया है। निषाद अपने भाग्य की बड़ाई सुनकर मन में परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला।





सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ। घर तरु तरह सर बाग बन बांस बनाएन्हि जाइ।।_अर्थ_उसने अपने सब सेवकों को इशारे से कहा दिया। वे स्वामि का रुख पाकर चले और उन्होंने घरों में, वृक्षों के नीचे, तालाबों पर तथा बगीचों और जंगलों में ठहरने के लिये स्थान बना दिये।







सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे स्नेहन सब अंग सिथिल तब।। सोहत दिएं निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।।_अर्थ_भरतजी ने जब श्रृंगवेरपुर को देखा, तब उनके सब अंग प्रेम के कारण शिथिल हो गये। वे निषाद को लागू दिये ( अर्थात् उसके कंधे पर हाथ रखकर चलते हुए ) ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो विनय और प्रेम शरीर धारण किये हुए हों।







एहि बिधि भरत सेन सबु संगा। देखि जाइ जग पावनी गंगा।। रामघाट कहं कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगन मिले जनु रामू।।_अर्थ_इस प्रकार भरतजी ने सब सेना को साथ में लिये हुए जगत् को पवित्र करनेवाली गंगाजी के दर्शन किये। श्रीराम घाट को ( जहां श्रीरामजी ने स्नान संध्या कि थी ) प्रणाम किया। उनका मन इतना आनन्द मग्न हो गया, मानो उन्हें स्वयं श्रीरामजी मिल गये हों।







करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।। करि मज्जनु मागहीं कर जोरी। रामचन्द्र पद प्रीति न थोरी।।_अर्थ_नगर के नर_नारी प्रणाम कर रहे हैं और गंगाजी के ब्रह्मरूप जल को देख_देखकर आनन्दित हो रहे हैं। गंगाजी में स्नान कर हाथ जोड़कर सब यही वर मांगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारा प्रेम कम न हो ( अर्थात् बहुत अधिक हो )।








भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।। जोरी पानी भर मागउं एहू। संजय राम पद कमल सनेहू।।_अर्थ_भरतजी ने कहा_हे गंगे ! आपकी रज सबको सुख देनेवाली तथा सेवक के लिये तो कामधेनु ही है। मैं हाथ जोड़कर यही वरदान मांगता हूं कि श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा स्वाभाविक प्रेम हो।






एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाई। मातु नहानईं जानि सब डेरा चले लवाइ।।_अर्थ_ इस प्रकार भरतजी स्नान कर और गुरुजी की आज्ञा पाकर तथा यह जानकर कि सब माताएं स्नान कर चुकी हैं, डेरा उठा ले चले।







जहं तहं लोगन्ह डेरा कीन्हां। भरतु सोंध सबहिं कर लीन्हा।। सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गए दोउ भाई।।_अर्थ_लोगों ने जहां_तहां डेरा डाल दिया। भरतजी ने सभी का पता लगाया ( कि सब लोग आराम से टिक गये हैं या नहीं)। फिर देव पूजन करके आज्ञा पाकर दोनों भाई श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी के पास गये।







चरन चांपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।। भाइहिं सौंपि मातु सेवकाई। आपी निषादहिं लीन्ह बोलाई।।_अर्थ_चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतजी ने सब माताओं का सत्कार किया। फिर भाई शत्रुध्न को माताओं की सेवा सौंपकर आपने निषाद को बुला लिया।







चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीरु स्नेह न थोरे।। पूंछत सखहि सो ठाउं देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुराऊ।।_अर्थ_ सखा निषादराज के हाथ_से_हाथ मिलायें हुए भरतजी चले। प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है ( अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है ), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है। भरतजी सखा से पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ_और नेत्र और मन की जलन कुछ ठण्डी करो।









जहं सिय राम लखन निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए। भरत बचन सुनि भयउ विषादू। तुरत तहां लइ गयउ निषादू।।_अर्थ_जहां सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रात को सोये थे। ऐसा कहते ही उनके नेत्रों के कोनों से ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर आया। भरतजी के वचन सुनकर निषाद को बड़ा विषाद हुआ। वह तुरंत ही उन्हें वहां ले गया।







जहं सिंसुपा पुनीत तरह रघुबर किया बिश्रामु। अति सनेह सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।_अर्थ_जहां पवित्र अशोक के वृक्ष के नीचे श्रीरामजी ने विश्राम किया था। भरतजी ने वहां अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक दण्डवत् प्रणाम किया।








कुस सांथरी निहारी सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।। चरन रेख रज आंखिन्ह लाई। बना न कहते प्रीति अधिकाई।।_अर्थ_ कुशों की सुन्दर सांथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजी के चरण चिन्हों की रज आंखों में लगायी। ( उस समय के ) प्रेम की अधिकता कहते नहीं बनती।







कनक बिन्दु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सिय समय लेखे।। सजल बिलोचन हृदय गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।।_अर्थ_भरतजी ने दो चार स्वर्ण बिन्दु ( सोने के कण या तारे आदि जो सीताजी के गहने कपड़ों से गिर पड़े थे ) देखें तो उनको सीताजी के समान समझकर सिर पर रख लिया। उनके नेत्र ( प्रेमाश्रु ) जल से भरे हैं और हृदय में ग्लानि भरी है। वे सखा से सुन्दर वाणी में ये वचन बोले_






श्रीहत सिय बिरहं दुति हीना। जथा अवध नर नारी विलीना।। पिता जनक देऊं पटतर केही। करतलु भोगु जोगु जग जेही।।_अर्थ_ये स्वर्ण के कण या तारे भी  सीताजी के विरह से ऐसे श्रीहत ( शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं जैसे ( राम_वियोग में ) अयोध्या के नर_नारी विलीन ( शोक के कारण क्षीण ) हो रहे हैं। जिन सीताजी के पास पिता राजा जनक हैं, इस जगत् में भोग और जोग दोनों जिनकी मुट्ठी में है, उन जनक जी को मैं किसकी उपमा दूं?








ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहिं सहित अमरावतिपालू।। प्रान नाथु रघुनाथ गोसाईं। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।_अर्थ_सूर्यकुल के सूर्य राजा दशरथ जी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावती के स्वामि इन्द्र भी सिखाते थे ( ईर्ष्यापूर्वक उनके जैसा ऐश्वर्य और प्रताप पाना चाहते थे ); और प्रभु श्रीरघुनाथजी जिनके प्राणनाथ हैं, जो इतने बड़े हैं कि जो कोई भी बड़ा होता है, वह श्रीरामचन्द्रजी की ( दी हुई ) बड़ाई से होता है।






पति देवता सुतीय मनि सीय सांथरी देखि। बिहरत हृदय न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।_अर्थ_ उन श्रेष्ठ पतिव्रता स्त्रियों में शिरोमणि सीताजी की साथरी ( कुशशय्या ) देखकर मेरा हृदय हहराकर ( दहलकर ) फट नहीं जाता; हे शंकर ! यह वज्र से भी अधिक कठोर है।







लालन जोगु लखन लघु लोने। भए न भाइ अस अहहिं न होने। पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुवीरहिं प्रानपियारे।।_अर्थ_मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुन्दर और प्यार करने योग्य हैं। जो लक्ष्मण अवध के लोगों के प्यारे, माता_पिता के दुलारे और श्रीसीतारामजी के प्राण प्यारे हैं।






मृदु मूर्ति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।। तें बन सहाहिं बिपति सब भांती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।।_अर्थ_जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीर में कभी गर्म हवा भी नहीं लगी, वे वन में सब प्रकार की विपत्तियां सह रहे हैं। ( हाय ! ) इस मेरी छाती ने (कठोरता में) करोड़ों वज्रों का भी निरादर कर दिया। ( नहीं तो यह कभी भी फट गयी होती )।







राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।। पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहिं सुखदाता।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी ने जन्म ( अवतार ) लेकर जगत् को प्रकाशित ( परम सुशोभित) कर दिया। वे रूप, शील और समस्त गुणों के समुद्र हैं। पुरवासी, कुटुम्बी, गुरु, माता_पिता सभी को श्रीरामजी का स्वभाव सुख देनेवाला है।






बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।। सादर कोटि कोटि सत सेषा। करि न कहीं प्रभु गुन गन लेखा।।_अर्थ_शत्रु भी श्रीरामजी की बड़ाई करते हैं। बोल_चाल, मिलने के ढ़ंग और विनय से वे मन को हर लेते हैं। करोड़ों सरस्वती और अरबों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की गिनती नहीं कर सकते।







सुख स्वरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान। तें सओवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।_अर्थ_जो सुख स्वरूप रघुवंशशिरोमणि  श्रीरामचन्द्रजी मंगल और आनंद के भण्डार हैं, वे पृथ्वी पर कुशाल बिछाकर सोते हैं। विधाता की गति बड़ी ही बलवान है।






राम सुना दुख कान न काऊ। जीवन तरु जिमि जोगवइ राउ।। पलक नयन फनी मनि जेहिं भांती। जोगवहिं जननी सकल दिन राती।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने कभी कानों से भी दु:ख का नाम नहीं सुना। महाराज स्वयं जीवन वृक्ष की तरह उनकी सार-संभाल किया करते थे। सब माताएं भी दिन_रात उनकी ऐसी सार संभाल करती थीं, जैसे पलक नेत्रों की और सांप अपनी मणि की करते हैं।

















Sunday, 31 March 2024

अयोध्याकाण्ड

देखि दूरी तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दण्ड प्रनामू।। जानि रामप्रिय दीन्ह असीसा। भरतहिं कहेउ बुझाई मुनीसा।।_अर्थ_निषादराज ने मुनिराज वशिष्ठ जी को देखकर अपना नाम बतलाकर दूर से ही दण्डवत् प्रणाम किया। मुनीश्वर वशिष्ठ जी ने उसको राम का प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरत को समझाकर कहा ( कि यह श्रीरामजी का मित्र है)।







राम सखा सुनि स्यंदन त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।। गाउं जाति गुहं नाउं सुनाई। कीन्ह जोहारी माथ महि लाई।।_अर्थ_यह श्रीरामजी का मित्र है, इतना सुनते ही भरतजी ने रथ त्याग दिया। वे रथ से उतरकर प्रेम में उमंगते हुए चले। निषादराज गुह ने अपना गांव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वी पर माथा टेककर जोहार की।







करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुं लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदय समाइ।।_अर्थ_दण्डवत् करते देखकर भरतजी ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया। हृदय में प्रेम समाता ही नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मण जी से भेंट हो गयी हो।








भेंटत भरत ताहि अति प्रीती। लोग सहाहिं प्रेम को रीती।। धन्य_धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।।_भरतजी गुह को अत्यंत प्रेम से गले लगा रहे हैं। प्रेम की रीति से सब लोग सिंहा रहे हैं ( ईर्ष्यापूर्व प्रशंसा कर रहे हैं ); मंगल की मूल ' धन्य_धन्य' की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं।








लोक बेद सब भांतिहिं नीचा। जासु छांह छुइ लेइअ सींचा।। तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलती पुलक परिपूरित गाता।।_अर्थ_( वे कहते हैं _) जो लोक और वेद दोनों में सब प्रकार से नीचा माना जाता है, जिसकी छाया के छू जाने से भी स्नान करना होता है, उसी निषाद से अंकवार भरकर ( हृदय से चिपटाकर ) श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई भरतजी ( आनंद और प्रेम वश ) शरीर में पुलकावली से परिपूर्ण हो मिल रहे हैं।








राम राम करि जे जमुहाहीं। तिन्हहिं न पाप पुंज समुहाहीं।। यह तौं राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जग पावन कीन्हा।।_अर्थ_ जो लोग राम_राम कहकर जंभाई लेते हैं ( अर्थात् आलस्य से भी जिनके मुंह से राम नाम का उच्चारण हो जाता है), पापों के समूह ( कोई भी पाप ) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुह को तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन ( जगत् को पवित्र करनेवाला बना दिया।







करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरइ ।। उलटा नाम जपत जग जाना। बाल्मीकि में ब्रह्म समाना।।_अर्थ_कर्मनाशा नदी का जल गंगाजी में पड़ जाता है ( मिल जाता है ), तब कहिये, उसे कौन सिर पर धारण नहीं करता ? जगत् जानता है कि उलटा नाम ( मरा_मरा ) जपते_जपते वाल्मीकिजी ब्रह्म के समान हो गये।










स्वपच सबर खस जमन जड़ पावंर कोल किरात । रामु कहत पावन परम होत भुवन विख्यात।।_अर्थ_मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी रामनाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवन में विख्यात हो जाते हैं।









नहिं अचिरिजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।। राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं।।_अर्थ _इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग_युगान्तर से यही रीति चली आ रही है। श्रीरघुनाथजी ने किसको बड़ाई नहीं दी ? इस प्रकार देवता रामनाम की महिमा कह रहे हैं और उसे सुन_सुनकर अयोध्या के लोग सुख पा रहे हैं।








रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूंजी कुल सुमंगल खेमा।। देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।_अर्थ_ रामसखा  निषादराज से प्रेम के साथ मिलकर भरतजी ने कुशल, मंगल और क्षेम पूछी। भरतजी का शील और प्रेम देखकर निषाद उस समय विदेह हो गया ( प्रेम मुग्ध होकर देह की सुध भूल गया)।








सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितइ एकटक ठाढ़ा।। धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।।_अर्थ_उनके मन में संकोच, प्रेम और आनंद इतना बढ़ गया कि वह खड़ा_खड़ा टकटकी लगाये भरतजी के चरणों की वन्दना करके प्रेम के साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा।








कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तइहउं काल कुसल निज लेखी।। अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें।
सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।_अर्थ_ हे रहो ! कुशल के मूल आपके चरणकमलों के दर्शन कर मैंने तीनों कालों में अपना कुशल जान लिया। अब आपके परम अनुग्रह से करोड़ों कुलों ( पीढ़ियों ) सहित मेरा मंगल ( कल्याण) हो गया।








समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियं जोइ। जो न भजइ रघुबीर पद जग बिना संचित सोइ।।_अर्थ_मेरी करतूत और कुल को समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की महिमा को मन में देख ( विचार ) कर ( अर्थात् कहां तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करनेवाला जीव, और कहां अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के स्वामि श्रीरामचन्द्रजी ! पर उन्होंने मुझ जैसे नीच को भी अपनी अहैतु की कृपा वश अपना लिया_यह समझकर) जो रघुवीर श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का भजन नहीं करता, वह जगत् में विधाता के द्वारा ठगा गया है।






कपटी कायर कुमति कुजाति। लोक बेद बाहेर सब भांती।। राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउ भुवन भूषन तबही तें।।_अर्थ_मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूं और लोक_वेद दोनों से सब प्रकार से बाहर हूं। पर जबसे श्रीरामचन्द्रजी ने मुझे अपनाया है, तभी से मैं विश्व का भूषण हो गया।







देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरी भरत लघु भाई।। कहि निषाद निज नाम सुबानीं।
सादर सकल जोहारीं रानी।।_अर्थ_ निषादराज की प्रीति को देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजी के छोटे भाई शत्रुध्नजी उससे मिले। फिर निषाद ने अपना नाम ले_लेकर सुन्दर ( नम्र और मधुर ) वाणी से सब रानियों को आदरपूर्वक जोहार की।






Sunday, 17 March 2024

अयोध्याकाण्ड

होहु संजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल
मरै कर ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊं। जिअत न सुरसरि उतरन देऊं।।_अर्थ_सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने का साज सजा लो ( अर्थात् भरत से युद्ध में मरने के लिये तैयार हो जाओ )। मैं भरत से सामने ( मैदान में ) लोहा लूंगा (: मुठभेड़ करूंगा) और जीते_जी उन्हें गंगापार उतरने न दूंगा।





होहु संजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊं। जिअत न सुरसरि उतरन देऊं।।_अर्थ_सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने के साथ सजा लो ( अर्थात् भरत से युद्ध में लड़ने के लिये तैयार हो जाओ )। मैं भरत से सामने ( मैदान में ) लोहा लूंगा ( मुठभेड़ करूंगा ) और जीते_जी उन्हें गंगापार उतरने न दूंगा।






समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।। भरत भाई नृपु मैं जन नीचू। बड़ें भाग अहि पाइअ मीचू।।_अर्थ_युद्ध में मरण, फिर गंगाजी का तट, श्रीरामजी का काम और क्षणभंगुर शरीर ( जो चाहे जब नाश हो जाय )। भरत श्रीरामजी के भाई और राजा ( उनके हाथ से मरना ) और मैं नीचे सेवक_बड़े भाग से ऐसी मृत्यु मिलती है।






स्वामि काज करिहउं रन रारी। जब धवलिहउं भुवनु दस चारी।। तजउं प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूं हाथ मुद मोदक मोरें।।_अर्थ_मैं स्वामी के काम के लिये रण मेंश लड़ाई करूंगा और चौदहों लोकों को अपने यश से उज्जवल कर दूंगा। श्रीरघुनाथजी के निमित्त प्राण त्याग दूंगा। मेरे तो दोनों ही हाथों में आनन्द के लड्डू हैं ( अर्थात् जीत गया तो रामसेवक का यश प्राप्त करूंगा और मारा गया तो श्रीरामजी की नित्य सेवा प्राप्त करूंगा )।





साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुं जासु न रेखा।। जायं जिअत जग सो महिभारू। जननी जीवन विटप कुठारू।_अर्थ_साधुऔं के समाज में जिनकी गिनती नहीं और श्रीराम जी के भक्तों में जिसका स्थान नहीं वह जगत् में पृथ्वी का भार होकर व्यर्थ हो जाता है। वह माता के जीवन रूपी वृक्ष के काटने के लिये कुल्हाड़ामात्र है।






बिगत बिषाद निषाद पति सबहिं बढ़ाई उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।_अर्थ_(इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के लिये प्राण समर्पण का निश्चय करके) निषादराज विषाद से रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच मांगा।






चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।। सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। माथीं बांधि चढ़ाइन्हि धनहीं।_अर्थ_ निषादराज को जोहार कर_करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राम में लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों की जूतियों का स्मरण करके उन्होंने भांजियां ( छोटे_छोटे तरकस ) बांधकर धनुहियों ( छोटे_छोटे धनुषों )_पर प्रत्यंचा चढ़ायीं।







अंगरी पहिरि कूड़ि सिर धरहीं। फरसा बांस सेल समय करहीं।। एक कुशल अति ओड़न खांड़ें। कूदहिं गगन मनहुं छिति छांड़े।।_अर्थ_ कवच पहनकर लोहे का टोप सिर पर रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछों को सीधा कर रहे हैं ( सुधार रहे हैं)। कोई तलवार वार रोकने में अत्यंत ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंग में भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद ( उछल ) रहे हों।





निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहइ जोहारे जाई।। देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।_अर्थ_अपना_अपना साज समाज ( लड़ाई का सामान और दल ) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुह को जोहार की। निषादराज ने सुंदर योद्धाओं को देखकर सबको सुयोग्य जाना और नाम ले_लेकय सबका सम्मान किया।






भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।_अर्थ_( उसने कहा_)हे भाइयों ! धोखा न लाना ( अर्थात् मरने से न घबराना), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोश सेके साथ बोल उठे_हे वीर ! अधीर मत हो।






राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।। जीवत पाउ न पाएं धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनी करहीं।।_अर्थ_हे नाथ ! श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से और आपके बल से हमलोग भरत की सेना को बिना वीर और और बिना घोड़े के ही कर देंगे ( एक_एक वीर और एक_एक घोड़े को मार डालेंगे )। जीते_जी पीछे पांव न रखेंगे। पृथ्वी को रुण्ड_मुण्डमयी कर देंगे ( सिरों और धरों से छा देंगें )।





दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढ़ोलू।। एतना कहते छींक भइ बांए।। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।_अर्थ_निषादराज ने वीरों का बढ़िया दल देखकर कहा_जुझाऊ ( लड़ाई का ) ढ़ोल बजाओ। इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई। शकुन विचारने वालों ने कहा कि खेत सुन्दर है ( जीत होगी )।





बूढ़ु एक कह सगुन बिचारी। भरतहिं मिलइ न होइहि रारी।। रामहिं भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रह नाहीं।।_अर्थ_एक बूढ़े ने शकुन विचारकर कहा_ भरत से मिलना होगा, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजी को मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है।





सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझे। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।_अर्थ_यह सुनकर निषादराज गुह ने कहा_बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दी में ( बिना विचारे ) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजी का शील_स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करने में हित नहीं है।






सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझे। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।_अर्थ_यह सुनकर निषादराज गुह ने कहा_बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दी में ( बिना विचारे ) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजी का शील_स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करने में हित नहीं है।





गहहु घाट भट समिति सब लेउं मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउं आइ।।_अर्थ_अतएव हे वीरों ! तुमलोग इकट्ठे होकर सब घाटों को रोक लो, मैं जाकर भरतजी से मिलकर उनका भेद लेता हूं। उनका भाव मित्र का है या शत्रु का या उदासीन का, यह जानकर तब आकर वैसा ( उसी के अनुसार ) प्रबन्ध करूंगा।






लखि सनेहु सुभायं सुहाएं। बैरु प्रीति नहिं दुरइं दुराएं।। अस कहि भेंट संजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।_अर्थ_उनके सुंदर स्वभाव से मैं उनके स्नेह को पहचान लूंगा। वैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंट का सामान सजाने लगा। उसने कंद, मूल, फल, पक्षी और हिरन मंगवाये।








मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।। मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।_अर्थ_कहारलोग पुराने और मोटी पहिना नामक मछलियों के भार भर_भरकर लाये। भेंट का सामान सजाकर मिलने के लिये चले तो मंगलदायक शुभ शकुन मिले।

Wednesday, 28 February 2024

अयोध्याकाण्ड

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहिं लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।_अर्थ_भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया ; और जो जिस योग्य था उसे उसी काम पर नियुक्त किया। सब व्यवस्था करके, रक्षकों को रखकर भरतजी राजमाता कौसल्याजी के पास गये।







आरती जननी जानि सब भरत सनेह सुजान। कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।_अर्थ_स्नेह के सुजान ( प्रेम के तत्व को जाननेवाले ) भरतजी ने सब माताओं को आर्त ( दु:खी ) जानकर उनके लिये पालकियां तैयार करने और सुखासन यान ( सुखपाल सजाने के लिये कहा।







चक्क चक्की जिमि पुर नर नारी। चाहत प्रात उर आरत भारी।। जागते सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाएं सचिव सुजाना।।_अर्थ_नगर के नर_नारी चकवे_चकवी की भांति हृदय में अत्यन्त आर्त होकर प्रातःकाल का होना चाहते हैं। सारी रात जागते_जागते सवेरा हो गया। तब भरतजी ने चतुर मंत्रियों को बुलाया।








कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।। बेगि चलिहउं सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग संवारे।।_अर्थ_और कहा_तिल का सब सामान ले चलो। वन में ही मुनि वसिष्ठ जी श्रीरामचन्द्रजी को राज्य दे देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मंत्रियों ने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये।









अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ। बिप्र बृंद चढ़ि वाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।।_अर्थ_सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठ जी अरुंधति और अग्निहोत्र की सब सामग्री सहित रथ पर सवार होकर चले। फिर ब्राह्मणों के समूह, जो सब_के_सब तपस्या और तेज के भण्डार थे, अनेकों सवारियों पर चढ़कर चले।







नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहं कीन्ह पयाना।। सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भईं सब रानी।।_नगर के सब लोग रथों को सजा_सजाकर चित्रकूट को चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी पालकियों पर चढ़_चढ़कर सब रानियां चलीं।







सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।_अर्थ_विश्वासपात्र सेवकों को नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजी के चरणों को स्मरण करके दोनों भाई चले।





राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।। बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के वश में हुए ( दर्शन की अनन्य लालसा से ) सब नर नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी_हथिनी जल को तककर ( बड़ी तेजी से बावले हुए ) जा रहे हों। श्रीसीतारामजी ( सब सुखों को छोड़कर ) वन में हैं, मन में ऐसा विचारके छोटे भाई शत्रुध्नजीसहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं।








देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरा चले हम गया रथ त्यागे।। जाइ समीप राखि निज डोली। रामु मातु मृदु बानी बोली।।_अर्थ_उनका स्नेह जानकर लोग प्रेम में मग्न हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथों को छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी भरतजी के पास जाकर अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणी से बोलीं__







तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।। तुम्हें चलत चलइहइ सबु लोगू। सकल सोक कृष नहिं मग जोगू।।_अर्थ_हे बेटा ! माता बलऐयआं लेती है, तुम रथ पर चढ़ जाओ, नहिं तो सारा प्यारा परिवार दु:खी हो जायगा। तुम्हारे पैदल चलने से सभी लोग पैदल चलेंगे। शोक के मारे सब दुबले हो रहे हैं पैदल रास्ते के ( पैदल चलने के ) योग्य नहीं है।






सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।। तमसा प्रथम दिवस करि बासू।। दूसर गोमति तीर निवासू।।_अर्थ_माता की आज्ञा सिर चढ़ाकर और उनके चरणों में सिर नवाकर दोनों भाई रथ पर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसा पर वास ( मुकाम ) करके दूसरा मुकाम गोमति के तीर पर किया।





पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग। करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।_अर्थ_कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रात को एक ही बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग_विलास को छोड़कर सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के लिये नियम और व्रत करते हैं।







सईं तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।। समाचार सब सुने निषादा। हृदयं बिचार करइ सबिषादा।।_अर्थ_रातभर सई नदी के तीर पर निवास करके सवेरे वहां से चल दिये और  सब श्रृंगवेरपुर के समीप जा पहुंचे । निषादराज ने सब समाचार सुने, तो वह दु:खी होकर हृदय में विचार करने लगा_








कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।। जौं पै जियं न होति कुटिलाईं। जौं कत लीन्ह संग कटकाई।।_अर्थ_क्या कारण है जो भरत वन को जा रहे हैं, मन में कुछ कपट भाव अवश्य है। यदि मन में कुटिलता न होती, तो साथ में सेना क्यों ले चले हैं।








जाहिं सानुज रामहिं मारी। करउं अकंटक राजु सुखारी।। भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।।_अर्थ_समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीरामजी को मारकर सुख से निष्कंटक राज्य करूंगा। भरत ने हृदय में राजनीति को स्थान नहीं दिया ( राजनीति का विचार नहीं किया )। तब ( पहले ) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवन से ही हाथ धोना पड़ेगा।








सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहिं समर न  जीतनिहारा।। का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।_अर्थ_संपूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जायें, तो भी श्रीरामजी को रण में जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है ? विष की बेलें अमृत फल कभी नहीं फलती।





अस बिचारि गुहं ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु। हथवांसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।_अर्थ_ऐसा विचाकर गुह  ( निषादराज) ने अपनी जाति वालों से कहा कि सबलोग सावधान हो जाओ। नावों को हाथ में ( कब्जे में ) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटों को रोक दो।






Saturday, 10 February 2024

अयोध्याकाण्ड

मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल स्नेहन बिकल में भारी।। भरतहिं कहहिं सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।।_अर्थ_माता, मंत्री, गुरु, नगर के स्त्री_पुरुष सभी स्नेह के कारण बहुत _ही व्याकुल हो गये। सब भरतजी को सराह_सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेम की साक्षात् मूर्ति ही है।



तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।। जो पावंरउ अपनी जड़तआई। तुम्हहीं सुगाइ मातु कुटिलाईं।।_अर्थ_हे तात भरत ! आप ऐसा क्यों न कहें।  श्रीरामजी को आप प्राणों के समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खता से आपकी माता कैकेई की कुटिलता को लेकर आपपर संदेह करेगा।




सो सब कोटिक पुरुष समेता। बसिहिं कलप षट नरक निकेता।। अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरई गरल दुख दारिद गहई।।_अर्थ_वह दुष्ट करोड़ों पुरखों सहित सौ कल्पों तक नरक के घर में निवास करेगा। सांप के पाप और अवगुण को मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विष को हर लेती है और दु:ख तथा दरिद्रता को भस्म कर देती है।




अवसि चलिअ बन रामु जहां भरत मंत्र भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलम्बन दीन्ह।।_अर्थ_हे भरतजी ! वन को अवश्य चलिये, जहां श्रीरामजी हैं। आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोक समुद्र में डूबते हुए सब लोगों को आपने बहुत ( बड़ा ) सहारा दे दिया।




भा सबके मन मोदु ने थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।। चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रान प्रिय भें सबही के।।_अर्थ_सबके मन में कम आनंद नहीं हुआ ( अर्थात् बहुत ही आनंद हुआ ) मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक आनंदित हो रहे हों। ( दूसरे दिन ) प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभी के प्राण प्रिय हो गये।




मुनिहिं बंदि भरतहिं सिरु नाई। चले सकल घर विदा कराई।। धन्य भरत जीवन जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाही।।_अर्थ_मुनि वसिष्ठ जी की वन्दना करके और भरतजी को सिर नवाकर सब लोग विदा लेकर अपने_अपने घर को चले। जगत् में भरतजी का जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील  स्नेह की सराहना करते जाते हैं।




कहहिं परस्पर भा बड़ काजू। सकल चले कर साजहिं साजू।। जेहिं राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।।_अर्थ_आपस में कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलने की तैयारी करने लगे। जिसको भी घर की रखवाली के लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वहीं समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी।




कोऊ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।_अर्थ_कोई कोई कहते हैं_रहने के लिये किसी को भी मत कहो, जगत् में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता ?




जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृदु मातु पितु भाई। सनमुख हो जो राम पद करै न सहस सहाई।।_अर्थ_यह संपति, घर, सुख, माता_पिता, भाई जल जाय जो श्रीमजी के चरणों के सम्मुख होने में हंसते हुए ( प्रसन्नतापूर्वक ) सहायता न करे।




घर घर साजहिं वाहन नाना। हरषु हृदय परभात पयाना।। भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजी गज भवन भंडारू।।_अर्थ_घर_घर लोग अनेकों प्रकार की सवारियां  सजा रहे हैं। हृदय में बड़ा हर्ष है कि सवेरे चलना है। भरतजी ने घर जाकर विचार किया कि नगर घोड़े _हाथी, नगर, खजाना आदि_





संपति सब रघुपति के आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही।। जौं परिणाम न मोहि भलाई। पाप सइरओमनइ साईं दोहाई।_अर्थ_सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी की है। यदि उसकी रक्षा की व्यवस्था किये बिना, उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूं, तो परिणाम में मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामी का द्रोह सब पापों का शिरोमणि है।





करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।। अस बिचारी सुचि सेवक बोले। जे सनेहु निज धरम न डोले।।_अर्थ_सेवक वहीं है जो स्वाऔऔमि का हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया जो कभी स्वप्न में भी अपने धर्म से नहीं डिगे थे।





कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहिं लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।_अर्थ_भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया ; और जो जिस योग्य था उसे उसी काम पर नियुक्त किया। सब व्यवस्था करके, रक्षकों को रखकर भरतजी राजमाता कौसल्याजी के पास गये।


Sunday, 28 January 2024

अयोध्याकाण्ड

कैकेई भव तनु अनुरागे। पावर प्रान अघाइ अभागे।। जौं प्रिय बिरहं प्राण प्रिय लागे। देखब सुनब बहुत अब आगे।।_अर्थ_कैकेयी से उत्पन्न देह में प्रेम करनेवाले ये पामर प्राण भरपेट ( पूरी तरह से ) अभागे हैं। जब प्रिय के वियोग में भी प्राण प्रिय लग रहे हैं तब अभी आगे और भी कुछ देखूं_सुनुंगा।

राम लखन सिय कहुं बनु दीन्हा। पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा।। लीन्ह विधवपन अपजसु आपू। दीन्हेउ प्रजा सोक संतापू।।_अर्थ_लक्ष्मण, श्रीरामजी और सीताजी को वन दिया; स्वर्ग भेजकर पति का कल्याण किया; स्वयं विधवापन और अपयश लिया; प्रजा को शोक और संताप दिया।

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू। कीन्ह कैकेईं सब कर काजू।। एहि तें मोर कहा अब नीका। तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका।।_अर्थ_और मुझे सुख, सुन्दर यश और उत्तम राज्य दिया ! कैकेई ने सभी का काम बना दिया ! इससे अच्छा अब मेरे लिये क्या होगा ? उसपर भी आपलोग मुझे राजतिलक देने को कहते हैं !

कैकेइ जठर जन्मी जग माहीं। यह मोहि कहं कछु अनुचित नाहीं।। मोरि बात सब बिधिहिं बनाई। प्रजा पांच कत करहु सहाई।।_अर्थ_कैकेयी के पेट से जगत् में जन्म लेकर यह मेरे लिये कुछ भी अनुचित नहीं है। मेरी सब बात तो विधाता ने ही बना दी है। ( फिर )उसमें प्रजा और पंच ( आपलोग ) क्यों सहायता कर रहे हैं।

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार। तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार।।_अर्थ_जिसे कुग्रह लगे हों ( अथवा जो पिशाच ग्रस्त हो ), फिर जो वआयउरओग से पीड़ित हो और उसी को फिर बिच्छू डंक मार दे, उसको यदि मदिरा पिलायी जाय, तो कहिये यह कैसा इलाज है !

कैकेइ सुअन जोगु जग जोई। चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई।। दसरथ तनय राम लघु भाई। दीन्ह मोहि बिधि बादि बड़ाई।।_अर्थ_कैकेयी के लड़के के लिये संसार में जो कुछ योग्य था, चतुर विधाता ने मुझे वही दिया। पर 'दशरथजी के पुत्र' और 'राम का छोटा भाई' होने की बड़ाई विधाता ने मुझे व्यर्थ दी है।

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका। राय रजायसु सब कहं नीका।। उतरु दें केहि बिधि केहि केही।। कहहु सुखेन जथा रुचि जेही।।_अर्थ_आप सब लोग भी मुझे टीका कढाने के लिये कह रहे हैं। मैं किस_किस को किस प्रकार से उत्तर दूं ? जिसकी जैसी रुचि हो आपलोग सुखपूर्वक वही कहें।

मोहि कुमातु समेत बिहाई। कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई।। मो बिनु को सचराचर माहीं। जेहिं सिय राम प्रान प्रिय नाहीं।।_अर्थ_मेरी कुमाता कैकेयीसमेत मुझे छोड़कर, कहिये, और कौन कहेगा कि यह काम अच्छा किया गया ? जड़ _चेतन  जगत् मेरे सिवा और कौन है जिसको श्रीसीतारामजी प्राणों के समान प्यारे न हों।

परम हानि सब कहं बड़ राहू। अदानी मोर नहिं दूषन काहू।। संजय सील प्रेम बस अहहू। सबुइ उचित सब जो कछु कहहू।।_अर्थ_जो परम हानि है, उसी में सबका बड़ा लाभ दीख रहा है। मेरा बुरा दिन है किसी का दोष नहीं। आप सब जो कुछ कहते हैं सो सब उचित ही है। क्योंकि आपलोग संशय, शील और प्रेम के वश में हैं।

राम मातु सुठि सरल चित। मो पर प्रेम बिसेषि। कहइ सुभायं सनेह बस मोरि दीनता देखि।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी की माता बहुत ही सरल हृदय हैं और मुझपर उनका विशेष प्रेम है। इसलिये मेरी दीनता देखकर वे स्वाभाविक स्नेह वश ही ऐसा कह रही हैं।

गुरु बिबेक सागर जगु जाना। जिन्हहि विस्व कर बदर समाना।। मो कहं तिलक साज सज सोऊ। भएं बिधि बिमुख सबु कोऊ।।_अर्थ_गुरुजी ज्ञान के समुद्र हैं, इस बात को सारा जगत् जानता है, जिनके लिये विश्व हथेली पर रखे हुए बेर के समान है, वे भी मेरे लिये राजतिलक का साज सज रहे हैं। सत्य है, विधाता के विपरीत होने पर सब कोई विपरीत हो जाते हैं।


परिहरि राम सिय जग माहीं। कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं।। सो मैं सुनब सहब सुखु मानी। अंतहुं कीच तहां जहं पानी।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी को छोड़कर जगत् में कोई यह नहीं कहेगा कि इस अनर्थ में मेरी सम्मति नहीं है। मैं उसे सुखपूर्वक सुनूंगा और सहूंगा। क्योंकि जहां पानी होता है, वहां अंत में कीचड़ होता ही है।

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू। परलोकहु कर नाहिन सोचू।। एकहइं उर बस दउसह दुखारी। मोहि लगि में संघीय राम दुखारी।।_अर्थ_मुझे इसका डर नहीं है कि जगत् मुझे बुरा कहेगा और न मुझे परलोक का ही सोच है। मेरे हृदय में तो बस, एक ही दु:सह दावानल धधक रहा है कि मेरे कारण श्रीसीतारामजी दु:खी हुए।

जीवन लाहु लखन भल पावा। सबु तजि रामु चरन मन लावा।। मोर जन्म रघुबर बन लागी। झूठ काह पछिताउं अभागी।।_अर्थ_जीवन का उत्तम लाभ तो लक्ष्मण ने पाया, जिन्होंने सबकुछ तजकर श्रीरामजी के चरणों में मन लगाया। मेरा जन्म तो श्रीरामजी के वनवास के लिये ही हुआ था। मैं अभागा झूठ_मूठ क्या पछताता हूं?

आपनी दारुन दीनता कहउं सबहि सिरु नाइ। देखें बिनु रघुनाथ पद जिय के जरनि न जाइ।।_अर्थ_सबको सिर झुकाकर मैं अपनी दारुण दीनता कहता हूं। श्री रघुनाथजी के चरणों के दर्शन किये बिना मेरे जी की जलन नहीं जायगी।

आन उपाय मोहि नहिं सूझा। को जिय कै रघुबर बिनु बूझा।। एकइं आंक इहइ मन माहीं। प्रातकाल चलिहउं प्रभु पाहीं।।_अर्थ_मुझे दूसरा कोई उपाय नहीं सूझता। श्रीरामजी के बिना मेरे हृदय की बात कौन जान सकता है ? मन में एक ही आंक ( निश्चयपूर्वक) यही है कि प्रात:काल प्रभु श्रीरामजी के पास चल दूंगा।

यद्यपि मैं अनभल अपराधी। भैं मोहि कारन सकल उपाधी।। तदपि सरन सनमुख मोहि देखी। छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी।।_अर्थ_यद्यपि मैं बुरा हूं और अपराधी हूं, और मेरे ही कारण यह सब उपद्रव हुआ है, तथापि श्रीरामजी मुझे शरण में सम्मुख आया हुआ देखकर सब अपराध क्षमा करके मुझपर विशेष कृपा करेंगे।

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ। कृपा सनेह सदन रघुराऊ।। अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा। मैं सिसु सेवक यद्यपि बामा।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी शील, संकोच, अत्यन्त सरल स्वभाव, कृपा और स्नेह के घर हैं। श्रीरामजी ने कभी शत्रु का भी अनिष्ट नहीं किया। मैं यद्यपि टेढ़ा हूं पर हूं तो उनका बच्चा और गुलाम ही।

तुम्ह पै पांच मोर भल जानी। आयसु आसिस देहु सुबानी।। जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी। आवहिं बहुरि राम रजधानी।।_अर्थ_आप पंच ( सब ) लोग भी इसी में मेरा कल्याण मानकर सुन्दर वाणी से आज्ञा और आशीर्वाद दीजिये, जिसमें मेरी विनती सुनकर और मुझे अपना दास जानकर श्रीरामचन्द्रजी राजधानी को लौट आवें।

यद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस। आपनी जानि न त्यआगइहहइं मोहि रघुबीर भरोस।।_अर्थ_यद्यपि मेरा जन्म कुमाता से हुआ है और मैं दुष्ट तथा सदा दोषमुक्त भी हूं तो भी मुझे श्रीरामजी का भरोसा है कि मुझे अपना जानकर त्यागेंगे नहीं।

भरत बचन सब कहं प्रिय लागे। राम स्नेह सुधा जनु पागे।। लोग वियोग बिषम विष दागे। मंत्र सबीज सुनत जनु जागे।।_अर्थ_भरतजी के वचन सबको प्यारे लगे मानो वे श्रीरामजी के प्रेमरूपी अमृत में पगे हुए थे। श्रीराम वियोग रूपी भीषण विष से सबलोग जले हुए थे। वे मानो बीज सहित मंत्र को सुनते ही जाग उठे।


Sunday, 7 January 2024

अयोध्याकाण्ड

राय राजपदु तुम्ह कहुं दीन्हा। पिता बचन फुर चाहिअ कीन्हा।। तजे राम जेहिं वचनहि लागी। तनु परिहरिउ राम बिरहागी।।_अर्थ_राजा ने राजपद तुमको दिया है। उनके लिये विषाद करना व्यर्थ है। यह सुन और समझ कर सोच त्याग दो और राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर तदनुसार करो।





नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना। करहु तात पितु बचन प्रवाना।। करहु सीस धरि भूप रजाई। हइ तुम्ह कहीं सब भांति भलाई।।_अर्थ_राजा को वचन प्रिय थे, प्राण प्रिय नहीं थे। इसलिये हे तात ! पिता पके वचनों का प्रमाण ( सत्य ) करो ! राजा की आज्ञा सिर चढ़ाकर पालन करो, इसी में सब तरह से भलाई है।






परसुराम पितु अग्या राखी। मारी मातु लोक सब साखी।। तनय जजआतइहइ यौवन दयऊ। पितु अग्यां अघ अजसु न भयऊ।।_अर्थ_परसुरामजी ने पिता की आज्ञा रखी और माता को मार डाला; सब लोक इस बात के साक्षी हैं। राजा ययाति के पुत्र ने पिता को अपनी जवानी दे दी। पिता की आज्ञा पालन करने से उन्हें पाप और अपयश नहीं हुआ।






अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन। तें भाजन सुख सुजसु के बसहिं अमरपति ऐन।।_अर्थ_जो अनुचित और उचित का विचार छोड़कर पिता के वचनों का पालन करते हैं, वे ( यहां ) सुख और सुयश के पात्र होकर अन्त में इन्द्र पुरी ( स्वर्ग )_में निवास करते हैं।







अवसि नरेस बचन फुर करहू। पालहु प्रजा सोकु परिहरहू।। सुरपुर नृप पाइहि परितोषू। तुम्ह कहुं सुकृतु सुजसु नहिं दोषू।।_अर्थ_राजा का वचन अवश्य सत्य करो। शोक त्याग दो और प्रजा का पालन करो। ऐसा करने से स्वर्ग में राजा संतोष पावेंगे और तुमको पुण्य और यश मिलेगा, दोष नहीं लगेगा।






बेद बिदित संमत सब ही का। जेहि पितु देइ सो पावइ टीका।। करहु राज परिहरहु गलानी। मानहुं मोर बचन हित जानी।।_अर्थ_ यह वेद में प्रसिद्ध है और ( स्मृति _पुराणादि ) सभी शास्त्रों के द्वारा सम्मत है कि पिता जिसको दे वही राजतिलक पाता है। इसलिये तुम राज्य करो, ग्लानि का त्याग कर दो। मेरे वचन को हित समझकर मानो।







सुनि सुख लहब राम बैदेही। अनुचित कहा न पंडित केहीं।। कौसल्याजी सकल महतारीं। तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं।।_अर्थ_इस बात को सुनकर श्रीरामचन्द्रजी और जानकी जी सुख पावेंगे और कोई पंडित इसे अनुचित नहीं कहेगा। कौसल्याजी आदि तुम्हारी सब माताएं भी प्रजा के सुख से सुखी रहेंगे।







परम तुम्हार राम कर जानिहि। सो सब बिधि तुम्ह कहीं भल मानिहि।। सौंपेहु राजु राम के आएं। सेवा करेगी स्नेह सुहाएं।।_अर्थ_जो तुम्हारे और श्रीरामचन्द्रजी के श्रेष्ठ सम्बंध को जान लेगा, वह सभी प्रकार से तुमसे भला मानेगा। श्रीरामचन्द्रजी के लौट आने पर राज्य उन्हें सौंप देना और सुन्दर स्नेह से उनकी सेवा करना।








कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि। रघुपति आएं उचित जस तस तब करब बहोरि।।_अर्थ_मंत्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं_गुरुजी की आज्ञा का अवश्य ही पालन कीजिये। श्री रघुनाथजी के लौट आने पर जैसा उचित हो, तब फिर वैसा ही कीजियेगा।









कौसल्या धरि धीरजु कहई। पूत पथ्य गुर आयसु अहई।। सो आदरिअ करिअ हित मानी। तजिअ बिषादु काल गति जानी।।_अर्थ_कौसल्याजी भी धीरज धरकर कह रही हैं_हे पुत्र ! जो पिता की आज्ञा का पालन करता है वही पुत्र धन्य है। समय की गति को समझकर धीरज धरो।








बन रघुपति सुरपुर नरनाहू। तुम्ह एहि भांति तात कदराहू।। परिजन प्रजा सचिव सब अंबा। तुम्हीं सुत सब कहां अवलंबा।।_अर्थ_श्रीरघुनाथजी वन में हैं, महाराज स्वर्ग का राज करने चले गये। और हे तात ! तुम इस प्रकार कातर हो रहे हो। हे पुत्र! कुटुम्ब, प्रजा, मंत्री और सब माताओं के_सबके एक तुम ही सहारे हो।






लखि बिधि बाम कालु कठिनाई। धीरजु धरहु मातु बलि जाई।। सिर धरि गुरु आयसु अनुसरहू। प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू।।_अर्थ_विधाता को प्रतिकूल और काल को कठोर देखकर धीरज धरो, माता तुम्हारी बलिहारी जाती है। गुरु की आज्ञा का पालन कर कुटुम्बियों का दु:ख हरो।




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गुरु के बचन सचिव अभिनन्दनु। सुने भरत हिय हित जनु चंदनु।। सुनी बहोरि मातु मृदु बानी। सील सनेह सरल रस सानी ।।_अर्थ_भरतजी ने गुरु के वचनों और मंत्रियों के अभिनंदन ( अनुमोदन )_को सुना जो उनके हृदय के लिये मानो चन्दन के समान शीतल था।





सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत व्याकुल भए। लोचन सरोरुह स्रवत सींचती बिरह उर अंकुर नए। सो दशा देखत समय तेहि बिसरी सबही सुधि देह की। तुलसी सराहत सकल सादर सीव सहज सनेह की।।_अर्थ_सरलता के रस में सनी हुई माता की वाणी सुनकर भरतजी व्याकुल हो गये। उनके नेत्र_कमल जल ( आंसू ) बहाकर हृदय के विरह रूपी नवीन अंकुर को सींचने लगे। ( नेत्रों के आंसुओं ने उनके वियोग दु:ख को बहुत ही बढ़ाकर उन्हें अत्यंत व्याकुल कर दिया। ) उनकी वह दशा देखकर उस समय सबको अपने शरीर की सुध भूल गयी। तुलसीदासजी कहते हैं_ स्वाभाविक प्रेम की सीमा श्रीभरतजी की सबलोग आदरपूर्वक सराहना करने लगे।





भरत कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि। बचन अमिअ जनु बोरि देते उचित उत्तर सबहि।।_अर्थ_धैर्य की धुरी धारण करनेवाले भरतजी धीरज धरकर, कमल के समान हाथों को जोड़कर, वचनों को मानो अमृत में डुबाकर सबको उचित उत्तर देने लगे।






मोहि उपदेसु दीन्हा गुर नीका। प्रजा सचिव संमत सब ही का।। मातु उचित धरि आयसु दीन्हा। अवसि सीस धरि चाहउं कीन्हा।।_अर्थ_गुरुजी ने मुझे सुन्दर उपदेश दिया। ( फिर ) प्रजा, मंत्री आदि सभी को यही सम्मत है। माता ने उचित समझकर ही आज्ञा दी है और मैं भी अवश्य उसको सिर चढ़ाकर वैसा ही करना चाहता हूं।







गुरु पितु मातु स्वामि हित बानी। सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी।। उचित कि अनुचित करें बिचारू। धर्मु जाइ सिर पातक भारू।।_अर्थ_( क्योंकि ) गुरु, पिता, स्वामी और सुहृद मित्र_( मित्र )_ की वाणी सुनकर प्रसन्न मन से अच्छी समझकर मानना चाहिये। उचित_अनुचित का विचार करने से धर्म जाता है और सिर पर पाप का भार चढ़ाता है।







तुम्ह तो देहु सरल सिख सोई। जो आचरण मोर भल होई।। यद्यपि यह समझते हौं नीकें। तदपि होत परितोष न जी कें।।_अर्थ_आप तो मुझे वहीं सरल शिक्षा दे रहे हैं, जिसके आचरण करने में मेरा भला हो। यद्यपि इस बात को मैं भली_भांति समझता हूं, तथापि मेरे हृदय को संतोष नहीं होता।







अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू। मोहि अनुहरत सिखावनु देहू।। उतरु देब छमब अपराधू। दुखित दोष गुन गनहिं न साधू।।_अब आपलोग मेरी विनती सुन लीजिए और मेरी योग्यता के अनुसार मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दे रहा हूं, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दु:खी मनुष्य के दोष गुणों को नहीं गिनते।





पितु सुरपुर सिय राम बन करन कहहु मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित को आपने बड़ काजु।।_अर्थ_पिताजी स्वर्ग में हैं, श्रीसीतारामजी वन में हैं और मुझे शिक्षा दीजिये। मैं उत्तर दे रहा हूं, यह अपराध क्षमा कीजिये। साधु पुरुष दु:खी मनुष्य के दोष_गुणों को नहीं गिनते।







पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहू मोहि राजु। एहि तें जानहु मोर हित को आपने बड़ काजु।।_अर्थ_पिताजी स्वर्ग में हैं, श्रीसीतारामजी वन में हैं और मुझे आप राज्य करने के लिये कह रहे हैं। इसमें आप मेरा कल्याण समझते हैं या अपना कोई बड़ा काम ( होने की आशा रखते हैं ) ?







हित हमार सियपति सेवकाईं। सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाईं।। मैं अनुमानि दीख मन माहीं। आन उपाय मोर हित नहीं।।_अर्थ_मेरा कल्याण तो सीता पति श्रीरामजी की चाकरी में हैं, सो उसे माता की कुटिलता ने छीन लिया। मैंने अपने मन में अनुमान करके देख लिया है कि दूसरे किसी उपाय से मेरा कल्याण नहीं है।







सोक समाजु राजु केहि लेखें। लखन राम सिय बिनु पद देखें।। बादि बसन बिनु भूषन भारू। बादि बिरति बिनु ब्रह्मबिचारू।।_अर्थ_यह शोक का समुदाय राज्य  लक्ष्मण, श्रीरामचन्द्रजी और सीताजी के चरणों को देखें बिना किस गिनती में है ( इसका क्या मूल्य है ) ? जैसे कपड़ों के बिना गहनों का बोझ व्यर्थ है। वैराग्य के बिना ब्रह्मविचार व्यर्थ है।








सरुज शरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरि भगति जायें जप जोगा।। जायं जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सबु बिनु रघुराई।।_अर्थ_रोगी शरीर के लिये नाना प्रकार के भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरि की भक्ति के बिना जप जप और जोग व्यर्थ है। वैसे ही श्री रघुनाथजी के बिना मेरा सबकुछ व्यर्थ है।







सरुज शरीर बादि बहु भोगा। बिनु हरि भगति जायें जप जोगा।। जायं जीव बिनु देह सुहाई। बादि मोर सब बिनु रघुराई।।_अर्थ_रोगी शरीर के लिये नाना प्रकार के भोग व्यर्थ हैं। श्रीहरि की भक्ति के बिना जप और जोग व्यर्थ है। वैसे ही श्री रघुनाथ के बिना मेरा सबकुछ व्यर्थ है। 







जाउं राम नहिं आयसु देहू। एकहइं आंक मोर हित एहू।। मोहि नृप करि भल आपन चहहू। सोच सनेह जड़ता बस कहहू।।_अर्थ_मुझे आज्ञा दीजिये, मैं श्रीरामजी के पास जाऊं। एक ही आंक ( निश्चयपूर्वक ) मेरा हित इसी में हैं। और मुझे राजा बनाकर आप अपना भला चाहते हैं, यह भी आप स्नेह की जड़ता ( मोह ) के वश होकर ही कह रहे हैं।






कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज। तुम्ह चाहत सुखु मोह बस मोहि से अधम कें राज।।_अर्थ_कैकेयी के पुत्र, कुटिलबुद्धि, राम विमुख  और निर्लज्ज मुझ से अधम के राज्य से आप मोह के वश होकर ही सुख चाहते हैं।







कहउं सांची सब सुनि पतिआहू। चाहिअ धरमसील नरनाहू। मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं। रसा रसातल जाइहि तबहीं।।_अर्थ_मैं सत्य कहता हूं, आप सब सुनकर कीन्हा विश्वास करें, धर्मशील को ही राजा होना चाहिये। आप मुझे हठ करके ज्योंहि राज देंगे त्योंहि पृथ्वी पाताल में धंस जायगी।







मोहि समान को पापनिवासू। जेहिं लगा सिय राम बनवासू।। रायन राम कहुं कानन दीन्हा। बिछुड़त गमन अमरपुर कीन्हा।।_अर्थ_मेरे समान पापों का घर कौन होगा, जिसके कारण सीताजी और श्रीरामजी का बनवास हुआ ? राजा ने श्रीरामजी को वन दिया और उनके बिछड़ते ही स्वयं स्वर्ग को गमन किया।






मैं सठ सब अनरथ कर हेतू। बैठ बात सब सुनउं सचेतू।। बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू। रहे प्रान सहि जग उपहासू।।_अर्थ_और मैं दुष्ट,जो सारे अनर्थों का कारण हूं, होश_हवास में बैठा सब बातें सुन रहा हूं। श्री रघुनाथजी से रहित घर को देखकर और जगत् का उपहास संकर भी ये प्राण बने हुए हैं।







राम पुनीत बिषय रस रूखे। लोलुप भूमि भोग के भूखे।। कहां लगी कहां हृदय कठिनाई। निदरि कुलिसहु जेहिं लही बड़ाई।।_अर्थ_(इसका यही कारण है कि ये प्राण ) श्रीराम रूपी पवित्र विषय_रस में आसक्त नहीं है। ये लालची भूमि और भोगों के ही भूखे हैं। मैं अपने हृदय की कठोरता कहां तक कहूं ? जिसने वज्र का भी तिरस्कार करके बड़ाई पायी है।







कारन तें कारज कठिन होत दोस नहिं मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर।।_अर्थ_कारण से कार्य कठिन होता ही है, इसमें मेरा दोष नहीं। हड्डी से वज्र और पत्थर से लोहा भयानक कठोर होता है।