Thursday, 6 June 2024

अयोध्याकाण्ड

भरत तीसरे पहर कहं कीन्ह प्रबेसु प्रयाग। कहत राम सिया राम सिया उमगि उमगि अनुराग।।_अर्थ_प्रेम में उमंग_उमंगकर सीताराम_सीताराम कहते हुए भरतजी ने तीसरे पहर प्रयाग में प्रवेश किया।

झलका झलकत पायन्ह कैसें। पंकज कोस ओस कन जैसें।। भरत पयादेहिं आए आजू। भयउ दुखित सुनि सकल समाजू।।_अर्थ_उनके चरणों में छाले कैसे चमकते हैं, जैसे कमल की कली पर ओस की बूंदें चमकती हैं। भरतजी आज पैदल ही चलकर आये हैं, यह समाचार सुनकर सारा समाज दु:खी हो गया।

खबरि लीन्ह सब लोग नहाए। कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए।। सबिधि सितासित नीर नहाने। दिए दान महिसुर सनमाने ।।_अर्थ_जब भरतजी ने यह पता पा लिया कि सब लोग स्नान कर चुके, तब त्रिवेणी पर आकर उन्होंने प्रणाम किया। फिर विधिपूर्वक ( गंगा_यमुना के ) श्वेत और श्याम जल में स्नान किया और दान देकर ब्राह्मणों का सम्मान किया।

देखत स्यामल धवल हिलोरे। पुलकित सरीरा भरत कर जोरे।। सकल कामप्रद तीरथराऊ। बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ।।_अर्थ_ श्याम और सफेद ( यमुनाजी और गंगाजी की ) लहरों को देखकर भरतजी का शरीर पुलकित हो उठा और उन्होंने हाथ जोड़कर कहा_हे तीर्थराज ! आप समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाले हैं। आपका प्रभाव वेदों में प्रसिद्ध और संसार में प्रकट है।

मागउं भीख त्यागि निज धरमू। आरती काह न करि कुकरमू।। अस जियं जानि सुजान सुदानी। सफल करहिं जग जाचक बानी।।_अर्थ_मैं अपना धर्म ( न मांगने का क्षत्रिय धर्म ) त्यागकर आपसे भीख मांगता हूं । आर्य मनुष्य कौन_कौन सा कुकर्म नहीं करता ? ऐसा हृदय में जानकर सुजान उत्तम दानी जगत् में मांगनेवाले की वाणी को सफल किया करते हैं ( अर्थात् वह जो मांगता है, सो दे देते हैं ) ।


अर्थ न धरम न काम रुचि गति न चहउं निरबान। जन्म जन्म रति राम पद यह बरदानु न आन।।_अर्थ_ मुझे न तो अर्थ की रुचि ( इच्छा ) है, न धर्म की, न काम की और न मैं मोक्ष ही चाहता हूं। जन्म_जन्म में मेरा श्रीरामजी के चरणों में प्रेम हो, बस, यही वरदान मांगता हूं, दूसरा कुछ नहीं।


जानहु रामु कुटिल करि मोही। लोग कहउ गुर साहिब द्रोही।। सीता राम चरन रति मोरें। अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें।।_अर्थ_स्वयं श्रीरामचन्द्रजी भी भले ही मुझे कुटिल समझे और लोग मुझे गुरुद्रोही या स्वामिद्रोही भले ही कहें; पर श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा प्रेम आपकी कृपा से दिन दिन बढ़ता ही रहे।


जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ। जाचत जलु पबि पाहन डारउ।। चातकु रटना घटें घटि जाई। बढ़ें प्रेमु बसब भांति भलाई।।_अर्थ_मेघ जन्म भरचातक की सुधि भुला दे और जल मांगने पर वह चाहे वज्र और पत्थर ( ओले ) ही गिरावे, पर चातक की रटना घटने से तो उसकी बात ही घट जायगी ( प्रतिष्ठा ही नष्ट हो जायगी )। उसकी तो प्रेम बढ़ने में ही सब तरह से भलाई है।


कनकहिं बान चढ़ई जिमि दाहें। तिमि प्रियतम पद नेम निबाहे।। भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी। भी मृदु बानी सुमंगल देनी।।_अर्थ_ जैसे तपाने पर सोने से आब ( चमक ) आ जाती है, वैसे ही प्रियतम के चरणों में प्रेम का नियम निबाहने से प्रेमी सेवक का गौरव बढ़ जाता है। भरतजी के वचन सुनकर बीच त्रिवेणी में से सुन्दर मंगल देनेवाली कोमल वाणी हुई।


तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू। राम चरन अनुराग अगाधू।। बादि गलानि करहु मन माहीं। तुम्ह सम रामहिं कोउ प्रिय नाहीं।।_अर्थ_ हे तात भरत ! तुम सब प्रकार से साधू हो। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में तुम्हारा अथाह प्रेम है। तुम व्यर्थ ही मन में ग्लानि कर रहे हो। श्रीरामचन्द्रजी को तुम्हारे समान प्रिय कोई नहीं है।


तनु पुलकेउ हियं हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल। भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरिसहिं फूल।।_अर्थ_त्रिवेणीजी के अनुकूल वचन सुनकर भरतजी का शरीर पुलकित हो गया, हृदय में हर्ष छा गया। भरतजी धन्य हैं, धन्य हैं, कहकर देवता हर्षित होकर फूल बरसाने लगें।


प्रमुदित तीरथराज निवासी। बऐखआनस बटु गृही उदासी।। कहहिं परस्पर मिली दस पांचा। भरतु सनेहु सील सुठि सांचा।।_अर्थ_तीर्थराज प्रयाग में रहनेवाले वानप्रस्थ, ब्रह्मचारी, गृहस्थ और उदासीन ( संन्यासी) सब बहुत ही आनंदित हैं और दस पांच मिलकर आपस में कहते हैं कि भरतजी का प्रेम और शील पवित्र और सच्चा है।


सुनत राम गुन ग्राम सुहाए। भरद्वाज मुनि बर पहिं आए।। दंड प्रनामु करते मुनि देखें। मूर्तिमंत भाग्य निज लेखे।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी के सुन्दर गुण समूहों को सुनते हुए वे मउनइश्रएष्ठ भरद्वाजजी के पास आये। मुनि ने भरतजी को दण्डवत् प्रणाम करते देखा और उन्हें अपना मूर्तिमान सौभाग्य समझा।


धाई उठाई लाइ उर लीन्हे। दीन्ह असीसा कृतार्थ कीन्हे।। आसनु दीन्ह नाइ सिर बैठे। चाहत सकुच गृहं जनु भजि पैठे।।_अर्थ_उन्होंने दौड़कर भरतजी को हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद देकर कृतार्थ किया। मुनि ने उन्हें आसन दिया। वे सिर नवाकर इस तरह बैठे मानो भागकर संकोच के घर में घुस जाना चाहते हैं।


मुनि पूछब कछु यह बड़ सोचूं सोचू। बोले रिषि लखि सीलु संकोचू।। सुनहु भरत हम सब सुधि पाई। बिधि करतब पर किछु न बसाई।।_अर्थ_उनके मन में यह बड़ा सोच है कि मुनि कुछ पूछेंगे ( तो मैं क्या उत्तर दूंगा ) । भरतजी के शील और संकोच को देखकर ऋषि बोले _भरत ! सुनो, हम सब खबर पा चुके हैं। विधाता के कर्तव्य पर कुछ वश नहीं चलता।


तुम्ह ग्लानि जियं जानि करहु समुझि मातु करतूति।। तात कैकेइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति।।_अर्थ_माता की करतूत को समझकर ( याद करके ) तुम हृदय में ग्लानि मत करो। हे तात ! कैकेयी का कोई दोष नहीं है, उसकी बुद्धि तो सरस्वती बिगाड़ गयी थी।


यहउ कहत भल कहि न कोऊ। लोकु बेदु बुध संमत दोऊ।। तात तुम्हार बिमल जासु गाई। पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई।।_अर्थ_यह कहते भी कोई भला न कहेगा, क्योंकि लोक और बेद दोनों ही विद्वानों को मान्य है। किन्तु हे तात ! तुम्हारा निर्मल यश गाकर तो लोक और वेद दोनों बड़ाई पावेंगे।



लोक बेद संमत सब कहई। जेहिं पितु देइ राज सो लहई।। राउ सत्यव्रत तुम्हहिं बोलाई। देखत राज सुखु धरम बड़ाई।।_अर्थ_यह लोक और वेद दोनों का मान्य है और सब यही कहते हैं कि पिता जिसको राज्य दे वही पाता है। राजा सत्यव्रती थे; तुमको बुलाकर राज्य देते, तो सुख मिलता, धर्म रहता और बड़ाई होती।


राम गवनु बन अनरथ मूला। जो सुनि सकल विश्व भई सूला।। सो भावी बस रानी अयानी। करि कुचल अंतहुं पछितानी।।_अर्थ_सारे अनर्थ की जड़ तो श्रीरामचन्द्रजी का वन गमन है, जिसे सुनकर समस्त संसार को पीड़ा हुई। वह श्रीराम का वन गमन भी भावीवश हुआ। बेसमझ रानी तो भावीवश कुचाल करके अन्त में पछतायी।



तहंउं तुम्हार  अलप अपराधू। कहो सो अधम अयान असाधू।। करतेहु राजु तो तुम्हहिं न दोषू।
रामहिं होता सुनत संतोषू।।_अर्थ_उसमें भी तुम्हारा कोई तनिक सा भी अपराध कहे, तो वह अधम, अज्ञानी और असाधु है। यदि तुम राज्य करते तो भी तुम्हें दोष न होता। सुनकर श्रीरामचन्द्रजी को संतोष ही होता।


अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहिं उचित मत एहु। सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु।।_अर्थ_हे भरत ! अब तो तुमने बहुत ही अच्छा किया; यही मत तुम्हारे लिये उचित था। श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में प्रेम होना ही संसार में समस्त मंगलों का मूल है।


सो तुम्हार धनु जीवन प्राना। भूरि भाग को तुम्हहिं समाना।। यह तुम्हार आचरजु न ताता। दशरथ सुअन राम प्रिय भ्राता।।_अर्थ_ सो वह ( श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का प्रेम) तो तुम्हारा धन, जीवन और प्राण ही है; तुम्हारे समान बड़भागी कौन है? हे तात ! तुम्हारे लिये यह आश्चर्य की बात नहीं है। क्योंकि तुम दशरथ जी के पुत्र और श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे भाई हो।


सुनहु भरत रघुबर मन माहीं। प्रेम पात्र तुम्ह सम कोउ नाहीं।। लखन राम सईतहइं अति प्रीती। निसि सब तुम्हहिं सराहत बीती।।_अर्थ_हे भरत ! श्रीरामचन्द्रजी के मन में तुम्हारे समान प्रेमपात्र दूसरा कोई नहीं है। लक्ष्मण जी, श्रीरामजी और सीताजी तीनों को सारी रात उस दिन अत्यन्त प्रेम के साथ तुम्हारी सराहना करते हुए बीती।


जाना मरमु नहात प्रयागा। मगन होहिं तुम्हरे अनुरागा।। तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें। सुख जीवन जग जस जड़ नर कें।।_अर्थ_प्रयागराज में जब वे स्नान कर रहे थे, उस समय मैंने उनका यह मर्म जाना। वे तुम्हारे प्रेम में मगन हो रहे थे। तुमपर श्रीरामचन्द्रजी का ऐसा ही ( अगाध ) स्नेह है जैसा मूर्ख ( विषयासक्त ) मनुष्य का संसार में सुखमय जीवन होता है।


यह न अधिक रघुबीर बड़ाई। प्रान्त कुटुंब पाल रघुराई।। तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू। धरें देह जनु राम सनेहू।।_अर्थ_यह श्रीरघुनाथजी की बहुत बड़ाई नहीं है। क्योंकि श्रीरघुनाथजी तो शरणागत के कुटुम्बभर के पालनेवाले हैं। हैं भरत ! मेरा यह मत है कि तुम तो मानो शरीरधारी श्रीरामजी के प्रेम ही हो।


तुम्ह कहं भरत कलंक यह हम सब कहां उपदेसु। राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु।।
_अर्थ_ हे भरत ! तुम्हारे लिये ( तुम्हारी समझ में ) यह कलंक है, पर हम सबके लिये तो उपदेश है। श्रीरामभक्तिरूपी रस की सिद्धि के लिये यह समय गणेश ( बड़ा शुभ) हुआ है।


नव बिनु बिमल तात जासु तोरा। रघुबर किंकर कुमुद चकोरा।। उदित सदा अंथइहइं कबहूं ना। घटिहिं न जग नभ दिन दिन दूना।।_ अर्थ_हे तात ! तुम्हारा यश निर्मल नवीन चन्द्रमा है और श्रीरामचन्द्रजी के दास कुमुद और चकोर हैं ( वह चन्द्रमा तो प्रतिदिन अस्त होता और घटता है, जिससे कुमुद और चकोर को दु:ख होता है ); परन्तु यह तुम्हारा यश रूपी चन्द्रमा सदा उदय रहेगा; कभी अस्त होगा ही नहीं। जगत् रूपी आकाश में यह घटेगा नहीं, वरन दिन दिन दूना होगा।



कोक तिलोक प्रीति अति करिही। प्रभु प्रताप रबी छबिहि न हरिही।। निसि दिन सुखद सदा सब काहू। ग्रसिहि न कैकेइ करतबु राहू।।_अर्थ_ त्रैलोक रूपी चकवा इस यश रूपी चन्द्रमा पर अत्यन्त प्रेम करेगा और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी का प्रताप रूपी सूर्य इस छबि का हरण नहीं करेगा। यह चन्द्रमा रात_दिन सब किसी को सुख देनेवाला होगा। कैकेयी का कुकर्मरूपी राहू इसे ग्रास नहीं करेगा।









Friday, 10 May 2024

अयोध्याकाण्ड

तें अब फिरत बिपिन पदचारी। कंद मूल फल फूल अहारी।। धिग कैकई अमंगल मूला। भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला।।_अर्थ_वही श्रीरामचन्द्रजी अब जंगलों में पैदल फिरते हैं और कन्द_मूल तथा फल_फूलों का भोजन करते हैं।अमंगल की मूल कैकेई को धिक्कार है, जो अपने प्राण प्रियतम पति से भी प्रतिकूल हो गयी।




मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी। सबु उत्पात भयउ जेहि लागी।। कुल कलंकु करि सृजेउ बिधातां। साईंदोह मोहि कीन्ह कुमाता।।_अर्थ_ मुझे पापों के समुद्र और अभागे को धिक्कार है, धिक्कार है जिसके कारण ये सब उत्पात हुए। विधाता ने मुझे कुल का कलंक बनाकर पैदा किया और कुमाता ने मुझे स्वामिद्रोही बना दिया।





सुनि सप्रेम समुझाव निषादू। नाथ करिअ कत बांदा बिषादू।। राम तुम्हारे प्रिय तुम प्रिय रामहिं। यह निरजोसु दोषु बिधि बामहिं।।_अर्थ_यह सुनकर निषादराज प्रेम पूर्वक समझाने लगा_ हे नाथ आप व्यर्थ विषाद किसलिए करते हैं ? श्रीरामचन्द्रजी आपको प्यारे हैं और आप श्रीरामचन्द्रजी को प्यारे हैं । यही निचोड़ ( निश्चित) सिद्धांत है, दोष तो प्रतिकूल विधाता का है।






बिधि बाम की करनी कठिन जेहि मातु किन्हीं बावरी। तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी।। तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहते हैं सौंहें किएं। परिनाम मंगल जानि अपने आने धीरज हिएं।।_अर्थ_प्रतिकूल विधाता की करनी बड़ी कठोर है, जिसने माता कैकेई को बावली बना दिया ( उसकी मति फेर दी )। उस रात श्रीरामचन्द्रजी बार_बार आदरपूर्वक आपकी बड़ी सराहना करते थे। तुलसीदास जी कहते हैं _( निषादराज कहता है कि_) श्रीरामचन्द्रजी को आपके समान अतिसय प्रिय और कोई नहीं है, मैं सौगंध खाकर कहता हूं। परिणाम में मंगल होगा, यह जानकर आप अपने हृदय में धैर्य धारण कीजिये।






अंतरजामी रामु सकुच स्नेह कृपायतन। चलिए करिअ विश्रामु यह विचार दृढ़ आनि मन।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी अन्तर्यामी तथा संकोच, प्रेम और कृपा के धाम हैं, यह विचारकर और मन में दृढ़ता लाकर चलिये और विश्राम कीजिये।





सखा बचन सुनि उर धरि धीरा। बास चले सुमिरत रघुबीरा।। यह सुधि पाई नगर नर नारी। चले बिलोकन आरत भारी।।_अर्थ_सखा के वचन सुनकर हृदय में धीरज धरकर श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करते हुए भरतजी डेरे को चले। नगर के सारे स्त्री_पुरुष यह ( श्रीरामजी के ठहरने के स्थान का ) समाचार पाकर बड़े आतुर होकर उस स्थान को देखने चले।






परदखिना करि करहिं प्रनामा। देहिं कैकेइहि खोरि निकामा।। भरि भरि बारि बिलोचन लेहीं। बाम बिधातहिं दूषन देहिं।।_अर्थ_वे उस स्थान की परिक्रमा करके प्रणाम करते हैं और कैकेई को बहुत दोष देते हैं। नेत्रों में जल भर_भर लेते हैं और प्रतिकूल विधाता को दूषण देते हैं।







एक सराहहिं भरत सनेहू। कोउ कह नऋपतइ निबाहेउ नेहू।। निंदहिं आपु सराहि निषादहिं। को कहा सका बिमोह बिषादहिं।।_अर्थ_कोई भरतजी के स्नेह की सराहना करते हैं और कोई कहते हैं कि राजा ने अपना प्रेम खूब निबाहा। सब अपनी निंदा करके निषाद की प्रशंसा करते हैं। उस समय के विमोह और विषाद को कौन कह सकता है ?

एहि बिधि राति लोग सबु जागा। भा भिनुसार गुदारा लागा।। गुरहिं सुनावं चढ़ाइ सुहाईं। नहीं नाव सब मातु चढ़ाईं।।_अर्थ_इस प्रकार रातभर सबलोग जागते रहे। सवेरा होते ही खेवा लगा। सुंदर नाव पर गुरुजी को चढ़ाकर फिर नयी नाव पर सब माताओं को चढ़ाया।






दंड चारि महुं भा सबु पारा। उतरि भरत तब सबहिं संभारा।।_अर्थ_चार घड़ी में सब गंगाजी के पार उतर गये। तब भरतजी ने उतरकर सबको संभाला।






प्रतिक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहिं सिर नाइ। आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकउ चलाइ।।_अर्थ_ प्रातःकाल की क्रियाओं को करके माता के चरणों की वन्दना कर और गुरुजी को सिर नवाकर भरतजी ने निषाद गणों को ( रास्ता दिखलाने के लिये ) आगे कर लिया और सेना चला दी।






किअउ निषादनाथ अगुआईं। मातु पालकीं सकल चलाईं।। साथ बोलाई भाई लघु दीन्हा। बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा।।_अर्थ_निषादराज को आगे करके पीछे सब माताओं की पालकियां चलायीं। छोटे भाई शत्रुध्नजी को बुलाकर उनके साथ कर दिया। फिर ब्राह्मणों सहित गुरुजी ने गमन किया।






आपु सुरसरि कीन्ह प्रनामू। सुमिरे लखन सहित सिय रामू।। गवने भरत पयादेहिं पाए। कोतल संग जाहिं डोरिआए।।_अर्थ_तदनन्तर आप ( भरतजी )_ने गंगाजी को प्रणाम किया और लक्ष्मण सहित श्रीसीतारामजी का स्मरण किया। भरतजी पैदल ही चले। उनके साथ कोतल ( बिना सवार के ) घोड़े बागडोर से बंधे चले जा रहे हैं।






कहहिं सुसेवक बारहिं बारा। होइअ नाथ अश्व असवारा।। रामु पयादेहिं पायं सिधाए। हम कहां रथ गज बाजि बनाए।।_अर्थ_उत्तम सेवक बार_बार कहते हैं कि हे नाथ ! आप घोड़े पर सवार हो लीजिए। ( भरतजी जवाब देते हैं कि ) श्रीरामचन्द्रजी तो पैदल ही गये और हमारे लिये रथ, हाथी और घोड़े बनाये गये हैं।






सिर भर जाउं उचित अस मोरा। सब तें सेवक धर्म कठोरा।। देखि भरत गति सुनि मृदु बानी। सब सेवक गन गरहिं गलानी।।_अर्थ_मुझे उचित तो ऐसा है कि मैं सिर के बल चलकर जाऊं। सेवक का धर्म सबसे कठिन होता है। भरतजी की दशा देखकर और कोमल वाणी सुनकर सब सेवकगण ग्लानि के मारे गले जा रहे हैं।

Wednesday, 24 April 2024

अयोध्याकाण्ड


देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरी भरत लघु भाई।। कहि निषाद निज नाम सुबानीं।
सादर सकल जोहारीं रानी।।_अर्थ_ निषादराज की प्रीति को देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजी के छोटे भाई शत्रुध्नजी उससे मिले। फिर निषाद ने अपना नाम ले_लेकर सुन्दर ( नम्र और मधुर ) वाणी से सब रानियों को आदरपूर्वक जोहार की।





जानि लखन सम देहिं असीसा। जिअहु सुखी सय लाख बरीसा।। निरखि निषादु नगर नर नारी। भए सुखी जनु लखनु निहारी।।_अर्थ_रानियां उसे लक्ष्मण जी के समान समझकर आशीर्वाद देती हैं कि तुम सौ लाख वर्षों तक सुखपूर्वक जिओ। नगर के स्त्री-पुरुष निषाद को देखकर ऐसे सुखी हुए मानो लक्ष्मण जी को देख रहे हों। 






कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू। भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू।। सुनि निषादु निज भाग बड़ाई। प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई।।_अर्थ_ सब कहते हैं कि जीवन का लाभ तो इसी ने पाया है, जिसे कल्याणस्वरूप श्रीरामचन्द्रजी ने भुजाओं में बांधकर गले लगाया है। निषाद अपने भाग्य की बड़ाई सुनकर मन में परम आनन्दित हो सबको अपने साथ लिवा ले चला।





सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ। घर तरु तरह सर बाग बन बांस बनाएन्हि जाइ।।_अर्थ_उसने अपने सब सेवकों को इशारे से कहा दिया। वे स्वामि का रुख पाकर चले और उन्होंने घरों में, वृक्षों के नीचे, तालाबों पर तथा बगीचों और जंगलों में ठहरने के लिये स्थान बना दिये।







सृंगबेरपुर भरत दीख जब। भे स्नेहन सब अंग सिथिल तब।। सोहत दिएं निषादहि लागू। जनु तनु धरें बिनय अनुरागू।।_अर्थ_भरतजी ने जब श्रृंगवेरपुर को देखा, तब उनके सब अंग प्रेम के कारण शिथिल हो गये। वे निषाद को लागू दिये ( अर्थात् उसके कंधे पर हाथ रखकर चलते हुए ) ऐसे शोभा दे रहे हैं, मानो विनय और प्रेम शरीर धारण किये हुए हों।







एहि बिधि भरत सेन सबु संगा। देखि जाइ जग पावनी गंगा।। रामघाट कहं कीन्ह प्रनामू। भा मनु मगन मिले जनु रामू।।_अर्थ_इस प्रकार भरतजी ने सब सेना को साथ में लिये हुए जगत् को पवित्र करनेवाली गंगाजी के दर्शन किये। श्रीराम घाट को ( जहां श्रीरामजी ने स्नान संध्या कि थी ) प्रणाम किया। उनका मन इतना आनन्द मग्न हो गया, मानो उन्हें स्वयं श्रीरामजी मिल गये हों।







करहिं प्रनाम नगर नर नारी। मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी।। करि मज्जनु मागहीं कर जोरी। रामचन्द्र पद प्रीति न थोरी।।_अर्थ_नगर के नर_नारी प्रणाम कर रहे हैं और गंगाजी के ब्रह्मरूप जल को देख_देखकर आनन्दित हो रहे हैं। गंगाजी में स्नान कर हाथ जोड़कर सब यही वर मांगते हैं कि श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में हमारा प्रेम कम न हो ( अर्थात् बहुत अधिक हो )।








भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू। सकल सुखद सेवक सुरधेनू।। जोरी पानी भर मागउं एहू। संजय राम पद कमल सनेहू।।_अर्थ_भरतजी ने कहा_हे गंगे ! आपकी रज सबको सुख देनेवाली तथा सेवक के लिये तो कामधेनु ही है। मैं हाथ जोड़कर यही वरदान मांगता हूं कि श्रीसीतारामजी के चरणों में मेरा स्वाभाविक प्रेम हो।






एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाई। मातु नहानईं जानि सब डेरा चले लवाइ।।_अर्थ_ इस प्रकार भरतजी स्नान कर और गुरुजी की आज्ञा पाकर तथा यह जानकर कि सब माताएं स्नान कर चुकी हैं, डेरा उठा ले चले।







जहं तहं लोगन्ह डेरा कीन्हां। भरतु सोंध सबहिं कर लीन्हा।। सुर सेवा करि आयसु पाई। राम मातु पहिं गए दोउ भाई।।_अर्थ_लोगों ने जहां_तहां डेरा डाल दिया। भरतजी ने सभी का पता लगाया ( कि सब लोग आराम से टिक गये हैं या नहीं)। फिर देव पूजन करके आज्ञा पाकर दोनों भाई श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी के पास गये।







चरन चांपि कहि कहि मृदु बानी। जननीं सकल भरत सनमानी।। भाइहिं सौंपि मातु सेवकाई। आपी निषादहिं लीन्ह बोलाई।।_अर्थ_चरण दबाकर और कोमल वचन कह-कहकर भरतजी ने सब माताओं का सत्कार किया। फिर भाई शत्रुध्न को माताओं की सेवा सौंपकर आपने निषाद को बुला लिया।







चले सखा कर सों कर जोरें। सिथिल सरीरु स्नेह न थोरे।। पूंछत सखहि सो ठाउं देखाऊ। नेकु नयन मन जरनि जुराऊ।।_अर्थ_ सखा निषादराज के हाथ_से_हाथ मिलायें हुए भरतजी चले। प्रेम कुछ थोड़ा नहीं है ( अर्थात् बहुत अधिक प्रेम है ), जिससे उनका शरीर शिथिल हो रहा है। भरतजी सखा से पूछते हैं कि मुझे वह स्थान दिखलाओ_और नेत्र और मन की जलन कुछ ठण्डी करो।









जहं सिय राम लखन निसि सोए। कहत भरे जल लोचन कोए। भरत बचन सुनि भयउ विषादू। तुरत तहां लइ गयउ निषादू।।_अर्थ_जहां सीताजी, श्रीरामजी और लक्ष्मण रात को सोये थे। ऐसा कहते ही उनके नेत्रों के कोनों से ( प्रेमाश्रुओं का ) जल भर आया। भरतजी के वचन सुनकर निषाद को बड़ा विषाद हुआ। वह तुरंत ही उन्हें वहां ले गया।







जहं सिंसुपा पुनीत तरह रघुबर किया बिश्रामु। अति सनेह सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु।।_अर्थ_जहां पवित्र अशोक के वृक्ष के नीचे श्रीरामजी ने विश्राम किया था। भरतजी ने वहां अत्यन्त प्रेम से आदरपूर्वक दण्डवत् प्रणाम किया।








कुस सांथरी निहारी सुहाई। कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई।। चरन रेख रज आंखिन्ह लाई। बना न कहते प्रीति अधिकाई।।_अर्थ_ कुशों की सुन्दर सांथरी देखकर उसकी प्रदक्षिणा करके प्रणाम किया। श्रीरामचन्द्रजी के चरण चिन्हों की रज आंखों में लगायी। ( उस समय के ) प्रेम की अधिकता कहते नहीं बनती।







कनक बिन्दु दुइ चारिक देखे। राखे सीस सिय समय लेखे।। सजल बिलोचन हृदय गलानी। कहत सखा सन बचन सुबानी।।_अर्थ_भरतजी ने दो चार स्वर्ण बिन्दु ( सोने के कण या तारे आदि जो सीताजी के गहने कपड़ों से गिर पड़े थे ) देखें तो उनको सीताजी के समान समझकर सिर पर रख लिया। उनके नेत्र ( प्रेमाश्रु ) जल से भरे हैं और हृदय में ग्लानि भरी है। वे सखा से सुन्दर वाणी में ये वचन बोले_






श्रीहत सिय बिरहं दुति हीना। जथा अवध नर नारी विलीना।। पिता जनक देऊं पटतर केही। करतलु भोगु जोगु जग जेही।।_अर्थ_ये स्वर्ण के कण या तारे भी  सीताजी के विरह से ऐसे श्रीहत ( शोभाहीन) एवं कान्तिहीन हो रहे हैं जैसे ( राम_वियोग में ) अयोध्या के नर_नारी विलीन ( शोक के कारण क्षीण ) हो रहे हैं। जिन सीताजी के पास पिता राजा जनक हैं, इस जगत् में भोग और जोग दोनों जिनकी मुट्ठी में है, उन जनक जी को मैं किसकी उपमा दूं?








ससुर भानुकुल भानु भुआलू। जेहिं सहित अमरावतिपालू।। प्रान नाथु रघुनाथ गोसाईं। जो बड़ होत सो राम बड़ाई।।_अर्थ_सूर्यकुल के सूर्य राजा दशरथ जी जिनके ससुर हैं, जिनको अमरावती के स्वामि इन्द्र भी सिखाते थे ( ईर्ष्यापूर्वक उनके जैसा ऐश्वर्य और प्रताप पाना चाहते थे ); और प्रभु श्रीरघुनाथजी जिनके प्राणनाथ हैं, जो इतने बड़े हैं कि जो कोई भी बड़ा होता है, वह श्रीरामचन्द्रजी की ( दी हुई ) बड़ाई से होता है।






पति देवता सुतीय मनि सीय सांथरी देखि। बिहरत हृदय न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि।।_अर्थ_ उन श्रेष्ठ पतिव्रता स्त्रियों में शिरोमणि सीताजी की साथरी ( कुशशय्या ) देखकर मेरा हृदय हहराकर ( दहलकर ) फट नहीं जाता; हे शंकर ! यह वज्र से भी अधिक कठोर है।







लालन जोगु लखन लघु लोने। भए न भाइ अस अहहिं न होने। पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे। सिय रघुवीरहिं प्रानपियारे।।_अर्थ_मेरे छोटे भाई लक्ष्मण बहुत ही सुन्दर और प्यार करने योग्य हैं। जो लक्ष्मण अवध के लोगों के प्यारे, माता_पिता के दुलारे और श्रीसीतारामजी के प्राण प्यारे हैं।






मृदु मूर्ति सुकुमार सुभाऊ। तात बाउ तन लाग न काऊ।। तें बन सहाहिं बिपति सब भांती। निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती।।_अर्थ_जिनकी कोमल मूर्ति और सुकुमार स्वभाव है, जिनके शरीर में कभी गर्म हवा भी नहीं लगी, वे वन में सब प्रकार की विपत्तियां सह रहे हैं। ( हाय ! ) इस मेरी छाती ने (कठोरता में) करोड़ों वज्रों का भी निरादर कर दिया। ( नहीं तो यह कभी भी फट गयी होती )।







राम जनमि जगु कीन्ह उजागर। रूप सील सुख सब गुन सागर।। पुरजन परिजन गुर पितु माता। राम सुभाउ सबहिं सुखदाता।।_अर्थ_ श्रीरामचन्द्रजी ने जन्म ( अवतार ) लेकर जगत् को प्रकाशित ( परम सुशोभित) कर दिया। वे रूप, शील और समस्त गुणों के समुद्र हैं। पुरवासी, कुटुम्बी, गुरु, माता_पिता सभी को श्रीरामजी का स्वभाव सुख देनेवाला है।






बैरिउ राम बड़ाई करहीं। बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं।। सादर कोटि कोटि सत सेषा। करि न कहीं प्रभु गुन गन लेखा।।_अर्थ_शत्रु भी श्रीरामजी की बड़ाई करते हैं। बोल_चाल, मिलने के ढ़ंग और विनय से वे मन को हर लेते हैं। करोड़ों सरस्वती और अरबों शेषजी भी प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के गुणों की गिनती नहीं कर सकते।







सुख स्वरूप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान। तें सओवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान।।_अर्थ_जो सुख स्वरूप रघुवंशशिरोमणि  श्रीरामचन्द्रजी मंगल और आनंद के भण्डार हैं, वे पृथ्वी पर कुशाल बिछाकर सोते हैं। विधाता की गति बड़ी ही बलवान है।






राम सुना दुख कान न काऊ। जीवन तरु जिमि जोगवइ राउ।। पलक नयन फनी मनि जेहिं भांती। जोगवहिं जननी सकल दिन राती।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी ने कभी कानों से भी दु:ख का नाम नहीं सुना। महाराज स्वयं जीवन वृक्ष की तरह उनकी सार-संभाल किया करते थे। सब माताएं भी दिन_रात उनकी ऐसी सार संभाल करती थीं, जैसे पलक नेत्रों की और सांप अपनी मणि की करते हैं।

















Sunday, 31 March 2024

अयोध्याकाण्ड

देखि दूरी तें कहि निज नामू। कीन्ह मुनीसहि दण्ड प्रनामू।। जानि रामप्रिय दीन्ह असीसा। भरतहिं कहेउ बुझाई मुनीसा।।_अर्थ_निषादराज ने मुनिराज वशिष्ठ जी को देखकर अपना नाम बतलाकर दूर से ही दण्डवत् प्रणाम किया। मुनीश्वर वशिष्ठ जी ने उसको राम का प्यारा जानकर आशीर्वाद दिया और भरत को समझाकर कहा ( कि यह श्रीरामजी का मित्र है)।







राम सखा सुनि स्यंदन त्यागा। चले उतरि उमगत अनुरागा।। गाउं जाति गुहं नाउं सुनाई। कीन्ह जोहारी माथ महि लाई।।_अर्थ_यह श्रीरामजी का मित्र है, इतना सुनते ही भरतजी ने रथ त्याग दिया। वे रथ से उतरकर प्रेम में उमंगते हुए चले। निषादराज गुह ने अपना गांव, जाति और नाम सुनाकर पृथ्वी पर माथा टेककर जोहार की।







करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ। मनहुं लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदय समाइ।।_अर्थ_दण्डवत् करते देखकर भरतजी ने उठाकर उसको छाती से लगा लिया। हृदय में प्रेम समाता ही नहीं है, मानो स्वयं लक्ष्मण जी से भेंट हो गयी हो।








भेंटत भरत ताहि अति प्रीती। लोग सहाहिं प्रेम को रीती।। धन्य_धन्य धुनि मंगल मूला। सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला।।_भरतजी गुह को अत्यंत प्रेम से गले लगा रहे हैं। प्रेम की रीति से सब लोग सिंहा रहे हैं ( ईर्ष्यापूर्व प्रशंसा कर रहे हैं ); मंगल की मूल ' धन्य_धन्य' की ध्वनि करके देवता उसकी सराहना करते हुए फूल बरसा रहे हैं।








लोक बेद सब भांतिहिं नीचा। जासु छांह छुइ लेइअ सींचा।। तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता। मिलती पुलक परिपूरित गाता।।_अर्थ_( वे कहते हैं _) जो लोक और वेद दोनों में सब प्रकार से नीचा माना जाता है, जिसकी छाया के छू जाने से भी स्नान करना होता है, उसी निषाद से अंकवार भरकर ( हृदय से चिपटाकर ) श्रीरामचन्द्रजी के छोटे भाई भरतजी ( आनंद और प्रेम वश ) शरीर में पुलकावली से परिपूर्ण हो मिल रहे हैं।








राम राम करि जे जमुहाहीं। तिन्हहिं न पाप पुंज समुहाहीं।। यह तौं राम लाइ उर लीन्हा। कुल समेत जग पावन कीन्हा।।_अर्थ_ जो लोग राम_राम कहकर जंभाई लेते हैं ( अर्थात् आलस्य से भी जिनके मुंह से राम नाम का उच्चारण हो जाता है), पापों के समूह ( कोई भी पाप ) उनके सामने नहीं आते। फिर इस गुह को तो स्वयं श्रीरामचन्द्रजी ने हृदय से लगा लिया और कुल समेत इसे जगत्पावन ( जगत् को पवित्र करनेवाला बना दिया।







करमनास जलु सुरसरि परई। तेहि को कहहु सीस नहिं धरइ ।। उलटा नाम जपत जग जाना। बाल्मीकि में ब्रह्म समाना।।_अर्थ_कर्मनाशा नदी का जल गंगाजी में पड़ जाता है ( मिल जाता है ), तब कहिये, उसे कौन सिर पर धारण नहीं करता ? जगत् जानता है कि उलटा नाम ( मरा_मरा ) जपते_जपते वाल्मीकिजी ब्रह्म के समान हो गये।










स्वपच सबर खस जमन जड़ पावंर कोल किरात । रामु कहत पावन परम होत भुवन विख्यात।।_अर्थ_मूर्ख और पामर चाण्डाल, शबर, खस, यवन, कोल और किरात भी रामनाम कहते ही परम पवित्र और त्रिभुवन में विख्यात हो जाते हैं।









नहिं अचिरिजु जुग जुग चलि आई। केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई।। राम नाम महिमा सुर कहहीं। सुनि सुनि अवध लोग सुखु लहहीं।।_अर्थ _इसमें कोई आश्चर्य नहीं है, युग_युगान्तर से यही रीति चली आ रही है। श्रीरघुनाथजी ने किसको बड़ाई नहीं दी ? इस प्रकार देवता रामनाम की महिमा कह रहे हैं और उसे सुन_सुनकर अयोध्या के लोग सुख पा रहे हैं।








रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा। पूंजी कुल सुमंगल खेमा।। देखि भरत कर सील सनेहू। भा निषाद तेहि समय बिदेहू।।_अर्थ_ रामसखा  निषादराज से प्रेम के साथ मिलकर भरतजी ने कुशल, मंगल और क्षेम पूछी। भरतजी का शील और प्रेम देखकर निषाद उस समय विदेह हो गया ( प्रेम मुग्ध होकर देह की सुध भूल गया)।








सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा। भरतहि चितइ एकटक ठाढ़ा।। धरि धीरजु पद बंदि बहोरी। बिनय सप्रेम करत कर जोरी।।_अर्थ_उनके मन में संकोच, प्रेम और आनंद इतना बढ़ गया कि वह खड़ा_खड़ा टकटकी लगाये भरतजी के चरणों की वन्दना करके प्रेम के साथ हाथ जोड़कर विनती करने लगा।








कुसल मूल पद पंकज पेखी। मैं तइहउं काल कुसल निज लेखी।। अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें।
सहित कोटि कुल मंगल मोरें।।_अर्थ_ हे रहो ! कुशल के मूल आपके चरणकमलों के दर्शन कर मैंने तीनों कालों में अपना कुशल जान लिया। अब आपके परम अनुग्रह से करोड़ों कुलों ( पीढ़ियों ) सहित मेरा मंगल ( कल्याण) हो गया।








समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियं जोइ। जो न भजइ रघुबीर पद जग बिना संचित सोइ।।_अर्थ_मेरी करतूत और कुल को समझकर और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की महिमा को मन में देख ( विचार ) कर ( अर्थात् कहां तो मैं नीच जाति और नीच कर्म करनेवाला जीव, और कहां अनन्त कोटि ब्रह्माण्डों के स्वामि श्रीरामचन्द्रजी ! पर उन्होंने मुझ जैसे नीच को भी अपनी अहैतु की कृपा वश अपना लिया_यह समझकर) जो रघुवीर श्रीरामचन्द्रजी के चरणों का भजन नहीं करता, वह जगत् में विधाता के द्वारा ठगा गया है।






कपटी कायर कुमति कुजाति। लोक बेद बाहेर सब भांती।। राम कीन्ह आपन जबही तें। भयउ भुवन भूषन तबही तें।।_अर्थ_मैं कपटी, कायर, कुबुद्धि और कुजाति हूं और लोक_वेद दोनों से सब प्रकार से बाहर हूं। पर जबसे श्रीरामचन्द्रजी ने मुझे अपनाया है, तभी से मैं विश्व का भूषण हो गया।







देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई। मिलेउ बहोरी भरत लघु भाई।। कहि निषाद निज नाम सुबानीं।
सादर सकल जोहारीं रानी।।_अर्थ_ निषादराज की प्रीति को देखकर और सुन्दर विनय सुनकर फिर भरतजी के छोटे भाई शत्रुध्नजी उससे मिले। फिर निषाद ने अपना नाम ले_लेकर सुन्दर ( नम्र और मधुर ) वाणी से सब रानियों को आदरपूर्वक जोहार की।






Sunday, 17 March 2024

अयोध्याकाण्ड

होहु संजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल
मरै कर ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊं। जिअत न सुरसरि उतरन देऊं।।_अर्थ_सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने का साज सजा लो ( अर्थात् भरत से युद्ध में मरने के लिये तैयार हो जाओ )। मैं भरत से सामने ( मैदान में ) लोहा लूंगा (: मुठभेड़ करूंगा) और जीते_जी उन्हें गंगापार उतरने न दूंगा।





होहु संजोइल रोकहु घाटा। ठाटहु सकल मरै के ठाटा।। सनमुख लोह भरत सन लेऊं। जिअत न सुरसरि उतरन देऊं।।_अर्थ_सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने के साथ सजा लो ( अर्थात् भरत से युद्ध में लड़ने के लिये तैयार हो जाओ )। मैं भरत से सामने ( मैदान में ) लोहा लूंगा ( मुठभेड़ करूंगा ) और जीते_जी उन्हें गंगापार उतरने न दूंगा।






समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा। राम काजु छनभंगु सरीरा।। भरत भाई नृपु मैं जन नीचू। बड़ें भाग अहि पाइअ मीचू।।_अर्थ_युद्ध में मरण, फिर गंगाजी का तट, श्रीरामजी का काम और क्षणभंगुर शरीर ( जो चाहे जब नाश हो जाय )। भरत श्रीरामजी के भाई और राजा ( उनके हाथ से मरना ) और मैं नीचे सेवक_बड़े भाग से ऐसी मृत्यु मिलती है।






स्वामि काज करिहउं रन रारी। जब धवलिहउं भुवनु दस चारी।। तजउं प्रान रघुनाथ निहोरें। दुहूं हाथ मुद मोदक मोरें।।_अर्थ_मैं स्वामी के काम के लिये रण मेंश लड़ाई करूंगा और चौदहों लोकों को अपने यश से उज्जवल कर दूंगा। श्रीरघुनाथजी के निमित्त प्राण त्याग दूंगा। मेरे तो दोनों ही हाथों में आनन्द के लड्डू हैं ( अर्थात् जीत गया तो रामसेवक का यश प्राप्त करूंगा और मारा गया तो श्रीरामजी की नित्य सेवा प्राप्त करूंगा )।





साधु समाज न जाकर लेखा। राम भगत महुं जासु न रेखा।। जायं जिअत जग सो महिभारू। जननी जीवन विटप कुठारू।_अर्थ_साधुऔं के समाज में जिनकी गिनती नहीं और श्रीराम जी के भक्तों में जिसका स्थान नहीं वह जगत् में पृथ्वी का भार होकर व्यर्थ हो जाता है। वह माता के जीवन रूपी वृक्ष के काटने के लिये कुल्हाड़ामात्र है।






बिगत बिषाद निषाद पति सबहिं बढ़ाई उछाहु। सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु।।_अर्थ_(इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी के लिये प्राण समर्पण का निश्चय करके) निषादराज विषाद से रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके उसने तुरंत ही तरकस, धनुष और कवच मांगा।






चले निषाद जोहारि जोहारी। सूर सकल रन रूचइ रारी।। सुमिरि राम पद पंकज पनहीं। माथीं बांधि चढ़ाइन्हि धनहीं।_अर्थ_ निषादराज को जोहार कर_करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राम में लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों की जूतियों का स्मरण करके उन्होंने भांजियां ( छोटे_छोटे तरकस ) बांधकर धनुहियों ( छोटे_छोटे धनुषों )_पर प्रत्यंचा चढ़ायीं।







अंगरी पहिरि कूड़ि सिर धरहीं। फरसा बांस सेल समय करहीं।। एक कुशल अति ओड़न खांड़ें। कूदहिं गगन मनहुं छिति छांड़े।।_अर्थ_ कवच पहनकर लोहे का टोप सिर पर रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछों को सीधा कर रहे हैं ( सुधार रहे हैं)। कोई तलवार वार रोकने में अत्यंत ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंग में भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद ( उछल ) रहे हों।





निज निज साजु समाजु बनाई। गुह राउतहइ जोहारे जाई।। देखि सुभट सब लायक जाने। लै लै नाम सकल सनमाने।।_अर्थ_अपना_अपना साज समाज ( लड़ाई का सामान और दल ) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुह को जोहार की। निषादराज ने सुंदर योद्धाओं को देखकर सबको सुयोग्य जाना और नाम ले_लेकय सबका सम्मान किया।






भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि। सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि।।_अर्थ_( उसने कहा_)हे भाइयों ! धोखा न लाना ( अर्थात् मरने से न घबराना), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़े जोश सेके साथ बोल उठे_हे वीर ! अधीर मत हो।






राम प्रताप नाथ बल तोरे। करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे।। जीवत पाउ न पाएं धरहीं। रुंड मुंडमय मेदिनी करहीं।।_अर्थ_हे नाथ ! श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से और आपके बल से हमलोग भरत की सेना को बिना वीर और और बिना घोड़े के ही कर देंगे ( एक_एक वीर और एक_एक घोड़े को मार डालेंगे )। जीते_जी पीछे पांव न रखेंगे। पृथ्वी को रुण्ड_मुण्डमयी कर देंगे ( सिरों और धरों से छा देंगें )।





दीख निषादनाथ भल टोलू। कहेउ बजाउ जुझाऊ ढ़ोलू।। एतना कहते छींक भइ बांए।। कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए।।_अर्थ_निषादराज ने वीरों का बढ़िया दल देखकर कहा_जुझाऊ ( लड़ाई का ) ढ़ोल बजाओ। इतना कहते ही बायीं ओर छींक हुई। शकुन विचारने वालों ने कहा कि खेत सुन्दर है ( जीत होगी )।





बूढ़ु एक कह सगुन बिचारी। भरतहिं मिलइ न होइहि रारी।। रामहिं भरतु मनावन जाहीं। सगुन कहइ अस बिग्रह नाहीं।।_अर्थ_एक बूढ़े ने शकुन विचारकर कहा_ भरत से मिलना होगा, उनसे लड़ाई नहीं होगी। भरत श्रीरामचन्द्रजी को मनाने जा रहे हैं। शकुन ऐसा कह रहा है कि विरोध नहीं है।





सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझे। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।_अर्थ_यह सुनकर निषादराज गुह ने कहा_बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दी में ( बिना विचारे ) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजी का शील_स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करने में हित नहीं है।






सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा। सहसा करि पछताहिं बिमूढ़ा।। भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझे। बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें।।_अर्थ_यह सुनकर निषादराज गुह ने कहा_बूढ़ा ठीक कह रहा है। जल्दी में ( बिना विचारे ) कोई काम करके मूर्ख लोग पछताते हैं। भरतजी का शील_स्वभाव बिना समझे और बिना जाने युद्ध करने में हित नहीं है।





गहहु घाट भट समिति सब लेउं मिलि जाइ। बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउं आइ।।_अर्थ_अतएव हे वीरों ! तुमलोग इकट्ठे होकर सब घाटों को रोक लो, मैं जाकर भरतजी से मिलकर उनका भेद लेता हूं। उनका भाव मित्र का है या शत्रु का या उदासीन का, यह जानकर तब आकर वैसा ( उसी के अनुसार ) प्रबन्ध करूंगा।






लखि सनेहु सुभायं सुहाएं। बैरु प्रीति नहिं दुरइं दुराएं।। अस कहि भेंट संजोवन लागे। कंद मूल फल खग मृग मागे।।_अर्थ_उनके सुंदर स्वभाव से मैं उनके स्नेह को पहचान लूंगा। वैर और प्रेम छिपाने से नहीं छिपते। ऐसा कहकर वह भेंट का सामान सजाने लगा। उसने कंद, मूल, फल, पक्षी और हिरन मंगवाये।








मीन पीन पाठीन पुराने। भरि भरि भार कहारन्ह आने।। मिलन साजु सजि मिलन सिधाए। मंगल मूल सगुन सुभ पाए।।_अर्थ_कहारलोग पुराने और मोटी पहिना नामक मछलियों के भार भर_भरकर लाये। भेंट का सामान सजाकर मिलने के लिये चले तो मंगलदायक शुभ शकुन मिले।

Wednesday, 28 February 2024

अयोध्याकाण्ड

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहिं लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।_अर्थ_भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया ; और जो जिस योग्य था उसे उसी काम पर नियुक्त किया। सब व्यवस्था करके, रक्षकों को रखकर भरतजी राजमाता कौसल्याजी के पास गये।







आरती जननी जानि सब भरत सनेह सुजान। कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान।।_अर्थ_स्नेह के सुजान ( प्रेम के तत्व को जाननेवाले ) भरतजी ने सब माताओं को आर्त ( दु:खी ) जानकर उनके लिये पालकियां तैयार करने और सुखासन यान ( सुखपाल सजाने के लिये कहा।







चक्क चक्की जिमि पुर नर नारी। चाहत प्रात उर आरत भारी।। जागते सब निसि भयउ बिहाना। भरत बोलाएं सचिव सुजाना।।_अर्थ_नगर के नर_नारी चकवे_चकवी की भांति हृदय में अत्यन्त आर्त होकर प्रातःकाल का होना चाहते हैं। सारी रात जागते_जागते सवेरा हो गया। तब भरतजी ने चतुर मंत्रियों को बुलाया।








कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू। बनहिं देब मुनि रामहिं राजू।। बेगि चलिहउं सुनि सचिव जोहारे। तुरत तुरग रथ नाग संवारे।।_अर्थ_और कहा_तिल का सब सामान ले चलो। वन में ही मुनि वसिष्ठ जी श्रीरामचन्द्रजी को राज्य दे देंगे, जल्दी चलो। यह सुनकर मंत्रियों ने वन्दना की और तुरंत घोड़े, रथ और हाथी सजवा दिये।









अरुंधती अरु अगिनि समाऊ। रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ। बिप्र बृंद चढ़ि वाहन नाना। चले सकल तप तेज निधाना।।_अर्थ_सबसे पहले मुनिराज वसिष्ठ जी अरुंधति और अग्निहोत्र की सब सामग्री सहित रथ पर सवार होकर चले। फिर ब्राह्मणों के समूह, जो सब_के_सब तपस्या और तेज के भण्डार थे, अनेकों सवारियों पर चढ़कर चले।







नगर लोग सब सजि सजि जाना। चित्रकूट कहं कीन्ह पयाना।। सिबिका सुभग न जाहिं बखानी। चढ़ि चढ़ि चलत भईं सब रानी।।_नगर के सब लोग रथों को सजा_सजाकर चित्रकूट को चल पड़े। जिनका वर्णन नहीं हो सकता, ऐसी पालकियों पर चढ़_चढ़कर सब रानियां चलीं।







सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ। सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ।।_अर्थ_विश्वासपात्र सेवकों को नगर सौंपकर और सबको आदरपूर्वक रवाना करके, तब श्रीसीतारामजी के चरणों को स्मरण करके दोनों भाई चले।





राम दरस बस सब नर नारी। जनु करि करिनि चले तकि बारी।। बन सिय रामु समुझि मन माहीं। सानुज भरत पयादेहिं जाहीं।।_अर्थ_श्रीरामचन्द्रजी के दर्शन के वश में हुए ( दर्शन की अनन्य लालसा से ) सब नर नारी ऐसे चले मानो प्यासे हाथी_हथिनी जल को तककर ( बड़ी तेजी से बावले हुए ) जा रहे हों। श्रीसीतारामजी ( सब सुखों को छोड़कर ) वन में हैं, मन में ऐसा विचारके छोटे भाई शत्रुध्नजीसहित भरतजी पैदल ही चले जा रहे हैं।








देखि सनेहु लोग अनुरागे। उतरा चले हम गया रथ त्यागे।। जाइ समीप राखि निज डोली। रामु मातु मृदु बानी बोली।।_अर्थ_उनका स्नेह जानकर लोग प्रेम में मग्न हो गये और सब घोड़े, हाथी, रथों को छोड़कर उनसे उतरकर पैदल चलने लगे। तब श्रीरामचन्द्रजी की माता कौसल्याजी भरतजी के पास जाकर अपनी पालकी उनके समीप खड़ी करके कोमल वाणी से बोलीं__







तात चढ़हु रथ बलि महतारी। होइहि प्रिय परिवारु दुखारी।। तुम्हें चलत चलइहइ सबु लोगू। सकल सोक कृष नहिं मग जोगू।।_अर्थ_हे बेटा ! माता बलऐयआं लेती है, तुम रथ पर चढ़ जाओ, नहिं तो सारा प्यारा परिवार दु:खी हो जायगा। तुम्हारे पैदल चलने से सभी लोग पैदल चलेंगे। शोक के मारे सब दुबले हो रहे हैं पैदल रास्ते के ( पैदल चलने के ) योग्य नहीं है।






सिर धरि बचन चरन सिरु नाई। रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई।। तमसा प्रथम दिवस करि बासू।। दूसर गोमति तीर निवासू।।_अर्थ_माता की आज्ञा सिर चढ़ाकर और उनके चरणों में सिर नवाकर दोनों भाई रथ पर चढ़कर चलने लगे। पहले दिन तमसा पर वास ( मुकाम ) करके दूसरा मुकाम गोमति के तीर पर किया।





पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग। करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग।।_अर्थ_कोई दूध ही पीते, कोई फलाहार करते और कुछ लोग रात को एक ही बार भोजन करते हैं। भूषण और भोग_विलास को छोड़कर सब लोग श्रीरामचन्द्रजी के लिये नियम और व्रत करते हैं।







सईं तीर बसि चले बिहाने। सृंगबेरपुर सब निअराने।। समाचार सब सुने निषादा। हृदयं बिचार करइ सबिषादा।।_अर्थ_रातभर सई नदी के तीर पर निवास करके सवेरे वहां से चल दिये और  सब श्रृंगवेरपुर के समीप जा पहुंचे । निषादराज ने सब समाचार सुने, तो वह दु:खी होकर हृदय में विचार करने लगा_








कारन कवन भरतु बन जाहीं। है कछु कपट भाउ मन माहीं।। जौं पै जियं न होति कुटिलाईं। जौं कत लीन्ह संग कटकाई।।_अर्थ_क्या कारण है जो भरत वन को जा रहे हैं, मन में कुछ कपट भाव अवश्य है। यदि मन में कुटिलता न होती, तो साथ में सेना क्यों ले चले हैं।








जाहिं सानुज रामहिं मारी। करउं अकंटक राजु सुखारी।। भरत न राजनीति उर आनी। तब कलंकु अब जीवन हानी।।_अर्थ_समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीरामजी को मारकर सुख से निष्कंटक राज्य करूंगा। भरत ने हृदय में राजनीति को स्थान नहीं दिया ( राजनीति का विचार नहीं किया )। तब ( पहले ) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवन से ही हाथ धोना पड़ेगा।








सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा। रामहिं समर न  जीतनिहारा।। का आचरजु भरतु अस करहीं। नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं।।_अर्थ_संपूर्ण देवता और दैत्य वीर जुट जायें, तो भी श्रीरामजी को रण में जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है ? विष की बेलें अमृत फल कभी नहीं फलती।





अस बिचारि गुहं ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु। हथवांसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु।।_अर्थ_ऐसा विचाकर गुह  ( निषादराज) ने अपनी जाति वालों से कहा कि सबलोग सावधान हो जाओ। नावों को हाथ में ( कब्जे में ) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटों को रोक दो।






Saturday, 10 February 2024

अयोध्याकाण्ड

मातु सचिव गुर पुर नर नारी। सकल स्नेहन बिकल में भारी।। भरतहिं कहहिं सराहि सराही। राम प्रेम मूरति तनु आही।।_अर्थ_माता, मंत्री, गुरु, नगर के स्त्री_पुरुष सभी स्नेह के कारण बहुत _ही व्याकुल हो गये। सब भरतजी को सराह_सराहकर कहते हैं कि आपका शरीर श्रीरामप्रेम की साक्षात् मूर्ति ही है।



तात भरत अस काहे न कहहू। प्रान समान राम प्रिय अहहू।। जो पावंरउ अपनी जड़तआई। तुम्हहीं सुगाइ मातु कुटिलाईं।।_अर्थ_हे तात भरत ! आप ऐसा क्यों न कहें।  श्रीरामजी को आप प्राणों के समान प्यारे हैं। जो नीच अपनी मूर्खता से आपकी माता कैकेई की कुटिलता को लेकर आपपर संदेह करेगा।




सो सब कोटिक पुरुष समेता। बसिहिं कलप षट नरक निकेता।। अहि अघ अवगुन नहिं मनि गहई। हरई गरल दुख दारिद गहई।।_अर्थ_वह दुष्ट करोड़ों पुरखों सहित सौ कल्पों तक नरक के घर में निवास करेगा। सांप के पाप और अवगुण को मणि नहीं ग्रहण करती। बल्कि वह विष को हर लेती है और दु:ख तथा दरिद्रता को भस्म कर देती है।




अवसि चलिअ बन रामु जहां भरत मंत्र भल कीन्ह। सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलम्बन दीन्ह।।_अर्थ_हे भरतजी ! वन को अवश्य चलिये, जहां श्रीरामजी हैं। आपने बहुत अच्छी सलाह विचारी। शोक समुद्र में डूबते हुए सब लोगों को आपने बहुत ( बड़ा ) सहारा दे दिया।




भा सबके मन मोदु ने थोरा। जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा।। चलत प्रात लखि निरनउ नीके। भरतु प्रान प्रिय भें सबही के।।_अर्थ_सबके मन में कम आनंद नहीं हुआ ( अर्थात् बहुत ही आनंद हुआ ) मानो मेघों की गर्जना सुनकर चातक आनंदित हो रहे हों। ( दूसरे दिन ) प्रातःकाल चलने का सुन्दर निर्णय देखकर भरतजी सभी के प्राण प्रिय हो गये।




मुनिहिं बंदि भरतहिं सिरु नाई। चले सकल घर विदा कराई।। धन्य भरत जीवन जग माहीं। सीलु सनेहु सराहत जाही।।_अर्थ_मुनि वसिष्ठ जी की वन्दना करके और भरतजी को सिर नवाकर सब लोग विदा लेकर अपने_अपने घर को चले। जगत् में भरतजी का जीवन धन्य है, इस प्रकार कहते हुए वे उनके शील  स्नेह की सराहना करते जाते हैं।




कहहिं परस्पर भा बड़ काजू। सकल चले कर साजहिं साजू।। जेहिं राखहिं रहु घर रखवारी। सो जानइ जनु गरदनि मारी।।_अर्थ_आपस में कहते हैं, बड़ा काम हुआ। सभी चलने की तैयारी करने लगे। जिसको भी घर की रखवाली के लिये रहो, ऐसा कहकर रखते हैं, वहीं समझता है मानो मेरी गर्दन मारी गयी।




कोऊ कह रहन कहिअ नहिं काहू। को न चहइ जग जीवन लाहू।।_अर्थ_कोई कोई कहते हैं_रहने के लिये किसी को भी मत कहो, जगत् में जीवन का लाभ कौन नहीं चाहता ?




जरउ सो संपति सदन सुखु सुहृदु मातु पितु भाई। सनमुख हो जो राम पद करै न सहस सहाई।।_अर्थ_यह संपति, घर, सुख, माता_पिता, भाई जल जाय जो श्रीमजी के चरणों के सम्मुख होने में हंसते हुए ( प्रसन्नतापूर्वक ) सहायता न करे।




घर घर साजहिं वाहन नाना। हरषु हृदय परभात पयाना।। भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू। नगरु बाजी गज भवन भंडारू।।_अर्थ_घर_घर लोग अनेकों प्रकार की सवारियां  सजा रहे हैं। हृदय में बड़ा हर्ष है कि सवेरे चलना है। भरतजी ने घर जाकर विचार किया कि नगर घोड़े _हाथी, नगर, खजाना आदि_





संपति सब रघुपति के आही। जौं बिनु जतन चलौं तजि ताही।। जौं परिणाम न मोहि भलाई। पाप सइरओमनइ साईं दोहाई।_अर्थ_सारी सम्पत्ति श्रीरघुनाथजी की है। यदि उसकी रक्षा की व्यवस्था किये बिना, उसे ऐसे ही छोड़कर चल दूं, तो परिणाम में मेरी भलाई नहीं है। क्योंकि स्वामी का द्रोह सब पापों का शिरोमणि है।





करइ स्वामि हित सेवकु सोई। दूषन कोटि देइ किन कोई।। अस बिचारी सुचि सेवक बोले। जे सनेहु निज धरम न डोले।।_अर्थ_सेवक वहीं है जो स्वाऔऔमि का हित करे, चाहे कोई करोड़ों दोष क्यों न दे। भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया जो कभी स्वप्न में भी अपने धर्म से नहीं डिगे थे।





कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा। जो जेहिं लायक सो तेहिं राखा।। करि सबु जतनु राखि रखवारे। राम मातु पहिं भरतु सिधारे।।_अर्थ_भरतजी ने ऐसा विचारकर ऐसे विश्वासपात्र सेवकों को बुलाया ; और जो जिस योग्य था उसे उसी काम पर नियुक्त किया। सब व्यवस्था करके, रक्षकों को रखकर भरतजी राजमाता कौसल्याजी के पास गये।